सोमवार, 22 मार्च 2021

गजल

जब कलम और कर्म दोनों खाली हो,
चल-जिंदगी में बहुत कुछ सबाली हों!

क्यों न खुद कोई तस्वीर उतारी जाये,
देखे औरो को खुदी को? गाली दी जाये!

तह पर तह लगाए कब तक जिये यारा,
शल्कों में छिपी शक्लें क्यों निकाली जाये!

अब तो परिंदों ने घरौंदे रखना छोड़ दिया,
चल दूर कंही दरिया में कस्ती उतारी जाये!

वक्त बहुत आये बहुत से निकलते जाएंगे 
भूल की भूले चल भूलकर भूल डाली जाए !!

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मंगलवार, 19 जनवरी 2021

यादों का इडियट बॉक्स

#यादों_का_इडियट_बॉक्स

ऐ सुनो! 
यह जो तुम...मुझे नित्य याद करते हो न,उसकी एक कसक तो मुझे भी होती है,पता ही नही चलता कि मर्म समझकर भी यह मर्मान्तक अहसास इतनी पुनरावृत्ति क्यों करता है?
आजकल हमारे वीराने में तुम्हारे साथ बिताये उन स्मृत पलो की एक-एक कड़ी सरसो के पौधों की तरह दक्षिणावृत्त होकर झुक सी गयी है,जैसे सजृन और फलन का दायित्व बढ़ गया हो..जैसे एक ऋण से उऋण होने के  लिये अपना सर्वस्व शनै-शनै क्षीण होते हुये मूकदर्शक बनकर निहार रहा होऊँ !
क्षीण होते वास्तविक दृश्य में सहसा तुम्हारी कल्पना भी दृश्य होती है!ठीक सरसो के फूलों की तरह...एक केशरिया छटा बनकर तुम्हारे पीत बस्त्रो में आने का बोधन कराती है और में गुम हो जाता हूँ कंही दूर वीराने में तुम्हे खोजता हुआ सा किन्तु तुम कस्तूरी की तरह उपवन महकाकर मुझे विस्मृतातीत कर चुके हो !!

यह जो गेंहू के नन्हे पौधों पर शबनमी बुंदे है न वह मुझे स्मरण दिलाती है,तुम्हारे ओष्ठ के वांयी तरफ कुदरत ने सजाये उस तिल की ,जिससे मुझे सबसे अधिक जलन होती थी,आखिर दमकती चेहरे की आभा पर वह आकर्षण अतिरेक का माध्यम जो बना था। 
हरितलबनी से परिपूर्ण पातों पर जब भुवनभास्कर की रश्मियां अपना तेज बिखेरती है न,तब मुझे आभाष होता है कि मैने भी 'सुगन्ध' को 'पाश' में संजोने का दुर्लभ प्रयास किया था!परन्तु हृदय से स्पंदन और आत्मा से परमात्मा बिलग करने का हठ जो था ..!!

आजकल हमारे यहाँ कुछ अलग सा आकर्षक कुहासा  होता है जैसे तुम्हारे बालो की चेहरे बाली लट परिपक्वता का शंदेश लाकर धबल हो गयी हो..नेत्र तीक्ष्णता ऐनक में लगी डंडी उसे आज भी सम्भाल पाती है....उसे तेजी से सम्भालते कंकन किंकिर हाथों की ध्वनि प्रेमातीत हुये हर स्मरण का आभास तो देती है किंतु बड़ा दुर्लभ है 'पानी' से 'पानी' पर "पानी" लिखना और कल की बातों को विस्मृत कर  आज की यादों को स्मृत रखना ... !

फागुन कल आएगा और भोरे अपना राग गाएंगे,हम तो मुसाफिर थे साथी रंग लगे न लगे अपना रंग न बदल पाएंगे।चलते रहेंगे उन्ही राहों में बार-बार ..अब तक न लौटे,अब क्या लौट के खाक जाएंगे ..?

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बुधवार, 13 जनवरी 2021

बाबा कीनाराम

-------:अघोर साधक बाबा कीनाराम:-------        ********************************
 यह घटना 1757 की है जब एक महान् अघोर साधक अपने गुरु को खोजते- खोजते गिरिनार की लम्बी यात्रा करते हुये काशी के हरिश्चन्द्र घाट के महाश्मशान पहुंचे। चुपचाप एक कोने में बैठे हुए अपने गुरु को निहार रहे थे। उनके नेत्र सहसा ही गीले हो गए थे। बस, वे जानना चाह रहे थे कि गुरु उन्हें पहचानते भी हैं या नहीं।
       प्रातःकाल का समय था। सर्द हवा पूरी तेजी से चल रही थी। भगवान् भास्कर धीरे-धीरे नीले आकाश में अपनी सिन्दूरी आभा बिखेर रहे थे। काशी का वह पूरा घाट स्वर्ण आभा से मण्डित हो गया था जिस कारण मानो गंगा की धारा में हज़ारों स्वर्ण कण बिखरे पड़े थे और अपनी चमक से अपनी असीम ऊर्जा बिखेर रहे थे। केदार घाट पर केदारेश्वर के मन्दिरोँ से घण्टों की गम्भीर आवाज़ एक प्रकार से आध्यात्मिक चेतना-सी जाग्रत  कर् रही थी। श्मशान की जलती चिताएं वायु के झोंकों से और भी विकराल हो रही थीं और कुछ बुझ चुकी थीं। श्मशान के चारों तरफ फैली बिखरी हड्डियां, मालाएं, मुर्दे के जलने से निकलती गन्ध--सब मिलकर एक मिला-जुला-सा रहस्यमय वातावरण उतपन्न हो रहा था। पीपल के पेड़ पर बैठे कौओं और गिद्धों की कर्कश ध्वनि वातावरण को और भी भयानक बना देती। ऐसा लगता था जैसे चिताओं में सुलगती आत्माएं मुक्ति की गुहार लगा रही हों। गंगा की उत्ताप तरंगें गतिमान वायु से टकराकर छप-छप कर् रही थीं, मानों व्याकुल चिताओं को शान्ति प्रदान करने की कोशिश कर् रही हों।
      एक ओर सृजन हो रहा है और दूसरी ओर महान् सत्य साकार हो रहा है। हरिश्चन्द्र घाट मुक्तिदायिनी काशी का प्रागेतिहासिक महाश्मशान है। जहाँ देवाधिदेव मृत्युंजय भगवान् शिव का प्रिय निवास है। कभी इसी शमशान घाट पर राजा हरिश्चंद्र डोम सरदार की चाकरी करते थे और उनकी पत्नी रानी तारा सर्प-दंश से मृत अपने पुत्र रोहिताश्व का अन्तिम संस्कार हेतु जब हरिश्चन्द्र के सामने उपस्थित हुई तो अपने कर्म के प्रति सजग हरिश्चन्द्र ने बिना शमशान का कर चुकाए अन्तिम संस्कार के लिए मना कर् दिया था।
      इसी महान् श्मशान में महाश्मशानेश्वर महादेव के समक्ष एक साधक अविचल मुद्रा में ध्यानस्थ था। तेजश्वी मुख, शुभ्र् श्वेत वस्त्र, ऊपर का भाग् निर्वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, शरीर पर चिता की राख लपेटे घनी जटा- जूट। ऐसा लग रहा था मानों साक्षात् महा मृत्युंजय समाधिष्ठ हैं।

