सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

एक सैनिक प्रेम और आत्मवलिदान

वो समय जब, बुरहान वाणी की मौत के बाद से कश्मीर में लगातार 4 महीने से ज्यादा प्रोटेस्ट चले। लेकिन कुछ साल पहले भी एक ऐसा प्रोटेस्ट हुआ था। भारतीय सेना के एक जवान पर एक लड़की के रे’प और एक नागरिक की ह’त्या का आरोप लगा था। रणजीत सिंह एक सिख नौजवान थे, पंजाब के एक छोटे से गांव के। मात्र 17 साल की उम्र में सन 2000 में वो भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे। वो एक बेहतरीन खिलाडी थे और बास्केट बाल में स्पेशलिस्ट थे। दो साल की सेवा के बाद वो गनर के तौर पर टैंक पर चलने के लिए अपॉइंट कर दिए गए। कुछ ही दिनों में उनकी नियुक्ति राष्ट्रीय राइफल्स में हो गयी। राष्ट्रीय राइफल्स सेना का एक खास अंग है जो 1990 के बाद कश्मीर में इंसर्जेंसी से निपटने के लिए गठित हुआ था। इसमें 50% इन्फेंट्री से और बाकी 50% सेना के बाकी अंग से लिए जाते हैं। चूँकि रणजीत सिंह इन्फेंट्री से नहीं थे तो कश्मीर भेजे जाने से पहले उन्हें ट्रेनिंग के लिए कोर्प्स बैटल स्कूल भेजा गया। इस स्कूल में एक समय में 3 से 4 हजार तक सिपाही ट्रेनिंग लेते हैं और ये ट्रेनिंग चार हफ़्तों की होती है।
रणजीत सिंह इस ट्रेनिंग में बेस्ट स्टूडेंट जज किये गए थे। एक बेहद रिगरस और टफ ट्रेनिंग के बाद रणजीत सिंह ने कश्मीर में अपनी यूनिट के कंपनी ऑपरेटिंग बेस को ज्वाइन किया। उन्हें उम्मीद थी की अब उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यहाँ शेड्यूल उस ट्रेनिंग से भी ज्यादा सख्त था। इस यूनिट में 60 – 70 जवान अमूनन होते हैं, जिसमें एक तिहाई एडमिनिस्ट्रेशन और सिक्योरिटी में, एक तिहाई पेट्रोलिंग और ऑपरेशन में और बाकी के एक तिहाई रेस्ट और ट्रेनिंग में होते हैं। किसी बड़े ऑपरेशन या इमरजेंसी के दौरान सभी सिपाही फील्ड में होते हैं और उस समय बिना किसी रेस्ट के 24 से 72 घंटे तक की ड्यूटी होती है। औसतन एक सिपाही को सिर्फ 5 से 6 घंटे सोने के मिलते हैं वो भी कभी कभी किस्तो में।
ऐसे माहौल में करीब 6 महीने तक रणजीत सिंह ने काम किया और छोटे बड़े ऑपरेशंस में हिस्सा लिया जिसमें 7 टेररिस्ट मारे गए। ऐसी यूनिट का एक खास काम लोकल लोगों से मिलकर इंटेलिजेंस इकठ्ठा करना भी होता है। रणजीत सिंह को भी ये जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वो लोगों से संपर्क बनाकर सूचनाएं इकट्ठी करें। सामान्यतः सैनिक मेडिकल टीम के साथ गांव जाते हैं, अपने संपर्क सूत्रों से मिलते हैं और सूचनाएं इकट्ठी करते हैं। रणजीत सिंह ने भी मेडिकल टीम और सद्भावना प्रोजेक्ट की टीमों के साथ गांव-गांव जाना शुरू किया और लोगों से संपर्क बनाने शुरू किये। रणजीत जी ने अपने कई सोर्स डेवलप किये जिनकी सूचना के आधार पर सेना ने कई सक्सेसफुल ऑपरेशंस को अंजाम दिया।
और ऐसे में एक दिन रणजीत की मुलाकात एक सोर्स की छोटी बहन से हुई। लव एट फर्स्ट साइट। दोनों तरफ से। पहली मुलाकात जैसे शर्माते सकुचाते हुई थी। लेकिन जल्द ही दोनों मिलने के बहाने खोजने लगे। एक आकर्षक सिख नौजवान, एक सुन्दर कश्मीरी लड़की। जैसे आसमान से उतरी जोड़ी हो। परियों की कहानियों के जैसे। एक तरफ सेना का डिसिप्लिन था , दूसरी तरफ अलग अलग धर्म, संस्कृति थी। समाज के पहरे थे। और पार्श्व में चलता यु’द्ध था।
लेकिन दिल की पुकार कौन ठुकरा सका है। दोनों एक दूसरे के गहरे प्यार में थे। मुलाकाते पब्लिक व्यू में ही संभव होती थीं और बहुत कम ही हो पाती थीं। लड़की कॉलेज जाती थी। इसलिए दोनों का आपसी प्यार मोबाईल के सहारे परवान चढ़ रहा था। घंटों फोन पर दोनों बातें करते। और इन बातों के लिए रणजीत को अक्सर अपनी 5 घंटे की नींद भी खोनी पड़ती थी। लेकिन इश्क में पगलाए रणजीत को इसकी परवाह नहीं थी।
इस बार रणजीत जब छुट्टियों से वापस आया तो अपनी महबूबा के लिए अंगूठी भी लाया था। एक मेडिकल कैम्प में उसने वो अंगूठी अपनी प्रेयसी को दी। रणजीत सिंह का दो साल का टेन्योर पूरा हो रहा था। लेकिन रणजीत ने वालंटीरियलि अपना टेन्योर 6 महीने और बढ़वा लिया। लेकिन जल्द ही ये 6 महीने भी पूरे होने लगे। रणजीत सिंह की दूसरी पोस्टिंग आ गयी। उसे कश्मीर छोड़कर जाना था। उसने अपनी महबूबा को मिलने के लिए बुलाया।
