सोमवार, 18 दिसंबर 2017

★कथा सरिता★

कालिदास एक बार भ्रमण करते-करते एक गांव पहुंचे गए। बहुत प्यास लगी थी, तो एक घर के द्वार जाकर पानी मांगा।
वहां मौजूद स्त्री और अपने ज्ञान के चलते ख्याति अर्जित कर चुके कालिदास के बीच रोचक संवाद हुआ। एक नजर इसी संवाद पर -

कालिदास बोले: माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा।

स्त्री बोली:  बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं।अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास:  मैं मेहमान हूं, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री:तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसारमें दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्यबताओ कौन हो तुम ?
(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)

कालिदास बोले:मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा:  नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है,
दूसरे पेड़ जिनकोपत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?
(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गएऔर तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)

कालिदास बोले:मैं हठी हूं.

स्त्री ने कहा: फिर झूठ। हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं।
सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?(कालिदास पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)

कालिदास ने फिर कहा:   फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।

स्त्री फिर बोली:  नहीं, तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो?
मूर्ख दो ही हैं।
#पहला_राजा_जो_बिना_योग्यता_के_भी_सब_पर_शासन_करता_है,

#और_दूसरा_दरबारी_पंडित_जो_राजा_को_प्रसन्न_करने_के_लिए_गलत_बात_पर_भी_तर्क_करके_उसको_सही_सिद्ध_करने_की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।)

स्त्री ने कहा: उठो वत्स! (आवाज सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात् माता सरस्वती वहां खड़ी थीं,

कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए।)माता ने कहा:शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे, इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

सीख:-विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।
               शुभ दिवस ,
              जय श्री कृष्ण

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

भारत यश

हरा भऱा वीरौ से हर दम प्यारा हिन्दुस्तान रहा
सव देशो मे देश हमारा भारत ये वलवान रहा  ।

अवधपुरी के रामचन्द्र ने लन्कापति को मारा था
मथुरा मे श्रीकृष्णचन्द्र ने राजा कँस पछाडा था  ।

अभिमन्यु ने चक्राव्युह मे शष्त्रुो को संहारा था  
जगतपाल भगवान कृष्ण ने भीषम का प्रण पाला था ।

धरती से सुरपुर तक देखो अर्जुन सेतु बनाया था
इंद्रलोक से ऐरावत हाथी जिसने मंगवाया था ।

स्वाभिमान की मूरत महाराणा ,मुगलो को  मार भगाया था
विजय हेतु हाडी रानी ने अपना शीश थाल में सजाया था ।

वीरमति ने करी वीरता भारतवासी जान रहा  
सव देशो मे देश सिरौमणि भारत ही वलवान रहा ।

अँगरेजौ कौ मार भगाया झॉसीवाली रानी ने
दुर्गा पदमा जौहर कीन्हे दल मे हिन्दुस्तानी ने  ।

वीरमति ने करी वीरता चारो युग हनुमान रहा
सब देशो में देश हमारा भारत ये बलवान रहा ।

अँग्ररेजौ ने मार न पाई चुन्गल चिडिया भारी थी
गोरे पड़े रहे खेतो में फौज पड़ी सरकारी थी ।

राजा गोविन्दसिहँ "दतिया' के चुन्गल चिडिया मारी थी ।

सत्तावन की क्रांति भारी 'बिस्मिल' सा स्वाभिमान रहा
आजाद-भगत रणबिगुल फूंके अंग्रेजो का श्मशान रहा ।

सब देशो देश शिरोमणि चारो युग हनुमान रहा
सब देशो से देश हमारा भारत ये वलवान रहा

हरा भरा वीरो से हरदम भारत ये वलवान रहा ।

(विगत चार वर्षो से लगातार आज ही के दिन )
                    आपका ही
              जितेन्द्र सिंह तोमर

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

===चम्बल एक सिंह अबलोकन===भाग 14

    
           ★बाग़ी मोहर सिंह गुजर★
५०-६० का दशक........हालिया मिली स्वतन्त्रता को समेटता हुआ भारत अपने पुनर्सृजन में मगन शने शने ताजे घावो पर बासी मरहम लगाता हुआ निरन्तर उन्नति कैसे हो? जेसे प्रश्नो में विचारशील था।किन्तु भारत का एक अहम भूभाग अभी भी १८५७ की जीवन शैली में जीवनयापन को जिए जा रहा था। हालाँकि बन्दुके पहले कभी विरोध ,अंग्रेजी हुकूमत,अबैध भू अधिकार,स्वाभिमान के लिए निकलती थी पर अब मरने बाले भी अपने थे और मारने बाले भी। बैलगाड़ियों में जूते बेलो की कंठमालाये जीवन राग की तरह बजती तो कभी चम्बल की वादियो में वारुदि सुगंध के अहसास के साथ गरजती।
चम्बल की अब लिखी गयी किस्सागोई में मानसिंह,रुपा,लाखन,माखन-छिद्दा,माधो सिंह,मलखान सिंह ,सुल्ताना,पुतली ,सुवेदार पान सिंह तोमर इत्यादि की कहानियो से जुदा नहीं हे मोहर सिंह की कहानी बही कायथो की पटवारी और बैमान लठैतों की चपलताओ से ही एक सीधे साधे युवक को बन्दूक थमा दी जिसने फिर मानवी लाशो पर चलना ही नियति माना ।
जब जब जुवा पर बागी डकैतो की बात चले और मोहरसिंह का किरदार अपनी अलग छाप छोड़ता हे। तो आइये आज के लेख में मिलते हे एक मुच्छड़ बागी किरदार से ......'मोहर सिंह गुजर'

