शनिवार, 12 अगस्त 2023

शब्द श्रद्धांजलि ♥️🙏♥️

अन्तर्जाली स्मरणिका और तुम
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बो कल का दिन था!जब तुम्हे पिछले 13 वर्ष उपरांत पुनः एक बिसराई हुई कसक की तरह सहज कुरेदा था मेने। 
महसूस किया था..तुम्हारे पंचम स्वर में निहित वेदना को,रुग्णता के पलो में जो दिव्य औषधि रूपी साथ था! आज छिन्न-भिन्न सा है ।
जेसे किसी ने वर्षो से संजोये हुए मुक्तकों की मणिका को एक पल में खण्डित कर दिया हो,और में और तुम छिटक के शिखर के किसी बिबर  में पढ़कर अनन्त रसातल की यात्रा पर निकल चुके हों....!!

हम एक ऐसी यात्रा के सहभागी बनकर रह गए।जो जीवन के प्रतिभागी बनने में दो राहे से होकर निकलनी थी।तुम्हारे शब्द मूक होकर मष्तिष्क में भूचाल ला देते थे। कितना कुछ समानता का समिश्रण था, स्वर से मुखर तक पुष्प-श्रद्धा के साथ आभा का समीकरण तक।यहां तक की अंतरात्मयी ऐश्वर से धमनियों के रक्त तक का एक ही होना संयोग मात्र नहीं हो सकता था.!!!

हाँ में!!
 तुम्हारे अदृश्य एक कृतिक का आज भी उपासक हूँ, किन्तु स्मरणी चिन्हो से वंचित हूँ।क्योंकि जब हृदय में साक्षात-चिरस्थायी एक प्रतिबिम्ब हो तो स्मरणीका चिन्ह स्वयं का स्वरूप छोड़कर अनन्त में यात्राबलंबित हो जाते हैं न.....??

किन्तु अन्तर्जाली स्मृति एक वर्ष-दस वर्ष, प्रतिवर्ष अथवा उम्र रहने तक,साँस चलने तक।सहज ही कुछ न कुछ स्मरण करने को प्रतिबद्ध करते रहती है। 
कि आज १० वर्ष की स्मरण,साढ़े तीन वर्ष की स्मृति कणिका अपना अनन्त ०(शून्य) त्याज्य करके पुनः ११ (एकादस) आलंबन के लिए स्वागतातुर है ।और तुम्हारा यथेस्ट १(एक), अभीस्ट १(एक) युग्म न होकर सदैव एकाकारी ही रह गया !
शीर्ष पर लघु शून्य,मध्य में वक्रार्द्ध और तल में निम्नतम तक नींव के साथ अपना असितित्व लिए बस प्रतीक्षित सा खड़ा है । 

फिर स्वविवेक अनुसार तुम १ से लेकर ९की दहाई तक,अपने भाल को  किसी से भी अंकित करो ये एकल था।एकल की सन्तुति और एकल ही प्रतीकित होगा।।

किसी का योग बनना सम्भवतः मेरी नीयति में नहीं और दहाई रिक्त होकर भी कोई रिक्तता नहीं ..!!!!
समय हंस से उसके पखेरू कुतरकर उसकी उड़ान समाप्त कर सकता है।किंतु उसके विवेकी नीर-क्षीर पृथक करने की क्षमता को कभी समाप्त नही कर सकता  है।
संकल्पों के कभी विकल्प नही होते,विकल्पों के सदैव अनन्त संकल्प जो होते है।एकमेवता संकल्पता की शिद्धि  है,जिसके समक्ष विवेक और श्रेष्ठता की परिशिष्ठता समाप्त हो जाती है ।
कुछ अनुभूतियां आजन्म समाप्त नही होती हैं,जैसे किसी का होना-न होना।अदृश्यता में दृश्यता व भास-आभाष से मुक्त अनुभूति भी एक सजीव आभा है ।
श्रेष्ठता परिमापन की असल आजतक कोई इकाई नही बनी है,वह तो हम लोंगो की नजर है जो...लाभ-हानि से जोड़कर श्रेष्ठता व निष्ठता का स्वभाव अनुसार परिमापन किया करती है ।

 ।। श्रद्धा_पुष्प_आभा_के_स्वमेवी_एकाकी भाव के साथ,स्वयं को साक्षात भावव्यक्ति पूर्ण होने पर ..प्रथम से आज १३ वर्षीय पूर्ण होने पर बधाई के साथ श्रद्धांजलि ।।
                       🙌🌷🎭
                   ~  जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
                        चम्बल मुरैना मप्र .

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

फूलन का आत्मसमर्पण

5 दिसंबर, 1982 की रात मोटर साइकिल पर सवार दो लोग भिंड के पास बीहड़ों की तरफ़ बढ़ रहे थे. हवा इतनी तेज़ थी कि भिंड के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र चतुर्वेदी की कंपकपी छूट रही थी.
उन्होंने जींस के ऊपर एक जैकेट पहनी हुई थी, लेकिन वो सोच रहे थे कि उन्हें उसके ऊपर शॉल लपेट कर आना चाहिए था.
मोटर साइकिल पर उनके पीछे बैठे शख़्स का भी ठंड से बुरा हाल था. अचानक उसने उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा, 'बाएं मुड़िए.' थोड़ी देर चलने पर उन्हें हाथ में लालटेन हिलाता एक शख़्स दिखाई दिया.

वो उन्हें लालटेन से गाइड करता हुआ एक झोपड़ी के पास ले गया. जब वो अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर झोपड़ी में घुसे तो अंदर बात कर रहे लोग चुप हो गए.

साफ़ था कि उन लोगों ने चतुर्वेदी को पहले कभी देखा नहीं था. लेकिन उन्होंने उन्हें दाल, चपाती और भुने हुए भुट्टे खाने को दिए. उनके साथी ने कहा कि उन्हें यहां एक घंटे तक इंतज़ार करना होगा.
थोड़ी देर बाद आगे का सफ़र शुरू हुआ. मोटर साइकिल पर उनके पीछे बैठे शख़्स ने कहा, 'कंबल ले लियो महाराज.' कंबल ओढ़कर जब ये दोनों चंबल नदी की ओर जाने के लिए कच्चे रास्ते पर बढ़े तो चतुर्वेदी के लिए मोटर साइकिल पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो रहा था रास्ते में इतने गड्ढे थे कि मोटर साइकिल की गति 15 किलोमीटर प्रति घंटे से आगे नहीं बढ़ पा रही थी.
वो लोग छह किलोमीटर चले होंगे कि अचानक पीछे बैठे शख़्स ने कहा, 'रोकिए महाराज.'
वहां उन्होंने अपनी मोटर साइकिल छोड़ दी. गाइड ने टॉर्च निकाली और वो उसकी रोशनी में घने पेड़ों के पीछे बढ़ने लगे. अंतत: कई घंटों तक चलने के बाद ये दोनों लोग एक टीले के पास पहुंचे.
चतुर्वेदी ये देख कर दंग रह गए कि वहां पहले से ही आग जलाने के लिए लकड़ियाँ रखी हुई थीं. उनके साथी ने उसमें आग लगाई और वो दोनों अपने हाथ सेंकने लगे.
राजेंद्र चतुर्वेदी ने अपनी घड़ी की ओर देखा. उस समय रात के ढाई बज रहे थे. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर चलना शुरू किया.
अचानक उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी, 'रुको.' एक व्यक्ति ने उनके मुंह पर टॉर्च मारी. तभी उनके साथ वहाँ तक आने वाला गाइड गायब हो गया और दूसरा शख्स उन्हें आगे का रास्ता दिखाने लगा.
वो बहुत तेज़ चल रहा था और चतुर्वेदी को उसके साथ चलने में दिक़्क़त हो रही थी. वो लगभग छह किलोमीटर चले होंगे. पौ फटने लगी थी और उन्हें बीहड़ दिखाई देने लगे थे.

राजेंद्र चतुर्वेदी याद करते हैं, ''उस जगह का नाम है खेड़न. वो टीले पर चंबल नदी के बिल्कुल किनारे है. पौ फट रही थी. हमारे साथ का आदमी आगे बढ़कर करीब 400 मीटर तक गया. उसने मुझसे कहा कि मैं ऊपर पहुंच कर आपको लाल रुमाल दिखाउंगा. जब आप यहाँ से चलना शुरू करना.''
चतुर्वेदी ने कहा, ''कुछ देर बाद उसका हिलता हुआ लाल रुमाल दिखाई दिया. मैंने धीरे-धीरे चलना शुरू किया. जब मैं टीले के ऊपर पहुंचा तो बबूल के झाड़ के पीछे से एक लंबा शख़्स बाहर निकला. उसकी शक्ल बिल्कुल जीसस क्राइस्ट से मिलती जुलती थी. उसने मान सिंह कह कर अपना परिचय कराया. उसने आगे आकर मेरे पैर छुए और मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया.''

