रविवार, 16 सितंबर 2018

भक्ति सत्यकथा 'बंशी बारे बाबा

        ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                          भाग-२८
                  ★भक्ति गाथा★
यु तो अपनी चम्बल में अशेष किस्से सजीव हे।कुछ दनदनाती गोलियों के तरह आते हे और हम हालिया स्मरण करके जल्द भूल जाते हे।किन्तु कुछ अविस्मरणीय किस्से भी हे जो गोलियों ,कडबाहटो,जख्मो,दुसमनियो से दूर अनन्त ईश्वर के साक्षात् होने का स्वप्रमान हे ।
ऐसा ही एक वाक्या हे रजोधा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने बाले गाव #अटागाँव का।पनिहल मिटटी से बने हुए घरो को चारो तरफ से आछ्यादित करते अनमोल बनस्पति के वृक्षयः और आपसी सोहार्द का प्रतीक ये गाँव भी सामन्ती सोच से निकल ही रहा था की अपवाद स्वरूप एक भूमि हड़प का सड़यन्त्र सबके सामने था ।
इस वाकये को जान्ने के लिए हमे आज से करीब 45  वर्ष पुर्व का सफर तय करना होगा।

अटागाँव के एक परिवार में तीन भाई रहा करते हे  सोवरन सिंह ,अहिवरन सिंह और रामबरन सिंह (पीछे के दो नाम परिवर्तित हे ) सोवरन सिंह बाल्यकाल से गाएँ और खेतो में मस्त श्रीकृष्ण भजनों में लींन रहा रहा करते थे बही छोटे दोनों भाई अपनी कार्यकुशलता,फुर्ती,बुद्धिमत्ता और धूर्तता के लिए जाने जाते ते।समस्त गाँव में ऐसा कोई न था जो अहिवरन और रामवरण की बुद्धि और कुटिनीति का लोहा न मानता हो।कुशल बुद्धि सदैव विद्यार्जन में निपुण होती हे और इसी बजह अतिशीघ्र ही उन्होंने अपने बड़े भाई की उपस्तिथि को नगण्य कर दिया।परिवारी-रिश्तेदारी सब जगह दोनों भाइयो की पूछ परख जबकि सोवरन जी अपनी गाय चराने और कुवारी के बेहदो में अनन्य सखा कृष्ण को खोजते रहते।मनोस्तिथि ऐसी जेसे बाबले हो ,सिर पे मुडाचा,हाथ दण्डी और वही कृष्ण भक्ति की पगडंडी ही उनका जीवन था।

जैसा की समय अनुकूल होता हे सोवरन जी का भी पाणिग्रहण हुआ।घरबाले समझते थे की सम्भवत विवाहोप्रांत परिवर्तन आये।जैसी की हर जगह भ्रान्ति हे की शादी के बाद लड़के सुधर जाएंगे किन्तु ये उपाय भी निष्फल रहा और सोवरन जी जीवन चर्या में तिल मात्र परिवर्तन न हुआ।घर परिवार बालो ने मुर्ख बाबला समझ उन्हें उपेक्षित कर दिया ।
समय के पंखो के साथ परिवार में वृद्धि हुई और जिम्मेदारियो में वृद्धि तनिक न हुई।सोवरन जी अपनी जिम्मेदारियो को समझते थे किन्तु 'मेरो मन अनन्त कहा सुख पावे' की अनन्त भक्तिपाश से सहज निकल पाना क्या सम्भव होता हे ..!!
जब बो कहते हे की भाई को भाई प्रति उकसाने बाली भार्यायै हर समय एक ही बुद्धि की परम्परागत वाहिकाएं होती हे।और ऐसा ही सोवरन सिंह साथ हुआ।उन्हें परिवार से अलग कर दिया...!पेत्रिक जमीन के त्रि असमान भाग हुए ...!!सबसे निम्न स्तर की जमीन सोवरन सिंह को दी गयी किंतु आश्चर्य इस बात का की अतिसामान्य से निम्न स्तर का कार्य करने बाले सोवरन जी के यहां धन-धान्य जेसे 'बंशी बारे' की कृपा से वरसात करता।किन्तु गाय और कृष्ण भजनों के प्रेमी सोवरन सिंह मुख के पर रहष्य भरी मुस्कान साथ एक शब्द रहता हे "मेरो तो बंशीबारो हे, ओरु कोउ कहा करे.!"

समय पंख लगा कर उड़ता जाता हे ,भाइयो ने नूतन युक्ति खोजी की सोवरन दादा के क्यों न ७बीघे खेत को अपने नाम कर लिया जाए जिसमे उन अकेले की सबसे ज्यादा फसल होती हे।पुलिस-पटवारी का जुगाड़ बिठाया गया।सोवरन सिंह को बाबला और निःशनतांन ,अवेवाहिक ठहरा कर ७बीघे जोत लिए गए ....!