      सूर्य की रक्तिम आभा उस तेजस्वी के मुख को और भी रक्तिम कर रही थी। पास ही एक झोला पड़ा था और पड़ी थी सिन्दूर पुती हुई एक मानव खोपड़ी। धीरे-धीरे सन्यासी अपने नेत्र खोलता है, चारों तरफ सरसरी दृष्टि से लोगों को देखता है, फिर महादेव को प्रणाम कर कुछ मन्त्र पढ़ता है।
       जलती चिताओं के पास पहुँच कर, उसमें से भस्म लेकर शरीर में लगाकर, अपने गन्तव्य की ओर चलने से पहले ज़मीन पर पड़ी उसी सिद्ध खोपड़ी से बोलता है--चल रे ! काहे ज़मीन पर पड़े-पड़े सो रहा है ?
       ये थे महान् अघोरी साधक कालूराम। उनका रोज़ का काम था साधना करना, कभी-कभी शव-साधना करना। यही क्रम वर्षो से चलता आ रहा था। प्रातः उठते ही अपनी सिद्ध खोपड़ी को आवाज़ लगाते। खोपड़ी हवा में उछलकर बाबा के हाथों में आ जाती और फिर उसे हाथ में लेकर भद्रवन की ओर चल पड़ते। आज जहाँ #क्रीमकुण्ड है, वहां पहले घना वन था--औघड़ साधकों का साधना-स्थल। तमाम औघड़ साधक वृक्षों के नीचे बैठे साधना करते रहते। बाबा कालूराम का उसी भद्रवन में एक विशेष् स्थान था जो वर्तमान में क्रीमकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान में आज उनकी समाधि भी है।
      खैर, वह मानव खोपड़ी आज रोज की तरह उछलकर बाबा के हाथों में नहीं आयी, जहाँ की तहाँ पड़ी रही।  बाबा कालूराम को पहले तो थोड़ा आवेश आ गया, उनका चेहरा तमतमा गया। लेकिन जब उन्होंने नज़र घुमाकर देखा--श्मशान के पास घने पीपल के वृक्ष के नीचे एक युवा साधक साधन-रत है। बीस-बाइस साल का युवक, हल्की-हल्की दाढ़ी-मूंछ, बड़े-बड़े घने घुंघराले काले बाल कंधों तक फैले हुए, शुभ्र् श्वेत वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की पतली माला, हाथ में कमण्डल--साक्षात् बाल शिव जैसा मोहक स्वरूप। बाबा कालूराम को तुरन्त आभास हो गया कि वह कोई साधारण युवक नहीं है, कोई सिद्ध युवा साधक है। इसी युवक ने मेरी सिद्ध मानव खोपड़ी को स्तंभित कर् रखा है।
      बाबा को अब किसी प्रकार का क्षोभ नहीं रहा, बल्कि उस साधक को देखकर उनके हृदय में वात्सल्य उमड़ आया--जैसे कोई अपना वर्षों से बिछुड़ा हुआ अचानक सामने आ गया हो। बाबा कालूराम चलते हुए उस युवक के पास पहुंचे। युवक ने झुककर बाबा कालूराम का चरण स्पर्श किया और कहा--मैं कीनाराम और यह मेरा शिष्य बीजाराम है। बीजाराम ने भी बाबा का झुकाकर चरण स्पर्श किया। बाबा ने पूछा--काशी में कैसे आना हुआ ? 
        कीनाराम बोले--गिरिनार से आ रहा हूँ तपस्या पूर्ण करके अपने गुरु की तलाश में। अनुभूति हुई कि गुरुदेव का दर्शन  काशी में होगा, बस चला आया।
       इतना कहकर कीनाराम चुप हो गए। बाबा कालूराम बस मुस्करा दिए, फिर बोले--तेरा गुरु तो तुझे मिल जायेगा, पहले कुछ खिलाओ, बड़ी भूख लगी है।
        क्या खाएंगे ?--कीनाराम ने पूछा।
        मछली खाने की इच्छा हो रही है।--बाबा कालूराम बोले। कीनाराम गंगा की ओर मुंह करके खड़े हो गए, फिर भगवती गंगा को हाथ जोड़कर उन्होंने प्रणाम किया। फिर कोई मन्त्र बुदबुदाया--देखते ही देखते दर्जनों मछलियां गंगा से उछल- उछल कर सामने जलती हुई चिता की आग में गिरने लगी। धड़ाधड़ एक के बाद एक मछली जलती चिता में गिर रही थी। बाबा कालूराम चिल्लाये--अरे ! पूरी गंगा की मछली निकाल देगा क्या ? बस कर, कीनाराम, बहुत है।
       वहां पर खड़े लोगों ने देखा--चिता मछलियों से भर गई थी। कीनाराम बोले--बीजाराम, जा अच्छी-अच्छी भुनी हुई मछली ले आ बाबा के लिए। बीजाराम मछली निकाल कर ले आया।बाबा आनंद-मग्न होकर मछली खाने लगे। इसके बाद बाबा कालूराम, कीनाराम और बीजाराम एक साथ चल पड़े भद्रवन की ओर।--------:अघोर साधक बाबा कीनाराम:-------
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                         भाग--02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी के अध्यात्म-ज्ञानप्रवाह में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

         
       एकाएक बाबा कालूराम रुक गए और पलटकर गंगा की ओर देखकर बोले--कीनाराम, देख, कोई शव बहा जा रहा है। कीनाराम तुरन्त बोले--नहीं बाबा, वह जिन्दा है।
       तो बुला उसे।
       कीनाराम वहीँ से चिल्लाकर बोले--इधर आ, कहाँ बहता जा रहा है ? 
        तत्काल वह शव विपरीत दिशा में घूमा और घाट के किनारे आ लगा। फिर धीरे-धीरे उठा और फिर पूरी ताक़त बटोर कर खड़ा हो गया सामने आकर हाथ जोड़कर, मूकवत। कीनाराम बोले--खड़ा-खड़ा मेरा मुंह क्या देख रहा है ? जा अपने घर, तेरी माँ रो-रो कर पागल हो रही है।
       तत्काल वह दौड़ता हुआ घर की ओर भागा और माँ से अपनी जीवित होने की कथा सुना डाली। माँ को विश्वास नहीं हो  रहा था। वह उसी हाल में अपने बेटे को लेकर उलटे पांव घाट की ओर भागी। तब तक सभी लोग घाट की सीढ़ी चढ़कर सड़क पर आ गए थे। तभी कीनाराम की दृष्टि सामने पडी। देखा--वही बालक अपने माँ के साथ भागता हुआ चला आ रहा है।
       कीनाराम कुछ समझ पाते,  उस बालक की माँ आकर कीनाराम के पैरों पर गिर पड़ी। कीनाराम ने उसको उठाया, आने का कारण पूछा तो वह बोल उठी--बाबा ! आपकी कृपा से मेरा बेटा पुनः जीवित हो गया। इसके लिए मैं आपकी सदा ऋणी रहूंगी। लेकिन यह आप ही हैं जिन्होंने इसे जीवन दान दिया है। अब यह आपका ही है। मेरी दी हुई जिंदगी तो ख़त्म हो चुकी थी, बाबा, अब आप इसे अपने चरणों में स्थान दीजिए। इसे मैं आपको सौंपती हूँ। कीनाराम बाबा कालूराम की ओर प्रश्नभरी दृष्टि से देखने लगे। बाबा कुछ बोले नहीं, बस सिर हिलाकर उन्होंने अपनी सहमति दे दी। आगे चलकर बाबा ने उस बालक का नाम 'राम जियावन' रखा जो आगे चलकर सिद्ध अघोरी बने।
      सभी लोग भद्रवन पहुंच बाबा की कुटिया के पास पड़ी हुई चटाई पर बैठ गए। सभी लोग आराम करने लगे। रात्रि में श्मशान घाट जाना था साधना करने। 
       एक दिन कीनाराम से रहा नहीं गया।  बाबा कालूराम के पास पहुंचे और उनके पास चुपचाप बैठ गए। बाबा ने पूछा--कीनाराम, क्या बात है चुपचाप आकर बैठ गए हो मेरे पास। कोई जिज्ञासा तो नहीं है ? 
      कीनाराम कुछ पल किसी गहरे सोच में डूबे रहे। फिर बोले--बाबा बचपन से मेरा मन अशान्त था। हर पल एक खालीपन-सा परेशान करता रहता। कुछ समझ में नहीं आता तो 'राम-राम' की माला जपने लगता। गुरु बनाया, उनके सान्निध्य में साधना भी की, लेकिन मन नहीं लगा। भारत के सभी धर्म-स्थलों पर गया। फिर भी मन अशान्त रहा। जब गिरनार गया तो भगवान् दत्तात्रेय मन्दिर में रहकर कठोर साधना की। भगवान् दत्तात्रेय के दर्शन लाभ भी हुए और ऐसी अनुभूति हुई कि भगवान् दत्तात्रेय कह रहे हैं कि काशी जाओ, वहीँ तुम्हारा कर्मक्षेत्र मिलेगा। बस, फिर क्या था, काशी के लिए चल पड़ा। सर्वप्रथम गंगा स्नान कर् भगवान् विश्वनाथ का स्मरण कर् एक वृक्ष के नीचे बैठा रहा। बस, आपको देखा तो मन को बड़ी शान्ति मिली। इसके बाद की तो सारी कथा आपको पता ही है।
       बाबा कालूराम कुछ पल चुप रहे फिर बोले--कीनाराम ! अब समय आ गया है रहस्य बतलाने का...तो सुनो, तुम्हारा जन्म विशेष् कार्य प्रयोजन के लिए हुआ है। तुम तो जीवन-मुक्त जाग्रत अघोर साधक हो। पता नहीं, कितने जन्मों से तुम्हारी साधना चली आ रही हैं। आज तुम्हारे पास जो सिद्धियां हैं, वे जन्म-जन्मान्तरों से चली आ रही हैं। तुम्हें स्वयम् पता नहीं है। अघोर संप्रदाय अति प्राचीन है। अघोर साधक कभी भी जगत् के सामने नहीं आते। मुक्तावस्था को उपलब्ध् होने के लिए उनकी  साधना चलती रहती है। लेकिन इधर कुछ काल से अवैदिक मतों का काफी बोलबाला हो गया। साधना के नाम पर भोली-भाली जनता को ठगा जा रहा है जिससे हमारे देश का अति प्राचीन अघोर पन्थ भ्रष्ट हो रहा है। महादेव की इच्छा से तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम्हें अघोर पन्थ की अलख जगानी है, अलग पहचान और चेतना जगानी है ताकि सारा संसार जान सके अघोर पन्थ का वास्तविक रहस्य और जहाँ तक गुरु की बात है, वह गुरु मैं ही हूँ तुम्हारा जन्म-जन्मान्तर से।