बिसुलि नदी के कछार में एक छोटा गाँव .जट पूरा-जिला भिंड...
गाँव के पश्चिम में भगवान शंकर का पीले रंग से पुता हुआ मन्दिर-मन्दिर से ही सटा था कभी मोहर सिंह का कच्चा मकान। मकान में लगी सोटो(लकड़ी के पट्ट) से छड़ता हुआ घुन चूर्ण उसकी 20 वर्ष पुरानी कारीगरी को प्रमाणित कर रहा था। एक टीले पर बनी मड़ैया और कुछ पालतू जानबरो के साथ पेत्रिक जमीन का सीना चिर जीवन यापन करना यही तो था उस गाँव की किन्तु समय की धुरी बदल गयी अब गाँव की पहिचान बन चूका था एक नाम 'मोहर'!

मोहर सिंह इसी गांव का रहने वाला एक छोटा सा किसान था। गांव में छोटी सी जमीन थी। जिंदगी मजे से चल रही थी। लेकिन चंबल के इलाके का इतिहास बताता है कि किसानों की जमीनों में फसल के साथ साथ दुश्मनियां भी उगती है। जमीन के कब्जें को मोहर के कुनबे में एक झगड़ा शुरू हुआ। और इसी झगड़े में मोहर सिंह की जमीन का कुछ हिस्सा दूसरे परिवार ने दबा लिया। गांव में झगड़ा हुआ। पुलिस के पास मामला गया। और पुलिस ने उस समय की चंबल में चल रही रवायत के मुताबिक पैसे वाले का साथ दिया। केस चलता रहा। इस मामले में मोहर सिंह गवाह था। 
गांव में मुकदमें में गवाही देना दुश्मनी पालना होता है। जटपुरा में एक दिन मोहर सिंह को उसके मुखालिफों ने पकड़ कर गवाही न देने का दवाब डाला। कसरत और पहलवानी करने के शौंकीन मोहर सिंह ने ये बात ठुकरा दी तो फिर उसके दुश्मनों ने उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी। घायल मोहर सिंह ने पुलिस की गुहार लगाई लेकिन थाने में उसकी आवाज सुनने की बजाय उस पर ही केस थोप दिया गया। 
बुरी तरह से अपमानित मोहर सिंह को कोई और रास्ता नहीं सूझा और उसने चंबल की राह पकड़ ली। 1958 में गांव में अपने इसी मंदिर पर मोहर सिंह ने अपने दुश्मनों को धूल में मिला देने की कसम खाई और चंबल में कूद पड़ा।  
मोहर सिंह ने पहला शिकार अपने गांव के दुश्मन को किया। उसके बाद बंदूक के साथ मोहर सिंह जंगलों में घूम रहा था। शुरू में उसने बाकि बागियों के गैंग में शामिल होने की कोशिश की। दो साल तक जंगलों में भटकते हुए मोहर सिंह की किसी गैंग में पटरी नहीं बैठी तो मोहर सिंह ने फैसला कर लिया कि वो खुद का गैंग बनाएंगा और गैंग भी ऐसा जिससे चंबल थर्रा उठे। 
गांव में ताकतवर लोगो से बदला लेने में ना कानून साथ देता है, ना भगवान और न ही अदालत की चौखट। चंबल में हर कमजोर के लिए ताकत हासिल करने का एक ही शॉर्ट कट है और वो है चंबल की डांग में बैठकर राईफलों के सहारे अपने दुश्मनों पर निशाना साधना।  मोहर सिंह की बदूंकें आग उगर रही थी और निशाना बन रहे थे दुश्मन। 
चंबल के मोहर सिंह ने अपना गैंग बनाया तो उस वक्त कई गैंग चंबल में अपना खौंफ बनाएं हुए थे। मानसिंह गैंग की कमान लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का पंडित के हाथों में थी। लाखन, माधों सिंह, हरविलास, छोटे-बटुरीसिंह जैसे गैंग पूरे चंबल में घूम रहे थे। और मोहर सिंह को इन्ही के बीच अपना रास्ता बनाना था। मोहर सिंह ने अपने साथियों के साथ पहले छोटी छोटी वारदात करना शुरू किया। और पुलिस के रिकॉर्ड में उसकी एंट्री शुरू हुई। 
मेहगांव थाने में धारा140/60 के तहत पहला अपराध था जो मोहर सिंह गैंग के खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। 1960 में ही गौहद थाने में दूसरा अपराध दर्ज हुआ(307/60) हत्या के प्रयास का। 