''तभी झाड़ से नीले रंग का बेलबॉटम और नीले ही रंग का कुर्ता पहने हुए एक महिला सामने आईं. उनके कंधे तक के बाल थे जिसे उन्होंने लाल रुमाल से बाँध रखा था. उनके कंधे से राइफ़ल लटक रही थी. उनकी शक्ल नेपाली की तरह लग रही थी. पूरी दुनिया में दस्यु संदरी के नाम से मशहूर फूलन देवी ने मेरे पैर पर पांच सौ एक रुपए रख दिए.''
चतुर्वेदी ने बात शुरू की, ''मैं आप के घर होकर आ रहा हूँ.' कब? फूलन ने झटके में पूछा. पिछले महीने, राजेंद्र चतुर्वेदी ने जवाब दिया. मुन्नी मिली? फूलन का सवाल था. राजेंद्र चतुर्वेदी ने जवाब दिया- न सिर्फ़ आपकी बहन मुन्नी बल्कि मैं आपकी मां और पिता से भी मिलकर आ रहा हूँ.
उन्होंने फूलन को पोलोरॉएड कैमरे से ली गई अपनी और उसके परिवार की तस्वीरें दिखाईं. उन्होंने ये भी कहा कि वो उनकी आवाज़ें भी टेप करके लाए हैं. जैसे ही फूलन ने टेप रिकॉर्डर पर अपनी बहन की आवाज़ सुनी, उनका सारा तनाव हवा हो गया.
अचानक फूलन ने पूछा, 'आप मुझसे क्या चाहते हैं?' चतुर्वेदी ने कहा, ''आप को मालूम है मैं यहाँ क्यों आया हूँ. हम चाहते हैं कि आप आत्मसमर्पण कर दें. इतना सुनना था कि फूलन आग बबूला हो गई. चिल्ला कर बोली, ''तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हारे कहने भर से हथियार डाल दूँगी. मैं फूलन देवी हूँ. मैं इसी वक़्त तुम्हें गोली से उड़ा सकती हूँ.''
पुलिस अधीक्षक राजेंद्र चतुर्वेदी को लगा कि नियंत्रण उनके हाथ से जा रहा है. फूलन के रौद्र रूप को देखते हुए मान सिंह ने तनाव कम करने की कोशिश की. उसने चतुर्वेदी से कहा, आइए मैं आपको गैंग के दूसरे सदस्यों से मिलवाता हूँ. एक-एक कर मोहन सिंह, गोविंद, मेंहदी हसन, जीवन और मुन्ना को चतुर्वेदी से मिलवाया गया.
अचानक फूलन का मूड फिर ठीक हो गया. जब दोपहर हुई तो फूलन ने उनके लिए खाना बनाया. रोटी सेंकते हुए ही उन्होंने पूछा, ''अगर मैं हथियार डालती हूँ तो क्या आप मुझे फाँसी पर चढ़ा दोगे?' चतुर्वेदी ने कहा, ''हम लोग हथियार डालने वालों को फाँसी नहीं देते. अगर आप भागती हैं और पकड़ी जाती हैं तो बात दूसरी है."
फूलन ने उन्हें बाजरे की मोटी-मोटी रोटियाँ, आलू की सब्ज़ी और दाल खाने के लिए दी. चतुर्वेदी ने सोचा कि अगर वो पोलेरॉयड कैमरे से फूलन की तस्वीर खींचे तो शायद उसे अच्छा लगे. उन्होंने तस्वीर खींच कर जब उसे फूलन को दिखाया तो वो चहक कर बोलीं, ''आप तो जादू करियो.''
फूलन ने गैंग के सभी सदस्यों को चिल्ला कर बुला लिया और पोलेरॉयड कैमरे से खींची गई अपनी तस्वीर दिखाने लगीं. चतुर्वेदी वहाँ 12 घंटे रहे. उन्होंने फूलन और उनके साथियों की तस्वीर खींची.

फूलन ने उन्हे अपनी माँ के लिए एक अंगूठी दी थी जिसमें एक पत्थर हकीक लगा हुआ था. चलते-चलते फूलन के दिमाग़ ने फिर पलटी खाई. वो बोलीं, ''इस बात का क्या सबूत है कि आपको मुख्यमंत्री ने ही भेजा है.''
चतुर्वेदी याद करते हैं, ''मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ अपना एक आदमी कर दीजिए. मैं उसे ख़ुद मुख्यमंत्री के पास ले जाकर उनसे मिलवाऊंगा. फूलन ने एक व्यक्ति को मेरे साथ लगा दिया.''
''शाम को हमने वहाँ से चलना शुरू किया और दो बजे रात को हम भिंड पहुंचे. मैंने तुरंत मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को फ़ोन मिलाया. वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार कर रहे थे. मैंने सिर्फ़ इतना कहा, 'सर टू डाउन डन.''
टू डाउन हमारा कोड वर्ड था. मैंने उनसे कहा, सर मैं सुबह छह बजे ग्वालियर से दिल्ली की फ़्लाइट पकड़ रहा हूँ. मैंने फूलन के उस साथी के लिए भी टिकट ख़रीदा. इंडियन एयरलाइंस के अधिकारियों से अनुरोध किया कि हमें बिज़नेस क्लास में अपग्रेड कर दें. दिल्ली हवाई अड्डे से हम टैक्सी में बैठकर मध्य प्रदेश भवन पहुंचे.

चतुर्वेदी ने बताया, ''वहां मैंने अपने और फूलन के साथी के लिए कमरा बुक करा दिया था. अर्जुन सिंह ने अपनी दाढ़ी तक नहीं बनाई थी. वो अपने कमरे में बैठे चाँदी के गिलास में संतरे का जूस पी रहे थे. मैंने उन्हें पोलोरॉएड कैमरे से खीचीं गई फूलन की तस्वीरें दिखाईं. मैंने कहा उनके एक आदमी मेरे साथ आए हैं और मेरे कमरे में बैठे हुए हैं.''
उन्होंने फ़ौरन उन्हें बुलवा लिया. उन्होंने देखते ही अर्जुन सिंह के पैर छुए. मैंने उन्हीं के सामने उनसे कहा कि अब तो आपको विश्वास हो गया कि मुझे मुख्यमंत्री ने ही भेजा था.'
उसके बाद फूलन के उस आदमी को वापस एक गार्ड के साथ वापस फूलन के पास भिजवाया गया. एक बार अर्जुन सिंह चतुर्वेदी को ले र दिल्ली पहुंचे. उन्होंने राजीव गांधी को संदेश भिजवाया कि उनके पास उनके लिए एक अच्छी ख़बर है.
राजेंद्र चतुर्वेदी को अभी तक याद है, ''हम लोग उनसे मिलने एक, सफ़दरजंग रोड गए थे. राजीव गाँधी ने ये समाचार सुनते ही मेरे कंधे थपथपाए और हमें अंदर के कमरे में ले गए. वहां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गुलाबी रिम का पढ़ने का चश्मा पहने बैठी हुई थीं.''
चतुर्वेदी ने कहा, ''मैंने उन्हें देखते ही सेल्यूट किया. अर्जुन सिंह ने उनसे मेरा परिचय कराया और बोले ये आपके लिए कुछ लाए हैं. जैसे ही उन्होंने फूलन के साथ मेरी तस्वीरें देखी, वो बोलीं, 'शी इज़ नॉट वेरी गुड लुकिंग.' फिर वो बोलीं आप आगे बढ़िए. हम आपके साथ हैं.''

इस बीच राजेंद्र चतुर्वेदी की फूलन देवी से कई मुलाक़ातें हुईं. एक बार वो अपनी पत्नी और बच्चों को फूलन देवी से मिलाने ले गए. फूलन देवी अपनी आत्मकथा में लिखती हैं, ''चतुर्वेदी की पत्नी बहुत सुंदर और दयालु थीं. वो मेरे लिए शॉल, कपड़े और कुछ तोहफ़े लेकर आई थीं. वो अपने साथ घर का बना खाना भी लाई थीं. '
मैंने राजेंद्र चतुर्वेदी से पूछा कि अपनी पत्नी को फूलन के सामने ले जाने की वजह क्या थी ? उनका जवाब था, ''फूलन को दिखाना चाहता था कि मैं उन पर किस हद तक विश्वास करता हूँ. बदले में क्या वो भी मुझ पर इतना विश्वास करेंगीं? बहरहाल वो उनसे मिल कर बहुत ख़ुश हुई थीं.''
चतुर्वेदी ने फूलन से पूछा, कब समर्पण करने जा रही हैं आप? फूलन का जवाब था, ''छह दिनों के भीतर.'' चतुर्वेदी की नज़र कैलेंडर पर गई. छह दिनों बाद तारीख थी, 12 फ़रवरी 1983.
समर्पण वाले दिन फूलन ने घबराहट में कुछ नहीं खाया और न ही एक गिलास पानी तक पिया. पूरी रात वो एक सेकंड के लिए भी नहीं सो पाईं. अगली सुबह एक डॉक्टर उन्हें देखने आया. फूलन के साथी मान सिंह ने उनसे पूछा, ''फूलन को क्या तकलीफ़ है?' डाक्टर का जवाब था तनाव. इसको वो बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं.
कार में बैठते ही फूलन ने चतुर्वेदी से अपनी राइफ़ल वापस माँगी. चतुर्वेदी ने कहा, नहीं फूलन अपने आप को ठंडा करो. फूलन इतनी परेशान थीं कि उन्होंने चतुर्वेदी के बॉडीगार्ड से उसकी स्टेन गन छीनने की कोशिश की. उसने फूलन को समझाया कि ऐसी हिमाकत दोबारा न करें, नहीं तो चतुर्वेदी और उनकी दोनों की बहुत बदनामी होगी.
डाक बंगलों के बाथरूम में फूलन ने अपने बालों में कंघी की. अपने माथे पर लाल कपड़ा बांधा और अपने मुंह पर ठंडे पानी के छींटे मारे. पुलिस की ख़ाकी वर्दी पहन कर उसके ऊपर लाल शॉल ओढ़ी.जब वो बाहर आईं तो पुलिस वालों ने उन्हें उनकी राइफ़ल वापस कर दी. उसमें कोई गोली नहीं थी. लेकिन उनकी गोलियों की बेल्ट में सभी गोलियां सलामत थीं. वो चाहतीं तो एक सेकेंड में अपनी राइफ़ल लोड कर सकती थीं.
तभी राजेंद्र चतुर्वेदी ने अर्जुन सिंह के आगमन की घोषणा की. फूलन मंच पर चढ़ीं उन्होंने अपनी राइफ़ल कंधे से उतार कर अर्जुन सिंह के हवाले कर दी. फिर उन्होंने कारतूसों की बेल्ट उतार कर अर्जुन सिंह के हाथ में पहना दी.
बगल में खड़े एक पुलिस अफ़सर ने फूलन को इशारा किया. उसने अपने दोनों हाथ जोड़ कर माथे के ऊपर उठाया. पहले उसने अर्जुन सिंह को नमस्कार किया और फिर सामने खड़ी भीड़ को. अफ़सर ने फूलन को फूलों का एक हार दिया. फूलन ने वो हार अर्जुन सिंह के गले में पहना दिया.
जब वो ऐसा कर रही थीं तो उस अफ़सर ने उन्हें रोक कर कहा कि हार उन्हें गले में न पहना कर उनके हाथ में दिया जाए. फूलन ने सवाल किया, क्यों? अर्जुन सिंह मुस्कराए और बोले, ''उन्हें गले में हार पहनाने दीजिए.' फिर फूलन ने एक और हार उठाया और मेज़ पर रखे दुर्गा के चित्र के सामने रख दिया.....



