रविवार, 18 अक्टूबर 2020

ऐतिहासिक गद्दार मीर जाफर

#गद्दारो_की_हवेली
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पढ़ते अथवा सोचते  ही रोंगटे खड़े हो जाते ही कि कहि कोई हमारे साथ ऐसा विश्वाशघाती तो नही जिसके रक्त से प्लाज्मा अलग हो गया हो! कंही कोई ऐसा तो नही जो स्वार्थ शिद्धि पूर्ण करने के लिए दुश्मन खेमे जा मिला हो !!कहीं कोई ऐसा तो नही जो मुस्कुराते हुए गले तो लगे किन्तु गला रेतने से पहले कुछ भी न सोचें !!!

जी हां!.....
बाग़ियों ,दस्युओं, चम्बल श्रंखला संस्करण में आपको चम्बल से काफी परिचित कराया, अब परिचय देता हूँ एक ऐसे द्रोही का जिसकी हवेली को 'रक्त हवेली' का बदनुमा नाम दाग मिला और जिसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला गया .....!जिसके दगा के कारण भारत को लगभग 200 वर्षो तक ब्रितानी हुकूमत की दासता झेलने पड़ी और 'सोने की चिड़िया' बोला जाने बाला महान दो सदियों तक लूटा जाता रहा ।

1733 में पैदा हुए नवाब सिराजुद्दोला की अपनी हत्या के समय महज़ 24 साल की उम्र थी।अपनी मौत से साल भर पहले ही अपने नाना की मौत के बाद, उन्होंने बंगाल की गद्दी संभाली थी! ये वही वक्त था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी उपमहाद्वीप में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही थी ।

सिराजुद्दौला को कम उम्र में नवाब बनाए जाने से उनके कई रिश्तेदार खफा थे....ख़ास तौर से उनकी खाला घसीटी बेग़म ! सिराजुद्दौला ने नवाब बनने के थोड़े ही समय बाद उन्हें क़ैद करवा दिया था!
सैना बढ़ते असमांजस्य के चलते  नवाब ने प्रायोगिक तौर पर बरसों से बंगाल के सेनापति रहे मीर जाफर की जगह मीर मदान को प्रमुखता दी......परिणाम वही 'सिल्हारे को सिल्हारे की जलन'..... इससे मीर जाफर नवाब से बुरी तरह खफ़ा हो गया ।

उन्ही दिनों फिरंगी अपने पाँव पसारने के लिए जगह तलाश रहे थे और उन्हें तलाश थी एक ऐसे भेदीये की जो उनकी राह के रोडा बनते नबाब की सुदृण व्यवस्था में सेंध लगा सके और उनकी तलाश शीघ्र ही अंसतुष्ट ओर सत्ता लालची मीर जाफर के रूप में पूर्ण हुई ।
एक गुप्त स्थान और मध्यस्थ के माध्यम से फिरंगी सेनापति क्लाइव -जाफर की गुप्त मंत्रणा हुई .....सड़यंत्रो की खाई खोदी गयी, अनुबंध हुआ और ब्रिटिश सेना ने आक्रमण कर दिया ।
नबाब की स्थिति चहुओर घिरे शिकार जेसी थी क्योंकि उत्तर से अब्दाली ओर पश्छिम से मराठो का अतिक्रमण पहले ही था....पूरी शक्ति से आकमण करना भी एक ओर से दुश्मन को   जीतने का खुला आमंत्रण था। प्रतिकार स्वरूप बंगाल के तीनों मोर्चे सम्भालती विशाल  फ़ौज की शक्ति प्रति मोर्चा एक  तिहाई से कम हो गयी ।
फ़ौज के एक हिस्से के साथ वो प्लासी पहुंचे.... मुर्शिदाबाद से कोई 27 मील दूर डेरा डाला गया... 23 जून को एक युद्ध में सिराजुद्दौला के विश्वासपात्र मीर मदान की मौत हो गई.... नवाब ने सलाह के लिए मीर जाफर को सन्देश भेजा.....और मीर जाफर ने सलाह दी कि युद्ध रोक दिया जाए. ....नवाब ने मीर जाफर की सलाह मानने की भारी  कर दी जिसकी परिणीति बंगाल और नबाब दोनो भूगतनी थी ।

युद्ध विराम कर दिया गया....!  नवाब कि फ़ौज वापस कैंप लौटने लगी..... मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को स्थिति समझा दी...!
क्लाइव ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया, एकाएक  हुए अप्रत्याशित हमले से सिराज की सेना बौखला गई... तितर-बितर होकर बिखर गई....जब तक कुछ समझ पाते क्लाइव ने लड़ाई जीत ली।नवाब सिराजुद्दौला को भाग जाना पड़ा....!

मीर जाफर तुरन्त  अंग्रेज़ कमांडर से जाकर मिला ओर सहमति के अनुसार उसे बंगाल का नवाब बना दिया गया....दरअसल वह  नाम का नवाब था  सत्ता तो अंग्रेज़ों के हाथ लग चुकी थी।


प्लासी की लड़ाई से भागकर नवाब सिराजुद्दौला अधिक दिन आज़ाद नहीं रह सके,उन्हें पटना में मीर जाफर के सिपाहियों ने पकड़ लिया. ....मुर्शिदाबाद लाया गया. !
मीर जाफर के बेटे मीर कासिम  ने उन्हें जान से मारने का हुक्म दिया!! 2 जुलाई 1757 को उन्हें मीरजाफर की हवेली  में फांसी पर लटकाया गया. ...अगली सुबह, उनकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड़ कराई गई....!!!!
कुछ समय ही मीरजाफर भी कठपुतली नबाब रहा ओर फिरंगियों उसी नीति के तहत जाफर के सेनापति पुत्र मीर कासिम द्वारा कलम कर दिया गया ,मीर कासिम नबाब तो बना किन्तु फिरंगी सत्ता के अधीन ओर भारत का एक क्षेत्र फिरंगियों के हाथ चला गया ।

मुर्शीदाबाद स्थिति मीरजाफर की हवेली को आज भी हराम अथवा हरामी के हवेली के रूप में बोला जाता है !
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यह आलेख लिखते चम्बल की एक लोकोक्ति स्मरण हो आयी..!

दगा किसी का सगा नही है ,नई मानो तो कर देखो!
जिन लोगो ने दगा किया है,जाकर उनके घर देखो!!
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत

ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत
Rajputana Soch पेज

===ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत===

साठा चौरासी का मुकीमपुर गढ़ी गाँव पिलखुवा के निकट अवस्थित है जो कि #तोमर राजपूतो का गाँव है। यहाँ के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे और उनका स्थानीय जनता में बहुत प्रभाव और मान सम्मान था। 1858 के विप्लव की शुरुआत के बाद क्षेत्र के राजपूत ग्रामीणों ने भी जमींदार गुलाब सिंह तोमर के नेतृत्व में बगावत कर दी। ठाकुर गुलाब सिंह ने ब्रितानियों को लगान न देने एवं क्रांतिकारियों का साथ देने का निश्चय किया। उन्होंने क्षेत्र वासियों को भी लगान न देने के लिए प्रेरित किया। मुकीमपुरगढ़ी में जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह के नेतृत्व में राजपूतो की एक बैठक बुलायी गयी। इसमें सभी ने ठाकुर गुलाब सिंह से सहमत होते हुए ब्रिटिश सरकार को भू-राजस्व न देने की घोषणा की। इस प्रकार मुकीमपुर गढ़ी राजपूत क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ बन गया। जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह ने निकटवर्ती क्षेत्र के गाँवों को भी क्रांति के लिए प्रोत्साहित किया। परिणामतः वहाँ भी क्रांतिकारी भावनाएं पनपने लगी और कुछ समय में वहाँ कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से भंग हो गयी। ब्रितानियों से संघर्ष होने के पूर्वानुमान के कारण जमींदार गुलाब सिंह ने अपनी गढ़ी  (लखौरी ईटों की किलेनुमा हवेली ) में हथियार भी इकट्ठे करने शुरू कर दिये।

