गुरुवार, 29 नवंबर 2018

जीने के फ़न्डे

#ज्ञानदंडा
अगर पाना है कुछ, तो रोना जारी रखिये,
अपने चेहरे पे, दिखावे की लाचारी रखिये!

मक़सद हो जाये पूरा तो बदल लो चोला,
वरना तो अपनी, ये हिक़मतें जारी रखिये!

ज़िन्दगी जीना है तो सीख लो कुछ प्रपंच,
आँखों में कभी पानी, कभी चिंगारी रखिये!

एक जैसा आचरण सदा अच्छा नहीं होता,
कभी जुबान हलकी, तो कभी भारी रखिये!

जितना झुकोगे लोग तो झुकाते ही जाएंगे,
ज़रुरत पड़ने पे, अपनी बात करारी रखिये!

कोई आ जाये तुम्हारे दर पे मदद पाने को,
कैसे दिखानी है मजबूरी, पूरी तैयारी रखिये!

इस दुनिया में जीना भी एक कला है श्रीमन्,
मतलब की दुश्मनी, मतलब की यारी रखिये!!!!

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रविवार, 25 नवंबर 2018

परमवीर यदुनाथ सिंह

                   ★एक शब्द श्रधांजलि★
                 ===नायक यदुनाथ सिंह===

शाहजहाँपुर उप्र के खजूरी गाँव में एक किसान परिवार हुआ करता था !श्री बीरबल सिंह जी का ...जिनकी आठवी सन्तान के रूप में २१ नबम्बर १९०६ को जन्म (अवतरण कहना अधिक उचित होगा ) हुआ महावीर हनुमान के अनन्य भक्त और हनुमान की तरह जीवन जीने बाले यदुनाथ सिंह का ...
बचपन से ही पढ़ने में कम रूचि और खेलने में निमग्न रहने की अभिरुचि पता ही नहीं चला कब प्राथमिक से हायर सेकेण्डरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।गाँव के हर व्यक्ति के साथ घुलना और और सदैव दुसरो की सेवा में ततपर रहना उनके जीवन की सरसता थी।अपनी हनुमान भक्ति की बजह से उनके साथ एक नाम और जुड़ गया था 'महाबीर' !
अपने आराध्य की तरह हे यदुनाथ सिंह जी भी कुंवारे ही रहे उन्होंने ने विवाह नहीं किया शायद उनकी अर्धांगिनी दूर हिमालय की वादिया थी,जिनके हिम् आच्यादित धवल धरा पर खमोस मुहब्बत "सर्वत्र विजय" के आदर्स वाक्य में निहित थी ।
21 नवम्बर 1941 को बो समय भी आया जब यदुनाथ सिंह को मनचाहा काम मिल गया। उस समय वह मात्र 26 वर्ष के थे और उन्होंने फौज में प्रवेश किया।
"राजपूत रेजिमेंट" अंतर्गत उनका चुनाव हुआ और अपने कोशल और साहस-वीरता के बलबूते यदुनाथ जी  को जुलाई 1947 में लान्स नायक के रूप में तरक्की मिली और इस तरह 6 जनवरी 1948 को वह 'टैनधार' में अपनी टुकड़ी की अगुवाई कर रहे थे और इस जोश में थे कि वह नौशेरा तक दुश्मन को नहीं पहुँचने देंगे।

उस दिन नायक यदुनाथ सिंह मोर्चे पर केवल 9 लोगों की टुकड़ी के साथ डटे हुए थे कि दुश्मन ने धावा बोल दिया। यदुनाथ अपनी टुकड़ी के लीडर थे। उन्होंने अपनी टुकड़ी की जमावट ऐसी तैयार की, कि हमलावरों को हार कर पीछे हटना पड़ा। 

