सोमवार, 27 मई 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन भाग 5 लाखन संशोधित

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
       भाग-५ ब (संसोधित व विस्तृत)
            ★बागी लाखन सिंह★
एक छोटी सी घटना से रघुबीर सिंह और लाखन सिंह का परिवार एक दूसरे के आमने सामने आ गया। चम्बल में अहसास ही नहीं हो पाता की कब चीर का सांप बन जाए और कब भाई से मानस मरी हो जाए...!
एक छोटा सा मानसिक सन्तुलन और समझने में हुई चूक से कितने घरो में चिराग बुझे और कितने चिराग बीहड़ में दौड़े।अगर समय पर आपसी मनभेद भुलाकर चर्चा की जाती तो सम्भवतः रघुवीर सिंह और लाखन सिंह की मित्रता कभी शशत्रुता के गहन अन्धकार में कालकबलित नहीं होती किन्तु नियति और विधि पर किसी का प्रभाव् नहीं पड़ता ।

मानक सिंह उस दुश्मनी की कहानी का चश्मदीद थे। 90 साल की उम्र में भी मानक सिंह को वो पूरी कहानी फिल्म की रील की तरह से याद है क्योंकि मानक सिंह खुद लाखन सिंह का भतीजा है और गैंग में सालों तक दुश्मनों पर पुलिस पर गोलियां चला चुका है। सात हत्याओं के आरोपी मानक सिंह ने लाखन के कहने पर ही पुलिस के सामने समर्पण किया था।
नगरा गांव में दो ठाकुर परिवारों की दुश्मनी की कहानी शुरू हो चुकी थी। लाखन सिंह इलाके के एक गांव में डकैती डालकर चंबल का रास्ता तय कर लिया। इस वारदात में उसके भाई और दूसरे लोग तो गिरफ्तार हुए लेकिन लाखन फरार हो गया।
चंबल में सबसे पहले हर गोविंद और महाराज सिंह के गैंग में कुछ दिन रहे। उसके बाद उसने चरणा डकैत के गैंग में शामिल हुआ। लेकिन उसने वहां से भी जल्दी ही किनारा कर लिया। क्योंकि लाखन सिंह को किसी से आदेश लेना पसंद नहीं था। लाखन सिंह ने अपना गैंग बना लिया और उसमें परिवार के कई लोग शामिल हो गए।
लाखन ने बदला लेना शुरू कर दिया। और डकैती में उसकी मुखबिरी करने के शक में पांच लोगों को एक साथ लाईन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया। वारदात से चंबल में लाखन सिंह का नाम सुर्खियों में आ गया। इस मामले में लाखन सिंह का भाई फिरंगी सिंह पकड़ा गया। फिरंगी सिंह हाईकोर्ट में अपील पर बाहर आ गया। लेकिन इस दौरान गांव में रघुबीर सिंह का रूतबा काफी ऊंचा हो गया था और फिरंगी के बाहर आने पर रघुबीर सिंह ने एक बार फिर उसको पुलिस की मदद से अंदर करा दिया और आरोप लगाया धमकी देने और सताने का।  इस बात ने लाखन सिंह के जख्मों को फिर से हरा कर दिया। लाखन सिंह ने अपना बदला लेने का फैसला किया।
दो महीने बाद नगरा गांव के बाहर खेत में हवेली के दो लोगो तिलक सिंह और मथुरी सिंह की लाश  गोलियों से छलनी पड़ी पाई गई। इस घटना ने लाखन सिंह को पुलिस रिकॉर्ड में लाखन द टैरिबल का नाम  दिया। पुलिस अब लाखन सिंह का सफाया करना चाहती थी। हवेली ने भी लाखन के सफाएं में पुलिस की पूरे तौर पर मदद करना शुरू कर दिया। लेकिन लाखन ने इस कत्ल के बाद तो लूट, डकैती और कत्ल की एक पूरी नदी ही बहा दी। हर रोज कही न कही लाखन सिंह गैंग की वारदात की खबर पुलिस फाईलों में दर्ज होने लगी।  और पुलिस के साथ मुठभेड़ से लाखन सिंह नहीं डरता था। उसका हौंसला कितना बढ़ा हुआ था इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि 1952-53 के बीच लाखन और पुलिस के बीच 9 एनकाउंटर हुए। इन एनकाउंटर में लाखन के सिर्फ दो लोग ही पुलिस की गोलियों का शिकार बने वही इस दौरान लाखन ने 47 लोगो को अपना निशाना बनाया।