गुरुवार, 16 मार्च 2023

रुअर की पटिया

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                  भाग-१०९
          ★रुअर की पटिया★    
          
बीहड़..!!!
हां वही बीहड़,जिनकी तुलना हम बीहडियो-गंवारों के लिए किसी चमत्कृत धाम से कम नही है।हम मैदानी बीहडियो के पूर्वजो की यंहा कर्मठ आभा बिखरी पड़ी है।उसी आभा से मस्तक पर अभिषेक कर हम मलेक्षों को कई बार रौंद चुके हैं।इसी बीहड़ की माटी में सिर्फ लड़ाके ही नही अपितु धर्मध्वजा के साथ-साथ सनातन आस्था के भी अकूत किस्से सुनने को मिल जाते है ।

 आज कुछ ऐसा ही किस्सा एक पाषाणकालीन शिला का जो कभी न्याय का प्रतीक हुआ करती थी,और आज भी यंहा के लोग अपनी बात की सत्यता प्रमाणित करने को इस शिला पर चलकर शपथ उठाने की बोलने से नही चूकते हैं। जो आज एक कहावत के रूप में प्रायः जुबान पर आ ही जाती है ।
"चलो रुअर की पटीआ पे कसम खाई लें!"
 
किस्सा लगभग 700-800 वर्ष पूर्व का है,अम्बाह-पिनाहट मुख्य राजमार्ग से 5 किलोमीटर उत्तर-पक्षमी बीहड़,चम्बल तलहटी की तरफ एक ग्राम स्थिति है। 'रुअर' सघन क्षत्रिय बाहुल्य आवादी का यह गांव आज सेकड़ो छोटे-छोटे मझरों(पुरों,भागों)में विभक्त हो चुका है।कालांतर में इस का बहुत नाम रहा है,फिर चाहे क्रांति में अथवा 'भडीआई'(चोरी का क्षेत्रीय नाम)में ख्यात कुख्यात रहा है। सिंधिया  रियासत काल में अगर कोई लश्कर से ऊंट-घोड़े साज-सामान चुराने का जिगर रखता था ,तो वह 'रुअर के भडीआ' ही थे।जो तात्कालीन रियासत को चुनोती देकर 'पनिहाई' (लुटे गए माल को बापस लौटाने की एवज में मिला/दिया धन)ले लिया करते थे।
इस गांव की कुछ पृकृति ही ऐसी है कि यंहा गुप्त को लुप्त होते देर नही लगती थी।इसी बीहड़िया गांव के हटी ग्रामीणों ने सिंधियाओ के 'नाक में कोड़ी' पहना रखी थी ।

ज्येष्ठ माह के दशहरे का समय था।जैसा कि प्रचलन है,हर कोई नदीस्नान अथवा पर्व को जाता है। ठिकाने से कुछ बच्चे पर्व लेने चम्बल किनारे गए,बालसुलभ जलक्रीड़ा करते-करते उनको एक शिला जल में तैरती हुई मिली...जिसे वह टनों भारी बजन की परवाह किये बिना कन्धों पर गांव तक ले आये।जब ग्रामीणों ने यह देखा कि छोटे-छोटे बालक इतना भारी पत्थर किस तरह रख लाये?सावधानी बस उन्होंने बच्चों से शिला लेनी चाही तो नही ले पाए और इसे चमत्कार ही कहिये या संयोंग दो खड़े पत्थरों पर वह शिला रख दी ,जिसे आजतक कोई टस-मस नही कर पाया है।वह अठिग शिला आज भी वंही आधी सदी से अधिक समय बाद भी अडिग है।
जैसा कि प्रचलन है,कोई भी असाधारण बात प्रायः चमत्कार से जोड़कर देखने की हम सनातनियों पृकृति रही है।अतः यह शिला आस्था का केंद्र बन गयी और इस के स्थान पर धीरे-धीरे सच-झूठ की कसमें उठाये जाने लगी। बुजुर्ग कहते हैं कि इस 'पटिया' पर जिसने भी झूठी सपथ ली उसका तत्तक्षण दुष्प्रभाव भुगतना पड़ा था। धीरे-धीरे, चलते-चलते यह स्थान इसी तरह बातो से प्रशिद्ध हुआ और कुछ जनहानि भी हुई तो ब्रिटिश कालीन 'जिला तंवरघार'  सेशन जज द्वारा इस स्थान पर कसम उठाने पर पाबन्दी लगा दी। जिससे धीरे-धीरे कसम उठाने की बात बन्द हो गयी।

आम जनश्रुति है कि शपथ लेने से पूर्व इस स्फटिक को गाय के दुग्ध से स्नान कराया जाता था।ततपश्चात अगर किसी ने मिथ्यासपथ ली तो यह स्फटिक रक्तवर्णीय होकर संकेत देती थी,अगर सपथ सच है तो शिला प्रतिक्रिया विहीन रहती थी।
यह चमत्कारी शिला आज भी उन्ही पत्थरों के आधार पर टिकी है और आस्था व जनश्रुतियों का केंद्र है।जिसपर ग्रामीणों द्वारा एक छोटा मन्दिर भी निर्मित है ।
शिला पर टँगे हुए सैकड़ों बागी/दस्युओं के बड़े-बड़े घण्टे घड़ियाल आज भी हैं,प्रतिवर्ष मेले लगतें हैं। अब लोग शपथ की सत्यता तो नही परखते किन्तु मन की मनोकामनाएं आज भी अनवरत जारी हैं।

आज भी इस शिला के पूर्वकालिक यश व सम्मति की झलक प्रचलित कहावत "में तो अपनी बात सांची साबित करबे को रुअर की पटिया पे कसम उठाए लेगों" में स्पष्ट दिखती हैं।

यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यंहा चम्बल में जलीय जीवों पर सेकड़ो मीडिया के कैमरे प्रायः घूमते रहते हैं।किंतु सनातन आस्था व न्याय की प्रतीक यह शिला आज भी किसी आखर अथवा चलचित्रीय धनलोलुप मीडिया के कैमरे या आर्टिकल से बाहर है।

यहाँ जब-जब कोई जवान वीरगति को प्राप्त होता है,बड़े-बड़े अधिकारी, लेते,बड़े-बड़े पेट लेकर इधर से बिना डकारे गुजर जाते रहें हैं।किन्तु न्यायिक आस्था के केंद्र से आजतक सभी का व्यवहार उपेक्षित ही रहा है ।

जय गोपाल जी की 🙏
(शिला का चित्र साभार भैया दीपक सिंह जी तोमर 'उसेद'! प्रस्तुत विवरण बुजुर्गों से सुनी बातों व प्रचलित जनश्रुतियों पर आधारित)
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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

मेरी गजलें

ये महीना भी गया,वह साल भी गुजर जाएगा,,
रंगमंच के पर्दे से हर किरदार नजर आएगा!

घटती रहेंगी सांस-दर-सांस उम्र की नजाकते ,
सांस,सांस-साँसों का काफिला गुजर जाएगा!

राह चलते आईने में अक्स निहार गुजरी दुनिया,
एकदिन अक्स से रूह का भरम भी हट जाएगा!

वक्त ने सौगात की खुशियां हँसे-हंसकर के दिल,
वक्त बदला,ले खुशी से,ये वक्त भी निकल जाएगा!