एक दिन बाद ही उसे नयी पोस्टिंग पर जाना था, इसलिए यूनिट में आज उसे कोई ड्यूटी नहीं दी गयी थी। ताकि वो अपनी पैकिंग कर सके। वो कैम्प छोड़कर बाहर नहीं जा सकता था। रणजीत ने देखा की एक पैट्रोलिंग टीम पैदल निकल रही थी। वो बिना किसी अधिकारी को बताये उस टीम के सबसे पीछे लगकर कैम्प से निकल गया। जब गांव पास आया तो वो अपनी टीम से अलग हो गया और एक उजाड़ मकान के पास पहुंचा। रणजीत सेना की पोशाक में था अपने सभी हथियारों के साथ। इसी मकान में उसने अपनी प्रेयसी को बुलाया था। रणजीत जानता था वो कितना बड़ा रिस्क ले रहा है, लेकिन प्यार के आगे फिर कौन सोचता है।
मुलाकात मुख़्तसर सी थी। रणजीत ने अपनी प्रेयसी से वादा किया कि वो जल्द ही वापस आएगा और शादी करके उसे अपने गांव ले जायेगा। दोनों ने साथ रहने की कसमे खायी और फिर मिलने का वादा करके उस घर से निकले। लेकिन जैसे ही वो घर से बाहर आये। उन्होंने देखा एक भीड़ बाहर खड़ी थी। क्रोध में भरी भीड़। लोगों ने रणजीत को घेर लिया और उसे धक्का देने लगे, मा’रने पर उतारू हो गए। वो चिल्ला रहे थे कि रणजीत ने उस लड़की के साथ बला’त्कार किया है। रणजीत ने उस भीड़ को समझाने की कोशिश की। उस लड़की ने भी भीड़ से कहा , लेकिन वहां सुनने वाला कोई न था। भीड़ गुस्से से पागल हो रही थी और रणजीत की जान लेने पर उतारू थी। रणजीत ने अपनी गन हाथ में लेकर उन्हें चेतावनी दी।
इस चेतावनी को सुनते ही एक आदमी ने हाथ में कु’ल्हाड़ी लिए उस पर हमला किया। और कोई चारा न देखकर रणजीत ने फा’यर किया। गो’ली सीधी उस आदमी को लगी और वो वहीँ गिरकर ढेर हो गया। भीड़ तत्काल छंटी और रणजीत वहां से निकल गया। लेकिन मुश्किल से वो 50 गज दूर ही जा पाया था कि विपरीत दिशा से आती एक बड़ी भीड़ ने फिर उसे घेर लिया। रणजीत सड़क के बीच में सैकड़ो लोगों की भीड़ के बीच अकेला खड़ा था। भीड़ उस पर प’त्थर फ़ेंक रही थी। भीड़ रणजीत की जान लेने पर आमादा हो चुकी थी रणजीत के लिए संकट की घडी थी। उसके पास गन थी, ग्रेनेड थे। वो उस भीड़ पर ग्रेनेड फ़ेंक कर निकल सकता था। फा’यर कर सकता था। लेकिन तय था की कई लोग मा’रे जाते।
शायद उस पर एक जान पहले ही ले लेने का अपराध बोध हावी हो रहा था। रणजीत ने भीड़ से परे अपनी निगाह फिराई। उसे अपनी प्रेमिका दिखी। लोगों की जकड में तड़फड़ाती हुई। दोनों की नजरें मिली। लड़की की आँखें आंसुओ से भरी थीं। रणजीत ने अपनी गन उठाई और उसकी नाल अपने मस्तक से सटा दी। एक गो’ली चली। आग की तरह ये खबर कश्मीर में फ़ैल रही थी कि एक सेना के जवान ने एक लड़की के साथ रे’प किया और एक नागरिक को मा’र दिया। सेना के लिए ये बड़े अपमान की बात थी। तुरंत एक्शन लेते हुए पुलिस ने कार्यवाही शुरू की।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत। जिसने आत्म ह’त्या कर ली थी। कहते हैं आत्म’हत्या कायरता का सबूत होती है। आत्मह’त्या कायर करते हैं। लेकिन सैन्य अधिकारी जानते थे कि रणजीत ने अपनी शहादत क्यों दी थी। सेना ने रणजीत को ‘किल्ड इन एक्शन’ माना, जिसने कई लोगों की जान लेने की जगह अपनी जान देकर सेना के शौर्य को बनाये रखा। सेना ने रणजीत सिंह को उचित सम्मान दिया। मैंने जब ये कहानी पढ़ी, बार-बार पढ़ी, हर बार मेरी आँखें भर आयी। मैं सलाम करता हूँ इस बहादुरी को। रणजीत सिंह को। भारतीय सेना को। ऐसा अद्भुत पराक्रम एक भारतीय सैनिक ही कर सकता है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो दफ़न हो कर रह गयी।
मैं आभार प्रकट करता हूँ लेफ्टिनेंट जनरल H.S. Panag जी का जिन्होंने ये कहानी लिखी। और पनाग साहब वही थे, जिन्होंने कोर्प्स बैटल स्कूल में रणजीत सिंह को बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड दिया था। और आभार कर्नल अभिषेक वाजपेयी जी का जिनकी वॉल पर मैंने इस कहानी को पढ़ा। रणजीत सिंह का नाम हमेशा अमर रहेगा। नाज है हमें रणजीत पर और गर्व है भारतीय सेना पर।
जय हिन्द.....जय हिन्द की सैना !!
-----------
जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

