गुरुवार, 6 अगस्त 2020

गुप्तचरों की दुर्दशा

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कल की पोस्ट से कुछ स्वजन व्यथित थे , में यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि प्रेम में धोखा ,किसी के दबाव , या किसी के अपमान के कारण नही जा रहा , आप सबीके5 रहते हुए किसी की इतनी हिम्मत नही की मुझतक कोई आंच आये , बस फेसबुक से एक ऊबन होने लगती है , जबतक मुझे लगता है कि मैं इसे चला रहा तबतक सब ठीक होता है मैं यहाँ लिखता हूँ लेकिन जैसे ही पता लगता ज्म कि ये हमे चला रहा हम ठहरे मलंग चल पड़ते हैं झोला उठाकर , तो आज आखिरी लेख है तो एक विशेष लेख तो बनता है , इसको पढ़कर सोचना की एक गुमनाम योद्धा कैसे आपकी सुरक्षा दीवार तैयार करता है और मूवी के इतर उसकी वास्तविक जीवन की लड़ाई कैसी होती है ।।

हर देश में मौजूद विदेशी दूतावास सर्फ दूतवाश है नही जासूसों का भी अड्डा होते हैं, लेकिन यह पता होने के बावजूद सारे देश ऐसी जासूसी को स्वीकार करते हैं, लेकिन क्यों?

जासूसी की अंतरराष्ट्रीय दुनिया बड़ी स्याह और आम तौर पर गैरकानूनी है, लेकिन इसके बावजूद हर देश इसे स्वीकार करता है। बकिंघम यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस स्ट्डीज के डायरेक्टर एंथनी ग्लीस इसे "जेंटलमैंस एग्रीमेंट" कहते हैं,यह कोई लिखित या आधिकारिक समझौता नहीं होता, बस "आप मुझ पर नजर रखें और मैं आप पर" वाली बात है।

 दूतावास हमेशा तथाकथित इंटेलिजेंस अफसरों को नियुक्त करते हैं, यह देशों के बीच एक गैरआक्रामक संधि सी है, जिसके तहत सरकारें आपसी फायदे के लिए एक दूसरे के मामलों पर आंखें मूंद लेती हैं।" अगर किसी देश को अपने जासूसों को विदेश भेजना है तो उसे विदेशी जासूसों को अपने देश में भी मंजूरी देनी होती है। अब यह जासूसों पर निर्भर करता है कि वह कितनी जानकारी किस ढंग से निकाल पाते हैं,यही वजह है कि दूसरे देशों में जासूसों को अक्सर डिप्लोमैट या कूटनीतिक अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया जाता है, उन्हें डिप्लोमैटिक इम्युनिटी और एक खास किस्म की सुरक्षा भी दी जाती है, कूटनीतिक संबंधों को लेकर 1961 की वियना संधि में इन बातों का जिक्र है।।

बबहरखैर 
जासूसी के बारे में सोचा जाता है तो आम तौर पर दिमाग में सिनेमा का चरित्र जेम्स बांड उभरता है, लेकिन यह वैसा नहीं है,जब हम खुफिया कार्य के बारे में सोचते या बातचीत करते हैं तो हम सामान्य रूप से जेम्स बांड, बंदूक, लड़कियां, गिटार और ग्लैमर के बारे में सोचते हैं, लेकिन गुप्तचरी की दुनिया वैसी नहीं है , ये कैसी है यदि दिखा दिया जाए तो रूह कांप जाए , यह उन देशभक्तों का यथार्थ आर्तनाद है, जिन्होंने अपने देश के लिए पाकिस्तान, चीन ,रसिया, अमेरिका ,ऑस्ट्रेलिया ,अफगानिस्तान, ईरान जैसे देशों में जासूसी करते हुए जीवन खपा दिया, लेकिन आज अपने देश में दिहाड़ी मजदूर या उससे भी गलीज हालत में हैं, उन्हें कोई 'राष्ट्रभक्त' पूछता नहीं, 'राष्ट्रभक्त' सरकार को देशभक्त जासूस की कोई चिंता नहीं, अब संकेत में नहीं, सीधी बात पर आते हैं और एक ऐसे ही एजेंट की कहानी आप सबको बताते हैं (नाम और पहचान गुप्त रखी गयी है बाकी अक्षरसः सत्य है) दिल्ली में एक जो भारतीय खुफिया एजेंसी 'रिसर्च एंड अनालिसिस विंग' ('रॉ') के जासूस थे, उन्होंने अपने बेशकीमती 4 वर्ष पाकिस्तान के अलग-अलग इलाकों में सड़कों पर खोमचा घसीटते हुए, मुल्ला बन कर मस्जिद में नमाज पढ़ाते हुए, संवेदनशील सरकारी महकमों पर महीनों नजरें रखते हुए, पाकिस्तानी सेना द्वारा पोषित आतंकियों से दोस्ती गांठते हुए, जान की परवाह न कर वहां की सूचनाएं भारत भेजते हुए और आखिर में बर्बर यातनाओं के साथ जेल काटते हुए बिताए।

बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान की जेल से छूट कर भारत पहुंचे 'रॉ' एजेंट (नाम पंडित जी रख लेते हैसंबोधन में आसानी होगी ) का जीवन अपने देश आकर और दुश्वार हो गया, 'रॉ' एजेंट पंडित जी उर्फ मोहम्मद इमरान।

पंडित जी की तरह ऐसे अनगिनत देशभक्त हैं, जिनका जीवन देश के लिए जासूसी करते हुए और जान को जोखिम में डालते हुए बीत गया। जब वे अपने वतन वापस लौटे तो अपना ही देश उन्हें भूल चुका था। सरकार को भी यह याद नहीं रहा कि भारत सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते ही वह पाकिस्तान में प्रताड़नाएं झेल रहा था। कुलभूषण जाधव तो सुर्खियों में इसलिए रहे हैं कि उनसे सरकार का राजनीतिक-स्वार्थ सध रहा है।

यह सियासत क्या कुलभूषण के जिंदा रहने की गारंटी है? अगर गारंटी होती तो रवींद्र कौशिक, सरबजीत सिंह जैसे तमाम देशभक्त पाकिस्तान की जेलों में क्या सड़ कर मरते? फिर सरकार का उनसे क्या लेना-देना, जो देशभक्ति में खप चुके, पर आज भी जिंदा हैं! ऐसे खपे हुए देशभक्तों की लंबी फेहरिस्त है, जो अपनी बची हुई जिंदगी घसीट रहे हैं। इन्होंने देश की सेवा में खुद को मिटा दिया, पर सरकार ने उन्हें न नाम दिया न इनाम.  'रॉ' एजेंट पंडित जी का प्रकरण सुनकर केंद्रीय खुफिया एजेंसी के एक आला अधिकारी ने कहा कि मोदी सरकार बदलाव की बातें तो करती है, लेकिन विदेशों में काम कर रहे 'रॉ' एजेंट्स को स्थायी गुमनामी के अंधेरे सुरंग में धकेल देती है।

विदेशों में हर पल जान जोखिम में डाले काम कर रहे अपने ही जासूसों की हिफाजत और देश में रह रहे उनके परिवार के लिए आर्थिक संरक्षण का सरकार कोई उपाय नहीं करती। जबकि देश के अंदर काम करने वाले खुफिया अधिकारियों की बाकायदा सरकारी नौकरी होती है। वेतन और पेंशन उन्हें और उनके परिवार वालों को ठोस आर्थिक संरक्षण देता है। इसके ठीक विपरीत 'रॉ' के लिए जो एजेंट्स चुने जाते हैं, सरकार उनकी मूल पहचान ही मिटा देती है।

उनका मूल शिक्षा प्रमाणपत्र रख लेती है और किसी भी सरकारी या कानूनी दस्तावेज से उसका नाम हटा देती है। पंडित जी इसकी पुष्टि करते हैं। पंडित जी कहते हैं कि R. K. पुरम स्थित DPS कॉलेज से उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी और दिल्ली विश्वविद्यालय  से उन्होंने ग्रैजुएशन किया था। 'रॉ' के लिए चुने जाने के बाद उनसे स्कूल और कॉलेज के मूल प्रमाणपत्र ले लिए गए। जब वे 4 साल बाद अपने घर लौटे तो उनकी पूरी दुनिया बदल चुकी थी. उन्हें बताया गया कि सरकारी मुलाजिमों का एक दस्ता वर्षों पहले उनके घर से उनकी सारी तस्वीरें ले जा चुका था। राशनकार्ड से पंडित जी का नाम हट चुका था. सरकारी दस्तावेजों से पंडित जी का नाम 'डिलीट' किया जा चुका था.