लाखन सिंह का कहर अब हवेली पर बढ़ता जा रहा था। हवेली के हर कोने पर गोलियों के निशान उसके खौंफ की कहानी बता रहे है। रघुवीर सिंह की पुस्तैनी हवेली में समय दर समय लाखन की रायफल से होते सुराख और नगरा में पुलिस का बढ़टी नफरी इस बात का प्रमाण दे रही थी की लाखन अपना बदला लेने के लिए हमेशा ताक में लगा रहता था। इसके अलावा लाखन इलाके में भी वारदात करने में जुटा रहता था। मार्च 1952 में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में ऊंटों के नाम पर अपनी किस्मत के सहारे बच निकले लाखन का शक एक बार फिर मुखबिरी के लिए रघुबीर सिंह पर ही गया।
गांव में दशहरे मनाया जा रहा था। लेकिन इसी बीच नगरा गांव के खेतों में हवेली वालों में से एक जबर सिंह को लाखन सिंह ने पकड़ लिया। लाखन सिंह ने जबर सिंह को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद गांव के बाहर से निकलते हुए ऐलान कर दिया कि वो हर दशहरे पर इस हवेली पर मौत बरसाएंगा।
मध्यप्रदेश पुलिस लाखन की दुश्मनी और कहर दोनों को जान चुकी थी। लिहाजा पुलिस ने लाखन को मारने के लिए एक प्लान बना दिया। प्लान था कि दशहरे पर लाखन फिर हवेली आएंगा और हवेली में रघुबीर का परिवार की सुरक्षा में पुलिस की पूरी बटालियन तैनात मिलेगी। 1954 में दशहरे के दिन लाखन ने फिर हवेली पर हमला किया लेकिन इस बार हवेली से निकली पुलिस की गोलियों ने उसके पैर उखाड़ दिए। लाखन को भागना पड़ा। ये लाखन के लिए एक हार थी। और हार का बदला लेना लाखन को अच्छी तरह से आता था।
दशहरे के दो दिन बाद पुलिस को सूचना मिली कि बीती रात आगरा के पास मानसिंह गैंग से पुलिस के बड़ी मुठभेड़ हुई है। और उस मुठभेड़ में मानसिंह गैंग के साथ लाखन सिंह का गैंग भी था। लिहाजा पुलिस को उम्मीद हुई कि मुठभेड़ से बच निकला गैंग अपने पुराने रास्ते से लौटेंगा। नगरा में थाना बना चुकी पुलिस को आदेश मिला कि वो आगरा वाले रास्ते पर कूच करे। पुलिस ने तेजी के साथ मूवमेंट की। नगरा थाना यानि हवेली से निकली पुलिस को गांव से निकले कुछ ही वक्त हुआ होगा। कि अचानक खेतों से लाखन का गैंग निकल आया।  और हवेली में कत्लेआम मचा दिया। 6 लोगो को मौत के घाट उतार कर लाखन सिंह वहां से निकल लिया।
पुलिस को इससे बड़ी हार शायद ही किसी डाकू के हाथ मिली हो। नगरा से सत्रह किलोमीटर दूर कस्बा पोरसा में मध्यप्रदेश पुलिस के डीआईजी ठहरे हुए थे। खबर पोरसा तक पहुंची तो सदमे में आई पुलिस फौरन नगरा पहुंची। लेकिन तब हवेली के अंदर सिर्फ रोने चीखने की चीत्कारें और हवेली के बाहर गोलियों के निशान बचे थे। लाखन अपना बदला लेकर निकल चुका था। लेकिन दुश्मनी कम नहीं थी। कहते है कि हवेली के लोगो की चिताओं के जलने से पहले ही रघुबीर सिंह के लोगो ने भी दूसरी तरफ लाशें बिछा दी।
अब इस दुश्मनी की कहानी चंबल के बीहड़ की हर डांग या भरकों में गूंज रही थी। पुलिस के मत्थे एक नाकामी का दाग बढ़ता जा रहा था। पुलिस चाहती थी कि किसी भी तरह इस दाग को साफ करने की कोशिश की जाएं..........
कृमशः
सलंग्न चित्र लाखन सिंह के भाई फिरंगी सिंह जी (जीवित अवस्था में )

                  जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

रविवार, 14 अप्रैल 2019

पूंजी स्नेह की

#पूंजी_स्नेह_की
हमारे गाँवों रिश्ते बड़े आत्मीय होते हे।यहाँ सिर्फ  माँ के लिये बेटा ही नहीं,भावियो के लिए भी देवरो की उम्र कभी नहीं बढ़ती हे ।

अभी कल ही तो में रोज की तरह पेड़ की छाँव में बैठा-बैठा सेलफोन में कुछ मनमाफिक पढ़ने का प्रयास कर रहा था और वही दशको से चिरपरिचित मधुर स्वरों ने आवाज दी ।
"ऐ लाला जरा इस सर्वत कलश को मातारानी के भवन तक लै चलो,आज तुम्हरे हाथ से नारियल भेंट कराएंगे!"