मुकीमपुर गढ़ी के विप्लव की सूचना जब अंग्रेज अधिकारियों तक पहुँची तो उन्होंने उसके दमन का निश्चय किया। ब्रितानियों ने गुलाब सिंह को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया और मुकीमपुर गढ़ी तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विप्लव भड़काने का आरोप भी उन पर लगाया गया। एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी यहाँ विप्लव के दमन के लिए भेजी गयी। उसने मुकीमपुर गढ़ी को चारो ओर से घेर लिया। गुलाब सिंह की हवेली पर तोप से गोले बरसाये गये। मुकाबला असमान था लेकिन ठाकुर गुलाब सिंह जी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने ब्रितानियों का सामना किया परन्तु वे तोपों के सामने ज्यादा देर टिक न सके। ठाकुर गुलाब सिंह की गढ़ी को तोपों से खंडहर में परिवर्तित कर दिया। ठाकुर गुलाब सिंह और उनके कई सहयोगी वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगती को प्राप्त हो गए। ब्रिटिश सेना को हवेली के अन्दर कुएँ से हथियार प्राप्त हुए जो उनका सामना करने के लिए जमींदार गुलाब सिंह एवं ग्रामीणों ने इकट्ठा किये थे। बाद में मुकीमपुर गढ़ी गाँव में आग लगा दी गयी। ब्रिटिश अधिकारी डनलप ने गुलाब सिंह की सम्पूर्ण जायदाद जब्त कर ली। आज भी ठाकुर गुलाब सिंह जी की हवेली के खंडहर 1857 की क्रांति के गवाह बने हुए हैं।
~~बागी गाँव सपनावत ~~
सपनावत साठा क्षेत्र के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण गाँव में से है जो गुलावठी के पास अवस्थित है। यह गहलोत(शिशोदिया) राजपूतो का गाँव है और बहादुरी और बगावती तेवरो के लिये हमेशा प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के राजपूतो ने हमेशा की तरह 1857 के विप्लव में भी अपनी बहादुरी और देशभक्ति का परिचय दिया। साठा चौरासी में बह रही क्रांति की लहर से सपनावत भी अछूता नही रहा और गाँव ने बगावत कर दी। सपनावत के राजपूतो ने भी मुकीमपुरगढ़ी और पिलखुवा की तरह भू-राजस्व गाजियाबाद तहसील में जमा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद सपनावत ने पूरी तरह अपने को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।
मशहूर क्रांतिकारी मालागढ के नवाब वलीदाद खाँ जिनपर मेरठ से लेकर अलीगढ तक बागियों की सरकार की जिम्मेदारी थी, को भी सपनावत के ग्रामीणों से अत्यधिक सहयोग मिला था। नवाब वलीदाद खाँ गाजियाबाद तथा लोनी का निरीक्षण करके सपनावत में भी रूके थे। यहाँ के ग्रामीणों से इनके नजदीकी सम्बन्ध थे। इसी कारण सपनावत के निवासियों ने क्रांति के समय नवाब वलीदाद खाँ की बहुत सहायता की।
सपनावत से कुछ दूर बाबूगढ़ में अंग्रेजी सेना की छावनी थी। गढ़मुक्तेश्वर से बाबूगढ़ आए बागी बरेली ब्रिगेड के क्रांतिकारी सैनिकों की सहायता के लिए यहाँ के अनेक नौजवान वहाँ पहुँच गये। बाबूगढ़ में क्रांतिकारियों ने अत्यधिक लूटपाट की और दुकानों में आग लगा दी।
1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात् अनेक ग्रामों को क्रांतिकारियों का साथ देने या क्रांति में संलग्न होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने बागी घोषित कर दिया। उन गाँवों की जमीन-जायदाद छीन ली गई। इन बागी ग्रामों में सपनावत भी था। सपनावत गाँव को भी विप्लवकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण बागी घोषित कर दिया गया और यहाँ के किसानो की जमीने छीन ली गईं।इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्रांति में भाग लेने वाले राजपूतों,मुस्लिमो की जमीने अंग्रेजों के भक्त जाटों के नाम चढ़ा दी गयी.
इन वीर आत्माओ को हमारा नमन जिनकी बहादुरी और बलिदानो की वजह से आज हम स्वतंत्र हैँ_/\_