भारत सरकार ऐसी घिसी-पिटी लीक पर क्यों चलती है? भारतीय खुफिया एजेंसी के अधिकारी ही यह सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि अमेरिका, चीन, इजराइल, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे कई देश अपने जासूसों की हद से आगे बढ़ कर हिफाजत करते हैं और उनके परिवारों का ख्याल रखते हैं. यहां तक कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई तक अपने एजेंटों को सुरक्षा कवच और आर्थिक संरक्षण देती है, लेकिन भारत सरकार इस पर ध्यान नहीं देती, क्योंकि सत्ता-सियासतदानों को इसमें वोट का फायदा नहीं दिखता।

वर्ष 2010 में 'रॉ' के टैलेंट हंट के जरिए चुने गए पंडित जी की अकेली आपबीती देश के युवकों को यह संदेश देने के लिए काफी है कि वे 'रॉ' जैसी खुफिया एजेंसी के लिए कभी काम नहीं करें। मेजर रवींद्र कौशिक से लेकर ऐसे तमाम 'रॉ' एजेंटों की बेमानी गुमनाम-शहादतों के उदाहरण भरे पड़े हैं। खुफिया एजेंसियों के अफसर ही यह कहते हैं कि पाकिस्तान या अन्य देशों में तैनात 'रॉ' एजेंट के प्रति आंखें मूंदने वाली सरकार भारत में रह रहे उनके परिवार वालों को लावारिस क्यों छोड़ देती है, यह बात समझ में नहीं आती। ऐसे में देश का कोई युवक 'रॉ' जैसी खुफिया एजेंसी के लिए काम करने के बारे में क्यों सोचे? पंडित जी को 'रॉ' के टैलेंट फाइंडर जीतेंद्रनाथ सिंह परिहार ने चुना था।

एक साल की ट्रेनिंग के बाद पंडित जी को जनवरी 2011 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर मोहनपुर पोस्ट से 'लॉन्च' किया गया ,पंडित कजी के साथ एक गाइड भी था जो उन्हें पाकिस्तान के पल्लो गांव होते हुए बम्बावली-रावी-बेदियान नहर पार करा कर लाहौर ले गया और उन्हें वहां छोड़ कर चला गया. उसके बाद से दी का जासूसी करने का सारा रोमांच त्रासद-कथा में तब्दील होता चला गया,23 जनवरी 2014 को सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर से गिरफ्तार किए जाने तक पंडित जी ने जासूसी के तमाम पापड़ बेले, खोमचे घसीटे, लाहौर, कराची, मुल्तान, हैदराबाद, पेशावर जैसे तमाम शहरों में आला सैन्य अफसरों से लेकर बड़े नेताओं की जासूसी की और दुबई, कुवैत, कतर, हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर जैसी जगहों पर बैठे 'रॉ' अफसरों के जरिए भारत तक सूचना पहुंचाई।

'रॉ' ने हैदराबाद के आमिर आलम के जरिए पंडित जी को अफगानिस्तान भी भेजा जहां जलालाबाद और कुनर में उन्हें अहले हदीस के चीफ शेख जमीलुर रहमान के साथ अटैच किया गया। वहां के सम्पर्कों के जरिए पंडित जी पेशावर में डेरा जमाए अरब मुजाहिदीन के सेंटर बैतुल अंसार पहुंच गए और जेहादी के रूप में ग्रुप में शामिल हो गए।  बैतुल अंसार पर ओसामा बिन लादेन और शेख अब्दुर्रहमान जैसे आतंकी सरगना पहुंचते थे और सेंटर को काफी धन देते थे। 23 जनवरी 2014 को पंडित जी को सिंध प्रांत के हैदराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पंडित की यंत्रणा-यात्रा शुरू हुई, पहले उन्हें हैदराबाद में आईएसआई के लॉकअप में रखा गया फिर उन्हें मिलिट्री इंटेलिजेंस की 302वीं बटालियन में शिफ्ट कर दिया गया, हैदराबाद से उन्हें मिलिट्री इंटेलिजेंस की दूसरी कोर के कराची स्थित मुख्यालय भेजा गया।

पूछताछ के दौरान पंडित को बर्बर यातनाएं दी जाती रहीं. पिटाई के अलावा उन्हें सीधा बांध कर नौ-नौ घंटे खड़ा रखा जाता था और कई-कई रात सोने नहीं दिया जाता था, करीब एक साल तक उन्हें इसी तरह अलग-अलग फौजी ठिकानों पर टॉर्चर किया जाता रहा और पूछताछ होती रही। इस दरम्यान पंडित जी के हबीब बैंक के हैदराबाद और मुल्तान ब्रांच के अकाउंट भी जब्त कर लिए गए और उसमें जमा होने वाले धन के स्रोतों की गहराई से छानबीन की गई। 21 दिसम्बर को उन्हें कराची जेल शिफ्ट कर दिया गया। पांच महीने बाद जून पंडित जी पर पाकिस्तानी सेना की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ और उन्हें कराची जेल से 85वीं एसएंडटी कोर (सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट कोर) को हैंड-ओवर कर दिया गया.

इस दरम्यान पंडित जी को पाक सेना की 44वीं फ्रंटियर फोर्स (एफएफ) के क्वार्टर-गार्ड में बंद रखा गया, वर्ष 2015 में पंडित जी 21वीं आर्मर्ड ब्रिगेड के हवाले हुए और उन्हें 51-लांसर्स के क्वार्टर-गार्ड में शिफ्ट किया गया। इस बीच मेजर नसीम खान, मेजर सलीम खान, लेफ्टिनेंट कर्नल हमीदुल्ला खान और ब्रिगेडियर रुस्तम दारा की फौजी अदालतों में मुकदमा (कोर्ट मार्शल) चलता रहा। पंडित जी कहते हैं कि कोई कबूलदारी और सबूत न होने के कारण पाकिस्तान सेना ने उन्हें सिंध सरकार के सिविल प्रशासन के हवाले कर दिया।

सिंध सरकार ने वर्ष 2015 में ही पंडित जी को भारत वापस भेजने (रिपैट्रिएट करने) का आदेश दे दिया था, लेकिन वह 1 साल तक कानूनी चक्करों में फंसता-निकलता आखिरकार मार्च 2016 में तामील हो पाया, पंडित जी को 22 मार्च 2016 को बाघा बॉर्डर पर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सुपुर्द कर दिया गया. 'रॉ' के मिशन पर पाकिस्तान में 4 वर्ष बिताने वाले पंडित जी 1  साल से अधिक समय तक जेल में बंद रहे, भारत लौटने पर भारत सरकार के एक नुमाइंदे ने उन्हें दो किश्तों में एक लाख 36 हजार रुपए दिए और उसके बाद फाइल क्लोज कर दी।

'रॉ' के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए नौसेना कमांडर कुलभूषण जाधव का पहला मामला है जब केंद्र सरकार ने उनकी रिहाई के लिए पुरजोर तरीके से आवाज उठाई और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक गुहार लगाई, लेकिन इसके पहले मेजर रवींद्र कौशिक से लेकर सरबजीत सिंह और सरबजीत से लेकर तमाम नाम, अनाम और गुमनाम जासूसों की हिफाजत के लिए भारत सरकार ने आज तक कोई कदम नहीं उठाया। कुलभूषण जाधव का मसला ही अलग है।

उन्हें तो तालिबानों ने ईरान सीमा से अगवा किया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथों बेच डाला। जर्मन राजनयिक गुंटर मुलैक अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इसे उजागर कर चुके हैं। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद सरबजीत की रिहाई के मसले में भी सामाजिक-राजनीतिक शोर तो खूब मचा लेकिन भारत सरकार ने कोई कारगर दबाव नहीं बनाया। आखिरकार, दूसरे पाकिस्तानी कैदियों को उकसा कर कोट लखपत जेल में ही सरबजीत सिंह की हत्या करा दी गई।

पाकिस्तान में मिशन पूरा कर या जेल की सजा काट कर वापस लौटे कई 'रॉ' एजेंटों ने केंद्र सरकार से औपचारिक तौर पर आर्थिक संरक्षण देने की गुहार लगाई है, लेकिन उस पर कोई सुनवाई नहीं की गई। यहां तक कि भारत सरकार ने उन्हें सरकारी कर्मचारी मानने से ही इन्कार कर दिया। सरकार ने अपने पूर्व 'रॉ' एजेंटों को पहचाना ही नहीं। ऐसे ही 'रॉ' एजेंटों में गुरदासपुर के खैरा कलां गांव के रहने वाले करामत राही शामिल हैं, जिन्हें वर्ष 1980 में पाकिस्तान 'लॉन्च' किया गया था।

पहली बार वे अपना मिशन पूरा कर वापस लौट आए, लेकिन 'रॉ' ने उन्हें 1983 में फिर पाकिस्तान भेज दिया। इस बार 1988 में वे मीनार ए पाकिस्तान के नजदीक गिरफ्तार कर लिए गए। करामत 18 साल जेल काटने के बाद वर्ष 2005 में वापस लौट पाए। करामत की रिहाई भी पंजाब के उस समय भी मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह के हस्तक्षेप और अथक प्रयास से संभव हो पाई। देश वापस लौटने के बाद करामत ने 'रॉ' मुख्यालय से सम्पर्क साधा, लेकिन 'रॉ' मुख्यालय के आला अफसरों ने धमकी देकर करामत को खामोश कर दिया। भारत सरकार की इस आपराधिक अनदेखी के खिलाफ करामत ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली, लेकिन अदालत भी कहां 'नीचा' सुनती है!

