गुरुवार, 22 जून 2017

तोमर वंशी महात्मा राम सा पीर रूणेचा राज०

पीरो के पीर बाबा रामदेव पीर रुनिचा

!!घणी घणी खम्मा राजा रामदेवजी ने !!
|| कौन थे राजा अजमल जी ||
!! क्यों कहते हैं बाबा !!
!! कौन थी डाली बाई !!
||श्री बाबा रामदेवजी की कथा
भगवान श्री रामदेव का अवतार संवत् १४६१ भांदों सुदी दोज शनिवार को पोखरण के तोमरवंशी राजा अजमल के यहां हुआ था। वह भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त और धर्मपरायण राजा थे, लेकिन नि:संतान होने के कारण दुखी रहते थे। नि:संतान होने के कारण उन्होंने द्वारकाधीश यात्रा के दौरान समुद्र में देह त्यागने का संकल्प किया और कूद गए। लेकिन जब आंख खुली तो वह द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के सामने थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर बरदान मांगने को कहा तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण जैसा पुत्र मांगा।


श्रीकृष्ण ने स्वंय बलरामजी के साथ उनके घर अवतरित होने का वरदान दिया। इसी वरदान के कारण पहले बलरामजी ने वीरमदेव के रूप में राजा अजमल की पत्नि मैढ़ादे के गर्भ से जन्म लिया, इसके नौ माह बाद भगवानश्रीकृष्ण श्रीरामदेव के रूप से पालने में अवतरित हुए। भगवान ने बालकाल से ही अपनी बाल लीलाएं दिखाना प्रारंभ की। पालने में प्रकट होने के बाद माता मैनादे को चमत्कार दिखाया, उनके आंचल से दूध की धार भगवान रामदेव के मुख में गिरने लगी और चूल्हे पर रखे बर्तन से उफन-उफन कर दूध बाहर गिर रहा था, उसे पालने से ही भुजा पसार कर उतार दिया। मां मैनादे को चतुरभुज रूप में दर्शन दिया। पांच वर्ष की उम्र में दर्जी रूपा द्वारा बनाए कपड़े के घोड़े को आकाश में उड़ाया वह तुरंत ही सजीव नीला घोड़ा हो गया। भैरव राक्षस को इसका पता चला तो उसने छोटे भाई आदू को रामदेव और वीरमदेव को पकडऩे भेजा, तब भगवान श्रीरामदेव ने घोड़े पर सवार होकर आदू नामक राक्षस को भाले से मारा।आदू के मरने के बाद उसने राज्य की जनता पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। श्री रामदेव ने भैरव राक्षस का वध कर राज्य की प्रजा को अत्याचारों से मुक्त कराया। व्यापारी लाखा बंजारा बैल गाडिय़ों में मिश्री भरकर पोखरण की ओर जा रहा था, तभी रास्ते में उसकी भेंट घोड़े पर आ रहे भगवान रामदेव से हुई, उन्होंने पूछा गाडिय़ों में क्या है तब लाखा ने कहा बाबजी नमक भरा है तो रामदेव जी ने कहा जैसी तेरी भावना। यह कहते ही गाडिय़ों की सारी मिश्री नमक बन गई। तब लाखा बंजारे को अपने झूठ पर पश्चाताप हुआ, उसने श्री रामदेव से माफी मांगी तब उन्होंने नमक को मिश्री बना दिया। बोहिता राजसेठ की नाव को समुद्र के तूफान से निकालकर किनारे लगाया। स्वारकीया भगवान रामदेव का सखा था उसकी मृत्यु शर्प के डंसने से हो गई तब श्री रामदेव जी ने उसका नाम पुकारा वह तुरंत ही उठकर बैठ गया। दला सेठ नि:संतान था, साधू संतों की सेवा उसका नित्य काम था भगवान श्री रामदेव की कृपा से उसे पुत्र प्राप्त हुआ उसने रूढि़चा स पत्नि बच्चे के साथ पैदल यात्रा की रास्ते में उसे लुटेरों ने मार दिया सिर धड़ से अलग कर दिया, भगवान श्रीरामदेव की कृपा से पुन: उसका सिर धड़ से जुड़ गया। भगवान रामदेव कलयुग के अवतारी हैं शेष शैय्या पर विराजमान महाशक्ति विष्णु का अवतार भगवान कृष्ण व भगवान राम का था। उसी शक्ति ने कलयुग में अवतार भगवान रामदेव के रुप में लिया था। उन्होंने अंधों को आंखें दी, कोढिय़ों का कोढ़ ठीक किया, लंगड़ों को चलाया। बाद में उन्होंने पोखरण राज्य अपनी बहिन लच्छाबाई को दहेज में दे दिया और रूढि़चा के राजा बने। यहीं पर संवत् १५१५ भादों सुदी ग्याहरस को ५३ वर्ष की आयु में जीवित समाधि ली। भगवान रामदेव की कृपा से आज भी उनके दरबार में अर्जी लगाने पर पीडि़त लोग ठीक हो रहे हैं।