कुकुर मूत्र विसर्जन

#विचित्र_तथ्य_कुकुर_विसर्जन_लेताजी
हम सभी ने कुत्तों को कभी न कभी बिजली के खंभे या गाडियो के टायर को गीला करते तो देखा ही होगा, लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि आखिर कुत्ते पेशाब करने के लिए इन दो जगहों को ही ज्यादा क्यों पसंद करते हैं?
हम सभी जानते हैं कि कुत्ता इंसानों के प्रति सबसे ज्यादा वफादार प्राणी है, इसके अलावा अन्य जानवरों की तुलना में कुत्ता थोड़ा ज्यादा सामाजिक भी होता है।
कार ,बाइक के टायर और बिजली के खंभों पर पेशाब करने के पीछे भी दरअसल एक सामाजिक कारण ही जिम्मेदार होता है। ऐसी जगहों पर पेशाब करके कुत्ते दूसरे कुत्तों के लिए अपनी गंधछोड़ जाते हैं।
आमतौर पर कुत्ते पेशाब करने के लिए ऐसी जगहको तरजीह देते हैं, जो सीधा खड़ा हो। इससे उनका निशाना सटीक बैठता है और खुल कर हलके हो लेते हैं। इतना ही नहीं, अपने इस अनोखी क्रिया से वो दूसरे कुत्तों के लिए नाक की ऊंचाई पर ही अपने पेशाब की गंध छोड़ जाते हैं।पेशाब की गंध क्षितिज सतह से ज़्यादा देर तकवर्टिकल सतह पर मौजूद रहती है।
उनकी इस आदतसे वो दूसरे कुत्तों को अपने क्षेत्र से परिचित कराते हैं। इसका मतलब ये भी होता हैकि वो दूसरे कुत्तों को संभवत: अपने इलाके की जानकारी देते हो।

ठीक इसी तरह लेताजी भी अपना अपना विशेष एजेंडा रखते हे ,चुनावी मौषम के लिए की फला हिंदुत्व की राजनीती करेगा ।
फला मूलनिवासियो के हिट करने का दायित्व संभालेगा ।
कुछ दल तो सत्ता सुख पाने के लिए एक विशेष वर्ग के नाज नखरे वाले प्राणियो को अल्प वस्तरीय  फूहड़ नृत्य और मादकता के सहारे जनता रूपी वोटबैंक को पाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हे ।

जो नेता सिर्फ सत्ता के लिए देश रूपी मर्यादा के की धुरी पर खुले आम मूत्र विसर्जन कर जाते  बो ही देशभक्ति ,विकास का बड़ा ढोल पीटते नजर आते हे ।

समझदारी इसी में हे की ये देख कर चुने कही लेताजी धुरी पर टांग उठाते कुकुर न निकल जाए ।