       बाबा कालूराम ने कीनाराम के सिर पर अपना हाथ रख दिया। जैसे ही हाथ रखा, कीनाराम के सामने सारा रहस्य खुल गया और जन्म लेने का उद्देश्य भी।
       समय अपनी गति से चलता रहा। बाबा कालूराम अब अपनी साधना में अधिक से अधिक लीन रहने लगे। बाकी के कार्य कीनाराम करने लगे। कीनाराम के चमत्कार और लोक-कल्याण के कार्य चारों ओर फैलने लगे। कोई दुःखी और निराश होकर नहीं जाता। जो लोग सच्चे मन से साधना करना चाहते थे, कीनाराम उन्हें सच्चा मार्ग बतलाते और जो आडम्बर करते, उन्हें वे दण्ड भी देते। धीरे-धीरे काशी नरेश राजा बलवन्त के कानों तक कीनाराम की लोकप्रियता की गाथा पहुँचने लगी। एक दिन वे कीनाराम के पास आये। राजा के नम्र स्वभाव और उनकी भक्ति देखकर कीनाराम ने उन्हें आशीर्वाद दिया। कीनाराम के लाख मना करने पर भी राजा बलवन्त सिंह ने उनका निवास स्थान पक्का बनवा दिया जो आजकल 'कीनाराम स्थल' या 'क्रीमकुण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है।
       बाबा कीनाराम का जन्म सन् 1684 में वाराणसी से 150 किलोमीटर दूर #रामगढ़ गांव में हुआ था। बचपन से ही एकान्त में रहना, किसी पेड़ के नीचे ध्यान करते रहना और हर समय केवल राम-राम का जप करते रहना उनका रोज का कार्य हो गया था। परिवार के लोग उनके आध्यात्मिक झुकाव को देखकर डरने लगे कि कहीं कीनाराम बड़े होकर साधू न् बन जाएं। बचपन से ही जो भी वे कह देते, वह हो जाता था। जब कीनाराम बारह वर्ष के हुए तो उनका बाल विवाह कर दिया गया। बाल्यावस्था होने के कारण उन्हें विवाह आदि के बारे में कुछ पता नही था। जब वे पन्द्रह वर्ष के हुए तब भी उनके स्वभाव में कोई अन्तर नहीं आया। तब उनके माता-पिता ने बहू की विदा करा लाने की तिथि तय कर दी। पहले बाल विवाह हो जाया करता था और गौना और बहू की विदा लड़के के वयस्क हो जाने पर होती थी। कीनाराम के माता-पिता कीनाराम के बैरागी  बन जाने के डर से ऐसा करने के लिए विवश हो गए थे। लेकिन एक दिन पहले कीनाराम दूध-भात खाने के लिए ज़िद करने लगे। किसी भी शुभ कार्य में दूध-भात खाना अशुभ माना जाता है। पर कीनाराम की ज़िद के आगे बेबस होकर माँ ने उन्हें दूध-भात खाने को दे दिया। कीनाराम बड़े चाव से दूध-भात खाकर सोने चले गए। दूसरे दिन कन्या के घर से समाचार आया कि रात में कन्या की मृत्यु हो गयी। 
       कुछ दिनों के बाद एक दिन कीनाराम बिना कुछ बतलाए घर छोड़कर चले गए। घूमते-घामते वे बलिया पहुंचे। वहां पर वैष्णव शिवाराम के सान्निध्य में साधना करने लगे। लेकिन वहां भी वे जो कुछ कहते, वह पूरा हो जाता। उन्हें स्वयम् पता नहीं होता कि यह सब कैसे हो जाता है। एक दिन कीनाराम क्या देखते हैं गुरु शिवाराम के पास एक युवती बैठी है। कीनाराम को आश्चर्य हुआ कि सन्यासी गुरु के समीप युवती का क्या काम ! बाबा बड़े स्नेह से उससे वार्ता कर् रहे थे। कीनाराम को देखकर गुरु शिवाराम बोले--कीनाराम ! तुम मेरे परम प्रिय शिष्य हो इसलिए तुमसे कहता हूँ। मैं इस युवती से विवाह करने जा रहा हूँ। अब से यह तुम्हारी गुरुमाता होंगी।
       कीनाराम कुछ नहीं बोले। अपने गुरु को प्रणाम कर वह आश्रम से बाहर चले आये और चुपचाप आश्रम के सामने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। पता नहीं क्यों उन्हें ग्लानि होने लगी। बस, बिना कुछ बोले तत्काल उन्होंने उस आश्रम को छोड़ दिया। भारत के धर्मस्थलों की यात्रा कर गिरिनार चले गए। वहां पर 10 वर्ष तक घोर तपस्या कर पूर्व जन्म की सुप्त सिद्धियों को जाग्रत कर् काशी चले गए। राजा बलवन्त सिंह उनके परम भक्त थे। उनसे दान में मिले कीनाराम स्थल (क्रिमकुण्ड) की स्थापना की और जो अघोरी श्मशान, वृक्ष, नदी तट पर साधना करते थे, उनके लिए विशेष्  साधना-स्थल की व्यवस्था की ताकि अघोरी साधक इधर-उधर भटकने के लिए बाध्य न हों। उनके लिए कुछ कड़े नियम बनाये गए जिनका कोई अघोरी उल्लंघन नहीं कर् सकेगा। अघोरी साधक पूर्ण ब्रह्मचारी रहेगा। नारी-भोग से सदा दूर रहेगा। किसी के घर के भीतर प्रवेश नहीं करेगा। सार्वजनिक स्थलों पर अपनी विद्या का प्रदर्शन नहीं करेगा। अपनी साधना में लीन रहेगा। मदिरा का सेवन साधना की आवश्यकता और मर्यादा में रहकर करेगा, सार्वजनिक स्थलों, श्मशानों, पूजा-स्थलों और मंदिरों पर नहीं। अन्य इसी प्रकार के कठोर नियम अघोर साधकों के लिए बनाये जिनका हर एक अघोरी साधक के पालन के लिए अनिवार्य कर् दिया। जो भी साधक इनका उल्लंघन करता पाया जाता, उसे कठोर दण्ड का भागी बनाया जाता। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे अघोर साधना और अघोरियों के लिए समाज में फैली भ्रान्त धारणा दूर होने लगी। लोग उन्हें अब बड़े श्रद्धा-भाव से देखने लगे। जब भी समय मिलता, अनेक सिद्ध अघोरी साधक लोक-कल्याण के कार्य भी करते। धीरे-धीरे दूर प्रान्तों के अघोरी साधक बाबा कीनाराम के चमत्कारों और उनके ज्ञान से अभिभूत होकर उनके अनुयायी बनने लगे और गुप्त रूप से उनके साधना नियमों के अनुसार अपनी साधना करने लगे। आज इक्कीसवीं सदी है। चार सदी बीत चुकी हैं। लेकिन बाबा कीनाराम ने जो ज्योति जलाई वह आज भी अनवरत चल रही है। बाबा कीनाराम के अनेक भक्त देश-विदेश में हैं। वे गुरु पूर्णिमा के अवसर पर लाखों की  संख्या में कीनाराम स्थल पर आते हैं और उस महान् साधक से अपने सुखमय जीवन की कामना करते हैं। बाबा ने जो धूनी जलाई, वह आज तक अनवरत जल रही है।


श्री शिवराम तिवारी जी की फेसबुक लेख से आभार

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

राजा राव रामबक्श सिंह जी डोडियाखेड़ा उन्नाव

#क्रांतिनायक_राजाराव_रामबख्शसिंह

वह 17 दिसम्बर 1859 का दिन था,जब क्रांतिकारी राजा की मुश्के जंजीरों से पग बेड़ियों से जकड़े हुए थे। अंग्रेज जज हेमिल्टन जॉर्ज कचहरी में आया तो सब खड़े हुए किन्तु वह अभियुक्त गजभर सीने को और चौड़ाकर एक पग जमीन तो एक पग ब्रेंच पर सिंहमुद्रा की यथास्थिति से रत्तीभर भी न बदला और नाममात्र दिखावे दण्ड व्यबस्था ने अभियुक्त को "हैंग टिल डेथ!" की सजा बोल दी ।
वह कोई फांसीघर नही था जँहा मृत्युदण्ड हेतु फांसी दी जाए,वह तो आम आबादी के मध्य गंगा तीर खड़ा एक वृक्ष था जँहा ब्रितानी से बगावत करने बालो मन मे भय व्याप्त करने हेतु फांसी दी जा रही थी ।