1961 में गौहद में पहला कत्ल का केस दर्ज हुआ। 
और इसके बाद की कहानी कत्लों का एक सिलसिला है।
मोहर सिंह ने पहले तो भिंड और आसपास के इलाके में अपराध किए लेकिन जैसे जैसे गैंग बढ़ने लगा मोहर सिंह ने भी अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। मोहर सिंह अपने गैंग के अनुशासन को लेकर बेहद सतर्क था। मोहर सिंह का गैंग बढ़ रहा था उधर दूसरी और पुलिस एक एक कर चंबल के दूसरे गैंग का सफाया कर रही थी। मोहर सिंह ने इसका तोड़ निकाल लिया था। मोहर सिंह ने चंबल में ऐलान कर दिया था कि जो कोई भी उनके गैंग की मुखबिरी करेंगा उसका पूरे परिवार को साफ कर दिया जाएंगा। और इस पर उसने कड़ाई से अमल शुरू कर दिया। मुखबिरों को निबटाने में मोहर सिंह बेहद खूंखार हो जाता था। 
मुखबिरों को और उनके परिवार पर मोहर सिंह शिकारी की तरह से टूट पड़ता था। मोहर सिंह के गैंग के ऊपर ज्यादातर मुखबिरों के कत्ल के मामले बन रहे थे। लेकिन चंबल में मोहर सिंह का खौंफ पुलिस और उसके मुखबिरों पर लगातार बढ़ता जा रहा था। और इसका फायदा मिल रहा था मोहर सिंह को। मोहर सिंह का नाम मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में फैल गया था। जहां दूसरे गिरोहों को किसी भी गांव में रूकते वक्त मुखबिरी का डर रहता था वही मोहर सिंह का गैंग बेखटके अपनी बिरादरी के गांवों में ठहरता और पुलिस को खबर होने से पहले ही निकल जाता था।
मोहर सिंह ने अपने गैंग को सबसे बड़ा गैंग बनाने के साथ-साथ कुछ कठोर नियम भी बना दिये थे। मोहर सिंह गैंग में किसी भी महिला डाकू को शामिल करने के खिलाफ था। और इसके साथ ही उसके गैंग को सख्त हिदायत थी कि वो किसी भी लडकी और औरत की और आंख उठाकर न देखे नहीं तो मोहर सिंह उसको खुद सजा देगा। ये बात पुलिस अधिकारियों को आज भी याद है
और इस बात को  साल बाद भी मोहर सिंह याद रखता है कि.........कृमशः😂🙏
(अगली कड़ी शीघ्र ही पोस्ट की जायेगी )
                       जितेंद्र सिंह तोमर'५२से'
                        13/12/2017