!! कौन थे राजा अजमल !!
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राजस्थान में पोखरण के राजा श्री अजमल द्वापर में अर्जुन थे। उनका पूरा समय परिवार विवाद ,राजपाठ की लड़ाई में चला गया, भगवान कृष्ण का सानिध्य होते हुए भी वह उनकी सेवा नहीं कर सके। भगवान श्री कृष्ण जब मृत्यु लोक से वापिस अपने धाम जाने लगे तब अर्जुन ने कहा था कि हे भगवान आपका छत्रछाया पाकर भी में इस जन्म में आपकी सेवा नहीं कर पाया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा उसे कलयुग में सेवा करने का अवसर देंगे। कलयुग में वही अर्जुन पोखरण के तोमरवंशी राजा हुए और भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति की, श्री कृष्ण के दर्शन पाए। उन जैसा पुत्र मांगा इसी कारण भगवान श्री कृष्ण उनके घर श्रीरामदेव जी के रूप में पुत्र बनकर अवतरित हुए। सिर्फ तीन प्रतिशत ठीक नहीं होंगे भगवान रामदेव का कहना है कि उनके दरबार में आने वाले ९७ प्रतिशत पीडि़त ठीक होंगे, लेकिन तीन प्रतिशत वे लोग ठीक नहीं होंगे जो भगवान पर विश्वास नहीं रखते।
!! क्यों कहते हैं बाबा !!
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भगवान रामदेव की परीक्षा लेने मक्का के पीर आए थे, जब उन्होंने परीक्षा के बाद वापिस जाने के लिए आज्ञा मांगी तो श्रीरामदेव जी ने कहा कि अब तुम वापिस नहीं जाओगे, मेरे साथ ही रहोगे। क्योंकि पीरों को बाबा कहा जाता है। श्रीरामदेव तो पीरों के भी पीर हैं, इसलिए उन्हें भी लोग बाबा कहकर पुकारते हैं।रामा धणी के नाम से पुकारते हैं।
!! कौन थीं डॉली बाई !!
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द्वापर में भगवान श्री कृष्ण की भक्त कुबजा थीं भगवान ने उनकी भक्ति के कारण उनकी कूबड़ ठीक कर स्वास्थ्य शरीर किया था। वही कुबजा द्वारकाधीश के श्री रामदेव अवतार में डालीबाई बनीं और भगवान श्रीरामदेव की भक्ति की। उनको भगवान ने भक्त महासति डालीबाई का पद दिया।
|| समाधि ||
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बाबा रामदेवजी महाराज ने १५२५ को भादवा सुदी ११ के दिन रुणिचा गांव के राम सरोवर पर सब रुणिचा वासियों को समझाया तत्पश्चात आपने समाधी ली|रामदेव जी ने समाधी में खड़े होकर सब के प्रति अपने अन्तिम उपदेश देते हुए कहा प्रति माह की शुक्ल पक्ष की दूज को पूज पाठ, भजन कीर्तन करके पर्वोत्सव मनाना, रात्रि जागरण करना। प्रतिवर्ष मेरे जन्मोत्सव के उपलक्ष में तथा अन्तर्ध्यान समाधि होने की स्मृति में मेरे समाधि स्तर पर मेला लगेगा। मेरे समाधी पूजन में भ्रान्ति व भेद भाव मत रखना। मैं सदैव अपने भक्तों के साथ रहुँगा। इस प्रकार श्री रामदेव जी महाराज ने समाधी ली।प्रभु ने समाधी ली और प्रजा में शोक संचार हो गया, उनमे बेचैनी बढ़ गयी| दुखित होकर सभी पुकारने लगे और जब प्रजा से रहा नहीं गया तो उनहोंने समाधी को खोदा| समाधी खोदते ही उस जगह पर फूल मिले और सभी प्रजा ने नमन कीया और उस जगह पर बाबा कि समाधी बनाई |
॥ घणी घणी खम्मा राजा रामदेवजी ने