आदेश हुआ हो और में अवहेलना ये असम्भव हे!बस आगे-आगे चल दिया शर्बत लेकर...!
प्राय ऐसा होता हे की जब कोई वर्षो पुरानी स्मृति सहसा पुनः नयनो के समक्ष चलचित्रित होती हे तो मष्तिष्क आपकि वर्षो पुरानी स्मरणता को पुनः सजीव करता हे ।

"शर्वत काँधे पे और स्वाद जिव्हा पर" जेसे कहावत नहीं उस समय समयबिम्ब प्रतीत हो रही थी।कितनी ही बार इसी तरह बचपन में दादी माँ, माँ,बड़ी माँ,चाची जी,भावियो के पाँच रूपये शुल्क की सर्त पर शर्वत पीया करते थे।आज तो उम्र में 'अंगूर' हो गए जो कल तक हर एक नवरात्र में मात्र 'लँगूर' हुआ  करते ।

सम्भवतः इस जीवन के वह सबसे सुखद पल थे जब पांच रूपये की 'पोषकशुल्क' के लिए माँओ के माध्यम से माँ का वह स्नेह तरल भी हमे प्रशन्न और उत्सुक देखने के लिए बड़े दुलार से मिलता था ।
आज तो 'मीलो' भागते हे जिंदगी ताकि जिंदगी का 'मील' अनवरत चलता रहे और 500 देकर टेबलों पे आया  'कडुतरल' की मदहोसी में डूबकर मृदुता प्राप्त करने की उसी तरह अपेक्षा करते हे।जिस तरह कभी बचपन में 'अनारणी फल' को खरबूज की तरह मीठा होना की मृगमरीचका  हो !

विचारो और स्मृतियों के मध्य दोलनगति करता हुआ में कब माँ के दरवार पहुंचा,अहसास ही न होता अगर एक दूसरी भावी अपनी सदाबहार टोन.........
"ओ छिन..रु.. रसिया!मन्दिर तो आ गओ अब लुगाई की धुन में मस्त हो जो कछु न दिख रहो,कलस उतारो और पूजा करबाये में हाथ बटाओ!"

मेरी तन्द्रा खुली तो झेंपना स्वभाविक था क्योंकि इस तरह इन छोटी भावी को मुझे छेड़कर, तानामारने में बड़ा आनन्द आता हे ।

पूजा मध्य उन्ही छोटी भावी के द्वारा  हल्दी और मोली से कलाई का मण्डन किया और मुंह मुंह व्यंगात्मक मुस्कान के साथ "एक ही पटक में नारियल न फूटने पर आगरा  से फुस्स हो आये लाला का व्यंग्वांण भी छोड़ा गया ।
पूजा उपरान्त जब कन्या और लँगूरो को शर्बत पिलाया जा था तब एक बड़ा गिलास मेरी तरफ उन बढ़ते हुए बड़े हांथो में देखा जिन्होंने कितनी बार मुझे अपने हाथो खिलाया था ।
उन बड़ी भावी के आंखो मेंने अपने लिए एक अबोध जैसा स्नेह देखा और कानो से सूना की.....

"लाला माँ के बेटा और भावी के लिए देवर कभी बड़े नहीं होते है वो सदा भोले-भाले,अबोध 'लँगूर' ही होते हे!तुम आज भी मुझे वही 15 वर्ष छोटे बच्चे ही लगते हो जो पांच रूपये की सर्त पर माता मन्दिर पर मेरे हाथो से सरबत पीया करते थे ......!

इस भागदोड और आभासी होते शहरी रिश्तों में जहां देवर-भावी का रिश्ता मात्र सब्जीमण्डी से सब्जी का थैला पकड़ने और अपने पति की कमाई पर ऐशखोर के रूप परिभाषित हो रहे हों वही गाँव की भावियो के लिए उनके देवर गवरु जवान होकर भी बातसलयि बच्चे होना किसी स्वर्गिक सुख से कम नहीं ..!!

