वह वांयी पंक्ति चौथी सीट थी जिसपर लड़का बैठे-बैठे प्रतीक्षा में अपनी डायरी के पेजो को तल्लीन्नता से लगातार कुछ लिख रहा था। क्योंकि बस चलने में समय था और वाकी सवारियों से उसे कोई मतलब नही था ।
एकाएक एक 5 फिट लम्बा भीनी-भीनी महक का झोंका उसके समक्ष नमूदार हुआ और उसको पता भी न लगा..!
"आपके साथ बाली सीट पर कोई है सर...अगर नही है तो मुझे विंडो सीट चाहिए!"
उसके पूछने का लहजा कुछ ऐसा था कि लड़के ने मूक रहकर ,एक ओर हटते हुए मूक सहमति में बगल खिसकते हुए उसे बैठने को....बगेर सिर ऊंचा किये जगह देकर डायरी में ही गुम रहा !!
करीब 20 मिनट उपरांत लड़के ने एक उबासी लेते हुए पुस्त से सिर टिकाते हुए आंखे बंद कर ली ...।
एकाएक गाड़ी स्टार्ट हुई और गियर गुर्राहट ने झपकी में व्यधान कर दिया ।
बाजू बैठी लड़की पर उचटती नजर डालते हुए देखा तो वह ओषत कद से कुछ छोटी एक ओषत रंग बाली जिसने ब्लू जींस के साथ फ्रॉक नुमा जॉर्जेट के साथ दोनो कंधों पर वी शेप दुपट्टा डाल रखा था जिसे भी ही महीन चतुराई के साथ पिनो से स्टेपल कर रखा था और इस यूनिक शैली का पहनावा आकर्षक लगा ।
"सर मुझे कुछ खाने को लाना है ...!"
कहते हुए लड़की ने वैनिटी से 200 की नॉट हाथों में चमकाई ओर वाहर निकलने को उद्धृत दिखी....लड़का खड़ा होकर एक ओर हट गया और उसने पहली बार 'स्लो लुइस' इत्र की चिरपरिचित महक महसूस की, वह अपने सेलफोन में शोशल मीडिया कुरेदने लगा और पुनः निमग्न होकर कभी-कभी मुश्कुरा भी रहा था कि खिड़की तरफ सिर से ऊपर कंगन युक्त हाथों में लैयज के साथ बिकानू मिक्सचर औऱ एप्पल फीज बोतल दिखी .....
"सर पकड़िए....मुझे कुछ और लेना है!"
न चाहते हुए भी हाथ मे वह तमाम खाने का सामान था और प्रतीक्षा थी कब हाथ खाली हो जाये!
कुछ ही मिनट में एक 500 ग्राम मिठाई लिए लड़की मुस्कुराती आई और यथास्थान बैठ गयी ।
"सर आप भी लीजिये न मुझे अच्छा लगेगा कि अकेले नही खाना पड़ेगा,देखिए #आपके लिए मिठाई भी लाई हुँ !"
लड़के भँवे विचारमुद्रा में सिकुड़ती गयी कि इसे कैसे पता है कि मुझे मीठा पसंद है !
उसने मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहकर पल्ला तो झाड़ लिया पर " आपको मीठा पसंद है" बार-बार मनमशतिष्क में नाद करता रहा ।
लड़का पुनः झपकी लेने के प्रयास में पुस्त से सिर टिकाकर कर बन्द आंखों से गन्तव्य की कल्पना में बिचरन करता रहा और .....
"में ठेंगी हु लेकिन इतनी भी नही की मुझे किसी हेल्प चाहिए...मेरे घर मे सब pg है सिर्फ में ही नही "
"इसका मतलब यह नही की तुम मुझ पे सिमपेथी दिखाओ, अपनी औकात में रहो .."
"यह मत समझो कि मैने तुम्हे खुद को नापती हुई नजरो नही देखा है...रज्जू की एनिवर्सरी पर तुम मुझे वॉच कर रहे थे और ठेंगी कहकर मुझे हिरासमेन्ट कर रहे हो !"
लड़के ने उसके द्वारा 'ठेंगी' शब्द बोलने के साथ ही उसकी आंखों में सागर की लहरों के समान उमड़ती लहरों को स्पष्ट देखा और उसी स्थिति में आंखों की झिरी से उसके चेहरों पर क्रोध,कातरता के ज्वार-भाटे देखता रहा ।
करीब 15 फोन उसकी फ़ोनवार्ता में उसने लड़के के प्रति के आधुनिक शैली की गालिया भी सुनी और फोन कटने के बाद उसे फ़्फ़कते भी देखा ।
वाहन अपनी तफतार से पथ को निरतर पास करता जा रहा था ओर लड़की अपनी वेदना अथवा हीनता को अश्रुपात करके कम किये जा रही थी ।
"सॉरी !फ़ॉर डिस्टरविंग यू सर..।"
"आपने कुछ खाया नही ..टेंसन न लीजिये आपको लूटने का मेरा कोई प्लान नही है !"
लड़का हंस पडा ओर लड़की के अभिनय बाली झूठी मुस्कान का जबाब एक पीस पेड़े का उठाकर दिया ।
बाते चलती रही लड़की पूछती रही और लड़का सनझिप्त उत्तर देता रहा ...इसी बीच गन्तव्य आया और ...! लड़की बेहद खूबसूरत डायरी के साथ पेन बढाते हुए बोला !
"ऑटोग्राफ प्लीज...!"
लड़का कुछ कहता उससेपहले ही लड़की बोल उठी !
"आप जिस संजीदगी से रिस्ते उकेरते है न उतनी ही गम्भीरता से स्वम को मेंटेन भी करते है, मेने आपके कुल 5-6 आर्टिकल पढ़े है और आपकी इसी संजीदगी के साथ कलम ओर कर्म की समानता की फैन हो गयी ।"
"जितेंद्र सर! में रहती तो रीवा में हूं but आपको बस में देख आश्चर्य चकित थी और आपकी संजीदगी से आपके साथ बैठने खाने के कुछ पल मिले !"
"कभी रीवा आइये, में उधर ही रहती हूं !"
मेरी रास्ते भर की विचार गुत्थी उसने एक पल में सुलझा कर "आभार" बोलते हुए डायरी-पेन लिया और ....एक विनय,आदेश,आग्रह मुझे समझ नही आया क्या था कि वह स्वम को 'अ'सफल न लिखने की बोलकर अंकभर सिमट गई ।
मेरे पहले किसी लिए हस्ताक्षर करते हाथ कम्पित थे और उसका नाम कुछ अस्पष्ट था ..
'सुनिधि मानव एकाएक भेंट!"
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जितेन्द्र सिंह तौमर '५२से'
कानपुर उप्र .
रविवार, 8 नवंबर 2020
रविवार, 18 अक्टूबर 2020
ऐतिहासिक गद्दार मीर जाफर
#गद्दारो_की_हवेली
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पढ़ते अथवा सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते ही कि कहि कोई हमारे साथ ऐसा विश्वाशघाती तो नही जिसके रक्त से प्लाज्मा अलग हो गया हो! कंही कोई ऐसा तो नही जो स्वार्थ शिद्धि पूर्ण करने के लिए दुश्मन खेमे जा मिला हो !!कहीं कोई ऐसा तो नही जो मुस्कुराते हुए गले तो लगे किन्तु गला रेतने से पहले कुछ भी न सोचें !!!
जी हां!.....
