शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

★चम्बल एक सिंह अबलोकन★भाग १५

          ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                            भाग-१५
                     ◆डाकू गब्बर सिंह★
सुनहरे पर्दे का 'शोले'बाला गब्बर सिंह ...........! जी हा ..
वही गब्बर सिंह जो ६०के दशक में फ़िल्मी दुनिया के रुपहले पर्दे पर नमूदार हुआ।कारतूसों से भरा हुआ बिलडोरिया चट्टानी टुकड़ो पर घसीटता हुआ।तम्बाकू से पीले दांत, झाड़-झकाड दाढ़ी चेहरे पर क्रूरता और सांभा से पूछता हे "अरे ओ सांभा कितने आदमी थे?
"सरदार दो" डरकर जबाब देता हुआ सांभा तलबे से मुंडी तक काँप रहा हे।
ये फ़िल्मी दुनिया का गब्बर असल में वास्तविक दुनिया के गब्बर के सामने १०प्रतिशत भी नहीं था।असल गब्बर को ओ सनक थी लोगो को नकटे-बूचे करके मारने की।
आज की पूरी श्रंखला में आपने पढ़ा होगा की चम्बल के बागियों ने अत्याचारो,जबदस्ती छीनती जमीनों या बदला लेने के लिए बन्दूक से मुहब्बत की थी और मर्यादा मे रहकर बागी कहलाये।किन्तु आज आपको एक ऐसे दुर्दांत,आदमखोर,सनकी डाकू से मिलवाते हे जिसने मात्र दौलत ओर कुख्याति के लिए सेकड़ो नाक काटी तो तीन सेकडे से ज्यादा हत्याए भी की और पौराणिक कथाओ के डाकू अंगुलिमाल को चुनोती देता किरदार निभाया तो आइये शब्दों की समय अभियांत्रिकी के माध्यम से चलते हे।72 वर्ष पूर्व के दुर्दांत पलो में।

जीं हां शोले का गब्बर नकली गब्बर है। क्योंकि सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाला किरदार एक असली डाकू गब्बर सिंह की कॉपी भर है। ऐसा डाकू जिसकी कहानी ने हिंदी फिल्म जगत में शोले भर दिये। 
फिल्म के खत्म होते ही खौंफ की निशानियां भी खत्म हो जाती है। लेकिन असली गब्बर के आतंक के निशान आज भी चंबल के बीहड़ों में बसे हुए गांवों में मिल जाते है। छिनसरेठा गांव। चंबल के बीहड़ों में बसे हुए सैकड़ों गांवों में से एक है।  गब्बरसिंह की कहानी तो लगभग छह दशक पहले ही खत्म हो चुकी है लेकिन उस कहानी का खौंफ आज तक इस गांव के बूढ़ें ढो रहे हे।
71 साल एक ऐसी जिंदगी जीना सिर्फ वही जान सकता है जिसके साथ गुजरी हो।लेकिन  ये अकेला फिरे लाल नहीं है। चंबल के दर्जनों गांव चबंल के गब्बर के आतंक की कहानी को आज भी सीने में छिपाएं हुए फिरते है। अजनबी ने गब्बर का नाम लिया नहीं कि पुराने घाव रिसने लगते है।
लेकिन ये बाते भी शायद आपको कहानी लगे तो फिर आप ये जान लीजिए कि हिंदुस्तान के सबसे सफल पुलिस अधिकारियों में से एक के एफ रूस्तमजी ने गब्बर के मरने की खबर को हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उनके सत्तरवें जन्मदिन पर  मध्यप्रदेश पुलिस की ओर से  सबसे बड़े तोहफे के तौर पर पेश किया था। 
गब्बर का शौंक सिर्फ मौत बांटना और बेगुनाह लोगो की नाक काटना था। इलाके में गब्बर से पहले भी बहुत डाकू हुए और गब्बर के  बाद भी चंबल में डाकुओं का पैदा होना जारी रहा लेकिन चंबल का सबसे बड़ा खौंफ और आतंक सिर्फ गब्बर के नाम रहा। ऐसा नाम कि हिंदी फिल्मों में भी उसका नाम देखने वालों की रीढ़ में पानी ला देता था। चंबल में जब गब्बर की कहानी खत्म हुई तब तक गब्बर खून और लाशों की ऐसी इबारत लिख गया कि उसके मरने के दशकों बाद भी लोग उसके नाम से कांप जाते है। इस बार असली गब्बर की कहानी। 

चंबल। दूर तक फैले बीहड़ों में भिंड शहर। चंबल में डाकुओं के ज्यादातर किस्सों में भिंड बार बार घूम कर आता है। इसी के गोहद थाने से कुछ किलोमीटर दूर चलने के बाद ही आपको एक सड़क डांग ले जाती है। ऊबड़-खाबड़ सड़क जैसे गांव का मिजाज का पता बता देती हो। इसी गांव में एक घर तक आपको लिए चलते है। ये घर आपको चंबल के सबसे बड़े आतंक का पता देगा। आप घर पर तो है लेकिन घर की जगह अब कोई पत्थर भी नहीं बचा है। 
‌ये घर गब्बर सिंह का घर है। गुजरो के इस गांव में गब्बर का जन्म १९२६ में हुआ था। गब्बर के पिता के पास बेहद कम जमीन थी। गांव में कम जमीन आपके रूतबे को भी कम कर देती है। गब्बर का परिवार पेट पालने के लिए मजदूरी किया करता था। इलाके में आज भी पत्थर निकाला जा रहा है वैद्य या अवैद्य दोनो तरीके से। गब्बर का परिवार भी गांव में पत्थर ढोने का काम करता था। गब्बर शरीर से काफी मजबूत था। गांव में मजदूरी के साथ ही शाम को अखाड़े में जोर -आजमाईश करता था। और  शरीर की मजबूती के घमंड में गब्बर गांव वालों से एक से एक शर्त लगाया करता था और ऐसे ही शर्त के दौरान गब्बर की जिंदगी ने अपनी राह बदल ली। बचपन में गब्बर आवारा था। गांव में खेती-किसानी से उसे कोई मतलब नहीं था। लेकिन गब्बर के बाप के एक अपराध के बाद पंचायत ने खेती की जमीन ही छीन ली। इसके बाद आवारा गब्बर के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया। आप जानते ही हैं.. ऐसे लोगों का बांहें खोलकर स्वागत करने के लिए तैयार रहता था चंबल.. बस यहीं से शुरू हो गया गब्बर के चंबल का सफर। 
‌गब्बर ने गांव में रहने वाले रखीश्वरों से दुश्मनी में कत्ल कर दिए लेकिन गब्बर के डकैत बनने की कहानी पहले ही शुरू हो चुकी थी। दरअसल चंबल के 40 और पचास के दशक में डाकुओं का बड़ा आतंक था और इलाके में लोग डर से डाकुओं की इज्जत करते थे। इसी दौरान एक बार गब्बर अपने डाकू रिश्तेदारों से मिला। उनका रौब-दाब देखकर ही गब्बर को डाकू बनने की धुन सवार हो गई और जब वो गांव में लौटा तो बदला हुआ गब्बर था जो हर बात पर मौत बांटने की धमकी देने लगा। 
इसी बीच गब्बर के पिता रघुबीर को आपसी झगड़े में सजा हो गई और गांव में भी उसका हुक्का पानी बंद हो गया। तो गब्बर ने फैसला कर लिया कि वो अब इस ईलाके में ईज्ज्त हासिल करके ही दम लेगा। लेकिन ईज्जत हासिल करने का जो तरीका उसने चुना वो बेहद खतरनाक था और उसका रास्ता चंबल के बीहड़ों से जा मिला था। गब्बर ने एक दिन छोटी सी बात पर गांव में रखीश्वरों के परिवार वालों को गोलियों से भून दिया। डांग में अपने दुश्मनों का कत्ल कर गब्बर चंबल में कूद गया। पहली बार में दो लोग को मौत के घाट उतारने की खबर चंबल में पहुंच चुकी थी और उसको कल्याण सिंह गुर्जर के गैंग में एंट्री मिल गई। चंबल में कहावत थी कि कत्ल करने के बाद कोई मुखबिर नहीं रह जाता यानि पुलिस का आदमी होने का डर खत्म हो जाता है इसीलिए किसी गैंग में शामिल होने के लिए या होने के बाद कत्ल और लूट दोनो करने होते थे। सो गब्बर सिंह ने अपनी पहली बाधा आसानी से पार कर ली थी।