चेहरे पर नकाब नही डाला गया,जल्लाद ने फंदा डाला और दूसरा छोर खींचा की मोटी बत्त का फंदा टूट गया ..!
पुनः फंदा बना प्रक्रिया दोहराई गयी किन्तु पुनः फंदा टूट गया ..!!
फांसी पाने बाले सिंह व्यक्ति ने एक निश्छल मुस्कान लेते हुए अंगड़ाई ली ओर गले मे पड़ी हुई रुद्राक्ष माला उतारते हुए कहा ..."है माँ गंगे अब मुझे अपनी स्नेही अंक  में बुला लो,में तैयार हूं !"
फांसी फंदा प्रक्रिया पूनः दोहराई गयी और एक छोर खिंचा गया एक माँ भारती का सपूत अपने आत्मोत्सर्ग उपरांत घण्टो वृक्ष ओर फांसी पर लटका रहा ।
असिस्टेंड कमिश्नर सी के क्रेमलिन की उपस्थिति में यह फांसी हुई थी व वह खुद हतप्रभ हुआ जब दो बार फांसी का फंदा टूट गया था, अंततः उसने करीब एक घण्टे तक राव जी लटकाये रखा और जब पूर्ण सन्तुष्ट हो गया तब मृत्युप्रमाण पत्र जारी कर लिखा ..'आज दिसम्बर 28 1859 राजा राव रामबक्श सिंह को जब तक फांसी पर लटकाया की वह मृत नही हो गए !'

यह कहानी है बैसबारा के अमर बलिदानी राजा राव रामबक्श सिंह जी की जो 1857 की क्रांति यज्ञ में आहूत हुए तमाम बागियों की तरह अंग्रेजो के काल बने थे। 
बैसवारा के क्रांतिकारी राव राम बख्श सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। उन्हें एक घंटे तक फांसी पर लटकाने का आदेश हुआ था। 17 दिसंबर 1858 को फांसी पर लटकाने के आदेश के एक साल 11 दिन बाद 28 दिसंबर 1859 को राव साहब को उसी जगह पर फांसी दी गई, जहां उन्होंने अंग्रेजों को मारा था।

दरअसल 29 जून 1857 को राव राम बख्श सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी जान बचाने के लिए डिल्लेश्वर मंदिर में घुसे थे। परिस्थिति ऐसी बनी कि 12 अंग्रेज जिंदा जला दिए गए। इसमें जनरल डीलाफौस समेत आठ की मौत हो गई थी। इसी के बाद राव साहब को फांसी की सजा सुनाई गई थी। किवदंती है कि राव साहब को फांसी देते वक्त दो बार फंदा टूट गया। इस पर राव साहब ने गले में पड़ी भोले शंकर के नाम की माला खुद से अलग की। तब जाकर अंग्रेज उन्हें फांसी दे पाए थे। राव साहब की इच्छा पर फांसी के दिन ही बक्सर के लंबरदार देशराज सिंह को उनका शव सौंप दिया गया।

महंत शोभन सरकार के स्वप्न ओर तात्कालिक शाशको के द्वारा पुरातत्व विभाग द्वारा गढे हुए स्वर्ण खजाने की दिलचस्प चर्चा में आये ढोढ़ीयाखेड़ा गढ़ दिसम्बर2016 की आम चर्चाओ में चर्चित रह चुका है,यह त्रिलोकचंदी बैसो वंश का किला है जिसके विषय मे कहाबत है कि यह किला तिलिसम से भरा है व यंहा सोने का अकूत खजाना छिपा है ।

डौंडियाखेड़ा को प्राचीनकाल में द्रोणिक्षेत्र या द्रोणिखेर भी कहा जाता था। अंग्रेजों ने अंतिम राजा राव रामबख्श सिंह को फांसी देने के बाद इस किले पर हमला करके तहस नहस कर दिया। बाद में टूटे फूटे किले को एक दूसरे बैंस राजा दिग्विजय सिंह (मुरारमऊ ) को सौंप दिया। यह किला उन्नाव जिले से 33 मील दूर दक्षिण पूर्व में है, जो 50 फुट उंचे विशाल टीले पर बना था। पश्चिम की ओर गंगा नदी की धारा टीले को छूती बहती है। किले का मुख्य द्वार पूर्व की ओर था। किले की सामने से लंबाई लगभग 385 फुट थी और पीछे का हिस्सा इससे कुछ और अधिक चौड़ा था !

1857 की क्रांति के अमर नायक राजा राव रामबक्श सिंह,तात्या टोपे,राणा बेनीमाधव सिंह,रानी लक्ष्मी बाई,कुँअर सिंह आउबा,राजा निम्बा सिंह तंवर,कुँअर सिंह इत्यादि जैसे वह युग युगांतर के योद्धा है जिनमे कुछ  जनमानस को स्मरण है ओर कुछ विस्मृत ..!

राजा राव रामबक्श सिंह जी के बलिदान दिवस पर कोटिस नमन है ।🙏

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 जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

इतिहास

---भारत का अंतिम जौहर/शाका---

  -------घासेड़ा का युद्ध------

---25 राजपूतो ने किया 25 हजार मुगल-जाट फौज का मुकाबला---

भारत का अंतिम जौहर/शाका हरियाणा की धरती पर हुआ जिसमे 25 राजपूतो ने 25 हजार सैनिकों की मुगल-जाट संयुक्त फौज का मुकाबला करते हुए 1500 जाट-मुगलो को मार गिराया। 

गुड़गाव में प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा राघव वंश के राजपूत निवास करते हैं। इन्ही में ढाना गांव के हाथी सिंह(हठी सिंह)राजपूत औरंगजेब के समय बड़े बागी हुआ करते थे। मेवात से लेकर दिल्ली तक मुगल शासन उनकी बगावत से परेशान था। इससे निबटने के लिए मुगल प्रशासन ने उनसे संधि करना बेहतर समझा और एक मेव लुटेरे सांवलिया की गर्दन काट के लाने के इनाम के बदले हठी सिंह को मेवात के घासेड़ा में नूह मालब समेत 12 गांव की जागीर देने की पेशकश की। हठी सिंह के पुत्र राव बहादुर सिंह राघव बेहद वीर और योग्य हुए जिन्होंने अपनी जागीर का विस्तार घासेड़ा के अलावा, कोटला, सोहना और इन्दोर परगनो तक कर लिया जिनसे जनश्रुतियो के अनुसार करीब 52 लाख का राजस्व प्राप्त होता था। अपनी योग्यता के बल पर वो कोल(अलीगढ़) के फौजदार भी बन गए। 

वही भरतपुर के जाट सूरजमल की मुगल वजीर सफदरजंग से दोस्ती जगजाहिर थी। सूरजमल वजीर सफदरजंग के साथ मुगल बादशाह के दरबार में पेश हुआ जहाँ उसे बादशाह से 'कुंवर बहादुर राजेन्द्र' और उसके पिता बदन सिंह को 'राजा महेन्द्र' की उपाधि प्राप्त हुई। सूरजमल को वजीर की अनुशंसा पर बादशाह से मथुरा की फौजदारी और खालसा जमीन पर शाही जागीर प्राप्त हुई। 

इसी समय सूरजमल और वजीर सफदरजंग में राजपूत राव बहादुर सिंह राघव को सबक सिखाने को लेकर मंत्रणा हुई। दोनो ही राव बहादुर सिंह राघव के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित थे। वजीर सफदरजंग मराठो के खिलाफ मोर्चे में बहादुर सिंह राघव द्वारा साथ ना देने के कारण उनसे शत्रुता रखता था और सूरजमल मेवात और ब्रज क्षेत्र में बहादुर सिंह राघव की बढ़ती ताकत को ईर्ष्या से देखता था। 

परिणामस्वरूप मुगल वजीर सफदरजंग ने शाही फरमान निकलवा कर सूरजमल को राव बहादुर सिंह पर हमला कर उन्हें मारने या गिरफ्तार करने का आदेश देकर दिल्ली से बड़ी फौज देकर रवाना किया। सूरजमल भारी फौज लेकर कोल(अलीगढ़) पहुँचा और वहां कब्जा कर लिया। सूरजमल का बेटा जवाहर सिंह भी भरतपुर से बड़ी जाट फौज लेकर आ मिला। उस समय राव बहादुर सिंह कुछ साथियों के साथ जमुना के खादर में शिकार खेलने गए थे। सूरजमल ने षडयंत्र के तहत राव बहादुर सिंह को पुरानी मित्रता के नाम पर संधि के बहाने अपने शिविर में बुलाया। बहादुर सिंह मित्रता के भरोसे पर सिर्फ 4 सहयोगियों के साथ सूरजमल के शिविर में गए। वहां सूरजमल ने राव बहादुर सिंह से उनकी प्रसिद्ध तलवार को देखने की इच्छा जाहिर की। सूरजमल ने तलवार लेकर अपने सहयोगीयो को पकड़ा दी। बहादुर सिंह को सूरजमल की मंशा पर संदेह हुआ और उन्होंने वहां से निकलना ठीक समझा। 