अब सोवरन जी का चित्त कुछ जागृत हुआ की अरे मेरी और बंशीवारे की गाये अब कहा करेगि ,में किस बिधि उससे मिल पाउँगा,कैसे उसकी मधुर बंशी की धुन में खो पाउँगा........!! हाय मेरे 'बंशी बारे' का साथ छूट जाएगा ....! बीहड़ का एकाकी यही हिस्सा तो हे जिसकी घास कितनी गाये रोज खाती हे किन्तु एक -एक तृण की पूर्ति एक रात्रि में करने बाला ये खेत दुस्ट भाइयो ने कब्जा लिया ......!!!!
हाय  बंशीबारे  अब तू ही कोई राह दिखा ..!मुझे खेतो की नहीं तेरी मुरली की पड़ी हे, की अब ये न मिलेगीे सुनने को ...!
सहसा पार्श्व से मुरली की मीठी स्वर लहरी सुनाई देती हे और सोवरन जी उसकी तरफ आकृष्ट हो जाते हे।
"आहा बंशीबारे तुम आ गए ,ये देखो मेरे भाइयो ने अपनी गोचर की जमीन हड़प ली अब कैसे अपनी गाये चरेंगी और कैसे हम साथ-साथ एक पोटली से 'कलेऊ' करेंगे ,शायद अब तुम बापस जल्दी  चले  जाओगे। एक वर्ष में सिर्फ४माह के लिए ही तो आते हो वृन्दावन से अपनी गाये लेकर ...!"
प्रतिउत्तर मे जेसे किसी ने एकाएक शांत पड़े 'जलतरंग' को छेड दिया हो,सेकड़ो बसन्तो से भँवरो को बाबला कर दिया हो,पुरवाई में चन्दन घोल दिया हो और पपीहे ने "पीहू-राग" गादिया हो के सदृश्य शब्द निकले " शंभु दादा तुम न्यायालय जाइए,किसी को मध्यस्त किये बिना मेरे साथ चलिए।मुरैना में अपने 'दाऊभैया' का घर भी हे उनसे मिलकर न्यायालय के माध्यम से अपनी खेती पुनः ले लेंगे ।"

सोवरन......! सोवरन.....!!सोवरन.......!!!
की आवाज और किसी के पुकारने पर उनकी तन्द्रा भंग हुयी।
आंय.....!!!
में अपने घर पे स्वप्न देख रहा था की जागृत था ....!!
अतिविष्मयकारी नजरो से घर मुहाने खेल रहे बच्चों की करतल ध्वनि और बालसुलभ अठखेलियों के समक्ष वो उठ खड़े हुए और निकल पड़े मुरेना की ओर......!

मुरैना न्यायालय में तहरीर लिखाई जाती हे।अब मुंशी द्वारा 'गवाह' का पूछा जाता हे तो सदैव की तरह एक शब्द निकलता हे 'बंशीबारो' और निकल आते हे घर की तरफ ।
अगले दिवस जब फरियादी का नाम दरवान उद्घोषित करता हे..!कचहरी से सोवरन जी नदारद थे ।
"बो तो पदयात्री हे और नियत समय पर पहुचने में बिलम्ब तो होगा ही ,आप न्याधीश महोदय के समक्ष मुझे ले चलिए ,'सम्भु दादा' जिन्हें आप सोवरन सिंह तोमर के नाम पुकार रहे थे उनका गवाह में ही 'बंशीबारो-बासुदेव-श्रीकृष्ण हु।"
गवाही दी जाती हे न्यायाधीश और मुंशी मात्र किसी अदृश्य शक्ति के कारण मन्त्रमुग्ध से मात्र श्रोता हे और फैसला ७बीघे जमीन सोवरन सिंह के नाम लिख देते हे ।
कुछ अंतराल बाद सोवरन सिंह अनमने भाव से दरवान से पूछते हे की भैया मेरा नाम निकल तो नहीं गया !मुझे बिलम्ब हो गया आने में ..।
दरवान कहता हे सोवरन सिंह तोमर तुम्हारा ही नाम हे न तो ये लीजिये आदेश आपकी गवाही हो चुकी हे और आपके गवाह अभी-अभी वृन्दावन परिक्रमा को जाने की कहकर ये पत्र मुझे आपको देने की बोल गए हे ।
सोवरन जी पत्र देखा और आँखों से अश्रुधार बह निकली "वाह बंशीबारे तू मेरे साथ भी था और गवाही भी दे गया..!",में सामान्य गवारिया समझता रहा तुझे तू तो वास्तविक 'बंशीबारो' निकला.......!!
                ------------------

आज भी सोवरणसिंह जी नगेपांव सिर्फ पदयात्रा करते हे।और बंशीबारे बाबा के नाम से पहिचाने जाते उनके वास्तबिक नाम से सम्भवतः ५%लोग ही परिचित हे।उनकी जीवन शैली भी अद्भुत हे बिलकुल विरक्तो की तरह न तन का होश न मन का उन्हें खोज हे तो सिर्फ 'बंशीबारे की' .........🙏🚩🙏
बोलिये भक्त बतसल भगवान बंशीबारे श्रीकृष्ण जी की जय !!