साभारः सुरेन्द्र सिंह जी भाटी "तेजमालता " जी

बुधवार, 21 जून 2017

चम्बल घाटी एक "सिंह अवलोकन"भाग १

=====हमारी चम्बल एक सिंह अबलोकन=====
उबड़ खाबड़ जमीन कभी सेकड़ो फिट गहरी खायी तो कभी सैकड़ो फिट ऊँचे पहाड़ नुमा ढलानों से छेँकुर,बबूल,गुग्गल,पीपल,पिलुआ,हिंस, नीम ,गुबड़ा,श्वेतार्क जेसी बहुमूल्य औषिधियो से परिपूर्ण एक क्षत्रीय बाहुल्य क्षेत्र हे "तंवर घार" जिसके उत्तर में भोर के समय स्वर्णमय आभा आच्छादन तो शाम को रजत प्रकीर्णन करती माता चम्बल की कल कल निनादिनी स्नेहबत्सलता का शुभाशीष मिलता हे ।

एक दृष्टि में आम जन्मानष् के कर्णो के द्वारा  श्रवण हुआ ये शब्द अक्सर मष्तिष्क में एक डरावनि छवि #डाकू का वृतचित्र बना देती किन्तु सत्य से मीलो दूर ले जाने बाला भरम हमारे मष्तिष्क पटल को संकीर्ण और संकीर्ण करता रहा ।
यथार्थ में इस वीर भूमि पर डाकू न होकर देश की संस्कृति एव धर्म को बचाने के करीव १५शताब्दी पहले मुगलो के विरुद्ध एक छापामार सैना का गठन तत्कालीन रियास्तदारो,जमीदारो ,ठाकुरो के सहयोग से हुआ ।
तत्कालिक तोमर,भदोरिया,कछवाह ,सिकरवार,परिहार क्षत्रिय कुलो से सुसज्जित सैना ने मुगलो को कभी इस क्षेत्र में दखल न होने दिया ।

जिसमे क्षेत्रीय दैवीय शक्तियो का सहयोग का भी वर्णन बुजुर्गो के श्री मुख से मिलता हे ।जिसमे 5 वि शताब्दी कालीन महादेव जी का पुरातन महुआदेव मन्दिर ठिकाना महुआ (महुआ,पालि,विजयगढ़) पर हुए महमूद गजनवी के हमले में गजनवी सैना मंदिर प्रांगड़ से पहले ही अंधी हो गयी थी ।
परिणीति में मलेक्ष्य सैना को गाजर मूली की तरह बीहड़ी खारो में ही काट कर निपटा दिया गया ।
जिसकी याद में आज भी फाल्गुन माह की तृतीय तिथि को बिशाल दंगल और मेले का आयोजन होता आ रहा हे ।

किसी भी दुष्ट आक्रमणकारी ने कभी फिर साहस न किया इस क्षेत्र में आक्रमण करने का ।
यही युद्ध शैली हल्दी घाटी के महान पूर्वज योद्धा  ग्वालियर महाराज श्री रामशाह तोमर जी ने अपनायी ।
छापामार,गुर्रिल्ला युद्ध का समिश्रण ही था की दुस्ट अकबर को बार मुह की खानी पड़ी मेवाड़ में ।

यहाँ के जल में ही ऐसी विलक्षण गुण विद्द्यमान हे की जिसे पान करते ही देशभक्ति मातृभूमि की भावनाये समन्दर के सामान असीम हो उठती हे ।
पोरसा तहसील हे मात्र 7 किमी दूर #पुरानी_कोंथर ठिकाने के अद्भुत कुए आज भी विद्यमान हे जिनके मात्र जलपान से लगातार 2वर्ष तक अंग्रेजी और सिंधिया फौज को रुलाये रखा ग्राम वासियो ने ।

शनै शनै समय के थपेड़ो में ये वीर भूमि जिस सैना के नाम से विख्यात थी वही उसी को अंग्रेज शाशन में  #वीर का अपभ्रंश बागी बना दिया जो आगे चलकर क्रान्ति की अलख में शामिल हुए बो बागी कहलाये अंततः ब्रिटिस सरकार की नीति फुट डालो शाशन करो लागू किया गया और कुछ मन्द बुद्धि,धन लोलुप प्राणियो को छद्म उपाधियों का लालच देकर इस क्षेत्र की अखण्डता को छिन्न भिन्न कर दिया गया ।

