सोमवार, 28 सितंबर 2020

भगत सिंह जी

अमर वीरगति की प्रेरणापुंज और युवाओ के प्रेरणा स्त्रोत भगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु,चन्द्रशेखर 'आजाद', रामप्रसाद 'बिस्मिल',असफाख,मंगलपांडे,राणा बेनीमाधव सिंह,बाबू कुँअर सिंह,महाबीर सिंह,दीक्षित जी जैसे महायोद्धाओं का कहि भी दस्ताबेजो में उल्लेख नही है। यह तो भारतीय जनता की भावना है कि उन्हें 'शहीद ए आजम,आजाद,पंडित बिस्मिल जैसी उपाधियों से अलंकृत किया जाता है ।

क्या कारण है कि आज भी भारत की राष्ट्रीय भाषा हिन्दी और  लिपि देवनागरी के साथ-साथ इन महाबीरो को प्रपत्रो में 'शहीद' का उद्बोधन नही मिला....?
अकबर ,शाहजंहा,हुमायु,टीपू की क्रूरता को महान बताने बाले   इस देश में हजारों,करोड़ो अन्तर्वाही कीड़े है और उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय पारितोषिको से सम्मानित भी किया जाता रहा है ।

भारत मे जातिवाद खत्म करने की बात तो की जाती है पर चुनाव आते ही जाती और धर्म आधारित मतो का वर्गीकरण आखिर क्यों होता है ...क्यों कि देश से जुड़े आंतरिक तन्त्र में प्रतिभा नही प्रजाति देखना है ही लोकतंत्र है।

छोटूराम के नाम के साथ जुड़ी 'सर' उपाधि उस ब्रितानी चरण चुम्बन का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो सिंधिया को 'वाइसराय' बनाती है। भले ही वीरगति प्राप्त क्रांतिकारियों को लोकतंत्र भूल जाये पर ब्रितानी सरकार के रीछ हमेशा से सर्वोपरि रखे गए ।

भारतरत्न,भारत विभूषण जैसे  पारितोषिक सम्मान आज लाई की तरह नङ्गे बॉलीबुड को बाटे जाते है और जो कुछ बच  जाए वह लेतो की खंडपीठ में बन्दरबाट कर लिए जाते है। पटेल के बुत हर जगह है किंतु 552 रियासतों के दानदाताओ का कहि नाम नही ...क्या यही भारत को ठेके पर हेंडल करने बालो की कृत्यगता ?
राष्ट्रीय खेल हॉकी ओर उसके जादूगर ध्यानचंद्र जी आज भी उपेक्षित है। क्योंकि उन्होंने हिटलर के समक्ष सीना तान कर बोला था.......'भारत का हूं और क्षत्रिय हूं सिक्को से स्वाभिमान नही तौला जा सकता है !"

पंडित गैंदालाल दीक्षित जी उम्रभर क्रांति की मशाल प्रज्वल्वित करके धन और आयुध उपलब्ध कराते रहे किन्तु आज देश मे 60 %को पता ही न होगा। तरकुली माता के अनन्य भक्त अंगरोजो की बलि चढाते रहे किन्तु उप्र से सटे मप्र,बिहार को भी पता नही होगा !

आईपीएल में बिकते क्रिकेटर ओर ऑनलाइन जुआ व मदिरा प्रचार करते क्रिकेटर ही अगर भारतरत्न है तो नङ्गे मानसिक वेश्यालय की दुनिया मे भारतरत्न खोजने की नीति कैसे प्रारम्भ हुई ....इन दलालो ने कोनसा तीर मारा है !

राष्ट्रीय बापू,राष्ट्रीय चाचा,राष्ट्रीय गुरु, जैसे सम्मान किस किधर परस्पर बटे वह हर कोई जानता है पर निर्पेक्षय की अति तो तब हुई थी, जब डा राजेन्द्र प्रसाद जी को सोमनाथ मंदिर जाने  से नेहरू ने रोका था !!

आज देश का बच्चा-बच्चा परिचित है कि जिन्होंने भारतभूमि को लहू से सींचा उनको उपेक्षित कर दिया गया है और हमे आजादी देने में 'असहयोग आंदोलन' का रट्टा लगाया गया। इतिहास की बात की जाए तो महान दूरदृष्टा ओर प्रजा बत्सल शाशक जयचन्द ओर मानसिंह को गद्दार प्रचारित किया किन्तु  माधव भट्ट,राघव चेतन,वातायन खत्री,आदि भेदियो पर मौन साधा गया ।


आज भगत सिंह जी को स्मरण करके उनको श्रद्धा सुमन अर्पित तो किये जायेंगे किन्तु उनको वलिदान को सर्वोचित उल्लेखनीय सम्मान दिलाने पर लेटे मौन साध लेंगे। असल मे यह जो लोकतंत्र है न सब बॉलीवुडिया सिल्वर स्क्रीन का ही वास्तविक रूप है जंहा वर्जित दृश्य भी अभिनय  प्रतिभा बनाकर परोसे जाते है। ओर देह दर्शन कराके संस्कृति सभ्यता के सभी बंध खोले जाते है ।

पूज्य भगत सिंह जी अच्छा हुआ लगभग दशक उपरांत भी आपका पुनर्जन्म नही हुआ क्योंकि यह देश तो कल फिरंगियों की शाश्कता का गुलाम था ....और आज हरामियों की मानसिकता का है ।

अमर शहीद भगत सिंह जी को एक भारतीय की तरफ से अश्रुपूरित श्रद्धा सुमन व नमन 🙏 

'इंकलाब जिन्दावाद' 💪
'वन्देमातरम' 
'जय भवानी'
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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 23 सितंबर 2020

तीर्थयात्रा (हास्य)

#भदेस_वार्ता
सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ 😂😂
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एक गाँव से कुछ बुजुर्ग एकबार तीर्थाटन को निकले ...विधीवत सबकी आरक्षित टिकिट थी और सबकी सीट्स संग-साथ बना रहने के लिए एक ही बोगी में क्रमानुसार नजदीक थी...
चलते-चलते सफर में चर्चाये आम होती हे और सहमति-असहमति,आलोचक-प्रशंशक दो समूह सदैव बनते आये हे,कुछ ऐसा ही वाक्या इधर भी था ।

रामआसरे-
" भैया तीरथ को तो जाय रहे हे पर बड़ी टेंसन में जान डरी हे,कुआ पे दो बीघा चरी और 6 बीघा कछवारि लगाई हे पर जा कदुआ घ्नसमा समवीरा की गैया कहु रोज न चरे!"
यह कहते हुए बुजुर्ग देवता ने धुंए से पीली हो चुकी  मुछो में अंतर्ध्यान हुए होठो के मध्य फटाफट करके 10 नम्बर ख़ेनि सरकाई ही थी की बपरिते बोल पड़े !

"अरे दद्दा जी बात तो एक और बेर कहो,जा सारे घ्नसमा ने सिग हार चराय डारो न तो लुगाई बाँध पाओ और न गैया...भोजाई उ तो दिनरात बाजार में जायके टिकिया-भल्ला में जड्ड देत रहे !"

यह कहते-कहते बपरीते ने बड़ी चुलबुली अदा में वांयी आँख झपकाई ई थी की गुस्से से तमतमाते 'घ्नसमा लाल' तेरही के मालपुआ के जेसे लाल हो उठे ।

"सुनि सारे बप्रीते तू तो सारे दोगला ई रहेगो जाकी बीड़ी पी लई बाकी की लुगाई बन जातु हे,और रही बात गैया की तो ऎसे ई चरेगी !"
"काहू के झाड़ .में दम होय तो गैया रोक के दिखाय .....मारे मुंडा के चाँद भोपाल न बनाई तो हमते उ को घनसमे कहेगो !!"