बाग़ियों ,दस्युओं, चम्बल श्रंखला संस्करण में आपको चम्बल से काफी परिचित कराया, अब परिचय देता हूँ एक ऐसे द्रोही का जिसकी हवेली को 'रक्त हवेली' का बदनुमा नाम दाग मिला और जिसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला गया .....!जिसके दगा के कारण भारत को लगभग 200 वर्षो तक ब्रितानी हुकूमत की दासता झेलने पड़ी और 'सोने की चिड़िया' बोला जाने बाला महान दो सदियों तक लूटा जाता रहा ।
1733 में पैदा हुए नवाब सिराजुद्दोला की अपनी हत्या के समय महज़ 24 साल की उम्र थी।अपनी मौत से साल भर पहले ही अपने नाना की मौत के बाद, उन्होंने बंगाल की गद्दी संभाली थी! ये वही वक्त था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी उपमहाद्वीप में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही थी ।
सिराजुद्दौला को कम उम्र में नवाब बनाए जाने से उनके कई रिश्तेदार खफा थे....ख़ास तौर से उनकी खाला घसीटी बेग़म ! सिराजुद्दौला ने नवाब बनने के थोड़े ही समय बाद उन्हें क़ैद करवा दिया था!
सैना बढ़ते असमांजस्य के चलते नवाब ने प्रायोगिक तौर पर बरसों से बंगाल के सेनापति रहे मीर जाफर की जगह मीर मदान को प्रमुखता दी......परिणाम वही 'सिल्हारे को सिल्हारे की जलन'..... इससे मीर जाफर नवाब से बुरी तरह खफ़ा हो गया ।
उन्ही दिनों फिरंगी अपने पाँव पसारने के लिए जगह तलाश रहे थे और उन्हें तलाश थी एक ऐसे भेदीये की जो उनकी राह के रोडा बनते नबाब की सुदृण व्यवस्था में सेंध लगा सके और उनकी तलाश शीघ्र ही अंसतुष्ट ओर सत्ता लालची मीर जाफर के रूप में पूर्ण हुई ।
एक गुप्त स्थान और मध्यस्थ के माध्यम से फिरंगी सेनापति क्लाइव -जाफर की गुप्त मंत्रणा हुई .....सड़यंत्रो की खाई खोदी गयी, अनुबंध हुआ और ब्रिटिश सेना ने आक्रमण कर दिया ।
नबाब की स्थिति चहुओर घिरे शिकार जेसी थी क्योंकि उत्तर से अब्दाली ओर पश्छिम से मराठो का अतिक्रमण पहले ही था....पूरी शक्ति से आकमण करना भी एक ओर से दुश्मन को जीतने का खुला आमंत्रण था। प्रतिकार स्वरूप बंगाल के तीनों मोर्चे सम्भालती विशाल फ़ौज की शक्ति प्रति मोर्चा एक तिहाई से कम हो गयी ।
फ़ौज के एक हिस्से के साथ वो प्लासी पहुंचे.... मुर्शिदाबाद से कोई 27 मील दूर डेरा डाला गया... 23 जून को एक युद्ध में सिराजुद्दौला के विश्वासपात्र मीर मदान की मौत हो गई.... नवाब ने सलाह के लिए मीर जाफर को सन्देश भेजा.....और मीर जाफर ने सलाह दी कि युद्ध रोक दिया जाए. ....नवाब ने मीर जाफर की सलाह मानने की भारी कर दी जिसकी परिणीति बंगाल और नबाब दोनो भूगतनी थी ।
युद्ध विराम कर दिया गया....! नवाब कि फ़ौज वापस कैंप लौटने लगी..... मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को स्थिति समझा दी...!
क्लाइव ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया, एकाएक हुए अप्रत्याशित हमले से सिराज की सेना बौखला गई... तितर-बितर होकर बिखर गई....जब तक कुछ समझ पाते क्लाइव ने लड़ाई जीत ली।नवाब सिराजुद्दौला को भाग जाना पड़ा....!
मीर जाफर तुरन्त अंग्रेज़ कमांडर से जाकर मिला ओर सहमति के अनुसार उसे बंगाल का नवाब बना दिया गया....दरअसल वह नाम का नवाब था सत्ता तो अंग्रेज़ों के हाथ लग चुकी थी।
प्लासी की लड़ाई से भागकर नवाब सिराजुद्दौला अधिक दिन आज़ाद नहीं रह सके,उन्हें पटना में मीर जाफर के सिपाहियों ने पकड़ लिया. ....मुर्शिदाबाद लाया गया. !
मीर जाफर के बेटे मीर कासिम ने उन्हें जान से मारने का हुक्म दिया!! 2 जुलाई 1757 को उन्हें मीरजाफर की हवेली में फांसी पर लटकाया गया. ...अगली सुबह, उनकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड़ कराई गई....!!!!
कुछ समय ही मीरजाफर भी कठपुतली नबाब रहा ओर फिरंगियों उसी नीति के तहत जाफर के सेनापति पुत्र मीर कासिम द्वारा कलम कर दिया गया ,मीर कासिम नबाब तो बना किन्तु फिरंगी सत्ता के अधीन ओर भारत का एक क्षेत्र फिरंगियों के हाथ चला गया ।
मुर्शीदाबाद स्थिति मीरजाफर की हवेली को आज भी हराम अथवा हरामी के हवेली के रूप में बोला जाता है !
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यह आलेख लिखते चम्बल की एक लोकोक्ति स्मरण हो आयी..!
दगा किसी का सगा नही है ,नई मानो तो कर देखो!
जिन लोगो ने दगा किया है,जाकर उनके घर देखो!!
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पढ़ते अथवा सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते ही कि कहि कोई हमारे साथ ऐसा विश्वाशघाती तो नही जिसके रक्त से प्लाज्मा अलग हो गया हो! कंही कोई ऐसा तो नही जो स्वार्थ शिद्धि पूर्ण करने के लिए दुश्मन खेमे जा मिला हो !!कहीं कोई ऐसा तो नही जो मुस्कुराते हुए गले तो लगे किन्तु गला रेतने से पहले कुछ भी न सोचें !!!
जी हां!.....
बाग़ियों ,दस्युओं, चम्बल श्रंखला संस्करण में आपको चम्बल से काफी परिचित कराया, अब परिचय देता हूँ एक ऐसे द्रोही का जिसकी हवेली को 'रक्त हवेली' का बदनुमा नाम दाग मिला और जिसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बोला गया .....!जिसके दगा के कारण भारत को लगभग 200 वर्षो तक ब्रितानी हुकूमत की दासता झेलने पड़ी और 'सोने की चिड़िया' बोला जाने बाला महान दो सदियों तक लूटा जाता रहा ।
1733 में पैदा हुए नवाब सिराजुद्दोला की अपनी हत्या के समय महज़ 24 साल की उम्र थी।अपनी मौत से साल भर पहले ही अपने नाना की मौत के बाद, उन्होंने बंगाल की गद्दी संभाली थी! ये वही वक्त था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी उपमहाद्वीप में अपने कदम जमाने की कोशिश कर रही थी ।
सिराजुद्दौला को कम उम्र में नवाब बनाए जाने से उनके कई रिश्तेदार खफा थे....ख़ास तौर से उनकी खाला घसीटी बेग़म ! सिराजुद्दौला ने नवाब बनने के थोड़े ही समय बाद उन्हें क़ैद करवा दिया था!