डकेत शब्द का प्रचलन भी इन्ही धन लोलुप गुलामो के कारण आया ।
सत्यता में ये क्रान्ति के नायक थे जिन्होंने रसूखदारों के जुल्म से त्रस्त होकर बीहड़ो का रास्ता लिया और स्वम ही स्वम को रायफल से न्याय दिलाने चम्बल की गोद में शरण ली ।
फिर चाहे बो रामप्रसाद बिस्मिल जी हो असफाक उल्ला खान हो या ठाकुर रोशन सिंन्ह जी
या नगरा के ठाकुर सूबेदार सिंह,माधो सिंह लाखन सिंह रुपा पण्डित ,फूंदी बाड़हि,जिलेदार सिंह ,हजूरी ,लायक,रमेश सिकरवार,रमेश राजावत इत्यादि या भारत की स्टेपल रेस के प्रशिद्ध धावक विश्व कीर्तिमान बनाने बाले पानसिंह तोमर ।
ये बागी स्वतः नहीं बने समय और मजबूरी में हथियार उठाना ही पढ़ता हे ।
(जिनपर क्रम बार समय मिलने पर चम्बल गाथा के साथ लिखूंगा )
(हालांकि कुछ दुस्ट डाकुओ ने सिर्फ लूटपाट ही की हे इसलिए उनका वर्णन निर्थक हे )
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आगे अंक क्रमश :
                  जय वीर भूमि "तंवरघार"

सोमवार, 19 जून 2017

हल्दी घाटी के वीर "महाराज रामशाह तोमर जी"


Ramshah Tomar

18 जून. 1576 को हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के मध्य घमासान युद्ध मचा हुआ था| युद्ध जीतने को जान की बाजी लगी हुई. वीरों की तलवारों के वार से सैनिकों के कटे सिर से खून बहकर हल्दीघाटी रक्त तलैया में तब्दील हो गई| घाटी की माटी का रंग आज हल्दी नहीं लाल नजर आ रहा था| इस युद्ध में एक वृद्ध वीर अपने तीन पुत्रों व अपने निकट वंशी भाइयों के साथ हरावल (अग्रिम पंक्ति) में दुश्मन के छक्के छुड़ाता नजर आ रहा था| युद्ध में जिस तल्लीन भाव से यह योद्धा तलवार चलाते हुए दुश्मन के सिपाहियों के सिर कलम करता आगे बढ़ रहा था, उस समय उस बड़ी उम्र में भी उसकी वीरता, शौर्य और चेहरे पर उभरे भाव देखकर लग रहा था कि यह वृद्ध योद्धा शायद आज मेवाड़ का कोई कर्ज चुकाने को इस आराम करने वाली उम्र में भी भयंकर युद्ध कर रहा है| इस योद्धा को अपूर्व रण कौशल का परिचय देते हुए मुगल सेना के छक्के छुड़ाते देख अकबर के दरबारी लेखक व योद्धा बदायूंनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली| बदायूंनी ने देखा वह योद्धा दाहिनी तरफ हाथियों की लड़ाई को बायें छोड़ते हुए मुग़ल सेना के मुख्य भाग में पहुँच गया और वहां मारकाट मचा दी| अल बदायूंनी लिखता है- “ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान के पोते रामशाह ने हमेशा राणा की हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहता था, ऐसी वीरता दिखलाई जिसका वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है| उसके तेज हमले के कारण हरावल में वाम पार्श्व में मानसिंह के राजपूतों को भागकर दाहिने पार्श्व के सैयदों की शरण लेनी पड़ी जिससे आसफखां को भी भागना पड़ा| यदि इस समय सैयद लोग टिके नहीं रहते तो हरावल के भागे हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार हो जाती|" 

राजपूती शौर्य और बलिदान का ऐसा दृश्य अपनी आँखों से देख अकबर के एक नवरत्न दरबारी अबुल फजल ने लिखा- "ये दोनों लश्कर लड़ाई के दोस्त और जिन्दगी के दुश्मन थे, जिन्होंने जान तो सस्ती और इज्जत महंगी करदी|"