 गब्बर सिंह अपना खौंफ पैदा करने के लिए इलाके में लूट, डकैती, अपहरण और कत्ल की झड़ी लगा दी। चंबल में कूदने के कुछ दिनों बाद ही गब्बर के नाम का खौंफ का गुबार चंबल में चढ़ने लगा। मध्यप्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड में गब्बर का नाम लगभग हर रोज गूंजने लगा। एक  के बाद एक वारदात की कहानी चंबल में थाने दर थाने चलने लगी। गब्बर सिंह डकैत चंबल के उन चंद डकैतों में से एक था जिसे हालात ने नहीं बल्कि उसकी इच्छा ने डकैत बनाया था। लिहाजा गांव में नाम मात्र की दुश्मनी के बाद पहले अपने दुश्मनों के साथ मौत का खेल खेला और फिर गांव के दूसरे लोगो पर भी उसकी बंदूकें गरजने लगी। गब्बर को बेगुनाहों की मौत से खेलना अच्छा लगता था। और वो इस खेल में महारथ हासिल करना चाहता थाष लिहाजा कत्ल की एक झडी लगा दी। 

बात-बेबात पर कत्ल करने की गब्बर की आदत से गैंग में भी दुश्मनी हो गई। कुछ ही महीने में गब्बर ने अपने पांच -छह साथियों को लेकर अपने गैंग से नाता तोड़ लिया और एक नया गैंग बना लिया। लूट से हासिल पैसे के सहारे हथियार भी हासिल हो चुके थे लिहाजा गब्बर सिंह ने चंबल में अपने आपको चंबल का महाराज कहलाना शुरू कर दिया। हर वारदात के बाद उसका गैंग पीड़ितों से नारे लगवाता था चंबल महाराज की जय। भिंड, मुरैना, ग्वालियर, धौलपुर, इटावा और आसपास के इलाकों में गब्बर ने वारदात करना शुरू कर दिया। गैंग भी बढ़ने लगा। और इसके साथ ही बढ़ने लगा गब्बर का आतंक भी। 
चंबल में पचास का दशक बड़े गैंग के दशक का गैंग था। दर्जनों गैंग चंबल के इलाके में आम जनता की जिंदगी को नर्क बनाए हुए थे। ऐसे में गबरा उर्फ गब्बर एक नया बवाल बन कर पुलिस के सामने आ खड़ा हुआ। गब्बर ने अपने गैंग को एक मशीन में तब्दील कर दिया। मौत और लूट की मशीन। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक अक्तूबर 1956 से दिसंबर 1956 के तीन महीनों के बीच एक के बाद एक कत्ल और डकैती की झड़ी लगा दी। दर्जनों डकैतियां और कत्ल के मामले थानों में दर्ज हो गए। 
गब्बर गैंग ने दर्जनों कत्ल, डकैतियां, अपहरण और लूट की वारदात को अंजाम दिया।  तीनों राज्यों की पुलिस उसके पीछे लग चुकी थी। पुलिस के ऊपर इस नये लेकिन खतरनाक गैंग को खत्म करने का दबाव बढ़ रहा था। लेकिन गब्बर पुलिस से बेखौफ था। पुलिस रिक़ॉर्ड के मुताबिक गब्बर के गैंग के साथ उस वक्त कई मुठभेड़े हुई। लेकिन हर मुठभेड़ में पुलिस के जवान या तो घायल हुए या फिर उन्हें अपनी जिंदगी खोनी पड़ी। एक के बाद एक एनकाउंटर से बच निकलने ने चंबल में गब्बर का रूतबा और बढ़ा दिया। गब्बर का हौसला भी इससे बढ़ता जा रहा था। 
चंबल के दूसरे डकैतों की तरह से गब्बर भी देवी की पूजा करता था और इस मामले में काफी हद तक अंधविश्वासी था। चंबल के घने जंगलों में बने रतनगढ़ देवी के मंदिर में वो हफ्तों तक रहता और पूजा किया करता था। घने जंगलों में बेहद ऊंचाई पर बने हुए इस मंदिर तक पहुंचने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी और जब तक वो वहां पहुचंती थी गैंग फरार हो चुके होते थे। चंबल में गब्बर का नाम चलने लगा था। गांव के गांव उससे कांपने लगे थे। और डाकुओं की परंपरा के मुताबिक गब्बर ने ऐलान कर दिया कि वो मां शीतला देवी के मंदिर पर नगाड़ें चढ़ाने जाएंगा। 
मां शीतला देवी का ये मंदिर डाकुओं के लिए काफी श्रद्रा का केन्द्र रहा है। गब्बर सिंह ने जब इस मंदिर पर घंटा और नगाड़़ा चढ़ाने का ऐलान किया तो इलाके में सनसनी फैल चुकी थी। क्योंकि गब्बर हर बार इस तरह के ऐलान के बाद कुछ नई वारदात करता था। और फिर एक दिन पूरे गैंग के साथ गब्बर सिंह दिन दहाड़ें शीतला मां के मंदिर पहुंच गया।
शीतला देवी के मंदिर पर घंटा चढ़ाने की घोषणा पुलिस तक भी पहुंची थी लेकिन पुलिस जब तक गब्बर सिंह को घेरती गब्बर वहां से फुर्र हो चुका था। शीतला देवी के इस मंदिर में रखे नगाड़े आज भी ये बताते है कि गब्बर का हौंसला और खौंफ दोनो कितनी ऊंचाई पर पहुंचे हुए थे। शीतला देवी के इस मंदिर में और भी डाकुओं के सिर झुकाने की कई दूसरी चीजें भी है। मंदिर में चमकती हुई पीीतल के दियों की ये झालर चंबल की पहली महिला डकैत पुतलीबाई ने चढ़ाई थी।
