शनिवार, 26 दिसंबर 2020

इतिहास

---भारत का अंतिम जौहर/शाका---

  -------घासेड़ा का युद्ध------

---25 राजपूतो ने किया 25 हजार मुगल-जाट फौज का मुकाबला---

भारत का अंतिम जौहर/शाका हरियाणा की धरती पर हुआ जिसमे 25 राजपूतो ने 25 हजार सैनिकों की मुगल-जाट संयुक्त फौज का मुकाबला करते हुए 1500 जाट-मुगलो को मार गिराया। 

गुड़गाव में प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा राघव वंश के राजपूत निवास करते हैं। इन्ही में ढाना गांव के हाथी सिंह(हठी सिंह)राजपूत औरंगजेब के समय बड़े बागी हुआ करते थे। मेवात से लेकर दिल्ली तक मुगल शासन उनकी बगावत से परेशान था। इससे निबटने के लिए मुगल प्रशासन ने उनसे संधि करना बेहतर समझा और एक मेव लुटेरे सांवलिया की गर्दन काट के लाने के इनाम के बदले हठी सिंह को मेवात के घासेड़ा में नूह मालब समेत 12 गांव की जागीर देने की पेशकश की। हठी सिंह के पुत्र राव बहादुर सिंह राघव बेहद वीर और योग्य हुए जिन्होंने अपनी जागीर का विस्तार घासेड़ा के अलावा, कोटला, सोहना और इन्दोर परगनो तक कर लिया जिनसे जनश्रुतियो के अनुसार करीब 52 लाख का राजस्व प्राप्त होता था। अपनी योग्यता के बल पर वो कोल(अलीगढ़) के फौजदार भी बन गए। 

वही भरतपुर के जाट सूरजमल की मुगल वजीर सफदरजंग से दोस्ती जगजाहिर थी। सूरजमल वजीर सफदरजंग के साथ मुगल बादशाह के दरबार में पेश हुआ जहाँ उसे बादशाह से 'कुंवर बहादुर राजेन्द्र' और उसके पिता बदन सिंह को 'राजा महेन्द्र' की उपाधि प्राप्त हुई। सूरजमल को वजीर की अनुशंसा पर बादशाह से मथुरा की फौजदारी और खालसा जमीन पर शाही जागीर प्राप्त हुई। 

इसी समय सूरजमल और वजीर सफदरजंग में राजपूत राव बहादुर सिंह राघव को सबक सिखाने को लेकर मंत्रणा हुई। दोनो ही राव बहादुर सिंह राघव के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित थे। वजीर सफदरजंग मराठो के खिलाफ मोर्चे में बहादुर सिंह राघव द्वारा साथ ना देने के कारण उनसे शत्रुता रखता था और सूरजमल मेवात और ब्रज क्षेत्र में बहादुर सिंह राघव की बढ़ती ताकत को ईर्ष्या से देखता था। 

परिणामस्वरूप मुगल वजीर सफदरजंग ने शाही फरमान निकलवा कर सूरजमल को राव बहादुर सिंह पर हमला कर उन्हें मारने या गिरफ्तार करने का आदेश देकर दिल्ली से बड़ी फौज देकर रवाना किया। सूरजमल भारी फौज लेकर कोल(अलीगढ़) पहुँचा और वहां कब्जा कर लिया। सूरजमल का बेटा जवाहर सिंह भी भरतपुर से बड़ी जाट फौज लेकर आ मिला। उस समय राव बहादुर सिंह कुछ साथियों के साथ जमुना के खादर में शिकार खेलने गए थे। सूरजमल ने षडयंत्र के तहत राव बहादुर सिंह को पुरानी मित्रता के नाम पर संधि के बहाने अपने शिविर में बुलाया। बहादुर सिंह मित्रता के भरोसे पर सिर्फ 4 सहयोगियों के साथ सूरजमल के शिविर में गए। वहां सूरजमल ने राव बहादुर सिंह से उनकी प्रसिद्ध तलवार को देखने की इच्छा जाहिर की। सूरजमल ने तलवार लेकर अपने सहयोगीयो को पकड़ा दी। बहादुर सिंह को सूरजमल की मंशा पर संदेह हुआ और उन्होंने वहां से निकलना ठीक समझा। 

राव बहादुर सिंह वहां से किसी तरह निकल के अपनी पैतृक जागीर घासेड़ा में आए और गढ़ी(छोटा किला) में मोर्चाबंदी कर ली। उनके साथ उनके परिवार के 24 पुरूष और अन्य महिलाएं एवं बच्चे थे। मुगल सेनापति सूरजमल के पास 20 हजार जाट और मुगलो की सेना थी, साथ में मुगल वजीर सफदरजंग 5 हजार मुगल सेना और दर्जनों तोप लेकर उससे आ मिला और उन्होंने घासेड़ा की गढ़ी को घेर लिया। उत्तर की दिशा से सफदरजंग के साथ जवाहर सिंह, दक्षिण की दिशा से बक्शी मोहन राम, सुल्तान और वीर नारायण, रिज़र्व फौज का नेतृव बालू राम जाट को दिया और सूरजमल खुद ने 5 हजार सैनिक और तोपो को लेकर अपने मामा सुखराम और मीर मुहम्मद पनाह के साथ पूर्वी दिशा में मोर्चाबंदी की। 

3 महीने तक विशाल मुगल-जाट फौज मात्र 25 राजपूतो द्वारा रक्षित गढ़ी(छोटे किले) को घेर कर हमला करती रही लेकिन तब भी सूरजमल की विशाल सेना गढ़ी में घुस नही पाई। इस बीच राव बहादुर सिंह के भाई जालिम सिंह और पुत्र अजीत सिंह घायल हो गए। युद्ध को इतना लंबा खिंचते देख सूरजमल ने संधि का प्रस्ताव भेजा जिसकी शर्तो को राव बहादुर सिंह राघव ने मानने से इनकार कर दिया। इसी बीच जालिम सिंह की मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद सूरजमल ने दोबारा संधि प्रस्ताव भेजा लेकिन हठी राव बहादुर सिंह ने दोबारा इसे ठुकरा दिया। 

17 अप्रैल 1753 की रात को सूरजमल ने चारो तरफ से भीषण हमला करने का आदेश दिया, अगले दिन भीषण गोलाबारी और लड़ाई में मीर मुहम्मद पनाह समेत 1500 मुगल-जाट सैनिक मारे गए लेकिन तब भी मुगल फौज गढ़ी(किले) में नही घुस पाई। इसके बाद राव बहादुर सिंह ने शाका-जौहर करने का निश्चय किया। उनके परिवार की महिलाओं ने बारूद में आग लगाकर खुद को उड़ा लिया। राव बहादुर सिंह अपने पुत्र अजीत सिंह और 24 अन्य परिवारजनों और सहयोगियों के साथ शाका करने के लिए गढ़ी से बाहर निकले और बहादुरी के साथ आखिरी दम तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह मंजर देख कर मुगल-जाट फौज का दिल दहल गया। मुगल सेनापति सूरजमल ने घासेड़ा पर कब्जा जरूर कर लिया लेकिन वहां उसे राख के अलावा कुछ भी प्राप्त नही हुआ। 