हल्दीघाटी (Haldighati Battle) के युद्ध में मुग़ल सेना के हृदय में खौफ पैदा कर तहलका मचा देने वाला यह वृद्ध वीर कोई और नहीं ग्वालियर का अंतिम तोमर राजा विक्रमादित्य का पुत्र रामशाह तंवर Ramshah Tomar था| 1526 ई. पानीपत के युद्ध में राजा विक्रमादित्य के मारे जाने के समय रामशाह तंवर Ramsa Tanwar मात्र 10 वर्ष की आयु के थे| पानीपत युद्ध के बाद पूरा परिवार खानाबदोश हो गया और इधर उधर भटकता रहा| युवा रामशाह (Ram Singh Tomar) ने अपना पेतृक़ राज्य राज्य पाने की कई कोशिशें की पर सब नाकामयाब हुई| आखिर 1558 ई. में ग्वालियर पाने का आखिरी प्रयास असफल होने के बाद रामशाह चम्बल के बीहड़ छोड़ वीरों के स्वर्ग व शरणस्थली चितौड़ की ओर चल पड़े|

मेवाड़ की वीरप्रसूता भूमि जो उस वक्त वीरों की शरणस्थली ही नहीं तीर्थस्थली भी थी पर कदम रखते ही रामशाह तंवर का मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने अतिथि परम्परा के अनुकूल स्वागत सत्कार किया. यही नहीं महाराणा उदयसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह रामशाह तंवर के पुत्र शालिवाहन के साथ कर आपसी सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता प्रदान की| कर्नल टॉड व वीर विनोद के अनुसार उन्हें मेवाड़ में जागीर भी दी गई थी| इन्हीं सम्बन्धों के चलते रामशाह तंवर मेवाड़ में रहे और वहां मिले सम्मान के बदले मेवाड़ के लिए हरदम अपना सब कुछ बलिदान देने को तत्पर रहते थे|

कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी के युद्ध में रामशाह तोमर, उसके पुत्र व 350 तंवर राजपूतों का मरना लिखा है| टॉड ने लिखा- "तंवरों ने अपने प्राणों से ऋण (मेवाड़ का) चूका दिया|" तोमरों का इतिहास में इस घटना पर लिखा है कि- "गत पचास वर्षों से हृदय में निरंतर प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा का अंतिम प्रकाश-पुंज दिखकर, अनेक शत्रुओं के उष्ण रक्त से रक्तताल को रंजित करते हुए मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के निमित्त धराशायी हुआ विक्रम सुत रामसिंह तोमर|" लेखक द्विवेदी लिखते है- "तोमरों ने राणाओं के प्रश्रय का मूल्य चुका दिया|" भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी व इतिहासकार सज्जन सिंह राणावत एक लेख में लिखते है- "यह तंवर वीर अपने तीन पुत्रों शालिवाहन, भवानीसिंह व प्रताप सिंह के साथ आज भी रक्त तलाई (जहाँ महाराणा व अकबर की सेना के मध्य युद्ध हुआ) में लेटा हल्दीघाटी को अमर तीर्थ बना रहा है| इनकी वीरता व कुर्बानी बेमिसाल है, इन चारों बाप-बेटों पर हजार परमवीर चक्र न्योछावर किये जाए तो भी कम है|"

तेजसिंह तरुण अपनी पुस्तक "राजस्थान के सूरमा" में लिखते है- "अपनों के लिए अपने को मरते तो प्राय: सर्वत्र सुना जाता है, लेकिन गैरों के लिए बलिदान होता देखने में कम ही आता है| रामशाह तंवर, जो राजस्थान अथवा मेवाड़ का न राजा था और न ही सामंत, लेकिन विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में इस वीर पुरुष ने जिस कौशल का परिचय देते हुए अपना और वीर पुत्रों का बलिदान दिया वह स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है|"

जाने माने क्षत्रिय चिंतक देवीसिंह, महार ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा- "हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप यदि अनुभवी व वयोवृद्ध योद्धा रामशाह तंवर की सुझाई युद्ध नीति को पूरी तरह अमल में लेते तो हल्दीघाटी के युद्ध के निर्णय कुछ और होता| महार साहब के अनुसार रामशाह तंवर का अनुभव और महाराणा की ऊर्जा का यदि सही समन्वय होता तो आज इतिहास कुछ और होता|"