इन मामलों में सम्बन्धित राज्य सरकारें भी 'रॉ' एजेंटों के प्रति आपराधिक उपेक्षा का ही भाव रखती हैं. 'रॉ' एजेंट कश्मीर सिंह का मामला अपवाद की तरह सामने आया जब 35 साल पाकिस्तानी जेल की सजा काट कर लौटने के बाद पंजाब सरकार ने उन्हें जमीन दी और मुआवजा दिया. वर्ष 1962 से लेकर 1966 तक कश्मीर सिंह सेना की नौकरी में थे. उसके बाद 'रॉ' ने उन्हें अपने काम के लिए चुना और पाकिस्तान 'लॉन्च' कर दिया. 1973 में वे पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में घुमाया जाता रहा और प्रताड़ित किया जाता रहा. 17 साल तक उन्हें एक एकांत सेल में बंद रखा गया. चार मार्च 2008 को वे रिहा होकर भारत आए, लेकिन इस लंबे अंतराल में कश्मीर सिंह जिंदगी से नहीं, पर उम्र से शहीद हो चुके थे.

गुरदास के डडवाईँ गांव के रहने वाले सुनील मसीह दो फरवरी 1999 को पाकिस्तान के शकरगढ़ में गिरफ्तार किए गए थे. आठ साल के भीषण अत्याचार के बाद वर्ष 2006 में वे अत्यंत गंभीर हालत में भारत वापस लौटे, लेकिन केंद्र सरकार ने उनके बारे में कोई ख्याल नहीं किया. उन्हीं के गांव डडवाईं के डैनियल उर्फ बहादुर भी पाकिस्तानी रेंजरों द्वारा 1993 में गिरफ्तार किए गए थे. चार साल की सजा काट कर वापस लौटे. अब पूर्व 'रॉ' एजेंट डैनियल रिक्शा चला कर अपना गुजारा करते हैं. पाकिस्तान की जेल में तकरीबन तीन दशक काटने के बाद छूट कर भारत आने वाले पूर्व 'रॉ' एजेंटों में सुरजीत सिंह का नाम भी शामिल है. 'रॉ' ने सुरजीत सिंह को वर्ष 1981 में पाकिस्तान 'लॉन्च' किया था. वे 1985 में गिरफ्तार किए गए और पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी करने के आरोप में उन्हें फांसी की सजा दी गई. 1989 में उनकी सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई.

वर्ष 2012 में पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से सजा काटने के बाद सुरजीत रिहा हुए. सुरजीत ने भी 'रॉ' के अधिकारियों से सम्पर्क साधा लेकिन नाकाम रहे. सुरजीत अपनी पत्नी को यह बोल कर पाकिस्तान गए थे कि वे जल्दी लौटेंगे लेकिन 1981 के गए हुए 2012 में वापस लौटे. जब लौटे तब वे 70 साल के हो चुके थे. भारत सरकार ने उनके वजूद को इन्कार कर दिया, जबकि वापस लौटने पर सुरजीत ने पूछा कि भारत सरकार ने उन्हें पाकिस्तान नहीं भेजा तो वे अपनी मर्जी से पाकिस्तान कैसे और क्यों चले गए? सुरजीत मिशन के दरम्यान 85 बार पाकिस्तान गए और आए.

पाकिस्तान में गिरफ्तार हो जाने के बाद भारतीय सेना की तरफ से उनके परिवार को हर महीने डेढ़ सौ रुपए दिए जाते थे. सुरजीत पूछते हैं कि अगर वे लावारिस ही थे तो सेना उनके घर पैसे क्यों भेज रही थी? सुरजीत ने भी न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट में शरण ले रखी है. गुरदासपुर जिले के डडवाईं गांव के ही रहने वाले सतपाल को वर्ष 1999 में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था. तब भारत पाकिस्तान के बीच करगिल युद्ध चल रहा था.

पाकिस्तान में सतपाल को भीषण यातनाएं दी गईं. पाकिस्तान की जेल में ही वर्ष 2000 में उनकी मौत हो गई. विडंबना यह है कि पाकिस्तान सरकार ने सतपाल का पार्थिव शरीर भारत को सौंपने की पेशकश की तो भारत सरकार ने शव लेने तक से मना कर दिया. सतपाल का शव लाहौर अस्पताल के शवगृह में पड़ा रहा. पंजाब में स्थानीय स्तर पर काफी बावेला मचने के बाद सतपाल का शव मंगवाया जा सका. शव पर प्रताड़ना के गहरे घाव और चोट के निशान मौजूद थे. तब भी भारत सरकार को उनकी शहादत की कीमत समझ में नहीं आई. सतपाल के बेटे सुरेंदर पाल आज भी अपने पिता के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं. पंजाब सरकार ने सतपाल के बेटे सुरेंदर पाल को सरकारी नौकरी का आश्वासन भी दिया, लेकिन यह आश्वासन भी ढाक के तीन पात ही साबित हुआ.

विनोद साहनी को 1977 में पाकिस्तान भेजा गया था, लेकिन वे जल्दी ही पाकिस्तानी तंत्र के हाथों दबोच लिए गए. उन्हें 11 साल की सजा मिली. सजा काटने के बाद विनोद 1988 में वापस लौटे. 'रॉ' ने विनोद को सरकारी नौकरी देने और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन दिया था, लेकिन लौटने के बाद 'रॉ' ने उन्हें पहचानने से भी इन्कार कर दिया. विनोद अब जम्मू में 'पूर्व जासूस' नामकी एक संस्था चलाते हैं और तमाम पूर्व जासूसों को जोड़ने का जतन करते रहते हैं.

रामराज ने 18 साल तक भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ' की सेवा की. 18 सितम्बर 2004 को उन्हें पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया. करीब आठ साल जेल काटने के बाद रिहा हुए रामराज को भारत आने पर उसी खुफिया एजेंसी ने पहचानने से इन्कार कर दिया. ऐसा ही हाल गुरबक्श राम का भी हुआ. एक साल की ट्रेनिंग देकर उन्हें वर्ष 1988 को पाकिस्तान भेजा गया था. उनका मिशन पाकिस्तान की सैन्य युनिट के आयुध भंडार की जानकारियां हासिल करना था. मिशन पूरा कर वापस लौट रहे गुरबक्श को पाकिस्तानी सेना के गोपनीय दस्तावेजों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया.

उन्हें सियालकोट की गोरा जेल में रखा गया. 14 साल की सजा काट कर वर्ष 2006 में वापस अपने देश लौटे गुरबक्श को अब सरकार नहीं पहचानती. रामप्रकाश को प्रोफेशनल फोटोग्राफर के रूप में 'रॉ' ने वर्ष 1994 में पाकिस्तान में 'प्लांट' किया था. 13 जून 1997 को भारत वापस आते समय रामप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया गया. सियालकोट की जेल में नजरबंद रख कर उनसे एक साल तक पूछताछ की जाती रही. वर्ष 1998 में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई.

सजा काटने के बाद सात जुलाई 2008 को उन्हें भारत भेज दिया गया. सूरम सिंह तो 1974 में सीमा पार करते समय ही धर लिए गए थे. उनसे भी सियालकोट की गोरा जेल में चार महीने तक पूछताछ होती रही और 13 साल सात महीने पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में प्रताड़ित होने के बाद आखिरकार वे 1988 में रिहा होकर भारत आए. बलबीर सिंह को 1971 में पकिस्तान भेजा गया था. 1974 में बलबीर गिरफ्तार कर लिए गए और 12 साल की जेल की सजा काटने के बाद 1986 में भारत वापस लौटे. भारत आने के बाद उन्हें जब 'रॉ' से कोई मदद नहीं मिली तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया. दिल्ली हाईकोर्ट ने मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन 'रॉ' ने हाईकोर्ट के आदेश पर भी कोई कार्रवाई नहीं की.