सूरजमल का दरबारी कवि सूदन इस युद्ध का चश्मदीद था और उसने सूरजमल की जीवनी सुजान चरित में राव बहादुर सिंह और उनके सहयोगी राजपूतो की बहादुरी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। यह भारतीय इतिहास का आखरी प्रमुख जौहर/शाका माना जाता है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी शायद ही कही हो जहाँ 25 लोगो ने अपने से हजार गुना बड़ी, सुसज्जित, हर तरीके से ताकतवर एवं सुविधा सम्पन्न फौज का एक छोटे से किले में कई महीनों तक मुकाबला किया और मात्र 25 लोगो ने 1500 लोगो को मार गिराया हो। सूरजमल और उसके मुगल सहयोगियों को ये अंदाजा बिलकुल भी नही था कि राव बहादुर सिंह और उनके अन्य राजपूत सहयोगी अपने आत्मसम्मान और इज्जत की रक्षा के लिए इस हद तक जा सकते हैं। 18वी सदी के संक्रमण काल में जब अव्यवस्था का फायदा उठाकर अनेक लूटेरे वर्ग उत्तर भारत की राजनीति में उभर आए थे और राजनीती बहादुरी और स्वाभिमान के बजाए लूट और धोखे के इर्द गिर्द सिमट गई थी, पुरानी स्वाभिमानी, इज्जतदार और बहादुर वर्ग इस लूट, फरेब और भ्रष्टाचार के तंत्र में किनारे हो चुकी थे, ऐसे समय राव बहादुर सिंह के नेतृत्व में मुट्ठीभर राजपूतो ने राजपुत्रो की शताब्दियों पुरानी आत्मबलिदान की परंपरा का प्रदर्शन कर उस समय की राजनीति में हलचल पैदा करने का काम किया। 

संदर्भ- 
          1. सुजान चरित, सूदन
          2. तारीख ए अहमदशाही
          3. गुड़गांव गज़ेटियर
          4. दी फॉल ऑफ मुगल एम्पायर, जे एन सरकार

साभार पुष्पेंद्र राणा जी 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

आचार्य श्रेष्ठ श्री त्रिलोचननाथ तिवारी जी की कृति

जिस स्थान पर कभी भी 

ह वर्ण दिखे न!

एक क्षण ठहरो और विचार करो!

ह वर्ण स्वयं में पूर्ण है और शिव-वाच्य है।

हंकार का अर्थ शिवाकार! 
शिव-स्वरूप!
अतः अहं, अ हं का अर्थ है 
जो शिव से वियुक्त है।

और जब तक कोई शिव से वियुक्त है तभी तक उसका स्व जीवित है।

अतः तन्त्र कुण्डलिनी शक्ति को 
अहं शक्ति कहता है। क्योंकि वह मूलाधार में शिव से वियुक्त पड़ी है।

अतः 
अहंकार शब्द का अर्थ है शिव-वियुक्त शिवा!

जब यह अहं जागृत होता है तो कुण्डलिनी जाग्रत होती है और फिर शिव की ओर, शुभ की ओर उन्मुख होती है।

तन्त्र कुण्डलिनी को भुजंगिनी कहता है। सर्पिणी की तरह होती है। कुटिल रेखा पर चलायमान, फुफकारती, डंसने को तत्पर!

कौन है जिसको अहं नहीं?

जिसका अहं नष्ट हुआ वह शिव सायुज्य प्राप्त कर चुका! 

किन्तु तब वह या तो 

सो हं

हुआ

या

फिर हं सः!

सोहं - वही है शिव!
हंसः - शिव है वही!!

स शक्ति वाच्य है। 

अतः जो अहं से इन्कार करता है वह

या तो जीवित नहीं, या फिर पाखण्डी है।

उसको कुछ काम आ पड़ा होगा!
वरना झुक कर मिला नहीं होता!!

अपना अहं छिपाने वाला स्वार्थी होता है।

अहं का दूसरा अर्थ है शक्ति! शिव-शक्ति! अर्थात् स!
अर्थात् शक्ति!
अर्थात् शिव से अलग छिटकी पड़ी
मूलाधार में साढ़े तीन फेरों में सिकुड़ी साक्षात शिवानी!

और घमण्ड?

पहले तो घ को समझो!

घकारं चञ्चलापाङ्गि ! चतुष्कोणात्मकं सदा।
पञ्चदेवमयं वर्णमरुणादित्यसन्निभम् ॥
निर्गुणं त्रिगुणोपेतं सदा त्रिगुणसंयुतम् ।
सर्व्वगं सर्व्वदं शान्तं घकारं प्रणमाम्यहम् ॥

सृष्टिरूपा वामरेखा किञ्चिदाकुञ्चिता ततः।
कुण्डलीरूपमास्थाय ततोऽधोगत्य दक्षतः॥
अत ऊर्द्ध्वं गता रेखा शम्भुर्नारायणस्तयोः।
ब्रह्मस्वरूपिणी देवि ! 
मात्राशक्तिः प्रकीर्त्तिता॥

मालतीपुष्पवर्णाभां षड्भुजां रक्तलोचनाम् ।
शुक्लाम्बरपरीधानां शुक्लमाल्यविभूषिताम्॥
सदा स्मेरमुखीं रम्यां लोचनत्रयराजिताम् ।
एवं ध्यात्वा घकारन्तु तन्मन्त्रं दशधा जपेत्॥

निर्गुंणं त्रिगुणोपेतं सदा त्रिगोलसंयुतम् ।
सर्व्वगं सर्व्वदा शान्तं घकारं प्रणमाम्यहम्॥

ऐसे घ का जो मण्ड है, घ को उबालने पर गाढ़ा सा तैरता,

वह घमण्ड है!

छड यार!

अरण्ये रोदनं वृथा!

ए भिया! ब्लॉक करो न!

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

अजब शौकीन दशयु

#शौकीन_बागी/दस्यु/डकैत

"शौख बड़ी चीज है..!"
किसी उत्पातन की यह चन्द पंक्तिया जैसे ढाई आखर की इश्किया भावनाओ सम्पूर्ण मूर्तिरूप देती हुई सी प्रतीत होती है।शौख और शोखी जब   कहि जाकर संगम करती है तब कहि जाकर एक  शोखिया किबदन्ति बनती है,जैसे प्रशिद्ध अभिनेता स्व. राजकुमार हर किसी को अपनी रील और रियल जिंदगी में "जानी" बोलकर सम्बोधित किया करते थे ...जबकि उनके कुत्ते का नाम जानी था !
कुछ ऐसा ही अजीबो-गरीब किस्सा हमारे बीहड़ के पूर्व दस्युओं का था,अपनी-अपनी पसंद की सनक और वह भी इतनी आश्चर्यपूर्ण की विश्वास ही न हो...किन्तु यह एक ऐसा सत्य है जो कंही बीहड़ो में गुम हो गया अथवा बीहड़ो में ही दफन है ।

ददुआ मानसिंह राठौर-
आजादी से पहले ओर आजादी के बाद का एक ऐसा बागी जिसके नाम कितने अंलकार है और मन्दिर में किसी देव नही बागी सम्राट को देवता की तरह पूजा जाता है.कहते है कि इन्हें विवाहों में भात(मामेलापक्ष की रश्म) भरने का बड़ा शौख था जो इनके जीवन मे भक्त नरसी की नोट नक़ी देख लगा था और अपने पूरे बीहडी जीवन हजारो भात भरे व लड़कियों के कन्यादान लिए ।