                 जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
                   वृजभूमि तंवरघार चम्बल

शनिवार, 8 सितंबर 2018

अनुभव

#अनुभव                  (कहानी)
‘‘पिया- पिया,’’ पापा की आवाज सुनकर पिया की निन्द्रा टूटी।‘‘जी पापा’’ कहती हुई वह सीढ़ियाँ उतरने लगी, किन्तु विचारों की माला अभी भी उसके मन में बनती-उधड़ती जा रही थी।
सुबह ही तो उसके ससुर से उसकी तीखी बहस हुई थी, ‘‘अरे ये बुज़ुर्ग हमारे युवा दृष्टिकोण को समझते ही नहीं, सिर्फ सुनते हैं और नकार देते हैं।
‘‘ पिया की मित्र फोन पर उसे कहती है कि तू तो अपनी बात पर अटल रह, ये तो बुज़ुर्ग हो चले हैं व इनका समय गुज़र गया है अब तो हर व्यवस्था नयी है।

पिया एक संयुक्त परिवार से शादी होकर एक ऐसे घर में आई जिसमें केवल वो, उसके पति, देवर व उसके ससुर थे। सास को गुज़रे बरसों हो चले थे। बरसों बाद जब बहू की चूड़ी घर में छनकी तो सुख की हँसी हर ओर बिखरने लगी।
ससुर का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था, वे अति उच्च पद से सेवानिवृत हुए थे तथा सम्पूर्ण परिवार के एकछत्र स्वामी थे।
परिवार में आई बहू से अब उनका परिवार एक बार फिर पूर्ण हुआ है इस बात से वह अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु जब से पिया ने अपने पति के साथ आपसी मुद्दों पर स्वयं निर्णय लेना शुरू किया तब से उसके ससुर दुःखी रहने लगे।

पिया और उसके पति को उनके ख़राब मूड में उनकी उदासी साफ़ दिख रही थी, किन्तु बात कैसे छेड़ी जाये यह समझ नहीं आ रहा था। एक दिन पिया ने निर्णय लिया कि वे अपने ससुर से उनके ख़राब मूड का कारण पूछेगी, क्योंकि एक पिया ही थी जिससे उसके ससुर हर बात बाँटते थे।
‘‘पापा, आपको क्या कोई बात परेशान कर रही है?’’पिया ने जब सोफे पर बैठते हुए पूछा तो ससुर नेअपना झुका सर ना में हिला दिया। मगर दो मिनट के मौनके बाद अचानक बोले - ‘‘बेटा, हम लोग अब बूढ़े हो गये हैं, ज़िन्दगी में बहुत दुःख देखा, बहुत सुख भी भोगा।
तुम्हारी सास के साथ ये परिवार बनाया और जब वे हमें बीच मझधार में छोड़कर ईश्वर के पास चली गई, तब हर सुख छोड़ अपने बच्चों को पाला और इस क़ाबिल किया आज वे समाज में प्रतिष्ठित हैं।
हमने तुम्हें अपने निर्णय स्वयं लेने के क़ाबिल बना दिया है किन्तु क्या हम इतनी अपेक्षा भी नहीं कर सकते कि किसी भी निर्णय को लेते समय हम बुज़ुर्गों से भी पूछ लिया करो?
’’पिया एक पल को तो चुप रह गई फिर अचानक बोली –"लेकिन पापा हमने आपको दो-तीन दिन पहले बताया तो थाना कि हम घर में पार्टी देने की सोच रहे हैं।"ससुर थोड़ा नाराज़ हो कर बोले – "हाँ जाते-जातेकह दिया था, हो सकता है पार्टी रखें। अरे भई, ऐसे हीपार्टी थोड़े ही ना हो जाती है। हमने हज़ारों पार्टियाँ दी हैं, हम जानते हैं इनविटेशन, तैयारी और कई ऐसे बिन्दु जो यदि छूट जायें तो एक मिनट में पार्टी ख़त्म हो जाती है।
"पिया तुनक कर बोली – "अब आपके ज़माने गये पापा,अब तो हर चीज़ के लिए ‘‘प्लैनर’’ होते हैं जो सब काम कर देते हैं।"यह सुनकर ससुर अचानक गुस्सा हो गये – "क्या मतलब है हमारे ज़माने गये का, हम बूढ़े हो गये तो क्या ख़त्म हो गये?"पिया भी गुस्से से बोली – "पापा, आप तो समझ हीनहीं रहे हैं, हम अब बच्चे नहीं रहे जो आपकी अंगुलीपकड़ कर हर निर्णय लें।"यह कहकर पिया पैर पटकती अपने कमरे में बजते अपनी फ्रेंड का फोन उठाने चल पड़ी और उसे सारी राम कहानी सुनाई।
तभी छत से उसके पति नीचे आये और पूछा क्या बातहो रही थी दोनों ससुर-बहू के बीच। पिया ने सारी बातपति को बताई। पति मुस्कुराते हुए बात सुनने लगे। कहते-कहते पिया को अहसास होने लगा कि वो अपने ससुर से वैसे ही बात करके आई है जैसे एक विद्रोही नव युवा अपनी स्वतंत्रता पर लगाम लगाने पर करता है औरयदि उसके अपने बच्चे बीस साल बाद उससे ऐसे बात करें तो उसे कैसा लगेगा?यह प्रश्न मन में कौंधते ही उसे ऐसा लगा मानो वह अपने ससुर के स्थान पर बैठी हो और उसका पुत्र उससे कह रहा हो – "माँ, अब आपका ज़माना तो गया, अब हमबच्चे नहीं रहे जो हर निर्णय आपकी अंगुली पकड़ कर करेगें।"पिया की आँखों में ग्लानी के आँसू आये और रुक गये। वह फौरन उठी और सर झुकाये अपने ससुर से बच्चों की तरह बोली - ‘‘क्या पापा, आप भी छोटे बच्चे की तरह रूठ जाते हो। आई एम सॉरी, पापा।"यह कह कर उसने अपने ससुर के कांपते हाथ पर अपना हाथ रखा।
ससुर की आँखों से आँसू बहने लगे, किन्तु रूठे बच्चे की तरह हँसते हुए बोले, ‘‘तू यूँ मुझे ना मना। मुझे पता है, अब हमारा ज़माना बीत गया है, मगर बेटा, हमारे पास सीखों का वो खज़ाना है जो हज़ारों दुःख, ठोकरें और धोखे खा कर हमने जमा किया है। हम नहीं चाहते तुम उनसे गुज़रो, तुम सब बहुत निपुण हो, गुणी हो, हमें तुम पर पूरा विश्वास है किन्तु जब हालात ऐसे बने कि रास्ते समझ ना आये तो हमारे इस खज़ाने से एक सीख का दीपक जला लेना और याद रहे तो हमारे लिए दुआ देना।
"पिया की आँखो से आँसू झरने लगे।सच ही तो है कल उसे भी तो उम्र के इसी पायदान पर आ खड़ा होना है और यदि आज उसने अपने बुज़ुर्गों कासम्मान नहीं किया, उनके सम्पूर्ण उम्र में इकठ्ठे किये अनुभवों के खज़ाने को नहीं आत्मसात् किया तो एक दिन समयचक्र फिर से घूमेगा और ऐसा ना हो कि उसकेबच्चे उसे यहीं खड़े होकर कहें कि - आपका ज़माना बीत गया है।
नहीं, पिया ख़ुश थी कि उसने समयचक्र को एक सकारात्मक दिशा दी है क्योंकि उसके बच्चे पापा से पूछ रहे थे कि - दादा मम्मी को बहुत प्यार करते हैंना?