'रॉ' एजेंट देवुत को पाकिस्तान की जेल में इतना प्रताड़ित किया गया कि वे लकवाग्रस्त हो गए. देवुत को 1990 में पाकिस्तान भेजा गया था. जेल की सजा काटने के बाद वे 23 दिसम्बर 2006 को लकवाग्रस्त हालत में रिहा हुए. लकवाग्रस्त केंद्र सरकार ने भी उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और उनकी पत्नी वीणा न्याय के लिए दरवाजे-दरवाजे सिर टकरा रही हैं और मत्था टेक रही हैं. 'रॉ' ने तिलकराज को भी पाकिस्तान 'लॉन्च' किया था, लेकिन उसका कोई पता ही नहीं चला.

'रॉ' ने भी पाकिस्तान में गुम हुए तिलकराज को खोजने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. तिलकराज के वयोवृद्ध पिता रामचंद्र आज भी अपने बेटे के वापस लौटने का इंतजार कर रहे हैं. 'रॉ' ने इसी तरह ओमप्रकाश को भी वर्ष 1988 में पाकिस्तान भेजा, लेकिन ओमप्रकाश का फिर कुछ पता नहीं चला. कुछ दस्तावेजों और कुछ कैदियों की खतो-किताबत से ओमप्रकाश के घर वालों को उनके पाकिस्तान की जेल में होने का सुराग मिला. इसे 'रॉ' को दिया भी गया, लेकिन 'रॉ' ने कोई रुचि नहीं ली. बाद में ओमप्रकाश ने अपने परिवार वालों को चिट्ठी भी लिखी. 14 जुलाई 2012 को लिखे गए ओमप्रकाश के पत्र के बारे में 'रॉ' को भी जानकारी दी गई, लेकिन सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं किया. 'रॉ' एजेंट सुनील भी पाकिस्तान से अपने घर वालों को चिट्ठियां लिख रहे हैं, लेकिन उनकी कोई नहीं सुन रहा.

पाकिस्तानी की सेना में मेजर के ओहदे तक पहुंच गए मेजर नबी अहमद शाकिर उर्फ रवींद्र कौशिक भारत सरकार की बेजा नीतियों और खुफिया एजेंसी 'रॉ' की साजिश के कारण मारे गए. 'रॉ' के अधिकारियों ने सोचे-संमझे इरादे से इनायत मसीह नामके ऐसे 'बेवकूफ' एजेंट को पाकिस्तान भेजा जिसने वहां जाते ही रवींद्र कौशिक का भंडाफोड़ कर दिया. कर्नल रैंक पर तरक्की पाने जा रहे रवींद्र कौशिक उर्फ मेजर नबी अहमद शाकिर गिरफ्तार कर लिए गए.

'रॉ' के सूत्र कहते हैं कि पाकिस्तानी सेना में रवींद्र कौशिक को मिल रही तरक्की और भारत में मिल रही प्रशंसा (उन्हें ब्लैक टाइगर के खिताब से नवाजा गया था) से जले-भुने 'रॉ' अधिकारियों ने षडयंत्र करके कौशिक की हत्या करा दी. कौशिक को पाकिस्तान में भीषण यंत्रणाएं दी गईं. पाकिस्तान की जेल में ही उनकी बेहद दर्दनाक मौत हो गई. भारत सरकार ने कौशिक के परिवार को यह पुरस्कार दिया कि रवींद्र से जुड़े सभी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए और चेतावनी दी कि रवींद्र के मामले में चुप्पी रखी जाए. रवींद्र ने जेल से अपने परिवार को कई चिट्ठियां लिखी थीं.

उन चिट्ठियों में उन पर ढाए जा रहे अत्याचारों का दुखद विवरण होता था. रवींद्र ने अपने विवश पिता से पूछा था कि क्या भारत जैसे देश में कुर्बानी देने वालों को यही सिला मिलता है? राजस्थान के रहने वाले रवींद्र कौशिक लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र थे, जब 'रॉ' के तत्कालीन निदेशक ने खुद उन्हें चुना था. 1965 और 1971 के युद्ध में मार खाए पाकिस्तान के अगले षडयंत्र का पता लगाने के लिए 'रॉ' ने कौशिक को पाकिस्तान भेजा.

कौशिक ने पाकिस्तान में पढ़ाई की. सेना का अफसर बना और तरक्की के पायदान चढ़ता गया. कौशिक की सूचनाएं भारतीय सुरक्षा बलों के लिए बेहद उपयोगी साबित होती रहीं और पाकिस्तान के सारे षडयंत्र नाकाम होते रहे. पहलगाम में भारतीय जवानों द्वारा 50 से अधिक पाक सैनिकों का मारा जाना रवींद्र की सूचना के कारण ही संभव हो पाया. कौशिक की सेवाओं को सम्मान देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें 'ब्लैक टाइगर' की उपाधि दी थी. लेकिन ऐसे सपूत को 'रॉ' ने ही साजिश करके पकड़वा दिया और अंततः उनकी दुखद मौत हो गई.

#विशेष - केंद्रीय खुफिया एजेंसी 'रिसर्च एंड अनालिसिस विंग' (रॉ) में भीषण अराजकता व्याप्त है. 'रॉ' की जिम्मेदारियां (अकाउंटिबिलिटी) कानूनी प्रक्रिया के तहत तय नहीं हैं. एकमात्र प्रधानमंत्री के प्रति उत्तरदायी होने के कारण 'रॉ' के अधिकारी इस विशेषाधिकार का बेजा इस्तेमाल करते हैं और विदेशी एजेंसियों से मनमाने तरीके से सम्पर्क साध कर फायदा उठाते रहते हैं. 'रॉ' के अधिकारियों कर्मचारियों के काम-काज के तौर तरीकों और धन खर्च करने पर अलग से कोई निगरानी नहीं रहती, न उसकी कोई ऑडिट ही होती है.

'रॉ' के अधिकारियों की बार-बार होने वाली विदेश यात्राओं का भी कोई हिसाब नहीं लिया जाता. कौन ले इसका हिसाब? प्रधानमंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार छोड़ कर कोई अन्य अधिकारी 'रॉ' से कुछ पूछने या जलाब-तलब करने की हिमाकत नहीं कर सकता. 'रॉ' के अधिकारी अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड और यूरोपीय देशों में बेतहाशा आते-जाते रहते हैं. लेकिन दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देशों में उनकी आमद-रफ्त काफी कम होती है. जबकि इन देशों में 'रॉ' के अधिकारियों का काम ज्यादा है.

'रॉ' के अधिकारी युवकों को फंसा कर पाकिस्तान जैसे देशों में भेजते हैं और उन्हें मरने के लिए लावारिस छोड़ देते हैं. प्रधानमंत्री भी 'रॉ' से यह नहीं पूछते कि अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे आलीशान देशों में 'रॉ' अधिकारियों की पोस्टिंग अधिक क्यों की जाती है और पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका या अन्य दक्षिण एशियाई देशों या मध्य पूर्व के देशों में जरूरत से भी कम तैनाती क्यों है? इन देशों में 'रॉ' का कोई अधिकारी जाना नहीं चाहता. लेकिन इस अराजकता के बारे में कोई पूछताछ नहीं होती. 'रॉ' में सामान्य स्तर के कर्मचारियों की होने वाली नियुक्तियों की कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है.

कोई निगरानी नहीं है. 'रॉ' के कर्मचारियों का सर्वेक्षण करें तो अधिकारियों के नाते-रिश्तेदारों की वहां भीड़ जमा है. सब अधिकारी अपने-अपने रिश्तेदारों के संरक्षण में लगे रहते हैं. तबादलों और तैनातियों पर अफसरों के हित हावी हैं. यही वजह है कि जिस खुफिया एजेंसी को सबसे अधिक पेशेवर (प्रोफेशनल) होना चाहिए था, वह सबसे अधिक लचर साबित हो रही है.
'रॉ' में सीआईए वह कुछ अन्य विदेशी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ भी गंभीर चिंता का विषय है.

'रॉ' के डायरेक्टर तक सीआईए के लिए जासूसी करने के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं. इसी तरह एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जिसे आईबी का निदेशक बनाया जा रहा था, उसके बारे में पता चला कि वह दिल्ली में तैनात महिला सीआईए अधिकारी हेदी अगस्ट के लिए काम कर रहा था. तब उसे नौकरी से जबरन रिटायर किया गया. भेद खुला कि सीआईए ही उस आईपीएस अधिकारी को आईबी का निदेशक बनाने के लिए परोक्ष रूप से लॉबिंग कर रही थी. 'रॉ' में गद्दारों की लंबी कतार लगी है. 'रॉ' के दक्षिण-पूर्वी एशिया मसलों के प्रभारी व संयुक्त सचिव स्तर के आला अफसर मेजर रविंदर सिंह का सीआईए के लिए काम करना और सीआईए की साजिश से फरार हो जाना भारत सरकार को पहले ही काफी शर्मिंदा कर चुका है.