माँ के ईन नवरात्रो में माँ की एक अलग ही मूर्ति से साक्षात होने के लिये हे महादेव हम आपके आभारी हे ।
निश्चित ही प्रेम के रिश्ते भी जीवन की अशेष पूंजी हे,संजोते रहिये .....!
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन,भाग-४४

  ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                      भाग-४४
               ●अपने- अपने भाव ●
कहते हे की मिटटी,जल और उस क्षेत्र में उपजे अन्न का समान प्राणियो पर समान प्रभाव पड़ता हे किन्तु जब मष्तिष्क में चम्बल की उर्वरक खाद की जगह जातीयता की मवाद भरी हो तो दर्द,पीड़ा,खुन्नस,जलन,पूर्वाग्रह का नासूर फूटता हे उर्वरक खाद बालो के ऊपर ....!
कुछ ऐसा ही हुआ था जब मूर्खता में उच्च न्यायालय के आदेस को ठीक तरह समझे बिना आरक्षण कारियों ने 'भारत बन्द' का नाम लेकर भारत भर को 'सीरिया' के समतुल्य बना दिया था !

वह २अप्रैल उसी तरह खूबसूरत थी।व्यापारियो की दुकानों से उठते धुप की महक और मन्दिरो से आती घण्टी-घड़ियालों की मधुर ध्वनियां पृकृति को गुंजायमान कर रही थी।'वेरियल चोराहे' के उन ठेले बालो को किसी 'बन्द' से क्या लेना जिनके साँझ के चूल्हे दिन की 'उदर गुजारूं' से ही होते हे ।
'गन्ना सवील' के उस बुजुर्ग दम्पति को तो उसी सवील से अपने इकलौते पोत्र की शिक्षा शुल्क भी भरणी हे...!उस दिव्यांग जगताप को किसी की राजनीति और विरोध से क्या लेना जिसका जीवन का ताला ही तालो की कुचिया मिलाकर चल रहा हे।उस 'हम्माल' को किसी के आरक्षण से किसी की धारा से क्या मिलना जिसका जीवन तो ओरो के लिए अपनी कमर 'क्विंटलों' के बोझे से तोड़ने के लिए ही बनी थी ।
विद्यालयो में जाते नन्हे नोनिहाल गले में पेयजल और पीठ पर भविष्य का बोझ उठाये कोलाहल करते हुए निकले जा रहे की एकाएक .........!!
कुछ नीलवर्णो के उन्मादी शराव भभको के साथ झुंडों में 'जे बीम' उच्चारण करते हुए मुरैना को 'गदर का लाहोर' बना देते हे ।
गले में २५० ग्राम स्वर्ण लटकाये एक 'नील युवती' वृद्ध बुजुर्ग को भद्दी गालिया देती हुई सवील बाले बुजुर्ग का हॉकी से सर फाड़ देती हे और लकड़ी की गुल्लक सड़क पर 'टूटे अरमानो' कीतरह उदरस्थ आशा को चोराहे पर 'भारत' की तरह बिखेर देती ।

आषाढ़  से पूर्व चैत्र में होती व्यापारियो पर पत्थर और गालियो की उष्ण वर्षा,चेहरों से गिरता रक्त चम्बल की मिटटी को अचेत किया जा रहा हे।किन्तु उन्मादी,दवे-कुचले,सो कॉल्ड दलितों को कमाई लूटने में मजा जो आ रहा हे।पैदल भागती पुलिस स्वम का असितित्व बचाने को प्रयासरत दिख रही थी तो कमजोर बीमवादि युवक के हाथ किसी ऑटो सवार युवती की लज्जा राक्षसी अट्टहासो के साथ खिच रही थी ।
नोनिहालो से सवार रिकसो पर लाठी-डंडे,ईंट-पत्थर वारिस के बोसो की तरह अनवरत गिर रहे थे।शायद इन्ही अबोधो ने ही तो न इनकी धाराओ को मूत कर कमजोर किया था ..!

दवे-कुचले और कतिथ पिछड़े जीवो की इस सुनियोजित उपद्रवी 'बन्द' को क्या हम जातीय हमला नहीं कह सकते हे!इन्ही 'असहाय नीले मूर्खो' ने उस दिन ईंट,पत्थर,लाठी-डंडे छोड़िये आग्नेय अशत्रो से भी तीन युवको भून दिया था कारण बस इतना था की वह सवर्ण थे और उपद्रवियों अपने घर से दूर रहने की बोल रहे थे ।

उस दिन मेने प्रत्क्षय देखा नोनिहालो की 'वाटर बॉटल' और दूध की बॉटलस् सड़को पर पड़ी माँ के आँचल के लिए रो रही थी।सेकड़ो मंगलसूत्र और जंजीरो को तोड़ा गया।यहां तक की नीली युवती ने एक बुजुर्ग महिला को उसकी पहिचान से पुकारा था जो उसका 'आभूषण' भी थी।किन्तु शराब के भभके में धुत्त सेकड़ो युवतियां जेसे 'नारी' का नारीत्व बखान करके जेसे खुद को बुलन्द कर रही थी ।

