सोमवार, 30 अगस्त 2021

नारायणी सैना (देवेंद्र सिकरवार फेसबुक लेख)



यूँ तो कृष्ण के चरणों की धूल के कण मात्र पर भी महाकाव्यों की रचना हो सकती है परंतु फिर भी उनके कालखंड में उनके चहुं ओर व्याप्त घटनाओं, व्यक्तियों व उपकरणों के प्रति मेरी अधिक आसक्ति रही है। 

उनका एक महत्वपूर्ण उपकरण थी नारायणी सेना। 

-नारायणी सेना, तत्कालीन युग की सबसे शक्तिशाली सेना
-नारायणी सेना, कृष्ण की सबसे भयानक प्रहारक शक्ति।
-नारायणी सेना, कृष्ण का सबसे बड़ा उपदेश।

पर आश्चर्य की बात है कि महाभारत युग की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति का अधिक विवरण पुराणों में उपलब्ध नहीं। 

इसका कारण भगवान वेदव्यास, महर्षि जैमिनि आदि लेखक व बुद्धिजीवियों की सैन्य विषयक मामलों में उदासीनता नहीं बल्कि कृष्ण के महान उद्देश्यों के समक्ष उसकी लघु महत्ता है। 

यही कारण है कि विभिन्न स्रोतों से लेकर मैंने नारायणी सेना के संबंध में उपलब्ध सूचनाओं को जोड़कर उसके संगठन व स्वरूप को निर्धारित करने का दुःसाहस किया है। 

वस्तुतः नारायणी सेना के संगठन का प्रारंभ तभी हो गया था जब कृष्ण ने गायें चराते हुये न केवल आभीरों की युद्धकला को आत्मसात किया बल्कि उसे पूर्ण मार्शल आर्ट में परिवर्तित करते हुए #वेलाकलि शैली को जन्म दिया। 

यह वैदिक कलारी की तीसरी शैली थी।

महारुद्र शिव द्वारा जन्मी, कार्तिकेय द्वारा प्रसारित इस कला के दो रूप 'थेक्कन' और 'वदक्कली' पहले ही अगस्त्य व परशुराम द्वारा प्रचलन में थी। 

हाथ में लकड़ी के ठोस दण्डों से 'डांडिया' रास ही नहीं होता था उससे दुश्मन का सिर भी चूर चूर किया जा सकता था। 

कमल पत्र और मृणाल तो बस प्रतीकात्मक व प्रशिक्षण भर के लिए था वरना कमलपत्र ढाल के रूप में और मृणाल लपलपाती तलवार के रूप में शत्रु का सिर धड़ से अलग कर सकती थी। 

रासनृत्य केवल मनोरंजन नहीं था बल्कि प्रहारक 'युद्ध नृत्य' भी था और यह कोई संयोग नहीं कि राजपूतों तक यह 'War Dance' शैली में तलवार संचालन होता रहा। 

और इतनी से नन्हीं अवस्था में इन युद्ध कलाओं का विकास करने वाले इस चमत्कारी बालक की क्षमताओं का अंदाज इसी से लगा लें कि मर्मस्थलों पर वार करके चाणूर व मुष्टिक जैसे भारत प्रसिद्ध मल्लों को माँस का लोंदा बना दिया और सटी हुई उंगलियों के एक कर प्रहार से गुंडे रजक की गर्दन सफाई से ऐसे उड़ा दी मानो हथेली हथेली न होकर तीखी छुरी हो। 

वस्तुतः भारत उस युग में एक खतरे का सामना कर रहा था। 

राम के युग के पश्चात 'असुर' पश्चिम एशिया में शक्तिशाली हो रहे थे और विभिन्न व्यापारिक बस्तियों के माध्यम से राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे थे। 

वे जरासंध के संपर्क में थे, 
वे कंस के संपर्क में थे, 
वे बाणासुर व नरक जैसे प्राचीन असुरों के भी संपर्क में थे।
वे दुर्योधन से भी संपर्क करने का प्रयत्न कर रहे थे। 

-जरासंध उनके दूषित प्रभाव में आकर 'नरमेध' जैसा दुष्कृत्य करने पर उतारू था।
-कंस असुरों का प्रयोग 'भाड़े के हत्यारों' के रूप में करने लगा। 

सिंधु क्षेत्र में यूनानियों की बस्ती 'दत्तमित्री' के रूप में एक और अलग खतरे के रूप में थी और उनका नेता गर्गाचार्य का पुत्र  'कालयवन ' जो आर्य संस्कृति का कट्टर शत्रु था जिससे असुरों का गठबंधन तय था। 

संभवतः जब कृष्ण जरासंध व कालयवन के 'इनसिजन टैक्टिक' अर्थात 'कैंची आक्रमण' से बचने के लिए यदुसंघ के 'महान निष्क्रमण' का नेतृत्व कर रहे थे उस समय ही उन्हें संभवतः एक पेशेवर सेना के संगठन की आवश्यकता प्रतीत हुई जिसके लिए सबसे अधिक आवश्यकता थी धन की। 