एक सैनिक और कश्मीरी लड़की का प्रेम

वो समय जब, बुरहान वाणी की मौत के बाद से कश्मीर में लगातार 4 महीने से ज्यादा प्रोटेस्ट चले। लेकिन कुछ साल पहले भी एक ऐसा प्रोटेस्ट हुआ था। भारतीय सेना के एक जवान पर एक लड़की के रे’प और एक नागरिक की ह’त्या का आरोप लगा था। रणजीत सिंह एक सिख नौजवान थे, पंजाब के एक छोटे से गांव के। मात्र 17 साल की उम्र में सन 2000 में वो भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे। वो एक बेहतरीन खिलाडी थे और बास्केट बाल में स्पेशलिस्ट थे। दो साल की सेवा के बाद वो गनर के तौर पर टैंक पर चलने के लिए अपॉइंट कर दिए गए। कुछ ही दिनों में उनकी नियुक्ति राष्ट्रीय राइफल्स में हो गयी। राष्ट्रीय राइफल्स सेना का एक खास अंग है जो 1990 के बाद कश्मीर में इंसर्जेंसी से निपटने के लिए गठित हुआ था। इसमें 50% इन्फेंट्री से और बाकी 50% सेना के बाकी अंग से लिए जाते हैं। चूँकि रणजीत सिंह इन्फेंट्री से नहीं थे तो कश्मीर भेजे जाने से पहले उन्हें ट्रेनिंग के लिए कोर्प्स बैटल स्कूल भेजा गया। इस स्कूल में एक समय में 3 से 4 हजार तक सिपाही ट्रेनिंग लेते हैं और ये ट्रेनिंग चार हफ़्तों की होती है।
रणजीत सिंह इस ट्रेनिंग में बेस्ट स्टूडेंट जज किये गए थे। एक बेहद रिगरस और टफ ट्रेनिंग के बाद रणजीत सिंह ने कश्मीर में अपनी यूनिट के कंपनी ऑपरेटिंग बेस को ज्वाइन किया। उन्हें उम्मीद थी की अब उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यहाँ शेड्यूल उस ट्रेनिंग से भी ज्यादा सख्त था। इस यूनिट में 60 – 70 जवान अमूनन होते हैं, जिसमें एक तिहाई एडमिनिस्ट्रेशन और सिक्योरिटी में, एक तिहाई पेट्रोलिंग और ऑपरेशन में और बाकी के एक तिहाई रेस्ट और ट्रेनिंग में होते हैं। किसी बड़े ऑपरेशन या इमरजेंसी के दौरान सभी सिपाही फील्ड में होते हैं और उस समय बिना किसी रेस्ट के 24 से 72 घंटे तक की ड्यूटी होती है। औसतन एक सिपाही को सिर्फ 5 से 6 घंटे सोने के मिलते हैं वो भी कभी कभी किस्तो में।
ऐसे माहौल में करीब 6 महीने तक रणजीत सिंह ने काम किया और छोटे बड़े ऑपरेशंस में हिस्सा लिया जिसमें 7 टेररिस्ट मारे गए। ऐसी यूनिट का एक खास काम लोकल लोगों से मिलकर इंटेलिजेंस इकठ्ठा करना भी होता है। रणजीत सिंह को भी ये जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वो लोगों से संपर्क बनाकर सूचनाएं इकट्ठी करें। सामान्यतः सैनिक मेडिकल टीम के साथ गांव जाते हैं, अपने संपर्क सूत्रों से मिलते हैं और सूचनाएं इकट्ठी करते हैं। रणजीत सिंह ने भी मेडिकल टीम और सद्भावना प्रोजेक्ट की टीमों के साथ गांव-गांव जाना शुरू किया और लोगों से संपर्क बनाने शुरू किये। रणजीत जी ने अपने कई सोर्स डेवलप किये जिनकी सूचना के आधार पर सेना ने कई सक्सेसफुल ऑपरेशंस को अंजाम दिया।