भारत-पाक युद्ध 1947
एक बार मात खाने के बाद दुश्मन ने दुबारा हौसला बनाया और पहले से ज्यादा तेजी से हमला कर दिया। इस हमले में यदुनाथ के चार सिपाही बुरी तरह घायल हो गये। लेकिन यदुनाथ का हौसला बुलंद था। दुश्मन बौखलाया हुआ था, हिंदुस्तान की फौजों की अलग अलग मोर्चों पर कामयाबी ने पाकिस्तानी सैनिकों को परेशान किया हुआ था। उनका मनोबल तथा आत्मविश्वास वापस लाने के लिए पाकिस्तानी टुकड़ियों से उनके नायक दूरदराज के इलाकों में हमला करवा रहे थे। उन्होंने 6 हजार सैनिकों की फौज के साथ 2 पंजाब बटालियन से 23/24 दिसम्बर 1947 को झांगर से पीछे हटा लिया गया था। और अब यह लग रहा कि दुश्मन का अगला निशाना नौशेरा होगा। उसके लिए ब्रिगेडियर उस्मान हर संभव तैयारी कर लेना चाहते थे। नौशेरा के उत्तरी छोर पर पहाड़ी ठिकाना कोट था, जिस पर दुश्मन जमा हुआ था। नौशेरा की हिफाजत के लिए यह ज़रूरी था कि कोट पर कब्जा कर लिया जाए।
1 फरवरी 1948 को भारत की 50 पैरा ब्रिगेड ने रात को हमला किया और नौशेरा पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया। इस संग्राम में दुश्मन को जान तथा गोला बारूद का बड़ा नुकसान उठाना पड़ा और हार कर पाकिस्तानी फौज पीछे हट गयी किन्तु उनके दुश्मनो की मंशा ही कुछ और थी ।
6 फरबरी  1948  उस दीन प्रात: घना कोहरा के कारण घोर अंधकार और ठंड भी थी l पाकिस्तानी  सैनिक
सैन्धार गाँव के आसपास के घने जंगलों में से अन्धाधुन्ध गोलियो की बौछार करते हुए हमारी ओर रेंग रहे थे l उनकी मशीन-गन लगातार गोलियाँ दाग रहे थे l लगातार अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलते रहने के कारण हमारे सैनिक चौकी के भीतर ही घीर गये थे l मोर्चा से बाहर वे सिर उठा कर स्थिति का आंकलन भी नही कर सकते थे l
नौशेरा की रक्षा के लिए, दुश्मनों को यहाँ  सैन्धार गाँव में ही रोकना अत्यावश्यक था l         इस भारतीय चौकी को भीषण आक्रमण का सामना करना था l क्योंकी यह सबसे अगली चौकी थी, और सिर्फ नौ सैनिकों को ही इसकी सुरक्षा करनी थी l इस चौकी की कमान यदुनाथ सिंह के हाँथो में थी l पांच सौ पाकिस्तानी सैनिकों और जन-जातियों ने कई बारभारतीय मोर्चाबंदी को तोड़ने का प्रयत्न कर चुके थे l इस बार वो आगे बद रहे थे,
यदुनाथ सिंह ने अपने साथियोँ को चतुरता से व्यवस्तिथ किया l सैनिको को उत्साहित किया और कहा " हम अपनी अंतिम साँस तक लड़ेंगे l उनके चार सैनिक पहले ही घायल हो चुके थे l फ़िर भी उनके सैनिकों ने, पाकिस्तान के इस आक्रमण को विफल कर दिया l दुश्मन लौट गए l परंतु पाकिस्तान के सैनिको और जन-जातियों  लोग फ़िर लौट आए इस बार उनमे अधिक शक्ति से आक्र्माण किया l पाकिस्तानी सैनिक समझ चुके थे कि, उनका सामना सैनिक से नही बल्कि भारतीय सैनिक से होगा, जिनके अदम्य साहस और द्रिढ-संकल्प के सामने उनकी  अधिक संख्या पर भारी पड़ती है l
हुआ भी वही, एक बार फ़िर , उन्होने दुश्मन के आक्रमण को  विफल कर दिया l इस युद्ध के दौरान नायक यदुनाथ सिंह के साहस और संकल्प शक्ति ने उनके साथियोँ का उत्साहित किया l जज़्बा ऐसा की घायल  सैनिकों ने भी सहायता की l उस समय तक उनके सभी सहयोगी सैनिक या तो घायल हो चुके थे या वीरगति को प्राप्त हो गए थे lपाकिस्तान का तीसरा और अंतिम आक्रमण जब हुआ , उस समय तक  नायक यदुनाथसिंह के पास कोई नही बचा था, जो उनकी सहायता उन्होने धैर्य नही छोड़ा  उनके घाव और दर्द भी उनके  देश भक्ति और दृण-इच्छा शक्ति को नही डीगा सकी l वे अपना स्टेन-गन ले कर अपनी चौकी के बाहर  निकल आए l उस समय पाकिस्तान केसैनिक हमारी चौकी से मात्र 15 गज़ की दूरी पर थे l  खुले मैदान मे शेर की तरह दहाड़ाते हुए दुश्मनो पर अन्धाधुन्ध गोलियो की बौछार करते हुए बढने लगे l पाकिस्तान के सैनिक,
यदुनाथ सिंह की भयानाक गोली-बारी का सामना नही कर सके l  पीछे लौट गए l यदुनाथ सिंह पुरी तरह जख्मी हो चुके थे l उनके  सिर और सीने में दो गोलियाँ लग चुकी थी l
वे युद्धस्थल पर ही गिर पड़े और उन्होने अंतिम साँस ली ....वे  वीरगति को प्राप्त हुए l
यह वीरगति सारे भारतवर्ष में "परमवीर यदुनाथ सिंह" के रूप सदैव यु ही स्मरण आती रहेगी और मरमिटने  के इस जज्बे को ही भारतीय सैना "सर्वत्र विजय" के आदर्श वाक्य में दोहराती रहेगी .....
जय हिन्द ..
जय जवान ....
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जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'