उन्होंने सबकुछ सोचकर शार्यात आर्यों के क्षेत्र पर अधिकार जमाकर बैठे प्राचीन असुरों के अड्डे 'कुशस्थली' पर आक्रमण कर उसे अधिकार में कर यदु गणसंघ को अजेय जलदुर्ग में सुरक्षित कर दिया बल्कि  पश्चिम एशिया के व्यापारिक केंद्र  पर अधिकार कर लिया।

धन अब कोई समस्या नहीं था। 

हरे भरे चरागाह, कृषि भूमि और पश्चिम एशिया से संपूर्ण व्यापार अब  कृष्ण की मुट्ठी में था। 

उनके द्वारा प्रशिक्षित गोपों की यह परंपरा से बनी एक छोटी मोटी सेना जो वृंदावन में ही तैयार हुई थी वही अब  एक पेशेवर सेना के रूप में नारायणी सेना के रूप में  विकसित हो गई क्योंकि अब  उनके हाथों में व्यापार व वाणिज्य के रूप में अकूत आर्थिक स्रोत पर उनका अधिकार में था। 

जरासंध मंडल जिस अनुपात में सेना बढा रहा था उसी अनुपात में कृष्ण को भी नारायणी सेना की संख्या बढ़ानी पड़ी जो बढ़ते बढ़ते  चार अक्षौहिणी अर्थात लगभग नौ लाख के आसपास हो गई। 

कृष्ण ने इस सेना की छावनियां चतुराईपूर्वक उन क्षेत्रों में स्थापित की जिनपर कोई राज्य अपने अधिकार का दावा नहीं कर सकता था लेकिन भारत के सभी महत्वपूर्ण मार्गों पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। 

उदाहरण के लिए उन्होंने अपनी सेना के एक बड़े भाग को चर्मण्यवती अर्थात चंबल के बीहड़ों में रखा जिससे न केवल सेना के पोषण हेतु विशाल चरागाह क्षेत्र मिल गया बल्कि विभाजन के कारण कमजोर हो चुके पांचालों को कुरुओं व मगध के विरुद्ध तुरंत सहायता पहुंचाई जा सकती थी। 

एक भाग कहीं न कहीं पूर्व में भी था ताकि काशी, पुण्ड्र और प्राग्ज्योतिषपुर के गठबंधन पर दृष्टि व नियंत्रण रखा जा सके व अभियान के समय तुरंत सैन्य उपलब्ध हो सके। 

उन्होंने सेना का एक बड़ा भाग निश्चय ही सौराष्ट्र में तो रखा ही होगा क्योंकि न केवल जरासंध मंडल बल्कि पश्चिमी एशिया के असुरों से सुरक्षा आवश्यक थी जिन्हें कृष्ण तीन बार सबक सिखा चुके थे। 

प्रथम कुशस्थली से एक एक असुर का समूल नाश ताकि पश्चिमी सीमा सुरक्षित रहे।
द्वितीय कालयवन का विनाश जिसमें भारी संख्या में असुर भी थे।
तृतीय गुरुदक्षिणा के तौर पर गुरुपुत्र को वापस लाने के प्रक्रम में पंचजन के पूरे बेड़े का विनाश। 

जरासंध की मृत्यु व शाल्व वध के साथ ही नारायणी सेना ने अपने सारे लक्ष्य पूर्ण कर लिये लेकिन तीन खतरे अभी भी उपस्थित थे। 

1-पूर्वोत्तर में नरक व बाणासुर जैसे असुर संस्कृति के पोषक राजाओं की उपस्थिति
2-असुरों का दुर्योधन से गठबंधन 
3-एकलव्य का द्वारिका के पास के द्वीपों में सैन्य उपस्थिति। 

पर सबसे बड़ा खतरा स्वयं नारायणी सेना ही बनती जा रही थी और कृष्ण इसे भलीभांति समझ रहे थे। 

सैद्धांतिक रूप से गणसंघ का नेतृत्व भले ही अंधकवंशी उग्रसेन के हाथों में था लेकिन वास्तविक नेतृत्व कृष्ण-बलराम व सात्यिकी  के हाथों में था और यही बात भोज व अन्धकवंशियों को खटक रही थी जिनका नेतृत्व कृतवर्मा कर रहा था। 

प्रारम्भ में कृष्ण के प्रशंसक रहे वृष्णिवंशी अक्रूर भी व्यक्तिगत कारणों से इस गुट से मिल गए और इस फूट ने स्यमंतक मणि के माध्यम से यदुकुल के विनाश का बीज बोया। 

और वैसे भी यादवों को अब कृष्ण व धर्म की आवश्यकता नहीं रह गई थी क्योंकि वह उनके अबाध भोग व सत्तामद के आड़े आ रहे थे। 

चूँकि कृष्ण सामूहिक नेतृत्व व सत्ता के विकेंद्रीकरण में भरोसा करते थे अतः उन्होंने 'नारायणी सेना' को कई भागों में बांटकर उसका नेतृत्व विभिन्न कुलों को सौंप दिया और सबसे बड़ा भाग कृतवर्मा को दिया। 

कृष्ण की उदारता के कारण सेना की निष्ठा अपने सेनानायकों के प्रति आ गई और उनकी बुराइयां भी। 