और ऐसे में एक दिन रणजीत की मुलाकात एक सोर्स की छोटी बहन से हुई। लव एट फर्स्ट साइट। दोनों तरफ से। पहली मुलाकात जैसे शर्माते सकुचाते हुई थी। लेकिन जल्द ही दोनों मिलने के बहाने खोजने लगे। एक आकर्षक सिख नौजवान, एक सुन्दर कश्मीरी लड़की। जैसे आसमान से उतरी जोड़ी हो। परियों की कहानियों के जैसे। एक तरफ सेना का डिसिप्लिन था , दूसरी तरफ अलग अलग धर्म, संस्कृति थी। समाज के पहरे थे। और पार्श्व में चलता यु’द्ध था।
लेकिन दिल की पुकार कौन ठुकरा सका है। दोनों एक दूसरे के गहरे प्यार में थे। मुलाकाते पब्लिक व्यू में ही संभव होती थीं और बहुत कम ही हो पाती थीं। लड़की कॉलेज जाती थी। इसलिए दोनों का आपसी प्यार मोबाईल के सहारे परवान चढ़ रहा था। घंटों फोन पर दोनों बातें करते। और इन बातों के लिए रणजीत को अक्सर अपनी 5 घंटे की नींद भी खोनी पड़ती थी। लेकिन इश्क में पगलाए रणजीत को इसकी परवाह नहीं थी।
इस बार रणजीत जब छुट्टियों से वापस आया तो अपनी महबूबा के लिए अंगूठी भी लाया था। एक मेडिकल कैम्प में उसने वो अंगूठी अपनी प्रेयसी को दी। रणजीत सिंह का दो साल का टेन्योर पूरा हो रहा था। लेकिन रणजीत ने वालंटीरियलि अपना टेन्योर 6 महीने और बढ़वा लिया। लेकिन जल्द ही ये 6 महीने भी पूरे होने लगे। रणजीत सिंह की दूसरी पोस्टिंग आ गयी। उसे कश्मीर छोड़कर जाना था। उसने अपनी महबूबा को मिलने के लिए बुलाया।
एक दिन बाद ही उसे नयी पोस्टिंग पर जाना था, इसलिए यूनिट में आज उसे कोई ड्यूटी नहीं दी गयी थी। ताकि वो अपनी पैकिंग कर सके। वो कैम्प छोड़कर बाहर नहीं जा सकता था। रणजीत ने देखा की एक पैट्रोलिंग टीम पैदल निकल रही थी। वो बिना किसी अधिकारी को बताये उस टीम के सबसे पीछे लगकर कैम्प से निकल गया। जब गांव पास आया तो वो अपनी टीम से अलग हो गया और एक उजाड़ मकान के पास पहुंचा। रणजीत सेना की पोशाक में था अपने सभी हथियारों के साथ। इसी मकान में उसने अपनी प्रेयसी को बुलाया था। रणजीत जानता था वो कितना बड़ा रिस्क ले रहा है, लेकिन प्यार के आगे फिर कौन सोचता है।
मुलाकात मुख़्तसर सी थी। रणजीत ने अपनी प्रेयसी से वादा किया कि वो जल्द ही वापस आएगा और शादी करके उसे अपने गांव ले जायेगा। दोनों ने साथ रहने की कसमे खायी और फिर मिलने का वादा करके उस घर से निकले। लेकिन जैसे ही वो घर से बाहर आये। उन्होंने देखा एक भीड़ बाहर खड़ी थी। क्रोध में भरी भीड़। लोगों ने रणजीत को घेर लिया और उसे धक्का देने लगे, मा’रने पर उतारू हो गए। वो चिल्ला रहे थे कि रणजीत ने उस लड़की के साथ बला’त्कार किया है। रणजीत ने उस भीड़ को समझाने की कोशिश की। उस लड़की ने भी भीड़ से कहा , लेकिन वहां सुनने वाला कोई न था। भीड़ गुस्से से पागल हो रही थी और रणजीत की जान लेने पर उतारू थी। रणजीत ने अपनी गन हाथ में लेकर उन्हें चेतावनी दी।