गुरुवार, 22 नवंबर 2018

मेरे गीत'मेरी रणभूमि'

माना की क्षत्रिय जन्मना कर्मणा मृत्यु योग पूर्ण होगा,
कन्धे पर सितारे न सही स्वभार प्रभार तारो से कम होगा !

पल पल खुद से खुद की खुदाई बाली जंग लड़ता हु,
साँस तोड़ती दिनदारी में लोहे से लोहा लह क्षत्रिय बनता हु !

समय समय असमय असमंजस में अकेला खड़ा मिलता हु,
कर्म धर्म रूचि सूचि सी सजी चतुरंगिणी नित युद्ध में मिलता हूँ!

बुरे भले का बोध माता ने बाल्यपन सींचा आज बटवृक्ष्यअड़िग हूँ,
हटी घमण्डी धर्मज्ञ अर्जुनसुत चक्रव्यूह वेदज्ञ अभिमन्यु में जूझगतिज्ञ हूँ!

भीष्म सा अटल शिद्धान्त यदा कदा सरसैया सर का सिरहाना मिला,
में तो फिर कलयुगी नराधम ठहरा जो कराह मिली शत का इकहरा मिला!

समयगति तू सर्त लगा अवगति में कोन किससे तीव्र धाता हे ,
मन्द मन्दर रहु तीव्र निरन्तर विजय वीरगति
दोनों मेरी ही गाथा हे !

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जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

सहालग (हास्य व्यंग)

           ★सहालग★          (हास्य-व्यंग)

"उठो देव-बैठो देव" से लेकर 'कान पकड़ उठा बैठक 'करने की स्तिथि तक आने को "सहालग" कहते हे।  अर्थात 'देवोत्थानी एकादशी से देवशयनी एकादशी मध्य का समय ...!
पता ही नहीं चलता कब कोनसे फूफा ओसारे की टूटी खाट पर पड़े पड़े राजपाल यादव से अर्जुन रामपाल बनने की कोशिश में जॉनी लीवर बने नजर आ जाए !

कुवारों-कुंवारियों के सावन के सोमबार से नवरात्रि तक किये अनगिनत उपवासो का फल कब प्रतिफल बन 'फलदान' का समय ले आये!भोजाइया दवे होंठो से ननद-देवरो को टटोलने लगती हे की 'द्वार रुकाई-काजल लगाई जेसी नेग भरी रश्मो में क्या मांग रखेंगी !
अब आधुनिक समय हे जियो के साथ वीडियो व्हाट्सऐप वीडियो पर विवाह से पूर्व ही भविष्य के युगलों में 33 psi दबाब से ट्युव ब्रस्ट होने तक की योजनाये क्रियांवन होने लगी हे ।
एकाएक लड़को का रुझान 'करामाती पेय' की दुकानों से सौंदर्य प्रसाधन की दुकानों की तरफ बड़ जाता हे।कोई कोई तो देशी 'नीबू नमक'-'मुल्तानी मिटटी' के उप्टन लगाकर घरवालो के लिए "भोंपा से पहले ही झोंटा" दिखने लगते हे ।
लड़कियो के फेसबुक अकाउंट एकाएक दिल्फ्टी शायरियों को त्याग 'महादेव भक्ति' की ओर उन्नत्ति की बढ़ने लगते हे।अब उन्हें बालो, चालो,फेसपेको,व्यूतिटिप्सो को सर्च करते हुए देखा जा सकता हे।हालांकि दिन रात मोबाइल बार्तालापो में रत रहकर सप्ताह में एक बार ही स्नान कर पाती हे।जो सारे गांव शहर में तितली बन स्वतन्त्र विचरण किया करती थी विवाह से पूर्व 'धुप से दुश्मनी' बना लेती की कही आगामी निखार की जगह "सुन्न भूरि" न हो जाए !