रमासरे को यह सुनते ही ततैया लग गयी और बपरीते को बगल में हटाके घनसमे के सामने आ बेठे और बोले ।

"काये रे घ्नसमा तेरी गैया काय हमाये खेत में  धसेगी?"
"भें कछु तेरे बाप को लगि गओ हे का, जो जा तरे ते बतरामन कर रहो हे !!"
"ज्यादा वाइसराय न बनि,मारे पनाह के चांद हाल खरोंच जागी!!!"

इतना सुनते ही घ्नसमे के टिकासरे में भूत झोलकिया लग गयी  ..
"सुनो ज्यादा चु चपर न करो अगर कछवारि होगी तो अब गैया जरूर चरेगी,तुम सिग हमाये झुनझुना झराय लियो और कराय दियो फांसी। तुमसे हमाये मुंडन में डरे रहे ..!"

रमासरे कुछ कहते उससे पहले ही बपरीता एक झोला उठा लाया और बड़ी जोर से बोल  उठा ...

"सुनो सिग अभाल ई तोर-तिया करे देत हे, जी हे गओ दद्दा को खेत और अब तुम अपनी गैया धसाय् के देखो अभाल ई भुभरो न फूटे तो कहियो !"

घ्नसमे भी ताव में आ गए और चारो तरफ नजर मारी लेकिन गाय का प्रतीक  जैसा कुछ न मिला तो बपरीते की जेब से गोविन्दबीड़ी का बण्डल निकाल कर गाय बना कर  रख दिया और छाती 56 इंच करते हुए बोल उठा ....

"लेयो तिहाये खेत मे गैया नई पुरो सांड घेर के ऐसे ई चरेगो,काट लियो हमाये कदुआ!"

फिर क्या ...बातो में बतबढ ओर तरण-तारणा आरम्भ हो गया ......दोनों तरफ मुंडा फटाफट खोपड़ियों पर बजने लगे। दोनों तत्वज्ञानी बड़ी श्रद्धा से परस्पर माँ-बहिनो को स्मरण कर रहे थे ।

ऊधम, हाय-पुकार,चिल्ल-पो सुनकर टीटी rpf बाले भी आये ओर तीनों को यह बोलकर झांसी उतार दिया कि ....तुम तीनो को तीर्थ जाने की नही संसद भवन जाने की आवश्यकता है जिसके लिए गाडी उल्टी तरफ जाएगी ...!

मामला रफा-दफा भी हो गया और मुरैना से नासिक जाने बाले यात्री झांसी में एक साथ बैठकर एक ही बीड़ी को पी रहे थे ...!किन्तु बपरीते अपने बीड़ी-बण्डल के पैसे दोनों लोगो से रोते हुए बसूल करना चाह रहे थे ।😀



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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 9 सितंबर 2020

मुखाग्नि प्रेम की

हाथ मे ली हुई बीड़ी से सुट्टा खीचकर ढेर सारा धुंआ फिजाओ में छोड़ते रामआसरे चाचा कहि दूसरी दुनिया मे   गुम है !
अभी कल की ही तो बात है जब रामजानकी काकी का डोला लेकर आये थे, ओर आज काकी के सफेद होते बालो के साथ बढ़ती हुई झुर्रियों से  चेहरे भरे चेहरे पर उनका आकर्षण बिल्कुल भी खत्म नही हुआ था ।
सिर पर बंधे अंगोछे से पसीना मिश्रित आँशु जब-जब वह पोंछते है ,तब-तब उन्हें अपनी 'मुह पूछाई' रस्म स्मरण हो आती है और हृदय में उठते हुए दर्द में सहसा एक मुस्कुराहट आकर कहि गुम हो जाती है ।
लोगो के भारी कोलाहल के मध्य रामआसरे काका का मष्तिष्क व्यतीत में चला गया और बीते कल का चलचित्र  इतना स्पष्ट हुआ कि वह निश्चेत से होकर अपलक गुमनाम मुहब्बत में चले गए !


घुंघुरू बजाते बेलो के साथ एक किशोर हंकार-हंकार कर बैलों को उत्साहित कर रहा था कि पूरा 4 बीघा खेत जल्दी लग जाये तो गांव में जो रमैया आई है ...उसके साथ हंसी ठिठोली करेंगे और दोपहर भर सुस्ताएँगे पर उन्हें नही पता था कि रमैया आज घर चली जायेगी ।
भोली-गोपी भी अपने साथी के साथ दुगने जोश में चल रहे थे .....ओर 4 बीघा सितम से पहले जुत गया ।
जल्दी-जल्दी नारे बदल हल को खेत मे छोड़ रमसा काका घर पहुचे ओर चिल्लाए....

"ओ री रमैया जरा गुड़ के साथ पानी दे  दो बड़ी पियास लगी है !"

किन्तु न प्रतिउत्तर आया और नाही उम्मीद का मूर्तिरूप रमैया!
घर सूना था .....न वह खिलखिलाहट थी न वह चहल-पहल !
एक रमैया के जाते ही रमसा काका जैसे फुट-फुट कर रोने को आतुर थे ।

बात आई-गयी हुई और रमसा-रमैया की कहानी भी अतीत की परतों में कही दब गई ..!

कुछ वर्षों उपरांत रमसे का पाणिग्रहण हुआ और जब छिपते-छिपाते प्रथम भेंट को पहुंचे तो ....अवाक रह गए..!

दुल्हिन ने पाँव छूकर जब पहला शब्द बोला तो उसमें एक परिचित स्वर  सा लगा ...

" देखो जी पहले पहिचानिये फिर ही मुझे स्पर्श करना !"

परीक्षा की घड़ी ओर बालपन का स्नेह सजीब हो उठा ...कांपते होंठो से रमसा कह उठे

"रम....ममया ....रम ....रमैया..!"
ओर एक खिलखिलाहट से अटारी गूंज उठी


समय पंख लगाके उड़ता रहा .....किन्तु रमैया की गौद सुनी रही। जन्हा सुना वही दोनो दौड़े जाते ...हजार पत्थर पूज कर भी रमैया-रमसे  सन्तान सुख से वंचित थे!
 रमसे-रमैया की जोड़ी को लोग प्रातः देखना पसंद नही करने लगे ....कहते कि बांझ का मुह देखना निकृष्ठ होता है और लोग भूलके मिलते भी तो मुंह बनाकर जमीन पर ठुकथूका के चलते बनते ।

वंही रमैया ने अतिरिक्त बात्सल्य स्नेह को अपने रमसा ओर पालतू जांनंबरों को देना प्रारम्भ कर दिया ..
समय के साथ घर-जमीन सबका बंटबारा हुआ पर रमसे का दिल आज भी साझा था ....वह तो प्रेम का अशेष सागर था जो सदैव हिलोरों में रहता था ।
अपने खेतों की फसल ओर अपनी रमैया यही जीवन था !

कभी-कभी रमैया दुखी होती और रमसे के सिर को गोद का सिरहाना देकर कहती कि .....' अ जी तुम चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे न,फिर क्यों सिर्फ मुझे ही निहारते रहे ?"

रमसे मोन रमैया की आंखों में निहारते हुए कहने लगे ....
"तूने क्यों इतने सम्बन्ध तोड़ सिर्फ मुझे ही साथी चुना !"

"साथी!"
रमैया सिर्फ इतना बोल पाई और हिचकियो के साथ हिलकारे ले उठी !

"तुम्हे याद नही होगा जब मे जिजी के साथ आई थी ,में ओर तुम दोनों खूब लड़ते थे !"
"....लेकिन तुमने उस दिन जान जोखिम में डालकर मुझे बचाया था।"

"याद है वह जंगली भेड़िये से तुम्हारा भिड़ना, मुझे परेह धकेल ...उसका निबाला बनने की आतुरता सिर्फ प्रेम में होती है !"