इस चेतावनी को सुनते ही एक आदमी ने हाथ में कु’ल्हाड़ी लिए उस पर हमला किया। और कोई चारा न देखकर रणजीत ने फा’यर किया। गो’ली सीधी उस आदमी को लगी और वो वहीँ गिरकर ढेर हो गया। भीड़ तत्काल छंटी और रणजीत वहां से निकल गया। लेकिन मुश्किल से वो 50 गज दूर ही जा पाया था कि विपरीत दिशा से आती एक बड़ी भीड़ ने फिर उसे घेर लिया। रणजीत सड़क के बीच में सैकड़ो लोगों की भीड़ के बीच अकेला खड़ा था। भीड़ उस पर प’त्थर फ़ेंक रही थी। भीड़ रणजीत की जान लेने पर आमादा हो चुकी थी रणजीत के लिए संकट की घडी थी। उसके पास गन थी, ग्रेनेड थे। वो उस भीड़ पर ग्रेनेड फ़ेंक कर निकल सकता था। फा’यर कर सकता था। लेकिन तय था की कई लोग मा’रे जाते।
शायद उस पर एक जान पहले ही ले लेने का अपराध बोध हावी हो रहा था। रणजीत ने भीड़ से परे अपनी निगाह फिराई। उसे अपनी प्रेमिका दिखी। लोगों की जकड में तड़फड़ाती हुई। दोनों की नजरें मिली। लड़की की आँखें आंसुओ से भरी थीं। रणजीत ने अपनी गन उठाई और उसकी नाल अपने मस्तक से सटा दी। एक गो’ली चली। आग की तरह ये खबर कश्मीर में फ़ैल रही थी कि एक सेना के जवान ने एक लड़की के साथ रे’प किया और एक नागरिक को मा’र दिया। सेना के लिए ये बड़े अपमान की बात थी। तुरंत एक्शन लेते हुए पुलिस ने कार्यवाही शुरू की।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत। जिसने आत्म ह’त्या कर ली थी। कहते हैं आत्म’हत्या कायरता का सबूत होती है। आत्मह’त्या कायर करते हैं। लेकिन सैन्य अधिकारी जानते थे कि रणजीत ने अपनी शहादत क्यों दी थी। सेना ने रणजीत को ‘किल्ड इन एक्शन’ माना, जिसने कई लोगों की जान लेने की जगह अपनी जान देकर सेना के शौर्य को बनाये रखा। सेना ने रणजीत सिंह को उचित सम्मान दिया। मैंने जब ये कहानी पढ़ी, बार-बार पढ़ी, हर बार मेरी आँखें भर आयी। मैं सलाम करता हूँ इस बहादुरी को। रणजीत सिंह को। भारतीय सेना को। ऐसा अद्भुत पराक्रम एक भारतीय सैनिक ही कर सकता है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो दफ़न हो कर रह गयी।
मैं आभार प्रकट करता हूँ लेफ्टिनेंट जनरल H.S. Panag जी का जिन्होंने ये कहानी लिखी। और पनाग साहब वही थे, जिन्होंने कोर्प्स बैटल स्कूल में रणजीत सिंह को बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड दिया था। और आभार कर्नल अभिषेक वाजपेयी जी का जिनकी वॉल पर मैंने इस कहानी को पढ़ा। रणजीत सिंह का नाम हमेशा अमर रहेगा। नाज है हमें रणजीत पर और गर्व है भारतीय सेना पर।
जय हिन्द.....जय हिन्द की सैना !!
-----------
जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