शीतला के मंदिर पर सरेआम नगाड़े चढ़ाने वाला गब्बर अब कोई छोटा मोटा पुलिस फाईल का भगौड़ा नहीं बल्कि चंबल  में गब्बर सिंह नामी डकैत बन चुका था गब्बर की हवस सिर्फ नाम होने भर से खत्म नहीं होने वाली थी। गब्बर चाहता था कि सब डाकूओं से अलग उसका नाम किसी भी गांव में पहुंचते ही खौंफ की लहर बन जाएं। और तभी उसने एक नया फैंसला ले लिया एक ऐसा फैसला जिसने उसके खौंफ को चंबल की घाटी से बाहर तक फैला दिया। अब उसने फैसला किया कि वो शरीर के अंग काट कर मुखबिरों को सजा देंगा।
चंबल में गब्बर सिंह का नाम गूंज रहा था लेकिन गब्बर को तो और ही धुन थी। पुलिस के साथ एक के बाद एक एनकाउंटर में भले ही गब्बर अपने गैंग को साफ बचा कर ले जा रहा हो लेकिन उसका शक था कि गांव के लोग उसकी मुखबिरी करते है। और ये बात गब्बर को इतनी चुभी कि उसने सजा तय कर ली।
छिनरैठा गांव में एक दिन दहाड़ें गब्बर जा धमका। गांव के एक चौकीदार पर उसको शक था कि उसने पुलिस को मुखबिरी की है। गांव में पहुंच कर पहले चौकीदार को पकड़ा फिर उसके साथ एक और आदमी को और जब वो उनको गांव के बीच के कुएं पर ला रहा था तो रास्ते में बैठे दो दलितों को भी उसने पकड़ लिया। भरे गांव के बीच जो अब घरों में बंद खौंफजदा लोगो का श्मशान दिख रहा था उसने पहले तो लाठियों से पीट-पीट कर उन चारों का मरने हाल कर दिया। उसके बाद उसने कहा कि ला तेरी नाक देखता हूं कितनी बड़ी है और चार लोगों की नाक काट दी। नाक कटने की पीड़ा से बेहोश लोगो में से चौकीदार को गोलियों से भून कर गब्बर आराम से टहलता हुआ चल दिया। गांव के लोगो के घर तो खुल गए लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो उन लोगो को अस्पताल तक पहुंचा दे। कोई गब्बर के कहर को न्यौतना नहीं चाहता था। किसी तरह सुबह तक पुलिस तक खबर गई और पूरी पुलिस पार्टी वहां पहुंची और दर्द से तड़प रहे लोगो को किसी तरह से हॉस्पीटल लेकर पहुंची। आज भी फिरेलाल जिंदा है तो उसके लगी हुई ेये नाक सरकार ने लगाई है लेकिन किसी को भी ये आसानी से पता चल जाता है कि नाक को किस तरह से काटा गया था।
एक ही गांव में चार लोगो की नाक काटने की घटना ने जैसे पूरे इलाके को दहला कर रख दिया। इससे पहले ऐसी घटना यदा-कदा ही चंबल के बीहड़ों में सुनी जाती थी लेकिन एक साथ चार लोगो की नाक काटने ने तो पुलिस के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी। लेकिन गब्बर सिंह की वहशत तो इससे जाग गई।  और अब उसने छोटी सी घटना पर गांव वालों को सबक सिखाने का एक बेहतर तरीका भी मान लिया। किसी बात पर भी वो नाराज होता तो फिर गांव के गांव को सबक सिखाने लगता। गब्बर के शिकार लोगो की कहानियां आप उनके मुंह से सुन सकते है। और एक गांव में चौपाल पर बैठे हुए ये लोग जब अपनी आपबीती सुनाते है तो आपको शोले का वो सीन याद आ जाता है जब गब्बर का आदमी कालिया रामगढ के लोगो से कहता है कि गब्बर आप से क्या चाहता है सिर्फ थोड़ा सा अनाज और क्या। इस गांव के लोग उस कहानी से ज्यादा खौंफ आप को दिखा सकते है क्योंकि हकीकत में ये वो है जिन्होंने उस सीन को असली जिंदगी में जीेने वाले ये लोग किस तरह से अपनी कहानी कहते है।
अब आप इस गांव के बचे हुए लोगो की बात सुनलीजिए जिन्होंने असली गब्बर सिंह के कहर को सालों तक भुगता है।
गल्ला न देने पर नाक काट लिए और पूरे गांव पर जुर्माना किया। देशी घी, दूध,चावल और आटा। गांव में उस वक्त किसी किसी के घर इतना सामान होता था कि वो तीस आदमियों के गिरोह को इस तरह से खाना खिला दे। और एक दो बार देने के बाद जब गांव वालो ने एक बार कहा कि उनके पास कुछ नहीं है तो गब्बर सिंह ने अपना खौंफ दिखा दिया। पहले दो लोगो की गांव के बीचो-बीच नाक काट ली और उसके बाद बाकि गांव को लाठियों और बंदूकों की बटों से बेहोश होने तक पीटा। गांव वालों को माफी मिली तब जब उन्होंने सजा के बदले जुर्माना देने की हामी भरी।
जीं हां उस वक्त जब एक आदमी के एक दिन के काम की मजदूरी सिर्फ एक आना या दो आना होती थी उस वक्त इस गांव के लोगो ने गब्बर सिंह को 1100 रूपए चुकाने के लिए एक साल तक गांव ही छोड़ दिया और शहरों में मजदूरी कर पैसा जमा कर वीरान पड़े गांव में कदम रखे।
इस बीच गब्बर सिंह की एक तांत्रिक से मुलाकात हुई और उस तांत्रिक ने गब्बर सिंह को बताया कि अगर वो 116 लोगो की नाक काट कर  दुर्गा मां को भेंट करता है तो फिर पुलिस की कोई गोली उसको छू नहीं पाएंगी।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