"वह निश्चल ,निःस्वार्थ प्रेम मेने तुम्हारे गज भर सीने के अंदर स्पंदित होते हृदय में स्पस्ट सुना था!"
"सुना था कि रक्त की हर वृन्द में सिर्फ रमैया बसति है फिर रमैया अपने प्रियतम मन से दूर कैसे रह सकती है ?"

"सुनो! जीवन मे कितने भी बदलाव आए पर में चाहूंगी कि में जब तन छोड़ू मेरा प्रियतम बस मुझे यू ही निहारे ..."
"उम्र का क्या है बालपन का प्रेम ,यौवन का समर्पण बना और प्रौढ़ आते-आते सहचर होने का प्रमाण भी !"

"में चाहूंगी कि में जब भी इस दुनिया को छोड़ू ,तुम मेरे सफेद बालों की लट से हमेशा मेरा चेहरा छुपने से बचाते रहो!"
"तुम कहते थे न!रमैया बालो की अलका से बड़ी जलन होती है जो मुझे तेरे दर्श के मध्य एक अवरोधक बनके बार-बार पूर्ण चन्द्र देखने से रोकती है !"
प्रेमभाव का सावन-भादो वर्ष पड़ा और रमैया के समर्पण का रमसे आभारी हो गया ।

"सुनो!"
'भगवान न करे कि कभी ऐसा समय आये में तुम्हे न पहिचान पाउ पर.....तुम मेरी पहिचान बने रहना !"
रमैया प्रेम चर्चा और रमसे प्रेम श्रोता बने उसकी गोद मे सिर रखे ही सो गए ...।


व्यतीत समय निकलता रहा और रमैया-रमसे का प्रेम प्रगाढ़ होता रहा किन्तु समय के प्रभाव से कोन बचा है......ओर एक दिन रमैया ऐसी गिरी की फिर उठ न पाई ....रीढ़ रमैया की क्षतिग्रस्त हुई थी और बाबले रमसे हो गए ...!!
बैलगाड़ी हांकते रमसे के शब्दों में हंकार नही थी और रेलगाड़ी की ध्वनि में उन्हें रमैया के नूपुर झनकते सुनाई दे रहे थे ..!

बड़े चिकित्सालय में रमैया के पास बैठे-बैठे रमसे काका बार उस अलका को पुनः रमैया के चेहरे पर देखने की लालसा में बैठे रहते की लट घूमे ओर वह उस लट को पुनः एक ओर कर पाए !


नजदीक बेड पर लेटा एक युवा यह रोज देखता ओर पूछता की .....
"बाबा क्यों आप इनके पास पूरा दिन-रात बेठे रहते हो ?"
'जबकि इनमे पहिचानना तो दूर कोई चेष्ठा भी शेष नही दिखती ...आप कुछ समय बाहर भी बैठ लिया कीजिये ...!"

रमसे...
"बेटा....यह मेरी वह सहचरी है जिसने मुझे  करोड़ो में पहिचाना था.....!"
"चलो ठीक आज मुझे नही जानती पर में तो इसे पिछले 6 दसको से जानता हूं न!"

"पता नही कब इसकी आंख खुले और में न होऊ तो इसको दर्द होगा क्योंकि हमने तो विवाह बाद भी साथ-साथ रहने के लाखों वादे किए थे !"

ओर अंतिम पिय दर्श को रमैया की आंखे गंगा-जमुना बन गयी ..।
वह जगी .....कांपते हाथ से रमसे का सिर अपने सीने पर  रख अपने अस्ताचल की राह को चली गयी ....!





श्मशान पर रमैया का पार्थिव शरीर रखा था ....रमेसर काका मुह से बीड़ी लगाए धुंआ उगल रहे थे ....!!
तमाम तैयारी उपरांत जब मुखाग्नि के लिए रमेसर काका को पुकारा वह पूर्व की तरह शांत थे ....
बुलाने पर जब न बोले तो हिलाने पर एक तरफ को लुढ़क गए ...
ओर मुंह से निकली बीड़ी की चिंगारी ने अंतिम धूम्र प्रकट किया .....देखते ही देखते ,रमेसर ओर रमैया की कहानी फिजाओ में घुलने लगी ...!!!!!!

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

सोमवार, 7 सितंबर 2020

कथा-सरिता

===कथा सरिता===
बहुत पुराने समय की बात है।भारत वर्ष में  एक नृप का चक्रवर्ती शाशनथा, उनके कुलगुरु और कुलपुरोहित नीति और ज्ञान की बातें समझाते रहते थे। 
निरन्तर युद्ध में जीतने के बाद राजा का ध्वज अखण्ड भारत पर गर्व से लहराता जा रहा था ।
निरन्तर प्राप्त होती विजय श्री और बढ़ते शाशन क्षेत्र के प्रभुत्व ने राजन के मस्तिष्क में गर्व की भावना कब अभिमान में परिवर्तित हुई उनको स्वम अहसास न हुआ ।
एक बार राजा ने घमंड से चूर होकर कुलगुरु से कहा, 'गुरुदेव, आज  मैं अब चक्रवर्ती सम्राट हो गया हूं....
अब मैं हजारों-लाखों लोगों का रक्षक हूं....
 मेरे कंधों पर उन सब की जिम्मेदारी है।'
कुलगुरु समझ गए कि मेरे यजमान को सर्वसत्ताधीस  होने की अवभिव्यक्ति का घमंड हो गया है। यह घमंड उसकी संप्रभुताको हानि पहुंचा सकता है। इस घमंड को तोड़नेके लिए कुलगुरु ने एक उपाय सोचा...
जब एक दिन शाम को राजा और कुलगुरु भ्रमण कर रहे थे तभी राजा को एक बड़ा सा पत्थर दिखा। कुलगुरु ने उस पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा 'राजन! जरा इस पत्थर को तोड़ कर तो देखो।
'राजा ने अत्यंत नम्र भाव से अपने बल से वह पत्थर तोड़ डाला।
किन्तु यह क्या! 
पत्थर के बीच में बैठे एक जीवित मेंढक को एक पतंगा मुंह में दबाए देख कर राजा दंग रह गया।

कुलगुरु ने राजा से पूछा, 'पत्थर के बीच बैठे इस मेंढक को कौन हवा-पानी और खुराक दे रहा है? इसका पालक कौन है? कहीं इसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी तुम्हारे ही कंधों पर तो नहीं आ पड़ी है?'
राजा को अपने कुलगुरु के प्रश्न का आशय समझमें आ गया। वह इस घटना से पानी-पानी हो कर कुलगुरु के आगे नतमस्तक हो गया।
 तब कुलगुरुने कहा, 'चाहे वह तुम्हारे राज्य की प्रजा हो या दूसरे प्राणी, पालक तो सबका एक ही है- परमपिता परमेश्वर।हम-तुम भी उसी की प्रजा हैं, उसी की कृपा से हमें अन्न और जल प्राप्त होता है। एक शाशक के रूप में तुम उसी के कार्यों को अंजाम देते हो। इसीलिए हमारे भीतर पालनकर्ता होने का घमंड कभी नहीं आना चाहिए।'

#सारांश -: किसी भी कार्य के लिए हम सब मात्र निमित्त हे जिसका कर्ता स्वम को समझ सर्वश्रेठता का प्रदर्शन करना सबसे बड़ी भूल हे ।
क्योंकि धन्वन्तरि वैद्य को भी मृत्यु के समय औषधि प्राप्त न हुई थी ।

रविवार, 6 सितंबर 2020

सस्ती शायरी

किसी को सिर रख रोने के लिए एक कंधे की तलाश है,
कोई सेकड़ो कंधों में कांधा बनकर भी कांधे से उदास है!

किसी का सब्र छलकने  नही फुट फुट रोने को कयास है,
नित याद करता अपनो को किसी मेअपनो से खटास है!