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

चम्बल एक सिंह अबलोकन

           ===चम्बल एक सिंह अबलोकन===
                ★रूपा पण्डित ★{तृतीय भाग}
सर्दिया अपना पूर्ण रूप लेने लगी थी और इधर रुपा पर  बिचित्र सनक सबार होती जा रही थी।31 दिसंबर 1958 की रात मध्यप्रदेश और राजस्थान के के बीच एक छोटे से गांव से चार लोगो को रूपा ने पकड़ा और उनका कत्ल कर दिया। थोड़ी देर बाद ही मुरैना जिले के एक गांव से चार और बेगुनाह लोगो को पकड़ उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। रूपा ने मध्यप्रदेश पुलिस के ऐलान का जवाब इस तरह से बेगुनाहों का खून बहा कर दिया था। 
मध्यप्रदेश पुलिस की डायरियों में रूपा और लाखन जी1और जी 2 के गैंग के तौर पर दर्ज हो चुके थे। पुलिस किसी भी कीमत पर इन दोनो का सफाया करना चाहती थी। इसी बीच अपने दुश्मनों की हवेली जला कर लाखन ने पुलिस के लिए बड़ी चुनौती डाल दी थी। इस पर सरकार ने सबसे पहले लाखन का सफाया करने के लिए एसएएफ की एक पूरी बटालियन पुलिस अधिकारी टी क्विन (कोड नेम जो असल कुछ और थी)के नेतृत्व में लाखन के गांव नगरा में उतार दी।
 टी क्विन किसी भी तरह से लाखन का सफाया चाहता था।  पहले तो सीधी मुठभेड़ हुई लेकिन लाखन सिंह आसानी से पुलिस के जाल को काटकर निकल भागा। इस पर टी क्विन ने पहली बार चंबल में ऐसी चाल चली जो चंबल में न कभी सुनी गई थी और न देखी गई थी।
टी क्विन नगरा के आस पास के गांवों की रात दिन खाक छान रहा था। हर गांव में उसने अपना मजबूत मुखबिर तंत्र खड़ा कर लिया था। लेकिन उसको न लाखन का सुराग मिल रहा था और न ही रूपा का।  टी क्विन ने  रूपा के गैंग छोड़ कर पुलिस के सामने समर्पण करने वाले एक डकैत को अपने विश्वास में ले लिया।    उससे हासिल सूचनाओं के आधार पर टी क्विन ने एक के बाद एक रूपा के लोगो को पकड़ना और मार गिराना शुरू कर दिया। रूपा ने बदला लेने का प्लान बनाया।
भिंड में पुलिस के घेरे में रह रहे मुखबिर के रिश्तेदारों को टार्चर किया और उन्हें मजबूर कर दिया कि वो मुखबिर को किसी बहाने से अपने यहां बुलाएं। और एक दिन जब वो मुखबिर जाल में फंस कर अपने रिश्तेदारों के यहां पहुंचा तो वहां उसका इंतजार कर रहा था .......रूपा। मुखबिर को बुरी तरह से यातना देकर मौत के घाट उतार दिया। 
 इसके बाद रूपा ने अपना दिमाग लगाया टी क्विन के सफाए पर। टी क्विन ने कई बार रूपा को दौड़ाया था और उधर रूपा ने एंबुश करना शुरू कर दिया। एक दिन मुरैना के जंगलों में घूम रहे टी क्विन पर उसका निशाना लग भी गया ........ अब तक पुलिस व्यूह रचती थी लेकिन इस बार सिकरवारि की डांग में शिकारी खुद शिकार हो गयी होती लेकिन टी क्विन के ड्राईवर ने अपनी जान पर खेलकर भी टी क्विन को निकाल लिया। वारदात में टी क्विन के साथ बात करने वाले 9लोगो को रूपा ने गोलियों से भून दिया। 
टी क्विन ने हार नहीं मानी। एक के बाद एक मुखबिरों के सहारे दोनो गैंग को ठिकाने लगाने की कोशिशों में जुटा रहा। लेकिन दोनो गैंग अलग अलग दिशाओं में काम करते थे ऐसे में एक दिन टी क्विन को  एक मुखबिर ने सलाह दी कि क्यों न 'कंटनैव कंटकै'की निति से काम  निकाल दिया जाएं।
कांटे से कांटा यानि लाखन का कांटा रूपा के कांटे से निकाल दिया जाएं। और फिर रूपा का देखा जाएंगा।  टी क्विन को ये राय जम गई। और फिर टी क्विन ने रूपा पर जाल बिछाना शुरू कर दिया।  रूपा के एक रिश्तेदार की मदद से टी क्विन उस तक पहुंच गया। 
टी क्विन ने रूपा को लालच दिया कि अगर वो लाखन सिंह का सफाया करा देता है तो फिर उसको हाजिर कराने में टी क्विन उसकी मदद करेगा। ये तो आज भी साफ नहीं कि क्या वाकई रूपा इस बात परयकीन कर रहा था? लेकिन ये साफ था कि वो लाखन सिंह का सफाया चाहता था लिहाजा उसने टी क्विन से हाथ मिला लिया। इसके बाद टी क्विन को सूचना मिलना शुरू हो गया।  

पुलिस को पोरसा इलाके में लाखन सिंह की सटीक मुखबिरी पुलिस को कर दी। सैकड़ों  पुलिस वाले तेजी से पोरसा के जंगलों में चुपचाप जा धमके। लेकिन किस्मत ने लाखन का साथ दिया। उसकी लोकेशन से पहले ही पुतली का गैंग निश्चित होकर खाना बना रहा था। ऐसे में पुलिस का उसके साथ आमना सामना हो गया। घटना में पुतली और उसका पूरा गैंग पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया। लेकिन लाखन मौके का फायदा उठाकर निकल चुका था। 
पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी। इससे भी ज्यादा परेशानी टी क्विन और रूपा पंडित के बीच के रिश्तों को लेकर होने लगी। टी क्विन चंबल के सबसे खूंखार डकैत के साथ दोस्ती की कहानियां सरकार को मिलने लगी। मीडिया ने दबाव बढ़ा दिया। टी क्विन को जेड ओ यानि जोनल ऑफिसर वन कहा जाता था लेकिन इन दोनो के रिश्तों के चलते पूरे इलाके में रूपा को जेड़ ओ 1 और टी क्विन को जेड और 2 कहा जाने लगा। 