हो सके संजों लो जिंदगी के सुनहरे पल कशिश से,
जज्बा-जज्बात और जन्नत,एक पल में पा जाएगा!

बड़ा अनुख है जिंदगी का पल ,नायाक-नालायक,
कभी सर्द कभी उष्ण बन फिर तपायेगा-सताएगा!!
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'अ'सफल

बुधवार, 18 जनवरी 2023

चम्बल एक सिंह अवलोकन भाग 108

अम्बाह कस्बे के पूठ गांव से करीब 100 मीटर पहले ही एक लगभग 500 वर्ष या उससे पुरानी जग्गा (शैवमत की उपमठ) है। यह जग्गा अपने-आप में ऐतिहासिक-प्रागेतिहासिक महत्वों के साथ-साथ श्रद्धा व सनातन साधकों जीवंत प्रमाण भी है ।
प्रथम दृष्टि में देखने पर वास्तुशिल्प व निर्मित ढांचे के अनुसार यह स्थान,लोक प्रचलित स्थापना से कंही हटकर ८०० अथवा इससे कहीं अधिक वर्ष पूर्व का प्रतीत होता है। क्योंकि इसमें और प्रतिहार कालीन ग्वालियरगढ़ वास्तुकला,वास्तुशिल्प व वास्तु शिल्प सामग्री सेंकडो समानताएं मिल जाएंगी  ।
अस्तु!
करीब 25 एकड़ जगह पर अडिग खड़े हुए इस तपोमढ़ मे सैकड़ों कक्ष व दक्षिण-पश्चिमी भाग के मध्य में श्रीराम-जानकी-लक्ष्मण जी की संयुक्त मूर्तियां है।जिनपर पुरातन समयातीत  कई ऐतिहासिक महत्व के उल्लेखित ताम्रपत्र महंत श्री नारायण दास जी के पास सुरक्षित हैं।
कभी शैव साधकों से लेकर क्रान्तिकारियों व सिंधियाओं की अगाध श्रद्धा केंद्र रहा मठ आज उपेक्षित सा खड़ा है। लोग आते हैं और 500 वर्षों से सतत धुनित अखण्ड धूनी आभा की परिक्रमा कर मनोती करते हैं और अतिशीघ्र लाभ प्राप्तकर विस्मरण कर देते हैं ।
एक प्रचलित जनश्रुति व बुजुर्गों के अनुसार सिंधिया सामन्त से रियासतदारी तक दत्तक सन्तान  मुक्ति का प्रमाणिक किस्सा बड़ा रोचक है।इसको जानने-समझने हेतु थोड़ा संक्षिप्त सा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करना मुझे आवश्यक लगता है ।

ग्वालियर का सिंधिया 'राजवंश' राणोजी सिंधिया द्वारा स्थापित किया गया था।यह महाराष्ट्र स्थिति सतारा जनपद में कान्हेरखेड़ गांव के जानकोजीराव  के पुत्र थे । सिंधिया 'शिंदे' का ही   ब्रिटिशों की वाक शैली द्वारा उतपन्न अपभ्रंसित 'सरनेम' है। सन 1818 के तीसरे मराठा युद्ध मे ब्रिटिश भारतीय शाशन के गवर्नर-जनरल लाडहेगेन्स्टिन द्वारा मराठाशक्ति पूरी तरह तहस-नहस कर दीया था,और सिंधियाओं कि बागडोर दौलतराव सिंधिया के हाथ आ गयी।दौलतराव  बिट्रिशो के समक्ष घुटने टेके व भारत के भीतर अंग्रेजी रियासत के रूप रहने को तैयार हो गए।मराठा सरदारों में दौलतराव सिंधिया ने अंग्रेजों के साथ मिलकर,उज्जैन से लश्कर होते हुए ग्वालियर पर आधिपत्य करते हुए,राजधानी बना लिया गया ।
दौलतराव सिंधिया की मृत्यु उपरांत उनकी बिधवा रानी बैजाबाई ने साम्राज्य चलाया और बिट्रिश सत्ता  हस्तांतरण से बची रही। 
एक बड़ी रौचक बात हैं की वाडियार वंश की तरह ही सिंधिया वंश भी सन्तानोतपत्ति से वंचित था।बैजाबाई के दत्तकपुत्र जानकोजीराव ने सत्ता संभाली,1843 जानकोजीराव की मृत्युपरांत पुनः एक दत्तक पुत्र लिया गया।जयाजीराव द्वारा कुल 4 विवाह कृमशः1848 चिमनाराजे,1852 लक्ष्मीबाई राजे,1873 बायूबीबाई राजे, व मृत्यु से कुछ दिन पूर्व ही रानी साक्याराजे के साथ...जिन्ही से एक सन्तान बाबा श्री मंगलाचार्य जी की आशीषभरी गालियों से प्राप्त हुआ।

किस्सा यह की श्रीटीलाद्वारपीठनामक,श्रीरामन्दमहापीठाचार्य श्री श्री ११०८ मंगलचार्य जी ख्याति उस समय इतनी हुआ करती थी,की लोग दूर-दूर से -उनके द्वारा प्रकट की अग्नि से उतपन्न धूनी की धोक लगाने आया करते थे। चंहुओर से हताश सिंधिया जब अपनी चौथी पत्नी से विवाह कर चुके तो उनको भी किसी ने महाराज जी द्वारा धुनि व उसकी परिकृमा का वक्तव्य कह सुनाया। राजा-रानी हाथी आदि फ़ौज के साथ आये तो बाबा जी ने 'कायर' व दुष्ट-पापी जैसे कटुशब्दो से नबाजकर भगा दिया।
ग्रामीणों के अनुसार पुनः सिंधिया दम्पत्ति दण्डबत करते हुए करीब 500 मीटर की दूरी तह करके आये तब मन्दिर में प्रवेश करने दिया था। पग-पखारन व आजन्म ईश्वरभक्ति में तल्लीन रहने के उपरांत महाराज ने उपहार स्वरूप एक गाली दी 'जा निपूत जाई,अब कभी अपना भोंडा(मुंह) मत दिखाना!'
कहते हैं कि इस वाकये के कुछ समय उपरांत रानी गर्भिणी तो हुई किन्तु राजा चल बसे। साकयाराजे से सिंधिया परिवार पहली उतपन्न सन्तान मिली और लगातार दत्तक पुत्रो का सिलसिला टूटा,आगे चलकर इसी सन्तान का नाम 'जीवाजी राव' रखा गया।

इस समस्त क्षेत्र में महाराज मङ्गलाचार्य जी से हजारों किस्से-किबदन्ति व जनश्रुतियां है।किंतु उनकी आयु ठीक से किसी को ज्ञात नही है।
महाराज जी द्वारा प्रकट की गई अखण्ड धूनी आज भी करीब 500 वर्षों से रमी हुई है,वंही पास में उनका चीमटा,त्रिशूल भी स्थापित है। जिससे हजारों लोगों की मंशाएं पूर्ण हो चुकी है ।
सनद रहे यह वही उपमठ है ,जिसमे विनोद खन्ना-कबीर बेदी अभिनीत 'कच्चे धागे' फ़िल्म व डाकू पुतली बाई से लेकर कई दस्यु आधारित फिल्म फिल्माई जा चुकी है। इसी मठ पर विनोदखन्ना कभी घण्टो भजन करके नृत्य भी कर चुके थे।

इस मठ के कुछ भागो का अधूरा निर्माण से पुनर्निर्माण व जीर्णोद्धार भी किया गया था,मन्दिर न्यास से करीब 51 बीघे पुख्ता जमीन जुड़ी हुई है। यह मंदिर न्यास्ट्रस्ट अंतर्गत आता है,जो कि जिलाधाकारी द्वारा संरक्षित है।
सन 1999 में इस मठ को पुरातत्व संरक्षित स्थान भी घोसित किया जा चुका है,...किन्तु यह हताश करने बाली बात है कि जगह-जगह उखड़ती हुई मन्दिर विशाल प्रवेश द्वार की ककैया ईंटें व पुरातन समय का मसाला अपनी बुनियादों से लगातार चूना छडा रँहा है। 

लोग आते हैं,चले जांते है..अखण्डधूनी से मनोकामना भी रखते हैं और पूर्ण होने पर आभार व्यक्त करने भी आते हैं,किन्तु नही आता कोई इस तपोस्थल,ऐतिहासिक स्थान व 'मङ्गलाचार्य जी महाराज ' तपोस्थल की सुधि लेने ...!!

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र

सोमवार, 15 अगस्त 2022

कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया जी

लाल सेना के संस्थापक - महान क्रान्तिकारी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया

ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लाल सेना तैयार कर एक युवक अर्जुन सिंह भदौरिया ने न केवल इटावा जनपद बल्कि सीमावर्ती जिलों को भी आजादी के संघर्ष की चेतना से ऐसा जोड़ा कि घर-घर में स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा

10 मई 1910 को बसरेहर के लोहिया गांव में जन्मे अर्जुन सिंह भदौरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था . 1942 में उन्होंने सशस्त्र लालसेना का गठन किया. बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए. 