रविवार, 8 अप्रैल 2018

चम्बल एक सिंह अवलोकन-भाग१७(द्वितीय)

    ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
               भाग-१७ (द्वितीय)
           ¶डाकू अमृतलाल किरार¶
1944 में यूपी पुलिस ने अमृतलाल को पकड़ने के लिए कमर कस ली। उसके गैंग के लोगो की निशानदेही की जाने लगी। लेकिन इससे बेपरवाह अमृतलाल ने कई डकैतियां डाली और फिर छिपने के लिए वापस शिवपुरी के जंगलों की पनाह ली। जंगलों में रहते रहते अमृतलाल ने शिवपुरी पर अपनी निगाह गड़ाई और एक के बाद एक लूट और डकैतियां इलाके में डालने लगा। धीरे -धीरे अमृतलाल के गैंग का नाम,उत्तरप्रदेश के ईटावा, मैनपुरी, मध्यप्रदेश में शिवपुरी, गुना, मुरैना और ग्वालियर तो राजस्थान में सवाईमाधोपुर की पुलिस फाईलों में दर्ज होने लगा। 
पुलिस अमृतलाल के पीछे थी और बेपरवाह अमृतलाल शहरों में आराम से घूमता था। इसी बीच 1946 में आगरा शहर में अमृतलाल अवैध असलहे के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पहचान होने पर अमृतलाल पर डकैती के मुकदमों की झड़ी लग गई और 18साल की कड़ी सजा सुनाई गई। अमृतलाल पर अलग अलग शहरों में डकैतियों के चार्ज थे लिहाजा पुलिस उसको लेकर अलग-अलग शहर जाती थी। ऐसी ही एक पेशी शिवपुरी में भी हुई। और फिर कोलारस के थाने की हिरासत से अमृतलाल भागने में कामयाब हो गया।  इस बार भी अमृतलाल अकेला नहीं गया। अपने गैंग के दो डाकुओं माता प्रसाद और साधुराम को तो साथ ले गया उसके साथ-साथ तीन दूसरे कैदियों को भी साथ लेकर निकल भागा। 
दो साल तक अमृतलाल ने फिर पूरे इलाके में ताबड़तोड़ वारदात की। और एक दिन ग्वालियर शहर की पुलिस के हत्थे च़ढ़ गया। अवैध हथियारों के साथ गिरफ्तार अमृतलाल को सजा काटने के लिए जेल भेज दिया गया। लेकिन अमृतलाल ने तो जैसे जेल की दीवारों को खिलौना मान रखा था। 1949 में एक दिन अमृतलाल यहां से भी हैरतअंगेज तरीके से फरार हो गया। 
ग्वालियर से फरार होने के बाद अमृतलाल एक दम से बदल गया। गैंग ने बेगुनाह लोगो को मारना और जिंदा जलाना भी शुरू कर दिया। 1950 में मैनपुरी जिले के एक गांव में पांच लोगों को डकैती के दौरान जिंदा जला दिया। एक के बाद एक डकैती। चंबल के बीहड़ों के बाहर अमृतलाल का नाम दहशत का नाम बन रहा था लेकिन चंबल के बीहड़ों के अंदर अमृतलाल का नाम एक दूसरी वजह से बिगड़ रहा था। अमृतलाल की अय्याशियां उसके गैंग के लोगो की निगाह में भी चढ़ने लगी थी।
चंबल के डकैतों ने अपने कुछ उसूल बनाएं हुए थे जिनको वो आसानी से या फिर लोगो की नजरों के सामने कभी तोड़ना नहीं चाहते थे। और सबसे पहला उसूल था कि गैंग के सदस्यों के परिवार पर कोई बुरी नजर नहीं रखेगा। लेकिन अमृतलाल की अय्याशियों ने सारे बीहड़ के सारे उसूलों को धता बता दी। अपने ही गैंग के जेल गए हुए सदस्यों के परिवार की महिलाओं के साथ अमृतलाल अवैध रिश्ते बनाने लगा। 