कृष्ण ने नारायणी सेना के अधिकांश भाग को नष्ट करवाने का निश्चय कर लिया लेकिन उससे पूर्व उन्होंने एक विशाल टुकड़ी लेकर एक अत्यंत गोपनीय अभियान किया और वह था एकलव्य के विरुद्ध। 

संभवतः एकलव्य की किसी भी पक्ष की छावनी में अनुपस्थिति ने उन्हें एकलव्य के इरादों के प्रति सतर्क कर दिया। वे पुनः शाल्व प्रकरण को दोहराना नहीं चाहते थे खासतौर पर जब बलराम दुर्योधन की अप्रत्यक्ष मदद हेतु  अपनी ही 'कूटनीति' दिखाने के चक्कर में सारे यादव महारथियों को अपने साथ 'तीर्थयात्रा' पर ले गए थे। 

द्वारिका असुरक्षित थी और पीछे की ओर से पांडव शिविर भी अतः उन्होंने एकलव्य के गुप्त ठिकाने पर आक्रमण किया और उसका वध कर उप्लवय लौट आये और इसका खुलासा घटोत्कच की मृत्यु के समय किया। 

अब बारी नारायणी सेना के विध्वंस की थी जिसमें से एक अक्षौहिणी से भी अधिक का निजी भाग कृतवर्मा के नेतृत्व में दुर्योधन के शिविर में भेज दिया।

सात्यिकी अपने संघीय व व्यक्तिगत अधिकार का हवाला देकर अपने नेतृत्व वाली सेना के साथ पांडव शिविर में आ गए। 

परंतु हास्यास्पद घटना यह हुई कि दुर्योधन ने कृष्ण के ऊपर अविश्वास के चलते नारायणी सेना को टुकड़ियों में बांटकर अलग अलग सेनापतियों के अधीन कर दिया जिससे उसकी मारक क्षमता ही समाप्त हो गई। 

कृष्ण के नारायणी सेना के बदले चरित्र के आकलन की सटीकता और उनके प्रशिक्षण की भयानकता को इसी बात से समझा जा सकता है कि युद्ध में इन सैनिकों ने खाली हाथों से ही अर्जुन के रथ के घोड़ों, चक्रों से लिपटकर रथ को अवरुद्ध कर दिया और अगर उस दिन कृष्ण न होते तो अर्जुन के साथ दुर्घटना होनी तय थी। 

खैर कौरवों के साथ नारायणी सेना का भी विनाश हुआ लेकिन कुछ महाभारत विशेषज्ञों के अनुसार नारायणी सेना के चौबीस सहस्त्र आभीर सैनिक भाग गए और पंजाब के घने वनों में आभीरों की पश्चिमी शाखा से जा मिले व कृष्ण के जाने के बाद अर्जुन पर आक्रमण कर अपने विनाश का प्रतिशोध लिया। 

कुछ आभीर सैनिक दक्षिण की ओर चले गए जहाँ उन्होंने कृष्ण की कलारी विधि 'वेलाकलि' का प्रचलन किया जो कलारी की अन्य मूल शाखाओं के साथ प्रैक्टिस की जाने लगी। 

अस्तु! 

नारायणी सेना एक अत्युत्तम उदाहरण है ऐसे लोगों का जो न्यायपथ पर चलते चलते अपना मार्ग भटक जाते हैं और फिर समूल विनाश ही उनकी नियति बन जाता है।

रविवार, 22 अगस्त 2021

प्रिया छुटकी की राखी पर

#मेरी_छुटकी
अबकी बार तेरी भेजी हुई स्नेहसूत्र कि पाती बिल्कुल समय पर मिली,जैसे सब कुछ संबरने लगा है,मेरे जीवन का हर एक बिखरा पन्ना फिर से जुड़ने लगा है।पर मुझे लगता है कि अब तू बड़ी होने लगी है..न पहले की रूठती है और न अब लड़ती है...बहुत दिन हो गए!अपनी चिरैया की चहचहाट सुने हुये...वह तेरे पैने बोलो की मधुराहट में खुद को मन्त्रमुग्ध हुये देखना जैसे आंगन की चिरैया का चहचहाना पल-पल स्मृतियों में तेरे शने-शने बड़े होने को में हर क्षण महसूस करता हूँ।
पिछली बार की राखी पर वह तुम्हारा बार-बार पूछना इस बार तुम्हारे आत्मविश्वास के आगे कहि छुप गया क्योंकि बिटिया को आश्वस्त दिखी...नीयत समय पर  उसका निश्छल प्रेम पहुंच ही जायेगा।