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार

~~~ प्रतिहार राजपूत ~~~
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~~ सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार का जीवन परिचय ~~ 

मिहिर भोज परिहार जी का जन्म सम्राट रामभद्र परिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव
की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। सम्राट मिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक
49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के
साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था। 
सम्राट मिहिर भोज बलवान, न्यायप्रिय और
धर्म रक्षक थे। मिहिर भोज शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ
था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50
वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।सम्राट मिहिर भोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिर भोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह
भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।सम्राट मिहिर भोज का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं पहला जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार सम्राट भोज ने
मलेच्छों(मुगलो,अरबों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। दूसरा कारण सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जो कि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है। इस दिन के 2 दिन बाद
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ
हो जाता है। जिन स्थानों पर प्रतिहारों, परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, अन्य शाखाओं को सम्राट भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के
इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिर भोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।
अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिर भोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक
सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि परिहार सम्राट
की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह
भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रू नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने
भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है। मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य,पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में
मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रू
उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर
कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की। कश्मीर
के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिर भोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए
दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते
थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।
किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने
की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट परिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस
समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार परिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है,
जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

परिहार क्षत्रिय राजपूत राजवंश।।
जय मिहिर भोज जी।।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
Source: नागौद स्टेट।।

भारत कल आज और कल

कल से प्रारम्भ होते नवरात्र और कुवारों-कुंवारियों के चेहरों पर ४माह उपरांत लौटती चमक में छिपा भविष्यवाद का गहन चिंतन भी मतदान से बड़ा मुद्दा हो सकता हे किन्तु इस तरफ देखनी की किसी को क्या परवाह आन पड़ी ....?

आज भारत विश्व की सर्वाधिक तरुण अवस्थाबादी जनसख्या का देश हे किन्तु दुर्भाग्य से वह योग्यता अनुरूप पारिश्रमिक सृजन में असफल हे और कही न कही देश की रीढ़ कही जाने बाली तरुणाई ही अर्थव्यवस्था का बो केंद्र जो देश उन्नति-प्रोन्नति का आधार स्तम्भ होकर ही खोखले बादो से प्रति पञ्च वर्षीय सरकार बनाओ योजना के रक्त पिशाचों द्वारा ठगी का शिकार बनाई जाती रही हे ।

क्या देश का उर्जामयी युवा अपने भविष्य के प्रति सचेत नहीं हे ......?
क्या तरुणाई का आधार खोखला होकर रुग्ण हे ....?

क्यो युवा मात्र सोचो अथवा व्यसन के आधीन होकर अपना भविष्य और देश का आधार दोनों दुर्बल करने पर उतारू हो रहा हे ?

सम्भवतः किसी ने इस बिंदु की तरफ आकर्षित होना मुनासिव न समझा ,आखिर युवाओ में आकर्षण खोजने की किसी को क्यों आन पड़ी,जब राष्ट्रवाद चरम पर होता हे तो बेरोजगारी भी सर्वोच्य शिखर पर होती  हे न ....!

एक सर्वेक्षण अनुसार देश का एक बड़ा हिस्सा व्यसन के प्रति आकर्षित हो रहा हे और जिसमे मूल में छिपा हे उनको समुचित व्यवसाय की अनुपलब्धता से बढ़ती मनोविकारों की खिन्नता में मष्तिष्क को क्रतिम सुख देने की लत लगना।न तो देश के ठेके पर चलाने बाले संचालक-परिचालक इस तरफ ध्यान देते हे और ना ही इस धीमे जहर के व्यवसायी! क्योंकि इन बेरोजगारो के खाली होने पर ही उनको लाभ प्राप्त होगा जो राजनेतिक भी होता हे और व्यवसायिक भी ।

जब देस के बड़े वर्ग के पास समुचित आय के श्रोत होंगे तो क्या बो अपना बहुमूल्य समय इन खाजनेतिक दलो और व्यसन्न कारियों के लिए निकाल पाएगा .....!!

आज हर युवा-युवती निरन्तर भाग रहा हे.....सोचता हे आज का परिश्रम कल उसके लिए स्वर्णिम भविष्य की बुनियाद रखेगा किन्तु देश की अतुलनीय शक्ति का दुर्भाग्य यहां भी साथ नहीं छोड़ता कुछ अवसर वादी मतो के लिए युवाओ से मतभेद कर निपट अनपढो को रोजगार मुहैया करा देता हे। और मेधा तड़पती हे.....
 अपनी दुत्कार पर,क्रोधित होती हे....
 अपनी उपेक्षाओं पर और कलुषित मन से बड़ जाती हे नशो की तरफ फिर स्वम की नशो से जहर ही क्यों न सोखना पड़े ..!!
यह कुछ समय की मानसिक शून्यता अंततः उन्हें ले जाती है गहन अंधकार में ओर कोई जहर पान करता तो कोई फांसी झूलता है !

विगत-तत्समय और आगामी धूर्त ठेकेदारिया अगर इस देश में मन्दिर मस्जिद,जातियों  की धूर्त राजनीति  करने से बेहतर होता की समुचित श्रमण का प्रबन्ध करती तो कदाचित देश की मेधा यू न पलायन करती !

एक तरफ तो युवा को जाति-पाती मिटाने की  शिक्षा दी जाती रही वही दूसरी तरफ सभी वरीयताओं,मेधाओ,उपलब्धियों,शेक्षणिक मान्यताओ,पात्रताओ को परेह् रखकर सिर्फ  जातिप्रमाणपत्र मांगे जाते हे ।