ममता और कर्तव्य

*चित्तौड़ के जौहर पर*
आयुवान सिंह हुडील की कहानी
''ममता और कर्त्तव्य''

अब गोरा कर्त्तव्य का चौथा अध्याय पूर्ण करने जा रहा था । उसे न सुख था और न दु:ख, न शोक था और न प्रसन्नता । वह पूर्ण स्थितप्रज्ञ था । मार्ग में धू-धू करती हुई सैकड़ों चिताएँ जल रही थी । भुने हुए मानव माँस से दुर्गन्ध उठी और धुआँ ने उसे तनिक भी विचलित और प्रभावित नहीं किया । वह न इधर देखता था और न उधर, बस बढ़ता ही जा रहा था ।
विक्रम संवत् 1360 के चैत्र शुक्ला तृतीया की रात्रि का चतुर्थ प्रहर लग चुका था । वायुमण्डल शांत था । अन्धकार शनैः शनैः प्रकाश में रूपान्तरित होने लग गया था । बसन्त के पुष्पों की सौरभ भी इसी समय अधिक तीव्र हो उठी थी । यही समय भक्तजनों के लिए भक्ति और योगियों के लिए योगाभ्यास द्वारा शान्ति प्राप्त करने का था । सांसारिक प्राणी भी वासना की निवृत्ति उपरांत इसी समय शान्ति की शीतल गोद में विश्राम ले रहे थे । चारों ओर शान्ति का ही साम्राज्य था ।

ठीक इसी समय पर चित्तौड़ दुर्ग (Chittorgarh) की छाती पर सैकड़ों चिताएँ प्रदीप्त हो उठी थी । चिर शान्ति की सुखद गोद में सोने के लिए अशान्ति के महाताण्डव का आयोजन किया जा रहा था । और ठीक इसी ब्रह्म मुहूर्त में विश्व की मानवता को स्वधर्म-रक्षा का एक अपूर्व पाठ पढ़ाया जाने वाला था । उस पाठ का आरम्भ धू-धू कर जल रही सैकड़ों चिताओं में प्रवेश (Johar of Chittorgarh) करती हुई हजारों ललनाओं के आत्मोसर्ग के रूप में हो गया था ।
“मैं सूर्य-दर्शन करने के उपरान्त शास्त्रोक्त विधि से चिता में प्रवेश करूँगी। अपने पुत्र गोरा को उसकी वृद्ध माताजी ने अपने पास बुलाते हुए कहा ।
“जो आज्ञा माताजी।’ कह कर गोरा आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा ।

‘‘और मैं माताजी का जौहर दर्शन करने के उपरान्त चिता-प्रवेश करूँगी |''

गोरा ने मुड़ कर देखा - पंवारजी माताजी को स्नान कराने के लिए जल का कलश ले जाते हुए कह रही थी । यदि कोई ओर समय होता तो उद्दण्ड गोरा अपनी स्त्री के इस आदेशात्मक व्यवहार को कभी सहन नहीं करता पर वह दिन तो उसकी संसार-लीला का अन्तिम दिन था । कुछ ही घड़ियों पश्चात् उसकी माता और स्त्री को अग्नि-स्नान द्वारा प्राणोत्सर्ग करना था और उसके तत्काल बाद ही गोरा को भी सुल्तान अलाउद्दीन की असंख्य सेना के साथ युद्ध करते हुए ‘धारा तीर्थ में स्नान करना था । इसीलिए असहिष्णु गोरा ने मौन स्वीकृति द्वारा स्त्री के अनुरोध का भी आज पालन कर दिया था । वह एक के स्थान पर दो चिताएँ तैयार कराने में जुट गया ।

थोड़ी देर में दो चिता सजा कर तैयार कर दी गई । उनमें पर्याप्त काष्ठ, घृत, चन्दन, नारियल आदि थे । एक चिता घर के पूर्वी आंगन में और दूसरी घर के उत्तरी अहाते की दीवार से कुछ दूर, वहाँ खड़े हुए नीम के पेड़ को बचाकर तैयार की गई थी । विधिवत् अग्निप्रवेश करवाने के लिए पुरोहितजी भी वहाँ उपस्थित थे ।

गोरा की माँ ने पवित्र जल से स्नान किया, नवीन वस्त्र धारण किए, हाथ में माला ली और वह पूर्वाभिमुख हो, ऊनी वस्त्र पर बैठकर भगवान का नाम जपने लगी । गत पचास वर्षों के इतिहास की घटनायें एक के बाद एक उस वृद्धा के स्मृति-पटल पर आकर अंकित होने लगी । उसे स्मरण हो आया कि पहले पहल जब वह नववधू के रूप में इस घर में आई थी, उसका कितना आदर-सत्कार था । गोरा के पिताजी उसे प्राणों से अधिक प्यार करते थे । वे युद्धाभियान के समय द्वार पर उसी का शकुन लेकर जाते थे और प्रत्येक युद्ध से विजयी होकर लौटते थे । विवाह के दस वर्ष उपरान्त अनेकों व्रत और उपवास करने के उपरान्त उसे गोरा के रूप में पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ था। । उस दिन पति-पत्नी को कितनी प्रसन्नता हुई थी, कितना आनन्द और उत्सव मनाया गया था। । गोरा के पिताजी ने उस आनन्द के उपलक्ष में एक ही रात में शत्रुओं के दो दुर्ग विजय कर लिए थे ।

अभी गोरा छः महीने का ही हुआ था कि सिंह के आखेट में उनका प्राणान्त हो गया था । वह उसी समय सती होना चाहती थी पर शिशु के छोटे होने के कारण वृद्ध जनों ने उसे आज्ञा नहीं दी । फिर गोरा बड़ा होने लगा। । वह कितना बलिष्ठ, उद्दण्ड, साहसी और चपल था उसने केवल बारह वर्ष की आयु में ही एक ही हाथ के तलवार के वार से सिंह को मार दिया था। और सोलह वर्ष की अवस्था में कुछ साथियों सहित बड़ी यवन सेना को लूट लाया था । इसके उपरान्त वृद्धा ने अपने मन को बलपूर्वक खींच कर भगवान में लगा दिया ।