1940 के दशक में, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने तीन साल (1941-44) तक चंबल की घाटियों के किनारे यमुना के किनारे रहने और पनपने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाते हुए एक सशस्त्र समूह लाल सेना का गठन किया था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना की तर्ज पर भारत छोड़ो आंदोलन के समय लाल सेना बनाने के बाद 'कमांडर' की उपाधि अर्जित की।  

आजादी के योद्धा कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने चंबल घाटी में हजारों क्रांतिकारियों को ट्रेनिंग देकर फिरंगी सरकार की चूलें हिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति का सबसे उम्दा प्रयोग किया था. करो या मरो आंदोलन के दौरान कमांडर को 44 वर्ष की सजा हुई और अपने पूरे जीवनकाल में वह करीब 52 बार जेल गए.

उन्होंने दो स्तरों पर काम किया - एक ओर वे एक गांधीवादी थे, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने लाल सेना की स्थापना की, जिसने लोगों को राजस्व, खाद्यान्न और हथियार जैसी ब्रिटिश संपत्ति लूटने के लिए प्रशिक्षित किया।  जबकि पैसे और हथियारों का कुछ हिस्सा समूह चलाने और खाद्यान्न खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया था, शेष पैसे का इस्तेमाल गरीबों को खिलाने के लिए किया गया था, ”।

अर्जुन सिंह के साहस से ब्रिटिश शासन तंग आ चुका था, लिहाजा जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो उन्हें बेडिय़ों से बांधकर रखा गया था। कोर्ट में मुकदमा चला और उन्हें 44 साल की कड़ी सजा सुनाई गई। आचार्य नरेंद्र देव चंबल के इस क्रांतिकारी संगठन से प्रभावित हुए और उन्होंने ही पहली बार अर्जुन सिंह भदौरिया को 'कमांडर' कहकर संबोधित किया। करो या मरो के आंदोलन में उन्हें 44 साल की कैद हुई. अंग्रेज इनसे इतने भयभीत थे कि उन्हें जेल में हाथ-पैरों में बेड़ियां डालकर रखा जाता था.

यही कारण रहा की आजाद भारत में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया 1957, 1967 और 1977 में इटावा से लोकसभा सांसद चुने गए. इटावा मे शैक्षिक पिछड़ेपन की समस्या, आवागमन के लिए पुलों का आभाव जैसी तमाम सरोकारी समस्याओं को वे सदन में प्रमुखता से उठाते रहे. कमांडर ने इसी जज्बे से आजाद भारत में आपातकाल का जमकर विरोध किया. तमाम यातनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, जिससे प्रभावित क्षेत्र की जनता ने सांसद चुन कर उन्हे सर आंखों पर बैठाया. वे आपातकाल में पुनः जेल भेज दिए गए। उन्होंने किसान पंचायत के संगठन में विशेष रुचि ली और स्वामी भगवान, गेंदा सिंह, मुलखी राज, सूरजदेव, रामधारी शास्त्री और बलवान सिंह के साथ मिलकर सशक्त किसान आंदोलन खड़ा किया। 🇮🇳

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

टेडी डे

रोजमर्रा ज़िंदगी की जूतम-लात से दो-चार, हम ख़ुद को अब कितना भी बड़ा-बुजु़र्ग क्यों ना महसूस करते हों....पर अयोध्या से लखनऊ की तरफ आते-जाते हुए हाइवे के किनारे-किनारे ऊंचे-नीचे, छोटे-बड़े तमाम कद-काठी के रंग-बिरंगे टेडीवेयर्स की वो बस्तियां...भले ही कुछ पल को सही, पर हम सबकी नोटिस में तो ज़रूर आईं होंगी।

तो बात यही 5-6 साल पुरानी है। जब लखनऊ से वापस आते हुए, एक ऐसी ही बस्ती के साइड से गुज़रते हुए, मैं बेसब्र हो पड़ी। भाई ने मुझे मचलते देख खासी दिलेरी दिखाई और गाड़ी को साइड लगाते हुए पूछा, "लेना है?" 
मैंने पलभर की देर किए बिना, भरसक मुस्कुराहट के साथ आंखें चमकाते हुए पूरा सिर 'हां' में हिलाया। उन्होंने पूछा, "कौन-सा लोगी?" मैंने झट से फुटपाथ पर काफी दूर तक नज़र डाली। 

'एक सबसे बड़े वाले टेडी पे नज़र गई, कितना बड़ा-सा...उसकी तो गोद में भी बैठा जा सकता है। फिर वो वाला बंदर दिखा, जो एक हाथ से रस्सियों से लटकते हुए चिढ़ा रहा था। फिसलती हुई नज़र उस झबरे बाल वाले डॉगी पे टिक गई, जिसके कान तो बिल्कुल खरगोश के जैसे लग रहे थे। वो पिंक आंखों वाले छोटे-छोटे टेडीवेयर्स की तो पूरी फैमिली ही रूम में सजाने के लिए है। वो सीने के पास दिल संभालता हुआ रेड वाला अगर ले भी लूं, तो उसके बगल में क्रीम कलर वाला रखने पे ही वो इतना जंचेगा।' एकाएक मुझे लगा कि मैं अब काफी असहाय हाल में पड़ चुकी हूं।😟

"अरे कोई लेना भी है।" और अब भाई बेसब्र होने लगे थे।  
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ता से जगते हुए एकदम से बोल गई, "हां, सब"!!
"अच्छा-अच्छा...मतलब कोई नहीं" कहते हुए भाई ने गाड़ी स्टार्ट कर ली और अगले घंटे भर में मैं खाली हाथ घर पे थी।🥺

वो दिन और आज का दिन...आज घर में हमारे समानांतर ही कई हेल्थ-हाइट के टैडियों की भी एक पूरी फैमिली का दबदबा है। और हां मजाल है, इनमें से कोई किसी नोना बाबू से साभार प्राप्त हो!!😎

सोचा था एकदिन जब सिलेबिट्टी बनूंगी, तो अपनी ये  कलेजाफाड़क सक्सेज-स्टोरी सुनाकर, नेहा कक्करजी जैसे किसी मासूम को रुलाऊंगी। ईश्वर की कृपा से आज वो मासूम लोग आप हो, और वो सिलेबिट्टी मैं।।😌🙏(सिलेबिट्टी ग्रुप से सर्टिफाइड)

#टेडी_डे

~RJ. रश्मि सिंह जी

शनिवार, 29 जनवरी 2022

इतिहास सोमनाथ युद्ध हमीर सिंह गोहिल

#वीर_हमीरसिंह_गोहिल
#सोमनाथ_का_शूरवीर

सोमनाथ मंदिर के ठीक सामने एक भाला धारी घुड़सवार की प्रतिमा तिराहे पर विद्यमान है, जिस पर लिखा है कि यह हमीर जी गोहिल की मूर्ति है जो सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए शहीद हुए थे। वैसे तो सोमनाथ पर सत्रह से अधिक बार आक्रमण के कारण कई लोग शहीद हुए होंगे, जिन्होंने सोरठ की उर्वर धरा में सोमनाथ की रक्षार्थ आत्माहुति दी होगी, किंतु यह वीर कोई खास होगा यह मेरे मन में पैठ गया। चूंकि गजनवी, खिलजी, तुगलक ये तो मेरे दिमाग में घूम गए किंतु यह वीर किससे और कब लड़ा होगा यह ज्ञात करना जरूरी हो गया था। जानकारी लेने पर तो लगता है उस रण बांकुरे पर आज भी लोग बिछ जाने को तैयार है। सोरठ में एक दोहा है -
"जननी जणे तो भक्त जण जे, के दाता, के सूर।
नहीं तर रहेजे वांझणी, मत गुमावजे नूर।।"

हमीर जी गोहिल भीमजी गोहिल के पुत्र थे और तीन भाइयों में सबसे छोटे, उन्हे गढाली गांव की जागीर मिली थी, एक बार अपने मझले भाई अरजण जी के साथ मुर्गों की लड़ाई के चक्कर में उनके निकल जा कह देने पर सौराष्ट्र छोड़ मारवाड़ चले गए।

दिल्ली की गद्दी पर उस समय मोहम्मद तुगलक (द्वितीय) बैठा हुआ था, जूनागढ़ के सूबेदार शम्शुद्दीन की पराजय के बाद उसने जफरखान को नियुक्त किया था। जफरखान की सीधी नजर सोमनाथ की संपदा पर थी और साथ ही वह अपने मजहब की कुंठा के कारण बुत शिकन बनना चाहता था।

जफरखान ने इसके लिए आदेश जारी किया कि अधिक संख्या में सोमनाथ में दर्शनार्थी इकट्ठा न हो। शिवरात्रि पर्व के अवसर पर जनमेदिनी तो एकत्रित होनी ही थी। जफरखान के कारकून रसूल खान के दर्शनार्थियों को रोकने पर विवाद हुआ और विवाद इतना बढ़ा कि जनता ने सैनिकों सहित रसूल खान को समाप्त कर दिया। जफरखान का आग बबूला होना स्वाभाविक था। उसने इस बहाने तमाम दलबल के साथ सोमनाथ पर चढ़ाई करने की सोची।