आज भारत स्वम की मेधाओ की उपेक्षा करके विदेशो पर निर्भर हे क्योंकि हमारे ठेकेदारो ने सत्ता-भत्ता से आगे कुछ सोचा ही नहीं ।
इस देश में एक से बढ़कर गुणीजन विरक्त सा जीवन जी रहे और मुर्ख सत्ताधीसि के सर्वोच्य पर विराजमान हे।मेधाये राजनेतिक स्वार्थो के चलते व्यसनकारी हो रही हे और सर्वोच्य न्यायालय से नगग्ना युक्त संस्कृति हिरस्कारि आदेशो पर व्यक्ति स्वत्र्ता का मुल्लमा चढ़ाकर निषेधात्मक नियमन सुनाये  जाते हे ।

यथार्थ में भारत,भारत न हा फिरंगियो के द्वारा थोपा गया नग्न,उभनिष्ठ,बलपौरुष हींन सदैव सभ्यता का ढोंग ओढे हुए #इण्डिया ही रहा ।

हे आर्यावर्त! तुझे बैभवशाली भारत बनने में और कितने युग लगेंगे .....!
देश की रीढ़ दिग्भ्रमित है और उसे स्वम झुकाव तक नही पता।राजनीतिक गलियारे की वेहया वैश्या ने सारा देश वर्णसंकर करके पौरुष विहीन कर दिया क्या ?

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~जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
  चम्बल मुरैना मप्र.

सोमवार, 28 सितंबर 2020

भगत सिंह जी

अमर वीरगति की प्रेरणापुंज और युवाओ के प्रेरणा स्त्रोत भगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु,चन्द्रशेखर 'आजाद', रामप्रसाद 'बिस्मिल',असफाख,मंगलपांडे,राणा बेनीमाधव सिंह,बाबू कुँअर सिंह,महाबीर सिंह,दीक्षित जी जैसे महायोद्धाओं का कहि भी दस्ताबेजो में उल्लेख नही है। यह तो भारतीय जनता की भावना है कि उन्हें 'शहीद ए आजम,आजाद,पंडित बिस्मिल जैसी उपाधियों से अलंकृत किया जाता है ।

क्या कारण है कि आज भी भारत की राष्ट्रीय भाषा हिन्दी और  लिपि देवनागरी के साथ-साथ इन महाबीरो को प्रपत्रो में 'शहीद' का उद्बोधन नही मिला....?
अकबर ,शाहजंहा,हुमायु,टीपू की क्रूरता को महान बताने बाले   इस देश में हजारों,करोड़ो अन्तर्वाही कीड़े है और उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय पारितोषिको से सम्मानित भी किया जाता रहा है ।

भारत मे जातिवाद खत्म करने की बात तो की जाती है पर चुनाव आते ही जाती और धर्म आधारित मतो का वर्गीकरण आखिर क्यों होता है ...क्यों कि देश से जुड़े आंतरिक तन्त्र में प्रतिभा नही प्रजाति देखना है ही लोकतंत्र है।

छोटूराम के नाम के साथ जुड़ी 'सर' उपाधि उस ब्रितानी चरण चुम्बन का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो सिंधिया को 'वाइसराय' बनाती है। भले ही वीरगति प्राप्त क्रांतिकारियों को लोकतंत्र भूल जाये पर ब्रितानी सरकार के रीछ हमेशा से सर्वोपरि रखे गए ।

भारतरत्न,भारत विभूषण जैसे  पारितोषिक सम्मान आज लाई की तरह नङ्गे बॉलीबुड को बाटे जाते है और जो कुछ बच  जाए वह लेतो की खंडपीठ में बन्दरबाट कर लिए जाते है। पटेल के बुत हर जगह है किंतु 552 रियासतों के दानदाताओ का कहि नाम नही ...क्या यही भारत को ठेके पर हेंडल करने बालो की कृत्यगता ?
राष्ट्रीय खेल हॉकी ओर उसके जादूगर ध्यानचंद्र जी आज भी उपेक्षित है। क्योंकि उन्होंने हिटलर के समक्ष सीना तान कर बोला था.......'भारत का हूं और क्षत्रिय हूं सिक्को से स्वाभिमान नही तौला जा सकता है !"

पंडित गैंदालाल दीक्षित जी उम्रभर क्रांति की मशाल प्रज्वल्वित करके धन और आयुध उपलब्ध कराते रहे किन्तु आज देश मे 60 %को पता ही न होगा। तरकुली माता के अनन्य भक्त अंगरोजो की बलि चढाते रहे किन्तु उप्र से सटे मप्र,बिहार को भी पता नही होगा !

आईपीएल में बिकते क्रिकेटर ओर ऑनलाइन जुआ व मदिरा प्रचार करते क्रिकेटर ही अगर भारतरत्न है तो नङ्गे मानसिक वेश्यालय की दुनिया मे भारतरत्न खोजने की नीति कैसे प्रारम्भ हुई ....इन दलालो ने कोनसा तीर मारा है !

राष्ट्रीय बापू,राष्ट्रीय चाचा,राष्ट्रीय गुरु, जैसे सम्मान किस किधर परस्पर बटे वह हर कोई जानता है पर निर्पेक्षय की अति तो तब हुई थी, जब डा राजेन्द्र प्रसाद जी को सोमनाथ मंदिर जाने  से नेहरू ने रोका था !!

आज देश का बच्चा-बच्चा परिचित है कि जिन्होंने भारतभूमि को लहू से सींचा उनको उपेक्षित कर दिया गया है और हमे आजादी देने में 'असहयोग आंदोलन' का रट्टा लगाया गया। इतिहास की बात की जाए तो महान दूरदृष्टा ओर प्रजा बत्सल शाशक जयचन्द ओर मानसिंह को गद्दार प्रचारित किया किन्तु  माधव भट्ट,राघव चेतन,वातायन खत्री,आदि भेदियो पर मौन साधा गया ।


आज भगत सिंह जी को स्मरण करके उनको श्रद्धा सुमन अर्पित तो किये जायेंगे किन्तु उनको वलिदान को सर्वोचित उल्लेखनीय सम्मान दिलाने पर लेटे मौन साध लेंगे। असल मे यह जो लोकतंत्र है न सब बॉलीवुडिया सिल्वर स्क्रीन का ही वास्तविक रूप है जंहा वर्जित दृश्य भी अभिनय  प्रतिभा बनाकर परोसे जाते है। ओर देह दर्शन कराके संस्कृति सभ्यता के सभी बंध खोले जाते है ।

पूज्य भगत सिंह जी अच्छा हुआ लगभग दशक उपरांत भी आपका पुनर्जन्म नही हुआ क्योंकि यह देश तो कल फिरंगियों की शाश्कता का गुलाम था ....और आज हरामियों की मानसिकता का है ।

अमर शहीद भगत सिंह जी को एक भारतीय की तरफ से अश्रुपूरित श्रद्धा सुमन व नमन 🙏 

'इंकलाब जिन्दावाद' 💪
'वन्देमातरम' 
'जय भवानी'
---------------.
जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 23 सितंबर 2020

तीर्थयात्रा (हास्य)

#भदेस_वार्ता
सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ 😂😂
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एक गाँव से कुछ बुजुर्ग एकबार तीर्थाटन को निकले ...विधीवत सबकी आरक्षित टिकिट थी और सबकी सीट्स संग-साथ बना रहने के लिए एक ही बोगी में क्रमानुसार नजदीक थी...
चलते-चलते सफर में चर्चाये आम होती हे और सहमति-असहमति,आलोचक-प्रशंशक दो समूह सदैव बनते आये हे,कुछ ऐसा ही वाक्या इधर भी था ।

रामआसरे-
" भैया तीरथ को तो जाय रहे हे पर बड़ी टेंसन में जान डरी हे,कुआ पे दो बीघा चरी और 6 बीघा कछवारि लगाई हे पर जा कदुआ घ्नसमा समवीरा की गैया कहु रोज न चरे!"
यह कहते हुए बुजुर्ग देवता ने धुंए से पीली हो चुकी  मुछो में अंतर्ध्यान हुए होठो के मध्य फटाफट करके 10 नम्बर ख़ेनि सरकाई ही थी की बपरिते बोल पड़े !

"अरे दद्दा जी बात तो एक और बेर कहो,जा सारे घ्नसमा ने सिग हार चराय डारो न तो लुगाई बाँध पाओ और न गैया...भोजाई उ तो दिनरात बाजार में जायके टिकिया-भल्ला में जड्ड देत रहे !"

यह कहते-कहते बपरीते ने बड़ी चुलबुली अदा में वांयी आँख झपकाई ई थी की गुस्से से तमतमाते 'घ्नसमा लाल' तेरही के मालपुआ के जेसे लाल हो उठे ।

"सुनि सारे बप्रीते तू तो सारे दोगला ई रहेगो जाकी बीड़ी पी लई बाकी की लुगाई बन जातु हे,और रही बात गैया की तो ऎसे ई चरेगी !"
"काहू के झाड़ .में दम होय तो गैया रोक के दिखाय .....मारे मुंडा के चाँद भोपाल न बनाई तो हमते उ को घनसमे कहेगो !!"