सैना बढ़ते असमांजस्य के चलते नवाब ने प्रायोगिक तौर पर बरसों से बंगाल के सेनापति रहे मीर जाफर की जगह मीर मदान को प्रमुखता दी......परिणाम वही 'सिल्हारे को सिल्हारे की जलन'..... इससे मीर जाफर नवाब से बुरी तरह खफ़ा हो गया ।
उन्ही दिनों फिरंगी अपने पाँव पसारने के लिए जगह तलाश रहे थे और उन्हें तलाश थी एक ऐसे भेदीये की जो उनकी राह के रोडा बनते नबाब की सुदृण व्यवस्था में सेंध लगा सके और उनकी तलाश शीघ्र ही अंसतुष्ट ओर सत्ता लालची मीर जाफर के रूप में पूर्ण हुई ।
एक गुप्त स्थान और मध्यस्थ के माध्यम से फिरंगी सेनापति क्लाइव -जाफर की गुप्त मंत्रणा हुई .....सड़यंत्रो की खाई खोदी गयी, अनुबंध हुआ और ब्रिटिश सेना ने आक्रमण कर दिया ।
नबाब की स्थिति चहुओर घिरे शिकार जेसी थी क्योंकि उत्तर से अब्दाली ओर पश्छिम से मराठो का अतिक्रमण पहले ही था....पूरी शक्ति से आकमण करना भी एक ओर से दुश्मन को जीतने का खुला आमंत्रण था। प्रतिकार स्वरूप बंगाल के तीनों मोर्चे सम्भालती विशाल फ़ौज की शक्ति प्रति मोर्चा एक तिहाई से कम हो गयी ।
फ़ौज के एक हिस्से के साथ वो प्लासी पहुंचे.... मुर्शिदाबाद से कोई 27 मील दूर डेरा डाला गया... 23 जून को एक युद्ध में सिराजुद्दौला के विश्वासपात्र मीर मदान की मौत हो गई.... नवाब ने सलाह के लिए मीर जाफर को सन्देश भेजा.....और मीर जाफर ने सलाह दी कि युद्ध रोक दिया जाए. ....नवाब ने मीर जाफर की सलाह मानने की भारी कर दी जिसकी परिणीति बंगाल और नबाब दोनो भूगतनी थी ।
युद्ध विराम कर दिया गया....! नवाब कि फ़ौज वापस कैंप लौटने लगी..... मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को स्थिति समझा दी...!
क्लाइव ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया, एकाएक हुए अप्रत्याशित हमले से सिराज की सेना बौखला गई... तितर-बितर होकर बिखर गई....जब तक कुछ समझ पाते क्लाइव ने लड़ाई जीत ली।नवाब सिराजुद्दौला को भाग जाना पड़ा....!
मीर जाफर तुरन्त अंग्रेज़ कमांडर से जाकर मिला ओर सहमति के अनुसार उसे बंगाल का नवाब बना दिया गया....दरअसल वह नाम का नवाब था सत्ता तो अंग्रेज़ों के हाथ लग चुकी थी।
प्लासी की लड़ाई से भागकर नवाब सिराजुद्दौला अधिक दिन आज़ाद नहीं रह सके,उन्हें पटना में मीर जाफर के सिपाहियों ने पकड़ लिया. ....मुर्शिदाबाद लाया गया. !
मीर जाफर के बेटे मीर कासिम ने उन्हें जान से मारने का हुक्म दिया!! 2 जुलाई 1757 को उन्हें मीरजाफर की हवेली में फांसी पर लटकाया गया. ...अगली सुबह, उनकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड़ कराई गई....!!!!
कुछ समय ही मीरजाफर भी कठपुतली नबाब रहा ओर फिरंगियों उसी नीति के तहत जाफर के सेनापति पुत्र मीर कासिम द्वारा कलम कर दिया गया ,मीर कासिम नबाब तो बना किन्तु फिरंगी सत्ता के अधीन ओर भारत का एक क्षेत्र फिरंगियों के हाथ चला गया ।
मुर्शीदाबाद स्थिति मीरजाफर की हवेली को आज भी हराम अथवा हरामी के हवेली के रूप में बोला जाता है !
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यह आलेख लिखते चम्बल की एक लोकोक्ति स्मरण हो आयी..!
दगा किसी का सगा नही है ,नई मानो तो कर देखो!
जिन लोगो ने दगा किया है,जाकर उनके घर देखो!!
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2020
ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत
ठाकुर #गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत
Rajputana Soch पेज
===ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत===
साठा चौरासी का मुकीमपुर गढ़ी गाँव पिलखुवा के निकट अवस्थित है जो कि #तोमर राजपूतो का गाँव है। यहाँ के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे और उनका स्थानीय जनता में बहुत प्रभाव और मान सम्मान था। 1858 के विप्लव की शुरुआत के बाद क्षेत्र के राजपूत ग्रामीणों ने भी जमींदार गुलाब सिंह तोमर के नेतृत्व में बगावत कर दी। ठाकुर गुलाब सिंह ने ब्रितानियों को लगान न देने एवं क्रांतिकारियों का साथ देने का निश्चय किया। उन्होंने क्षेत्र वासियों को भी लगान न देने के लिए प्रेरित किया। मुकीमपुरगढ़ी में जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह के नेतृत्व में राजपूतो की एक बैठक बुलायी गयी। इसमें सभी ने ठाकुर गुलाब सिंह से सहमत होते हुए ब्रिटिश सरकार को भू-राजस्व न देने की घोषणा की। इस प्रकार मुकीमपुर गढ़ी राजपूत क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ बन गया। जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह ने निकटवर्ती क्षेत्र के गाँवों को भी क्रांति के लिए प्रोत्साहित किया। परिणामतः वहाँ भी क्रांतिकारी भावनाएं पनपने लगी और कुछ समय में वहाँ कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से भंग हो गयी। ब्रितानियों से संघर्ष होने के पूर्वानुमान के कारण जमींदार गुलाब सिंह ने अपनी गढ़ी (लखौरी ईटों की किलेनुमा हवेली ) में हथियार भी इकट्ठे करने शुरू कर दिये।
मुकीमपुर गढ़ी के विप्लव की सूचना जब अंग्रेज अधिकारियों तक पहुँची तो उन्होंने उसके दमन का निश्चय किया। ब्रितानियों ने गुलाब सिंह को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया और मुकीमपुर गढ़ी तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विप्लव भड़काने का आरोप भी उन पर लगाया गया। एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी यहाँ विप्लव के दमन के लिए भेजी गयी। उसने मुकीमपुर गढ़ी को चारो ओर से घेर लिया। गुलाब सिंह की हवेली पर तोप से गोले बरसाये गये। मुकाबला असमान था लेकिन ठाकुर गुलाब सिंह जी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने ब्रितानियों का सामना किया परन्तु वे तोपों के सामने ज्यादा देर टिक न सके। ठाकुर गुलाब सिंह की गढ़ी को तोपों से खंडहर में परिवर्तित कर दिया। ठाकुर गुलाब सिंह और उनके कई सहयोगी वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगती को प्राप्त हो गए। ब्रिटिश सेना को हवेली के अन्दर कुएँ से हथियार प्राप्त हुए जो उनका सामना करने के लिए जमींदार गुलाब सिंह एवं ग्रामीणों ने इकट्ठा किये थे। बाद में मुकीमपुर गढ़ी गाँव में आग लगा दी गयी। ब्रिटिश अधिकारी डनलप ने गुलाब सिंह की सम्पूर्ण जायदाद जब्त कर ली। आज भी ठाकुर गुलाब सिंह जी की हवेली के खंडहर 1857 की क्रांति के गवाह बने हुए हैं।
~~बागी गाँव सपनावत ~~
सपनावत साठा क्षेत्र के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण गाँव में से है जो गुलावठी के पास अवस्थित है। यह गहलोत(शिशोदिया) राजपूतो का गाँव है और बहादुरी और बगावती तेवरो के लिये हमेशा प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के राजपूतो ने हमेशा की तरह 1857 के विप्लव में भी अपनी बहादुरी और देशभक्ति का परिचय दिया। साठा चौरासी में बह रही क्रांति की लहर से सपनावत भी अछूता नही रहा और गाँव ने बगावत कर दी। सपनावत के राजपूतो ने भी मुकीमपुरगढ़ी और पिलखुवा की तरह भू-राजस्व गाजियाबाद तहसील में जमा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद सपनावत ने पूरी तरह अपने को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।
मशहूर क्रांतिकारी मालागढ के नवाब वलीदाद खाँ जिनपर मेरठ से लेकर अलीगढ तक बागियों की सरकार की जिम्मेदारी थी, को भी सपनावत के ग्रामीणों से अत्यधिक सहयोग मिला था। नवाब वलीदाद खाँ गाजियाबाद तथा लोनी का निरीक्षण करके सपनावत में भी रूके थे। यहाँ के ग्रामीणों से इनके नजदीकी सम्बन्ध थे। इसी कारण सपनावत के निवासियों ने क्रांति के समय नवाब वलीदाद खाँ की बहुत सहायता की।
सपनावत से कुछ दूर बाबूगढ़ में अंग्रेजी सेना की छावनी थी। गढ़मुक्तेश्वर से बाबूगढ़ आए बागी बरेली ब्रिगेड के क्रांतिकारी सैनिकों की सहायता के लिए यहाँ के अनेक नौजवान वहाँ पहुँच गये। बाबूगढ़ में क्रांतिकारियों ने अत्यधिक लूटपाट की और दुकानों में आग लगा दी।
1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात् अनेक ग्रामों को क्रांतिकारियों का साथ देने या क्रांति में संलग्न होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने बागी घोषित कर दिया। उन गाँवों की जमीन-जायदाद छीन ली गई। इन बागी ग्रामों में सपनावत भी था। सपनावत गाँव को भी विप्लवकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण बागी घोषित कर दिया गया और यहाँ के किसानो की जमीने छीन ली गईं।इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्रांति में भाग लेने वाले राजपूतों,मुस्लिमो की जमीने अंग्रेजों के भक्त जाटों के नाम चढ़ा दी गयी.