माधो सिंह भदौरिया -
एक ऐसा बीहड़ी किरदार जिसका जीवन ही सेकड़ो किरदारो का रोल अदा करते हुए निकला एक सैनिक, डॉक्टर,मास्टर ओर जादूगर के करतब दिखाने बाला बागी रीयल दुनिया से रिल दुनिया मे भी अपना किरदार खुद बना। इसके साथ ही इन्हें गाना-गीत बजाने सुनने का शोख था ,माधोसिंह के गैंग प्रायः लोकगीत ओर फिल्मी गीत अपहरण करके लाये लोगो से सुनते थे व उन्हें इनाम स्वरूप रुपये भी दिया करते थे। एक वाकये अनुसार 50 हजार मोटी रकम की पकड़ का गीत सुनकर 1100 पुरुष्कार देकर उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया था ।कहते है कि माधो आंखों पर पट्टी बांध मिर्च को गोली फोड़ दिया करते थे ।

मोहर सिंह-मलखान सिंह-
बीहड़ी अपराध इतिहास में इन्हें 2M बोला जाता  है इन्होंने भी रियल  से रील दुनिया तक का सफर तय किया,पर इन्हें शोख था 3 राजपुताना रेजिमेंट की तरह बड़ी बड़ी रोबीली मुछे रखने का..लोग कहते है कि इनकी मुच्चो में रोज पौआ -पौआ घी लगा करता था !रमेश सिकरवार,हरिसिंह,टुंडा आदि भी मुच्छड़ दशयु थे ।

छिद्दा-माखन-
डायलोगों की दुनिया के जीवंत किरदार छिद्दा-माखन ममेरे-फुफेरे भाई थे और बचपन सहपाठी के साथ जीवन के साथी भी थे ...यह बचपन परस्पर प्रशन्नता की कुशलक्षेम "साहिब सलाम" बोलकर लिया करते थे।इनदोनो को दो जिस्म एक जान ओर अपनी सेकेंडो में लांगुरिया लोकगीत बनाने की अद्भुत शोख थी ..कहते है कि माखन महाभारत का पूरा विवरण इन लोकेगीतो में गा दिया करता था तो छिद्दा के बगेर वह कभी गा नही पाते थे ..असल मे माखन की मौत छिद्दा को जब पता चली जब "साहिब सलाम" का प्रतिउत्तर नही मिला था !

मध्यप्रदेश में चंबल के बीहड़ों में पनपने वाले दस्यु गिरोह के कई सरगना अपने अजीबोगरीब शौक के कारण दंत कथाओं के पात्रों की तरह हमेशा चर्चित रहे हैं।इनमें से कुछ दस्यु गिरोह शिवपुरी जिले के जंगलों में सक्रिय रहे हैं। आजादी के पूर्व कुख्यात दस्यु सरगना टुन्डा अपने साथियों के साथ एक आकर्षक जलप्रपात पर रहता था इसलिए यह स्थान उसके नाम से 'टुन्डा भरखा खो' के नाम से जाना जाने लगा। शिवपुरी के पास घने जंगल में स्थित यह स्थल अब प्रसिद्ध पर्यटक स्थल बन गया है।

पचास से साठ के दशक में भी शिवपुरी के जंगलों में कुख्यात डाकू सरदार अमृतलाल अपने गिरोह के साथ सक्रिय रहा... अमृतलाल ने लोगों का अपहरण करके उनसे फिरौती वसूलने की शुरुआत की थी जो आज के डकैत गिरोह भी कर रहे हैं।इसे अजीव तरह लोगो वेवकूफ बनाने का शोख था..ओर यह वहसी तरीके महिलाओ के कान फाड़कर कुंडल खींचने सायको शौकीन था।डाकू सरदार अमृतलाल के बारे में क्षेत्र के बुजुर्गों में चर्चा रहती है कि वह एक से सवा लाख रुपए की फिरौती उस समय भी लेने की सनक से ग्रसित था, जबकि उस जमाने में यह बहुत ही बडी रकम होती थी।

हरीसिंह को लोंगों की नाक काटने की सनक थी। जब वह किसी से भिड़ता तो सबसे पहले उसकी नाक काटने से नहीं चूकता था।उसने कई नागरिकों व ठसक बाले लोगो साथ-साथ पुलिस बालो की भी नाक पर हाथ साफ  किया था ।

कालांतर में यहाँ के जंगलों में दयाराम, रामबाबू गडरिया, हजरत रावत, कमल सिंह जैसे खूँखार दस्यु गिरोह सक्रिय हो गए, जिनमें सबसे ज्यादा खतरनाक इनामी एवं चर्चित दयाराम रामबाबू गडरिया गिरोह था।
रामबाबू और दयाराम को देशी घी खाने और अपहृतों को खिलाने का शौक था। वे घी के इतने दीवाने थे कि अपनी बंदूकों की सफाई भी तेल की जगह घी से किया करते थे..!
इस गिरोह में रामबाबू सबसे ज्यादा क्रोधी और सनकी था। जब किसी अपहृत की फिरौती समय पर नहीं पहुँच पाती तो यह उसे गोली मारने को सबसे ज्यादा उतावला रहता था।
दयाराम और रामबाबू के बारे में कहा जाता है कि उन्हें एक हजार एवं पाँच सौ रुपए के नोटों और सोने के आभूषण से लगाव था और वे अपने साथ हमेशा बड़ी राशि रखते थे ...।

#चम्बल_सिंह_अबलोकन

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बाबू कथा (व्यंग)

अजी!भारत रहा होगा कभी कृषि प्रधान देश, आजकल तो बाबू प्रधान देश है।सोसलमीडिया से मैनस्ट्रीम मीडिया तक और संसद,पान की दुकान से लेकर पैनड्राइव की दुनिया तक मे बस बाबूओ का जिक्र ही मिलेगा।
कोई भी न्यूज हो जब तक कोई परकटि न्यूज बाली बाबू न प्रकट करे ...वह कपोल कल्पित झूठ बनकर रह जाती है !
बुद्धुबक्स के बाबू ही आजकल हमको अपडेट रखते है कि लड़को के कब पिम्पल निकलने पर कोनसा गोवर घिसना है और कब किस मौषम में कोनसे पाने से भुभडे के नट-बोल्ट टाइट करके 'थाना बाले तोतले बाबू' को पटाना है? फिर चाहे घर के अड़ियल 'लट्ठ बाले बाबू' के द्वारा  दिनरात पिलने पर 61-62 दिन वैधबाबू का कोर्स ही क्यों न करना पड़े। पर तोतले बाबू को 'माताबाबू' की पूजा का अधिकार दिलाना है ।

आज का भारत देख मुझे नही लगता कि लोगो को प्रेम जैसा कुछ होता होगा बल्कि प्रतीत होता है कि सबको 'संक्रमित बाबू रोग' हो गया है और अंततः उस बाबू की याद आ जाती है जो विभिन्न सरकारी दफ्तरों में इंग्लिश पीकर मिलता है और सबकी फाइलें 'अपनी इंग्लिस' के चक्कर मे मण्डप बाली सालियों की तरह छिपाते रहता है ।जैसे 'जूता छिपाई' (सॉरी..!फाइल छिपाई) की रश्म का नैग मिला वह मोदी जी की तरह 'सीना छप्पन' करते हुए आपकी फाइल नई-दुल्हन की सुहागसेज मुह दिखाई की तरह पेस कर देगा ।
अगर मुझ जैसे निपट गंवार से पूछ लें कि, "कभी बाबुओ के चक्कर में पड़े हो?"