सहालग के समय में जहां घरवालो पर आर्थिक दबाब बनता हे बही हलवाइयों के क्लछो,डोंगो,पतीलो,चमचो की काया का पुनर्जन्म हो जाता हे।टेंट बालो का नास्ता कम भाव ज्यादा बड़ जाता हे और दूधियों के दूध में दूध कम पानी ज्यादा पाया जाता हे ।

एक से दशक पुरानी हुई भोजाई रूपी हबेलियो पर एकाएक पुन दुल्हन सा दिखने का संक्रमण दिखेगा जिसे एशियन पेंट से पुताई कर बन-ठन किया जाएगा किन्तु पेट की बड़ी हुई चर्वी और साढे तीन पसली से डेड पसली पर आये  फिगर को शायद ही कोई युक्ति पूर्ण कर पाये !बड़े भाइयो बड़ी बुरी हालत होती हे इस सहालग में रूठे फ़ूफा से लेकर रूठी बीबियो की मनोती मुंनब्बल करते करते उन्हें पता ही नहीं चलता की कब दर्जी मास्टर ने पतलून का साइज छोटा सिल दिया या शेरवानी को मुशक महाराज सुभह के नाश्ते में रोशदान बना गए !

सहालग में असली आनन्द तो जो दूल्हा दुल्हन से छोटे होते हे उनका होता हे।दुल्हन की बहिनो के मन में दूल्हे को फूल फेंक कैसे मारा जाए जो दूल्हे के भाई की मुंडी से टकराये की जुगाड़ में समय निकलता हे तो दूल्हे के भाई काले सूट बाली को ताड़ूँगा या पिले बाली को ताड़ूँगा में बीत जाता हे।हालाँकि घुड़चढ़ी में करामाती पेय के साथ तालमेल बनाते हुए  ऐसे नागिन बनते हे की पहने हुए ब्लेजर का और नाली में भेद फोरेंसिक लेव भी न कर पाये हालाँकि नाचते हुए दूल्हे को धक्का दे खुद घोड़ी की  लगाम और रकाव थामने की तमन्ना थी ।

किसी किसी वारात् में फूफा के बाद कोई रुठने बाला व्यक्ति होता तो बह होते हे दूल्हे के बहिनोइ जिन्हें उनकी ससुराल बालो ने 'रसगुल्ला दिखाकर दहिबढ़ा' टिका दिया था हालाँकि बरात के खजांची भी यही होते हे और अपना दायित्व निभाते निभाते खुन्दक निकालते हे राइफल पर पूरा बिलडोरिया  फूँक खुद को प्राप्त रसगुल्ले और दहीबड़े का घाटा पूरा करने की कोशिश करते हुए देखे जाते हे ।

लड़कियो बालो की तरफ से कुछ लड़के ऐसे भी निस्वार्थ  सेवाभावी होते हे जो दौड़ दौड़ कर पानी से लेकर आसमानी पानी तक की व्यवस्था में लगे रहते हे। वास्तविकता में बो विवाह रूपी टूर्नामेंट के नॉकआउट से लेकर सेमीफाइनल तक प्रतियोगिता में रेफरी द्वारा मण्डप रूपी स्टेडियम से बाहर कर दिए गए होते हे।हालाँकि वारात् के स्वागत से लेकर दुल्हन बिदाई तक टकटकी बाँध दूल्हे की तरफ ऐसे देखते रहते की कह रहे हो "बेटा सेमीफाइनल तक हम भी खूब लोफ्टेट शॉट लगाये थे पर बाउंड्री बाल पर अंकल द्वारा कोट इन बोल्ड हो गए थे!,जाओ ले जाओ हमारी 'ख़ुशी' को ईश्वर करे तुम ससुरे दिन रात चोका-बर्तन करो,अब कुछ दिन बाद मामा बनने का इन्तेजार हम न करेंगे-अबकी सहालग में हम भी विवाह करेंगे!"

तो मित्रो इस उठो देव बेठो देव से कान पकड़ उठा बैठक करने की सहालग रूपी सौगात पर बफर में ऐंठन भरी पूड़ियों जेसी शुभकामनाये .....
और नागिन डांस से तिगनी नाच तक की शुभकामनाओ युक्त सांत्वनाये ।

दुल्हन बही जो पीया मन भाये साथ में एक साली दहेज में आये,
जो बेठे जीजा की मुंडी पे कहे नचने को भौजी तानपुरा बजाए ।।
😊😊😊
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जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

बुधवार, 14 नवंबर 2018

साक्ष्य इस जहां के

चमचमाती सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंगों में हाथ जोड़े धर्माचार्य,
होर्डिंगों के नीचे घिरी जगह में हाथ देकर ग्राहक रोकती वेश्याएं .....
ये एक साथ होना था
मेरे ही वक्त में...........!!!!!