जब तक जिला प्रशाशन और पुलिस अमला नियंत्रण करता हजारो हड्डिया चटक चुकी थी।दुधमुहे मुखो से दूध छीन चुका था ....!'गतिमान एक्सप्रेस' में भारी लूट हो चुकी थी.....रेलवे स्टेशन क्षत-विक्षत हो चुका था......महिला,बच्चे,पुरुष,बुजुर्ग 6 घण्टो तक बिन अन्न-जल ट्रेन में कैद हो चुके थे और कैद करने बाले वही नीले युवक युवतियां थे,जिन्हें जातीय बन्द को हिंसा और लूटकर प्रासंगिक किया था ।

जब उत्पात और लूट की अति हो गयी तो आखिर में   कुछ नवयुवको के समूहों ने इन 'नीलचारियो' खदेड़ा और 'मुरैना रेलवे स्टेशन पर मातृत्व से भरी माँओ ने नोनिहालो के लिए अपने आँचल का दूध और  पूरी ट्रेन के लिए सुस्वादु खाना बनाया ।
उस दिन गतिमान एक्सप्रेस का हर यात्री आँखों खारा जल लिए एक बात बोल रहा था की अपने-अपने भाव हे ।
"मुरैना में जीवन की आस छोड़ चुके थे जब इन उत्पातियों ने हमे लूटा था ।किन्तु इस निस्वार्थ और निःशुल्क सेवा को हम लूटकर जा रहे जीवन पर्यन्त न भूलेंगे ...."

एक यात्री नवयुवती कह रही थी .....
"भैया हमें जो लूटकर गए उनका भाव क्या था और जो हमे लूटा रहे हे उनका भाव क्या हे .....!"
"अपने-अपने भाव हे कोई लूटकर लूटता हे तो लूटाकर 'लूटता' हे!"

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

बुधवार, 27 मार्च 2019

अमर शहीद गाथा

===महावीर जसवन्त सिंह रावत===
         ★गाथा एक महावीर की★

बचपन से सुनते आया हूँ की आत्माये अमर होती हे मरता तो मात्र शरीर हे।पंचमहाभूतो से निर्मित यह शरीर क्या नष्ट होकर भी अपनी गतिविधियों के सजीव माध्यम से देश के प्रति अपनी कर्तव्यता नहीं भूलता !
हा यह कोई दन्तकथा नहीं बल्कि सत्यकहानी हे जिनके कर्मस्थल को 'गढ़' के रूप जाना जाता हे और मृत्यु उपरान्त भी एक 'भारत माँ का लाल' निरतंर सीमाओ पर सजग प्रहरी बन आज भी रायफल उठाये 'सिपाही' से 'मेजर जनरल' तक पदोन्नति पाता हे ..!
विस्मय मत करिये यह किस्सा हे भारत की दूर सीमाओ पर तैनात "जसवंत गढ़" के अमर शाशक मेजर-जनरल(वर्तमान) बाबा जसवंत सिंह रावत जी और उनकी प्रेमिकाएं "शैला-नूरा" का जिन्होंने हजारो-हजार चीनियो को अपनी बुद्धि,बाहुवल और चातुर्य के बलबूते लगातार 3 दिन-रात (72घण्टे) तिल भर बढ़ना छोड़िये मार-मार के लाशो के ढेर में परिवर्तित कर रखा था ....!

पिता गुमानसिंह की देखरेख और माँ लीलादेवी की पावन कोख से 19 अगस्त 1941 ग्राम बाड्यू, पट्टी-खाडली,ब्लाक बीरोंखाल को अवतरित हुए थे।17 वर्ष की अल्पायु से सैना को समर्पित जसवंत जी अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे।उनके चातुर्य और कोशल की बजह वह सहपाठियों से खेलते हुए भी कभी न हारते ते थे यंहा तक की अकेले दम पर पूरी चीनी आर्टिलरी को तहस-नहस करने बाले वह प्रथम गैरराजपत्रित सैनिक भी थे ।