रमासरे को यह सुनते ही ततैया लग गयी और बपरीते को बगल में हटाके घनसमे के सामने आ बेठे और बोले ।

"काये रे घ्नसमा तेरी गैया काय हमाये खेत में  धसेगी?"
"भें कछु तेरे बाप को लगि गओ हे का, जो जा तरे ते बतरामन कर रहो हे !!"
"ज्यादा वाइसराय न बनि,मारे पनाह के चांद हाल खरोंच जागी!!!"

इतना सुनते ही घ्नसमे के टिकासरे में भूत झोलकिया लग गयी  ..
"सुनो ज्यादा चु चपर न करो अगर कछवारि होगी तो अब गैया जरूर चरेगी,तुम सिग हमाये झुनझुना झराय लियो और कराय दियो फांसी। तुमसे हमाये मुंडन में डरे रहे ..!"

रमासरे कुछ कहते उससे पहले ही बपरीता एक झोला उठा लाया और बड़ी जोर से बोल  उठा ...

"सुनो सिग अभाल ई तोर-तिया करे देत हे, जी हे गओ दद्दा को खेत और अब तुम अपनी गैया धसाय् के देखो अभाल ई भुभरो न फूटे तो कहियो !"

घ्नसमे भी ताव में आ गए और चारो तरफ नजर मारी लेकिन गाय का प्रतीक  जैसा कुछ न मिला तो बपरीते की जेब से गोविन्दबीड़ी का बण्डल निकाल कर गाय बना कर  रख दिया और छाती 56 इंच करते हुए बोल उठा ....

"लेयो तिहाये खेत मे गैया नई पुरो सांड घेर के ऐसे ई चरेगो,काट लियो हमाये कदुआ!"

फिर क्या ...बातो में बतबढ ओर तरण-तारणा आरम्भ हो गया ......दोनों तरफ मुंडा फटाफट खोपड़ियों पर बजने लगे। दोनों तत्वज्ञानी बड़ी श्रद्धा से परस्पर माँ-बहिनो को स्मरण कर रहे थे ।

ऊधम, हाय-पुकार,चिल्ल-पो सुनकर टीटी rpf बाले भी आये ओर तीनों को यह बोलकर झांसी उतार दिया कि ....तुम तीनो को तीर्थ जाने की नही संसद भवन जाने की आवश्यकता है जिसके लिए गाडी उल्टी तरफ जाएगी ...!

मामला रफा-दफा भी हो गया और मुरैना से नासिक जाने बाले यात्री झांसी में एक साथ बैठकर एक ही बीड़ी को पी रहे थे ...!किन्तु बपरीते अपने बीड़ी-बण्डल के पैसे दोनों लोगो से रोते हुए बसूल करना चाह रहे थे ।😀



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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 9 सितंबर 2020

मुखाग्नि प्रेम की

हाथ मे ली हुई बीड़ी से सुट्टा खीचकर ढेर सारा धुंआ फिजाओ में छोड़ते रामआसरे चाचा कहि दूसरी दुनिया मे   गुम है !
अभी कल की ही तो बात है जब रामजानकी काकी का डोला लेकर आये थे, ओर आज काकी के सफेद होते बालो के साथ बढ़ती हुई झुर्रियों से  चेहरे भरे चेहरे पर उनका आकर्षण बिल्कुल भी खत्म नही हुआ था ।
सिर पर बंधे अंगोछे से पसीना मिश्रित आँशु जब-जब वह पोंछते है ,तब-तब उन्हें अपनी 'मुह पूछाई' रस्म स्मरण हो आती है और हृदय में उठते हुए दर्द में सहसा एक मुस्कुराहट आकर कहि गुम हो जाती है ।
लोगो के भारी कोलाहल के मध्य रामआसरे काका का मष्तिष्क व्यतीत में चला गया और बीते कल का चलचित्र  इतना स्पष्ट हुआ कि वह निश्चेत से होकर अपलक गुमनाम मुहब्बत में चले गए !


घुंघुरू बजाते बेलो के साथ एक किशोर हंकार-हंकार कर बैलों को उत्साहित कर रहा था कि पूरा 4 बीघा खेत जल्दी लग जाये तो गांव में जो रमैया आई है ...उसके साथ हंसी ठिठोली करेंगे और दोपहर भर सुस्ताएँगे पर उन्हें नही पता था कि रमैया आज घर चली जायेगी ।
भोली-गोपी भी अपने साथी के साथ दुगने जोश में चल रहे थे .....ओर 4 बीघा सितम से पहले जुत गया ।
जल्दी-जल्दी नारे बदल हल को खेत मे छोड़ रमसा काका घर पहुचे ओर चिल्लाए....

"ओ री रमैया जरा गुड़ के साथ पानी दे  दो बड़ी पियास लगी है !"

किन्तु न प्रतिउत्तर आया और नाही उम्मीद का मूर्तिरूप रमैया!
घर सूना था .....न वह खिलखिलाहट थी न वह चहल-पहल !
एक रमैया के जाते ही रमसा काका जैसे फुट-फुट कर रोने को आतुर थे ।

बात आई-गयी हुई और रमसा-रमैया की कहानी भी अतीत की परतों में कही दब गई ..!

कुछ वर्षों उपरांत रमसे का पाणिग्रहण हुआ और जब छिपते-छिपाते प्रथम भेंट को पहुंचे तो ....अवाक रह गए..!

दुल्हिन ने पाँव छूकर जब पहला शब्द बोला तो उसमें एक परिचित स्वर  सा लगा ...

" देखो जी पहले पहिचानिये फिर ही मुझे स्पर्श करना !"

परीक्षा की घड़ी ओर बालपन का स्नेह सजीब हो उठा ...कांपते होंठो से रमसा कह उठे

"रम....ममया ....रम ....रमैया..!"
ओर एक खिलखिलाहट से अटारी गूंज उठी


समय पंख लगाके उड़ता रहा .....किन्तु रमैया की गौद सुनी रही। जन्हा सुना वही दोनो दौड़े जाते ...हजार पत्थर पूज कर भी रमैया-रमसे  सन्तान सुख से वंचित थे!
 रमसे-रमैया की जोड़ी को लोग प्रातः देखना पसंद नही करने लगे ....कहते कि बांझ का मुह देखना निकृष्ठ होता है और लोग भूलके मिलते भी तो मुंह बनाकर जमीन पर ठुकथूका के चलते बनते ।

वंही रमैया ने अतिरिक्त बात्सल्य स्नेह को अपने रमसा ओर पालतू जांनंबरों को देना प्रारम्भ कर दिया ..
समय के साथ घर-जमीन सबका बंटबारा हुआ पर रमसे का दिल आज भी साझा था ....वह तो प्रेम का अशेष सागर था जो सदैव हिलोरों में रहता था ।
अपने खेतों की फसल ओर अपनी रमैया यही जीवन था !

कभी-कभी रमैया दुखी होती और रमसे के सिर को गोद का सिरहाना देकर कहती कि .....' अ जी तुम चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे न,फिर क्यों सिर्फ मुझे ही निहारते रहे ?"

रमसे मोन रमैया की आंखों में निहारते हुए कहने लगे ....
"तूने क्यों इतने सम्बन्ध तोड़ सिर्फ मुझे ही साथी चुना !"

"साथी!"
रमैया सिर्फ इतना बोल पाई और हिचकियो के साथ हिलकारे ले उठी !

"तुम्हे याद नही होगा जब मे जिजी के साथ आई थी ,में ओर तुम दोनों खूब लड़ते थे !"
"....लेकिन तुमने उस दिन जान जोखिम में डालकर मुझे बचाया था।"

"याद है वह जंगली भेड़िये से तुम्हारा भिड़ना, मुझे परेह धकेल ...उसका निबाला बनने की आतुरता सिर्फ प्रेम में होती है !"

"वह निश्चल ,निःस्वार्थ प्रेम मेने तुम्हारे गज भर सीने के अंदर स्पंदित होते हृदय में स्पस्ट सुना था!"
"सुना था कि रक्त की हर वृन्द में सिर्फ रमैया बसति है फिर रमैया अपने प्रियतम मन से दूर कैसे रह सकती है ?"

"सुनो! जीवन मे कितने भी बदलाव आए पर में चाहूंगी कि में जब तन छोड़ू मेरा प्रियतम बस मुझे यू ही निहारे ..."
"उम्र का क्या है बालपन का प्रेम ,यौवन का समर्पण बना और प्रौढ़ आते-आते सहचर होने का प्रमाण भी !"

"में चाहूंगी कि में जब भी इस दुनिया को छोड़ू ,तुम मेरे सफेद बालों की लट से हमेशा मेरा चेहरा छुपने से बचाते रहो!"
"तुम कहते थे न!रमैया बालो की अलका से बड़ी जलन होती है जो मुझे तेरे दर्श के मध्य एक अवरोधक बनके बार-बार पूर्ण चन्द्र देखने से रोकती है !"
प्रेमभाव का सावन-भादो वर्ष पड़ा और रमैया के समर्पण का रमसे आभारी हो गया ।

"सुनो!"
'भगवान न करे कि कभी ऐसा समय आये में तुम्हे न पहिचान पाउ पर.....तुम मेरी पहिचान बने रहना !"
रमैया प्रेम चर्चा और रमसे प्रेम श्रोता बने उसकी गोद मे सिर रखे ही सो गए ...।