राव बहादुर सिंह वहां से किसी तरह निकल के अपनी पैतृक जागीर घासेड़ा में आए और गढ़ी(छोटा किला) में मोर्चाबंदी कर ली। उनके साथ उनके परिवार के 24 पुरूष और अन्य महिलाएं एवं बच्चे थे। मुगल सेनापति सूरजमल के पास 20 हजार जाट और मुगलो की सेना थी, साथ में मुगल वजीर सफदरजंग 5 हजार मुगल सेना और दर्जनों तोप लेकर उससे आ मिला और उन्होंने घासेड़ा की गढ़ी को घेर लिया। उत्तर की दिशा से सफदरजंग के साथ जवाहर सिंह, दक्षिण की दिशा से बक्शी मोहन राम, सुल्तान और वीर नारायण, रिज़र्व फौज का नेतृव बालू राम जाट को दिया और सूरजमल खुद ने 5 हजार सैनिक और तोपो को लेकर अपने मामा सुखराम और मीर मुहम्मद पनाह के साथ पूर्वी दिशा में मोर्चाबंदी की। 

3 महीने तक विशाल मुगल-जाट फौज मात्र 25 राजपूतो द्वारा रक्षित गढ़ी(छोटे किले) को घेर कर हमला करती रही लेकिन तब भी सूरजमल की विशाल सेना गढ़ी में घुस नही पाई। इस बीच राव बहादुर सिंह के भाई जालिम सिंह और पुत्र अजीत सिंह घायल हो गए। युद्ध को इतना लंबा खिंचते देख सूरजमल ने संधि का प्रस्ताव भेजा जिसकी शर्तो को राव बहादुर सिंह राघव ने मानने से इनकार कर दिया। इसी बीच जालिम सिंह की मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद सूरजमल ने दोबारा संधि प्रस्ताव भेजा लेकिन हठी राव बहादुर सिंह ने दोबारा इसे ठुकरा दिया। 

17 अप्रैल 1753 की रात को सूरजमल ने चारो तरफ से भीषण हमला करने का आदेश दिया, अगले दिन भीषण गोलाबारी और लड़ाई में मीर मुहम्मद पनाह समेत 1500 मुगल-जाट सैनिक मारे गए लेकिन तब भी मुगल फौज गढ़ी(किले) में नही घुस पाई। इसके बाद राव बहादुर सिंह ने शाका-जौहर करने का निश्चय किया। उनके परिवार की महिलाओं ने बारूद में आग लगाकर खुद को उड़ा लिया। राव बहादुर सिंह अपने पुत्र अजीत सिंह और 24 अन्य परिवारजनों और सहयोगियों के साथ शाका करने के लिए गढ़ी से बाहर निकले और बहादुरी के साथ आखिरी दम तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह मंजर देख कर मुगल-जाट फौज का दिल दहल गया। मुगल सेनापति सूरजमल ने घासेड़ा पर कब्जा जरूर कर लिया लेकिन वहां उसे राख के अलावा कुछ भी प्राप्त नही हुआ। 

सूरजमल का दरबारी कवि सूदन इस युद्ध का चश्मदीद था और उसने सूरजमल की जीवनी सुजान चरित में राव बहादुर सिंह और उनके सहयोगी राजपूतो की बहादुरी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। यह भारतीय इतिहास का आखरी प्रमुख जौहर/शाका माना जाता है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी शायद ही कही हो जहाँ 25 लोगो ने अपने से हजार गुना बड़ी, सुसज्जित, हर तरीके से ताकतवर एवं सुविधा सम्पन्न फौज का एक छोटे से किले में कई महीनों तक मुकाबला किया और मात्र 25 लोगो ने 1500 लोगो को मार गिराया हो। सूरजमल और उसके मुगल सहयोगियों को ये अंदाजा बिलकुल भी नही था कि राव बहादुर सिंह और उनके अन्य राजपूत सहयोगी अपने आत्मसम्मान और इज्जत की रक्षा के लिए इस हद तक जा सकते हैं। 18वी सदी के संक्रमण काल में जब अव्यवस्था का फायदा उठाकर अनेक लूटेरे वर्ग उत्तर भारत की राजनीति में उभर आए थे और राजनीती बहादुरी और स्वाभिमान के बजाए लूट और धोखे के इर्द गिर्द सिमट गई थी, पुरानी स्वाभिमानी, इज्जतदार और बहादुर वर्ग इस लूट, फरेब और भ्रष्टाचार के तंत्र में किनारे हो चुकी थे, ऐसे समय राव बहादुर सिंह के नेतृत्व में मुट्ठीभर राजपूतो ने राजपुत्रो की शताब्दियों पुरानी आत्मबलिदान की परंपरा का प्रदर्शन कर उस समय की राजनीति में हलचल पैदा करने का काम किया। 

संदर्भ- 
          1. सुजान चरित, सूदन
          2. तारीख ए अहमदशाही
          3. गुड़गांव गज़ेटियर
          4. दी फॉल ऑफ मुगल एम्पायर, जे एन सरकार

साभार पुष्पेंद्र राणा जी 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

आचार्य श्रेष्ठ श्री त्रिलोचननाथ तिवारी जी की कृति

जिस स्थान पर कभी भी 

ह वर्ण दिखे न!

एक क्षण ठहरो और विचार करो!

ह वर्ण स्वयं में पूर्ण है और शिव-वाच्य है।

हंकार का अर्थ शिवाकार! 
शिव-स्वरूप!
अतः अहं, अ हं का अर्थ है 
जो शिव से वियुक्त है।

और जब तक कोई शिव से वियुक्त है तभी तक उसका स्व जीवित है।

अतः तन्त्र कुण्डलिनी शक्ति को 
अहं शक्ति कहता है। क्योंकि वह मूलाधार में शिव से वियुक्त पड़ी है।

अतः 
अहंकार शब्द का अर्थ है शिव-वियुक्त शिवा!

जब यह अहं जागृत होता है तो कुण्डलिनी जाग्रत होती है और फिर शिव की ओर, शुभ की ओर उन्मुख होती है।

तन्त्र कुण्डलिनी को भुजंगिनी कहता है। सर्पिणी की तरह होती है। कुटिल रेखा पर चलायमान, फुफकारती, डंसने को तत्पर!

कौन है जिसको अहं नहीं?

जिसका अहं नष्ट हुआ वह शिव सायुज्य प्राप्त कर चुका! 

किन्तु तब वह या तो 

सो हं

हुआ

या

फिर हं सः!

सोहं - वही है शिव!
हंसः - शिव है वही!!

स शक्ति वाच्य है। 

अतः जो अहं से इन्कार करता है वह

या तो जीवित नहीं, या फिर पाखण्डी है।

उसको कुछ काम आ पड़ा होगा!
वरना झुक कर मिला नहीं होता!!

अपना अहं छिपाने वाला स्वार्थी होता है।

अहं का दूसरा अर्थ है शक्ति! शिव-शक्ति! अर्थात् स!
अर्थात् शक्ति!
अर्थात् शिव से अलग छिटकी पड़ी
मूलाधार में साढ़े तीन फेरों में सिकुड़ी साक्षात शिवानी!

और घमण्ड?

पहले तो घ को समझो!

घकारं चञ्चलापाङ्गि ! चतुष्कोणात्मकं सदा।
पञ्चदेवमयं वर्णमरुणादित्यसन्निभम् ॥
निर्गुणं त्रिगुणोपेतं सदा त्रिगुणसंयुतम् ।
सर्व्वगं सर्व्वदं शान्तं घकारं प्रणमाम्यहम् ॥

सृष्टिरूपा वामरेखा किञ्चिदाकुञ्चिता ततः।
कुण्डलीरूपमास्थाय ततोऽधोगत्य दक्षतः॥
अत ऊर्द्ध्वं गता रेखा शम्भुर्नारायणस्तयोः।
ब्रह्मस्वरूपिणी देवि ! 
मात्राशक्तिः प्रकीर्त्तिता॥

मालतीपुष्पवर्णाभां षड्भुजां रक्तलोचनाम् ।
शुक्लाम्बरपरीधानां शुक्लमाल्यविभूषिताम्॥
सदा स्मेरमुखीं रम्यां लोचनत्रयराजिताम् ।
एवं ध्यात्वा घकारन्तु तन्मन्त्रं दशधा जपेत्॥

निर्गुंणं त्रिगुणोपेतं सदा त्रिगोलसंयुतम् ।
सर्व्वगं सर्व्वदा शान्तं घकारं प्रणमाम्यहम्॥

ऐसे घ का जो मण्ड है, घ को उबालने पर गाढ़ा सा तैरता,

वह घमण्ड है!

छड यार!

अरण्ये रोदनं वृथा!