कुछ क्षण पश्चात् उसे फिर स्मरण आया कि आज से बीस वर्ष पहले उसके घर में नववधू आई थी| वह कितनी सुशीला, आज्ञाकारिणी और कार्य दक्ष है| आज भी जब वह मुझे स्नान करा रही थी तो किस प्रकार उसकी आँखें सजल उठी थी| गोरा के उद्दण्ड और क्रोधी स्वभाव के कारण उसे कभी भी इस घर में पति-सम्मान नहीं मिला| फिर भी वह उसकी सेवा में कितनी तन्मय और सावधान रहती है| वृद्धा ने फिर अपने मन को एक झटका सा देकर सांसारिक चिन्तन से हटा लिया और उसे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लगा दिया । वह ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र को गुनगुनाने लगी ।

कुछ क्षण पश्चात् फिर उसे स्मरण आया कि राव रतनसिंह, महारानी पद्मिनी और रनिवास की अन्य ललनायें उसका कितना अधिक सम्मान करती हैं महारानी पद्मिनी की लावण्यमयी सुकुमार देह, उसके मधुर व्यवहार और चित्तौड़ दुर्ग पर आई इस आपति का उसे ध्यान हो आया । उसने आँखें उठा कर प्राची की ओर देखा और नेत्रों से दो जल की बूंदें गिर कर उनके आसन में विलीन हो गई |

इतने में उसका पंचवर्षीय पौत्र बीजल नीद से उठ कर दौड़ा-दौड़ा आया और सदैव की भाँति उसकी गोद में बैठ गया ।
“आज दूसरे घरों में आग क्यों जल रही है दादीसा ? बीजल ने वृद्धा के मुँह पर अपने दोनों हाथ फेरते हुए पूछा । वृद्धा ने उसे हृदय से लगा लिया उसके धैर्य का बाँध टूट पड़ा, नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित हुई और उसने बीजल के सुकुमार सिर को भिगो दिया । बीजल अपनी दादी के इस विचित्र व्यवहार को बिल्कुल नहीं समझा और वह मुँह उतार कर फिर बैठ गया ।

वृद्धा ने मन ही मन कहा - ‘‘इसे कैसे बताऊँ कि अभी कुछ ही देर में इस घर में भी आग जलने वाली है जिसमें मैं, तुम्हारी माता और तुम सभी –“ वृद्धा की हिचकियाँ बन्ध गई । उसने अपनी बहू को आवाज दी - ‘‘बीजल को ले जा ?’ वह मेरे मन को अन्तिम समय में फिर सांसारिक माया में फँसा रहा है।’’

पंवारजी दही के लिए हठ करती हुई अपनी तीन वर्षीया पुत्री मीनल को गोद में लेकर आई और बीजल को हाथ पकड़ कर घर के भीतर ले गई ।
“कितना सुन्दर और प्यारा बच्चा है । ठीक गोरा पर ही गया है । बची भी कितनी प्यारी है । जब वह तुतली बोली में मुझे दादीथा कह कर पुकारती है तो कितनी भली लगती है। कुछ ही क्षणों के बाद ये भी अग्निदेव के समर्पित हो जायेंगे । हाय ! मेरे गोरा का वंश ही विच्छेद हो जाएगा | एक गोरा का क्या आज न मालूम कितनों के वंश-प्रदीप बुझ रहे हैं । यह सोचते हुए वृद्धा की आँखों में फिर अश्रुधारा प्रकट हो गई । उसने बड़ी कठिनाई से अपने को सम्हाला; सुषुप्त आत्मबल का आह्वान किया और फिर नेत्र बन्द करके ईश्वर के ध्यान में निमग्न हो गई ।

गोरा अब तक यंत्रवत् सब कार्य करने में तल्लीन था । उसने अब तक न निकट भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं पर ही कुछ सोचा था और न अपने मन को ही किसी विकार से उद्वेलित किया था । पर जब जौहर-व्रत सम्बन्धी सम्पूर्ण व्यवस्था समाप्त हो गई तब उसने भाव रहित मुद्रा में प्राची की ओर देखा । उषाकाल प्रारम्भ होने ही वाला था । प्राची में उदित अरूणाई के साथ ही साथ उसे अपनी माता का स्मरण हो आया । उसे स्मरण हो आया कि एक घड़ी पश्चात् सूर्योदय होते ही उसकी पूजनीया वृद्धा माँ अग्निप्रवेश करेगी और वह पास खड़ा-खड़ा उस दृश्य को देखेगा । वह कठोर हृदय था, कूर स्वभाव का था, साहसी और वीर था पर उच्चकोटि का मातृभक्त भी था । अब तक कभी भी उसने माता की अवज्ञा नहीं की थी । माता भी उसे बहुत अधिक प्यार करती थी और वह भी माता का बहुत अधिक सम्मान करता था । पिता का प्यार उसे प्राप्त नहीं हुआ था, पर माता की स्नेह सिंचित शीतल गोद में लिपटकर ही वह इतना साहसी और वीर बना था । माता का अमृत तुल्य पय-पान कर ही उसने इतना बल-वीर्य प्राप्त किया था; उसकी ओजमयी वाणी से प्रभावित होकर उसने अब तक शत्रुओं का मान मर्दन किया था । उसके स्वास्थ्य, कल्याण और उसकी दीर्घायु के लिए उसकी माता ने न मालूम कितने ही व्रत-उपवास किये थे, कितने देवी-देवताओं से प्रार्थना की थी; यह सब गोरा को ज्ञात था । माता के कोटि-कोटि उपकारों से उसका रोम-रोम उपकृत और कृतज्ञ हो रहा था|

तीर्थों में गंगा सबसे पवित्र है, पर गोरा की दृष्टि में उसकी माता की गोद से बढ़ कर और कोई तीर्थ पवित्र नहीं था । उसके लिए मातृ-सेवा ही सब तीर्थ-स्नान के फल से कहीं अधिक फलदायी थी । माता गोरा के लिए आदि शक्ति योगमाया का ही दूसरा रूप है । वही उसके लिए विपत्ति के समय रक्षा का विधान करती और सुख के समय उसे खिलातीपिलाती और अपनी पवित्र गोद में लिपटाती । वही परम पवित्र माता कुछ ही क्षण पश्चात् चिता में प्रवेश कर भस्म हो जाएगी और भस्म इसलिए हो जायेगी कि गोरा जैसा निर्वीर्य पुत्र उसे बचा नहीं सकता । उसे अपने पुरुषार्थ पर लज्जा आई, विवशता पर क्रोध आया ।
उसने मन ही मन अपने आपको धिक्कारा - “मैं कितना असमर्थ हूँ कि आज अपनी प्राणप्रिय माताजी को भी नहीं बचा सकता ।