अजनबियों का मेला है दिल कोई धंदा तो ग्राहक तलास है,
पल जोड़ स्वयं को लिखता हूं लोगो को स्वार्थ की आस है!

'असफल' जिंदगी के फलसफे इतने सस्ते नही मिलते है,
किसी इश्क में तन तो किसी को इश्क में धन की तलाश है!

तलाशे जिंदगी खत्म नही होगी खत्म ये सारा जन्हा होगा,
घमंड से उठे मष्तक एक दिन तेरा भी बाकी न निशां होगा !!!!

  

रविवार, 23 अगस्त 2020

क्षत्रियो की ८४ ओर इतिहास

--- राजपूतो में चौरासी की अवधारणा---

राजपूतो के बसापत का पैटर्न समझने के लिए ये पोस्ट जरूर पढ़ें। इससे पहले इस विषय पर कभी नही लिखा गया--

राजपूतो की ज्यादातर बसापत गांवो के समूह के रूप में मिलती हैं। 12 गांव, 24 गांव, 42 गांव, 60 गांव, 84 गांव आदि। इन्हें खाप कहा जाता है। ये राजपूतो में ही मिलती है या राजपूतो से गिरकर दूसरी जाती में गए वंशो में। दूसरी जातियों में भी सिर्फ उन्ही वंशो की एक गोत्र की खाप मिलती है जो राजपूतो से गिर कर उनमे शामिल हुए हैं। क्योंकि राजपूतो की ही बसापत सैनिक सेवा के बदले जागीर मिलने से होती थी। इसके अलावा खुद से भी किसी क्षेत्र को जीता जाता था लेकिन उसके बाद अपने से बड़ी ताकत से पट्टा अपने नाम लिखवाया जाता था जो कि गांवो के समूह के रूप में ही होता था। 

जागीर एक दो गांव की भी हो सकती थी लेकिन ज्यादातर कई गांवो की होती थी। अब जरूरी नही कि जितने गांवो की जागीर मिली है उन सभी गांवो में उन राजपूतो की बसापत हो। लेकिन समय के साथ आबादी बढ़ने से जागीर के अन्य गांवो में भी फैल जाते थे। बाद में खुद खेती भी करने लगे। 

राजपूतो की इन खापो में सबसे ज्यादा लोकप्रिय संख्या 84 की थी। 84 क्या है इसको जानना बहुत जरूरी है। भारतीय संस्कृति में संख्या 84 का बड़ा धार्मिक महत्व रहा है। इसे शुभ माना जाता रहा है। इसीलिए किसी चीज को दर्शाने में इस संख्या का बहुत इस्तेमाल किया जाता रहा है। जैसे महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थो की संख्या 84 बताई गई है। जरूरी नही की तीर्थो की संख्या सटीक 84 ही हो लेकिन पवित्र होने के कारण इस संख्या का सांकेतिक रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह मेरु पर्वत की ऊँचाई 84 हजार योजन बताई जाती है। ब्रज को 84 कोस में फैला बताया जाता है। प्रसिद्ध जोगियों की संख्या 84 बोली जाती है। जानवरो की प्रजातियों की संख्या 84 लाख बताई जाती हैं आदि आदि। 

इसी तरह जब इलाकाई डिवीज़न की बात की जाती थी तब भी 84 का बहुत उपयोग किया जाता था। एक परगने को 84 गांव के बराबर माना जाता था। हालांकि मध्यकाल में एक परगना 40 गांव का भी हो सकता था और 400 गांव का भी। राजपूतो को सबसे बड़ी जागीर जो मिलती थी वो ज्यादातर 84 गांव की ही होती थी। इनमे से कई 84 आज भी मौजूद हैं लेकिन जरूरी नही कि इनमे आज राजपूतो की संख्या पूरे 84 गांवो में हो। इसके अलावा 84 गांव पूरे ना होने या उससे कुछ ज्यादा होने पर भी 84 बोल दिया जाता था। कई बार एक पूरा परगना किसी एक वंश की जागीर में होने पर उसे 84 बोलना पसंद करते थे भले ही उसमे 84 गांव पूरे ना हो या उससे कुछ ज्यादा हों। ये 84 सांकेतिक ज्यादा होती थी।

इसी तरह 84 के चार गुना यानी की 360 और 360 के चार गुना 1440 संख्याओं को भी शुभ माना जाता है इसीलिए इनका भी राजपूतो के इलाकाई डिवीज़न में बहुत महत्व था। लेकिन 360 और 1440 ज्यादातर जागीर में नही मिलते थे। एक 'सरकार' जो आज के जिले की तरह होता था उसे 360 गांव के बराबर माना जाता था। हालांकि ये संख्या भी सांकेतिक ही होती थी। किसी वंश का शासन किसी बड़े हिस्से में हो जो लगभग सरकार के बराबर या आसपास हो तो उसे 360 गांव बोल दिया जाता था जैसे हरियाणा में मडाडों का राज्य था या रोहतक वाले परमारो का। अगर इससे कहीं ज्यादा बड़ा हो तो 1440 गांव बोल दिया जाता था। जैसे हरिद्वार, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर क्षेत्र में पुंडीरो का राज्य था। गौरतलब है कि 360 या 1440 अक्सर वहां होते थे जहां किसी वंश का पहले से ही बड़ा राज्य रहा हो और बड़ी ताकत के अधीन होने के बावजूद ये अर्धस्वतंत्र होते थे और अपने राज्य में खुद जागीर बांटते थे। और आज भी उसी तरह से इनकी आबादी मिलती है। 

उदाहरण के लिए हरियाणा के परमारो का राज दादरी से गोहाना और जींद से बहादुरगढ़ के क्षेत्र तक था। इसको 360 गांव की रियासत कह सकते हैं। ये इलाका जीतने के बाद परमार राजा ने अपने सेनापतियों या पुत्रो वगैरह को जागीरे बांटी होंगी। इसी तरह परमारो की इस क्षेत्र में 12, 24 या 32 गांवो की 3-4 या उससे ज्यादा खाप बनी। इन्ही जागीर के गांवो में परमार राजपूतो की आबादी का विस्तार हुआ। कुछ एकलौते गांव की जागीरे या भोम भी दी जाती थीं इसलिए स्वतंत्र गांव भी बसते थे। रियासत के बाकी गांवो में किसान जातीयो के लोग बसाकर परमार राजा उनसे खेती कराते। इन परमारो की राजधानी कलानौर थी। किसानों को बसाने के उपक्रम में किसानों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण किसान जाती के लोग जमीन के लिए 'भेंट' देने की भी पेशकश करते, तभी से कलानौर में कौला पूजा की शुरुआत हुई। किसानों को जहां खेती की जमीन मिलती वही बस जाते थे, किसी एक गोत्र के किसानो को खेती करने के लिए जागीर की तरह गांवो का पूरा समूह देने का कोई मतलब नही था इसलिए उनमे एक ही गांव में कई गोत्र के लोग मिलेंगे जो रिश्तेदारी में आकर नही बसे बल्कि एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से जमीनें मिलने पर बसे हैं। इसी तरह एक गोत्र की जगह कई गोत्र की खाप भी मिलेगी। हरियाणा में सुरक्षा कारणों से जाटो में अलग अलग गोत्र के किसानों के गांवो द्वारा मिलकर खाप बना लेने का चलन था इसलिए वहां जाटो में बहुगोत्रीय खाप भी मिलती हैं जैसे महम चौबीसी खाप। ये खाप कलानौर परमार रियासत की खालसाई जमीन पर खेती करने वालो की है जो इन्होंने 19वी सदी में ही बनाई है। इस खाप के जाट परमारो के मुजारे होते थे। इस खाप के बनने के बाद ही इन्होंने कौला पूजन के खिलाफ आंदोलन किया। 