सोमनाथ पर आक्रमण की आशंका के चलते गढाली से मझले भाई अरजण ने हमीर को ढूंढने के लिए माणसुर गांव के गढ़वी को भेजा। हमीर जी को भाई के दुखी होने की सूचना मिली जिसपर उनका मन तुरंत चलने को हुआ, अपने दो सौ राजपूत साथियों के साथ वे दरबार पहुंच गए। धामेल के जागीरदार उनके काका वरसंग देव और बड़े भाई दूदाजी आदि के साथ उनका समय बीतने लगा, वे दूदाजी की जागीर अरठिला आ गए। यहां उनका नित्य जीवन और खेलकूद जारी था, हमीर अभी कुंवारे थे। कड़ाके की भूख लगी थी और साथियों के साथ वे दरबारगढ़ आए और (दूदाजी की पत्नी) बड़ी भाभी से खाना मांगा, तब भाभी ने कहा कि - "क्यों देवर जी इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो, क्या खाना खाकर सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जाना है?" हमीर जी ने पूछा कि भाभी क्या सोमनाथ पर संकट है? तब भाभी ने बताया कि दिल्ली का कटक निकल चुका है और सूबेदार जफरखान का दल रास्ते में है। यह बात सुनकर हमीर औचक खड़े हो गए और पूछा -"भाभी क्या बात कर रहीं हो? क्या कोई राजपूत सोमनाथ के लिए मरने निकल पड़े ऐसा नहीं? विधर्मियों की फौज चढ़ाई करेगी और रजपूती मर गई है क्या? ऐसे कई प्रश्न उन्होंने किये जिस पर भाभी ने कहा कि राजपूत तो बहुत है मगर सोमनाथ के लिए साका करे ऐसा कोई नहीं, तुम खुद राजपूत नहीं हो क्या?

भाभी की बात पर हमीर झळहला उठे। व्यंग्य भीतर तक चुभ गया। उसी समय भाभी को कहा - "मेरे दोनों बड़े भाइयों को मेरा जुहार कहना, मैं सोमनाथ मंदिर के लिए साका करने निकल रहा हूँ।" भाभी ने पछताते हुए खूब समझाया, मगर वे न माने और अपने पीछे किसी को समझाने भेजने की दुहाई देकर अपने दो सौ साथियों के साथ निकल गए। जब क्षेत्र के क्षत्रप बड़े आक्रमण से दिग्मूढ़ बने हुए थे, रजवाड़े अंतर्कलह में डूबे हुए थे तब हमीर मृत्यु का मंडप पोखने के लिए निकल पड़े।

कुंवर हमीर जी कुंवारे थे और अपने दो सौ साथियों के साथ चल पड़े, नीरव अंधेरी आधी रात को एक जगह से गुजरते हुए, जहां वायु भी रूक चुकी थी ऐसी नीरवता को चीरती एक महिला के शोकगीत गाने की आवाज सुनाई दी। झोंपड़ी में एक वृद्धा चारण गा रही थी। हमीर ने वहां जाकर पूछा कि किसके लिए यह शोकगीत गा रही हो? वृद्धा ने कहा मैं एक विधवा हूं और पन्द्रह दिन पहले दिवंगत अपने पुत्र का शोकगीत गा रही हूँ। हमीर ने कहा - "मां पुत्र के मरने के बाद भी लाड़ लड़ा कर उसका मर्शिया गा रही हो क्या तुम मेरे लिए शोकगीत गाओगी?" "मुझे मेरा शोकगीत सुनना है!" उस लाखबाई चारण ने कहा कि - "बाप यह क्या बोल रहे हो, क्या तुम्हारा जीते जी शोकगीत गाकर मुझे पाप में पड़ना है?" हमीर ने कहा - "मां हम मरण के रास्ते पर निकल चुके हैं और सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जा रहे हैं। इस रास्ते से लौटना संभव नहीं है।" चारण लाखबाई उस राजपूत युवा के शौर्य की बात सुनकर अभिभूत हो गई। उसने पूछा कि - "बेटा हमीर तुम विवाहित हो?" हमीर ने ना कहा। तब वृद्धा ने कहा -" रास्ते में जो मिले उससे विवाह कर लेना। क्योंकि कुंवारों को युद्ध में अप्सरा वरण नहीं करती।" हमीर ने कहा कि -" मां हम मृत्यु के लिए जाने वालों को कौन अपनी कन्या ब्याहेगा?"
वृद्धा ने कहा कि "बाप तुम्हारी सूर वीरता देख कोई तुम्हे अपनी पुत्री ब्याहने के लिए कहे तो मना मत करना। मेरा यह कहा जरूर निभा लेना।" यह कहकर वृद्धा सोमनाथ में राह जोऊंगी बताते हुए चल पड़ी।

हमीर को रास्ते में द्रोणगढड़ा गांव में वेगड़ा भील मिल गए जो गीर के जंगल का सरदार था उसके पास भील योद्धाओं की हजार बारह सौ की टुकड़ी थी। गीर से लेकर शिहोर और सरोड के पहाड़ तक वेगड़ा के तीरों की धाक जमी हुई थी। भील जनजाति सोमनाथ में गहरी आस्था रखते थे और जूनागढ़ के राजा की सत्ता स्वीकार करते थे। वेगड़ा के पास एक युवा कन्या थी। जिसका नाम था राजबाई। एक बार जेठवा राजपूत गीर के पूर्वी हिस्से में स्थित तुलसीश्याम के मंदिर की यात्रा पर जा रहे थे, वेगड़ा के साथ उनका सामना हो गया, युद्ध में जेठवा के मरने से पहले उसने वेगड़ा को अपनी नन्ही बालिका सौंपते हुए जिम्मेदारी दी कि इसका पालन करना और योग्य होने पर किसी राजपूत के साथ विवाह कर देना। वेगड़ा ने मरते हुए जेठवा को वचन दिया और राजबाई को पुत्री की तरह पाला।

संयोग से चारण वृद्धा लाख बाई का वेगड़ा की राह से गुजरना हुआ, वेगड़ा ने उसे रोका और किसी राजपूत की जानकारी चाही लाख बाई ने हमीर जी गोहिल के सोमनाथ के लिए साका करने निकले होने की बात बताते हुए कहा कि उसी को अपनी कन्या परणा दे।

लाखबाई के कहे अनुसार वेगड़ा ने अपने तीन सौ धनुर्धर योद्धाओं के साथ गिर के काळवानेस के निकट पड़ाव डाला। उधर से चले आ रहे हमीर जी काळवानेस के पास शिंगोड़ा नदी के किनारे पहुंचे।
बहती नदी देख हमीर जी के साथी नहाने के लिए उतर गए। नहाने के दौरान किल्लोल करते कुछ को देर हुई कुछ आगे के लिए निकल गये। नहाने वाले साथियों के बाहर आने पर देखते हैं कि घोड़े गायब थे। हमीर जी ने आदेश दिया कि समीप पहाड़ी पर चढ़कर देखो कि घोड़े ले जाने वाले कौन है? खबर मिली कि घोड़े पास के पड़ाव में हिनहिना रहे हैं। वहां जाकर पूछने पर वेगड़ा सामने आया और पूछा कि हमीर जी गोहिल आप हो क्या? हम तो आपकी बांट जोह रहे हैं। प्रत्युत्तर में हमीर ने पूछा कि वे लोग कौन है तब वेगड़ा ने अपना परिचय दिया। वेगड़ा का परिचय सुनकर हमीर गदगद हुए कहा की सोमनाथ का साका करने चले और आपका मिलाप हुआ। ॥

वेगड़ा ने हमीर को दो दिनों के लिए रोक लिया। इस बीच राजबाई को हमीर से विवाह का पूछा, जेठवा कुल की कन्या राजबाई ने स्वीकृति और संकोच के साथ लज्जा का आवरण धारण किया। हमीर जी ने भी स्वीकृति दी मगर एक समस्या आ खड़ी हुई कि जितने साका करने वाले साथी थे उनका भी विवाह नहीं हुआ था उन्होंने हमीर जी के विवाह की शपथ ली थी, उन सबके लिए भील कन्याएँ ढूँढ कर सभी के सामूहिक लग्न हुए। गिर की वादियां ढोल और बांसुरी से गूंज उठी। इस तरह मौत का वरण करने वाले योद्धाओं ने पहले उन भील कन्याओं का वरण कर सिर पर केसरिया बांध लिया। द्रोणगढड़ा का गिरी प्रांतर उस विवाह का साक्षी बना। कई बातें इतिहास के पन्नों से भले ही छूट रही हो लेकिन लोक मानस ने अपने हृदय में स्थान दिया है।

इस तरह गीर के जंगल में लग्न के दूसरे दिन सब के साथ वेगड़ा ने भी अपने साथियों के साथ प्रयाण किया। अरठीला गांव के साथी माणसुर गढ़वी भी रास्ते के छोटी बस्तियों के टिंबे आदि में अपनी बबकार लगा, योद्धा तैयार कर साथ ले चला। राजपूत, भील, काठी, अहीर, मेर, भरवाड़ और रबारी जाति के जवान सोमनाथ के लिए साका करने निकल पड़े।