रविंदर सिंह जिस समय 'रॉ' के कवर में सीआईए के लिए क्रॉस-एजेंट के बतौर काम कर रहा था, उस समय भी केंद्र में भाजपा की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. वर्ष 2004 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार आने के बाद रविंदर सिंह भारत छोड़ कर भाग गया. अराजकता का चरम यह है कि उसकी फरारी के दो साल बाद नवम्बर 2006 में 'रॉ' ने एफआईआर दर्ज करने की जहमत उठाई.

मेजर रविंदर सिंह की फरारी का रहस्य ढूंढ़ने में 'रॉ' को आधिकारिक तौर पर आजतक कोई सुराग नहीं मिल पाया. जबकि 'रॉ' के ही अफसर अमर भूषण ने बाद में यह रहस्य खोला कि मेजर रविंदर सिंह और उसकी पत्नी परमिंदर कौर सात मई 2004 को राजपाल प्रसाद शर्मा और दीपा कुमारी शर्मा के छद्म नामों से फरार हो गए थे. उनकी फरारी के लिए सीआईए ने सात अप्रैल 2004 को इन छद्म नामों से अमेरिकी पासपोर्ट जारी कराया था.

इसमें रविंदर सिंह को राजपाल शर्मा के नाम से दिए गए अमेरिकी पासपोर्ट का नंबर 017384251 था. सीआईए की मदद से दोनों पहले नेपालगंज गए और वहां से काठमांडू पहुंचे. काठमांडू में अमेरिकी दूतावास में तैनात फर्स्ट सेक्रेटरी डेविड वास्ला ने उन्हें बाकायदा रिसीव किया. काठमांडू के त्रिभुवन हवाई अड्डे से दोनों ने ऑस्ट्रेलियन एयरलाइंस की फ्लाइट (5032) पकड़ी और वाशिंगटन पहुंचे, जहां डल्स इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सीआईए एजेंट पैट्रिक बर्न्स ने दोनों की अगवानी की उन्हें मैरीलैंड पहुंचाया.

मैरीलैंड के एकांत आवास में रहते हुए ही फर्जी नामों से उन्हें अमेरिका के नागरिक होने के दस्तावेज दिए गए, उसके बाद से वे गायब हैं. पीएमओ ने रविंदर सिंह के बारे में पता लगाने के लिए 'रॉ' से बार-बार कहा लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला, जबकि 'रॉ' प्रधानमंत्री के तहत ही आता है. इस मसले में 'रॉ' ने कई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के निर्देशों को भी ठेंगे पर रखा. रविंदर सिंह प्रकरण खुलने पर 'रॉ' के कई अन्य अधिकारियों की भी पोल खुल जाएगी, इस वजह से 'रॉ' ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया.

विदेशी एजेंसियों के लिए क्रॉस एजेंसी करने और अपने देश से गद्दारी करने वाले ऐसे कई 'रॉ' अधिकारी हैं, जो पकड़े जाने के डर से या प्रलोभन से देश छोड़ कर भाग गए. मेजर रविंदर सिंह जैसे गद्दार अकेले नहीं हैं. 'रॉ' के संस्थापक रहे रामनाथ काव का खास सिकंदर लाल मलिक जब अमेरिका में तैनात था तो वहीं से लापता हो गया. सिकंदर लाल मलिक का आज तक पता नहीं चला. मलिक को 'रॉ' के कई खुफिया प्लान की जानकारी थी.

बांग्लादेश को मुक्त कराने की रणनीति की फाइल सिकंदर लाल मलिक के पास ही थी, जिसे उसने अमेरिका को लीक कर दिया था. मलिक की उस कार्रवाई को विदेश मामलों के विशेषज्ञ एक तरह की तख्ता पलट की कोशिश बताते हैं, जिसे इंदिरा गांधी ने अपनी बुद्धिमानी और कूटनीतिक सझ-बूझ से काबू कर लिया.

मंगोलिया के उलान बटोर और फिर इरान के खुर्रमशहर में तैनात रहे 'रॉ' अधिकारी अशोक साठे ने तो अपने देश के साथ निकृष्टता की इंतिहा ही कर दी. साठे ने खुर्रमशहर स्थित 'रॉ' के दफ्तर को ही फूंक डाला और सारे महत्वपूर्ण और संवेदनशील दस्तावेज आग के हवाले कर अमेरिका भाग गया. विदेश मंत्रालय को जानकारी है कि साठे कैलिफोर्निया में रहता है, लेकिन 'रॉ' उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया. 'रॉ' के सीनियर फील्ड अफसर एमएस सहगल का नाम भी 'रॉ' के भगेड़ुओं में अव्वल है.

लंदन में तैनाती के समय ही सहगल वहां से फरार हो गया. टोकियो में भारतीय दूतावास में तैनात 'रॉ' अफसर एनवाई भास्कर सीआईए के लिए क्रॉस एजेंट का काम कर रहा था. वहीं से वह फरार हो गया. काठमांडू में सीनियर फील्ड अफसर के रूप में तैनात 'रॉ' अधिकारी बीआर बच्चर को एक खास ऑपरेशन के सिलसिले में लंदन भेजा गया, लेकिन वह वहीं से लापता हो गया. बच्चर भी क्रॉस एजेंट का काम कर रहा था. 'रॉ' मुख्यालय में पाकिस्तान डेस्क पर अंडर सेक्रेटरी के रूप में तैनात मेजर आरएस सोनी भी मेजर रविंदर सिंह की तरह पहले सेना में था, बाद में 'रॉ' में आ गया.

मेजर सोनी कनाडा भाग गया. 'रॉ' में व्याप्त अराजकता का हाल यह है कि मेजर सोनी की फरारी के बाद भी कई महीनों तक लगातार उसके अकाउंट में उसका वेतन जाता रहा. इस्लामाबाद, बैंगकॉक, कनाडा में 'रॉ' के लिए तैनात आईपीएस अधिकारी शमशेर सिंह भी भाग कर कनाडा चला गया. इसी तरह 'रॉ' अफसर आर वाधवा भी लंदन से फरार हो गया. केवी उन्नीकृष्णन और माधुरी गुप्ता जैसे उंगलियों पर गिने जाने वाले 'रॉ' अधिकारी हैं, जिन्हें क्रॉस एजेंसी या कहें दूसरे देश के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सका.

पाकिस्तान के भारतीय उच्चायोग में आईएफएस ग्रुप-बी अफसर के पद पर तैनात माधुरी गुप्ता पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी के साथ मिल कर भारत के ही खिलाफ जासूसी करती हुई पकड़ी गई थी. माधुरी गुप्ता को 23 अप्रैल 2010 को गिरफ्तार किया गया था. इसी तरह अर्सा पहले 'रॉ' के अफसर केवी उन्नीकृष्णन को भी गिरफ्तार किया गया था. पकड़े जाने वाले 'रॉ' अफसरों की तादाद कम है, जबकि दूसरे देशों की खुफिया एजेंसी की साठगांठ से देश छोड़ कर भाग जाने वाले 'रॉ' अफसरों की संख्या कहीं अधिक है.

 'जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से हम सब मर-मर के जीते हैं, वो सुबह कभी तो आएगी..! 

अलविदा 🙏🙏

बुधवार, 5 अगस्त 2020

छुटकी प्रिया की राखी पर

#मेरी_छुटकी_नटखट
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मेरी दुलारी पता है ....उस दिन जब तुमने मुझसे रूठते हुए,टेड़ा मुँह करते हुए ....मेरे पत्राचारी व्यवहार की जानकारी पूँछी थी न! उसी दिन तुम्हारे छोटे-छोटे हाथो की बुनी हुई एक भावनात्क डोरी मेने अपनी कलाई में महसूस की थी ।
उसमे सितारे नही थे किंतु चन्द्र ओर उसके साथ आकाश गंगा बिखरे असीम तारागण थे। जो मुझे भावनाओ से अभिभूत कर रहे थे। में नही समझता कि तुमसे बंधी हुई ऐसी कोनसी डोर है जो मुझसे कोई भी भेद छिपने नही देती है और वह भी इतनी सहजता से की में स्वम से साझा करने में संकोच करता हूं ।

तुम्हारा रोज-रोज पूछना की "स्पीडपोस्ट आई क्या दद्दा!" 
मुझसे कंही न कही मेरी ही तरह 'बिलम्बित गति' प्रतिदिन प्रश्न करती है.....की तुझसे तेरी यह प्रकृति कहि दूर जा रही है और किसी के निश्छल स्नेह में सबकुछ समयनुसार होने बाला है....!
मुझे नही पता कि तुमसे कब मिलूंगा ओर कब तुम्हारे भाग्यशाली चरण स्पर्श कर सकूंगा ?
किन्तु इतना अवश्य जान गया हूं कि, तुम मेरे जीवन मे नया सौभाग्य लेकर आई हो ।