भूखें बच्चों की मौत की खबरों के बीच मस्ती में झूमते,चार्टड जेट से उतरती दुल्हन,
अपराधियों के बच्चों के ऊपर चावल फेंकते जननायक.....
एक ही पेज पर भूख और भूख को साथ होना था.....
ये एक साथ होना था
मेरे ही वक्त में...!!!!!!

कांपतें हुए हाथों से मांगनी थी सड़क किनारे रोटी,
उन्हीं हाथों से राजतिलक होना था.....
भीख मांगना रोटी का,
और भीख देना सत्ता की......!
ये एक साथ ही होना था
मेरे ही वक्त में....!!!!

एक साथ चलनी थी दोनो तस्वीरें....
मंगलयान पर कामयाबी से झूमते हुए!
और पेड़ पर लटकी लाश पर रोने वाले
दोनो पर हुलसते और झुलसते हुए....!
जननायकों को रोना था और गाना था
लेकिन चेहरों पर कई बार धोने पर भी
वो रो रहे है या गा रहे.....!!!!!
मुश्किल था ये पता लगाना

ये एक साथ ही होना था
मेरे ही वक्त में......!😑
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जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

शनिवार, 3 नवंबर 2018

स्मरणीका में गजक

          ==='गजक' पुनः लुभाती हुई==

गजक और गुझिया में एक अद्भुत और अनदेखा सम्बन्ध हे और बो इनके प्रथक-पृथक स्वाद के होते हुए भी भारतीय ज्योतिस अनुसार "कुम्भ" राशि का होना।जेसे संगिनी और संगिनी अनुजा दोनों एक साथ आई हो घर के आँगन में।एक अपनी मर्यादा में सिमटी हुई सी और दूसरी अपनी स्वंत्रता के आभार में गली,कूचे,मोहल्ले,परिवार में तितली की तरह उन्मुक्त विचरण करती हुई अनायास ही थके हारे बुजुर्गो को आकर्षण में बांध अपनी  मनमोहक सदावहार खुशबु से बत्सल्य बोध-स्मरण करती हुई  .....!
एक का आगमन जहां जीवन में अतीव सुखद पलो में आगमन ...और चिरस्थाई होकर रह गयी चम्बल के उस पार!समेटे हुए भविष्य की तमाम सृजनताओ के मध्य अपनी मध्यस्तओ के चिरस्थायित्व को ....!

गजक आती हे भार्यानुजा की तरह....समय के साथ और एक आकर्षण,नूतन,नवेलापन,अल्हड़ता,उन्मुक्तता,के बीच केशरिया होती सर्सो के पुष्पो के मध्य  ...जेसे पीले परिधानों की चुनरिया रख-रखी हो माथे पर ....!
गजक का आगमन लाता हे एकल युवाओ के लिए परिग्रणीक तमाम आशाये और खिले हुए आभामण्डल पर समानयोग की तमाम कल्पनायें ....! तमाम कल्पनाओ के मध्य मधुर युगल सहयात्रियों सी अपार सम्भावनाये वही गुझीया बेठी रहती हे एक अनुभवी विवाहिता की तरह सदाबहार .....सिमटी-लाज से दोहरी होती हुई और जानती हे की छुटको का आकर्षण छुटकुओ के लिए ही हे न......युगल बन्ध का दायित्व तो उसी को पूर्ण करना हे ।

गजक के आते ही जेसे गुझिया का चिर आकर्षण जेसे पतझट की तरह कुछ शुष्क  हुआ क्योंकि नवांगतुक  मोह ही कुछ और होता हे।गुझिया परिपक्व हे समझती हे की इसी गजक के नए नबेले आकर्षण में छिपा आगामी भविष्य का सृजन,मान-मर्यादाओ का आलम्बन और मनमुक्तता से,लाड से देखती हे अपने समक्ष्य नवयुगलों की सहभागिता में एक कागज के आधार पर  गजक की मधुर मध्यस्तता.....दो युगलों के मध्य स्नेह का अंकुर डालते हुए ....छुदाअग्नि की तृप्ता के साथ साथ नयनाभिराम अदृश्य स्नेह अमृत का वर्षण करते हुए ......
मनमोहक मुस्कराहट के मध्य भविष्य की सृजन युक्ति को परिपक्व होते हुए ....
दो अभिर्नजनाओ को निकट और निकट सन्निकट आते हुए ....!