धन्य है यह भारत भूमि जहाँ रामशाह तंवर Ramshah Tanwar जिन्हें रामसिंह तोमर Ramsingh Tomar, रामसा तोमर Ramsa Tomar आदि नामों से भी जाना जाता रहा है, जैसे वीरों ने जन्म लिया और मातृभूमि के लिए उच्चकोटि के बलिदान देने का उदाहरण पेश कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श प्रेरक पैमाना पेश किया|
साभार ज्ञान दर्पण पत्रिका

शनिवार, 3 जून 2017

"एक मुस्लिम शहजादी और क्षत्रीय कुँवर की अद्भुत प्रेम कहानी "

""जब एक मुस्लिम शहजादी सती हुए राजपूत योद्धा के पीछे ""

==महारावल वीरमदेव सोनिगरा चौहान (जालौर)=====

राजस्थान का इतिहास शोर्य और बलिदानी गाथाओ से भरा है राजस्थान मे जहाँ भी जाऐँगे आपको वीरो कि शौर्य गाथाए सूनने को मिलेगी ऐसे स्थलो मे से एक है जालोर का स्वर्णगिरी दुर्ग जो देश भर मे अभेध दुर्गो मे गिना जाता है||

“आभ फटे धर उलटे कटे बखत रा कोर,
सिर कटे धर लडपडे जद छूटे जालोर ”

12 वीँ शताब्दी के अँतिम वर्षो मे जालोर दुर्ग पर चौहान राजा कान्हडदेव का शासन था इनका पुत्र कुंवर वीरमदेव चौहान समस्त राजपूताना मे कुश्ती का प्रसिद्ध पहलवान था एवँ कूशल
यौद्धा था छोटी आयू मे भी कई यूद्धो मे कुशल सैन्य सँचालन कर अपनी सैना को विजय दिलाई थी ||

वीरमदेव कि ख्याति सुनकर, उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व को देख कर दिल्ली के बादशाह अल्लाउदिन खिलजी कि बेटी शहजादी फिरोजा(सताई) का दिल विरमदेव पर आ गया तथा शहजादी ने किसी भी किमत पर विरमदेव से विवाह करने तथा अपनाने कि जिद पकड ली,

“वर वरुँ तो विरमदेव ना तो रहुँगी अकन कूँवारी ”

शहजादी कि हठ सूनकर दिल्ली दरबार मे कौहराम मच गया काफी सोच विचार के बाद अपना राजनैतिक फायदा देख बादशाह खिलजी इसके लिए तैयार हुआ शादी का प्रस्ताव जालोर दुर्ग पहुँचाया गया मगर विरमदेव ने तूरँत प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा,

"मामा लाजै भाटियाँ कूल लाजै चौह्वान,
जौ मे परणुँ तुरकाणी तो पश्चिम उगे भान”

(मतलब मेरे मामा भाटी वंश से है में खुद चौहान एक तुर्कन से कैसे शादी करू मेरा वंश अपवित्र हो जायेगा ऐसा तभी संभव है जब सूरज पश्चिम से उगेगा )

परिणामत युद्ध का ऐलान हुआ लगभग एक वर्ष तक तुर्को कि सैना जालोर पर घेरा लगाए बैठी रही फिर युद्ध प्रारँभ हुआ किल्ले की हजारो  राजपूतनियो ने जौहर की रस्म निभायी, मात्र 22 वर्ष कि अल्पायू मे खुद विरमदेव केसरिया बाना पहन कर सबसे आगे सैना का नैतृत्व कर रहा था और इस भयँकर यूद्ध मे विरमदेव विरगति को प्राप्त हो गया ||

तूर्कि सैना विरमदेव का सिर दिल्ली ले गयी तथा शहजादी के सामने रख दिया जब शहजादी ने मस्तक को थाली मे रखवाया और मस्तक से शादी करने की बात कही तो मस्तक अपने आप थाली से पलट गया लेकिन शहजादी भी अपने वादे पर अडीग थी शादी करुँगी तो विरमदेव से वर्ना कूँवारी मर जाऊँगी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”……………।

वीरमदेव ने अपना कर्तव्य निभाया और एक हिन्दू होने के नाते मरने को तैयार हुआ पर एक तूर्कि मुस्लिम शहजादी से शादी नही की वही एक मुस्लिम शहजादी एक हिन्दू राजा के प्रेम मे इतनी कायल हुई कि उसके लिए अपनी जान तक दे दी अतँत शहजादी मस्तक को अपने हाथ मे लेकर यमूना नदी मे कूद कर विरमदेव के पिछे सती हो गयी”