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 26 अक्तूबर 1959 का दिन था। टी क्विन ग्वालियर से वापसी के रास्ते में महुवा गांव में रूके। इस बीच महुवा थाने के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ कि जी 1 गैंग की आमद इलाके में होने वाली है। रूपा का गैंग वारदात के लिए लाखन के गांव नगरा की ओर जाने वाला है। गैंग की दूरी कुछ मील दूर है।  टी क्विन ने कुछ ही देर में 9 बटालियन का इंतजाम कर लिया। इलाके को पूरे तरह से घेर लिया गया।  
दो प्लानटून नगरा की तरफ
दो प्लाटून महुआ, 
दो प्लाटून काली आरोली
और एक एक प्लाटून उद्योतगढ़ और पोरसा भेज दी गई। 
क्विंस ने छह बटालियन के साथ मार्च किया।  और बीहड से चंबल के बीच की जगह में घेरा बंदी कर ली। पुलिस जैसे ही कुछ आगे बढ़ी तो गैंग के पहरेदार जिसे आउटपोस्ट कहा जाता है ने शोर मचाना शुरु कर दिया कि "पतरी दाल खाने बालो की आमद हुई भजो रे भजो" गोलियां चलने लगी। पुलिस ने आवाज को निशाना बना कर 28 ग्रुप बना कर एक के बाद एक कई घेरे बना  दिये। 
गैंग तीन तरफ से भाग कर तीन मील को पार कर राजस्थान में निकलना चाहता था लेकिन हर तरफ पुलिस की भारी फायरिंग हो रही थी। और रूपा के गैंग के बचने का कोई रास्ता नहीं था। चंबल की ओर भागते हुए गैंग को चंबल से आधा किलोमीटर पहले ही एक दूसरी पुलिस पार्टी से सामना हुआ। पुलिस जमादार बालम सिंह ने अपनी रेंज में दिख रहे  तीन लोगो पर अचानक अपनी टॉमीगन से गोलियों की बौछार कर दी। गोलियों के साथ चीखने की आवाज भी हवा में गूंजी और फिर शांत हो गई। रात का वक्त था ऑपरेशन रोक दिया गया। अल सुबह तलाश शुरू हुई तो कुछ दूर जंगल में एक लाश मिली लेकिन जैसे उसका चेहरा पहचाना गया तो टी क्विन निराश हो गया क्योंकि ये रूपा नहीं था बल्कि उसका गैंग का राजाराम था। पुलिस पार्टी लौट ही रही थी कि एक और खून के निशान दिखाई दिए।ष निशान के पीछे जाने पर कुछ दूर पर ही गोलियों से छलनी एक लाश थी। और लाश की पहचान के साथ ही टी क्विन खुशी के साथ नाचने लगा। क्योंकि ये लाश किसी और की नहीं मानसिंह के बाद चंबल के सबसे बड़े डाकू रूपा की लाश थी। 
हालांकि चंबल के किस्सों में ये कहानी कुछ दूसरे तरीके से कही जाती है।
आम लोगो के  मुताबिक टी क्विन ने लाखन को मार पाने में नाकाम रहने पर रूपा का ही काम तमाम करने की ठानी। उधर रूपा को टी क्विन पर पूरा विश्वास था लिहाजा टी क्विन के बुलावे पर वो  गैंग को पीछे छोड़ कर सिर्फ राजाराम के साथ ही महुआ आ पहुंचा और वहां टी क्विन ने उसका एनकाउँटर कर दिया और एक खूबसूरत जाल में फसकर रुपा ने स्वम अपनी मोत का सामान इक्ट्ठा किया था ।
लेकिन कहानी कुछ भी हो चंबल का एक और आतंक पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया था। इस मुठभेड की सूचना मिलने पर के एफ रूस्तम जी ने अपनी टेबल में लगे हुए चार्ट से जी 1 गैंग के नाम पर भी काटा लगा दिया। और चंबल का एक और खौंफनाक डाकू जमीन से उठ कर किस्सों की नदी में उतर गया। 

-: किस्सा पुलिस रिकार्ड और बुजुर्गो की बातो पर आधारित।
कृमशः....
मिलते रहेंगे किसी नयी पुरानी कहानी के साथ। सलग्न चित्र प्रतीकात्मक।

सोमवार, 27 नवंबर 2017

★चम्बल एक सिंह अवलोकन★भाग 11

===चम्बल एक सिंह अबलोकन===
                भाग -११
        ●रूपा पण्डित' दीक्षित'●
"खेड़ा राठौड़"..............!
ये नाम आपको जाना पहचाना लग रहा होगा.... ऐसे हर आदमी को जिसका चंबल से जरा सा भी रिश्ता है उसको ये नाम कभी भूल ही नहीं सकता है।
और कभी न भूलने का एक तगड़ा कारण भी हे किवदंतियों ,किस्सों,नोटंकियो के बिभिन्न माध्यमो के द्वारा आम जनमानस के मस्तिष्क पटल में एक अमित छाप जो हे इस बीहड़ी गाँव की ।हम लाख कोशिश करे की स्मरण विस्मरण हो जाए किन्तु इस ठिकाने में बने हुए दो बागि मन्दिरो के घड्याळ और नित्य शांध्य् कालीन भजन पूजन हमे कुछ सोचने को मजबूर कर ही देती हे ।कि जब जब ये डाकू थे तो इन मन्दिरो का असितित्व क्यों ?
जी बागी सम्राट् राजा मानसिंह मन्दिर से थोड़ा हटकर एक और बागी का मन्दिर हे और दस्यु का नाम था 'रुपा महाराज उर्फ़ रुप्पे पण्डित बिल्लोरी आँखों बॉला चम्बल का एक सरदार जिसने T Quin (कोड नेम) जेसे अधिकारी से मित्रता की और इसी मित्रता के पाश में बंधकर चम्बल के झलावे के रूप मशहूर लाखन सिंह का एनकाउंटर करवाना चाहां और पुलिस व्यूह में स्वम फस गया । आइये काफी समय वाद पुनः "चम्बल एक सिंह अबलोकन" श्रंखला की अगली कड़ी में रूबरू होते हे रुपा महाराज से ।
ये गांव  राजा मानसिंह का गांव है। टूटे-फूटी गढ़ी में मानसिंह की कहानी आपको सुनाई दे सकती है लेकिन इस गढ़ी के सामने  बिखरे पड़े मिट्टे के टीलों में भी ये किस का घर हे ये कोई आसानी से नहीं बता सकता।दशकों के मौसम की मार झेलता हुआ एक घर अब टीला बन चुका लेकिन इस टीले से निकली एक आवाज अब भी चंबल के बीहड़ों में गूंजती है।जब भी मानसिंह का नाम गूंजता है तो एक और आवाज साथ में फूट पड़ती है वो है रूपा पंडित की आवाज।  मानसिंह की गढ़ी के ठीक सामने उसके आंगन में एक छोटा सा घर कभी के रूप्पे पंडित का घर था।  रूपा के पुरखे मध्यप्रदेश में रहते थे लेकिन  मानसिंह के परिवार वाले कुल पुरोहिताई के लिए उनको मध्यप्रदेश से बुला कर लाए थे और रहने के लिए अपने ही हिस्से से थोड़ी  सी जमीन दे दी थी। रूपा का परिवार इसी पुरोहिताई और थोड़ी सी खेती के सहारे अपने दिन काट रहा था।