तू कितनी भी बड़ी हो जाये,अपने लक्ष्य प्रशासनिक अधिकारिणी बनने को अतिशीघ्र  पूर्ण कर जाए किन्तु तू मेरे लिए सदा वही रहेगी जिसकी नाक बहती है और में मग्न होकर उसे पोंछ कर तुझे दुलार रहा होता होता हूँ।जी करता है की तुझसे जब भी मिलु ,तुझे गुलाबी फ्रॉक में कंधे पे उठाकर नाचता फिरू ..चंहुओर तेरी ख्वाहिशो पर अपने अंक का हिंडोला बनाके झुलाता रहू..!वह समय अपनी गति को स्थिर कर दे और तुम बस मेरे कांधे बैठ मेरे सिर पर अपने नन्हे-नन्हे हाथो से बाल पकड़कर बैठी रहो ।
बहुत दिन हो गए अपनी छुटकी का गुस्से में टेड़ा मुंह बनते हुए देखना,जैसे इस बनाबटी गुस्से में भी असीम स्नेह-बात्सल्य निर्झर होकर झरता है न..यही मेरे इस जीवन की अशेष पूंजी है।
पिछली बार तेरा स्नेहसूत्र थोड़ा बिलम्ब से मिला ,उसे में सहेजकर रखे रहा और इस जीवन के मृत्युलोक आगमन दिवस पर अपने कर में आत्मसात किया क्योंकि सारा जीवन ही उस दिन का ऋणी है जब इस दुनिया मे हम आते है,फिर तेरे प्रति मेरे कर्तव्यों का स्मरण मेरे जन्म दिवस से बेहतर कोई दिन हो ही नही सकता है ।

सच कहें तो मेरे जीवन मे अशेष रिक्तताये थी  जो तेरे आने से एकाएक परिपूर्ण हो उठी है,जैसे सुष्क हुए तड़ाग में किसी के आशीष से दुग्ध रत्न से परिपूर्ण हो उठा हो,जीवन की  समस्त आशाएं एक साथ आकर मेरा पता मुझसे पूछ रही हों।
मुझे नही पता कि तेरे इस स्नेह ऋण का भार  कैसे व्यक्त करू,किन्तु लिखते-लिखते डबडबाई आंखे बहुत कुछ मूक होकर स्वतः शीतल भाव से गदगद कर रही है ।

मेरी चिरैया तू मेरी जिंदगी का वह सौभाग्य है जो सबको नही मिलता है..!
तुम्हारी रक्षा स्नेह सूत्र वचन के साथ तुम्हारे नन्हे-नन्हे श्री चरणों मे मेरा गर्वशीश तुम्हे प्रणाम करता है ।
❣️🙏❣️😘
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तुम्हारा दद्दा 
कुँ.जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र,तन्वरघार स्टेट '५२से'

रविवार, 11 जुलाई 2021

मेरे व्यंग

#गहदुये_गीदड़पंथ

किसी समय कुत्ते जंगल मे व गहदुये (सियार,शृगाल,गीदड़)हम मानवो के साथ पालतू हुआ करते थे। वह दुनिया सबसे विकसित जीव मानव के साथ रहकर मस्त रखबाली करते और कभी-कभार एकाध लठ्ठ खाकर भी पडे रहते। कुल मिलाकर गहदुये बड़े मस्त थे ।
वही बेचारे कुत्ते बड़े परेसान थे,प्रोटोकॉल के तहत ग़ांव के आस-पास मंडराते की ठोक-पीटकर,गहदुओ द्वारा चिथकर अपनी दुर्दसा पर खून के आंसू रोते रहते ।

इसी तरह गहदुओ -कुत्तों का जीवन यापन होते-होते एक लंबा अरसा गुजर गया और ग़ांव में खा-खाकर गहदुओ की चर्बी चढ़ गई ।अब वह खेलते हुए बच्चों को डराने लगे,मानवो पर ही गुर्राने लगे ...मानव स्वभाव से युक्तियों का आविष्कारी प्राणी रहा है और उसने युक्ति पूर्ण तरीके से इस समस्या का निदान करने की ठान ली ।

कुत्तों को इन्विटेसन दिया,गहदुये तो पहले से पूंछ में फूल बनाकर डटे हुए थे। कुत्तों की तरफ भी पूंछो में ढिबरी डालकर बड़े-बड़े पंच आये और पंचायत हुई ।
मानवो ने की सुनो गहदुओ तुम्हारी सन्तति ठीक-ठाक से विकास कर चुकी है अब क्यों न इन कुत्तों की भी दशा में सुधार किया जाए  और सर्वसम्मति से 6-6 माह का ग्रामनिबास दोनों भाइयों को प्रदान करके विकास का चक्र किया जाए !
गहदुये तो दिमाक चर्बी लिए घूम ही रहे उन्होंने बड़े घमंड से "जाओ ये भी क्या याद करेंगे कि किसी ने आश्रय दान किया था!" बोलकर वन गमन कर लिया ।