किस्सा उन दिनों का जब जबाहर लाल नेहरू विश्वशांति के पक्षधर बने घूम रहे थे।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा में मिली स्थायी सदस्यता को 'गुडविल अ ब्रदर' दिखाने के लिए चाइना को बतोर 'गिफ्ट' कर दिया गया और वर्तमान 'जुमलों' की तरह  जुमला हुआ  निकला था "हिन्दी-चीनी,भाई-भाई!"
इसी जुमले को क्रियांवत दिखाने के लिए भारत की उन तमाम आयुद्धशालाओ को 'कप-प्लेट' निर्माण की इकाइयों में बदल दिया गया।शायद मुर्ख नेतृत्व और सत्ताधीशो की मति घास चरने चली गयी थी जेसे आजकल आरक्षण को वोट केलिए 'अंग्रेजो का तम्बू' बनाया जा रहा हे।यह भारत का दुर्भाग्य हे की सत्ता में आते भत्ता के लिए #लेते देश की नीव को खाली करने पर आमादा हे ।
उस समय के मुर्ख गृहमंत्री VK.मेनन पाकिस्तान से समझोता कर ही चुके थे और नेहरू गुडविल क्रियान्वन के इश्क में 'हिन्दी-चीनी,भाई..."! का जुमला आविष्कार कर ही चुके उनको लगा की भारत चहुओर से सुरक्षित हे,हथियारो पर फौज पर खर्च करना मूर्खता हे।ये गैरजरूरी खर्च कम क्या खत्म होना चाहिए।फलतः अरुणाचल से फौज की 'नफरिया' हटा ली गयी हजारो मील भारतमाँ का आँचल माँ के लालो से छीन लिया गया और दुश्मन को आमन्त्रित करती नीतियों के कारण चीन की तरफ से भारतीय सीमाओ को 'चीनी ड्रेगन' निगलने लगा और मुर्ख सत्ताधीस कप्प्लेट निर्माण में मगन हो गए ..!
उस समय चीनी सैना ने बहुत तवाही मचा राखी थी क्यों की भारतीय सैना विहीन सीमाये चीनियो के लिए खुला आमन्त्रण था और वह आये अरुणाचल में बुद्ध मूर्ति के हाथ काट ले गए ..!
जब हालात बेकाबू हो गए तो गढ़वाल रायफल की चौथी बटालियन को तैनात किया गया।इसी बटालियन के महावीर थे जसवंत सिंह रावत....!
तत्कालीन रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री की मूर्खताओं के कारण इस बटालियन पर न हथियार थे न उचित रसद!यहां तक की कारतूसों की भी कमी थी।जिसके कारण चीनी हर मोर्चे पर हावी होते आ रहे थे और भारतीय फौजे न हार रही थी,हार तो दुस्ट राजनेतिक हस्तक्षेपो की रही थी।
17 नबम्बर 1962 को चीन की तरह से अरुणाचल की नूरानांग पोस्ट पर चौथा और बड़ा हमला किया गया।रसद और असहले विहीन हो चुकी फौजो को हार मानते हुए पीछे हटने के आदेश दिए गए किन्तु जिन्हें लड़ना होता हे वह सहज नहीं हारते वाक्य को चरितार्थ करते हुए पोस्ट से हते जसवंत जी और उनके दो साथी ...1 लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी,2रायफलमैन गोपाल सिंह गुसाई ..!
इनमे एक अदृश्य महिला शक्ति भी साथ थी।
शैला और नूरा नामक दो वीरांगनाएँ जो प्रेम के साथ समर्पित थी प्रेमी के लिए,मातृभूमि के लिए। चहुओर से गोलिया और भारी आर्टिलरी सेलिंग के बीच इस छोटी सी बटालियन की रसद और बारूद खत्म होने लगी क्योंकि उनके पास कोई अर्जुन का अक्षय तुरीण थोड़े था जो देवकृपा से भरता रहता और नेगी  और वैरागी जी को रसद के लिए बेस पर भेजा गया ..!

अब कठिन मोर्चे  पर हजारो चीनियो के समक्ष थे चीनियो के हिसाब से तीन हजार जबकि सत्यता में जसवंत,शैला,नूरा की त्रिगुणात्मक अद्भुत फौज जो लगातार  65 घण्टो से चीनियो के चने भून रही थी।यह तीन वीरो फौज विभिन्न मोर्चे व उपलब्ध हथियारों के बल पे किसी रेजिमेंट की तरह लड़ रही।चीनि स्तब्ध थे की यह कोनसी बटालियन आ गयी जो हम हजारो को हरा रही हे किन्तु वह शाम भारत के लिए अशुभ थी जब खाना लेके आती नूरा को चीनियो ने छिप के पकड़ लिया और नूरा उनके अत्याचारो को कैसे सह पाती जो की आम नागरिक थी एक नारी थी ..!
चीनियो को आश्चर्य हुआ जब ज्ञात हुआ की पिछले कई दिनों से वह किसी ब्रिगेड से नहीं बल्कि दो लड़की और एक जवान से परास्त हो रहे थे।नूरा को जानकारी उपरान्त वीरगति प्राप्त हुई और उधर शैला-जसवंत की रसद समाप्ति की और थी....बिकट स्तिथि में बची गोलियों से लड़ते हुए शैला भी प्रेम में प्रगति करती हुई वीरगति को प्राप्त हो गयी ..!
अंतिम गोली से महावीर जसवंत सिंह भी जीवित किसी दुश्मन के हाथ आये बगैर परमगति को प्राप्त हो गए ।
अंततः चीनी आये और अतिछुब्धता में महावीर का शीश काट ले गए ....!