मानसिंह के परिवार की दुश्मनी गांव के पंडित तलफीराम से शुरू हुई तो आंच रूपा महाराज के परिवार पर आनी शुरू हो गई।30जुलाई1928गांव में कत्ल हुए तो रूपा के पिता छविराम का नाम भी मानसिंह के साथ ही लिखा दिया ।
मामले में मानसिंह के साथ छविराम को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।  छविराम जेल से बाहर नहीं आ पाया। उसके चार लड़के रूपनारायण,कन्हाई,लक्ष्मीनारायण और दुल्ला  पूरे तौर पर मानसिंह के परिवार पर ही निर्भर थे। रूपनारायण उर्फ रूप्पा उस वक्त महज12साल का था। छविराम की तबीयत जेल में खराब रहने लगी। और फिर एक दिन छविराम ने आखिरी सांस लेते हुए मानसिंह से वचन लिया कि वो रूप्पे का अपने बेटे की तरह से ख्याल रखेंगा।

छविराम का परिवार सदमे में दिन गुजार रहा था कि एक और हादसा इस परिवार के साथ हो गया।एक दिन पुलिस गांव में पहुंची और रूपा के चाचा मुरारीराम को पकड़ कर ले गई। और उसके कुछ देर बाद लाश बीहड़ों में पड़ी मिली.................
मुरारीराम का किसी से कोई झगड़ा नहीं था। रूपा लाश की हालत देखकर रोता हुआ पुलिस के पास पहुंचा और हत्यारों को पकड़ कर सजा दिलाने की गुहार लगाई। किस्सा है ये कि थाने में रूपा को बजाय मदद के एक किक मिली और थाने से बेईज्जत कर बाहर कर दिया।चंबल में जब भी कानून से किसी को निराशा मिलती है उसकी आशा बीहड़ों में सिमट आती है। रूपा के लिए तो चंबल वैसे भी जाना-पहचाना था।
किशोर वय रुपा अभी मात्र 14 वर्षीय था और चम्बल की शरण में एक शातिर बिल्लोरी आँखों बाला रहस्य भी बाज की मांनीद जवान होता गया उम्र के साथ अपराध भी परवान चड़ने लगे .........