व्यतीत समय निकलता रहा और रमैया-रमसे का प्रेम प्रगाढ़ होता रहा किन्तु समय के प्रभाव से कोन बचा है......ओर एक दिन रमैया ऐसी गिरी की फिर उठ न पाई ....रीढ़ रमैया की क्षतिग्रस्त हुई थी और बाबले रमसे हो गए ...!!
बैलगाड़ी हांकते रमसे के शब्दों में हंकार नही थी और रेलगाड़ी की ध्वनि में उन्हें रमैया के नूपुर झनकते सुनाई दे रहे थे ..!

बड़े चिकित्सालय में रमैया के पास बैठे-बैठे रमसे काका बार उस अलका को पुनः रमैया के चेहरे पर देखने की लालसा में बैठे रहते की लट घूमे ओर वह उस लट को पुनः एक ओर कर पाए !


नजदीक बेड पर लेटा एक युवा यह रोज देखता ओर पूछता की .....
"बाबा क्यों आप इनके पास पूरा दिन-रात बेठे रहते हो ?"
'जबकि इनमे पहिचानना तो दूर कोई चेष्ठा भी शेष नही दिखती ...आप कुछ समय बाहर भी बैठ लिया कीजिये ...!"

रमसे...
"बेटा....यह मेरी वह सहचरी है जिसने मुझे  करोड़ो में पहिचाना था.....!"
"चलो ठीक आज मुझे नही जानती पर में तो इसे पिछले 6 दसको से जानता हूं न!"

"पता नही कब इसकी आंख खुले और में न होऊ तो इसको दर्द होगा क्योंकि हमने तो विवाह बाद भी साथ-साथ रहने के लाखों वादे किए थे !"

ओर अंतिम पिय दर्श को रमैया की आंखे गंगा-जमुना बन गयी ..।
वह जगी .....कांपते हाथ से रमसे का सिर अपने सीने पर  रख अपने अस्ताचल की राह को चली गयी ....!





श्मशान पर रमैया का पार्थिव शरीर रखा था ....रमेसर काका मुह से बीड़ी लगाए धुंआ उगल रहे थे ....!!
तमाम तैयारी उपरांत जब मुखाग्नि के लिए रमेसर काका को पुकारा वह पूर्व की तरह शांत थे ....
बुलाने पर जब न बोले तो हिलाने पर एक तरफ को लुढ़क गए ...
ओर मुंह से निकली बीड़ी की चिंगारी ने अंतिम धूम्र प्रकट किया .....देखते ही देखते ,रमेसर ओर रमैया की कहानी फिजाओ में घुलने लगी ...!!!!!!

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

सोमवार, 7 सितंबर 2020

कथा-सरिता

===कथा सरिता===
बहुत पुराने समय की बात है।भारत वर्ष में  एक नृप का चक्रवर्ती शाशनथा, उनके कुलगुरु और कुलपुरोहित नीति और ज्ञान की बातें समझाते रहते थे। 
निरन्तर युद्ध में जीतने के बाद राजा का ध्वज अखण्ड भारत पर गर्व से लहराता जा रहा था ।
निरन्तर प्राप्त होती विजय श्री और बढ़ते शाशन क्षेत्र के प्रभुत्व ने राजन के मस्तिष्क में गर्व की भावना कब अभिमान में परिवर्तित हुई उनको स्वम अहसास न हुआ ।
एक बार राजा ने घमंड से चूर होकर कुलगुरु से कहा, 'गुरुदेव, आज  मैं अब चक्रवर्ती सम्राट हो गया हूं....
अब मैं हजारों-लाखों लोगों का रक्षक हूं....
 मेरे कंधों पर उन सब की जिम्मेदारी है।'
कुलगुरु समझ गए कि मेरे यजमान को सर्वसत्ताधीस  होने की अवभिव्यक्ति का घमंड हो गया है। यह घमंड उसकी संप्रभुताको हानि पहुंचा सकता है। इस घमंड को तोड़नेके लिए कुलगुरु ने एक उपाय सोचा...
जब एक दिन शाम को राजा और कुलगुरु भ्रमण कर रहे थे तभी राजा को एक बड़ा सा पत्थर दिखा। कुलगुरु ने उस पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा 'राजन! जरा इस पत्थर को तोड़ कर तो देखो।
'राजा ने अत्यंत नम्र भाव से अपने बल से वह पत्थर तोड़ डाला।
किन्तु यह क्या! 
पत्थर के बीच में बैठे एक जीवित मेंढक को एक पतंगा मुंह में दबाए देख कर राजा दंग रह गया।

कुलगुरु ने राजा से पूछा, 'पत्थर के बीच बैठे इस मेंढक को कौन हवा-पानी और खुराक दे रहा है? इसका पालक कौन है? कहीं इसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी तुम्हारे ही कंधों पर तो नहीं आ पड़ी है?'
राजा को अपने कुलगुरु के प्रश्न का आशय समझमें आ गया। वह इस घटना से पानी-पानी हो कर कुलगुरु के आगे नतमस्तक हो गया।
 तब कुलगुरुने कहा, 'चाहे वह तुम्हारे राज्य की प्रजा हो या दूसरे प्राणी, पालक तो सबका एक ही है- परमपिता परमेश्वर।हम-तुम भी उसी की प्रजा हैं, उसी की कृपा से हमें अन्न और जल प्राप्त होता है। एक शाशक के रूप में तुम उसी के कार्यों को अंजाम देते हो। इसीलिए हमारे भीतर पालनकर्ता होने का घमंड कभी नहीं आना चाहिए।'

#सारांश -: किसी भी कार्य के लिए हम सब मात्र निमित्त हे जिसका कर्ता स्वम को समझ सर्वश्रेठता का प्रदर्शन करना सबसे बड़ी भूल हे ।
क्योंकि धन्वन्तरि वैद्य को भी मृत्यु के समय औषधि प्राप्त न हुई थी ।

रविवार, 6 सितंबर 2020

सस्ती शायरी

किसी को सिर रख रोने के लिए एक कंधे की तलाश है,
कोई सेकड़ो कंधों में कांधा बनकर भी कांधे से उदास है!

किसी का सब्र छलकने  नही फुट फुट रोने को कयास है,
नित याद करता अपनो को किसी मेअपनो से खटास है!

अजनबियों का मेला है दिल कोई धंदा तो ग्राहक तलास है,
पल जोड़ स्वयं को लिखता हूं लोगो को स्वार्थ की आस है!

'असफल' जिंदगी के फलसफे इतने सस्ते नही मिलते है,
किसी इश्क में तन तो किसी को इश्क में धन की तलाश है!

तलाशे जिंदगी खत्म नही होगी खत्म ये सारा जन्हा होगा,
घमंड से उठे मष्तक एक दिन तेरा भी बाकी न निशां होगा !!!!

  

रविवार, 23 अगस्त 2020

क्षत्रियो की ८४ ओर इतिहास

--- राजपूतो में चौरासी की अवधारणा---

राजपूतो के बसापत का पैटर्न समझने के लिए ये पोस्ट जरूर पढ़ें। इससे पहले इस विषय पर कभी नही लिखा गया--

राजपूतो की ज्यादातर बसापत गांवो के समूह के रूप में मिलती हैं। 12 गांव, 24 गांव, 42 गांव, 60 गांव, 84 गांव आदि। इन्हें खाप कहा जाता है। ये राजपूतो में ही मिलती है या राजपूतो से गिरकर दूसरी जाती में गए वंशो में। दूसरी जातियों में भी सिर्फ उन्ही वंशो की एक गोत्र की खाप मिलती है जो राजपूतो से गिर कर उनमे शामिल हुए हैं। क्योंकि राजपूतो की ही बसापत सैनिक सेवा के बदले जागीर मिलने से होती थी। इसके अलावा खुद से भी किसी क्षेत्र को जीता जाता था लेकिन उसके बाद अपने से बड़ी ताकत से पट्टा अपने नाम लिखवाया जाता था जो कि गांवो के समूह के रूप में ही होता था। 

जागीर एक दो गांव की भी हो सकती थी लेकिन ज्यादातर कई गांवो की होती थी। अब जरूरी नही कि जितने गांवो की जागीर मिली है उन सभी गांवो में उन राजपूतो की बसापत हो। लेकिन समय के साथ आबादी बढ़ने से जागीर के अन्य गांवो में भी फैल जाते थे। बाद में खुद खेती भी करने लगे। 

राजपूतो की इन खापो में सबसे ज्यादा लोकप्रिय संख्या 84 की थी। 84 क्या है इसको जानना बहुत जरूरी है। भारतीय संस्कृति में संख्या 84 का बड़ा धार्मिक महत्व रहा है। इसे शुभ माना जाता रहा है। इसीलिए किसी चीज को दर्शाने में इस संख्या का बहुत इस्तेमाल किया जाता रहा है। जैसे महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थो की संख्या 84 बताई गई है। जरूरी नही की तीर्थो की संख्या सटीक 84 ही हो लेकिन पवित्र होने के कारण इस संख्या का सांकेतिक रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह मेरु पर्वत की ऊँचाई 84 हजार योजन बताई जाती है। ब्रज को 84 कोस में फैला बताया जाता है। प्रसिद्ध जोगियों की संख्या 84 बोली जाती है। जानवरो की प्रजातियों की संख्या 84 लाख बताई जाती हैं आदि आदि। 