इसके साथ साथ जिन लोगो ने भी अमृतलाल की हथियार खरीदने या छिपने में मदद की उनके परिवार की औरतों की ईज्जत के साथ भी अमृतलाल हथियारों के दम पर खेलने लगा था। इसी बीच एक डकैती के दौरान अमृतलाल को गोली लग गई। लेकिन अमृतलाल को गोली से भी ज्यादा चोट इस बात से लगी कि ये गोली उसी के गैंग मेंबर जयश्रीरमान ने उसको निशाना बना कर चलाई थी। गैंग में दरार पड़ चुकी थी। जय के साथ गैंग के कई लोग हो गये थे जो अमृतलाल की अय्याशियों से नाराज थे। अमृतलाल अपने समर्थकों को साथ लेकर वहां से निकला और इसी के साथ उसने फिर कभी किसी यूपी के आदमी को अपने गैंग में न रखने की कसम खाई। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक अमृतलाल ने इसके बाद यूपी के इलाकों में कभी कोई वारदात नहीं की और पूरी तरह से अपना ऑपरेशन मध्यप्रदेश और राजस्थान को को ही बना लिया।
अमृतलाल की अय्याशियां पूरे चंबल में सुर्खियां बटोर रही थी। दारू और औरत अमृतलाल की कमजोरी कही जाने लगी। लेकिन अमृतलाल अपने दिमाग की मदद से फिर से बड़ा गैंग खड़ा करने में कामयाब हो चुका था। फिर से चंबल के इलाकों में अमृतलाल का सिक्का चल रहा था। डकैतियों में होने वाली फायरिंग और पुलिस मुठभेड़ से बचने का रास्ता निकाल चुका अमृतलाल अब पकड़ का मास्टर बन चुका था। कही से भी कही भी अमृतलाल आ सकता था और पकड़ को दिन दहाड़े ले जा सकता था। और पकड़ को इस तरह से रखता था कि पुलिस चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।
शिवपुरी, गुना, मुरैना और ग्वालियर के जाने कितने गांवों में अमृतलाल ने लूट और डकैतियां डाली। लेकिन पकड़ करने के बाद उसने इसी को अपना मुख्य औजार बना लिया। एक दो के बजाया कई बार तो वो आदमियों को झुंड के तौर पर जंगल में ले जाकर बंधक बना लेता था और जबतक एक मोटी रकम हासिल नहीं होती थी वो किसी को नहीं छोड़ता था। एक ऐसी ही वारदात में शिवपुरी शहर के एक प्रसिद्ध मंदिर में पूजा करने गए चालीस लोगो में से 26 लोगो का अपहरण करके वो पालपुर के जंगलों में दाखिल हो गया। एक दो दस दिन नहीं  बल्कि महीनों तक पुलिस उनको छुड़ाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाती रही लेकिन अमृतलाल के शिकंजे से किसी भी पकड़ को बिना फिरौती रिहा नहीं करा पाई। पकड़ रिहा हुई और शिवपुरी पहुंची तो पुलिस के होश ठिकाने नहीं रहे जब किसी भी पकड़ ने अपने अपहरण से ही इंकार कर दिया। 
अमृतलाल का नाम शिवपुरी के जंगलों में एक खौंफ बन चुका था। पुलिस के हाथ पैर बंधे हुए थे। दुसस्साहसी अमृतलाल हर बार पहले  से अलग कारनाम कर पुलिस को चौंका दिया करता था। शहर के सेठ को लूटने से पहले सेठ जी के पैर छूं कर आशीर्वाद लेने की बात हो या फिर उमरी के राजा की गढ़ी लूटने का कारनामा। हर बार अमृतलाल के किस्से लोगो की जुबां पर चढ़ जाते थे। 