शुरूआत में गांव में आने वाले गैंग के लिए पहरे पर खड़े होने वाले रूपा की दिलेरी मानसिंह के दिल में घर करने लगी।रूपा को सिर्फ बाहर से नहीं भीतर से चंबल को देखना था। बंदूकों की रखवाली नहीं करनी थी बल्कि बंदूकें चलानी थी। रूपा ने बंदूकों का साथ देते देते एक दिन खुद ही बंदूक थाम ली। और अब वो चंबल में मानसिंह गैंग का एक मैंबर हो गया। एक ऐसा मेंबर जिसको मानसिंह बेटे जैसा मानते थे।रूपा का निशाना काफी तेज था। पुलिस की फाईलों में रूप्पा का नाम दर्ज हो गया रूपापंडित के तौर पर। मानसिंह के गैंग में उनका बड़ा भाई नवाबसिंह,बेटा सूबेदार सिंहऔर तहसीलदार सिंह थे। लेकिन रूपा अपनी पहचान बनाने में सफल रहा था।
रूपा ने अपने बाप की मौत के बाद सिर्फ मानसिंह को ही अपना सगा मान लिया था। मानसिंह के इशारे परकिसी भी जान लेने के लिये तैयार रूपा उसके एक इशारे पर अपनी जान देने के लिए भी तैयार रहता था।रूपा अपने सरदार मानसिंह की तरह ही पूजा पाठी था। और किसी भी वारदात से पहले शगुन का विचार करता था। यहां तक कि मानसिंह की आखिरी मुठभेड़ से पहले भी उसने मानसिंह से गैंग को उस दिशा में ले जाने से मना किया था।  लेकिन होनी को कौन टाल सकता है इतने शगुन विचार वाले रूपा पंडित को भी पुलिस कीगोलियों का ही निशाना बनना था।
मानसिंह के गैंग में लोग बढ़ने लगे थे। और गैंग में एक और डकैत था जिस पर गैंग को नाज था और वो था लाखन सिंह तोमर। लाखन सिंह और रूपा गैंग में एक दूसरे से होड़ करते थे। दोनो बेहद शातिर और तेज निशानेबाज,और दोनो पर ही गैंगकी नजर। ऐसे में मानसिंह को लगने लगा था कि इन दोनों की दोस्ती गैंग को लेकर कभी भी दुश्मनी में बदल सकती है। और ऐसे में एक दिन मानसिंह ने गैंग को दो हिस्सों में बांट दिया। एक हिस्सा लाखन सिंह को देकर दूसरे हिस्से में रूपा को रख लिया।लाखन सिंह ने अलग गैंग बना लिया। और रूपा मानसिंह के साथ रह कर वारदात करने लगा। इसीबीच एक मुठभेड़ में मानसिंह का लड़का तहसीलदार सिंह घायल होकर गिरफ्तार हो गया।तहसीलदार सिंह के खिलाफ कुछ लोगो ने गवाही दी। तहसीलदार सिंह को फांसी की सजा से बचाने के लिए मानसिंह और रूपा ने चंबल में तबाही मचा दी। हर उस गवाह या उसके रिश्तेदारों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया जिसकी गवाही से तहसीलदार सिंह के गले पर फांसी का फंदा कस सकता था।
एक दिन मानसिंह गैंग लौट रहा था कि उसकी पुलिस से मुठभेड हो गई। मुठभेड़ में मानसिंह पुलिस के जवान गोविंद सिंह थापा की गोलियों का निशाना बन गया।  गोलियों से जख्मी मानसिंह ने रूपा को देखा और दम तोड़ दिया। रूपा अपने मुखिया की लाश को वहां छोड़ना नहीं चाहता था।100किलो वजनी मानसिंह की लाश को कंधें पर उठाकर रूपा ने दो किलोमीटर तक दौड़ लगाई लेकिन सैकड़ों की तादाद में पुलिस की गोलियां गैंग पर भारी पड़ रही थी। गैंग के लोगो ने रूपा से लाश को वही छोड़कर निकलने को कहा। निराश रूपा ने लाश को वहां रखा और हाथ जोड़कर सबके सामने कसम खाई कि वो इस खून का बदला लेगा।
गैंग लौट चुका था। मानसिंह के साथ उसका बड़ा बेटा सूबेदार सिंह भी मारा जा चुका थाऔर तहसीलदार सिंह जेल में था। ऐसे में गैंग की कमान किसको दी जाए। मानसिंह का बड़ा भाईनवाबसिंह जिंदा था लेकिन गैंग को एक ऐसे मुखिया की जरूरत थी जो टूटे हुए मनोबल को ऊंचा उठा सके और गैंग का रुतवा बनाएं रखे। सबकी निगाहें टिकी रूपा पंडित पर। और चंबल में मानसिंह के बाद उसके गैंग की कमान संभाल ली रूपा पंडित ने।  रूपा पंडित अब रूपा महाराज बन चुका था। और वक्त था उसकी कसम पूरी करने का।रूपा महाराज चंबल में खौंफ का नया नाम बन चुका था। गैंग की कमान संभालते ही उसने दुश्मनों से हिसाब किताब करना शुरू कर दिया। लाखन सिंह का गैंग भी चंबल में बड़ा गैंग बन चुका था। पहले तो मानसिंह की मौत के बाद सुलह सफाई हुई। लेकिन जल्दी ही चंबलकी बादशाहत को लेकर दोनो में दुश्मनी ने एकनया रंग ले लिया।पहले लाखन ने कुछ लोगो को परेशान किया रूपा के फिर रूपा नेलाखन के लोगो को मारना शुरू कर दिया।दोनों गैंग का आमना-सामना भी होने लगा।