तो में कंहूँगा- की भाई बाबुओ से भाजपा बचाये ओर राहुल गांगी को राष्ट्रीय युवा बनाये पर कभी इन तोतले,चोर,परकटे,बाबूओ के चक्कर मे एक बार सबको घुमाए!

बाबुओं का चक्कर जब इस मृत्युलोक में पड़ता है तो मानव जीवन-मृत्यु के तमाम चक्कर भूल सिर्फ और सिर्फ 'बाबू माया' के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता है।जन्म लेते ही जब थोड़ी समझ आती है तो घर मे प्रथमतः दर्शन होते है 'जूता बाले बाबू+जी के(सम्मान के साथ 'जी')यह एक इकलौते बाबू होते है जो आप-हम सबको अपने जूता के जोर पर सही राह दिखाते है,पर हमें शोशल मीडिया के इनबॉक्स बाले बाबुओ के चक्कर मे अपना कल्याण दिखने लगता है और ऐन मौके पर हमें वह बाबू बुलाकर अपनी वारात के स्वागत में बुत बनाकर खड़ा कर देते है। बाकी रही-सही कसर 'डीजे बाबू' ....."तू पसन्द है किसी ओर की" बजाकर पूरा कर देते है ।

इस बाबुमय विश्व मे सबसे घातक होते है बैंक बाले बाबू..!
पैसे निकालो तो ...
"विड्रॉल में एक जगह और सिग्नेचर...अबे शब्दो मे अमाउंट की स्पेलिंग सही कर!" इत्यादि की इस तरह घुड़की देते है जैसे ग्राहक खुद के पैसे नही 'केशियर बाबू' की किडनी विड्रॉल में लिख दी हो !
"बुधवार को आना पासबुक अपडेट कराने, अभी प्रिंटर मशीन की मौसी नाराज है !"
(जबकि बेचारा ग्राहक पिछले 25 बुधवारो से लगातार प्रिंटर की मौसी जी को बार-बार मना रहा होता है)
मनीजर बाबू का तो कहना ही क्या ...पूरे दिन लंच करके  अपने छौना बाबू को के नखरे जो लेने है !

सबसे क्रोधाग्नि बाले होते है घर मे विधिवत 'माताबाबू' की पूजा करके सांसारिक ढंग से लाये हुए 'घूंघट बाले बाबू'! यह बाबू जब जीवन मे प्रवेश करते है लौंडो के जीवन मे हच के टॉवर लग जाते है। दिन में भगा-भगा के नही सोने देते और रात में बर्फ से ठंडे पाँव लगाकर नही जीने देते है। मटर छिलने से पँखो पर गीला कपड़ा लगवाते है और जब इनका मन हो तो 'लठ्बाले बाबू जी' के सामने रोकर बेमतलब बोनस में गजक सी कुटबा देते है !

है महादेव जी!विनय है कि तमाम तरह के बाबुओ से बचाये रखे किन्तु 'माताबाबू बाले 'ठीकरी बाबू' ओर 'पनाह बाले बाबू(जी) से सबकी बनाए रखे !

नॉट-: किसी के पास तोतला बाबू हो तो हमे समर्पित कर सकते है!
अथः सिरी बाबू कथाय प्रथमः अध्याय: नमो नमः

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शनिवार, 14 नवंबर 2020

रंगोली के रंग


          ★ कहानी★

एकाएक चेहरे पर आयी श्वेत-श्याम अलका को हटाने  के लिए उन्होनो पास रखी बाल्टी में हाथ धोये ही थे की कहि से आकर एक बिल्ली ने उनकी बनाई रंगोली के रंगों  को बिखेर दिया। वह मुस्काई ओर बड़े ही भाव से बोल पड़ी...
"क्यों री मौसी...अब सासु माँ-ननदी सब गए जमाने के किस्से क्या बने तुम आकर उनकी याद दिलाने लगी !"

वह अकेली ही रहती थी किन्तु उस गांव का हरेक घर उनका परिवार था,वह आज से करीब 5 दशक पहले एक  17वर्षीय किशोरी बधु के रूप में आई थी। ऐसा क्या नही था जो उनकी वरात में न गया हो किन्तु उस वरात का किरीटमणि नही था ।
वह दूर थे अपनी कर्तव्यनिष्ठा के प्रति समर्पित 65 के युद्ध मे दुश्मन से लोहा लेते हुए, सेकड़ो दुश्मनो के काल बने हुए....मोर्चे-मोर्चे पर जैसे उन्ही का युद्ध कौशल कुलाचे भर रहा था ।

इधर वरायत की अगवानी पर तोरण मारा जा रहा था तो उधर वह बंकर पे बंकर मार रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कुँअर रणवीर आज अपने नाम को प्रदर्शित कर रहे हो .....उधर मण्डप में बैठी दुलहिन पास रखी फैंटा-कटार में प्रियतम प्रतिबिम्ब की कल्पनाओ में सँजो रही थी। विधि-विधान से पाणिग्रहण तो हुआ परन्तु रश्मो में बंधी नवविवाहिता को प्रियतम दरश न हुए ...!!

नवविवाहिता की अगवानी हुई पूरी हवेली में जैसे उत्सव था वही विवाहिता की मनमंदिर हवेली सजकर भी श्रंगार रहित थी...रिक्तता थी। उस अद्वतीय सौंदर्य को अपलक निहारने बाली दो आंखों की जो रण में जिसे निहारती वह  ओहदा शीघ्र ही रिक्त हो जाता और एकाएक ग्रेनेड आकर समीप ही गिरा की वह हिरन की तरह पहाड़ी से लुडककर गिरता-गिरता पड़ोसी के आंगन में जा फसा ।

विवाह की चौथी होने को थी कि दनदनाते कदमो से सेना का दस्ता आया और उनकी एकमात्र पहचान विशेष हेलमेट के साथ अपनी करून ध्वनि बजा श्रद्धांजलि दे ...अपने पीछे छोड़ एक लकड़ी का बक्सा जिसपर बड़े  शब्दो मे लिखा था 'सूबेदार रणवीर सिंह' !
घर मे करुंनक्रदन पसरा था तो नवविवाहिता मात्र मौन थी और सबसे बोल रही थी ...

"मुझसे बगेर पूछे कुँअर जी कहि नही जा सकते ,इस लोहे के टोप से क्या उनकी वीरगति मान लू !"

"में अपनी अंतिम सांस तक प्रतीक्षा करूँगी ओर वह भी सुहागन रहकर !!"