गजक आजकल बुजुर्गो की जेवो में कुर्ते की महक बनती जा रही और नन्हे-मुन्नों की कभी भी न पूर्ण होने बाली आकांक्षा भी ....।
बत्तु में आज गुझिया नहीं गजक की प्रधानता हे।बो पितामह को देखते ही चिल्लाते दौड़ते हे की "बाबा बत्तु लाये..?" और अपनी मनमाफिक बत्तु पाकर नाचने लगते हे जेसे लीलाधर श्रीकृष्ण जी पुनः माखन मिश्री प्राप्त करके "ठुमक-ठुमक नाचे कन्हैया नन्दबाबा के दुआर" का पुनः चलचित्रिकरन हो गया हो ।
बही दूर अपनी मर्यादाओ में लिपटी गुझिया अपनी उपेक्षाओं में भी बत्सल्यबोध करती निहाल हुई जाती हे और अंक में भर लाडले के केशो में उंगलियो की कंघी कर माथा चूम मातृयित्व का अथाह सागर बन जाती हे ......

वादियो का ही मेरा सागर हे वादियो सा विशाल भी
कुछ ठहर मुसाफिर दरख्तो की छाँव में  देख मेरा गाँव भी ।।

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           जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

प्रतिवेदना और प्रतिउत्तर

मेरे शब्द इतने कातर न थे की तेरे नैनो से नीर बहा देते,
टटोला तो होता मनमहलो की ईंट तेरे करो से कुरिदवा-दवा देते !!

बिखरे खण्डहरों में बसाबट हो रही हे अब रात्रिचरो की ,
अँधेरे ही तुम्हारी रोशनियों की आशनाई हे
जरूरत कहा जुगनुओं की !

मानता हु कुरेदता हु तुम्हे अपना स्नेह समझाने को,
भूल थी साया,साया होता हे  आत्मा चाहिए प्रतिमा बनाने को !

में नहीं मेरे शब्द फिर तुम्हे खोजते रहेंगे जुडाव इतना हे,
संयोग बनी प्रज्वलित लो तुम में मस्त पतंगा और मुझे जलना हे !

सागर में टूटी नाव का पतवार सा डूब तृप्त हो जाऊँगा,
अपने अपने हाल पे मलंग रहो ऋण-ऋण,धन हो जाऊँगा !

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

में और मेरा कन्छेदि (व्यंग)

                ★एक वार्ता★

पिछले दिनों हमारा घर जाना हुआ तो गाँव से लगे मझरे बाला हमारा 'अमूलब्टर बासी' सहपाठी कनछेदीलाल खेतो पर भेंटा गया।उसका मेरा रिश्ता बड़ा ही अजब हे।रिश्ता इतना प्रगाढ़ हे की परीक्षाओ के समय मेरी पीछे बाली बेंच पे बैठता और खुद की उत्तर पुस्तिका में अनुक्रमाक मेरा ही उतारा करता था।जिसके चलते उसको कई बार मेरे द्वारा  'पनाह पूजन' की क्रिया द्वारा भी गुजरना पडा था और तभी मुझे पता नहीं क्यों 'लम्बर गुरु' के खिताब से नवाजता आ रहा हे ।
आजकल हमारा कन्छेदि 'नीली पार्टी' का सदस्य हे और गाये बगाहे 'भेनवती' की नीलगती वादों से पुरे मझरे को 'नीललैंड' बनाने पे तुला हे ।

वो कहता है अगर आप हम जैसे आम लोगों का, या चैटिंग-सैटिंग में बीज़ी नौजवान पीढ़ी के बचे हुए समय में कुछ ज्ञान वर्धन करेंगे तो बड़ी कृपा होगी।मै कन्छेदी को, इलेक्शन वाले किसी अपडेट से नावाकिफ़ रखना ख़ुद भी कभी गवारा नहीं करता। उसके अनुरोध को मुझे टालना कभी अच्छा नहीं लगा। मेरे पास इन दिनों टाइम-पास का कोई दूसरा शगल या आइटम, सिवाय कन्छेदी के और कोई बचा भी तो नहीं इसलिए उसे बातों के मायाजाल में घेरे रहना मेरी भी मजबूरी है।
उसे पुराने क़िस्से सुनने और मुझे सुनाने का शौक है।आप लोगों के पास टाइम है तो चलें, टाइम पास के लिए कुछ गड़े मुर्दे उखाड़ लें?