6 माह बाद समयावधि पूर्ण हुई और कुत्तों की गर्दनों की चाम बदल गयी उधर गहदुये लेंडी,बेर खाकर भूखे रहकर कुछ बड़े शिकारी जानबरो के  शिकार बनकर आधे रह गए। कुत्तों ने मानवो के साथ  निष्ठा व मित्रतापूर्ण व्यवहार बनाकर,पहले से इधर अपनी 'जड़ें चूल्हे तक जमा ली थी' ।
परिणाम यह हुआ कि मानवो ने बोला कि जाकर इन गहदुयो की रेल बना दो ,सालो को इतना कूटो की चारो पहर अपनी दुर्दशा पर रोते रहे ।
गहदुये आये 'हुआये' कुत्तों 'भों-भों' करके अपनी चिरपरिचित गाली से उन्हें सुसज्जित करके रेद दिया...तब से गहदुये रात के चारो प्रहर रोते-चिल्लाते आ रहे है और कुत्ते उन्हें गरियाकर चिथेड़कर भगाते आ रहे है...!
कुत्तों को डर बस किसी 'फिआउली' (पागल गहदुये) से लगता है जो प्रोटोकॉल को 'पौये' की झक्क में फक्क करके कुत्तों की रेल बना देता है और मानव तालिया बजाते आ रहा है ।
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बात कहने का तातपर्य है कि पहले की तरह आज भी कुछ कुत्ते-गहदुये-फिआउली बने लोग शोशल मीडिया में भी है। जो सिर्फ रोना-भोंकना-फफ़ियाना सतत करते रहते है और कभी न कभी किसी न किसी के  'पालतू पट्टे' में जरूर मिलेंगे ..अतः  मानवो को उनसे समुचित दूरी बनाकर रहना चाहिए ।क्योंकि सबको पता 14 इंजेक्सन दोनों के काटने पर 'उपग्रह' छोड़ सीधे पेटकी टुंडी में भाले की तरह कोचे जाने में डॉक्टर दया नही करता है ।  

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JVS. 

sd ओझा सर

जहर से अब आराम हुआ है.

पोटेशियम सायनाइड (KCN) एक यौगिक होता है, जो रंगहीन, दिखने में चीनी जैसा व  पानी में घुलनशील होता है. KCN को सोने की खदानों, आर्गेनिक सिनथेशिस और इलेक्ट्रोप्लेटिंग में इस्तेमाल किया जाता है. छोटे पैमाने पर यह आभूषणों के केमिकल gilding (सोने का पानी चढ़ाना)  और buffing (पालिश करना) के काम आता है.यह एक तीक्ष्ण जहर है. एक बार चाय पीते और साथ में काम करते समय यह जहर बहुत हीं अल्पतम मात्रा में एक कर्मचारी के पेट में चला गया . डाक्टरों की टीम ने कई घंटों के अथक प्रयास के बाद उसे बचा लिया. यह पहला मौका था कि पोटेशियम सायनाइड के जहर से प्रभावित व्यक्ति को बचाया जा सका. इसका एक कण जुबां पर रखते हीं अादमी की मौत हो जाती है. इसका मतलब कि एक कण का सौवां हिस्सा वह जहर होगा, जिसके कारण उसकी जान बची.

आज तक कोई भी पोटेशियम सायनाइड का स्वाद बता नहीं पाया है. कई वैज्ञानिक इस प्रयास में अपनी जान गंवा बैठे हैं. जहर खाते समय हीं वे लिखना शुरू कर देते , पर कोई भी S से आगे नहीं लिख पाया. S से Sweet भी हो सकता है और Sour भी. वैज्ञानिकों के अकारण मौत को देखते हुए इस प्रयोग को बन्द करना पड़ा. बाद में एक भारतीय ने अपने सुसाइड नोट में जो लिखा,वह अक्षरशः दिया जा रहा है   "Doctors, Potassium cyanide, I have tested it. It burns the tongue and tastes acrid ." चूंकि इतना लम्बा लिखना KCN खाने वाले के लिए सम्भव नहीं था, इसलिए इसकी विश्वसनीयता प्रामाणिक नहीं मानी गई.

एक बार और पोटेशियम सायनाइड के स्वाद का पता चलने की बारी आई थी. बात 16 फरवरी सन् 1932 की है. महान् वैज्ञानिक सर सी वी रमण के तत्वाधान में एक विलक्षण प्रयोग हुआ, जिसकी देख रेख देशी विदेशी वैज्ञानिकों की एक टीम कर रही थी. सबसे पहले योगी नरसिंह स्वामी शहद के मानिंद तेजाब चाट गये. फिर संखिया, कुचिला आदि जहरीले पद्दार्थों का उन्होंने सेवन किया. उसके बाद बारी आई पोटेशियम सायनाइड का. जय मां काली के उद्घोषणा के साथ वे पोटेशियम सायनाइड भी खा गये. कुछ देर बाद पूरा हाल तालियों की गड़गड़हट से गूंज उठा. योगी नरसिंह स्वामी भी पोटेशियम सायनाइड का स्वाद नहीं बता पाए. कारण,  एसिड, संखिया और कुचिला का स्वाद चढ़ी उनकी जिह्वा पोटेशियम सायनाइड का स्वाद बताने में असमर्थ रही.

पोटेशियम सायनाइड लोगों की जान हीं नहीं लेती, बल्कि उनके दिलों को जोड़ती भी है. एक बार लैब में साथ साथ काम करने वाले एक लड़की और एक लड़के को पोटेशियम सायनाइड की जरूरत महसूस हुई. दोनों प्यार में धोखा खाए हुए थे. दोनों चुपके चुपके लैब में पोटेशियम सायनाइड खोजते. साथ में किस कदर उन्हें प्यार में धोखा मिला, उसकी चर्चा भी एक दुसरे से करते. पोटेशियम सायनाइड तो मिला नहीं, पर उनका प्यार जरूर परवान चढ़ गया. 