फिर उसे ध्यान आया -‘‘मेरी जैसी हजारों माताएँ आज चिता-प्रवेश कर रही हैं और मैं निर्लज्ज की भाँति खड़ा-खड़ा उन्हें देख रहा हूँ, अपने हाथों चिता में आग लगा रहा हूँ, धिक्कार है मेरे पुरूषार्थ को, धिक्कार है मेरे बाहुबल को और धिक्कार है मेरे क्षत्रियत्व को। गोरा उत्तेजित हो उठा और शत्रुओं पर टूट पड़ने के लिए कमर में टंगी हुई तलवार लेने के लिए झपट पड़ा । सहसा उसे ध्यान आया कि अभी तो जौहर-व्रत पूरा करवाना है। वह रुका और पूर्वी तिबारी में बैठी हुई माँ के चरणों में अन्तिम प्रणाम करने के लिए चल पड़ा ।

गोरा ने अत्यन्त ही भक्तिपूर्वक ईश्वर ध्यान में निमग्न माता को चरण छूकर प्रणाम किया । माता ने पुत्र को देखा और पुत्र ने माता को देखा । दोनों ओर से स्नेह-सरितायें उमड़ पड़ी । गोरा अबोध शिशु की भाँति माता की गोद में लेट गया । उसका पत्थर तुल्य कठोर हृदय भी माता की शीतल गोद का सान्निद्य प्राप्त कर हिमवत् द्रवित हो चला । माता ने अपना सर्वसुखकारी स्नेहमय हाथ गोरा के माथे पर फेरा और कहने लगी ।

“गोरा तुम्हारा परम सौभाग्य है । स्वतंत्रता, स्वाभिमान, कुल-मर्यादा और सतीत्व रूपी स्वधर्म पर प्राण न्यौछावर करने का सुअवसर किसी भाग्यवान क्षत्रिय को ही प्राप्त होता है। तुमन आज उस दुर्लभ अवसर को अनायास ही प्राप्त कर लिया है । ऐसे ही अवसरों पर प्राणोत्सर्ग करने के लिए राजपूत माताएँ पुत्रों को जन्म देती है । वास्तव में मेरा गर्भाधान करना और तुम जैसे पुत्र को जन्म देना आज सार्थक हुआ है । बेटा, उठ ! यह समय शोक करने का नहीं है ।’ कहते हुए माता ने बड़े ही स्नेह से गोरा के आँसू अपने हाथों से पोंछे ।

मातृ-प्रेम में विह्वल गोरा पर इस उपदेश का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा । उसकी आँखों का बाँध टूट गया । वह अबोध शिशु की भाँति माता से लिपट गया । रण में शत्रुओं के लिए महाकाल रूपी गोरा आज माता की गोद में दूध-मुँहा शिशु बन गया था । कौन कह सकता था कि क्रूरता, कठोरता, रूद्रता और निडरता की साक्षात् मूर्ति, माँ की गोद में अबोध शिशु की भाँति सिसकियाँ भरने वाला यही गोरा था ।

माता ने अपने दोनों हाथों के सहारे से गोरा को बैठाया । वह फिर बोली - ‘‘बेटा! तुझे अभी बहुत काम करना है । मुझे जौहर करवाना है, फिर बहू को सौभाग्यवती बनाना है और बच्चों को भी ..... | यह कहते-कहते वात्सल्य का बाँध भी उमड़ पड़ा, पर उसने तत्काल ही अपने को सम्हाल लिया । वह आगे बोल उठी – ‘‘तेरा इस समय इस प्रकार शोकातुर होना उचित नहीं । तेरी यह दशा देख कर मेरा और बहू का मन भी शोकातुर हो जाता है । पवित्र जौहर-व्रत के समय स्त्रियों को विकारशून्म मन से प्रसन्नचित्त हो चिता में प्रवेश करना चाहिए तभी जौहर-व्रत का पूर्ण फल मिलता है, नहीं तो वह आत्महत्यातुल्य निकृष्ट कर्म हो जाता है।

इतने में पुरोहित ने आकर सूचना दी - माताजी सूर्योदय होने वाला है; चिता-प्रवेश का यही शुभ समय है । माता तुरन्त वहाँ से उठ खड़ी हुई और चिता के पास आकर खड़ी हो गई । गोरा फूट-फूट कर रोने लगा । पुरोहित ने सांत्वना बंधाते हुए कहा -

“गोराजी किसके लिए अज्ञानी पुरूष की भाँति शोक करते हो । क्योंकि -
’’न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||’’

अब गोरा ने अपने को सम्भाला । उसने अपनी स्त्री और बालकों सहित माँ की परिक्रमा की । माता ने उनका माथा सूघा और आशीर्वाद दिया । “शीघ्रता करिए। पुरोहित ने चिता पर गंगाजल छिड़कते हुए कहा ।

वृद्धा ने तीन बार चिता की परिक्रमा की और फिर प्राची में उदित होते हुए सूर्य को नमस्कार किया और प्रसन्न मुद्रा में वह चिता पर चढ़कर बैठ गई । उसने अपने मुँह में गंगाजल, तुलसी-पत्र और थोड़ा सा स्वर्ण रखा और ब्राह्मणों को भूमिदान करने का संकल्प किया ।

गोरा ने कहा - ‘‘अन्तिम प्रार्थना है माँ ! स्वर्ग में मेरे लिए अपनी सुखद गोद खाली रखना और यदि संसार में जन्म लेने का अवसर आए तो जन्म-जन्म में तू मेरी माता और मैं तेरा पुत्र होऊँ ।’

माता ने हाथ की उंगली ऊपर कर ईश्वर की ओर संकेत किया और “मेरे दूध की लज्जा रखना बेटा ।’’ कह कर आँखें बन्द कर ध्यानमग्न हो गई । पुरोहित ने वेद मन्त्रों के उच्चारण के साथ अग्नि प्रज्जवलित की । गोरा ने देखा स्वर्णिम लपटों से गुम्फित उसकी माता कितनी दैदीप्यमान लग रही थी । देवताओं के यज्ञ-कुण्ड में से प्रकटित जग-जननी दुर्गा के तुल्य उसने ज्वाला-परिवेष्ठित अपनी माता के मातृ स्वरूप को मन ही मन नमस्कार किया और आत्मा की अमरता का प्रतिपादन करता हुआ गुनगुना उठा -

’ ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।’’
पुरोहित ने चिता में शेष घृत को छोड़ते हुए श्लोक के दूसरे चरण को पूरा किया‘‘न चैनं कलेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः ।।'

गोरा ने कर्त्तव्य के एक अध्याय को समाप्त किया और वह दूसरे की तैयारी में जुट पड़ा । अलसाए हुए नेत्रों सहित वह उत्तरी चिता के जाकर खड़ा हो गया । पंवारजी ने चंवरी के समय के अपने वस्त्र निकाले, उन्हें पहना, माँग में सिन्दूर भरा, आँखों में काजल लगाया और वह नवदुल्हन सी सजधज कर घर के बाहर आ गई । उसने बीजल का हाथ पकड़ते हुए मीनल को गोरा की गोद में देते हुए मुस्करा कर कहा -
“लो सम्हालो अपनी धरोहर, मैं तो चली।“ गोरा ने बीजल की अंगुली पकड़ ली और मीनल को अपनी गोद में बैठा लिया । उसने देखा पंवारजी आज नव-दुलहन से भी अधिक शोभायमान हो रही थी । वह प्रसन्न मुद्रा में थी और उसके चेहरे पर विषाद की एक भी रेखा नहीं थी । गोरा ने मन ही मन सोचा - ‘‘मैंने इस देवी की सदैव अवहेलना की है। इसका अपमान किया है । अन्तिम समय में थोड़ा पश्चाताप तो कर लूं ॥“
उसने कहा - ‘‘पंवारजी मैंनें तुम्हे बहुत दुःख दिया है । क्या अन्तिम समय में मेरे अपराधों को नहीं भूलोगी ।'
“यह क्या कहते हैं नाथ आप । मैं तो आपके चरणों की रज हूँ और सदैव आपके चरणों की रज ही रहना चाहती हूँ । परसों गौरी-पूजन (गणगौर) के समय भी मैंनें भगवती से यही प्रार्थना की थी कि वह जन्म-जन्म में आपके चरणों की दासी होने का सौभाग्य प्रदान करें |'' “पंवारजी मैंनें आज अनुभव किया कि तुम स्त्री नहीं साक्षात् देवी हो।

“सो तो हूँ ही । परम सौभाग्यवती देवी हूँ इसलिए पति की कृपा की छाया में स्वर्ग जा रही हूँ ।’ यह कह कर पंवार जी तनिक सी मुस्कराई और फिर बोल उठी -

“इस घर में आपके पीछे होकर आई पर स्वर्ग में आगे जा रही हूँ । क्यों नाथ ! मैं बड़ी हुई या आप ?’ परिस्थितियों की इस वास्तविक कठोरता के समय किये गये इस व्यंग से गोरा में किंचित् आत्महीनता की भावना उदय हुई उसके मानस प्रदेश पर भावों का   द्वन्द्व मच गया और उसकी वाणी कुण्ठित हो गई ।

इसके उपरान्त पंवारजी आगे बढी । उसने बीजल और मीनल को चूमा, उनके माथों पर प्यार का हाथ फेरा । स्वामी की परिक्रमा की, उसके पैर छुए और वह बोली -

“नाथ ! स्वर्ग में प्रतीक्षा करती रहूँगी, शीघ्र पधार कर इस दासी को दर्शन देना । स्वर्ग में मैं आपके रण के हाथों को देखेंगी । देखेंगी आप किस भाँति मेरे चूड़े का सम्मान बढ़ाते हैं ।’’

गोरा ने सोचा - “ये अबला कहलाने वाली नारियाँ पुरूषों से कितनी अधिक साहसी, धैर्यवान और ज्ञानी होती हैं। इस समय के साहस और वीरत्व के समक्ष युद्धभूमि में प्रदर्शित साहस और वीरत्व उसे अत्यन्त ही फीके जान पड़े | उसने पहली बार अनुभव किया कि नारी पुरूषों से कहीं अधिक श्रेष्ठ होती हैं । अब उसके साहस, धैर्य और वीरता का गर्व गल चुका था । वह बोल उठा -

पंवारजी तुमने अन्तिम समय में मुझे परास्त कर दिया। मैं भगवान सूर्य की साक्षी देकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारे चूड़े के सम्मान को तनिक भी ठेस नहीं पहुँचने ढूँगा।" बोली पंवारजी ने सब शास्त्रीय विधियों को पूर्ण किया और फिर पति से हाथ जोड कर बोली-
“नाथ मैं चिता में स्वयं अग्नि प्रज्जवलित कर दूँगी। आप मोह और ममता की फॉस इन बच्चों को लेकर थोड़े समय के लिए दूर पधार जाइये।”
गोरा मन्त्र मुग्ध सा -
‘‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।’’
गुनगुनाता हुआ दोनों बालकों को गोद में उठाकर घर के भीतर चला गया ।
“दादीसा जल क्यों गए पिताजी ? बीजल ने उदास मुद्रा में पूछा ।
“दादीसा भगवान के पास चली गई है बेटा।”
‘‘हम लोग क्यों नही चलते ।’’
“अभी थोड़ी देर बाद चलेंगे बेटा।'
गोरा ने अपने पुत्र के भोले मुँह को देखा । वह उसकी जिज्ञासा को किन शब्दों में शान्त करे, यह सोच नहीं सका ।
इतने में “भाभू जाऊँ , भाभू जाऊँ “ कह कर मीनल मचल उठी और उसने गोरा की गोद से कूद कर माता के पास जाने के लिए अपने नन्हें से दोनों पैरों को नीचे लटका दिया|

गोरा ने मचलती हुई मीनल के चेहरे को देखा । उसे उसका निर्दोष, भोला और करूण मुख अत्यन्त ही भला जान पड़ा ।

वह आंगन में रखी चारपाई पर बैठ गया और उसने पुत्र और पुत्री को दोनों हाथों से वक्षस्थल से चिपटा लिया । वात्सल्य की सरिता उमड़ चली । वह सोचने लगा - “किस प्रकार अपने हृदय के टुकड़ों को अपने ही हाथों से अग्नि में फेंकूं ? हाय ! मैं कितना अभागा हूँ, लोग सन्तान प्राप्ति के लिये नाना प्रकार के जप-तप करते और कष्ट उठाते हैं पर मैं आप, अपने सुमन से सुन्दर सुकुमार और निर्दोष बच्चों के स्वयं प्राण ले रहा हूँ। मैं सन्तानहत्यारा नहीं बनूंगा, चाहे म्लेच्छ इन्हें उठाकर ले जायें पर अपने हाथों इनका वध नहीं करूँगा ।’’