वेगड़ा ने अपने खबरचियों के द्वारा जफरखान की फौज की जानकारी हासिल की। उधर दिल्ली की फौज सौराष्ट्र की सीमाएं रौंदती, राजाओं और ठाकोरों को दंडित करती आ रही थी, उसकी सेना को रोकने की सामर्थ्य न होने के कारण कोई उन्हें रोक नहीं रहा था। इधर हमीर और वेगड़ा सोमनाथ के प्रांगण में उन सेनाओं का रास्ता देखने लगे। पुजारी और प्रभास के नगरजन स्तब्ध होकर खड़े थे। जफरखान को तो जैसे सोमनाथ को रौंद डालना था। उसे समाचार मिला कि कोई सिरफिरे उसका रास्ता रोकने के लिए सोमनाथ में तैयार हैं। वेगड़ा का पड़ाव सोमनाथ और प्रभास के बाहर था। हमीर ने अंदर का मोर्चा सम्हाला था।

जफरखान उन्मत्त होकर वहां आ पहुंचा, बाहर के मोर्चे पर वेगड़ा भील के योद्धाओं के तीरों के हमले ने मुस्लिम आक्रांताओं की सेना को त्राहिमाम् करवा दिया। एक तरफ देवालय को तोड़ने का जुनून था तो दूसरी तरफ मंदिर रक्षा की विजीगिषा थी। हाथी पर बैठे जफर ने सेना का संहार देख तोपों को आगे करने का हुक्म दिया।

उस समय भील योद्धाओं ने जफरखान का इरादा भांप लिया। उन्होंने घनी झाड़ियों और वृक्षों की ओट से बाणों का संधान जारी रखा। सूबेदार के तोपची चित्कार कर गिरने लगे। जफर ने गुस्से में दूसरी पंक्ति को आगे कर दी, भील योद्धा भी खेत होते कम होने लगे। जफर ने कुशल हाथी के साथ एक सरदार को वेगड़ा के पीछे किया, हाथी ने सूंड में पकड़ कर उसे पटक दिया जिससे वेगड़ा वहीं सोमनाथ रक्षा यज्ञ में समिधा बनकर काम आए। दूसरी तरफ भीतरी सुरक्षा में रत हमीर जी सचेत थे जफर का हमला सोमनाथ गढ़ की ओर हुआ। सुलगते तीरों की वर्षा हमीर जी ने शुरू की। पत्थरों से भी आक्रमण हुआ। जो सैनिक गढ़ के पास थे उन पर उबलता तेल डाला गया। इस प्रकार पहला आक्रमण असफल हुआ। सांझ हुई मंदिर में आरती हुई। सभी साथियों को एकत्रित कर अगला व्यूह समझाया।

जफरखान ने सोमनाथ को तीन तरफ से घेर लिया चौथी तरफ समुद्र था। दूसरे दिन सुबह हमीर जी ने घुड़सवार होकर आक्रमण कर दिया और हाथियों को भालों से गोदकर त्राहि त्राहि करवा दी। जफर ने गढ़ में प्रवेश के लिए सुरंग खोद डाली जिसमें हमीर जी ने पानी भरवा कर प्रवेश को अवरूद्ध कर दिया। रोज नई योजना के साथ जफर का नौ दिन तक हमीर जी ने सामना किया।

सोमनाथ गढ़ के सामने नौ दिनों से जफरखान के सैनिकों से लड़ते हमीर जी के पास योद्धा खेत रहे, नौवें दिन की रात्रि शेष बचे योद्धाओं को इकट्ठा कर व्यूह समझाया, कि जैसे ही सूर्यनारायण पूर्व दिशा से निकले गढ़ के द्वार खुले छोड़कर 'केसरिया' कर लेना यानी आत्माहुति दे देना। "सभी सावधान हो जाओ" इतना कहते ही हर हर महादेव के घोष गुंजायमान हुआ। पूरी रात कोई योद्धा सोया नहीं, सोमनाथ के मंदिर में मृत्यु के आलिंगन की उत्तेजना की कल्पना ही की जा सकती है, उन वीरों ने रात भर अबीर गुलाल की होली खेली, भगवान शंकर को भी जैसे सोने न दिया।

भिनसारे नहा धोकर हमीर जी ने चंद्र स्थापित भगवान सोमनाथ की पूजा की, हथियारों से सुसज्ज होकर लाख बाई को चरण स्पर्श किया और आशीष मांगा साथ ही कहा कि 'आई अब मेरे कानों को मृत्यु के मीठे गीत सुनने की वेला आ पहुंची है। सोमनाथ के पटांगण में थोड़ी देर के लिए नीरवता फैल गई। पथारी पर बैठी 'आई' ने सुमीरनी फेरते हुए कहा - धन्य है वीर तुझको, तूने सोरठ की मरने पड़ी मर्दानगी का पानी रक्खा।' आई ने गाया -

वे'लो आव्यो वीर, सखाते सोमैया तणी।
हीलोळवा हमीर, भाला नी अणिए भीमाउत।
(વે'લો આવ્યો વીર, સખાતે સોમૈયા તણી;
હીલોળવા હમીર, ભાલાની અણીએ ભીમાઉત.)

माथे मुंगीपर खरू, मोसाळ वसा वीस।
सोमैया ने शीश, आप्यु अरठीला धणी।।
(માથે મુંગીપર ખરૂ, મોસાળ વસા વીસ;
સોમૈયાને શીષ, આપ્યુ અરઠીલા ધણી.)

गढ़ के दरवाजे खोल दिये और जफरखान की फौज पर योद्धा टूट पड़े। इस अचानक आक्रमण की कल्पना न होने से जफर अचकचा गया। उसने फौज को सावधान कर युद्ध आरंभ किया। इस ओर हमीर जी काला कहर बरसाते हुए लड़ रहे थे। सांझ होते होते दुश्मन फौज को बहुत पीछे धकेल दिया। हमीर जी ने देखा कि अब शेष बचे डेढ़ दो सौ योद्धाओं में किसी के हाथ, किसी के पैर, किसी की आँतें कट चुकी थी। हमीर जी ने निर्णय लिया कि अब युद्ध इसी परिसर में लड़ना है। सुबह होते ही जफरखान ने सामने से हमला किया, कारण कि वह ज्यादा समय कमजोर शत्रु को देने के लिए तैयार नहीं था। हमीर जी ने भगवान आशुतोष को जल अर्पण किया और सभी साथियों ने आपस में अंतिम जुहार करने के साथ रणांगण में उतर पड़े।

ग्यारहवें दिन की सांझ युद्ध में हमीर जी का शरीर क्षत विक्षत हो गया, तलवार का भयानक वार होने के बाद भी दुश्मन को बराबर प्रत्युत्तर दे रहे थे लेकिन ग्यारहवें दिन की सांझ शिव सेवा में उन्होंने स्वयं को अर्पित कर दिया। इस युद्ध को लाख बाई गढ़ की ड्योढ़ी से निहार रही थी और उस शूरवीर योद्धा की विरूदावली गा रही थी और गाया पहला शोकगीत -

रड़वड़िये रड़िया, पाटण पारवती तणा;
कांकण कमल पछे, भोंय ताहळा भीमाउत ।
(રડવડિયે રડિયા, પાટણ પારવતી તણા;
કાંકણ કમળ પછે, ભોંય તાહળા ભીમાઉત.)

वेळ तुंहारी वीर, आवीने उं वाटी नहीं ;
हाकम तणी हमीर, भेखड़ हुती भीमाउत।
(વેળ તુંહારી વીર, આવીને ઉં વાટી નહીં;
હાકમ તણી હમીર, ભેખડ હુતી ભીમાઉત.)

इधर चारण मां अपने शूरवीर पुत्रों के शोकागीत गा रही थी और जफरखान के सैनिकों के हाथों सोमनाथ का देवल लुट रहा था। हमीर जी इस तरह अपने अनुपम पराक्रम से इतिहास के पृष्ठ लाँघते हुए लोक जीवन के कंठ से होकर हृदय में विराजित हो चुके थे। जब सौराष्ट्र का शौर्य बिखरा हुआ था तब अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ स्वयं का बलिदान हमीर जी को लोकमन का नायक बना गया।

सोमनाथ मंदिर के बाहर वेगड़ा जी की और मंदिर के परिसर में हमीर जी की डेरी आज भी पूजी जाती है। सोमनाथ मंदिर की लूट में भले ही आक्रांताओं ने बहुत बार प्रयास किया हो मगर तत्कालीन वीरों ने अपने बलिदानों से इस धरा को अभिषिक्त किया है।

बुधवार, 26 जनवरी 2022

कुछ अपनी

मैं एक सनातनी हूँ, 
क्षात्र मेरा धर्म है, 

मेरा राष्ट्रीय ध्वज है,
 क्षात्र व सूर्य तेज युक्त वह केसरिया ध्वज,?
 जिसे कभी महान क्षत्रिय सम्राट विक्रमादित्य ने हिन्दुकुश से लेकर अरब की भूमि तक लहराया था।

अगर मैं कहूँ मेरी पहचान न मैं भारतीय हूँ, 
न आर्यावर्त, न जम्बूद्वीप?
 मेरी पहचान तो मेरे धर्म से जुडी है,
 क्योंकि राष्ट्र तो बनते है और बिगड़ते है,
अखंड होते है, खंडित होते है?
 पर मूल राष्ट्रीयता या मेरी असल पहचान तो मेरी वह संस्कृति है जो इस महान अपराजेय व कालजयी सनातन धर्म से मिली है?