इन वीर आत्माओ को हमारा नमन जिनकी बहादुरी और बलिदानो की वजह से आज हम स्वतंत्र हैँ_/\_
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020
क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार
~~~ प्रतिहार राजपूत ~~~
~~~ पढकर शेयर जरुर करें ~~~
~~ सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार का जीवन परिचय ~~
मिहिर भोज परिहार जी का जन्म सम्राट रामभद्र परिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव
की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। सम्राट मिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक
49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के
साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था।
सम्राट मिहिर भोज बलवान, न्यायप्रिय और
धर्म रक्षक थे। मिहिर भोज शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ
था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50
वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।सम्राट मिहिर भोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिर भोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह
भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।सम्राट मिहिर भोज का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं पहला जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार सम्राट भोज ने
मलेच्छों(मुगलो,अरबों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। दूसरा कारण सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जो कि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है। इस दिन के 2 दिन बाद
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ
हो जाता है। जिन स्थानों पर प्रतिहारों, परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, अन्य शाखाओं को सम्राट भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के
इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिर भोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।
अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिर भोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक
सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि परिहार सम्राट
की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह
भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रू नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने
भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है। मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य,पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में
मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रू
उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर
कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की। कश्मीर
के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिर भोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए
दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते
थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।
किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने
की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट परिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस
समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार परिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है,
जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
परिहार क्षत्रिय राजपूत राजवंश।।
जय मिहिर भोज जी।।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
Source: नागौद स्टेट।।
भारत कल आज और कल
कल से प्रारम्भ होते नवरात्र और कुवारों-कुंवारियों के चेहरों पर ४माह उपरांत लौटती चमक में छिपा भविष्यवाद का गहन चिंतन भी मतदान से बड़ा मुद्दा हो सकता हे किन्तु इस तरफ देखनी की किसी को क्या परवाह आन पड़ी ....?
आज भारत विश्व की सर्वाधिक तरुण अवस्थाबादी जनसख्या का देश हे किन्तु दुर्भाग्य से वह योग्यता अनुरूप पारिश्रमिक सृजन में असफल हे और कही न कही देश की रीढ़ कही जाने बाली तरुणाई ही अर्थव्यवस्था का बो केंद्र जो देश उन्नति-प्रोन्नति का आधार स्तम्भ होकर ही खोखले बादो से प्रति पञ्च वर्षीय सरकार बनाओ योजना के रक्त पिशाचों द्वारा ठगी का शिकार बनाई जाती रही हे ।
क्या देश का उर्जामयी युवा अपने भविष्य के प्रति सचेत नहीं हे ......?
क्या तरुणाई का आधार खोखला होकर रुग्ण हे ....?
क्यो युवा मात्र सोचो अथवा व्यसन के आधीन होकर अपना भविष्य और देश का आधार दोनों दुर्बल करने पर उतारू हो रहा हे ?
सम्भवतः किसी ने इस बिंदु की तरफ आकर्षित होना मुनासिव न समझा ,आखिर युवाओ में आकर्षण खोजने की किसी को क्यों आन पड़ी,जब राष्ट्रवाद चरम पर होता हे तो बेरोजगारी भी सर्वोच्य शिखर पर होती हे न ....!
एक सर्वेक्षण अनुसार देश का एक बड़ा हिस्सा व्यसन के प्रति आकर्षित हो रहा हे और जिसमे मूल में छिपा हे उनको समुचित व्यवसाय की अनुपलब्धता से बढ़ती मनोविकारों की खिन्नता में मष्तिष्क को क्रतिम सुख देने की लत लगना।न तो देश के ठेके पर चलाने बाले संचालक-परिचालक इस तरफ ध्यान देते हे और ना ही इस धीमे जहर के व्यवसायी! क्योंकि इन बेरोजगारो के खाली होने पर ही उनको लाभ प्राप्त होगा जो राजनेतिक भी होता हे और व्यवसायिक भी ।
जब देस के बड़े वर्ग के पास समुचित आय के श्रोत होंगे तो क्या बो अपना बहुमूल्य समय इन खाजनेतिक दलो और व्यसन्न कारियों के लिए निकाल पाएगा .....!!
आज हर युवा-युवती निरन्तर भाग रहा हे.....सोचता हे आज का परिश्रम कल उसके लिए स्वर्णिम भविष्य की बुनियाद रखेगा किन्तु देश की अतुलनीय शक्ति का दुर्भाग्य यहां भी साथ नहीं छोड़ता कुछ अवसर वादी मतो के लिए युवाओ से मतभेद कर निपट अनपढो को रोजगार मुहैया करा देता हे। और मेधा तड़पती हे.....
अपनी दुत्कार पर,क्रोधित होती हे....
अपनी उपेक्षाओं पर और कलुषित मन से बड़ जाती हे नशो की तरफ फिर स्वम की नशो से जहर ही क्यों न सोखना पड़े ..!!
यह कुछ समय की मानसिक शून्यता अंततः उन्हें ले जाती है गहन अंधकार में ओर कोई जहर पान करता तो कोई फांसी झूलता है !
विगत-तत्समय और आगामी धूर्त ठेकेदारिया अगर इस देश में मन्दिर मस्जिद,जातियों की धूर्त राजनीति करने से बेहतर होता की समुचित श्रमण का प्रबन्ध करती तो कदाचित देश की मेधा यू न पलायन करती !
एक तरफ तो युवा को जाति-पाती मिटाने की शिक्षा दी जाती रही वही दूसरी तरफ सभी वरीयताओं,मेधाओ,उपलब्धियों,शेक्षणिक मान्यताओ,पात्रताओ को परेह् रखकर सिर्फ जातिप्रमाणपत्र मांगे जाते हे ।
आज भारत स्वम की मेधाओ की उपेक्षा करके विदेशो पर निर्भर हे क्योंकि हमारे ठेकेदारो ने सत्ता-भत्ता से आगे कुछ सोचा ही नहीं ।
इस देश में एक से बढ़कर गुणीजन विरक्त सा जीवन जी रहे और मुर्ख सत्ताधीसि के सर्वोच्य पर विराजमान हे।मेधाये राजनेतिक स्वार्थो के चलते व्यसनकारी हो रही हे और सर्वोच्य न्यायालय से नगग्ना युक्त संस्कृति हिरस्कारि आदेशो पर व्यक्ति स्वत्र्ता का मुल्लमा चढ़ाकर निषेधात्मक नियमन सुनाये जाते हे ।
यथार्थ में भारत,भारत न हा फिरंगियो के द्वारा थोपा गया नग्न,उभनिष्ठ,बलपौरुष हींन सदैव सभ्यता का ढोंग ओढे हुए #इण्डिया ही रहा ।
हे आर्यावर्त! तुझे बैभवशाली भारत बनने में और कितने युग लगेंगे .....!