तुम्हे बता दु की में जब जॉब अथवा स्टडी लाइफ में रहा ...रक्षाबन्धन को घर नही आता था। क्योंकि मुझे पता है कलाई पर धागे अनन्त बंध जाए फिर भी किसी छुटकी या बड़की के साथ अपने हृदय के भाव साझा नही कर पाया वह तुमने सहज ही जान लिए ।

तुम्हारी भेजे हुए धागे तो में उसी दिन से बंधे समझ रहा हूं, जब तुमने मेरे नाम की यह राखी रजिस्टर्ड की होगी। वह देर आये...अबेर आये कोई फर्क नही क्योंकि में कलाई त्योहार उपरांत राखी वर्ष भर बांधे रखता हूं....ठीक मोली की तरह ! जो मुझे पल-पल मेरे कर्तव्यों के निर्वहन (क्षत्रियत्व)का स्मरण कराती रहती है !
वर्षो से एक सपना था कि कोई मेरे कहे बगेर मुझे एक धागा देकर उस डोर से बांध दे...जिसकी आजन्म से रिक्तता है। एक अनजाना अधिकार कहि सुप्त था जो सहसा जागृत हो गया ।

हमे नही याद कब मिले ...पर न जाने क्यों तुझे कांधे बिठा सारा संसार घुमाके अर्पित कर देने की एक लालसा  जागृत है। कहि न कही तुम्हारे टेढ़े-मेढे गुस्से बाले मुह की शैतानी अलग ही बात्सल्य जागृत करता है। सोचता हूं जब तुमसे मिलूंगा कहि खुशी में हार्टफेल न कर बैठु !

छुटकी तुम चिंतित मत होना तुम्हारा स्नेह सूत्र मेरे पास ही है और तुम्हारा भैया यथार्त के साथ कल्पनाओ में भी उतना ही विश्ववास करता है। जब मिलु अपनी सभी शिकायते दिनभर सुनाना ओर शाम को बड़ी दादी की तरह सब भूलकर खाना में देरी के लिए झिड़की देना ....में चाहता ही हु की तुम बस रूठी रहो और में चिढ़ाता रहुँ ....मनाता रहु...यू ही युगों तक .....जन्मजन्मातर ...तुम्हारे स्नेहबन्धन  के कर से कभी करमुक्त न हो संकु..!!

तुम्हारी 'आईएएस' सफल होने की प्रशन्नता में नाचने को आतुर तुम्हारा भैया ...

मेरे इस तुक्ष्य जीवन मे अवतरीत उन सभी बहिनो का सात जन्मों तक ऋणी हु, जिन्होंने मेरी कलाई कभी सुनी नही रहने दी ❤️❤️❤️🙏

कुँ. जितेंद्र सिंह तोमर "   "
चम्बल मुरैना मप्र "तँवरघार"

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

भूपत सिंह चौहान 'बागनिया'

कुछ अपराधियो की कहानिया बड़ी फ़िल्मी सी लगती है। कथानक के प्रथम भाग में वही खलनायक,नायक जैसा प्रतीत होता हे और मध्य में अतिक्रूर खलनायक से चलकर अंततः पुनः संवेदनाओ का पात्र बन जाता हे ।
दरअसल ऐसी हजारो कहानिया हे,जिन्होनो भावतिरेक में रास्ते तो गलत चुन लिए और जब उन्हें अहसास हुआ तो बापसी की राह सिर्फ मृत्यु ही बाकी थी। कुछ ऐसी ही कहानी हे भूपत सिंह वागनिया की ....!!

गुजरात के काठियावाड़ का वो लड़का जिसका नाम था भूपत सिंह चौहान 'वागनिया' दरबार में घोड़ों की देखभाल का काम किया करता था। बहुत कम उम्र से ही घोड़ों की दौड़ में उनके साथ भाग-भाग कर भूपत की कद काठी निखर आई थी। इसके अलावा वागनिया के राजा अमरावाल के साथ शिकार पर जाने के कारण भूपत  बंदूक चलाना भी सीख लिया था। कहते हे की प्रकृति आगामी भविष्य की दुर्गमताओ के लिए मानव को पूर्व से प्रशिक्षित करती हे और ऐसा लग रहा था मानो नियति उसके कल के लिए उससे सारी तैयारी करवा रही हो ।
जीवन सामान्य चल रहा था कि तभी भूपत के मालिक ने आत्महत्या कर ली.....!इसके साथ ही वागनिया दरबार पर 9 लाख की चोरी का इल्ज़ाम भी लग गया! जिसमें भूपत और उसके मालिक के खिलाफ वारंट जारी हो चुके थे....।
भूपत ये समझ गया था कि इस झूठे इल्जाम में फंसा कर उसे जेल में डाल दिया जाएगा ।
इसी उधेड़ बुन के बीच उसकी मुलाकात उसके दोस्त राणा भगवान सिंग डांगर से हुई....राणा के परिवार के साथ पहले ही अनहोनी हो चुकी थी....उसकी बहन की आबरू लूट ली गयी थी तथा उसके पिता को मौत के घाट उतार दिया गया था....!

राणा के सिर पर खून सवार था,उसे किसी हाल में भी अपने दुश्मन से बदला लेना था और भूपत के लिए अब दोस्त का बदला उसका अपना बदला हो चुका था। बस फिर क्या था उस बदले के लिए भूपत ने अपने जीवन का पहला कत्ल किया और इसी के साथ राणा और भूपत ने गैंग बना ली....!

दो लोगों से बनी ये गैंग देखते देखते 42 डाकुओं के गिरोह में बदल गयी। अब हर तरफ भूपत डाकू के चर्चे होने लगे. 87 हत्याओं के साथ 8 लाख 40 हजार की लूट भूपत और उसकी गैंग के नाम दर्ज हो गयी....! अभियोजन पहला था किन्तु भूपत-भगवान की यह जोड़ी सौराष्ट्र प्रान्त में अपराधो का जैसा पहाड़ खड़ा करना चाहते थे ।

भूपत ज्यों ज्यों पुलिस के आंख की किरकिरी बन रहा था, त्यों त्यों आम लोगों के बीच उसकी जयकार हो रही थी.....इसका प्रमुख कारण था आम लोगों के प्रति भूपत की अच्छाई। भूपत पर कभी किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार का आरोप नहीं लगा....उल्टा उसने कई गरीब लड़कियों की शादी करवाई और अपने लूट के माल में से दोनों हाथ खोल कर गरीबों में धन बांटा...!

कहा तो यहां तक जाता है कि एक बार भूपत डाकू ने एक सुनार की दुकान लूटी.... उस लूट में जितने सोने चांदी के सिक्के थे भूपन ने वे सब उछालने शुरु कर दिए जिससे गरीब लोग उसे उठा सकें। यही कारण था कि भूपत कभी पुलिस के हाथ नहीं आया क्योंकि उसे हर घर में शरण मिल जाती थी ।
भले ही भूपत बहुत चालाक था लेकिन कहते हैं ना कि एक दिन घड़ा सबका भरता हे और  अंत सबका आता है। भूपत के आतंक का भी अंत हुआ.....भगवान के साथ लगभग पूरा गैंग ढेर हो गया लेकिन भूपत पुलिस के हाथ ना आया क्योंकि वो सरहद पार कर पाकिस्तान चला गया....।

यहां उसे अवैध रूप से सरहद पार करने के जुर्म में एक साल की कैद तथा 100 रुपये जर्माने की सजा हुई। भूपत ने सोचा कि वह फिर से अपने देश लौट जाएगा मगर ऐसा ना हो सका,उसे पाकिस्तान से दोबारा भारत ना लौटने दिया गया...!

आखिरकार भूपत सिंह चौहान ने यहां अपना धर्म परिवर्तन कर लिया तथा बन गया अमीन यूसुफ. यहीं उसने एक मुस्लिम लड़की से शादी भी की तथा 2006 में पाकिस्तान की धरती पर ही दम तोड़ दिया ।

भूपत सिंह के जीवन पर 'एक हतो भूपत' 'भूपत एक विलक्षण गुन्हेगार' तथा 'डाकू भूपत सिंह' जैसी कई किताबें भी लिखी गयीं.....।

(चित्र गूगल चचा की जेब से उधार)
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 25 मार्च 2020

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                  भाग-97
        ◆रमेश राजावत◆

अंम्वाह टी आई रोज की तरह अपने ऑफिस पहुचे ही थे की महुआ सब स्टेसन SI पांडे का खरखराता स्वर वायरलेस रिसीवर की पिंग पिंग करती हल्की ध्वनि पर संगीत छेड़ रहा था....".सर आई हेव एम्बुस्ड द ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
     भाग-97
◆रमेश राजावत◆

अंम्वाह टी आई रोज की तरह अपने ऑफिस पहुचे ही थे की महुआ सब स्टेसन SI पांडे का खरखराता स्वर वायरलेस रिसीवर की पिंग पिंग करती हल्की ध्वनि पर संगीत छेड़ रहा था....".सर आई हेव एम्बुस्ड द टेरेबल ऑफ़ चम्बल रमेश...आई हेव वांट टू बेक आप फोर्सेस इमिडेडली इन विलेज गोहदुपुरा फार्महाउस ऑफ़ मुखिया ...ऑवर!!"