खेत पर हमे देखते ही बड़ी जोर से भागा आया और कहने लगा कि,"लम्बर गुरू! अब गाँव कम आते हो और इधर देखो हमने अपना कुर्ता-पजामा 'नीलाम्भ' कर लिया हे "(कहते कहते हमारी बरमूडा पहने टांगो में लम्बलेट हो गया)
"देखो गुरु अब आपका चेला आपसे विज्ञान नहीं ठगनीति का धवल ज्ञान चाहता हे क्योंकि आपके 'चम्बल शोधो' का में बहुत बड़ा प्रशंशक हु और आपने तो सन् 51 तक की राजनीति पर शोध भी किया था न ....!कृपया करके अपने इस चेले को भी कुछ प्रशिक्षण दीजिये।हालांकि आपकी 'राजनीति को खाजनीती' परिभाषित करने की सोच का आत्मा से सम्मान भी करता हु।" (कहते कहते फोरस्कावर पैकेट की एक दण्डी मेरी तरफ श्रद्धा से या पता नहीं रिश्वत रूप से मेरी तरफ अपनी 'नील धागा' लपेटे हथेली के माध्यम से समर्पित कर रहा था।)

"अबे तुतिये कनछेदिया तुझे पता नहीं की में इस 'मुखाग्नि' के लिए अभी पात्र नहीं हुआ...!ससुरे तू नोटँकी न कर ज्यादा ये पकड़ 'करका श्री' की पुड़िया और रख!"तुझे आज फ्री में खाजनीती का मुर्दापुरान सुनाता हु ।(गुटके की पुड़िया देख कन्छेदि की आँखे नीली और लाल हुयी दन्तावली में चमक 19-20 हो रही थी।)

में कन्छेदि से मुखातिव होकर उसे 'मुर्दापुरान श्रवण कराने लगा..

'ये राजनीति भी अब गज़ब की हो गई है, ज़िंदा लोगों पर आजकल की नहीं जाती। मुद्दे नहीं मिलते ...... मुर्देउखाड़े जाते हैं।राजनीतिज्ञ लोगों को आजकल फावड़ा-बेलचा ले के चलना होता है। क्या पता किस जगह किस रूप में क्या गड़ा मिल जावे?'

एक अच्छे किस्म के, ताज़ा-ताज़ा, स्वच्छ, लगभग हाल में पाटे हुए मुरदे की ख़ुश्बू नेता को सैकड़ों मील दूर से मिल जाती है।एक अच्छा मुरदा क़िस्मत के ख़ज़ाने खोल देता है, ऐसा जानकार, तजुर्बेकार, राजनीति में चप्पलें घिसे नेताओं का मानना है।

सन बावन से सत्तर तक के इलेक्शन में, ‘लोकतंत्र के पर्व की तरह’ ख़ुशबू थी, सादग़ी और भाईचारे से लोग इस पर्व के उत्साह में झूमते रहे। वैसे कुछ प्रदेशों में, कट्टा से वोट छापे जाने की शुरुआत हो चुकी थी।पर काबिज हो के मजलूम लोगों के वोट के हक़ को छीन लेना नए फैशन मेंशामिल होने लगा था। धीरे-धीरे लोगोंने सोचा इससे बदनामी हो रही है। जीतने में मज़ा नहीं आ रहा, वे अपने आदमियों से बाकायदा हवाई फायरिंग कर लोगों को सचेत कर देने की कहने लगे।