देश की रीढ़ दिग्भ्रमित है और उसे स्वम झुकाव तक नही पता।राजनीतिक गलियारे की वेहया वैश्या ने सारा देश वर्णसंकर करके पौरुष विहीन कर दिया क्या ?
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~जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.
सोमवार, 28 सितंबर 2020
भगत सिंह जी
अमर वीरगति की प्रेरणापुंज और युवाओ के प्रेरणा स्त्रोत भगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु,चन्द्रशेखर 'आजाद', रामप्रसाद 'बिस्मिल',असफाख,मंगलपांडे,राणा बेनीमाधव सिंह,बाबू कुँअर सिंह,महाबीर सिंह,दीक्षित जी जैसे महायोद्धाओं का कहि भी दस्ताबेजो में उल्लेख नही है। यह तो भारतीय जनता की भावना है कि उन्हें 'शहीद ए आजम,आजाद,पंडित बिस्मिल जैसी उपाधियों से अलंकृत किया जाता है ।
क्या कारण है कि आज भी भारत की राष्ट्रीय भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी के साथ-साथ इन महाबीरो को प्रपत्रो में 'शहीद' का उद्बोधन नही मिला....?
अकबर ,शाहजंहा,हुमायु,टीपू की क्रूरता को महान बताने बाले इस देश में हजारों,करोड़ो अन्तर्वाही कीड़े है और उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय पारितोषिको से सम्मानित भी किया जाता रहा है ।
भारत मे जातिवाद खत्म करने की बात तो की जाती है पर चुनाव आते ही जाती और धर्म आधारित मतो का वर्गीकरण आखिर क्यों होता है ...क्यों कि देश से जुड़े आंतरिक तन्त्र में प्रतिभा नही प्रजाति देखना है ही लोकतंत्र है।
छोटूराम के नाम के साथ जुड़ी 'सर' उपाधि उस ब्रितानी चरण चुम्बन का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो सिंधिया को 'वाइसराय' बनाती है। भले ही वीरगति प्राप्त क्रांतिकारियों को लोकतंत्र भूल जाये पर ब्रितानी सरकार के रीछ हमेशा से सर्वोपरि रखे गए ।
भारतरत्न,भारत विभूषण जैसे पारितोषिक सम्मान आज लाई की तरह नङ्गे बॉलीबुड को बाटे जाते है और जो कुछ बच जाए वह लेतो की खंडपीठ में बन्दरबाट कर लिए जाते है। पटेल के बुत हर जगह है किंतु 552 रियासतों के दानदाताओ का कहि नाम नही ...क्या यही भारत को ठेके पर हेंडल करने बालो की कृत्यगता ?
राष्ट्रीय खेल हॉकी ओर उसके जादूगर ध्यानचंद्र जी आज भी उपेक्षित है। क्योंकि उन्होंने हिटलर के समक्ष सीना तान कर बोला था.......'भारत का हूं और क्षत्रिय हूं सिक्को से स्वाभिमान नही तौला जा सकता है !"
पंडित गैंदालाल दीक्षित जी उम्रभर क्रांति की मशाल प्रज्वल्वित करके धन और आयुध उपलब्ध कराते रहे किन्तु आज देश मे 60 %को पता ही न होगा। तरकुली माता के अनन्य भक्त अंगरोजो की बलि चढाते रहे किन्तु उप्र से सटे मप्र,बिहार को भी पता नही होगा !
आईपीएल में बिकते क्रिकेटर ओर ऑनलाइन जुआ व मदिरा प्रचार करते क्रिकेटर ही अगर भारतरत्न है तो नङ्गे मानसिक वेश्यालय की दुनिया मे भारतरत्न खोजने की नीति कैसे प्रारम्भ हुई ....इन दलालो ने कोनसा तीर मारा है !
राष्ट्रीय बापू,राष्ट्रीय चाचा,राष्ट्रीय गुरु, जैसे सम्मान किस किधर परस्पर बटे वह हर कोई जानता है पर निर्पेक्षय की अति तो तब हुई थी, जब डा राजेन्द्र प्रसाद जी को सोमनाथ मंदिर जाने से नेहरू ने रोका था !!
आज देश का बच्चा-बच्चा परिचित है कि जिन्होंने भारतभूमि को लहू से सींचा उनको उपेक्षित कर दिया गया है और हमे आजादी देने में 'असहयोग आंदोलन' का रट्टा लगाया गया। इतिहास की बात की जाए तो महान दूरदृष्टा ओर प्रजा बत्सल शाशक जयचन्द ओर मानसिंह को गद्दार प्रचारित किया किन्तु माधव भट्ट,राघव चेतन,वातायन खत्री,आदि भेदियो पर मौन साधा गया ।
आज भगत सिंह जी को स्मरण करके उनको श्रद्धा सुमन अर्पित तो किये जायेंगे किन्तु उनको वलिदान को सर्वोचित उल्लेखनीय सम्मान दिलाने पर लेटे मौन साध लेंगे। असल मे यह जो लोकतंत्र है न सब बॉलीवुडिया सिल्वर स्क्रीन का ही वास्तविक रूप है जंहा वर्जित दृश्य भी अभिनय प्रतिभा बनाकर परोसे जाते है। ओर देह दर्शन कराके संस्कृति सभ्यता के सभी बंध खोले जाते है ।
पूज्य भगत सिंह जी अच्छा हुआ लगभग दशक उपरांत भी आपका पुनर्जन्म नही हुआ क्योंकि यह देश तो कल फिरंगियों की शाश्कता का गुलाम था ....और आज हरामियों की मानसिकता का है ।
अमर शहीद भगत सिंह जी को एक भारतीय की तरफ से अश्रुपूरित श्रद्धा सुमन व नमन 🙏
'इंकलाब जिन्दावाद' 💪
'वन्देमातरम'
'जय भवानी'
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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.
बुधवार, 23 सितंबर 2020
तीर्थयात्रा (हास्य)
#भदेस_वार्ता
सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ 😂😂
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एक गाँव से कुछ बुजुर्ग एकबार तीर्थाटन को निकले ...विधीवत सबकी आरक्षित टिकिट थी और सबकी सीट्स संग-साथ बना रहने के लिए एक ही बोगी में क्रमानुसार नजदीक थी...
चलते-चलते सफर में चर्चाये आम होती हे और सहमति-असहमति,आलोचक-प्रशंशक दो समूह सदैव बनते आये हे,कुछ ऐसा ही वाक्या इधर भी था ।
रामआसरे-
" भैया तीरथ को तो जाय रहे हे पर बड़ी टेंसन में जान डरी हे,कुआ पे दो बीघा चरी और 6 बीघा कछवारि लगाई हे पर जा कदुआ घ्नसमा समवीरा की गैया कहु रोज न चरे!"
यह कहते हुए बुजुर्ग देवता ने धुंए से पीली हो चुकी मुछो में अंतर्ध्यान हुए होठो के मध्य फटाफट करके 10 नम्बर ख़ेनि सरकाई ही थी की बपरिते बोल पड़े !
"अरे दद्दा जी बात तो एक और बेर कहो,जा सारे घ्नसमा ने सिग हार चराय डारो न तो लुगाई बाँध पाओ और न गैया...भोजाई उ तो दिनरात बाजार में जायके टिकिया-भल्ला में जड्ड देत रहे !"
यह कहते-कहते बपरीते ने बड़ी चुलबुली अदा में वांयी आँख झपकाई ई थी की गुस्से से तमतमाते 'घ्नसमा लाल' तेरही के मालपुआ के जेसे लाल हो उठे ।
"सुनि सारे बप्रीते तू तो सारे दोगला ई रहेगो जाकी बीड़ी पी लई बाकी की लुगाई बन जातु हे,और रही बात गैया की तो ऎसे ई चरेगी !"
"काहू के झाड़ .में दम होय तो गैया रोक के दिखाय .....मारे मुंडा के चाँद भोपाल न बनाई तो हमते उ को घनसमे कहेगो !!"