लोगो ने समझा कि सम्भवतः गहरा आघात लगा है पर नवविवाहिता अडिग थी,वह अपने प्रण न हटी ओर आज  भी लगभग आधा सैकड़ा आयु उपरांत माथे टिकुली मांग सिंदूर अनवरत सजता ।
कुछ समय बड़ो ने विरोध किया पर समय के साथ सबके लिए यह आम बात हो गयी ।

प्रणीता कंवर नाम था उनका....नाम जैसी ही अडिग। एक दम शांति और सुंदरता के जैसे समस्त अलंकार एकसाथ आकर रुक गए हो....रणवीर और प्रणीता के पाणिग्रहण माध्यम बने अश्व पर हर कोई सवार नही हो पाता था ,सिवाय प्रणीता के पिता पर कुँअर रणजीत ने खेल-खेल में अश्व को अपना मुरीद क्या किया उनके विवाह की वेदी के जैसे पहले मन्त्र बन गए ।

संन 65 युद्ध से लापता हुए कुँअर का कोई पता न चला और प्रणीता के इरादे दृण होते रहे ....समय अपनी गति से चलता रहा अब वह हर किसी के लिए सम्मान की जैसी मूर्ति थी। हवेली त्याग खपरैल की कुटी ओर एक स्यामा गाय के साथ दिनभर भजन। बच्चो को पढ़ाना,गांव भर के लोगो के दुख बाटना ही दिनचर्या थी ।

अभी दस दिन पूर्व ही तो उन्होंने अपने वैवाहिक अथवा प्रतीक्षित समय के 40 वे करवाचौथ को बगेर अन्न-जल के पूर्ण किया था और आज एक बिल्ली बार-बार उनकी रंगोली को बिखरा देती थी ।

"यह बिल्ली भी मेरा बार-बार काम बिगाड़ रही है जैसे किसी जन्म की दुश्मन हो!"

प्रणीता बड़बड़ा ही रही थी कि ......

"देवी सुनिए!"
"यशवीर सिंह जी की हवेली किधर है ?"

एक लगभग 60 वर्षीय प्रोढ़ किन्तु आभामय तेजश्वी चेहरे पर उनकी नजर पड़ते ही न जाने क्यों एक हुक सी उठी पर वह न चाहते हुए भी अपने स्वसुर का नाम सुनकर उन्होंने सिर पर अपनी पियरी साड़ी का पल्लू लेते हुए दवे स्वर में पूछ लिया ....!

"जी! उनकी हवेली में अब कोई नही है ,में उनके लड़के जो युद्ध मे लापता हो गए है उनकी पत्नी हु, कहिये आपकी की क्या सेवा कर सकती हूँ !"

प्रतिउत्तर सुन रणवीर की आंखों से अश्रु वह निकले और सजल नेत्रो से देखने की देरी थी कि ....अर्द्धस्वरूपा साक्षात हो गयी ।

"है नाथ !"
"युगों बाद आज बापीसी का ध्यान आया !"
बोलकर अचेत होगयी 

पड़ोस बाले एकत्रित हुए कुछ एकाध वयोवृद्ध बुजुर्गो ने पहिचाना तो गांवभर में ढोल तांसे बज उठे और प्रणीता के प्राणनाथ सहित पूरे गांव ने खण्डहर होती हवेली को दुलहिन की तरह दीपो से सजाकर इस चमत्कारिक वापिसी पर आनन्द गीत गाये !

आज दसको बाद अटारी पर रोनक थी जैसे युगों की प्रतीक्षा उपरांत पपीहे को स्वाति नक्षत्र का जल और जल को सुष्क हुए उपवन की चाह मूर्तिरूप हो उठी हो ।
दूर सघन में कोई संगीत प्रेमी मधुर स्वर में बांसुरी से आल्हादित हो रहा था तो प्रणीता कंवर का सुहाग आज पुनः नवेली दुल्हन की तरह सजा था .......!

प्रणीता कंवर की रंगोली दूर अंतरिक्ष मे रंग बिरंगी उल्कावृष्टि बनकर प्रणीता कंवर एवम कुँअर रणवीर के परिणय की साक्षी बन रही थी ।

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दीपोत्सव की बधाईया 🏜️🎡☀️⭐️🌟🌞🌞

       -जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
          चम्बल मुरैना मप्र

रविवार, 8 नवंबर 2020

बगल बाली सीट

 वह वांयी पंक्ति चौथी सीट थी जिसपर लड़का बैठे-बैठे प्रतीक्षा में अपनी डायरी के पेजो को तल्लीन्नता से लगातार कुछ लिख रहा था। क्योंकि बस चलने में समय था और वाकी सवारियों से उसे कोई मतलब नही था ।
एकाएक एक 5 फिट लम्बा भीनी-भीनी महक का झोंका उसके समक्ष नमूदार हुआ और उसको पता भी न लगा..!

"आपके साथ बाली सीट पर कोई है सर...अगर नही है तो मुझे विंडो सीट चाहिए!"

उसके पूछने का लहजा कुछ ऐसा था कि लड़के ने मूक रहकर ,एक ओर हटते हुए मूक सहमति में बगल खिसकते हुए  उसे बैठने को....बगेर सिर ऊंचा किये  जगह देकर डायरी में ही गुम रहा !!

करीब 20 मिनट उपरांत लड़के ने एक उबासी लेते हुए पुस्त से सिर टिकाते हुए आंखे बंद कर ली ...।
एकाएक गाड़ी स्टार्ट हुई और गियर गुर्राहट ने झपकी में व्यधान कर दिया ।

बाजू बैठी लड़की पर उचटती नजर डालते हुए देखा तो वह ओषत कद से कुछ छोटी एक ओषत रंग बाली जिसने ब्लू जींस के साथ फ्रॉक नुमा जॉर्जेट के साथ दोनो कंधों पर वी शेप दुपट्टा डाल रखा था जिसे भी ही महीन चतुराई के साथ पिनो से स्टेपल कर रखा था और इस यूनिक शैली का पहनावा आकर्षक लगा ।

"सर मुझे कुछ खाने को लाना है ...!"
कहते हुए लड़की ने वैनिटी से 200 की नॉट हाथों में चमकाई ओर वाहर निकलने को उद्धृत दिखी....लड़का खड़ा होकर एक ओर हट गया और उसने पहली बार 'स्लो लुइस' इत्र की चिरपरिचित महक महसूस की, वह अपने सेलफोन में शोशल मीडिया कुरेदने लगा और पुनः निमग्न होकर कभी-कभी मुश्कुरा भी रहा था कि खिड़की तरफ सिर से ऊपर कंगन युक्त हाथों में लैयज के साथ बिकानू मिक्सचर औऱ एप्पल फीज बोतल दिखी .....

"सर पकड़िए....मुझे कुछ और लेना है!"

न चाहते हुए भी हाथ मे वह तमाम खाने का सामान था और प्रतीक्षा थी कब हाथ खाली हो जाये!

कुछ ही मिनट में एक 500 ग्राम मिठाई लिए लड़की मुस्कुराती आई और यथास्थान बैठ गयी ।

"सर आप भी लीजिये न मुझे अच्छा लगेगा कि अकेले नही खाना पड़ेगा,देखिए #आपके लिए  मिठाई भी लाई हुँ !"

लड़के भँवे विचारमुद्रा में सिकुड़ती गयी कि इसे कैसे पता है कि मुझे मीठा पसंद है !
उसने मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहकर पल्ला तो झाड़ लिया पर " आपको मीठा पसंद है" बार-बार  मनमशतिष्क में नाद करता रहा ।

लड़का पुनः झपकी लेने के प्रयास में पुस्त से सिर टिकाकर कर बन्द आंखों से गन्तव्य की कल्पना में बिचरन करता रहा और .....

"में ठेंगी हु लेकिन इतनी भी नही की मुझे किसी हेल्प चाहिए...मेरे घर मे सब pg है सिर्फ में ही नही "
"इसका मतलब यह नही की तुम मुझ पे सिमपेथी दिखाओ, अपनी औकात में रहो .."
"यह मत समझो कि मैने तुम्हे खुद को नापती हुई नजरो नही देखा है...रज्जू की एनिवर्सरी पर तुम मुझे वॉच कर रहे थे और  ठेंगी कहकर मुझे हिरासमेन्ट कर रहे हो !"