अमृतलाल का हौंसला आसमान पर था और पुलिस को कुछ सूझ नहीं रहा थ। इसी बीच एक दिन अमृतलाल जा धमका राजस्थान के बारा जिले में। वहां के एक थाने कस्बां में दिनदहाड़े जा धमके अमृतलाल ने थाने के हथियार और गोलियों लूटी और आराम से चलता बना।  1954 में एक और थाने बैराड़ जा पहुंचा लेकिन पुलिस समय से चेत गई और अमृतलाल गैंग को भारी गोली बारी का सामना करना पड़ा। अमृतलाल थाने को लूटे बिना ही वापस हो गया। लेकिन इन घटनाओं ने पूरे चंबल में अमृतलाल को और भी कुख्यात कर दिया। अमृतलाल गैंग नंबर तीन बन चुका था। पुलिस चार्ट में पहले नंबर में रूपा पंडित यानि मानसिंह के बाद उसके गैंग का मुखिया दूसरे पर लाखन तो तीसरे पर  जी 3 के नाम पर अमृतलाल का नाम दर्ज हो चुका था। पुलिस शिवपुरी के जंगलों में माथा पकड़ रही थी लेकिन अमृतलाल अपनी अय्याशियों में आराम से मशगूल था। हर गांव में अपने लिए एक औरत का इंतजाम करने वाले अमृतलाल की रात अय्याशियों में ही कटती थी।  
पुलिस रिकार्ड में दर्ज दर्जनों औरतों के नाम और पते आज भी अमृतलाल की अय्याशियों का पता देते है। ये रिकॉर्ड़ उन महिलाओं के नाम पर रखा गया जिनके गहरे रिश्ते अमृतलाल के साथ थे। 
अमृतलाल की तलाश में पुलिस जमीन-आसमान एक किए हुए थी। पौहरी थाने में नए इंचार्ज लाए गए। लेकिन अमृतलाल की अपराध कथा में पन्ने जुड़ते जा रहे थे। मध्यप्रदेश 1956 में नया राज्य बना था तो पुलिस ने चंबल को डकैतों से मुक्त करने के नाम पर एक बड़ा अभियान शुरू किया। शिवपुरी और गुना के जंगलों का खार बन चुके अमृतलाल पुलिस के पहले निशानों में से था। लेकिन बेपरवाह अमृतलाल ने मुरैना जिले में पाली घाट के पास शादी के लिए जा रही एक पूरी बारात को ही लूट लिया और चालीस हजार रूपए की रकम हासिल की। बारात से एक आदमी का अपहरण कर उसको जंगल में अपने साथ ले गया बाद में 60,000 की रकम हासिल करने के बाद ही उसको छोड़ा। पुलिस की नाक दम बन चुके अमृतलाल अपने 25 आदमियों के गैंग के साथ धामर में एक बडे़ ठाकुर के घर डकैती डाली और लाखों रूपए के साथ हथियार भी लूट कर ले गया। लूट के साथ ही दो लोगो को भी पकड़ के तौर पर अपने साथ ले गया। 
इसके बाद उसने राजमार्गों पर ही गाड़ियां रोक कर पकड़ बनाना शुरू कर दिया। ग्वालियर के राष्ट्रीय राजमार्ग से दिन दहाड़े दो बड़े व्यापारियों का अपहरण किया और उनसे फिरौती वसूल कर ली। सुर्खियों में बढ़ते जा रहे अमृतलाल ने एक नया धंधा और शुरू कर दिया था. और वो था इलाके ठेकेदारों से चौथ वसूली का ।
शिवपुरी और गुना के जंगलों में तेंदुपत्ता का हर ठेकेदार उसको वसूली दिया करता था। कोई भी ठेकेदार बिना अमृतलाल को चौथ दिए अपना काम नहीं कर सकता था। 
अमृतलाल के पास इतना पैसा हो गया था कि वो इसको ब्याज पर देने का काम भी करने लगा। इलाके के बडे सेठ उससे  ब्याज पर पैसा लेने लगे। चंबल में एक किस्सा ये भी है कि चंबल के सबसे बड़े कातिल माने जाने वाले लाखन सिंह को भी उसने पचास हजार रूपया उधार दिया था। अमृतलाल ने पैसे के दम पर इलाके में पुलिस से बड़ा मुखबिर तंत्र खड़ा कर लिया था। और उन पर अमृतलाल पानी की तरह से पैसा बहाता था। पूर्व पुलिस प्रमुख के एफ रूस्तमजी ने इस बारे में लिखा कि पचास के दशक के शुरूआत में एक नाई के हेयरकट से खुश होकर अमृतलाल ने उसको100 रूपए का नोट ईनाम में दिया था। इतना ही नहीं एक मुखबिर ने दस मील साईकिल पर आकर पुलिस के बारे में खबर दी तो अमृतलाल ने उसको 1000रूपया दिया। 
लेकिन उसकी अय्याशियां उसके खिलाफ जा रही थी। वो अब अपने ही इलाके लोगो को अपना दुश्मन मानने लगा था। औरतों को लेकर उसके लफड़े फैलने लगे थे। अपनी अय्याशियों और शराब की लत ने उसकी समझदारी को हवा कर दिया था. ऐसी ही एक वारदात में वो अपने ही रिश्तेदारों के गांव में जा चढ़ा।
गांव में कई लोगो को मौत के घाट उतारने वाले अमृतलाल को अपने दुश्मन का कुलनाश करना एक खेल लगता था। दुश्मनों का नामों-निशान मिटा देना। और इसी सनक में वो पुलिस थाने को ही उडाऩे चल दिया। 