इसी तरह जब इलाकाई डिवीज़न की बात की जाती थी तब भी 84 का बहुत उपयोग किया जाता था। एक परगने को 84 गांव के बराबर माना जाता था। हालांकि मध्यकाल में एक परगना 40 गांव का भी हो सकता था और 400 गांव का भी। राजपूतो को सबसे बड़ी जागीर जो मिलती थी वो ज्यादातर 84 गांव की ही होती थी। इनमे से कई 84 आज भी मौजूद हैं लेकिन जरूरी नही कि इनमे आज राजपूतो की संख्या पूरे 84 गांवो में हो। इसके अलावा 84 गांव पूरे ना होने या उससे कुछ ज्यादा होने पर भी 84 बोल दिया जाता था। कई बार एक पूरा परगना किसी एक वंश की जागीर में होने पर उसे 84 बोलना पसंद करते थे भले ही उसमे 84 गांव पूरे ना हो या उससे कुछ ज्यादा हों। ये 84 सांकेतिक ज्यादा होती थी।

इसी तरह 84 के चार गुना यानी की 360 और 360 के चार गुना 1440 संख्याओं को भी शुभ माना जाता है इसीलिए इनका भी राजपूतो के इलाकाई डिवीज़न में बहुत महत्व था। लेकिन 360 और 1440 ज्यादातर जागीर में नही मिलते थे। एक 'सरकार' जो आज के जिले की तरह होता था उसे 360 गांव के बराबर माना जाता था। हालांकि ये संख्या भी सांकेतिक ही होती थी। किसी वंश का शासन किसी बड़े हिस्से में हो जो लगभग सरकार के बराबर या आसपास हो तो उसे 360 गांव बोल दिया जाता था जैसे हरियाणा में मडाडों का राज्य था या रोहतक वाले परमारो का। अगर इससे कहीं ज्यादा बड़ा हो तो 1440 गांव बोल दिया जाता था। जैसे हरिद्वार, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर क्षेत्र में पुंडीरो का राज्य था। गौरतलब है कि 360 या 1440 अक्सर वहां होते थे जहां किसी वंश का पहले से ही बड़ा राज्य रहा हो और बड़ी ताकत के अधीन होने के बावजूद ये अर्धस्वतंत्र होते थे और अपने राज्य में खुद जागीर बांटते थे। और आज भी उसी तरह से इनकी आबादी मिलती है। 

उदाहरण के लिए हरियाणा के परमारो का राज दादरी से गोहाना और जींद से बहादुरगढ़ के क्षेत्र तक था। इसको 360 गांव की रियासत कह सकते हैं। ये इलाका जीतने के बाद परमार राजा ने अपने सेनापतियों या पुत्रो वगैरह को जागीरे बांटी होंगी। इसी तरह परमारो की इस क्षेत्र में 12, 24 या 32 गांवो की 3-4 या उससे ज्यादा खाप बनी। इन्ही जागीर के गांवो में परमार राजपूतो की आबादी का विस्तार हुआ। कुछ एकलौते गांव की जागीरे या भोम भी दी जाती थीं इसलिए स्वतंत्र गांव भी बसते थे। रियासत के बाकी गांवो में किसान जातीयो के लोग बसाकर परमार राजा उनसे खेती कराते। इन परमारो की राजधानी कलानौर थी। किसानों को बसाने के उपक्रम में किसानों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण किसान जाती के लोग जमीन के लिए 'भेंट' देने की भी पेशकश करते, तभी से कलानौर में कौला पूजा की शुरुआत हुई। किसानों को जहां खेती की जमीन मिलती वही बस जाते थे, किसी एक गोत्र के किसानो को खेती करने के लिए जागीर की तरह गांवो का पूरा समूह देने का कोई मतलब नही था इसलिए उनमे एक ही गांव में कई गोत्र के लोग मिलेंगे जो रिश्तेदारी में आकर नही बसे बल्कि एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से जमीनें मिलने पर बसे हैं। इसी तरह एक गोत्र की जगह कई गोत्र की खाप भी मिलेगी। हरियाणा में सुरक्षा कारणों से जाटो में अलग अलग गोत्र के किसानों के गांवो द्वारा मिलकर खाप बना लेने का चलन था इसलिए वहां जाटो में बहुगोत्रीय खाप भी मिलती हैं जैसे महम चौबीसी खाप। ये खाप कलानौर परमार रियासत की खालसाई जमीन पर खेती करने वालो की है जो इन्होंने 19वी सदी में ही बनाई है। इस खाप के जाट परमारो के मुजारे होते थे। इस खाप के बनने के बाद ही इन्होंने कौला पूजन के खिलाफ आंदोलन किया। 

इसीलिए हरियाणा और पश्चिम यूपी में जाट और गूजर जैसी जातियों में एकगोत्र कि खाप सिर्फ वो ही हैं जो राजपूतो से निकले हैं। जैसे पश्चिम यूपी में गूजरो में भाटी, कलस्यान, पवार, नागर आदि की ही खाप मिलती हैं जो अपने को राजपूतो से निकला बताते हैं। बाकी हूण, चेची,  कसाना आदि गोत्र के गूजर जो असली गूजर कहे जाते हैं वो बिखरे हुए ही मिलते हैं। 

राजपूतो के गांव वहीं बसते थे जहाँ उन्हें खुद सैनिक सेवा के बदले जागीर मिलती थी। जबकि कृषक या अन्य पेशों वाली जातियां कही भी किसी की भी जागीर में या 
खालसाई इलाको में बस सकती थीं जहाँ उन्हें खेती के लिए जमीन या उनके पारंपरिक पेशे से जुड़ा काम मिल जाए। पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब वगैरह में दिल्ली के करीब होने के कारण मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद राजपूतो को कोई नई जागीरे नही मिली और जो पुरानी जागीरे या राज्य थे उनको भी धीरे धीरे तोड़ा जाता रहा इसलिए अपनी जागीरों में भी नए गांवो में राजपूतो का बसना बंद होता गया। इस कारण इन क्षेत्रों में एक तो पिछली कई सदियों में राजपूतो की आबादी का विस्तार बहुत कम हुआ। ऊपर से जागीरे टूटने और कमजोर होने के कारण कई खापो के अन्य जातियों में शामिल होने से संख्या पहले से कम भी होती गई। जबकि कृषक जाती होने के कारण जाट गूजर जैसी जातियों के लोग 20वी सदी तक नए इलाको और गांवो में बसते रहे, दूसरों की जागीरों में मुजारे के अलावा खालसाई जमीनों पर भी खेती करने के लिए बसते रहे। इसके अलावा राजपूतो से गिरी खाप भी इनमे शामिल होती रहीं। इस कारण इन क्षेत्रों में इनकी आबादी का बहुत विस्तार हुआ और इनके पिछली कुछ सदियों में ही बसे गांव बहुत मिलेंगे। दिल्ली में सल्तनत की राजधानी से लगता इलाका खालसा में होने के बावजूद इनकी वहां बहुत आबादी है। 

इस 360 की तरह ही मडाड और चौहानो की 360 थी। मडाडों के 360 गांव जो बोले जाते हैं उसका मतलब उनकी रियासत से था, मडाड राजपूतो की बसापत सभी 360 गांवो में नही थी। 

इसी तरह उत्तरी दोआब में पुंडीरो की रियासत 1440 गांव की बोली जाती थी जो आज के सहारनपुर, हरिद्वार, मुजफ्फरनगर और शामली जैसे 4 जिलों में फैली हुई थी। इसमे पुंडीरो के गांवो के कई समूह हैं जो पहले जागीर रही होंगी। 

लेकिन इसमे कोई एकरूपता नही होती थी। जैसे जाटू तंवरो के राज्य का क्षेत्रफल मडाडों या परमारो से ज्यादा नही था लेकिन वो अपने को 1440 बोलते थे। बाद में भाट जगाओ ने अज्ञानता के कारण अपने हिसाब से इन संख्याओं को परिभाषित करने का काम किया। जैसे किसी वंश की 360 बोली जाती है लेकिन वर्तमान में उस जगह सिर्फ 40-50 गांव में उस वंश की आबादी दिख रही है तो भाटो ने अपने मन से उस वंश की दूसरी जगह बसी खापो को जोड़ जाड़ के 360 गांव सिद्ध कर दिए। जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश में गहलोतो के कई जगा/भाट यहां पुराने जमाने से 360 गांव होने की बात जो जनश्रुतियों में लोकप्रिय थी, उसे सिद्ध करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी खाप के गहलोतो के गांव के साथ नेपाल में गहलोत बताकर वहां के गांव तक की काल्पनिक संख्या जोड़ देते हैं। जबकि उन्हें नही पता कि हाथरस क्षेत्र में ही एक समय गहलोतो का बड़ा राज्य था जिस कारण 360 गांव होने की बात जनश्रुतियों में थी। 