जसवंत जी वीरता का प्रमाण तो स्वम चीनी सैना हे जो युद्ध समाप्ति उपरान्त राष्ट्रीय सैनिक सम्मान के साथ महाबीर जसवंत जी की कांसे की बनी हुई मूर्ति कंधो पर लाये थे ।
आज जसवंत की याद में उस पोस्ट पर 'जसवन्तगढ मन्दिर' नूरानांग घाटी और शैला मन्दिर उनके सम्मान में बने हुए हे ।

भारतीय सैना अनुसार वह आज भी जीवित हे और मुस्तैदी से ड्यूटी भी दे रहे।नित्य उनके बूट पोलिस,बिस्तर गिलाफ,वर्दी आदि को धोया जाता हे और उनके घर उनकी सैलरी,छुट्टी परमोसन इत्यादि दिया जाता हे ।
वह छुट्टी जाते हे तो उनकी सीट बुक होती हे एक दस्ता उनको सैनिक सम्मान के साथ विदा और लेने भी जाता हे ।
उस पोस्ट पर तैनात सैनिको के अनुसार जसवंत बाबा भी दिखाई देते हे और किसी भी चीनी गतिबिधि की सुचना भी देते हे ......
नमन भारत के महावीरों को जो मर के भी अमर हो गए और पंचभूतों में सशरीर न होते हुए भी निरन्तर कर्तव्य पथ पर अडिग हे !
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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

Miss you papa ji

★पिताजी आप बहुत याद आओगे★
‌         ___🙏🚩🙏___

बो कल-परसो से बार-बार कलाई घड़ी देख मुस्कुराते हुये मुझसे प्रश्न कर रहे थे "बेटा आज दिनांक क्या हुई और तिथि क्या हे?" अपरान्ह 12 और रात्रि 9 जेसे उन्होंने तय कर रखे थे,मुझसे प्रश्न करने को!उनका इतना शानिध्य,स्नेह,बात्सल्य ,पोषण,शिष्यत्व,मार्गदर्शन प्राप्त करके भी में अंजान रहा इस रहश्य पूर्ण प्रश्न से !
वर्षो से देखता आया हूँ कि प्रत्येक होली पर वह सबसे पहले धूल,राख ही मलते थे अपने चेहरे पर !
एक बार मेने यूँही कोतूहलवस पूछ लिया था की 'पापा जी आप अगर क्षमा करे तो एक बात पूंछू !'
जल में मिटटी का छोटा सा कण डालने पर जो वर्त्ताकार तरंग बनती हे ठीक उसी की तरह उनके चेहरे पर एक मनमोहक और आकर्षक मुस्कुराहट प्रकट हुई और कहने " जीतू तुम प्रश्न करने से पहले भर्मित क्यों रहते हो?आखिर तुम्हारे प्रश्न ही तो हे जो मुझे कुछ न कुछ स्मरण दिलाते रहते हे और तुम्हारी इन जिज्ञासाओं में मुझे मेरा अतीत चित्रपट की तरह सजीव दिखता हे।सदैव निः संकोच होकर पूछा करो !"

देखो ! वर्षांत और पुनर्सृजन की बैला होती हे होली,यहां हमे अपने जन्म अर्थात मिटटी से जुड़ने और 'ख़ाक' मिलने को कदापि विस्मरण नहीं करना चाहिए।इस कारणवर्ष में प्रतिवर्ष मिटटी और राख दोनों ललाट पर लगाकर अपनी जीवन और मृत्यु दोनों नमन करता हूँ ।"
उनके एक-एक शब्द का गुढ़ अर्थ हे,एक-एक कार्य में न जाने कितने भाव निहित जिन्हें में इतना सामीप्य प्राप्त करके भी न समझ पाया,सम्भवतः में जुगनू उन भास्कर की दिव्य रश्मियों के कैसे समझता जो मात्र उनका अंश हूँ और वह परिपूर्ण तेजपुंज थे ।
जब काफी छोटा था शायद वर्षो में वय होगी कोई 6-7 वर्ष....!उन्हें न जाने क्या हुआ की वर्षो से छूटी 'हल की मुठ' पुनः याद आ गयी।'जरार पशु मेले' को किसी बगैर तैयारी के निकल गए और उधर वो अकेले नहीं दो खूबसूरत बैलो की जोड़ी साथ लाये।एक तकनीकी अभियन्ता की शायद वह प्रथम प्रौन्नति होगी जब 'कलिसाज'  आधुनिक और तीव्र कृषक से मन्थर गतिक कृषि को प्राथमिकता दिया होगा और उनकी देखा-देखि हमारे लगभग बैल रहित हो चुके साढ़े पांच सहस्त्रीय बीघे से ज्यादा भूमिबाले 'ठिकाने' में पुनः लगभग दशको बाद 'बैलो की घुँघरूओ' की मधुर ध्वनि गुंजार कर उठी थी ।