वैज्ञानिकों ने पोटेशियम सायनाइड को प्रभाव हीन करने के लिए एक नया मिश्रण 3- मरसोटोपाइरुवेट बना दिया है, जिसका चूहों पर सफल परीक्षण किया जा चुका है. यह औद्योगिक हादसों और आतंकवादी हमलों में उपयोगी सिद्ध होगा. 

वैसे पोटेशियम सायनाइड इच्छा मृत्यु के लिए रामबाण औषधि है . लाइलाज बीमारी वाले रोगियों को सरकार की सहमति से शान्ति प्रिय और पीड़ा रहित मृत्यु देने का इससे बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता. 

जितनी दवा पी उतना हीं तड़पे,
जहर से अब आराम हुआ है!

            साभार -Er S D Ojha सर🙏

समय के झटके2

ज़रा सी देर में, इसरार बदल जाते हैं
वक़्त के साथ, इक़रार बदल जाते हैं!

दौलत है तो सब दिखते हैं अपने से,
वर्ना तो यारो, दिलदार बदल जाते हैं!

न करिये यक़ीं अब इन हवाओं पे भी,
मिज़ाज़ इनके, हर बार बदल जाते हैं!

भूल जाओ अब तो सौहार्द की भाषा,
वक़्त पड़ने पर, घरवार बदल जाते हैं!

जब तक समझ आते हैं अपने पराये,
जीने के तब तक, आसार बदल जाते हैं!

न आजमाइए अब खून के रिश्तों को,
वक़्त पे उनके, व्यवहार बदल जाते हैं!

न ढूंढिए यंहा अब मोहब्बत को इधर
देखते ही देखते, बाज़ार बदल जाते हैं!!

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JVS.

समय के झटके 1

आखिर सांसों का साथ, कब तक रहेगा !
किसी का हाथों में हाथ, कब तक रहेगा !

बस यूं ही डूबते रहेंगे चाँद और सूरज तो,
आखिर रोशनी का साथ, कब तक रहेगा !

अगर जीना है तो चलना पड़ेगा अकेले ही,
आखिर रहबरों का साथ, कब तक रहेगा !

न करिये काम ऐसे कि डूब जाये नाम ही,
आखिर सौहरतों का साथ, कब तक रहेगा !

कभी तो ज़रूर महकेगा उल्फत का चमन,
आखिर ख़िज़ाओं का साथ, कब तक रहेगा !

तुम भी खोज लो ’ ख़ुशी के अल्फ़ाज़' यारा,
आखिर रोने धोने का साथ, कब तक रहेगा !

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मुस्कुराइये अनुभव तो मिला
     JVS.

ये नयन

#ये_नयन
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अपनी आँखों से-अपनी आँखों का कभी प्रतिबिम्ब  निहारा है,..कभी किसी की आँखों मे,इस दुनिया-जंहान की दिलकसी का नजारा इतना मोहक होता है कि पलके झपकना भूलकर जड़ हो जाती है..जैसे उन्हें भय मिश्रित अपेक्षा हो कि कंही पल भर की झपकी ..वह मोहिनी न भंग करदे जिसकी कब से प्रतीक्षा की थी !

आपके नयन ही आपके प्रति हुए उस अतीव आकर्षण का मूल से प्रतीत होते है..आप जब मुझे देखकर हया से लजाती हुई पलको को ढालती है न,तब प्रतीत होता है हृदय के स्पंदन की गति कहीं इतनी तीव्रतम न हो जाये ...कि रक्त वेग से शरीर की उन तमाम वाहिकाओं का असितित्व एक झटके में सिमट जाये !

यूं तो सिनेमाई अदाकारों ने,फ़नकारों ने नयनो को खूब तबज्जो दी पर मुझे लगता है कि इन नयनो पर कुछ भी लिखना-बोलना इतना सरल नही है..यह जो नैना है ....झुकी लज्जा के साथ मूक होकर एक उद्वेग  प्रकट करते है ..जैसे वृक्ष अपने फलो से लदकर हयावस भार से झुकते-झुकते लजाया हो ...जैसे गाँव-जबार मे एकाएक झुकी हुई बदरिया बड़े स्नेह से जल आचमन से  करती प्रतीत हुई हो ।
जैसे सागर शांत पड़ी तरंगों में ज्वार-भाटा आकर चला गया हो !