इसीलिए हरियाणा और पश्चिम यूपी में जाट और गूजर जैसी जातियों में एकगोत्र कि खाप सिर्फ वो ही हैं जो राजपूतो से निकले हैं। जैसे पश्चिम यूपी में गूजरो में भाटी, कलस्यान, पवार, नागर आदि की ही खाप मिलती हैं जो अपने को राजपूतो से निकला बताते हैं। बाकी हूण, चेची,  कसाना आदि गोत्र के गूजर जो असली गूजर कहे जाते हैं वो बिखरे हुए ही मिलते हैं। 

राजपूतो के गांव वहीं बसते थे जहाँ उन्हें खुद सैनिक सेवा के बदले जागीर मिलती थी। जबकि कृषक या अन्य पेशों वाली जातियां कही भी किसी की भी जागीर में या 
खालसाई इलाको में बस सकती थीं जहाँ उन्हें खेती के लिए जमीन या उनके पारंपरिक पेशे से जुड़ा काम मिल जाए। पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब वगैरह में दिल्ली के करीब होने के कारण मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद राजपूतो को कोई नई जागीरे नही मिली और जो पुरानी जागीरे या राज्य थे उनको भी धीरे धीरे तोड़ा जाता रहा इसलिए अपनी जागीरों में भी नए गांवो में राजपूतो का बसना बंद होता गया। इस कारण इन क्षेत्रों में एक तो पिछली कई सदियों में राजपूतो की आबादी का विस्तार बहुत कम हुआ। ऊपर से जागीरे टूटने और कमजोर होने के कारण कई खापो के अन्य जातियों में शामिल होने से संख्या पहले से कम भी होती गई। जबकि कृषक जाती होने के कारण जाट गूजर जैसी जातियों के लोग 20वी सदी तक नए इलाको और गांवो में बसते रहे, दूसरों की जागीरों में मुजारे के अलावा खालसाई जमीनों पर भी खेती करने के लिए बसते रहे। इसके अलावा राजपूतो से गिरी खाप भी इनमे शामिल होती रहीं। इस कारण इन क्षेत्रों में इनकी आबादी का बहुत विस्तार हुआ और इनके पिछली कुछ सदियों में ही बसे गांव बहुत मिलेंगे। दिल्ली में सल्तनत की राजधानी से लगता इलाका खालसा में होने के बावजूद इनकी वहां बहुत आबादी है। 

इस 360 की तरह ही मडाड और चौहानो की 360 थी। मडाडों के 360 गांव जो बोले जाते हैं उसका मतलब उनकी रियासत से था, मडाड राजपूतो की बसापत सभी 360 गांवो में नही थी। 

इसी तरह उत्तरी दोआब में पुंडीरो की रियासत 1440 गांव की बोली जाती थी जो आज के सहारनपुर, हरिद्वार, मुजफ्फरनगर और शामली जैसे 4 जिलों में फैली हुई थी। इसमे पुंडीरो के गांवो के कई समूह हैं जो पहले जागीर रही होंगी। 

लेकिन इसमे कोई एकरूपता नही होती थी। जैसे जाटू तंवरो के राज्य का क्षेत्रफल मडाडों या परमारो से ज्यादा नही था लेकिन वो अपने को 1440 बोलते थे। बाद में भाट जगाओ ने अज्ञानता के कारण अपने हिसाब से इन संख्याओं को परिभाषित करने का काम किया। जैसे किसी वंश की 360 बोली जाती है लेकिन वर्तमान में उस जगह सिर्फ 40-50 गांव में उस वंश की आबादी दिख रही है तो भाटो ने अपने मन से उस वंश की दूसरी जगह बसी खापो को जोड़ जाड़ के 360 गांव सिद्ध कर दिए। जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश में गहलोतो के कई जगा/भाट यहां पुराने जमाने से 360 गांव होने की बात जो जनश्रुतियों में लोकप्रिय थी, उसे सिद्ध करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी खाप के गहलोतो के गांव के साथ नेपाल में गहलोत बताकर वहां के गांव तक की काल्पनिक संख्या जोड़ देते हैं। जबकि उन्हें नही पता कि हाथरस क्षेत्र में ही एक समय गहलोतो का बड़ा राज्य था जिस कारण 360 गांव होने की बात जनश्रुतियों में थी। 

इसी तरह सर्विस क्लास जातियों के भी आंतरिक संगठन में 84 और 360 गांवो पर चौधरी होते थे। उदाहरण के लिए एक विशेष क्षेत्र में बढ़ई जाती के 360 गांव बोले जाते थे जिनपर उनका मुखिया होता था जिसे चौधरी कहते थे। इसका मतलब ये नही कि वो 360 गांव के मालिक होते थे। बल्कि 360 गांव में रहने वाले बढ़ई जाती के लोगो का मुखिया होता था। लेकिन 360 भी सांकेतिक होता था। गांव इससे कहीं ज्यादा या कम हो सकते थे। 

राजपूतो में उत्तर भारत में निम्नलिखित चौरासी थीं----

(ये संपूर्ण लिस्ट नही है और ना ही परफेक्ट है। कई जगह पहले कुछ और मान्यता रही होगी और अब कुछ और। जैसे बुलंदशहर के बाछलो पर पहले 55 गांव की जागीर होती थी जो अंग्रेजो के समय खत्म हो गई और उस वक्त जिन 12 गांवो में बसापत थी उनमे ही उनकी आबादी रही आई इसलिए अब बारहा गांव की खाप बोली जाती है)

गाजियाबाद-हापुड़ में तोमरो की चौरासी।

हापुड़ के गढ़मुक्तेश्वर में ही चौरासी का आधा ब्यालसी भी थी तोमरो की। 

बुलंदशहर के खुर्जा में भाल सोलंकीयो की चौरासी।

बुलंदशहर के ही जेवर में छोकरो की चौरासी। 

बुलंदशहर के ही अनूपशहर और संभल के नरौली क्षेत्र में बडगूजरो(राघव) की चौरासी।

पुराने जमाने में गुड़गांव और मुजफ्फरनगर क्षेत्र में भी बडगूजरो(राघवो) की चौरासी बोली जाती थी। अब गुड़गांव में चौबीसी बोली जाती है जबकि मुजफ्फरनगर वाली के मुसलमान बन जाने की बात बोली जाती है लेकिन असल मे बालियान जाट जो बडगूजरो की देखा देखी अपने को अब रघुवंशी बोलते हैं उन्ही के लिए पुराने  समय मे जनश्रुतियों में बडगूजरो की चौरासी होना बोला गया है।  
 
बुढ़ाना क्षेत्र में कछवाहों की चौरासी। हालांकि पुराने जमाने में इनकी यहां 360 होने का जिक्र होता था। जिसका मतलब इनका कभी बड़ा राज्य रहा हो सकता है।

सहारनपुर के काठा क्षेत्र को पहले चौरासी बोला जाता था।

लोनी में चौहानो की चौरासी थी। 

अलीगढ़ के चंडौस क्षेत्र में चौहानो की चौरासी।

अलीगढ़-हाथरस क्षेत्र में पुंडीरो की चौरासी है।

कासगंज के सोरों क्षेत्र मे सोलंकियों की चौरासी।

इसी क्षेत्र में गौरहार की चौरासी।

मथुरा में तरकर की चौरासी। 

बदायूं के बिलसी क्षेत्र में जंघारा तोमरो की चौरासी।

मैनपुरी के किरावली में राठोड़ो की चौरासी।

आंवला में चौहानो की चौरासी है।

मिर्जापुर के कांतित में गहरवारों की चौरासी थी। 

प्रयागराज के मेजा क्षेत्र में भी गहरवारों की चौरासी है। 

कानपुर के शिवली में चंदेलों की चौरासी है।

एमपी के जबलपुर के पास बनाफ़रो की चौरासी है।

उन्नाव में बिसेन राजपूतो की चौरासी होती थी। 

मैनपुरी के बेवर क्षेत्र में बैस राजपूतो की चौरासी बोली जाती थी। 

जौनपुर में चंदेलों की चौरासी होती थी। 

गोखपुर के उनौला के पास पालिवार राजपूतो की चौरासी है।

बलिया के दोआबा में बिसेनो की चौरासी है। 

गाजीपुर के गहमर क्षेत्र और उससे लगते बिहार में सिकरवारो की चौरासी। 

सिकरवारों की चौरासी थी। 

एमपी के मुरैना में सिकरवारों की चौरासी है। 

भोपाल के पास चौहानो की चौरासी है।

रीवा के रामपुर में बघेलों की चौरासी। 

सीधी में चौहानो और सेंगरो की चौरासी। 

सुल्तानपुर-जौनपुर क्षेत्र में राजकुमारों के क्षेत्र को चौरासी कोस में फैला बोलते हैं। 