पिताजी में एक बिलक्षण गुण था।वह इस इस दुनिया में अपनी अलग ही सम्बोधन संज्ञाएँ रखा करते थे।यहां तक की बैलो को भी उन्होनो नाम दिया था......भोली-गोपी..!!
मेने देखा हे उनकी एक पुकार पर "भोली-गोपी" को हल लेकर भागते हुए!मेने देखा उनके हाथो में बेलो के लिए कभी भी 'पैना"(चाबुक) न ले जाते हुए!मेने देखा उनको खाना खाने से पूर्व "भोली-गोपी" को अपने खाने का चौथाई भाग खिलाते हुये!मेने देखा उन्हें मूक पशुओ से बाते करते हुये पशुओ की मूक भावनाओ को समझते हुये !

उनकी गली-मोहल्ले के सभी आवारा कुत्तो से गजब की दोस्ती थी।वह जब भी यात्राओ से लोट कर आते तो कुत्तो का झुण्ड जेसे उन्हें देख पूँछ हिलाकर,जमीन पर लोट कर उनका अभिनन्दन किया करते थे !
एक बार मेने उनसे पूछा था 'पापा आप इन पशुओ को कैसे नियंत्रित कर लिया करते हे,इनसे इतना प्रेम आपको क्यों हे ?
ऐसे जिज्ञासाएँ रखकर मुझे,मेरे आदर्श-गुरु का मन्द-मन्द मुस्कुराना न जाने क्यों किसी दूसरी दुनिया में ले जाता था,में आजतक समझ ही नहीं पाया हूँ ।
मेरी जिज्ञासा पर उनका संछिप्त किन्तु अथाह उत्तर था,"ईश्वर अंश जीव अविनासी !"........
बेटा मुझे इनकी तृप्ति और प्रेम ऐश्वर्य प्रेम दिखता हे जो पशु आप सभी के लिये पाशविक हे वही मेरे ऐश्वरीक हे जो मुझे ठीक तुम्हारी तरह ही स्नेह करते हे !
‌जिंदगी का मेरा पहला अनुभव था जब मेने पिता पुत्र,पति-पत्नी,भाई-बहिन, माता-पुत्र में निहित स्नेह से अलग हटकर 'प्रेम' को साक्षात देखा था !
‌इतने बड़े और 'चम्बल के तामसिक जल' से अभिसिंचित इस गाँव में उनके सभी प्रेमी हे।गोधूलि बैला के समय उनके अंतिम दर्शनार्थ गाँव भर का हुजूम और हर एक गांवबाले की नम होती आँखे उनकी असंभावित विदाई सबको विस्मय में डाले हुए थी।जो आता एक ही बात कहता कि 'अभी प्रातः ही उन्होंने उसे झाड़ा था एक गलती पर !"
‌रेडियो बीबीसी और मोटी-मोटी किताबो में उनको प्रहरों तक देखा था मेने खोये हुए।आधुनिक संचार और गणक यंत्रो पर वह कभी विशवास नहीं रखते थे किन्तु मशीने जेसे उनकी उँगलियों के इशारो पर नृत्य कर उठती थी।चम्बल की ऐतिहासिक भूमि के कण-कण की उनकी जानकारी थी....उन्होंने ही तो मुझे मेग्नीफाइड के ग्लास के माध्यम से इस रज में निहित राधा-मोहन स्वरूप श्याम और गौर वर्ण 'रजकण'से परिचित कराया था !
में विस्मय में हूँ लगातार साडे तीन वर्षो से केन्सर को पराजित प्रमाण करने बाले आप ‌दिनाक 17/03/2019 शायं 4:30 को आप "ॐ नमो भगवते....." जपते हुए सारे ठिकाने को शोक का अटिसञ्छिप्त समय देकरO इस माया लोक से उस दिव्यलोक की यात्रा को कैसे निकल गए ....!
‌आपके शिष्यत्व...मार्गदर्शन का में सदैव ऋणी रहूँगा पापा जी ....
‌आपके पदपंकजो की धूल....
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‌             जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...