लड़के ने उसके द्वारा 'ठेंगी' शब्द बोलने के साथ ही उसकी आंखों में सागर की लहरों के समान उमड़ती लहरों को स्पष्ट देखा और उसी स्थिति में आंखों की झिरी से उसके चेहरों पर क्रोध,कातरता के ज्वार-भाटे देखता रहा ।
करीब 15 फोन उसकी फ़ोनवार्ता में उसने लड़के के प्रति के आधुनिक शैली की गालिया भी सुनी और फोन कटने के बाद उसे फ़्फ़कते भी देखा ।

वाहन अपनी तफतार से पथ को निरतर पास करता जा रहा था ओर लड़की अपनी वेदना अथवा हीनता को अश्रुपात करके कम किये जा रही थी ।

"सॉरी !फ़ॉर डिस्टरविंग यू सर..।"
"आपने कुछ खाया नही ..टेंसन न लीजिये आपको लूटने का मेरा कोई प्लान नही है !"

लड़का हंस पडा ओर लड़की के अभिनय बाली झूठी मुस्कान का जबाब एक पीस पेड़े का उठाकर दिया ।
 
बाते चलती रही लड़की पूछती रही और लड़का सनझिप्त उत्तर देता रहा ...इसी बीच गन्तव्य आया और ...! लड़की बेहद खूबसूरत डायरी के साथ पेन बढाते हुए बोला !

"ऑटोग्राफ प्लीज...!"
लड़का कुछ कहता उससेपहले ही लड़की बोल उठी !

"आप जिस संजीदगी से रिस्ते उकेरते है न उतनी ही गम्भीरता से स्वम को मेंटेन भी करते है, मेने आपके कुल 5-6 आर्टिकल पढ़े है और आपकी इसी संजीदगी के साथ कलम ओर कर्म की समानता की फैन हो गयी ।"

"जितेंद्र सर! में रहती तो रीवा में हूं but आपको बस में देख आश्चर्य चकित थी और आपकी संजीदगी से आपके साथ बैठने खाने के कुछ पल मिले !"

"कभी रीवा आइये, में उधर ही रहती हूं !"

मेरी रास्ते भर की विचार गुत्थी उसने एक पल में सुलझा कर "आभार" बोलते हुए डायरी-पेन लिया और ....एक विनय,आदेश,आग्रह मुझे समझ नही आया क्या था कि वह स्वम को 'अ'सफल न लिखने की बोलकर अंकभर सिमट गई ।
मेरे पहले किसी लिए हस्ताक्षर करते हाथ कम्पित थे और उसका नाम कुछ अस्पष्ट था ..
'सुनिधि मानव एकाएक भेंट!"

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जितेन्द्र सिंह तौमर '५२से'
कानपुर उप्र .

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

ऐतिहासिक गद्दार मीर जाफर

#गद्दारो_की_हवेली
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पढ़ते अथवा सोचते  ही रोंगटे खड़े हो जाते ही कि कहि कोई हमारे साथ ऐसा विश्वाशघाती तो नही जिसके रक्त से प्लाज्मा अलग हो गया हो! कंही कोई ऐसा तो नही जो स्वार्थ शिद्धि पूर्ण करने के लिए दुश्मन खेमे जा मिला हो !!कहीं कोई ऐसा तो नही जो मुस्कुराते हुए गले तो लगे किन्तु गला रेतने से पहले कुछ भी न सोचें !!!

जी हां!.....
बाग़ियों ,दस्युओं, चम्बल श्रंखला संस्करण में आपको चम्बल से काफी परिचित कराया, अब परिचय देता हूँ एक ऐसे द्रोही का जिसकी हवेली को 'रक्त हवेली' का बदनुमा नाम दाग मिला और जिसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला गया .....!जिसके दगा के कारण भारत को लगभग 200 वर्षो तक ब्रितानी हुकूमत की दासता झेलने पड़ी और 'सोने की चिड़िया' बोला जाने बाला महान दो सदियों तक लूटा जाता रहा ।

1733 में पैदा हुए नवाब सिराजुद्दोला की अपनी हत्या के समय महज़ 24 साल की उम्र थी।अपनी मौत से साल भर पहले ही अपने नाना की मौत के बाद, उन्होंने बंगाल की गद्दी संभाली थी! ये वही वक्त था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी उपमहाद्वीप में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही थी ।

सिराजुद्दौला को कम उम्र में नवाब बनाए जाने से उनके कई रिश्तेदार खफा थे....ख़ास तौर से उनकी खाला घसीटी बेग़म ! सिराजुद्दौला ने नवाब बनने के थोड़े ही समय बाद उन्हें क़ैद करवा दिया था!
सैना बढ़ते असमांजस्य के चलते  नवाब ने प्रायोगिक तौर पर बरसों से बंगाल के सेनापति रहे मीर जाफर की जगह मीर मदान को प्रमुखता दी......परिणाम वही 'सिल्हारे को सिल्हारे की जलन'..... इससे मीर जाफर नवाब से बुरी तरह खफ़ा हो गया ।

उन्ही दिनों फिरंगी अपने पाँव पसारने के लिए जगह तलाश रहे थे और उन्हें तलाश थी एक ऐसे भेदीये की जो उनकी राह के रोडा बनते नबाब की सुदृण व्यवस्था में सेंध लगा सके और उनकी तलाश शीघ्र ही अंसतुष्ट ओर सत्ता लालची मीर जाफर के रूप में पूर्ण हुई ।
एक गुप्त स्थान और मध्यस्थ के माध्यम से फिरंगी सेनापति क्लाइव -जाफर की गुप्त मंत्रणा हुई .....सड़यंत्रो की खाई खोदी गयी, अनुबंध हुआ और ब्रिटिश सेना ने आक्रमण कर दिया ।
नबाब की स्थिति चहुओर घिरे शिकार जेसी थी क्योंकि उत्तर से अब्दाली ओर पश्छिम से मराठो का अतिक्रमण पहले ही था....पूरी शक्ति से आकमण करना भी एक ओर से दुश्मन को   जीतने का खुला आमंत्रण था। प्रतिकार स्वरूप बंगाल के तीनों मोर्चे सम्भालती विशाल  फ़ौज की शक्ति प्रति मोर्चा एक  तिहाई से कम हो गयी ।
फ़ौज के एक हिस्से के साथ वो प्लासी पहुंचे.... मुर्शिदाबाद से कोई 27 मील दूर डेरा डाला गया... 23 जून को एक युद्ध में सिराजुद्दौला के विश्वासपात्र मीर मदान की मौत हो गई.... नवाब ने सलाह के लिए मीर जाफर को सन्देश भेजा.....और मीर जाफर ने सलाह दी कि युद्ध रोक दिया जाए. ....नवाब ने मीर जाफर की सलाह मानने की भारी  कर दी जिसकी परिणीति बंगाल और नबाब दोनो भूगतनी थी ।

युद्ध विराम कर दिया गया....!  नवाब कि फ़ौज वापस कैंप लौटने लगी..... मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को स्थिति समझा दी...!
क्लाइव ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया, एकाएक  हुए अप्रत्याशित हमले से सिराज की सेना बौखला गई... तितर-बितर होकर बिखर गई....जब तक कुछ समझ पाते क्लाइव ने लड़ाई जीत ली।नवाब सिराजुद्दौला को भाग जाना पड़ा....!