मेरे आदर्श मेरे नायक तो सनातन धर्म ध्वज धारक उस धर्म पताका को विश्व में फहराने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, योगेश्वर प्रभु श्री कृष्ण, चक्रवर्ती क्षत्रिय सम्राट विक्रमादित्य, क्षत्रिय सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ,वीर शिवाजी महाराज, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप,  सम्राट पृथ्वीराज चौहान , सम्राट अनंगपाल सिंह तोमर , वीर दुर्गादास राठौड़ , सम्राट हर्षवर्धन बैंस, राजा सुहेलदेव बैंस, बुंदेला वीर छत्रसाल महाराज , अप्रितम जुंझार योद्धा धीर सिंह पुण्डीर, राजमाता जिया रानी( मौला देवी पुण्डीर), भड़ माधो सिंह भंडारी , अपराजेय योद्धा आल्हा उधल, वीरवर गोरा बादल,  महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध ,गुरु गोविन्द सिंह, पंडित उपाधि धारक रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, ठाकुर महावीर सिंह राठौर, बाबू कुंवर सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल हणुत सिंह राठौर, मेजर शैतान सिंह भाटी, जनरल बिपिन सिंह रावत जैसे अनेकों अनेक क्षात्र धर्म ध्वज धारक महापुरुष व युगपुरोधा है।

सनातन में क्षात्र धर्म के सिद्धांतों आदर्शों ने ही इस भारत देश की मातृ समान भूमि को संस्कृति के सर्वोच्च सिंहासन पर बिठाया था। 
यदि ये धर्म न हो तो राष्ट्रीयता का कैसा बोध ? 
धर्म नहीं रहेगा तो मैं भी भारत देश की इस भूमि को मातृभूमि न मान कर साधारण भूमि मानूँगा। 
अतः मेरे लिए मेरा धर्म सर्वोच्च है।

धर्म रहा तो इस पृथ्वी पर कही न कही राष्ट्र बन जाएगा। 
नाम भी भारत या आर्यावर्त रख लेंगे।
 पर धर्म न बचा तो राष्ट्र का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। 
इसलिए हमारे पूर्वजों ने धर्म को आधार बना कर इस राष्ट्र का निर्माण किया। 
जो कभी जम्बूद्वीप एशिया में फैला था। 
धर्म की सीमाएं सिमटी तो राष्ट्र भी आर्यावर्त (ईरान से इंडोनेशिया व मॉरीशस से मास्को) तक सिमट गया। 
धर्म और संकुचित हुआ तो आज का भारत रह गया। सनातन धर्म सिमटता गया और राष्ट्र भी खंड खंड में खण्डित होता गया।
 जो पाकिस्तान व बंगलादेश कभी हमारा भाग था वह आज खंडित हो गया क्योंकि वहाँ से धर्म लुप्त हुआ और राष्ट्रीयता का बोध समाप्त हो गया।

वर्तमान के राजनेताओं ने धर्म के स्थान पर राष्ट्र को प्रमुखता दी। 
धर्मविहीन राष्ट्र कैसा होता है ? 
ये आज के राष्ट्र को देखकर जान सकते हैं।
 पहले न कोई निर्धन था यदि था तो मन में संतोष था। 
धनी व्यक्ति दयालू तथा दानी प्रवृत्ति के थे। 
मन में न लोभ मोह था न ईर्ष्या एवं धर्म के प्रसार के कारण राष्ट्रीयता का भी बोध था। 
इतनी निष्ठा उस समय चोरों में भी होती थी। 
आज वह निष्ठा समाज के रक्षकों से भी लुप्त हो गई क्योंकि धर्म नहीं रहा।

आज अधर्म फैला हुआ है इसलिए समाज में भी असंतोष भय निराशा का बोध है।
 राष्ट्रीयता लुप्त है या किसी विशेष अवसर पर ही राष्ट्रभक्ति का बोध होता है।

ऐसे में यदि खंड खंड हो चुके राष्ट्र को बचाना है तो माध्यम धर्म को बनाना होगा।
 जब धर्म व संस्कृति बचेगी तो ही ये राष्ट्र भी बचेगा।

अतः धर्म सर्वोपरि है, सनातन संस्कृति ही राष्ट्र का उद्धार करने की क्षमता रखती है।

जय क्षात्र धर्म ।।

सोमवार, 22 नवंबर 2021

बॉलीवुड 'नीलिमा अजीम'

प्यार का सहारा न मिला ।

नीलिमा अजीम का जन्म 2 दिसम्बर 1958 को हुआ था । बचपन से हीं उनकी रुचि कत्थक नृत्य में थी । बड़ी होकर उन्होंने कत्थक नृत्य में अपनी कामयाबी के असीम पल गुजारे हैं । उन्हें कत्थक की राजकुमारी के नाम से जाना जाने लगा । उन्होंने बाइबिल की कहानियां , कश्मीर, फिर वही तलाश और धूम मचाओ धूम आदि धारावाहिकों में काम किया । उनकी फिल्मों का सफर फिल्म सड़क से 1991 में शुरु हुई थी । उसके बाद उन्होंने कर्म योद्धा (1992), नागिन और लुटेरे (1992) , हाहाकार ( 1995) , छोटा सा घर (1996),  इतिहास (1997 ), इश्क विश्क (2003) और देहरादून डायरी ( 2013) में काम किया है ।

नीलिमा अजीम की निजी जिंदगी बहुत उतार चढ़ाव वाली रही । उन्होंने तीन शादियां की । कोई कामयाब नहीं रही । उनकी पहली शादी आफिस आफिस धारावाहिक फेम पंकज कपूर से 1975 में हुई थी । एक बेटा हुआ - शाहिद कपूर । वही शाहिद कपूर जिसने पद्मावती , हैदर , जब वी मेट , कमीने और उड़ता पंजाब जैसी हिट फिल्में की हैं । आज शाहिद कपूर को सुपर स्टार का दर्जा मिला हुआ है । लड़ते झगड़ते यह शादी 9 साल तक घिसटती रही । 1984 में दोनों अलग हो गये । पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक से शादी कर ली । बाद में 1990 में नीलिमा अजीम ने फिल्म अभिनेता राजेश खट्टर से शादी की । यह शादी 11 साल तक चली । 2001 में यह शादी भी टूट गयी । इस शादी से एक बेटा ईसान खट्टर पैदा हुआ । यह बेटा भी फिल्मी लाइन में हीं गया । उसकी फिल्म धड़क खूब चली है ।

राजेश खट्टर ने बाद के दिनों में वंदना सजनानी से शादी कर ली ।  नीलिमा अजीम ने भी अपनी तीसरी शादी अपने बचपन के दोस्त और क्लासिकल वोकालिस्ट उस्ताद रजा अली खां से 2004 में की । उम्मीद थी कि यह शादी सफल होगी , पर यह शादी तो केवल पांच साल हीं चली । इन दोनों का 2009 में तलाक हो गया । एक बार फिर नीलिमा अजीम को मिस्टर राइट नहीं मिला । जब त्याग, समर्पण , प्यार का अभाव होता है तो शादियां टूटती हैं । अब यह अवधारणा दम तोड़ने लगी है कि जोड़ियां आसमान में बनतीं हैं । जोड़ियां इसी धरती पर बनतीं हैं । जब आपसी समझ बेकार हो जाती है तो ये शादियां इसी धरती पर हीं टूटतीं  हैं । पहले कम टूटती थीं , अब ज्यादा टूटती हैं । हम जीरो टाॅलरेंस की तरफ बढ़ रहे हैं ।

ऐसे संकट की घड़ी में शाहिद कपूर ने अपनी मां का भरपूर साथ दिया है । उनका अपने जैविक पिता पंकज कपूर के साथ साथ सौतेले पिताओं राजेश खट्टर और उस्ताद रजा अली खां के साथ भी मधुर सम्बंध हैं । उनकी शादी में इनके तीनों पिताओं ने शिरकत की थी । उनकी मां के साथ साथ उनकी सौतेली माताएं ( सुप्रिया पाठक , वंदना सजनानी ) भी वर वधू को आशीर्वाद देने आयीं थीं । ज्ञातव्य हो कि शाहिद कपूर ने मीरा राजपूत से शादी की है । उनको एक बेटा और बेटी का प्रेम रतन मिला है । शाहिद कपूर का अपने भाई ईशान खट्टर से भी अच्छे सम्बंध हैं । एक बार एक इण्टरव्यू के दौरान शाहिद कपूर ने मजाक में कहा था । मैं अपने बच्चों से पहले ईसान खट्टर की नैपी बदल चुका हूं ।

जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनकी अलग दुनियां हो जाती है । वे अपनी इस दुनियां में रम जाते हैं । मां बाप के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं । 12 जनवरी 2017 को नीलिमा अजीम की फिल्म का प्रीमियम था । शाहिद कपूर अपनी फिल्म पद्मावत की शूटिंग में व्यस्त थे । नहीं आ पाए । ईसान खट्टर थोड़ी देर के लिए आए और चले गये । नीलिमा अजीम को बहुत खाली खाली का आभास हुआ होगा । उनको फिर से अपना घर बसाने की सोचनी चाहिए  । क्या पता अबकी बार मिस्टर राइट मिल जाय । जिंदगी का खालीपन भर जाय ।

जिंदगी की राहों में रंजोगम के मेले हैं ।
भीड़ है कयामत की और हम अकेले हैं ।

            कोपिड फ्रॉम     - इं एस डी ओझा सर

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...