हाँ! यह जो तुम्हारे नैना है वह मेरे मन की भाषा बोलते है,मुझे विदित है वह तुम्हारा मुझे देख कल्पना करके बार-बार पलके झपकाना और खुद की आँखों से खुद को आश्वत करना कि प्रत्यक्ष को अब प्रमाण नही दिए जा सकते है ।

धनुष जैसी भृकुटियों के नीचे विद्यमान यह जो दो ज्ञानेन्द्रीय है न ...कभी बन्द होकर शांति से सपना नही देखती है।इनके सपने तो खुले चक्षुओं से चारो और दिग-दिगान्तर तक बड़े करीने से सजते है।
गीतकार ने लिखा था कि ..
"नैनो की ना मानियो ,नैना ठग लेंगे..!"
के स्थान पर....
"नैनो की यह बात नैना जाने रे.." 
से में बड़ी सहमति रखता आया हूँ,आखिर नैना ही तो वह भावना का केंद्र है जँहा से होकर खुशी और गम दोनों के भावना प्रवाह समान रूप से प्रस्फुटित होते है ।

मुझे कभी कभी महसूस होती है तुम्हारी पलको पर शबनम की वह बूंदे ..जैसे फूली हुई सरसो में कोई भंवर आकर इन मोतियों को न तोड़ ले जाये। आँखे ही तो वह तारा है जिसके तारे में अपना बना हुआ प्रतिबिम्ब हर कोई निहारने की तमन्ना किये रहता है ।
सुनो!
एक छोटी सी ख्वाहिश पलको पर आ बैठी है कि मुझे अशेष समय तक वह दो नैना अपने चक्षुओं से अपलक निहारने है....और बस निहारने है ।

मोहब्बत के भी कुछ राज होते हैं,
जागती आँखों में भी ख्वाब होते हैं!
जरूरी नही हैं कि गम में ही आँसू आएँ,
मुस्कुराती आँखों में भी सैलाब होते हैं!

बशीर बद्र की यह पंक्तिया एकाएक स्मरण हो आयी ।

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JVS.

मंगलवार, 25 मई 2021

खूबसूरत अहसास

अरे सुनो!!
शायद तुम्हे सुनने या पढने में आ जाये..पर मुझे लगता है कि यह सब ग्रहण करने शक्ति अब तुमसे बहुत दूर जा चुकी है,ठीक बेसे ही जैसे पतझड़ में वृक्ष अपने तृणों से रहित होकर बड़े ही अनासक्त से लगते है...और उनके तल में एकत्रित हो जाता है उन्ही के तृणों का बहुत बड़ा झुरमुट। जिसमे किसी की भी पदचाप उन तृणों के असितित्व को चकनाचूर करते हुए निकल जाती है,असितित्व तुम्हारे अप्राप्य तृणों का होता है और उनकी करुण कृदंन कि एक पीड़ा को में अपने अंतस में महसूस करता हूं ।
जरा इधर चितवन करिए...!
तुम्हारे मुरझाए हुए चेहरे को जब भी देखता हूं,मुझे भय होता है कि तुम इतने समीप कैसे हो,कैसे कभी -कभी तुम्हारी उपस्थिति मुझे इतनी सुस्पष्ट आभासित रहती है?
जबकि आभास-बास्तविक्ता,प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष,सच-झूठ,स्पर्श-अश्पर्स,दृश्य-अदृश्य इन सब सजीव-निर्जीव अनुभवों का आलम्बन कहि दूर अनन्त में ओझल हो चुका है ।

देखो! बिल्कुल तुम्हारी पसंद की छोटी चिड़िया जैसी आज कैसे भोर से बाल सँवार के निकली है,उसका एक पैर खड़े होकर दाना चुगना और दोनों पैरों पर नाचना मुझे बार-बार उस गोरैया की याद दिलाती है,जिसके पंखे से पर क्षतिग्रस्त हो गए थे,तुम बहुत रोये थे जैसे चिड़िया के रूप में तुमने स्वयं कुतरे हुए खुद के पंखों की पीड़ा महसूस की हो !

तुम्हे पता है?
अब हमारे यंहा अब ओस के मोती नही झड़ते है और उसपर गिरती किरणों से भुवन भास्कर की रश्मिका का परावर्तित आनन्द का दृश्य जैसे किसी ने अपहृत कर लिया है।फिर भी जाता हूं की कंही कोई शबनम न गिरी हो और में उस आभास में विश्वास के धनी दृश्य से अछूता न रह जाऊ ।
वो ठंड से मेरा काँपना और जुड़ी के ज्वर से कराहना ...तुम्हारा दोस्तो के साथ मेरा ख्याल रखना कितना सुखद था...ऐ काश!वह ज्वर सदा के लिए बना रहता ।
मुझे याद है ...मेरा सर्द लहर में भीगकर हॉस्टल तक पहुँचना और तुम्हारा बस से बीच राह में साथ देने के लिए कूदना..कितना कुछ तुम अपना हिस्सा अपने आप बाट लेते थे ।
अब न साथ है,न हिस्सा है और न ही वह बारिस है बस बाकी है अन्तस् का भीगना और खुशनुमा वक्त की स्मर्णीकाये। जिनमे व्यक्त करने पर अनुभवी होने का भय....वह भय ही तो है जो हृदय के भाव भरे स्पंदन को महसूस ही नही होने देता है। रक्त वाहिकाएं रक्तसंचरण तो करती है पर अब उसमें पूर्व की भावनाओ का सागर ठाटे नही मारता है,वहः तो वक्त के साथ अरमानो की तरह सूख चला है। उसमे जो कहि नमी बाकी है न उसमे 'समझदारी' का ताप सनै-सनै सब झुलसा के दरारे निकाल चुका है। उन दरारों से उठती भावुकता की नमी बाष्प बनकर कभी कभी निकलती है और साथ ही निकलता खूबसूरत अहसासों का जनाना जिसमे लाश भी खुद है और जनाजेगीर भी खुद है ..!!!