इसी तरह सर्विस क्लास जातियों के भी आंतरिक संगठन में 84 और 360 गांवो पर चौधरी होते थे। उदाहरण के लिए एक विशेष क्षेत्र में बढ़ई जाती के 360 गांव बोले जाते थे जिनपर उनका मुखिया होता था जिसे चौधरी कहते थे। इसका मतलब ये नही कि वो 360 गांव के मालिक होते थे। बल्कि 360 गांव में रहने वाले बढ़ई जाती के लोगो का मुखिया होता था। लेकिन 360 भी सांकेतिक होता था। गांव इससे कहीं ज्यादा या कम हो सकते थे। 

राजपूतो में उत्तर भारत में निम्नलिखित चौरासी थीं----

(ये संपूर्ण लिस्ट नही है और ना ही परफेक्ट है। कई जगह पहले कुछ और मान्यता रही होगी और अब कुछ और। जैसे बुलंदशहर के बाछलो पर पहले 55 गांव की जागीर होती थी जो अंग्रेजो के समय खत्म हो गई और उस वक्त जिन 12 गांवो में बसापत थी उनमे ही उनकी आबादी रही आई इसलिए अब बारहा गांव की खाप बोली जाती है)

गाजियाबाद-हापुड़ में तोमरो की चौरासी।

हापुड़ के गढ़मुक्तेश्वर में ही चौरासी का आधा ब्यालसी भी थी तोमरो की। 

बुलंदशहर के खुर्जा में भाल सोलंकीयो की चौरासी।

बुलंदशहर के ही जेवर में छोकरो की चौरासी। 

बुलंदशहर के ही अनूपशहर और संभल के नरौली क्षेत्र में बडगूजरो(राघव) की चौरासी।

पुराने जमाने में गुड़गांव और मुजफ्फरनगर क्षेत्र में भी बडगूजरो(राघवो) की चौरासी बोली जाती थी। अब गुड़गांव में चौबीसी बोली जाती है जबकि मुजफ्फरनगर वाली के मुसलमान बन जाने की बात बोली जाती है लेकिन असल मे बालियान जाट जो बडगूजरो की देखा देखी अपने को अब रघुवंशी बोलते हैं उन्ही के लिए पुराने  समय मे जनश्रुतियों में बडगूजरो की चौरासी होना बोला गया है।  
 
बुढ़ाना क्षेत्र में कछवाहों की चौरासी। हालांकि पुराने जमाने में इनकी यहां 360 होने का जिक्र होता था। जिसका मतलब इनका कभी बड़ा राज्य रहा हो सकता है।

सहारनपुर के काठा क्षेत्र को पहले चौरासी बोला जाता था।

लोनी में चौहानो की चौरासी थी। 

अलीगढ़ के चंडौस क्षेत्र में चौहानो की चौरासी।

अलीगढ़-हाथरस क्षेत्र में पुंडीरो की चौरासी है।

कासगंज के सोरों क्षेत्र मे सोलंकियों की चौरासी।

इसी क्षेत्र में गौरहार की चौरासी।

मथुरा में तरकर की चौरासी। 

बदायूं के बिलसी क्षेत्र में जंघारा तोमरो की चौरासी।

मैनपुरी के किरावली में राठोड़ो की चौरासी।

आंवला में चौहानो की चौरासी है।

मिर्जापुर के कांतित में गहरवारों की चौरासी थी। 

प्रयागराज के मेजा क्षेत्र में भी गहरवारों की चौरासी है। 

कानपुर के शिवली में चंदेलों की चौरासी है।

एमपी के जबलपुर के पास बनाफ़रो की चौरासी है।

उन्नाव में बिसेन राजपूतो की चौरासी होती थी। 

मैनपुरी के बेवर क्षेत्र में बैस राजपूतो की चौरासी बोली जाती थी। 

जौनपुर में चंदेलों की चौरासी होती थी। 

गोखपुर के उनौला के पास पालिवार राजपूतो की चौरासी है।

बलिया के दोआबा में बिसेनो की चौरासी है। 

गाजीपुर के गहमर क्षेत्र और उससे लगते बिहार में सिकरवारो की चौरासी। 

सिकरवारों की चौरासी थी। 

एमपी के मुरैना में सिकरवारों की चौरासी है। 

भोपाल के पास चौहानो की चौरासी है।

रीवा के रामपुर में बघेलों की चौरासी। 

सीधी में चौहानो और सेंगरो की चौरासी। 

सुल्तानपुर-जौनपुर क्षेत्र में राजकुमारों के क्षेत्र को चौरासी कोस में फैला बोलते हैं। 

इसी तरह 360 की अगर बात करें तो हरियाणा और पंजाब में बड़े राज्य रहे हैं इसलिए वहां कई 360 मिलती हैं। 

जैसे उत्तरी हरियाणा में चौहानो की 360। लेकिन वहां अब बसे हुए गांवो के आधार पर दो 84 बोलने का चलन ज्यादा है। 

उससे नीचे मडाडों की 360

मडाडों के नीचे परमारो की 360

सिरसा में भट्टियों की भी 360 होती थी। 

पंजाब में वराह और तावनी राजपूतो की भी 360 बोली जाती थी। 

उनसे आगे घोडेवाहा के 360 गांव का राज बोला जाता था।

लुधियाना और जालंधर के आसपास मंज राजपूतो की 360 होती थी। 

हाथरस आगरा क्षेत्र मे अब गहलोत की 84 है लेकिन पहले 360 बोली जाती थी जिससे संकेत मिलता है कि पहले यहां इनका बड़ा राज्य था। 

मुरादाबाद के कठेरिया रामपुर में अपने 360 गांव बोलते हैं हालांकि कठेरियो का राज इससे कई गुना बड़े इलाके पर था, मुरादाबाद से लेकर शाहजहांपुर तक। इनके राज्य के लिए 1440 की सांकेतिक संख्या भी कम है। 

कानपुर में जो चंदेलों की 84 है उसको पहले 360 बोलते थे। 

गोंडा क्षेत्र में बिसेनो का 360 रहा है। 

वाराणसी-गाजीपुर के कटेहर क्षेत्र के रघुवंशियो की खाप को 360 बोला जाता था। 

बलिया जिले के प्रसिद्ध लखनेसर के सेंगरो के राज्य को 360 गांव का ही बोला जाता था। 

इसके बाद अगर 1440 की बात करें तो पुंडीरो के अलावा भिवानी हिसार में जाटू तंवरो के 1440 गांव बोले जाते थे। 

मुरैना क्षेत्र में भी तोमरो की खाप को 1440 बोला जाता है। 

अवध का बैसवाड़ा भी 1440 गांव का माना जाता है। 

उन्नाव का दिखितवाड़ा, राय बरेली के कान्हपुरिया, सुलतानपुर के बछगोती, सर्यूपार के कलहंस, सूर्यवंशी, श्रीनेत, उत्तरी अवध के चंद्रवंशी बाछल, हरदोई के सोमवंशी, आजमगढ़- अम्बेडकरनगर के पालिवारो के राज्य भी 360 या 1440 गांव का बोले जाते थे। 

लेखक- पुष्पेन्द्र राणा

संदर्भ- विभिन्न colonial रिकार्ड्स

नोट- इसमे सिर्फ मेरी जानकारी की और पढ़ने में जो आई सिर्फ उन्ही खापो का जिक्र किया है। इस तरह की और खापो के बारे में जानकारी हो तो बताए। धीरे धीरे उन्हें भी जोड़ दिया जाएगा। जागीर/खाप इससे अलग संख्या में भी होती है। 12, 24, 60, 87 आदि गांव की भी खाप होती हैं और इन्हें भी शुभ संख्या माना जाता है लेकिन 84 को सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि इस संख्या का 7 और 12 दोनो से भाग होता है। ये भारतीय ज्योतिषशास्त्र का विषय है, में इसके डिटेल मे नही जाना चाहता। मेने 84 के बहाने से राजपूतो के सेटलेमेंट्स या उपनिवेशीकरण का पैटर्न समझाने की कोशिश की है क्योंकि में देखता था कि इस विषय मे लोगो को बहुत भ्रम हैं। (आज तक किसी academician ने भी इस विषय पर शोध नही किया और ना ही उन्हें ज्ञान) अगर फिर भी कोई डाउट हो तो पूछ सकते हैं। राजपूतो की बसापत सिर्फ इसी तरह होती थी ऐसा नही है लेकिन पुराने जमाने मे ये ही स्टैण्डर्ड प्रक्रिया थी।

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