लाखन सिंह के साथ के लोग आसानी से रूपा महाराज या उसके गैंग पर गोलियां चलाने से इस लिये भी पीछे हट जाते थे कि ये मानसिंह का गैंग है यानि राजा मान सिंह का गैंग जिसको चंबल में किसी ने चुनौती नहीं दी थी।चंबल में रूपा ने जल्दी ही मानसिंह की तरह से ही दरबार लगाना शुरू कर दिया। चंबल के गांवों में रूपा का कहा कानून बन गया। कानून से निराश लोगों ने रूपा के दरबार मेंगुहार लगाना शुरू कर दिया। रूपा हर किसी काइंसाफ अपने अंदाज में करता था। उसके फैसले के खिलाफ कही अपील नहीं थी। जिसको भी दोषी पाया गया उसकी सजा मुकर्रर थी। एक गोली की आवाज और सांस जिस्म से बाहर।मानसिंह की मौत के बाद उसके दुश्मनों ने फिर से सिर उठाया। मानसिंह की जमीन को जोतना शुरू कर दिया। मानसिंह की पत्नी रूकमणी देवी हताश थी क्योंकि तहसीलदार सिंह जेल में था और पूरे गांव में पहरा। मानसिंह के दुश्मन  दीवाली का त्यौहार जोरो-शोरो के साथ मनाने जा रहे थे। गांव में शाम हो चुकी थी। और कुछ पटाखों की आवाज आई। लेकिन ये पटाखें दीवाली के पटाखे नहीं थे ये मौत के पटाखे थे और मौत रूपा महाराज के नाम से आई थी।रूपा ने ये ऐलान कर दिया था कि जब तक वो जिंदा है मानसिंह के परिवार की ओर आंख उठाने वाले को गोलियों से भून दिया जाएगा।
रूपा का आतंक चंबल में फैलता जा रहा था। रूपा के गैंग में35से40लोग थे। और पुलिसके मुताबिक हर रोज का खर्च200रूपए था। गैंग के पास सबसे अत्याधुनिक हथियार थे।  टेलीस्कोपिक राईफल तो रूपा की पहचान थी तो उसके गैंग के पास शक्तिशाली दूरबीन,हैंडग्रेनेड,टीएमसी,ब्रेनगन और वॉयरलैस सेट तक थे।  रूपा ने दशको तक पकड़ कर उनके परिवारवालों से लाखों रूपए इकट्ठा किए । पुलिस रूपा का कुछ नहीं बिगाड पा रही थी। गैंग अपहरण करता और रूपा का नाम घर तक पहुंचता था और घर वाले पैसा पहुंचा दिया करते थे।
एक बार चंबल के एक गांव से रूपा केगैंग ने पकड़ की और लड़के के बाप को फिरौती की खबर भिजवा दी गई। लेकिन लड़के के बाप ने ये खबर पुलिस को दे दी। ये बात रूपा तक पहुंची तो रूपा ने घात लगाकर बाप को भी उठा लिया। उसके बाद चंबल के बीहड़ों में बाप बेटे को ऐसी यातनाएं दे कर मौत के घाट उतारा कि सुनने वालों की रूह कांप उठे। इसके बाद चंबल में रूपा का विरोध करने की हिम्मत किसी की नहीं रही।चंबल में रूपा का नाम आंतक और खौंफ का नाम बन चुका था।. अब यदि पुलिस को किसी पकड़ के बारे में जानकारी मिलती और वो पूछताछ के लिए भी पहुंचती तो पकड़ के परिवार वाले ही पकड़ से इंकार कर देते थे।
चंबल में रूपा महाराज का नाम तो गूंज रहा था लेकिन बेताज बादशाह बनने की इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। और ये ही कारण था कि रूपा और लाखन की दुश्मनी बढने लगी।चंबल में एक तरफ रूपा की बंदूकें गरज रही थी तो उसी  वक्त लाखन सिंह भी पुलिस को नाकों चने चबवा रहा था। लगातार डकैतियों और कत्ल की वारदात से पुलिस हैरान-परेशान हो उठी।  चंबल का बादशाह बनने के लिए छटपटा रहे रूपा महाराज ने अपने गैंग के लोगो से वादा किया कि वो लाखन को खत्म कर के रहेगा। दोनों गैंग कई बार आपस में टकराए लेकिन हर बार लाखन बच कर निकलने में कामयाब हो गया।लाखन सिंह से बुरी तरह नाराज रूपा भी चाहताथा कि किसी तरह से लाखन सिंह का सफाया हो जाए तो फिर चंबल में उसके सामने बोलने वाला कोई नहीं बचेगा। रूपा को बादशाहत पसंद थी। वो किसी को भी मार गिराने में पल भर भी नहींलगाता था।
चंबल के किस्सों में एक बहुत मशहूर किस्सा है कि1946में रूपा अपने मुखिया मानसिंह से कहकर चंबल से बाहर कोलकाता गया था। महीनो बाद लौटे रूपा से मानसिंह ने पूछा कि तुमने कोलकाता क्या किया तो उसने जवाब दिया था कि दाऊ एक दर्जन से ज्यादा लोगो का सफाया।रूपा इस दौरान चंबल में वारदात भी कर रहा था। चंबल में उसने सैकड़ों पकड़ की थी,और सैकड़ों डकैतियों से उसको लाखों का माल हासिल हुआ था। खुद गांव के लोग भी सामान पहुंचाते थे। ऐसे में इतनी रकम का रूपा क्या करता था ये सवाल भी पुराने पुलिस अधिकारियों की डायरियों मिलता है।
बाप का कत्ल कर उसके बेटे को पैसा थमा देने जैसी सनक का शिकार था रूपा। किसी पर खुश होकर उसके पैसा थमा देना उसके लिए रोजमर्रा की बात थी।  मध्यप्रदेश पुलिस ने1958में कहाकि वो रूपा का इस साल के आखिर तक सफाया कर देंगी। और रूपा ने पुलिस के इस बयान का अपने अंदाज में जवाब दिया।

क्रमश:
सलग्न चित्र उसैद घात चम्बल

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

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