ए भिया! ब्लॉक करो न!

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

अजब शौकीन दशयु

#शौकीन_बागी/दस्यु/डकैत

"शौख बड़ी चीज है..!"
किसी उत्पातन की यह चन्द पंक्तिया जैसे ढाई आखर की इश्किया भावनाओ सम्पूर्ण मूर्तिरूप देती हुई सी प्रतीत होती है।शौख और शोखी जब   कहि जाकर संगम करती है तब कहि जाकर एक  शोखिया किबदन्ति बनती है,जैसे प्रशिद्ध अभिनेता स्व. राजकुमार हर किसी को अपनी रील और रियल जिंदगी में "जानी" बोलकर सम्बोधित किया करते थे ...जबकि उनके कुत्ते का नाम जानी था !
कुछ ऐसा ही अजीबो-गरीब किस्सा हमारे बीहड़ के पूर्व दस्युओं का था,अपनी-अपनी पसंद की सनक और वह भी इतनी आश्चर्यपूर्ण की विश्वास ही न हो...किन्तु यह एक ऐसा सत्य है जो कंही बीहड़ो में गुम हो गया अथवा बीहड़ो में ही दफन है ।

ददुआ मानसिंह राठौर-
आजादी से पहले ओर आजादी के बाद का एक ऐसा बागी जिसके नाम कितने अंलकार है और मन्दिर में किसी देव नही बागी सम्राट को देवता की तरह पूजा जाता है.कहते है कि इन्हें विवाहों में भात(मामेलापक्ष की रश्म) भरने का बड़ा शौख था जो इनके जीवन मे भक्त नरसी की नोट नक़ी देख लगा था और अपने पूरे बीहडी जीवन हजारो भात भरे व लड़कियों के कन्यादान लिए ।

माधो सिंह भदौरिया -
एक ऐसा बीहड़ी किरदार जिसका जीवन ही सेकड़ो किरदारो का रोल अदा करते हुए निकला एक सैनिक, डॉक्टर,मास्टर ओर जादूगर के करतब दिखाने बाला बागी रीयल दुनिया से रिल दुनिया मे भी अपना किरदार खुद बना। इसके साथ ही इन्हें गाना-गीत बजाने सुनने का शोख था ,माधोसिंह के गैंग प्रायः लोकगीत ओर फिल्मी गीत अपहरण करके लाये लोगो से सुनते थे व उन्हें इनाम स्वरूप रुपये भी दिया करते थे। एक वाकये अनुसार 50 हजार मोटी रकम की पकड़ का गीत सुनकर 1100 पुरुष्कार देकर उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया था ।कहते है कि माधो आंखों पर पट्टी बांध मिर्च को गोली फोड़ दिया करते थे ।

मोहर सिंह-मलखान सिंह-
बीहड़ी अपराध इतिहास में इन्हें 2M बोला जाता  है इन्होंने भी रियल  से रील दुनिया तक का सफर तय किया,पर इन्हें शोख था 3 राजपुताना रेजिमेंट की तरह बड़ी बड़ी रोबीली मुछे रखने का..लोग कहते है कि इनकी मुच्चो में रोज पौआ -पौआ घी लगा करता था !रमेश सिकरवार,हरिसिंह,टुंडा आदि भी मुच्छड़ दशयु थे ।

छिद्दा-माखन-
डायलोगों की दुनिया के जीवंत किरदार छिद्दा-माखन ममेरे-फुफेरे भाई थे और बचपन सहपाठी के साथ जीवन के साथी भी थे ...यह बचपन परस्पर प्रशन्नता की कुशलक्षेम "साहिब सलाम" बोलकर लिया करते थे।इनदोनो को दो जिस्म एक जान ओर अपनी सेकेंडो में लांगुरिया लोकगीत बनाने की अद्भुत शोख थी ..कहते है कि माखन महाभारत का पूरा विवरण इन लोकेगीतो में गा दिया करता था तो छिद्दा के बगेर वह कभी गा नही पाते थे ..असल मे माखन की मौत छिद्दा को जब पता चली जब "साहिब सलाम" का प्रतिउत्तर नही मिला था !

मध्यप्रदेश में चंबल के बीहड़ों में पनपने वाले दस्यु गिरोह के कई सरगना अपने अजीबोगरीब शौक के कारण दंत कथाओं के पात्रों की तरह हमेशा चर्चित रहे हैं।इनमें से कुछ दस्यु गिरोह शिवपुरी जिले के जंगलों में सक्रिय रहे हैं। आजादी के पूर्व कुख्यात दस्यु सरगना टुन्डा अपने साथियों के साथ एक आकर्षक जलप्रपात पर रहता था इसलिए यह स्थान उसके नाम से 'टुन्डा भरखा खो' के नाम से जाना जाने लगा। शिवपुरी के पास घने जंगल में स्थित यह स्थल अब प्रसिद्ध पर्यटक स्थल बन गया है।

पचास से साठ के दशक में भी शिवपुरी के जंगलों में कुख्यात डाकू सरदार अमृतलाल अपने गिरोह के साथ सक्रिय रहा... अमृतलाल ने लोगों का अपहरण करके उनसे फिरौती वसूलने की शुरुआत की थी जो आज के डकैत गिरोह भी कर रहे हैं।इसे अजीव तरह लोगो वेवकूफ बनाने का शोख था..ओर यह वहसी तरीके महिलाओ के कान फाड़कर कुंडल खींचने सायको शौकीन था।डाकू सरदार अमृतलाल के बारे में क्षेत्र के बुजुर्गों में चर्चा रहती है कि वह एक से सवा लाख रुपए की फिरौती उस समय भी लेने की सनक से ग्रसित था, जबकि उस जमाने में यह बहुत ही बडी रकम होती थी।

हरीसिंह को लोंगों की नाक काटने की सनक थी। जब वह किसी से भिड़ता तो सबसे पहले उसकी नाक काटने से नहीं चूकता था।उसने कई नागरिकों व ठसक बाले लोगो साथ-साथ पुलिस बालो की भी नाक पर हाथ साफ  किया था ।

कालांतर में यहाँ के जंगलों में दयाराम, रामबाबू गडरिया, हजरत रावत, कमल सिंह जैसे खूँखार दस्यु गिरोह सक्रिय हो गए, जिनमें सबसे ज्यादा खतरनाक इनामी एवं चर्चित दयाराम रामबाबू गडरिया गिरोह था।
रामबाबू और दयाराम को देशी घी खाने और अपहृतों को खिलाने का शौक था। वे घी के इतने दीवाने थे कि अपनी बंदूकों की सफाई भी तेल की जगह घी से किया करते थे..!
इस गिरोह में रामबाबू सबसे ज्यादा क्रोधी और सनकी था। जब किसी अपहृत की फिरौती समय पर नहीं पहुँच पाती तो यह उसे गोली मारने को सबसे ज्यादा उतावला रहता था।
दयाराम और रामबाबू के बारे में कहा जाता है कि उन्हें एक हजार एवं पाँच सौ रुपए के नोटों और सोने के आभूषण से लगाव था और वे अपने साथ हमेशा बड़ी राशि रखते थे ...।

#चम्बल_सिंह_अबलोकन

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बाबू कथा (व्यंग)

अजी!भारत रहा होगा कभी कृषि प्रधान देश, आजकल तो बाबू प्रधान देश है।सोसलमीडिया से मैनस्ट्रीम मीडिया तक और संसद,पान की दुकान से लेकर पैनड्राइव की दुनिया तक मे बस बाबूओ का जिक्र ही मिलेगा।
कोई भी न्यूज हो जब तक कोई परकटि न्यूज बाली बाबू न प्रकट करे ...वह कपोल कल्पित झूठ बनकर रह जाती है !
बुद्धुबक्स के बाबू ही आजकल हमको अपडेट रखते है कि लड़को के कब पिम्पल निकलने पर कोनसा गोवर घिसना है और कब किस मौषम में कोनसे पाने से भुभडे के नट-बोल्ट टाइट करके 'थाना बाले तोतले बाबू' को पटाना है? फिर चाहे घर के अड़ियल 'लट्ठ बाले बाबू' के द्वारा  दिनरात पिलने पर 61-62 दिन वैधबाबू का कोर्स ही क्यों न करना पड़े। पर तोतले बाबू को 'माताबाबू' की पूजा का अधिकार दिलाना है ।

आज का भारत देख मुझे नही लगता कि लोगो को प्रेम जैसा कुछ होता होगा बल्कि प्रतीत होता है कि सबको 'संक्रमित बाबू रोग' हो गया है और अंततः उस बाबू की याद आ जाती है जो विभिन्न सरकारी दफ्तरों में इंग्लिश पीकर मिलता है और सबकी फाइलें 'अपनी इंग्लिस' के चक्कर मे मण्डप बाली सालियों की तरह छिपाते रहता है ।जैसे 'जूता छिपाई' (सॉरी..!फाइल छिपाई) की रश्म का नैग मिला वह मोदी जी की तरह 'सीना छप्पन' करते हुए आपकी फाइल नई-दुल्हन की सुहागसेज मुह दिखाई की तरह पेस कर देगा ।
अगर मुझ जैसे निपट गंवार से पूछ लें कि, "कभी बाबुओ के चक्कर में पड़े हो?"