शिवपुरी पुलिस अधीक्षक चुन्नीलाल ने अमृतलाल को पकड़ने की जोरदार कोशिश शुरू की। इसके लिए इलाके को अच्छे से समझने वाले लहरी सिंह को पौहरी थाने का इंचार्ज बनाया गया। लहरी सिंह ने अमृतलाल के परिजनों पर शिकंजा कसा। लहरी सिंह ने कसम खाई कि वो अमृतलाल को जिंदा पकड़ कर उसको पांच जूते सरेआम लगाएंगे। 
अमृतलाल को ये बात पता चल चुकी थी। उसने भी बदला लेने की ठान ली। लहरी सिंह और अमृतलाल एक दूसरे को मात देने के लिए चाल चलने लगे। लहरी सिंह की धार्मिक आस्था को इस्तेमाल कर उनको मौत के घाट उतारने के लिए अमृतलाल ने कई बार पांसे फेंके।
तो लहरी सिंह भी रोज अमृतलाल के गांव में जाकर उसके परिजनों का सरेआम बेईज्जत करने लगे। अमृतलाल अपनी मां को बहुत मानता था। एक दिन पुलिस अधीक्षक चुन्नीलाल और लहरी सिंह ने अमृतलाल की मां के साथ गेस्टहाउस में थोड़़ी सी सख्ती बरती तो ये खबर अमृतलाल को बर्दाश्त नहीं हुई। अमृतलाल को गुस्से में ये भी ख्याल नहीं रहा कि पुलिस से सीधे शहर में जाकर टकराना मौत से टकराने जैसा है। उसको धुन सवार हो गई कि चुन्नीलाल और लहरी सिंह को ठिकाने लगाना है। और तभी उसको पता चला कि चुन्नीलाल कोलारस थाने पर निरीक्षण करने जाने वाले है। बस इतनी खबर अमृतलाल के लिए बहुत थी और फिर वो जा धमका कोलारस थाना। 
पुलिस थाने में घुसे अमृतलाल ने एक दीवान और सिपाही का कत्ल कर दिया। थाना लूट लिया और बंदूकों को उठा कर चलता बना। लेकिन चुन्नीलाल और लहरीसिंह किस्मत के चलते बच गए। क्योंकि कुछ देर पहले ही वो पुलिस लाईँस जा चुके थे। 
इस घटना ने पूरे प्रदेश में बवाल खड़़ा कर दिया। एक डकैत दिन दहाडे थाना लूट रहा है और सीधे एसपी को मारने के लिए शहर में जा धमकता है। प्रदेश सरकार ने अपना ऑपरेशन कड़ा करने के लिए कहा। लेकिन अमृतलाल तो इस वारदात के बाद बीहड़ों के पत्थरों में गुम हो चुका था। पुलिस के पास न कोई मुखबिर था और न ही कोई पता । आखिर पत्थरों में खोजे तो किसको। लेकिन तभी लहरी सिंह और पुलिस को एक पत्थर में पारस दिखा। एक ऐसा पारस जो किसी लोहे को सोना नहीं बनाता बल्कि एक हैवान बने इंसान से इलाके को छुटकारा दिला सकता है। 
लहरी सिंह का रात दिन सिर्फ अमृतलाल की या फिर उसकी खबर की खोज में ही कट रहा था। हर तरफ मुखबिर लगे हुए थे। लेकिन कही से ऐसी खबर नहीं आ रही थी जो पुलिस को अमृतलाल तक पहुंचा सके। लहरी सिंह अमृतलाल की किलेबंदी में दरार खोज रहे थे कि उनको पता चला कि एक बद्री किरार नाम का लड़का है।   जिसका जीजा कभी अमृतलाल के गैंग में रहा है। और कुछ कहानी का सिरा भी लहरी सिंह को पता चला।  बीस हजार का ईनामी डाकू जिंदा या मुर्दा किसतरह  से कानून के हाथ आ सकता है ये योजना लहरी सिंह के दिमाग में उतर गई।
बद्री किरार की बहन पर अमृतलाल की बुरी नजर थी। बद्री का रथी किरार भी अमृतलाल गैंग का एक्टिव मैंबर था और उसकी मौत हो गई थी। अमृतलाल की नजर उसकी पत्नी नारायणी पर थी। उसको हासिल करने के लिए वो बद्री पर दबाव बनाए हुए था। लाचार बद्री परिवार बचाने के लिए उसके सामने झुकने को तैयार था कि लहरी सिंह उसतक पहुंच  गए।
बद्री किरार के बारे में कई कहानियां पुलिस की फाईलो में दर्ज है। लेकिन उस वक्त के इंचार्ज लहरी सिंह बता रहे है कि किस तरह से उसको ट्रैनिंग दी गई और कैसे उसको कोड़ भी बताया गया। उसके साथ तिवारी जी कोलारस के इंचार्ज थे वो भी  पुलिस के इस सबसे अहम ऑपरेशन को करीब से देख रहे थे।
बद्री को गैंग में एक मैंबर के तौर पर भेजा गया। उस वक्त तक अमृतलाल शराब और अपनी अय्याशियों के चलते गैंग में ही काफी बदनाम हो चुका था। और उसके बुरे दिन शुरू हो चुके थे। लगभग दो दशक से पुलिस की निगाहों से दूर और हर मुठभेड़ में साफ बच निकलने वाले अमृतलाल को लगने लगा था कि पुलिस की गोली और उसके सीने के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है। शक्की मिजाज अमृतलाल बेरहम भी हो उठा। युद्दानगर और नवलपुरा की दो मुठभेड़ों में उसको बेहद नुकसान उठाना पड़ा। उसको अपने ही गैंग मेंबर दौलतरसिंह के भाई मंगलसिंह पर संदेह हुआ। मंगलसिंह को गैंग से निकाल दिया गया था। गुस्से से भरे अमृतलाल ने अपने वफादार दौलत सिंह को तड़पा तड़पा कर कत्ल किया। कत्ल के दिन गैंग में फूट पड़ गई। और अमृतलाल के दो बाजू सुल्तान सिंह और देवीलाल शिकारी गैंग से टूटकर चले गए थे।