मीर जाफर तुरन्त  अंग्रेज़ कमांडर से जाकर मिला ओर सहमति के अनुसार उसे बंगाल का नवाब बना दिया गया....दरअसल वह  नाम का नवाब था  सत्ता तो अंग्रेज़ों के हाथ लग चुकी थी।


प्लासी की लड़ाई से भागकर नवाब सिराजुद्दौला अधिक दिन आज़ाद नहीं रह सके,उन्हें पटना में मीर जाफर के सिपाहियों ने पकड़ लिया. ....मुर्शिदाबाद लाया गया. !
मीर जाफर के बेटे मीर कासिम  ने उन्हें जान से मारने का हुक्म दिया!! 2 जुलाई 1757 को उन्हें मीरजाफर की हवेली  में फांसी पर लटकाया गया. ...अगली सुबह, उनकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड़ कराई गई....!!!!
कुछ समय ही मीरजाफर भी कठपुतली नबाब रहा ओर फिरंगियों उसी नीति के तहत जाफर के सेनापति पुत्र मीर कासिम द्वारा कलम कर दिया गया ,मीर कासिम नबाब तो बना किन्तु फिरंगी सत्ता के अधीन ओर भारत का एक क्षेत्र फिरंगियों के हाथ चला गया ।

मुर्शीदाबाद स्थिति मीरजाफर की हवेली को आज भी हराम अथवा हरामी के हवेली के रूप में बोला जाता है !
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यह आलेख लिखते चम्बल की एक लोकोक्ति स्मरण हो आयी..!

दगा किसी का सगा नही है ,नई मानो तो कर देखो!
जिन लोगो ने दगा किया है,जाकर उनके घर देखो!!
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत

ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत
Rajputana Soch पेज

===ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत===

साठा चौरासी का मुकीमपुर गढ़ी गाँव पिलखुवा के निकट अवस्थित है जो कि #तोमर राजपूतो का गाँव है। यहाँ के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे और उनका स्थानीय जनता में बहुत प्रभाव और मान सम्मान था। 1858 के विप्लव की शुरुआत के बाद क्षेत्र के राजपूत ग्रामीणों ने भी जमींदार गुलाब सिंह तोमर के नेतृत्व में बगावत कर दी। ठाकुर गुलाब सिंह ने ब्रितानियों को लगान न देने एवं क्रांतिकारियों का साथ देने का निश्चय किया। उन्होंने क्षेत्र वासियों को भी लगान न देने के लिए प्रेरित किया। मुकीमपुरगढ़ी में जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह के नेतृत्व में राजपूतो की एक बैठक बुलायी गयी। इसमें सभी ने ठाकुर गुलाब सिंह से सहमत होते हुए ब्रिटिश सरकार को भू-राजस्व न देने की घोषणा की। इस प्रकार मुकीमपुर गढ़ी राजपूत क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ बन गया। जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह ने निकटवर्ती क्षेत्र के गाँवों को भी क्रांति के लिए प्रोत्साहित किया। परिणामतः वहाँ भी क्रांतिकारी भावनाएं पनपने लगी और कुछ समय में वहाँ कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से भंग हो गयी। ब्रितानियों से संघर्ष होने के पूर्वानुमान के कारण जमींदार गुलाब सिंह ने अपनी गढ़ी  (लखौरी ईटों की किलेनुमा हवेली ) में हथियार भी इकट्ठे करने शुरू कर दिये।

मुकीमपुर गढ़ी के विप्लव की सूचना जब अंग्रेज अधिकारियों तक पहुँची तो उन्होंने उसके दमन का निश्चय किया। ब्रितानियों ने गुलाब सिंह को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया और मुकीमपुर गढ़ी तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विप्लव भड़काने का आरोप भी उन पर लगाया गया। एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी यहाँ विप्लव के दमन के लिए भेजी गयी। उसने मुकीमपुर गढ़ी को चारो ओर से घेर लिया। गुलाब सिंह की हवेली पर तोप से गोले बरसाये गये। मुकाबला असमान था लेकिन ठाकुर गुलाब सिंह जी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने ब्रितानियों का सामना किया परन्तु वे तोपों के सामने ज्यादा देर टिक न सके। ठाकुर गुलाब सिंह की गढ़ी को तोपों से खंडहर में परिवर्तित कर दिया। ठाकुर गुलाब सिंह और उनके कई सहयोगी वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगती को प्राप्त हो गए। ब्रिटिश सेना को हवेली के अन्दर कुएँ से हथियार प्राप्त हुए जो उनका सामना करने के लिए जमींदार गुलाब सिंह एवं ग्रामीणों ने इकट्ठा किये थे। बाद में मुकीमपुर गढ़ी गाँव में आग लगा दी गयी। ब्रिटिश अधिकारी डनलप ने गुलाब सिंह की सम्पूर्ण जायदाद जब्त कर ली। आज भी ठाकुर गुलाब सिंह जी की हवेली के खंडहर 1857 की क्रांति के गवाह बने हुए हैं।
~~बागी गाँव सपनावत ~~
सपनावत साठा क्षेत्र के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण गाँव में से है जो गुलावठी के पास अवस्थित है। यह गहलोत(शिशोदिया) राजपूतो का गाँव है और बहादुरी और बगावती तेवरो के लिये हमेशा प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के राजपूतो ने हमेशा की तरह 1857 के विप्लव में भी अपनी बहादुरी और देशभक्ति का परिचय दिया। साठा चौरासी में बह रही क्रांति की लहर से सपनावत भी अछूता नही रहा और गाँव ने बगावत कर दी। सपनावत के राजपूतो ने भी मुकीमपुरगढ़ी और पिलखुवा की तरह भू-राजस्व गाजियाबाद तहसील में जमा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद सपनावत ने पूरी तरह अपने को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।
मशहूर क्रांतिकारी मालागढ के नवाब वलीदाद खाँ जिनपर मेरठ से लेकर अलीगढ तक बागियों की सरकार की जिम्मेदारी थी, को भी सपनावत के ग्रामीणों से अत्यधिक सहयोग मिला था। नवाब वलीदाद खाँ गाजियाबाद तथा लोनी का निरीक्षण करके सपनावत में भी रूके थे। यहाँ के ग्रामीणों से इनके नजदीकी सम्बन्ध थे। इसी कारण सपनावत के निवासियों ने क्रांति के समय नवाब वलीदाद खाँ की बहुत सहायता की।
सपनावत से कुछ दूर बाबूगढ़ में अंग्रेजी सेना की छावनी थी। गढ़मुक्तेश्वर से बाबूगढ़ आए बागी बरेली ब्रिगेड के क्रांतिकारी सैनिकों की सहायता के लिए यहाँ के अनेक नौजवान वहाँ पहुँच गये। बाबूगढ़ में क्रांतिकारियों ने अत्यधिक लूटपाट की और दुकानों में आग लगा दी।
1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात् अनेक ग्रामों को क्रांतिकारियों का साथ देने या क्रांति में संलग्न होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने बागी घोषित कर दिया। उन गाँवों की जमीन-जायदाद छीन ली गई। इन बागी ग्रामों में सपनावत भी था। सपनावत गाँव को भी विप्लवकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण बागी घोषित कर दिया गया और यहाँ के किसानो की जमीने छीन ली गईं।इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्रांति में भाग लेने वाले राजपूतों,मुस्लिमो की जमीने अंग्रेजों के भक्त जाटों के नाम चढ़ा दी गयी.
इन वीर आत्माओ को हमारा नमन जिनकी बहादुरी और बलिदानो की वजह से आज हम स्वतंत्र हैँ_/\_