तो में कंहूँगा- की भाई बाबुओ से भाजपा बचाये ओर राहुल गांगी को राष्ट्रीय युवा बनाये पर कभी इन तोतले,चोर,परकटे,बाबूओ के चक्कर मे एक बार सबको घुमाए!

बाबुओं का चक्कर जब इस मृत्युलोक में पड़ता है तो मानव जीवन-मृत्यु के तमाम चक्कर भूल सिर्फ और सिर्फ 'बाबू माया' के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता है।जन्म लेते ही जब थोड़ी समझ आती है तो घर मे प्रथमतः दर्शन होते है 'जूता बाले बाबू+जी के(सम्मान के साथ 'जी')यह एक इकलौते बाबू होते है जो आप-हम सबको अपने जूता के जोर पर सही राह दिखाते है,पर हमें शोशल मीडिया के इनबॉक्स बाले बाबुओ के चक्कर मे अपना कल्याण दिखने लगता है और ऐन मौके पर हमें वह बाबू बुलाकर अपनी वारात के स्वागत में बुत बनाकर खड़ा कर देते है। बाकी रही-सही कसर 'डीजे बाबू' ....."तू पसन्द है किसी ओर की" बजाकर पूरा कर देते है ।

इस बाबुमय विश्व मे सबसे घातक होते है बैंक बाले बाबू..!
पैसे निकालो तो ...
"विड्रॉल में एक जगह और सिग्नेचर...अबे शब्दो मे अमाउंट की स्पेलिंग सही कर!" इत्यादि की इस तरह घुड़की देते है जैसे ग्राहक खुद के पैसे नही 'केशियर बाबू' की किडनी विड्रॉल में लिख दी हो !
"बुधवार को आना पासबुक अपडेट कराने, अभी प्रिंटर मशीन की मौसी नाराज है !"
(जबकि बेचारा ग्राहक पिछले 25 बुधवारो से लगातार प्रिंटर की मौसी जी को बार-बार मना रहा होता है)
मनीजर बाबू का तो कहना ही क्या ...पूरे दिन लंच करके  अपने छौना बाबू को के नखरे जो लेने है !

सबसे क्रोधाग्नि बाले होते है घर मे विधिवत 'माताबाबू' की पूजा करके सांसारिक ढंग से लाये हुए 'घूंघट बाले बाबू'! यह बाबू जब जीवन मे प्रवेश करते है लौंडो के जीवन मे हच के टॉवर लग जाते है। दिन में भगा-भगा के नही सोने देते और रात में बर्फ से ठंडे पाँव लगाकर नही जीने देते है। मटर छिलने से पँखो पर गीला कपड़ा लगवाते है और जब इनका मन हो तो 'लठ्बाले बाबू जी' के सामने रोकर बेमतलब बोनस में गजक सी कुटबा देते है !

है महादेव जी!विनय है कि तमाम तरह के बाबुओ से बचाये रखे किन्तु 'माताबाबू बाले 'ठीकरी बाबू' ओर 'पनाह बाले बाबू(जी) से सबकी बनाए रखे !

नॉट-: किसी के पास तोतला बाबू हो तो हमे समर्पित कर सकते है!
अथः सिरी बाबू कथाय प्रथमः अध्याय: नमो नमः

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शनिवार, 14 नवंबर 2020

रंगोली के रंग


          ★ कहानी★

एकाएक चेहरे पर आयी श्वेत-श्याम अलका को हटाने  के लिए उन्होनो पास रखी बाल्टी में हाथ धोये ही थे की कहि से आकर एक बिल्ली ने उनकी बनाई रंगोली के रंगों  को बिखेर दिया। वह मुस्काई ओर बड़े ही भाव से बोल पड़ी...
"क्यों री मौसी...अब सासु माँ-ननदी सब गए जमाने के किस्से क्या बने तुम आकर उनकी याद दिलाने लगी !"

वह अकेली ही रहती थी किन्तु उस गांव का हरेक घर उनका परिवार था,वह आज से करीब 5 दशक पहले एक  17वर्षीय किशोरी बधु के रूप में आई थी। ऐसा क्या नही था जो उनकी वरात में न गया हो किन्तु उस वरात का किरीटमणि नही था ।
वह दूर थे अपनी कर्तव्यनिष्ठा के प्रति समर्पित 65 के युद्ध मे दुश्मन से लोहा लेते हुए, सेकड़ो दुश्मनो के काल बने हुए....मोर्चे-मोर्चे पर जैसे उन्ही का युद्ध कौशल कुलाचे भर रहा था ।

इधर वरायत की अगवानी पर तोरण मारा जा रहा था तो उधर वह बंकर पे बंकर मार रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कुँअर रणवीर आज अपने नाम को प्रदर्शित कर रहे हो .....उधर मण्डप में बैठी दुलहिन पास रखी फैंटा-कटार में प्रियतम प्रतिबिम्ब की कल्पनाओ में सँजो रही थी। विधि-विधान से पाणिग्रहण तो हुआ परन्तु रश्मो में बंधी नवविवाहिता को प्रियतम दरश न हुए ...!!

नवविवाहिता की अगवानी हुई पूरी हवेली में जैसे उत्सव था वही विवाहिता की मनमंदिर हवेली सजकर भी श्रंगार रहित थी...रिक्तता थी। उस अद्वतीय सौंदर्य को अपलक निहारने बाली दो आंखों की जो रण में जिसे निहारती वह  ओहदा शीघ्र ही रिक्त हो जाता और एकाएक ग्रेनेड आकर समीप ही गिरा की वह हिरन की तरह पहाड़ी से लुडककर गिरता-गिरता पड़ोसी के आंगन में जा फसा ।

विवाह की चौथी होने को थी कि दनदनाते कदमो से सेना का दस्ता आया और उनकी एकमात्र पहचान विशेष हेलमेट के साथ अपनी करून ध्वनि बजा श्रद्धांजलि दे ...अपने पीछे छोड़ एक लकड़ी का बक्सा जिसपर बड़े  शब्दो मे लिखा था 'सूबेदार रणवीर सिंह' !
घर मे करुंनक्रदन पसरा था तो नवविवाहिता मात्र मौन थी और सबसे बोल रही थी ...

"मुझसे बगेर पूछे कुँअर जी कहि नही जा सकते ,इस लोहे के टोप से क्या उनकी वीरगति मान लू !"

"में अपनी अंतिम सांस तक प्रतीक्षा करूँगी ओर वह भी सुहागन रहकर !!"

लोगो ने समझा कि सम्भवतः गहरा आघात लगा है पर नवविवाहिता अडिग थी,वह अपने प्रण न हटी ओर आज  भी लगभग आधा सैकड़ा आयु उपरांत माथे टिकुली मांग सिंदूर अनवरत सजता ।
कुछ समय बड़ो ने विरोध किया पर समय के साथ सबके लिए यह आम बात हो गयी ।

प्रणीता कंवर नाम था उनका....नाम जैसी ही अडिग। एक दम शांति और सुंदरता के जैसे समस्त अलंकार एकसाथ आकर रुक गए हो....रणवीर और प्रणीता के पाणिग्रहण माध्यम बने अश्व पर हर कोई सवार नही हो पाता था ,सिवाय प्रणीता के पिता पर कुँअर रणजीत ने खेल-खेल में अश्व को अपना मुरीद क्या किया उनके विवाह की वेदी के जैसे पहले मन्त्र बन गए ।

संन 65 युद्ध से लापता हुए कुँअर का कोई पता न चला और प्रणीता के इरादे दृण होते रहे ....समय अपनी गति से चलता रहा अब वह हर किसी के लिए सम्मान की जैसी मूर्ति थी। हवेली त्याग खपरैल की कुटी ओर एक स्यामा गाय के साथ दिनभर भजन। बच्चो को पढ़ाना,गांव भर के लोगो के दुख बाटना ही दिनचर्या थी ।

अभी दस दिन पूर्व ही तो उन्होंने अपने वैवाहिक अथवा प्रतीक्षित समय के 40 वे करवाचौथ को बगेर अन्न-जल के पूर्ण किया था और आज एक बिल्ली बार-बार उनकी रंगोली को बिखरा देती थी ।

"यह बिल्ली भी मेरा बार-बार काम बिगाड़ रही है जैसे किसी जन्म की दुश्मन हो!"

प्रणीता बड़बड़ा ही रही थी कि ......

"देवी सुनिए!"
"यशवीर सिंह जी की हवेली किधर है ?"