इतने में “भाभू जाऊँ , भाभू जाऊँ “ कह कर मीनल मचल उठी ।
गोरा उन बालकों को गोदी में उठा कर छत पर ले गया । उसने देखा - ‘‘धॉयधाँय कर सैकड़ों चिताएँ जल रही थी । उनमें न मालूम कितने इस प्रकार के निर्दोष बालकों को स्वाहा किया गया था । उसने देखा मुख्य जौहर-कुण्ड से निकल रही भयंकर अग्नि की लपटों ने दिन के प्रकाश को भी तीव्र और भयंकर बना दिया था ।

“हा, महाकाल ! मुझसे यह जघन्य कृत्य मत करा। हा, देव ! इतनी कठोर परीक्षा तो हरिशचन्द्र की भी नहीं ली थी ।' कहता हुआ गोरा बालकों का मुँह देख कर रो पड़ा । पिता का हृदय था, द्रवित हो बह चला ।

उसने फिर पूर्व की ओर दृष्टिपात किया । उसकी दृष्टि सुल्तान के शिविर पर गई । उसका रोम-रोम क्रोध से तमक उठा । प्रतिहिंसा की भयंकर ज्वाला प्रज्जवलित हो उठी । द्रवित हृदय भी उससे कुछ कठोर हुआ । उसने सोचा -
“मैं क्यों शोक कर रहा हूँ । मुझे तो अपने सौभाग्य पर गर्व करना चाहिए ।“ उसे अपनी माता और पत्नी का चिता-प्रवेश और उपदेश स्मरण हो आया । ‘
‘मैं अपने इन नौनिहालों को सतीत्व और स्वतंत्रता रूपी स्वधर्म की बलि पर चढ़ा रहा हूँ । वास्तव में मैं भाग्यवान हूँ ।’ वह तमक कर उठ बैठा और बच्चों को गोदी में उठा कर कहने लगा-
“चलो तुम्हें अपनी भाभू के पास पहुँचा आऊँ ',
’’नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।’’

गुनगुनाता हुआ वह पंवारजी की चिता के पास बालकों को लेकर चला आया । चिता इस समय प्रचण्डावस्था में धधक रही थी । गोरा ने अपने हृदय को कठोर किया और भगवान का मन में ध्यान किया । फिर अपना दाहिना पैर कुछ आगे करके वह दोनों बालकों को दोनों हाथों से पकड़ कर थोड़ा सा झुला कर चिता में फेंकने वाला था कि पुत्र और पुत्री चिल्ला कर उसके हाथ से लिपट गए । उन्होंने अपने नन्हें-नन्हें सुकोमल हाथों से दृढ़तापूर्वक उसके अंगरखे की बाँहों को पकड़ लिया और कातरता और करूणापूर्ण दृष्टि से टुकर-टुकर पिता के मुँह की ओर देखने लग गए । ऐसा लगा मानों अबोध बालकों को भी पिता का भीषण मन्तव्य ज्ञात हो गया था । उस समय इन बालकों की आँखों में बैठी हुई साकार करूणा को देखकर क्रूर काल का भी हृदय फट जाता । गोरा उनकी आँखों की प्रार्थना स्वीकार कर कुछ कदम चिता से पीछे हट गया । चिता की भयंकर गर्मी और भयावनी सूरत को देखकर मीनल अत्यन्त ही भयभीत हो गई थी; उसने भाभू जाऊँ, भाभू जाऊँ की रट भय के मारे बन्द कर दी । बीजल इस नाटक को थोड़ा बहुत समझ चुका था । उसने पिता से कहा –
“पिताजी ! मैं भी ललाई में तलँगा । मुझे आग में क्यों फेंकते हो?

ममता की फिर विजय हुई । गोरा ने उन दोनों बालकों को हृदय से लगा लिया । उनके सिरों को चूमा और सोचा, – “पीठ पर बाँध कर दोनों को रणभूमि में ही क्यों नहीं ले चलूं ?“ थोड़ी देर में विचार आया, - “ऐसा करने से अन्य योद्धा मेरी इस दुर्बलता और कायरता के लिए क्या सोचेंगे ?“ ये दो ही नहीं हजारों बालक आज भस्मीभूत हो। रहे हैं ।

वह फिर साहस बटोर कर उठा - अपने ही शरीर के दो अंशो को अपने ही हाथों आग में फेंकने के लिए । उसने हृदय कठोर किया, भगवान से बालकों के मंगल के लिए प्रार्थना की; अपने इस राक्षसी कृत्य के लिए क्षमा माँगी और मन ही मन गुनगुना उठा -
“हा क्षात्र-धर्म, तू कितना कूर और कठोर है ।“ बीजल नहीं पिताजी-नहीं पिताजी' चिल्लाता हुआ उसके अंगरखे की छोर पकड़ कर चिपट रहा था, मीनल ने कॉपते हुए अपने दोनों नन्हें हाथ पिता के गले में डाल रखे थे । दोनों बालकों की करूणा और आशाभरी दृष्टि पिता के मुंह पर लगी हुई थी ।
गोरा ने ऑखें बन्द की और कर्त्तव्य के तीसरे अध्याय को भी समाप्त किया । अग्नि ने अपनी जिह्वा से लपेट कर दोनों बालकों को अपने उदर में रख लिया । ममता पर कर्त्तव्य की विजय हुई ।
गोरा पागल की भाँति लपक कर घर के भीतर आया । अब घर उसे प्रेतपुरी सा भयंकर जान पड़ा । वह उसे छोड़ कर बाहर भागना चाहता था कि सुनाई दिया -
“कसूमा का निमन्त्रण है, शीघ्र केसरिया करके चले आइए।’’

अब गोरा कर्त्तव्य का चौथा अध्याय पूर्ण करने जा रहा था । उसे न सुख था और न दु:ख, न शोक था और न प्रसन्नता । वह पूर्ण स्थितप्रज्ञ था । मार्ग में धू-धू करती हुई सैकड़ों चिताएँ जल रही थी । भुने हुए मानव माँस से दुर्गन्ध उठी और धुआँ ने उसे तनिक भी विचलित और प्रभावित नहीं किया । वह न इधर देखता था और न उधर, बस बढ़ता ही जा रहा था ।

(आयुवान सिंह साहब की कलम से)
ममता और कर्त्तव्य।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...