रोजमर्रा की फाइल्स में सर झुकाये इंस्पेक्टर ने आनन-फानन में  ऑफ़ चम्बल रमेश...आई हेव वांट टू बेक आप फोर्सेस इमिडेडली इन विलेज गोहदुपुरा फार्महाउस ऑफ़ मुखिया ...ऑवर!!"
आनन-फानन में 25 लोगो की टीम गठित की गयी और बात तत्कालीन आईपीएस चम्बल रेंज विजयकुमार  सूचित की गयी ...दलबल और दलबल की कांनवाय जेसी उड़ चली पिनाहट रोड की धूल के गुब्बार यथा स्थिति बखूबी वयाँ कर रहे थे की मामला कितना महत्वपूर्ण हे ।

उसैदपूरा 'तंवरघार उ.मा. विद्यालय' के तिराहे पर अगर बागी/डाकुओ की लाशो की कोई गणना करने बाला होता तो सम्भवतः अपने आप में इस क्षेत्र की कुख्याती का कीर्तमान बन जाता किन्तु क्रोध-दहसत,प्रतिशोध और धूर्तता से बाहर आकर किसी ने नही देखा ट्रेक्टर से ज़िंदा घसीट कर ले जाते हुए फुला डाकू की उधडी हुई चमड़ी को और उसे घसीट कर ले जा रहे उसी के परम् मित्र रघुनन्दन शर्मा थानेदार को .....यंहा लाशो सुरक्षित रखने के लिए 'फॉर्मलीन' नही मिलती थी और मरे हुए शरीर को नीम के झोंरो(पत्तो) में रखा जाता था फिर चाहे शरीर कर्तव्य की वलिवेदि पर गोली खाये किसी खाकसार हुए खाकी का हो या बदले की भावना में बीहड़ कूड़े बागी अथवा डकेत का हो ....!
चम्बल के हजारो किस्से हे कुछ मेरे हिस्से हे तो कुछ आपके हिस्से और रमेश राजावत का किस्सा भी चम्बल की एक चूक का हिस्सा भर हे। जो चम्बल का अभिन्न हिस्सा हे और लुप्त होती स्मर्तियो का एक हिस्सा है ।

जिला भिंड की रौंन तहसील का कछार बाला भाग,जँहा उप्र-मप्र के तीन जनपद जेसे वहति हुई जलराशि के समक्ष परस्पर कलेऊ करने बेठे किसान ....वहति हुई पञ्च संगम हुई नदियो में भले ही कोई  जल का भेद न समझ आये किन्तु बहादुरपुरा निबासी रमेश को अपने घर का टिमटिमाता दिया समझा जाता था...! पढ़ने में कुसाग्र बुद्धि और ग्रामीण चर्या में कसा हुआ मेहनती शरीर जब बहादुर पुरा के ऊँचे नीचे टीलो पर सैना के लिए पसीना बहाता था तो कोई भी कह उठता "अरे जाय रमेशा ऐ देखो, फौज में जायबे को कैसो पगला हे गओ हे !"
रमेश का यही जूनून उसे 12 जून 1988 को ला खड़ा करता हे ग्वालियर स्थिति बाज स्टेडियम बीआरओ भर्ती ग्राउंड में और तीन चक्कर टॉप में पूरा करते-करते रमेश के पाँव में चउथा चक्कर ...ग्राउंड में पड़ी बजरी से घायल होकर इस सरजमी पर पहली बार लहू के निसान अंकित करता हे ...पर कहते हे की जिन्हें जूनून होता हे वह दर्द की परवाह नहीं करते और रमेश जिंदगी की पहली रेस में 48 नम्बर की स्टाम्प कन्धे पर अंकित करता हे ।
पर शायद नियति पर सभी की तरह रमेश का भी वस नही था...मेडिकल एक्जाम्स में अनफिट ठहरा दिया जाता हे। हतास-निरास घर लोट आया और घर पर पड़े CRPF कॉल लेटर की तिथि की प्रतीक्षा करने लगता ...समय ने अपनी गति भी नही बदली और रमेश की किश्मत का द्वतीय अध्याय बदल गया ।
भोपाल स्थिति बंगरसिया भर्ती केंद्र से रमेश को 'एजुकेशन हलबिल्दार' पद पर रिकरियूट कर लिया गया। घर की कच्ची दीवाले पक्की खुशियो के गीत गुंजार करने लगी और घर में वैवाहिक रिश्ते भी आने लगे पर रमेश अभी कहा तैयार था प्रणय की वेदी में बैठने ...उसे प्रतीक्षा थी तमाम रैंक और घर की मुकम्ल ईटो से सजी बैंक का फिर उसे परवाह नही थी कितने ही बंकर बदले जाए और कितने दुश्मन मारे जाए ...!
समय पंख लगाकर उड़ता रहा और स्नातक रमेश एजुकेसन हवलदार से Asi पद की पदोन्नति अपने कोशल और तीक्ष्ण बुद्धि पा गया ...घर की मिटटी की दीवालों पर सीमेंट और ईंट की मजबूती तो जम ही रही थी किन्तु नियति रमेश के लिए अलग ही बुनियाद लिख रही थी ।

वह 11 अप्रैल 1991 की भोर थी जेसे रमेश के जीवन में यह सुभह नही भाद्रपद की अमावश्या की स्याहता थी जब खलिहान में आग लगी या लगाई का पर्दाफास हुए बगैर रमेश के पिताजी को खलिहान में झुझा दिया गया...शरीर से वृद्ध श्री राजावत जी गाँव की प्राथमिक शाला के ब्लॅकबोर्ड पर चॉक चलाया करते थे और सम्माननीय व्यक्ति थे किन्तु जब उनपे लोगो के लट्ठ चले तो वह अंतरयात्रा को चल निकले ...और खुशहाल गाँव में भ्याभ्यता की नीव ऐसी पड़ी जो दशको तक रक्त की शीतलता से भी न बुझ पायी। रमेश की जिंदगी का तीसरा पड़ाव था जब श्मशान के धुएं में बिलीन होती एक शिक्षक की अंतिम कहानी पर उसके बेटे ने अग्नि को साक्षी मान सैनिक जीवन ली सपथ को भुला कर, प्रतिशोध की सपथ लेली ...!!

24 अप्रैल 1991 की वह तेहरवी शायद ही कोई भूल पायेगा जब मृत्युभोज उपरान्त रमेश की राइफल से निकले शीशे ने दो अप्रत्याशित तेहरवियो की मुनादी कर दी और जो ट्रिगर आतंकियों नक्सलियों पर बज्र प्रहार करता था वह चम्बल की वादियो में कहर बनके बरपा !
Crpf का एक असिस्टेंट सव इंपेक्टर की वर्दी पर पैसे से खरीदे हुए दो सितारों में इजाफा ही नही हुआ था वरन रमेश राजावत से 'रमेशा बागी' सफर भी प्रारम्ब हुआ ।
कन्धे और कमर में बंधे बिलडोरिये के कारतूस 315 से एसएलआर में क्या बदले दनादन रमेश के अपराधिक मामले जिले दर जिले बदलते गए ...फिरोतियों की ऐसी बाढ़ आई की एक समय में सेकड़ो बनिए धन स्वतः रमेश को देंने पहुच जाते थे। बड़ी हुई कुख्याति ने रमेश का गैंग भी खड़ा कर दिया जिसमे बड़ी कॉन्थर थाना पोरसा के चैना तोमर जेसे तैराक भी थे ।
में चम्बल में नगरा के लाखन के बाद किसी को किस्मत का धनी समझता हु वह रमेश हे क्योंकि इतनी वारदातो के बाद भी वह बुद्धि और सक्रिय मुखविर तन्त्र के कारण हर बार पुलिस प्रशाशन को चकमा दे जाता और तुरन्त ही कोई बड़ी पकड़ करता। उसने अपनी सैनिक जीवन के अनुभव का बखूबी प्रयोग किया और तावातोड़ अपहरण करके नई ईवारत लिखी ...नए सम्पर्क हुए और अपहरण ऐसा भी हुआ जब औरैया पुलिस अधिकारी की लड़की को ही उठा लिया ...नाम था बबली पांडे !
बबली और रमेश का किस्सा भी बड़ा फ़िल्मी और दिलचस्प रहा हे। अपहृत होकर आई पढ़ी-लिखी बबली बीहड़ो में दौड़ लगाते रमेश के प्रेम में बीहड़ो की ही हो गयी और जब रमेश ने फिरोती उपरान्त उसे घर पहुचाना चाहा तो बबली ने के दो टूक शब्द " महीनो बीहड़ में तेरे साथ रहकर भले ही में अछूती वे पवित्र हूँ लेकिन कौन समाज मुझे स्वीकार करेगा !" सुनकर रमेश पहलीबार हतप्रभ था ।
बागी/ डकैतो की शक्तिपीठ माँ रतनगढ़ बाली पर रमेश-बबली की विधि विधान के साथ वैवाहिक रीती सम्पन्न हुई और कभी कॉलेज की जीनियस रमेश के साथ कारबाइन पर इतिहास लिखने लगी ..!! सम्भवतः चम्बल के किस्सों में यह पहला किस्सा था जब दो स्नातक वैवाहिक बन्धन में बंधकर अपराधो में स्नातकोत्तर कर रहे थे ।