इसी तरह 360 की अगर बात करें तो हरियाणा और पंजाब में बड़े राज्य रहे हैं इसलिए वहां कई 360 मिलती हैं। 

जैसे उत्तरी हरियाणा में चौहानो की 360। लेकिन वहां अब बसे हुए गांवो के आधार पर दो 84 बोलने का चलन ज्यादा है। 

उससे नीचे मडाडों की 360

मडाडों के नीचे परमारो की 360

सिरसा में भट्टियों की भी 360 होती थी। 

पंजाब में वराह और तावनी राजपूतो की भी 360 बोली जाती थी। 

उनसे आगे घोडेवाहा के 360 गांव का राज बोला जाता था।

लुधियाना और जालंधर के आसपास मंज राजपूतो की 360 होती थी। 

हाथरस आगरा क्षेत्र मे अब गहलोत की 84 है लेकिन पहले 360 बोली जाती थी जिससे संकेत मिलता है कि पहले यहां इनका बड़ा राज्य था। 

मुरादाबाद के कठेरिया रामपुर में अपने 360 गांव बोलते हैं हालांकि कठेरियो का राज इससे कई गुना बड़े इलाके पर था, मुरादाबाद से लेकर शाहजहांपुर तक। इनके राज्य के लिए 1440 की सांकेतिक संख्या भी कम है। 

कानपुर में जो चंदेलों की 84 है उसको पहले 360 बोलते थे। 

गोंडा क्षेत्र में बिसेनो का 360 रहा है। 

वाराणसी-गाजीपुर के कटेहर क्षेत्र के रघुवंशियो की खाप को 360 बोला जाता था। 

बलिया जिले के प्रसिद्ध लखनेसर के सेंगरो के राज्य को 360 गांव का ही बोला जाता था। 

इसके बाद अगर 1440 की बात करें तो पुंडीरो के अलावा भिवानी हिसार में जाटू तंवरो के 1440 गांव बोले जाते थे। 

मुरैना क्षेत्र में भी तोमरो की खाप को 1440 बोला जाता है। 

अवध का बैसवाड़ा भी 1440 गांव का माना जाता है। 

उन्नाव का दिखितवाड़ा, राय बरेली के कान्हपुरिया, सुलतानपुर के बछगोती, सर्यूपार के कलहंस, सूर्यवंशी, श्रीनेत, उत्तरी अवध के चंद्रवंशी बाछल, हरदोई के सोमवंशी, आजमगढ़- अम्बेडकरनगर के पालिवारो के राज्य भी 360 या 1440 गांव का बोले जाते थे। 

लेखक- पुष्पेन्द्र राणा

संदर्भ- विभिन्न colonial रिकार्ड्स

नोट- इसमे सिर्फ मेरी जानकारी की और पढ़ने में जो आई सिर्फ उन्ही खापो का जिक्र किया है। इस तरह की और खापो के बारे में जानकारी हो तो बताए। धीरे धीरे उन्हें भी जोड़ दिया जाएगा। जागीर/खाप इससे अलग संख्या में भी होती है। 12, 24, 60, 87 आदि गांव की भी खाप होती हैं और इन्हें भी शुभ संख्या माना जाता है लेकिन 84 को सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि इस संख्या का 7 और 12 दोनो से भाग होता है। ये भारतीय ज्योतिषशास्त्र का विषय है, में इसके डिटेल मे नही जाना चाहता। मेने 84 के बहाने से राजपूतो के सेटलेमेंट्स या उपनिवेशीकरण का पैटर्न समझाने की कोशिश की है क्योंकि में देखता था कि इस विषय मे लोगो को बहुत भ्रम हैं। (आज तक किसी academician ने भी इस विषय पर शोध नही किया और ना ही उन्हें ज्ञान) अगर फिर भी कोई डाउट हो तो पूछ सकते हैं। राजपूतो की बसापत सिर्फ इसी तरह होती थी ऐसा नही है लेकिन पुराने जमाने मे ये ही स्टैण्डर्ड प्रक्रिया थी।

आंखों का क्या

घर से दूर ट्यूबेल के तिबरिया पर बैठे ताऊ कहि शून्य में गुम है, वह लगातार बीड़ी के दीर्घ कस खींचते हुये फिजाओ में ढेर सारे धुंआ को छोड़ने के साथ ऐसा प्रतीत  होते है जैसे धुंये के साथ जीवन श्वांस भी छोड़ने का प्रयास कर रहे हो..!

प्रणाम दाऊ !

मेरे अभिवादन शब्दो ने जैसे उन्हें कल्पना लोक से यथार्त लोक में ला दिया और पपड़ी पड़े ओठो से शुष्क सी मुस्कान के साथ स्नेह प्रस्फुटित हो गया !

"जीते रहो लले....कैसे हो ?"

- दाऊ बैलों से होती खेती मेने भी देख ली है पर इतना याद नही....आपसे आग्रह है कि कुछ अपने पुराने समय बाले किस्से सुनाइये ....!

बातो ही बातो मेरा जिज्ञासु मष्तिष्क उन्हें कुरेदने लगा और वह अपने कर्तव्यों की आधार बने सिर से अंगोछा उतारते हुए पुनः कही बीते हुए बिचरण करने लगे ओर मुझे उनकी आंखों में चलचित्रित होते भावो की नमी स्पष्ट  महसूस हुई ..।

"यह जो 4 वर्षो से खड़ा ट्रेक्टर दिख रहा है न! मेने कभी नही सोचा था कि यह मेरी वृद्धता की तरह उपेक्षित हो जाएगा!"
"लाले!...मेने तो अपनी जवानी के समय एक बैलजोड़ी,जरार के मैला से खरीदी थी, उसे भी कभी नही  बेचा !"
"जब हम किसी भी सजीव-निर्जीव बस्तु,स्थान,अथवा उससे जुड़ी भावना में  लाभ-हानि देखने लगते है तो प्रेम का मूल बिलुप्त होकर सिर्फ और सिर्फ लाभ का भाव ही जीवित रह जाता है !"

अपनी यादों से जुड़ी भावनाओ में बिचरण करते हुए उन्होंने तनाव महसूस किया और ओठो से बीड़ी को जोड़ते हुए बीड़ी धुएं योग के साथ भावनाओ को दबाने के लिए लगातार कस खिंचने लगे !
एक सांस खींचते हुए पुनः बोल उठे ..…जैसे एक शून्य से दूसरे शून्य को जोड़कर योगफल शून्य ही खोज रहे हो !

"मेरा जमाना......जमाना ही नही भावों का अथाह सागर हुआ करता था!"
"आज की तरह पैसा भी नही था ,ओर इसके साथ-साथ उसका इतना महत्व भी नही था।"
"अलग-अलग कमरे भी नही थे....क्या हृदय भी अलग-अलग नही थे। एक को हल्का दर्द हुआ पूरा गांव साथ था....अब तो एक परिवार होकर भी अलग-अलग है !"
'यह जो ट्रेक्टर अपनी जरावस्था में निस्तेज से खड़ा है न...यह जब आया था ,मुझे बहुत बुरा लगा था ....क्योंकि  मेरे हाथ से मेरे हल की मूठ जो छीन रही थी !'