एक लगभग 60 वर्षीय प्रोढ़ किन्तु आभामय तेजश्वी चेहरे पर उनकी नजर पड़ते ही न जाने क्यों एक हुक सी उठी पर वह न चाहते हुए भी अपने स्वसुर का नाम सुनकर उन्होंने सिर पर अपनी पियरी साड़ी का पल्लू लेते हुए दवे स्वर में पूछ लिया ....!

"जी! उनकी हवेली में अब कोई नही है ,में उनके लड़के जो युद्ध मे लापता हो गए है उनकी पत्नी हु, कहिये आपकी की क्या सेवा कर सकती हूँ !"

प्रतिउत्तर सुन रणवीर की आंखों से अश्रु वह निकले और सजल नेत्रो से देखने की देरी थी कि ....अर्द्धस्वरूपा साक्षात हो गयी ।

"है नाथ !"
"युगों बाद आज बापीसी का ध्यान आया !"
बोलकर अचेत होगयी 

पड़ोस बाले एकत्रित हुए कुछ एकाध वयोवृद्ध बुजुर्गो ने पहिचाना तो गांवभर में ढोल तांसे बज उठे और प्रणीता के प्राणनाथ सहित पूरे गांव ने खण्डहर होती हवेली को दुलहिन की तरह दीपो से सजाकर इस चमत्कारिक वापिसी पर आनन्द गीत गाये !

आज दसको बाद अटारी पर रोनक थी जैसे युगों की प्रतीक्षा उपरांत पपीहे को स्वाति नक्षत्र का जल और जल को सुष्क हुए उपवन की चाह मूर्तिरूप हो उठी हो ।
दूर सघन में कोई संगीत प्रेमी मधुर स्वर में बांसुरी से आल्हादित हो रहा था तो प्रणीता कंवर का सुहाग आज पुनः नवेली दुल्हन की तरह सजा था .......!

प्रणीता कंवर की रंगोली दूर अंतरिक्ष मे रंग बिरंगी उल्कावृष्टि बनकर प्रणीता कंवर एवम कुँअर रणवीर के परिणय की साक्षी बन रही थी ।

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दीपोत्सव की बधाईया 🏜️🎡☀️⭐️🌟🌞🌞

       -जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
          चम्बल मुरैना मप्र

रविवार, 8 नवंबर 2020

बगल बाली सीट

 वह वांयी पंक्ति चौथी सीट थी जिसपर लड़का बैठे-बैठे प्रतीक्षा में अपनी डायरी के पेजो को तल्लीन्नता से लगातार कुछ लिख रहा था। क्योंकि बस चलने में समय था और वाकी सवारियों से उसे कोई मतलब नही था ।
एकाएक एक 5 फिट लम्बा भीनी-भीनी महक का झोंका उसके समक्ष नमूदार हुआ और उसको पता भी न लगा..!

"आपके साथ बाली सीट पर कोई है सर...अगर नही है तो मुझे विंडो सीट चाहिए!"

उसके पूछने का लहजा कुछ ऐसा था कि लड़के ने मूक रहकर ,एक ओर हटते हुए मूक सहमति में बगल खिसकते हुए  उसे बैठने को....बगेर सिर ऊंचा किये  जगह देकर डायरी में ही गुम रहा !!

करीब 20 मिनट उपरांत लड़के ने एक उबासी लेते हुए पुस्त से सिर टिकाते हुए आंखे बंद कर ली ...।
एकाएक गाड़ी स्टार्ट हुई और गियर गुर्राहट ने झपकी में व्यधान कर दिया ।

बाजू बैठी लड़की पर उचटती नजर डालते हुए देखा तो वह ओषत कद से कुछ छोटी एक ओषत रंग बाली जिसने ब्लू जींस के साथ फ्रॉक नुमा जॉर्जेट के साथ दोनो कंधों पर वी शेप दुपट्टा डाल रखा था जिसे भी ही महीन चतुराई के साथ पिनो से स्टेपल कर रखा था और इस यूनिक शैली का पहनावा आकर्षक लगा ।

"सर मुझे कुछ खाने को लाना है ...!"
कहते हुए लड़की ने वैनिटी से 200 की नॉट हाथों में चमकाई ओर वाहर निकलने को उद्धृत दिखी....लड़का खड़ा होकर एक ओर हट गया और उसने पहली बार 'स्लो लुइस' इत्र की चिरपरिचित महक महसूस की, वह अपने सेलफोन में शोशल मीडिया कुरेदने लगा और पुनः निमग्न होकर कभी-कभी मुश्कुरा भी रहा था कि खिड़की तरफ सिर से ऊपर कंगन युक्त हाथों में लैयज के साथ बिकानू मिक्सचर औऱ एप्पल फीज बोतल दिखी .....

"सर पकड़िए....मुझे कुछ और लेना है!"

न चाहते हुए भी हाथ मे वह तमाम खाने का सामान था और प्रतीक्षा थी कब हाथ खाली हो जाये!

कुछ ही मिनट में एक 500 ग्राम मिठाई लिए लड़की मुस्कुराती आई और यथास्थान बैठ गयी ।

"सर आप भी लीजिये न मुझे अच्छा लगेगा कि अकेले नही खाना पड़ेगा,देखिए #आपके लिए  मिठाई भी लाई हुँ !"

लड़के भँवे विचारमुद्रा में सिकुड़ती गयी कि इसे कैसे पता है कि मुझे मीठा पसंद है !
उसने मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहकर पल्ला तो झाड़ लिया पर " आपको मीठा पसंद है" बार-बार  मनमशतिष्क में नाद करता रहा ।

लड़का पुनः झपकी लेने के प्रयास में पुस्त से सिर टिकाकर कर बन्द आंखों से गन्तव्य की कल्पना में बिचरन करता रहा और .....

"में ठेंगी हु लेकिन इतनी भी नही की मुझे किसी हेल्प चाहिए...मेरे घर मे सब pg है सिर्फ में ही नही "
"इसका मतलब यह नही की तुम मुझ पे सिमपेथी दिखाओ, अपनी औकात में रहो .."
"यह मत समझो कि मैने तुम्हे खुद को नापती हुई नजरो नही देखा है...रज्जू की एनिवर्सरी पर तुम मुझे वॉच कर रहे थे और  ठेंगी कहकर मुझे हिरासमेन्ट कर रहे हो !"

लड़के ने उसके द्वारा 'ठेंगी' शब्द बोलने के साथ ही उसकी आंखों में सागर की लहरों के समान उमड़ती लहरों को स्पष्ट देखा और उसी स्थिति में आंखों की झिरी से उसके चेहरों पर क्रोध,कातरता के ज्वार-भाटे देखता रहा ।
करीब 15 फोन उसकी फ़ोनवार्ता में उसने लड़के के प्रति के आधुनिक शैली की गालिया भी सुनी और फोन कटने के बाद उसे फ़्फ़कते भी देखा ।

वाहन अपनी तफतार से पथ को निरतर पास करता जा रहा था ओर लड़की अपनी वेदना अथवा हीनता को अश्रुपात करके कम किये जा रही थी ।

"सॉरी !फ़ॉर डिस्टरविंग यू सर..।"
"आपने कुछ खाया नही ..टेंसन न लीजिये आपको लूटने का मेरा कोई प्लान नही है !"

लड़का हंस पडा ओर लड़की के अभिनय बाली झूठी मुस्कान का जबाब एक पीस पेड़े का उठाकर दिया ।
 
बाते चलती रही लड़की पूछती रही और लड़का सनझिप्त उत्तर देता रहा ...इसी बीच गन्तव्य आया और ...! लड़की बेहद खूबसूरत डायरी के साथ पेन बढाते हुए बोला !

"ऑटोग्राफ प्लीज...!"
लड़का कुछ कहता उससेपहले ही लड़की बोल उठी !

"आप जिस संजीदगी से रिस्ते उकेरते है न उतनी ही गम्भीरता से स्वम को मेंटेन भी करते है, मेने आपके कुल 5-6 आर्टिकल पढ़े है और आपकी इसी संजीदगी के साथ कलम ओर कर्म की समानता की फैन हो गयी ।"

"जितेंद्र सर! में रहती तो रीवा में हूं but आपको बस में देख आश्चर्य चकित थी और आपकी संजीदगी से आपके साथ बैठने खाने के कुछ पल मिले !"

"कभी रीवा आइये, में उधर ही रहती हूं !"

मेरी रास्ते भर की विचार गुत्थी उसने एक पल में सुलझा कर "आभार" बोलते हुए डायरी-पेन लिया और ....एक विनय,आदेश,आग्रह मुझे समझ नही आया क्या था कि वह स्वम को 'अ'सफल न लिखने की बोलकर अंकभर सिमट गई ।
मेरे पहले किसी लिए हस्ताक्षर करते हाथ कम्पित थे और उसका नाम कुछ अस्पष्ट था ..
'सुनिधि मानव एकाएक भेंट!"

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जितेन्द्र सिंह तौमर '५२से'
कानपुर उप्र .

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...