अमृतलाल ने अपने गैंग में बहनोई मोतीराम को शामिल किया। मोतीराम को एक केस में सजा होनी थी तो अमृतलाल ने उसके दुश्मनों को बेरहमी से कत्ल कर दिया। मोतीराम भी बद्री की बहन पर नजर रखे था। इसके बाद दोनो ही बद्री किरार को परेशान किये हुए थे। इसी बीच बद्री पुलिस के साथ मिल कर दोनों का गेम बजाने का प्लान तैयार कर चुका था। 
बद्री गैंग में शामिल हो गया लेकिन उसने लहरी सिंह के प्लॉन के मुताबिक ये जाहिर नहीं होने दिया कि वो किसी भी हथियार को चलाना जानता है। जब भी उसको कोई हथियार लेने के लिए कहा जाता वो कह देता कि नहीं उसको तो लाठी ही पसंद है। और फिर एक दिन जब अमृतलाल ने उसको कहा कि आज रात उसको बद्री की बहन के साथ गुजारना है। बद्री महीनों से इस दिन को टाल रहा था लेकिन अय्याश अमृतलाल ने उसको विवश कर दिया कि वो अपनी बहन को आज अमृतलाल को सौंप दे। बद्री ने कहा कि गोपालपुर में उसकी बहन आज की रात रहेंगी।
पूरा गैंग गोपालपुर की ओर चल दिया। रास्ते में अमृतलाल ने बद्री पर खुश होकर उसको शिवपुरी के डीएम का वो पर्चा भी दिखाया जिस पर अमृतलाल के सिर पर बीस हजार रूपए के इनाम की घोषणा लिखी हुई थी। बद्री का इरादा पक्का हो चुका था बस मौके की तलाश थी।
18 अगस्त 1959। मुंह अंधेरे से चला हुआ गैंग चलते चलते थक चुका था। भरी दोपहर में गोपालपुर से कुछ दूर पहले ही महुवा के पेड़ों के नीचे गैंग ने आराम करने का तय किया। मोतीराम और अमृतलाल दोनो खुश थे। गैंग के लोगो के लिए पास के गांव से बकरा लाकर काटा गया और शराब का लंबा दौर चला। खाने के बाद गैंग मेंबर तालाब के किनारे सो गए। बीच में अमृतलाल और मोतीराम सो गए और उनके पास बद्री किरार बैठ गया। बद्री ने जानबूझकर खाना नहीं खाया था। तबीयत खराब होने का बहाना किए हुए बद्री को पहली बार अमृतलाल ने अपनी राईफल थमा दी। शायद ये अमृतलाल की पहली और आखिरी भूल थी। 
 कुछ देर बाद जब गैंग के लोग सो गए तो बद्री ने सबकी राईफले और बंदूके उठाकर तालाब में फेंक दी और अमृतलाल की राईफल से उसको सटाकर एक गोली चला दी। चंबल में चली लाखों गोलियों में से सबसे कीमती गोली। एक ही गोली अमृतलाल को चीरते हुए मोतीलाल के सीने में धंस गई। एक गोली दो शिकार। चंबल के इतिहास में किसी डाकू का अपनी ही गोली से ऐसा अंत इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। 
गोली की आवाज से उठे गैंग के मेंबर जैसे ही आगे बड़े । बद्री ने गोलियों की बौंछार कर दी। निहत्थे गैंग के सदस्य जान बचा कर जंगल की ओर भागे। बद्री ने मोती की राईफल भी उठाई और दोनो राईफलों को टांग कर गोपाल पुर जा धमका। थाने में जाकर लहरी सिंह को कोड वर्ड में सदेंश भेजने की गुहार की। काली गाय मिल गई।
थानेदार गजाधर सिंह ने भगा दिया लेकिन जल्दी ही उनको शक हुआ तो फौरन बद्री को बुलाया गया और बद्री उनको लेकर पुलिस पार्टी के साथ मौका ए वारदात पर पहुंच गया। मौके पर दो लाशे थी जिसमें से एक लाश पच्चीस साल से चंबल के सीने में धसें हुए कांटे यानि अमृतलाल की थी।  पुलिस प्रमुख के एफ रूस्तम जी ने पत्रकारों को कहा कि ये एक चालाक लोमडी़ का अंत है। एंड ऑफ ए क्लेवर फॉक्स। और अमृतलाल की मोटी फाईल में आखिरी शब्द दर्ज हो गए। 

विशेष:-प्रस्तुत लेख सूत्र पूर्व पुलिस अधिकारी के ऍफ़ रुस्तम जी की डायरी से संकलित व सन्दर्भित ।

                     जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से"

              

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...