यह कहते-कहते दाऊ की आंखों में नमी तैर उठी और वह बुझी हुई बीड़ी को पुनः सुलगाकर उस तैरती नमी को शुष्क करने का असफल प्रयास करते थे !

'किन्तु इसके साथ भी होते उपेक्षित व्यवहार पर मुझे कष्ट  होता है। बेलो के बाद इससे प्रेम जो कर बैठा..."
"मेरे प्रेम की परिणीति देखिए ....यह भी बेचारा जब बेदम हुआ,इससे उड़ते रक्त सम्लित गाढे धुंये पर किसी ने ध्यान नही दिया और जब लोगो का स्वार्थ शिद्धि वाधित हो गया तो ....."
'इसे भी खड़ा छोड दिया ....साइलेंसर आज उल्टा जुडा है ,कल एयरक्लीनर किसी अस्थमा रोगी के फेफडो की कचड़े से भर चुका है !"
'चहुओर उगते झाड़ किसी वृद्ध की दाढ़ी जैसे प्रतीत होने लगे है। इसकी लिफ्ट जैसे जोड़ो के रोग से ग्रसित होकर अब बोझा नही उठा सकती !'
'इसकी हेडलाइट्स मेरी आंखो की तरह चश्मे से भी नही देख सकती न..!"

यह बोलते-बोलते दाऊ की लगभग शतक से दशक पूर्व बाली आंखों से एक-अश्रुधारा वह निकली और मेरा पूरा असितित्व तरल में बदलता प्रतीत हुआ। उन्होंने सिरहाने रखी डोलची से कुछ जल लिया और कुछ अंश शुश्क   हो चले कंठ में पहुचाये !
मेने उनके दर्द को स्पष्ट महसूस किया और बात बदलनी चाही किन्तु जब भाव का प्रवाह वेदना की गति से बहने लगे तब कोई भी अवरोध कुछ प्रभाव नही रखता है, ताऊ कहते चले में मष्तिष्क में लिखता चला ।

'यह ट्रेक्टर भी मेरी तरह चार बच्चों के आधिपत्य में है, चारो की साझाकरण ओर लाभकरन नीति में फंसा हुआ।"
"काश!किसी एक का होता तो यह इस तरह रुग्ण न होता....इसकी रगों में नया रक्त दौड़ता....पाचन का निस्कासन बादलों तक अपना रंग दिखाता ओर इसकी आंखों की रोशनी मे.......में भी अपनी अपनी माटी को पुनः हल की तरह सृजित होते देखता !"

'बेलो की मधुर घण्टियाँ सुने दसको के बीत गए किन्तु कभी-कभी इसकी मधुर 'पी-पी......पी-पी' में एक मल्हार ही गुनगुना लेता !"

उनका गला रुंध आया और अंततः सारा ठीकरा आधुनिकता पर फोड़ते हुए बोले ......
'चल जीतू एक काम कर इस फोन पर कोई सुरैया-शमसाद का पुराना गीत ही सुना दे !"

मेने उनकी उनकी पसंद का गीत ......"ले के पहला-पहला प्यार,भरके आंखों में फुहार"
लगा दिया और वह अपने दिनों को स्मरण करके साथ-साथ दोहराने लगे .......!
में बस उनके अनुभवी चेहरे इतनी शीघ्र बिलुप्त हुई कसक को खोजता रहा .....किन्तु वह आंखे पुनः न खुली जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी,आंखों का क्या .....वहउस दर्द को पान कर चुकी थी ,ओर ट्रेक्टर पर केन्ग्लिया पक्षियों का एक झुंड झगड़ रहा था ।


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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र

सत्यबोध

जैसा कि जनश्रुति है.....
 नागिन जब नाग के साथ रमणरत होती है तो वह नितांत निर्जन  को चुनती है ....अपने अंडजो को दुनिया देखने से पूर्व घेरकर ...स्वयं ही निगलने की प्रवृति में कितने बच्चों को मारकर खा जाती है..!

वही मादा बिच्छू अपने अंडों को हीयरे से लगाकर रखती है ...उन्हें सेह करने के साथ-साथ दोनो हाथो से निरन्तर लुढ़काते हुए,स्थानान्तरन करते हुए एक वृहद सुरक्षा के सिपाही की तरह से सुरक्षा प्रदान करती रहती है! 
स्वजाये अन्डजो के पोषण में वह जब तक कुछ भी नही खाती ....! वह सन्तानमोह में सब भूल बैठती है, उसे सन्तान मोह ओर सृजन अभिलाषा इतनी प्रवल होती है कि अन्डो से निकलते बच्चे उसे जब चुनने लगते है,तब वह भूख से परिचित होती है और जब तक कि  उसके बच्चे उससे तिल-तिल के मारते है !

वह पल प्रतिपल असहनीय दर्द को महसूस करती है और   भागती है ....जीवन रक्षा के लिए ....मर्मातक पीड़ा से बचने के लिए ! 
किन्तु सन्तानमोह में यह पीड़ा तो सहन करती है, स्वयं के  दर्द कारक बच्चों को स्वयं से प्रथक नही करती है। और अंततः उसी के जाए एक दिन उसको निढाल कर देते है ....वह सृजन करके स्वयं के विनाश का कारण स्वयं बनती है !

सर्पनी अंडे देकर उन्हें भूल जाती है, जैसे कोई कभी मोह था ही नही! उसने तो सर्प के साथ रमण सिर्फ भौतिक आवश्यकता पूर्ति और रति आकर्षण वश किया था .....प्रकृति ने उसे गर्भ (गर्व भी पढ़ सकते है,जिसका भाव अंत मे प्रकट होगा) दिया और सर्पिणी ने गर्भ को बोझ समझ उपेक्षित कर दिया ।

उसे तो पूर्वाग्रह हो गया उन अचेष्ठी अन्डो है कि उसे जनते हुए उसकी ऊपरी चमड़ी उधड़ गयी ....उसे असहनीय प्रसव वेदना सहनी पड़ी। उसने सृजन ओर बात्सल्य से जुडी प्रसव को बिपरीत दृश्टिकोण से परखा ..!
अंततः नियत समय पर आ गयी अपने अंशो को निगलने के लिए ,अन्डो की वृत्ताकार परिधि में उसने कुंडली लगाई और चटकते अण्ड आवरण पर शिकारी की निगाह रखी ......जो निकला और निकलते ही अपनी माँ से दूर भागा बच गया किन्तु जो निकल कर मातृपक्षीय मोह न त्याग सका ,वह माता द्वारा ही पुनः उदरस्थ कर लिया गया...!
यह कैसा सृजन ओर जनन था जिसमे पूर्वाग्रह ओर क्रोध में जननकर्ता द्वारा शैशव को क्षुदा शांति की भेंट चढ़ना पड़ा ?

मादा बिच्छू ओर  सर्पिणी यू तो दोनों के प्राकृतिक जनन व्यवहार सर्वदा बिपरीत है किंतु जब इसे #खाजनीति की  दृष्टि से तौला जाए तो बिच्छू वह क्षेत्र व समाज है जिसमे #लेता पैदा होता है और शैशव काल मे ही 'भौतिक शास्त्री-लेन्ज' की व्यंजना का सन्दर्भ बनता है !

जब वह बड़ा होकर सर्पिणी सदृश होता है तो सर्वप्रथम समाज,क्षेत्र,कर्त्तव्य,कर्म,धर्म से विमुख होकर उसी  से उदरपूर्ति कर लेता है ....जिसके सृजन ,पालन,पोषण का उत्तरदायित्व उसपर होता है .....!!!