हिन्दुस्तानी नेता, चाहे कैसा भी हो, उनमें कहीं न कहीं से गाँधी बब्बा की आत्मा घुस ही आती है।
वे अहिसा का पाठ भी पढ़े होने के हिमायती बने दीखते हैं।अपने लोगों को सीखा के भेजते, आप को बूथ पर ये ज़रूर कहना है कि हम आपको लूटने-धमकाने आये नहीं हैं, हमें बस डिब्बा उठाना है। नेता जीताना है। वे डिब्बा उठाये चलते सत्यमेव जयते ‘लोगो’ वाले खाकी वर्दीधारी, पोलिग बूथ के कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी, इस पुनीत कार्य को होते देखने में ख़ुद को अभ्यस्त करते दिखते।
वे ‘जान बची और लाखों पाए’ वाले नोटों को गिनने में लग जाते।अब ये हरकतें, प्राय कम जगहों पर, या कहें तो नक्सलवाद आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कहीं देखने में नहीं आती।
उन दिनों मुर्दा उखाड़ने का झंझट कोई नहीं पालता था, तब मुर्दे बनाने, टपकाने के खेल हुआ करते थे।सीमित जगहों पर ये खेल था तो सांकेतिक मगर ज़बरदस्त था।
एक चेतावनी थी, प्रजातंत्र पर आस्था रखने वालो चेतो, नहीं तो हम समूची बिरादरी में फैलाने के लिए बेकरार हैं।
कन्छेदी .........! जानते हो इसकी वज़ह क्या थी?
कन्छेदी भौंचक्क देख के, ना वाली मुंडी भर हिला पाता।
मै आगे कहता, राजनीति में आज़ादी के बाद बेहिसाब पैसा आ गया। अपना देश, गरीब, शोषित, दलित, अशिक्षा, महामारी, अंधविश्वास, झाड़-फूँक में उलझा हुआ था। या तो बाबानुमा धूर्त लोग या चालाक नेता इसे ठग रहे थे।योजना के नाम पर बेहिसाब पैसा, रोड सड़क में, नालियों बाँध में,ठेकेदार इंजिनीयर के बीच बह रहा था।बाढ़ में पैसा, तूफ़ान में पैसा, भूकंम्प में पैसा, सूखे में पैसा। पैसा कहाँ नहीं था.....? नेताओं ने इन पैसों को, दिल खोल के बटोरने के लिए इलेक्शन लड़ा। लठैत-गुंडे पाले ......। दबदबा बनाया ......। मुँह में राम बगल में छुरी लिए घूमे ....!

एक रोटी की छीन-झपट, जो भूखों-नंगों के बीच हो सकती थी वो बेइन्तिहा हुई। मेरा कहना तो ये है कि कमोबेश आज भी आकलन करें तो कोई तब्दीली नज़र नहीं आती, हाल कुछ बदले स्वरूप में वही है।दिल को जीतने का नया खेल यूँ खेला जाने लगा है कि गड़े हुए मुर्दे उखाड़ो।
बोफोर्स के मुर्दे उखाड़ते-उखाड़ते सरकार पलट गई नेताओं के सामने नज़ीर बन गया। पिछले किये गए कार्यों का पोस्टमार्टम, उनके कर्ताधर्ताओं का चरित्र हनन अच्छे परिणाम देने लगे। घोटालों को, घोटालेबाज़ों को हाईलाईट किये रहना, पानी पी-पी के कोसना, गला बैठने तक कोसना फ़ैशन बन गया ।
दामाद जी को सूट सिलवा दो तो आफ़त, न सिलवा के दो, तो जग हँसाई।परीक्षा पास करा के लोगों को नौकरी दो तो उनके घर के मुर्ग-मुस्सल्ल्म की उड़ती ख़ुशबू सूँघ के घोटाले की गणना करने वालों की आज कमी नहीं।

‘आय से ज़्यादा इनकम’ के मामले में, अपने देश में बेशुमार मुर्दे गड़े हैं। इनको तरीके से उखाड़ लो तो, विदेशों से काला धन वापस लाने की तात्कालिक ज़रूरत नहीं दिखती।कोयला माफ़िया की कब्र उघाड़ के देख लो, माइनिंग वाले, प्लाट आवंटन, मिलेट्री के टॉप सीक्रेट सौदे पर तो हम अपनी आँख भी उठा नहीं सकते।जो है जैसा है, की तर्ज़ पर, या मुंबई फुटपाथ पर सोये हुए बेसहारा ग़रीबों की तर्ज़ पर इन्हें बख्श दें......?

किन-किन मुर्दों को को कहाँ-कहाँ से उठायें?सब एक साथ खोद डाले गए तो चारों तरफ बदबू फैल जायेगी। महामारी फैलने का खतरा अलग से हो सकता है।स्वच्छ भारत के आम स्वच्छ आदमी के मन से सोचें........।
इस प्रजातंत्र में, कई इलेक्शन आने हैं......।अपनी सनातन परंपरा में ये अच्छा करते हैं मुर्दों को हम गाड़ने की बजाय... जला देते हैं।शरीर जला देने के बाद भी, अविनाशी आत्मा का अंश फ़कत कुछ दिनोंके लिए हमारे दिलों में गड़ा रह जाता है बस.....!

कन्छेदी की तन्द्रा भंग हुई। वह मायूस सा थका हारा सा अपनी पत्नी के 'करवाचौथ'  का बहाना लेके भारी कदमो से  लौट गया........।
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                जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...