शनिवार, 26 जनवरी 2019

सवारी अथवा सवारा

         ===सवारी अथवा सवारा===
               ●हास्य कल्पना●

वास्तविकता में मौषम और समय किसी के लिए समान रहते हे तो वह वर्ग हे परिवहन वालो का....।
वह दिवस विशेष के मोको पर भी अपनी सदावहार 'टोन' से हमलोगो की तरह बाहर नहीं निकलते।जेसे उसी में रचे-बसे भर हो .....!
"शीशे की तरह दिल तोड़ दिया पथरा का जमाना से लेकर" गर्मी में "खटिया सरकने और ठण्ड लगने" तक में वातानुकूलन का अनुभव देते हे।तो कभी "कब याद करु उसको,कब तक अश्क बहाउ" सूना-सूना के कितनो को 'खाँसी-हंसी' मध्य पड़ने बाले ठसके का पुनःअनुभव करा ही दे ...।

इनमे कुछ ट्रेवल्स बसे मेल तो कुछ फीमेल भी होती हे।जिनके मुह,बोनट,डेशबोर्ड,विंडस्क्रीन पर लाली-नथुनिया से सजी दुल्हनिया की मुखाकृति से लेकर दिल्फ्टी शायरिया और प्रीतम के प्रति 'दारु पीकर मत चलाना,जिंदगी भर साथ दूंगी' जेसी पंक्तियों से लेकर उच्चक्के कोटि की तस्वीरें भी चस्पा मिलेंगी किन्तु रंग के मामले में यंहा भी शेडो की भरमार मिलेंगी।76  लोंडो की रँगविरंगि तस्वीरें विभिन्न मुद्राओ में देख कर अनुमान लगाया जा सकता हे।कि, यह मण्डली पसन्द के मामलो कितनी बहिर्मुखी हे ।
तुरा जब फिट बैठता हे जब आप चालक और परिचालक की जुल्फों के भेद नहीं कर पाते की 'जुल्फे नागन' की हे या ना-गण की ...!
बात अगर इनकी 'होर्न्स'(ध्वनि) की जाए तो इतने कर्कस से लेकर मधुर तक मिलेंगे की आपको अकेले यात्रा में सहयात्री की याद आ ही नहीं सकती।चाल तो कहने क्या साहव.....इतने लटके-झटके दिखाकर चलाई जाती हे की सीलिंग और विंडस्क्रीन पर दर्शाये क्षितिज(जहा जमी-आसमा मिलते प्रतीत होते हे) से लेकर व्हिलो के पास बंधे हजारो नुपुर एक साथ झंकार उठे हो.....!और आपको आपकी उनकी....नेपथ्य बाली पदचाप ....स्मरण हो आई हो और आप किसी से  चेटीआते,शेखी बखारते,पुरुषप्रधान विनोद अध्यन में-दर्शन में,अथवा मित्रो के समक्ष 'पति-पर-मूसक' होने का दाबा करते-करते,तदस्तिथि में थूक से सेलफोन की स्क्रीन साफ़ करने की सुखद अनभूति का स्मरण कर सकते हे ।
अंततः इनके पश्चभाग में  'घर कब आओगे'... 'ड्रायवर की बनी दुल्हनिया-क्लीनर से प्यार हुआ' .....'मालिक की लाड़ली'.....'डिपर मत मार जगह मिलने पर दूंगी...साइड'  'फला जगह की शेरनी' इत्यादि जेसे मनोवैग्यानिक, बहुभावअर्थीय, रिझाते,ट्रैफिक-शाश्त्रीय,त्रकारीभाव पाये जाते है ।