रमासरे को यह सुनते ही ततैया लग गयी और बपरीते को बगल में हटाके घनसमे के सामने आ बेठे और बोले ।
"काये रे घ्नसमा तेरी गैया काय हमाये खेत में धसेगी?"
"भें कछु तेरे बाप को लगि गओ हे का, जो जा तरे ते बतरामन कर रहो हे !!"
"ज्यादा वाइसराय न बनि,मारे पनाह के चांद हाल खरोंच जागी!!!"
इतना सुनते ही घ्नसमे के टिकासरे में भूत झोलकिया लग गयी ..
"सुनो ज्यादा चु चपर न करो अगर कछवारि होगी तो अब गैया जरूर चरेगी,तुम सिग हमाये झुनझुना झराय लियो और कराय दियो फांसी। तुमसे हमाये मुंडन में डरे रहे ..!"
रमासरे कुछ कहते उससे पहले ही बपरीता एक झोला उठा लाया और बड़ी जोर से बोल उठा ...
"सुनो सिग अभाल ई तोर-तिया करे देत हे, जी हे गओ दद्दा को खेत और अब तुम अपनी गैया धसाय् के देखो अभाल ई भुभरो न फूटे तो कहियो !"
घ्नसमे भी ताव में आ गए और चारो तरफ नजर मारी लेकिन गाय का प्रतीक जैसा कुछ न मिला तो बपरीते की जेब से गोविन्दबीड़ी का बण्डल निकाल कर गाय बना कर रख दिया और छाती 56 इंच करते हुए बोल उठा ....
"लेयो तिहाये खेत मे गैया नई पुरो सांड घेर के ऐसे ई चरेगो,काट लियो हमाये कदुआ!"
फिर क्या ...बातो में बतबढ ओर तरण-तारणा आरम्भ हो गया ......दोनों तरफ मुंडा फटाफट खोपड़ियों पर बजने लगे। दोनों तत्वज्ञानी बड़ी श्रद्धा से परस्पर माँ-बहिनो को स्मरण कर रहे थे ।
ऊधम, हाय-पुकार,चिल्ल-पो सुनकर टीटी rpf बाले भी आये ओर तीनों को यह बोलकर झांसी उतार दिया कि ....तुम तीनो को तीर्थ जाने की नही संसद भवन जाने की आवश्यकता है जिसके लिए गाडी उल्टी तरफ जाएगी ...!
मामला रफा-दफा भी हो गया और मुरैना से नासिक जाने बाले यात्री झांसी में एक साथ बैठकर एक ही बीड़ी को पी रहे थे ...!किन्तु बपरीते अपने बीड़ी-बण्डल के पैसे दोनों लोगो से रोते हुए बसूल करना चाह रहे थे ।😀
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.
बुधवार, 9 सितंबर 2020
मुखाग्नि प्रेम की
हाथ मे ली हुई बीड़ी से सुट्टा खीचकर ढेर सारा धुंआ फिजाओ में छोड़ते रामआसरे चाचा कहि दूसरी दुनिया मे गुम है !
अभी कल की ही तो बात है जब रामजानकी काकी का डोला लेकर आये थे, ओर आज काकी के सफेद होते बालो के साथ बढ़ती हुई झुर्रियों से चेहरे भरे चेहरे पर उनका आकर्षण बिल्कुल भी खत्म नही हुआ था ।
सिर पर बंधे अंगोछे से पसीना मिश्रित आँशु जब-जब वह पोंछते है ,तब-तब उन्हें अपनी 'मुह पूछाई' रस्म स्मरण हो आती है और हृदय में उठते हुए दर्द में सहसा एक मुस्कुराहट आकर कहि गुम हो जाती है ।
लोगो के भारी कोलाहल के मध्य रामआसरे काका का मष्तिष्क व्यतीत में चला गया और बीते कल का चलचित्र इतना स्पष्ट हुआ कि वह निश्चेत से होकर अपलक गुमनाम मुहब्बत में चले गए !
घुंघुरू बजाते बेलो के साथ एक किशोर हंकार-हंकार कर बैलों को उत्साहित कर रहा था कि पूरा 4 बीघा खेत जल्दी लग जाये तो गांव में जो रमैया आई है ...उसके साथ हंसी ठिठोली करेंगे और दोपहर भर सुस्ताएँगे पर उन्हें नही पता था कि रमैया आज घर चली जायेगी ।
भोली-गोपी भी अपने साथी के साथ दुगने जोश में चल रहे थे .....ओर 4 बीघा सितम से पहले जुत गया ।
जल्दी-जल्दी नारे बदल हल को खेत मे छोड़ रमसा काका घर पहुचे ओर चिल्लाए....
"ओ री रमैया जरा गुड़ के साथ पानी दे दो बड़ी पियास लगी है !"
किन्तु न प्रतिउत्तर आया और नाही उम्मीद का मूर्तिरूप रमैया!
घर सूना था .....न वह खिलखिलाहट थी न वह चहल-पहल !
एक रमैया के जाते ही रमसा काका जैसे फुट-फुट कर रोने को आतुर थे ।
बात आई-गयी हुई और रमसा-रमैया की कहानी भी अतीत की परतों में कही दब गई ..!
कुछ वर्षों उपरांत रमसे का पाणिग्रहण हुआ और जब छिपते-छिपाते प्रथम भेंट को पहुंचे तो ....अवाक रह गए..!
दुल्हिन ने पाँव छूकर जब पहला शब्द बोला तो उसमें एक परिचित स्वर सा लगा ...
" देखो जी पहले पहिचानिये फिर ही मुझे स्पर्श करना !"
परीक्षा की घड़ी ओर बालपन का स्नेह सजीब हो उठा ...कांपते होंठो से रमसा कह उठे
"रम....ममया ....रम ....रमैया..!"
ओर एक खिलखिलाहट से अटारी गूंज उठी
समय पंख लगाके उड़ता रहा .....किन्तु रमैया की गौद सुनी रही। जन्हा सुना वही दोनो दौड़े जाते ...हजार पत्थर पूज कर भी रमैया-रमसे सन्तान सुख से वंचित थे!
रमसे-रमैया की जोड़ी को लोग प्रातः देखना पसंद नही करने लगे ....कहते कि बांझ का मुह देखना निकृष्ठ होता है और लोग भूलके मिलते भी तो मुंह बनाकर जमीन पर ठुकथूका के चलते बनते ।
वंही रमैया ने अतिरिक्त बात्सल्य स्नेह को अपने रमसा ओर पालतू जांनंबरों को देना प्रारम्भ कर दिया ..
समय के साथ घर-जमीन सबका बंटबारा हुआ पर रमसे का दिल आज भी साझा था ....वह तो प्रेम का अशेष सागर था जो सदैव हिलोरों में रहता था ।
अपने खेतों की फसल ओर अपनी रमैया यही जीवन था !
कभी-कभी रमैया दुखी होती और रमसे के सिर को गोद का सिरहाना देकर कहती कि .....' अ जी तुम चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे न,फिर क्यों सिर्फ मुझे ही निहारते रहे ?"
रमसे मोन रमैया की आंखों में निहारते हुए कहने लगे ....
"तूने क्यों इतने सम्बन्ध तोड़ सिर्फ मुझे ही साथी चुना !"
"साथी!"
रमैया सिर्फ इतना बोल पाई और हिचकियो के साथ हिलकारे ले उठी !
"तुम्हे याद नही होगा जब मे जिजी के साथ आई थी ,में ओर तुम दोनों खूब लड़ते थे !"
"....लेकिन तुमने उस दिन जान जोखिम में डालकर मुझे बचाया था।"
"याद है वह जंगली भेड़िये से तुम्हारा भिड़ना, मुझे परेह धकेल ...उसका निबाला बनने की आतुरता सिर्फ प्रेम में होती है !"
"वह निश्चल ,निःस्वार्थ प्रेम मेने तुम्हारे गज भर सीने के अंदर स्पंदित होते हृदय में स्पस्ट सुना था!"