बुधवार, 14 अप्रैल 2021

नव सम्वत्सर पर विशेष

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। वसंत ऋतु में वृक्ष, लता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं जिसे मधुमास भी कहते हैं। इतना ही यह वसंत ऋतु समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को विभिन्न प्रकार के फूलों से अलंकृत कर जन मानस में नववर्ष की उल्लास, उमंग तथा मादकाता का संचार करती है।
इस नव संवत्सर का इतिहास बताता है कि इसका आरंभकर्ता परमार वंशी महाराज विक्रमादित्य थे। कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण थे।
ये लोग पारस कुश से सिंध आए थे। सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात एवं महाराष्ट्र में फैल गए और दक्षिण गुजरात से इन लोगों ने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। शकों ने समूची उज्जयिनी को पूरी तरह विध्वंस कर दिया और इस तरह इनका साम्राज्य शक विदिशा और मथुरा तक फैल गया। इनके कू्र अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़ कर बाहर कर दिया।

 इस पराक्रमी वीर महावीर का जन्म अवन्ति देश की प्राचीन नगर उज्जयिनी में हुआ था जिनके पिता महेन्द्रादित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दंपत्ति ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान भूतेश्वर से अनेक प्रार्थनाएं एवं व्रत उपवास किए। सारे देश शक के उन्मूलन और आतंक मुक्ति के लिए विक्रमादित्य को अनेक बार उलझना पड़ा जिसकी भयंकर लड़ाई सिंध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई जिसमें शकों ने अपनी पराजय स्वीकार की।
इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया जिसे विक्रमी शक संवत्सर कहा जाता है।

 राजा विक्रमादित्य की वीरता तथा युद्ध कौशल पर अनेक प्रशस्ति पत्र तथा शिलालेख लिखे गए जिसमें यह लिखा गया कि ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की।
इतना ही नहीं शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी और अरब विजय के उपलक्ष्य में मक्का में महाकाल भगवान शिव का मंदिर बनवाया।

 #नवसंवत्सर_का_हर्षोल्लास

 आंध्रप्रदेश में युगदि या उगादि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है। वीर विक्रमादित्य की विजय गाथा का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उल ओकुल' में किया है।
उन्होंने लिखा है वे लोग धन्य हैं जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य के समय जन्म लिया। सम्राट पृथ्वीराज के शासन काल तक विक्रमादित्य के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित रही जो बाद में मुगल काल के दौरान हिजरी सन् का प्रारंभ हुआ। किंतु यह सर्वमान्य नहीं हो सका, क्योंकि ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य सिद्धांत का मान गणित और त्योहारों की परिकल्पना सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण का गणित इसी शक संवत्सर से ही होता है। जिसमें एक दिन का भी अंतर नहीं होता।
 सिंधु प्रांत में इसे नव संवत्सर को 'चेटी चंडो' चैत्र का चंद्र नाम से पुकारा जाता है जिसे सिंधी हर्षोल्लास से मनाते हैं।
कश्मीर में यह पर्व 'नौरोज' के नाम से मनाया जाता है जिसका उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वर्ष प्रतिपदा 'नौरोज' यानी 'नवयूरोज' अर्थात्‌ नया शुभ प्रभात जिसमें लड़के-लड़कियां नए वस्त्र पहनकर बड़े धूमधाम से मनाते हैं।
 सनातन संस्कृति के अनुसार नव संवत्सर पर कलश स्थापना कर नौ दिन का व्रत रखकर मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ कर नवमीं के दिन हवन कर मां भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। जिसमें सभी लोग सात्विक भोजन व्रत उपवास, फलाहार कर नए भगवा झंडे तोरण द्वार पर बांधकर हर्षोल्लास से मनाते हैं।
 इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है लोग इन्हीं दिनों तामसी भोजन, मांस मदिरा का त्याग भी कर देते हैं !!

●लेख स्त्रोत:-  इंटरनेट  व राजा विक्रमादित्य परमार का इतिहास विक्रमी सम्वत से सम्बंधित पुष्तके ...

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से' 
चम्बल मुरैना मप्र

सोमवार, 22 मार्च 2021

गजल

जब कलम और कर्म दोनों खाली हो,
चल-जिंदगी में बहुत कुछ सबाली हों!

क्यों न खुद कोई तस्वीर उतारी जाये,
देखे औरो को खुदी को? गाली दी जाये!

तह पर तह लगाए कब तक जिये यारा,
शल्कों में छिपी शक्लें क्यों निकाली जाये!

अब तो परिंदों ने घरौंदे रखना छोड़ दिया,
चल दूर कंही दरिया में कस्ती उतारी जाये!

वक्त बहुत आये बहुत से निकलते जाएंगे 
भूल की भूले चल भूलकर भूल डाली जाए !!

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राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...