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार

~~~ प्रतिहार राजपूत ~~~
~~~ पढकर शेयर जरुर करें ~~~
~~ सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार का जीवन परिचय ~~ 

मिहिर भोज परिहार जी का जन्म सम्राट रामभद्र परिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव
की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। सम्राट मिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक
49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के
साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था। 
सम्राट मिहिर भोज बलवान, न्यायप्रिय और
धर्म रक्षक थे। मिहिर भोज शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ
था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50
वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।सम्राट मिहिर भोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिर भोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह
भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।सम्राट मिहिर भोज का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं पहला जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार सम्राट भोज ने
मलेच्छों(मुगलो,अरबों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। दूसरा कारण सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जो कि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है। इस दिन के 2 दिन बाद
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ
हो जाता है। जिन स्थानों पर प्रतिहारों, परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, अन्य शाखाओं को सम्राट भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के
इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिर भोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।
अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिर भोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक
सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि परिहार सम्राट
की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह
भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रू नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने
भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है। मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य,पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में
मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रू
उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर
कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की। कश्मीर
के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिर भोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए
दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते
थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।
किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने
की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट परिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस
समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार परिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है,
जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

परिहार क्षत्रिय राजपूत राजवंश।।
जय मिहिर भोज जी।।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
Source: नागौद स्टेट।।

भारत कल आज और कल

कल से प्रारम्भ होते नवरात्र और कुवारों-कुंवारियों के चेहरों पर ४माह उपरांत लौटती चमक में छिपा भविष्यवाद का गहन चिंतन भी मतदान से बड़ा मुद्दा हो सकता हे किन्तु इस तरफ देखनी की किसी को क्या परवाह आन पड़ी ....?

आज भारत विश्व की सर्वाधिक तरुण अवस्थाबादी जनसख्या का देश हे किन्तु दुर्भाग्य से वह योग्यता अनुरूप पारिश्रमिक सृजन में असफल हे और कही न कही देश की रीढ़ कही जाने बाली तरुणाई ही अर्थव्यवस्था का बो केंद्र जो देश उन्नति-प्रोन्नति का आधार स्तम्भ होकर ही खोखले बादो से प्रति पञ्च वर्षीय सरकार बनाओ योजना के रक्त पिशाचों द्वारा ठगी का शिकार बनाई जाती रही हे ।

क्या देश का उर्जामयी युवा अपने भविष्य के प्रति सचेत नहीं हे ......?
क्या तरुणाई का आधार खोखला होकर रुग्ण हे ....?

क्यो युवा मात्र सोचो अथवा व्यसन के आधीन होकर अपना भविष्य और देश का आधार दोनों दुर्बल करने पर उतारू हो रहा हे ?

सम्भवतः किसी ने इस बिंदु की तरफ आकर्षित होना मुनासिव न समझा ,आखिर युवाओ में आकर्षण खोजने की किसी को क्यों आन पड़ी,जब राष्ट्रवाद चरम पर होता हे तो बेरोजगारी भी सर्वोच्य शिखर पर होती  हे न ....!

एक सर्वेक्षण अनुसार देश का एक बड़ा हिस्सा व्यसन के प्रति आकर्षित हो रहा हे और जिसमे मूल में छिपा हे उनको समुचित व्यवसाय की अनुपलब्धता से बढ़ती मनोविकारों की खिन्नता में मष्तिष्क को क्रतिम सुख देने की लत लगना।न तो देश के ठेके पर चलाने बाले संचालक-परिचालक इस तरफ ध्यान देते हे और ना ही इस धीमे जहर के व्यवसायी! क्योंकि इन बेरोजगारो के खाली होने पर ही उनको लाभ प्राप्त होगा जो राजनेतिक भी होता हे और व्यवसायिक भी ।

जब देस के बड़े वर्ग के पास समुचित आय के श्रोत होंगे तो क्या बो अपना बहुमूल्य समय इन खाजनेतिक दलो और व्यसन्न कारियों के लिए निकाल पाएगा .....!!

आज हर युवा-युवती निरन्तर भाग रहा हे.....सोचता हे आज का परिश्रम कल उसके लिए स्वर्णिम भविष्य की बुनियाद रखेगा किन्तु देश की अतुलनीय शक्ति का दुर्भाग्य यहां भी साथ नहीं छोड़ता कुछ अवसर वादी मतो के लिए युवाओ से मतभेद कर निपट अनपढो को रोजगार मुहैया करा देता हे। और मेधा तड़पती हे.....
 अपनी दुत्कार पर,क्रोधित होती हे....
 अपनी उपेक्षाओं पर और कलुषित मन से बड़ जाती हे नशो की तरफ फिर स्वम की नशो से जहर ही क्यों न सोखना पड़े ..!!
यह कुछ समय की मानसिक शून्यता अंततः उन्हें ले जाती है गहन अंधकार में ओर कोई जहर पान करता तो कोई फांसी झूलता है !

विगत-तत्समय और आगामी धूर्त ठेकेदारिया अगर इस देश में मन्दिर मस्जिद,जातियों  की धूर्त राजनीति  करने से बेहतर होता की समुचित श्रमण का प्रबन्ध करती तो कदाचित देश की मेधा यू न पलायन करती !

एक तरफ तो युवा को जाति-पाती मिटाने की  शिक्षा दी जाती रही वही दूसरी तरफ सभी वरीयताओं,मेधाओ,उपलब्धियों,शेक्षणिक मान्यताओ,पात्रताओ को परेह् रखकर सिर्फ  जातिप्रमाणपत्र मांगे जाते हे ।

आज भारत स्वम की मेधाओ की उपेक्षा करके विदेशो पर निर्भर हे क्योंकि हमारे ठेकेदारो ने सत्ता-भत्ता से आगे कुछ सोचा ही नहीं ।
इस देश में एक से बढ़कर गुणीजन विरक्त सा जीवन जी रहे और मुर्ख सत्ताधीसि के सर्वोच्य पर विराजमान हे।मेधाये राजनेतिक स्वार्थो के चलते व्यसनकारी हो रही हे और सर्वोच्य न्यायालय से नगग्ना युक्त संस्कृति हिरस्कारि आदेशो पर व्यक्ति स्वत्र्ता का मुल्लमा चढ़ाकर निषेधात्मक नियमन सुनाये  जाते हे ।

यथार्थ में भारत,भारत न हा फिरंगियो के द्वारा थोपा गया नग्न,उभनिष्ठ,बलपौरुष हींन सदैव सभ्यता का ढोंग ओढे हुए #इण्डिया ही रहा ।

हे आर्यावर्त! तुझे बैभवशाली भारत बनने में और कितने युग लगेंगे .....!
देश की रीढ़ दिग्भ्रमित है और उसे स्वम झुकाव तक नही पता।राजनीतिक गलियारे की वेहया वैश्या ने सारा देश वर्णसंकर करके पौरुष विहीन कर दिया क्या ?

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~जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
  चम्बल मुरैना मप्र.

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...