"सुना था कि रक्त की हर वृन्द में सिर्फ रमैया बसति है फिर रमैया अपने प्रियतम मन से दूर कैसे रह सकती है ?"
"सुनो! जीवन मे कितने भी बदलाव आए पर में चाहूंगी कि में जब तन छोड़ू मेरा प्रियतम बस मुझे यू ही निहारे ..."
"उम्र का क्या है बालपन का प्रेम ,यौवन का समर्पण बना और प्रौढ़ आते-आते सहचर होने का प्रमाण भी !"
"में चाहूंगी कि में जब भी इस दुनिया को छोड़ू ,तुम मेरे सफेद बालों की लट से हमेशा मेरा चेहरा छुपने से बचाते रहो!"
"तुम कहते थे न!रमैया बालो की अलका से बड़ी जलन होती है जो मुझे तेरे दर्श के मध्य एक अवरोधक बनके बार-बार पूर्ण चन्द्र देखने से रोकती है !"
प्रेमभाव का सावन-भादो वर्ष पड़ा और रमैया के समर्पण का रमसे आभारी हो गया ।
"सुनो!"
'भगवान न करे कि कभी ऐसा समय आये में तुम्हे न पहिचान पाउ पर.....तुम मेरी पहिचान बने रहना !"
रमैया प्रेम चर्चा और रमसे प्रेम श्रोता बने उसकी गोद मे सिर रखे ही सो गए ...।
व्यतीत समय निकलता रहा और रमैया-रमसे का प्रेम प्रगाढ़ होता रहा किन्तु समय के प्रभाव से कोन बचा है......ओर एक दिन रमैया ऐसी गिरी की फिर उठ न पाई ....रीढ़ रमैया की क्षतिग्रस्त हुई थी और बाबले रमसे हो गए ...!!
बैलगाड़ी हांकते रमसे के शब्दों में हंकार नही थी और रेलगाड़ी की ध्वनि में उन्हें रमैया के नूपुर झनकते सुनाई दे रहे थे ..!
अभी कल की ही तो बात है जब रामजानकी काकी का डोला लेकर आये थे, ओर आज काकी के सफेद होते बालो के साथ बढ़ती हुई झुर्रियों से चेहरे भरे चेहरे पर उनका आकर्षण बिल्कुल भी खत्म नही हुआ था ।
सिर पर बंधे अंगोछे से पसीना मिश्रित आँशु जब-जब वह पोंछते है ,तब-तब उन्हें अपनी 'मुह पूछाई' रस्म स्मरण हो आती है और हृदय में उठते हुए दर्द में सहसा एक मुस्कुराहट आकर कहि गुम हो जाती है ।
लोगो के भारी कोलाहल के मध्य रामआसरे काका का मष्तिष्क व्यतीत में चला गया और बीते कल का चलचित्र इतना स्पष्ट हुआ कि वह निश्चेत से होकर अपलक गुमनाम मुहब्बत में चले गए !
घुंघुरू बजाते बेलो के साथ एक किशोर हंकार-हंकार कर बैलों को उत्साहित कर रहा था कि पूरा 4 बीघा खेत जल्दी लग जाये तो गांव में जो रमैया आई है ...उसके साथ हंसी ठिठोली करेंगे और दोपहर भर सुस्ताएँगे पर उन्हें नही पता था कि रमैया आज घर चली जायेगी ।
भोली-गोपी भी अपने साथी के साथ दुगने जोश में चल रहे थे .....ओर 4 बीघा सितम से पहले जुत गया ।
जल्दी-जल्दी नारे बदल हल को खेत मे छोड़ रमसा काका घर पहुचे ओर चिल्लाए....
"ओ री रमैया जरा गुड़ के साथ पानी दे दो बड़ी पियास लगी है !"
किन्तु न प्रतिउत्तर आया और नाही उम्मीद का मूर्तिरूप रमैया!
घर सूना था .....न वह खिलखिलाहट थी न वह चहल-पहल !
एक रमैया के जाते ही रमसा काका जैसे फुट-फुट कर रोने को आतुर थे ।
बात आई-गयी हुई और रमसा-रमैया की कहानी भी अतीत की परतों में कही दब गई ..!
कुछ वर्षों उपरांत रमसे का पाणिग्रहण हुआ और जब छिपते-छिपाते प्रथम भेंट को पहुंचे तो ....अवाक रह गए..!
दुल्हिन ने पाँव छूकर जब पहला शब्द बोला तो उसमें एक परिचित स्वर सा लगा ...
" देखो जी पहले पहिचानिये फिर ही मुझे स्पर्श करना !"
परीक्षा की घड़ी ओर बालपन का स्नेह सजीब हो उठा ...कांपते होंठो से रमसा कह उठे
"रम....ममया ....रम ....रमैया..!"
ओर एक खिलखिलाहट से अटारी गूंज उठी
समय पंख लगाके उड़ता रहा .....किन्तु रमैया की गौद सुनी रही। जन्हा सुना वही दोनो दौड़े जाते ...हजार पत्थर पूज कर भी रमैया-रमसे सन्तान सुख से वंचित थे!
रमसे-रमैया की जोड़ी को लोग प्रातः देखना पसंद नही करने लगे ....कहते कि बांझ का मुह देखना निकृष्ठ होता है और लोग भूलके मिलते भी तो मुंह बनाकर जमीन पर ठुकथूका के चलते बनते ।
वंही रमैया ने अतिरिक्त बात्सल्य स्नेह को अपने रमसा ओर पालतू जांनंबरों को देना प्रारम्भ कर दिया ..
समय के साथ घर-जमीन सबका बंटबारा हुआ पर रमसे का दिल आज भी साझा था ....वह तो प्रेम का अशेष सागर था जो सदैव हिलोरों में रहता था ।
अपने खेतों की फसल ओर अपनी रमैया यही जीवन था !
कभी-कभी रमैया दुखी होती और रमसे के सिर को गोद का सिरहाना देकर कहती कि .....' अ जी तुम चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे न,फिर क्यों सिर्फ मुझे ही निहारते रहे ?"
रमसे मोन रमैया की आंखों में निहारते हुए कहने लगे ....
"तूने क्यों इतने सम्बन्ध तोड़ सिर्फ मुझे ही साथी चुना !"
"साथी!"
रमैया सिर्फ इतना बोल पाई और हिचकियो के साथ हिलकारे ले उठी !
"तुम्हे याद नही होगा जब मे जिजी के साथ आई थी ,में ओर तुम दोनों खूब लड़ते थे !"
"....लेकिन तुमने उस दिन जान जोखिम में डालकर मुझे बचाया था।"
"याद है वह जंगली भेड़िये से तुम्हारा भिड़ना, मुझे परेह धकेल ...उसका निबाला बनने की आतुरता सिर्फ प्रेम में होती है !"
"वह निश्चल ,निःस्वार्थ प्रेम मेने तुम्हारे गज भर सीने के अंदर स्पंदित होते हृदय में स्पस्ट सुना था!"
"सुना था कि रक्त की हर वृन्द में सिर्फ रमैया बसति है फिर रमैया अपने प्रियतम मन से दूर कैसे रह सकती है ?"
"सुनो! जीवन मे कितने भी बदलाव आए पर में चाहूंगी कि में जब तन छोड़ू मेरा प्रियतम बस मुझे यू ही निहारे ..."
"उम्र का क्या है बालपन का प्रेम ,यौवन का समर्पण बना और प्रौढ़ आते-आते सहचर होने का प्रमाण भी !"
"में चाहूंगी कि में जब भी इस दुनिया को छोड़ू ,तुम मेरे सफेद बालों की लट से हमेशा मेरा चेहरा छुपने से बचाते रहो!"
"तुम कहते थे न!रमैया बालो की अलका से बड़ी जलन होती है जो मुझे तेरे दर्श के मध्य एक अवरोधक बनके बार-बार पूर्ण चन्द्र देखने से रोकती है !"