इनमे कुछ वाहन 'मेल्स' भी होते हे,जिसकी अनुभूति 'एंटर गेट' के सामने लिखा 'महिला सीट' और "फलाना टूर&ट्रेवल्स आपका हार्दिक स्वागत करता हे "....ऐसी अनुभूति कराता हे जेसे  'दौर-ऐ-जाम' के वक्त साकी बने मित्र ने एक जाम के बाद ही.....पूरी खेप लाने बाली नजरो से आशा लगाई हो ..!
इनकी विंडस्क्रीन पर नर स्वभावी विभिन्न नर्तकियों से लेकर हूरो तक की आकृतिया दिख जाती हे।इन बाहनो के प्रायः 'रेडिएटर कवर' नदारत होकर ऐसा दृश्य मष्तिष्क में बनाते हे जेसे बीड़ी-हुक्के की तलब में बिचारे दूकान खोज रहे हो......और बगल गुजरते वाहन से पैसे न होने की एवज कोई फुक्कु ब्रांड चलने की सहमति दे रहे हो ...तलव बड़ी चीज हे प्यारे,गुटके-तम्बाकू की लत में सर्वदा ट्रक और बसो का मुह भी  दन्तरहित ही दीखता हे ...!!
हेडलाइट्स के मध्य चस्पा बड़ी-बड़ी क्रुरसिंघि मुछो से तो वाहन पूरा मर्द ही नजर आता हे.....!मुखाकृति को और चलने पर बजती खिड़कियों का करतल का संयोजन करके देखिये की 'नरवाहन' और उसका माथे अंगोछा लपेटे चालक जेसे 'नाती-बाबा,साडू-साडू' बाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हो ..!
इनमे बजते विद्धुतचुम्बकीय वाद्य यन्त्र पर गीतों परिचालक की आयुनुसार भजन,गीत,रसिया बजाए जाते हे।हालांकि अल्ताफ राजा की गायी गजले "तुम तो ठहरे परदेशी ...की बेटकलुफि से लेकर रफ़ी साहव का 'आजा तुझको पुकारे मेरा प्यार' आह्वाहन सहसा नरो की नाजुक दुनिया की सैर करा ही देता हे।हालांकि परिचालक मुड़ तफ़रीह मारने का हुआ और रक्त में करामाती रसायन का मिशन हुआ तो 'मुन्नी बदनाम से लेकर,जवानी मांगे पानी-पानी' का ठोस-रस अनुभव करके गोरी जेल भी करा सकती हे ।
इन वाहनों की पीछे लिखी ...'तू चल में आया'.....'अम्मा-बप्पा की दुआएं'....फला का शेर....ढिका का गेहदु....गोरी का साजन......ड्रायवर की जिंदगी स्टेरिंग और ब्रेक पर'....!!!!इत्यादि वाक्य जीवन घर्षण को व्यक्त करते हे ।
यदपि कुछ-कुछ वाहन तांत्रिको का स्वभाव् भी दर्शाते हे जो अनपरिचित 'जय बाबा अकड़-पकोड़े'......'अलख निरंजन'.....'मैड बाबा की कृपा'...'जय केतली बाबा 56' के न समझ आने बाले लम्बे लम्बे बाउंसरों की तरह बहुत दूर तक समझ नहीं आते हे !

खेर इतना सब लिखते आने बाली/बाला रेल-गाडी-रेलगाडा की प्रतिक्षा कर रहा हूँ.....की अपनी तकदीर में सवारी वाहन मेल आएगा अथवा फीमेल ....😊

-------------------
जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
प्लेटफाम नम्बर 4 ग्वालियर

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...