आज इस वीर की जयंती हर साल मनाई जाती है जालोर,राजस्थान में इनके नाम पर होस्टल,कॉलेज और चौराहे के नाम रखे गए है ।
                  
  साभार -: ज्ञान दर्पण पत्रिका

गुरुवार, 1 जून 2017

आखिर क्या हे लचित बोरोफुकन जिनके नाम पर NDA बेस्ट केडर का मैडल मिलता हे ।

कौन हैं ये "लचित बोरफुकन" ? लेख को पूरा पढ़ने पर आपको भी ज्ञात हो जाएगा कि क्यों वामपंथी और मुगल परस्त इतिहासकारों ने इस नाम को हम तक पहुचने नहीं दिया |

क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे उत्तर भारत पर अत्याचार करने वाले मुस्लिम शासक और मुग़ल कभी बंगाल के आगे पूर्वोत्तर भारत पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सके ?

कारण था वो सनातन धर्म का योद्धा जिसे वामपंथी और मुग़ल परस्त इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया - असम के परमवीर योद्धा
"लचित बोरफूकन।"

अहोम राज्य (आज का आसाम या असम) के राजा थे चक्रध्वज सिंघा और दिल्ली में मुग़ल शासक था औरंगज़ेब।
औरंगज़ेब का पूरे भारत पे राज करने का सपना अधूरा ही था बिना पूर्वी भारत पर कब्ज़ा जमाये।

इसी महत्वकांक्षा के चलते औरंगज़ेब ने अहोम राज से लड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का नेतृत्व कर रहा था राजपूत राजा राजाराम सिंह।
राजाराम सिंह औरंगज़ेब के साम्राज्य को विस्तार देने के लिए अपने साथ 4000 महाकौशल लड़ाके, 30000 पैदल सेना, 21 राजपूत सेनापतियों का दल, 18000 घुड़सवार सैनिक, 2000 धनुषधारी सैनिक और 40 पानी के जहाजों की विशाल सेना लेकर चल पड़ा अहोम (आसाम) पर आक्रमण करने।

अहोम राजय के सेनापति का नाम था
"लचित बोरफूकन।"
कुछ समय पहले ही लचित बोरफूकन ने गौहाटी को दिल्ली के मुग़ल शासन से आज़ाद करा लिया था।
इससे बौखलाया औरंगज़ेब जल्द से जल्द पूरे पूर्वी भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहता था।

राजाराम सिंह ने जब गौहाटी पर आक्रमण किया तो विशाल मुग़ल सेना का सामना किया अहोम के वीर सेनापति "लचित बोरफूकन" ने।

मुग़ल सेना का ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे रास्ता रोक दिया गया। इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10000 सैनिक मारे गए और "लचित बोरफूकन" बुरी तरह जख्मी होने के कारण बीमार पड़ गये।
अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ। राजाराम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा। जिसको राजा चक्रध्वज ने "आखरी जीवित अहोमी भी मुग़ल सेना से लडेगा" कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

लचित बोरफुकन जैसे जांबाज सेनापति के घायल और बीमार होने से अहोम सेना मायूस हो गयी थी। अगले दिन ही लचित बोरफुकन ने राजा को कहा कि जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के खतरे से जूझ रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे कर सकता हूँ ? मैं युद्ध भूमि से बीमार और लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें....

इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर वो ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमे "लचित बोरफुकन" ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुग़ल सेना को रौंद डाला। अनेकों मुग़ल कमांडर मारे गए और मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। जिसका पीछा करके "लचित बोरफुकन" की सेना ने मुग़ल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया। इस युद्ध के बाद कभी मुग़ल सेना की पूर्वोत्तर पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई। ये क्षेत्र कभी गुलाम नहीं बना।

ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर मिली उस ऐतिहासिक विजय के करीब एक साल बाद ( उस युद्ध में अत्यधिक घायल होने और लगातार अस्वस्थ रहने के कारण ) भारत देश की भूमि का ये सपूत यह अदभुत वीर लाड़ला सदैव के लिए माँ सामान भारत भूमि के आँचल में सो गया |

भारत देश की भूमि के इस वीर सपूत को 24 मई जन्म जयंती  ऐसे अद्वितीय पुत्र को कोटि - कोटि नमन ।
                       जय भवानी
साभार -:मनोज राणा जी

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...