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र

तँवर वंश अभिवादन

#जय_गोपाल_जी_की
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चन्द्रवंश,भरतकुल-पाण्डव वंशी तोमर(तँवर) क्षत्रियो का अभिवादन क्यों है ..?
कभी-कभी कुछ अतिसामान्य से व्यवहारिक प्रश्न मष्तिष्क में आते तो है किंतु समुचित उत्तर जिव्हा में ओर भाव होते हुए भी चुप रह जाते है .....कारण है समुचित जानकारी और उससे कारण का ज्ञात न होना !

आज तँवरवंश के अविवादन पर कुछ शब्दो के माध्यम से चर्चा की जाए..।

महाभारत के युद्ध से पूर्व धर्मराज युधिष्ठिर के मातृपक्षीय बन्धु योगेश्वर श्रीकृष्ण जी जीवन ही इतनी लीलाओं का अथाह सागर रहा कि उनके अनन्त नाम रखे गए ....और गोवर्धन पर्वत तर्जनी पर धारण करने बाले लीलाधर देवराज इंद्र के द्वारा 'गोपाल' पुकारे गए।
योगेश्वर की बहिन योगमाया तँवर कुलदेवी तो योगेश्वर द्वतीय कुलदेव माने गए ...!
एक समय आया कि गुरुपुत्र अशश्वथामा ने द्रौपदी पुत्रो की नृशंस हत्या कर दी और जाकर ऋषि आश्रम में छुप गया। जब पाण्डव व योगेश्वर से सामना हुआ तो छिपकर सीखे गए 'बृह्मशीर्ष अमोघअस्त्र' का सन्धान किया ....जिसके प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण जी की सलाह पर पार्थ द्वारा भी उसी दिव्याश्त्र का सन्धान किया। अंतरिक्ष मे अंधेरा होने लगा ,दिगम्बर डिगने लगे...पृथ्वी कम्पित हो गयी और सृष्टि जैसे महाप्रलय के अंधकार में लुप्त होने लगी ....। दो महान दिवाश्त्रो के मध्य आये महर्षि द्वारा अर्जुन-अशश्वथामा को आदेशित किया गया कि इससे पूर्व महाप्रलय हो अपने अस्त्र बापस करलो ....अर्जुन को पूर्णसंचलन ज्ञान था और उन्होनो अस्त्र बापस कर किन्तु गुरुपुत्र को अर्द्धज्ञान था और उसने अपने पूर्वाग्रह के कारण पाण्डव वंश बीजनाश हेतु उत्तरा के गर्भ पर लक्षित कर दिया ।
गर्भ में पल रहे शिशु महात्मा परीक्षित का जीवन ओर भरतकुल वंश का असितित्व जब संकट में आया तो पुनः योगेश्वर अपनी योगमाया के साथ अपने अनन्य भक्त की रक्षा गर्भ में उस अस्त्र का कबच बन करते रहे ।

जब महात्मा परीक्षित का जन्म हुआ तो वह सबकी तरह रुदन करने की बजाय शुकासन लगाकर बेठ गए और सबपर अपनी परीक्षित दृष्टि से अवलोकन करने लगे ....किसी के अंक में जाने की जगह उन्ही निगाहे तलाश रही रही थी .....अपना चक्रधर....रक्षक मुरलीधर....अपना दैव गिरिधर गोपाल ! जैसे ही गोपाल का आगमन हुआ और वह दौड़कर चिपक गए गोपाल के  अंक में ....जय जय गोपाल गाने लगे ।

प्रथम कुल दैव महादेव हरिहर शंकर जी के बाद द्वितीय कुलदेव के रूप में गिरिधर गोपाल जी इतनी बार इस तन्वरकुल रक्षा की है कि महात्मा परीक्षित से ही सम्भवतः "जय गोपाल जी की" तंवरो का कुल अविवादन  प्रचलित हो गया और हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए अपार श्रद्धा में जय गोपाल जी की बोलते है ।

★जय गोपाल जी की ★

सन्दर्भ :-
 श्रीमदभागवत महापुराण,महाभारत,श्रीमद्भभागत विष्णु महापुराण,सबल सिंह चोहान कृत महाभारत

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प्रेम

परोक्षप्रेम,प्रत्यक्ष मोहभंग
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वह भी एक आम फेसबुकिया था....औरो की तरह रोज 8 से लेकर 20 घण्टे तक दिहाड़ी करने बाला। अपने अंक में समेटे था सेकड़ो झटके,अनगिनत भावनाये ओर युवामन की अशेष आशाओं में कही पुनः जीवन स्थापन के लिए नित्य प्रत्यनशील !
घर से दूर एकांत रहना और अवकाश बाले दिनों में भी टिफिन के साथ कोई किताब लेकर जंगलो,नदी सरोबरो के किनारे फक्कड़ जैसी प्रियता में वह इस दुनिया मे एक विचित्र से कम नही था। सधे शब्दो मे बोलना ओर माटी को शब्द देना जैसे उसे इसी फक्कड़पन का फल था ..!!

वह जब व्याकरणीय त्रुटियों के साथ माटी को शब्द देता तो लोग बलिहारी हुए जाते थे.....लोगो ने जब उसके विषय मे कल्पनाएं गढ़ी तो कल्पनाएं सदा की तरह स्थिति के विपरीत ही बनी....सदा इंसान परोक्ष में बसी कल्पनाओ में ठगा महसूस करता है,ओर जब पूर्वनियोजित धारणा से कही एक हजार गुना अधिक निम्न प्रत्यक्ष होता है! तो जो मानव आकर्षण होता है वह  कुछ अपवादों को छोड़ .....आकर्षण बिंदु से कही दूर भागता है ।
लोग उससे दूर भाग रहे थे और वह जीवन युद्ध मे भाग रहा था .....इधर-उधर,यत्र-तत्र, सर्वत्र! स्वम की प्राणवायु  खोजते हुए क्योंकि उसे आडम्बर पसंद नही थे और समय उसके साथ परिहास कर रहा था ...।
समय ने उसके साथ इतने परिहास किये की उसे उसपर होने बाले परिहास कही सूक्ष्म दिखते ओर वह नए-नए खुशियों के माध्यम में खुश था ।

उसके नीड़ में तृणों के अभाव थे किंतु वह पक्षियों के नीड़ सुरक्षित करके सुख अनुभूत करता था। वह औरो को अपना बनाकर उनकी उपलब्धियों में स्वम से जोड़ लेता था....वह नही जानता था कि "औरो के परितोष स्वम के घर मे नही सजते!"
यंहा तो अपना घर सजाने के लिए 'रद्दी पत्र' भी स्वम ही खरीदने पड़ते है। उसमें किसी से मोह नही लगाया क्यूकी  वह जिससे मोह करता था.....वह इस दुनिया मे तमाम कष्टों के विचरण का माध्यम बन जाता अथवा इस दुनिया से ही विचर जाता। कहि दूर अनन्त में अदृश्य धुंए की कुछ लकीरे उसे आज भी स्मरण है ....स्वम की असफलताओं के प्रतीक बनकर....अपनो से कही दूर रहने का संकेतक प्रतीक बनकर !

वह प्राकृतिक था....है और सदैव रहेगा! उसने न कल आकर्षण के आवरण ओढ़े थे ...न कभी आकर्षण बिंदु बने रहने की अपेक्षाएं की थी। वह तो नग्न तेग जैसा था ...दुधारा,निरीह,निष्ठुर...जिसके फल का स्पर्श सिर्फ घाव दे सकता है और हजारो घाव लिए वह लोगो को घावों से बचाते हुए इस दुनिया को अलविदा कर गया .....आकर्षण की अपेक्षाओं से रहित एक सिहाई का  सरोबर अंततः सुख गया !!!!

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...