प्रेमभाव का सावन-भादो वर्ष पड़ा और रमैया के समर्पण का रमसे आभारी हो गया ।
"सुनो!"
'भगवान न करे कि कभी ऐसा समय आये में तुम्हे न पहिचान पाउ पर.....तुम मेरी पहिचान बने रहना !"
रमैया प्रेम चर्चा और रमसे प्रेम श्रोता बने उसकी गोद मे सिर रखे ही सो गए ...।
व्यतीत समय निकलता रहा और रमैया-रमसे का प्रेम प्रगाढ़ होता रहा किन्तु समय के प्रभाव से कोन बचा है......ओर एक दिन रमैया ऐसी गिरी की फिर उठ न पाई ....रीढ़ रमैया की क्षतिग्रस्त हुई थी और बाबले रमसे हो गए ...!!
बैलगाड़ी हांकते रमसे के शब्दों में हंकार नही थी और रेलगाड़ी की ध्वनि में उन्हें रमैया के नूपुर झनकते सुनाई दे रहे थे ..!
बड़े चिकित्सालय में रमैया के पास बैठे-बैठे रमसे काका बार उस अलका को पुनः रमैया के चेहरे पर देखने की लालसा में बैठे रहते की लट घूमे ओर वह उस लट को पुनः एक ओर कर पाए !
नजदीक बेड पर लेटा एक युवा यह रोज देखता ओर पूछता की .....
"बाबा क्यों आप इनके पास पूरा दिन-रात बेठे रहते हो ?"
'जबकि इनमे पहिचानना तो दूर कोई चेष्ठा भी शेष नही दिखती ...आप कुछ समय बाहर भी बैठ लिया कीजिये ...!"
रमसे...
"बेटा....यह मेरी वह सहचरी है जिसने मुझे करोड़ो में पहिचाना था.....!"
"चलो ठीक आज मुझे नही जानती पर में तो इसे पिछले 6 दसको से जानता हूं न!"
"पता नही कब इसकी आंख खुले और में न होऊ तो इसको दर्द होगा क्योंकि हमने तो विवाह बाद भी साथ-साथ रहने के लाखों वादे किए थे !"
ओर अंतिम पिय दर्श को रमैया की आंखे गंगा-जमुना बन गयी ..।
वह जगी .....कांपते हाथ से रमसे का सिर अपने सीने पर रख अपने अस्ताचल की राह को चली गयी ....!
श्मशान पर रमैया का पार्थिव शरीर रखा था ....रमेसर काका मुह से बीड़ी लगाए धुंआ उगल रहे थे ....!!
तमाम तैयारी उपरांत जब मुखाग्नि के लिए रमेसर काका को पुकारा वह पूर्व की तरह शांत थे ....
बुलाने पर जब न बोले तो हिलाने पर एक तरफ को लुढ़क गए ...
ओर मुंह से निकली बीड़ी की चिंगारी ने अंतिम धूम्र प्रकट किया .....देखते ही देखते ,रमेसर ओर रमैया की कहानी फिजाओ में घुलने लगी ...!!!!!!
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.
सोमवार, 7 सितंबर 2020
कथा-सरिता
===कथा सरिता===
बहुत पुराने समय की बात है।भारत वर्ष में एक नृप का चक्रवर्ती शाशनथा, उनके कुलगुरु और कुलपुरोहित नीति और ज्ञान की बातें समझाते रहते थे।
निरन्तर युद्ध में जीतने के बाद राजा का ध्वज अखण्ड भारत पर गर्व से लहराता जा रहा था ।
निरन्तर प्राप्त होती विजय श्री और बढ़ते शाशन क्षेत्र के प्रभुत्व ने राजन के मस्तिष्क में गर्व की भावना कब अभिमान में परिवर्तित हुई उनको स्वम अहसास न हुआ ।
एक बार राजा ने घमंड से चूर होकर कुलगुरु से कहा, 'गुरुदेव, आज मैं अब चक्रवर्ती सम्राट हो गया हूं....
अब मैं हजारों-लाखों लोगों का रक्षक हूं....
मेरे कंधों पर उन सब की जिम्मेदारी है।'
कुलगुरु समझ गए कि मेरे यजमान को सर्वसत्ताधीस होने की अवभिव्यक्ति का घमंड हो गया है। यह घमंड उसकी संप्रभुताको हानि पहुंचा सकता है। इस घमंड को तोड़नेके लिए कुलगुरु ने एक उपाय सोचा...
जब एक दिन शाम को राजा और कुलगुरु भ्रमण कर रहे थे तभी राजा को एक बड़ा सा पत्थर दिखा। कुलगुरु ने उस पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा 'राजन! जरा इस पत्थर को तोड़ कर तो देखो।
'राजा ने अत्यंत नम्र भाव से अपने बल से वह पत्थर तोड़ डाला।
किन्तु यह क्या!
पत्थर के बीच में बैठे एक जीवित मेंढक को एक पतंगा मुंह में दबाए देख कर राजा दंग रह गया।
कुलगुरु ने राजा से पूछा, 'पत्थर के बीच बैठे इस मेंढक को कौन हवा-पानी और खुराक दे रहा है? इसका पालक कौन है? कहीं इसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी तुम्हारे ही कंधों पर तो नहीं आ पड़ी है?'
राजा को अपने कुलगुरु के प्रश्न का आशय समझमें आ गया। वह इस घटना से पानी-पानी हो कर कुलगुरु के आगे नतमस्तक हो गया।
तब कुलगुरुने कहा, 'चाहे वह तुम्हारे राज्य की प्रजा हो या दूसरे प्राणी, पालक तो सबका एक ही है- परमपिता परमेश्वर।हम-तुम भी उसी की प्रजा हैं, उसी की कृपा से हमें अन्न और जल प्राप्त होता है। एक शाशक के रूप में तुम उसी के कार्यों को अंजाम देते हो। इसीलिए हमारे भीतर पालनकर्ता होने का घमंड कभी नहीं आना चाहिए।'
#सारांश -: किसी भी कार्य के लिए हम सब मात्र निमित्त हे जिसका कर्ता स्वम को समझ सर्वश्रेठता का प्रदर्शन करना सबसे बड़ी भूल हे ।
क्योंकि धन्वन्तरि वैद्य को भी मृत्यु के समय औषधि प्राप्त न हुई थी ।
रविवार, 6 सितंबर 2020
सस्ती शायरी
किसी को सिर रख रोने के लिए एक कंधे की तलाश है,
कोई सेकड़ो कंधों में कांधा बनकर भी कांधे से उदास है!
किसी का सब्र छलकने नही फुट फुट रोने को कयास है,
नित याद करता अपनो को किसी मेअपनो से खटास है!
अजनबियों का मेला है दिल कोई धंदा तो ग्राहक तलास है,
पल जोड़ स्वयं को लिखता हूं लोगो को स्वार्थ की आस है!
'असफल' जिंदगी के फलसफे इतने सस्ते नही मिलते है,
किसी इश्क में तन तो किसी को इश्क में धन की तलाश है!
तलाशे जिंदगी खत्म नही होगी खत्म ये सारा जन्हा होगा,
घमंड से उठे मष्तक एक दिन तेरा भी बाकी न निशां होगा !!!!
कोई सेकड़ो कंधों में कांधा बनकर भी कांधे से उदास है!
किसी का सब्र छलकने नही फुट फुट रोने को कयास है,
नित याद करता अपनो को किसी मेअपनो से खटास है!
अजनबियों का मेला है दिल कोई धंदा तो ग्राहक तलास है,
पल जोड़ स्वयं को लिखता हूं लोगो को स्वार्थ की आस है!
'असफल' जिंदगी के फलसफे इतने सस्ते नही मिलते है,
किसी इश्क में तन तो किसी को इश्क में धन की तलाश है!
तलाशे जिंदगी खत्म नही होगी खत्म ये सारा जन्हा होगा,
घमंड से उठे मष्तक एक दिन तेरा भी बाकी न निशां होगा !!!!
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