एक बार रमेश और बबली अपनी बिली जीप के साथ आगरा के आर्म कॉन्टेक्ट से एसएलआर और अन्य रायफलों के बुलेट्स लेने क्या पहुचे ..डीलर ने खटीक और मुस्लिम दंगो की बजह चलती पुलिस चेकिंग के कारण डिलेबरी देने की असमर्थता जताई! रुकने का पर्याप्त बंदोबस्त न होने के कारण उसकी जीप वाईपास अछनेरा मार्गपर रुकी और रमेश का सातिर दिमाक ने युक्ति निकाली ...क्यों न पुलिस के हथियार ही ले लिए जाए और दुःसाहस की नई इबारत लिखी गयी ।
दोनों ने अपने अनुभव और पढ़े-लिखे होने का लाभ उठाया और जीप जाकर रुकी अछनेरा चोकी पर ..बातो में ऑफिसर्स का अनुभव और बबली का साथ पुलिस बालो को धता देने में काम आया .....वह जिस पुलिस ऑफिसर रेस्ट हॉउस में रुका वही के कोथ व तैनात सिपाहियो की 8 एसएलआर और कई बॉक्स राउंड लूट लाया ।

रमेस के साहस दुःसाहस का दुसरा किस्सा अम्बाह कस्बे का हे...वह दिन और दिनों तरह होटल 'सुखसागर' कर्मचारियों के लिए सामान्य दिन था जब सुरक्षाबलो जेसी नम्बर प्लेट बाली विली जीप होटल सुखसागर की पार्किंग में खड़ी थी और सैना अफसर की तरह सूटेड-बूटेड रमेश होटल के कमरा नम्बर बीस में द्वतीय तल पर ठहरा था लेकिन लाखो चतुराई भरे प्रयास बाबजूद भी आपकी प्रशिद्धि/कुख्याति आपका चेहरा और नाम आम जनमानस में किसी प्रतिबिम्ब की तरह स्थापित या चस्पा कर देता हे और रमेश की भी पहिचान हो गयी ...होटल में हड़कम्प था और नीचे saf और मप्र पुलिस के चौकस जवान किन्तु कहते हे जब तक आई नही होती बाल-बांका नही होता और रमेश अपनी जान पर खेल गया बालकनी के सहारे निकली अंडर कंट्रक्शन हाइटेसन वायरिंग से दूसरी बिल्डिंग और सामान्य नागरिको की भीड़ बन पुलिस बल को चकमा देकर निकल गया ।

कहते हे की समान जोड़े चिरञ्जीवी नही होते ,यही कुछ रमेश के साथ हुआ भांजे के विवाह बाद रमेश कुछ काम से गाँव गया और पुलिस का नेटवर्क एक्टिव हो गया ...एम्बुस्ड हुआ,फायरिंग हुई ...यंहा पुलिस को जोड़े के रूप में रमेश गैंग की पहली सफलता हाथ लगी ...फायरिंग में बबली और चैना के साथ 3 अन्य पुलिस की गोलियों के शिकार हो गए पर किसी तरह रमेश और अन्य साथी बच निकले जिसमे रमेश बाल्मीकि नामक एक रमेश का विशवस्थ भी था । वह अपने कुछ साथियो के साथ अपने विश्वस्थ शरणप्रदाता गोहदुपुरा मुखिया के यंहा समय निकालने लगा ...उन्ही के दहगांव के पास बने ट्यूबेल की तिवरिया से सारे नेटवर्क को अंडर ग्राउंड करके स्वम अंडर ग्राउंड हो गया किन्तु नियति में जब अंत आता हे और समय बिपरीत होता हे तो सभी चतुराई और बुद्धिमत्ता बिपरीत हो जाती हे और अतिविश्वास के चलते रमेश को व्यूह में घेर लिया गया ।

अम्बाह,नगरा,महुआ की संयुक्त पुलिस पार्टी की धूल जब गोहदुपुरा के खेतो दिखाई तो सभी ने योजनाबद्ध कारीवायी की फलतः तिवरिया पर सेकड़ो राउंड फायर हुए यंहा तक की हेंण्ड ग्रेनेडो उस ट्यूबेल की तिवरिया के साथ रमेश की दुस्साहसिक कहानी भी सदा की तरह चम्बल के भरखो में धुंधली हो गयी ।
प्रत्यक्षी और जानकार ग्रामीणों के अलावा अगर तथ्यों पर गौर किया जाए तो उनके अनुसार मुखिया ने धोके से पहले जहर देकर रमेश को मार उसके द्वारा एकत्रित सम्पत्ति के लालच में मुखबिरी की थी और उसकी गवाह मुखिया जी पोरसा स्थिति वह कोठी हे जिस पर कभी कोयले तो कभी चॉक से शरारती लोग बड़े-बड़े हर्फो में लिख देते हे ...
"बागी रमेश राजावत की कोठी..!"

किस्से की सत्यता कुछ भी हो अंततः उपसंघारत यही निकलता हे की अपराध और अपराधी कैसा भी बुद्धि और समझ का धनी हो बुरे का अंत बुरा होता हे और कुछ समय बाद बीहड़िया लोग किस्सा बताकर भूलने लगते हे ...!!

#विशेष-
(प्रस्तुत घटनाक्रम,किस्सागोई,और तिथियों में अंतर सम्भावित हे। जो पुलिस सूत्रो,ग्रामीण लोगो की बातचीत पर आधारित हे , जो चम्बल पर अध्यन एवं शोधन कर रहे  लेखक के निजी विचारो और चम्बल आधारित संकलित पुस्तक "चम्बल एक सिंह अवलोकन" के किसी विवाद का उत्तरदायित्व नही लेता हे ।)
('चम्बल एक सिंह अवलोकन' पुस्तक,ब्लॉग व शोशल मीडिया पोस्ट  लेखक की निजी बौद्धिक सम्पत्ति हे जिसे कॉपीराइट कर लिया गया हे। इसके किसी अंश अथबा भाग की प्रतिलिपि/डीजिटल प्रिंटिंग,कटपेस्ट, एडिटिंग,पत्र-पत्रिकाओ में लेखक अनुमति बगैर प्रकाशन करना कॉपीराइट एक्ट1957 अंनुच्छेद 18 (3) के अंतर्गत दण्डनीय हे ।)

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र .

रविवार, 26 जनवरी 2020

गणतन्त्र

===गणों पर लदा 'गणतन्त्र'===
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रिहर्सल शुरू हो गई,गणतंत्र आ गया! सुबह-सुबह चौराहे पर मलिन बालक-बालिकाओं को तिरंगे की झंडियां बेचते देख, सहसा यकीन करने का मन करता है....'गणतंत्र आ गया....!!
' मैंने उनसे जानना चाहा। 'अभी बोहनी नहीं हुई है साब।' वे सर्द आवाज में बोले। एकाएक लगा, जैसे गणतंत्र 'बोहनी' के इंतजार में अटका हुआ है। 
तस्दीक करने के लिए मैंने फुटपाथ पर ठंड में गठरी बने पड़े आदमी से पूछा, 'तो तुमने देखा है गणतंत्र को?' 
वह मैली-कुचैली, फटी-पुरानी कंबल को कसकर पकड़ते हुए, अनजान भय से भयाक्रांत होते हुए, कांपती आवाज में बोला, 'बाल-बच्चों की कसम साब, मैं रात भर इधर ही था, नहीं देखा। इसने देखा होगा।'

यह कहते हुए उसने पास में लेटे व्यक्ति की ओर इशारा कर दिया। वह अधलेटा आदमी सर्दी से इतना नहीं कांपा, जितना इस भय से कांप उठा कि कहीं, गणतंत्र को देखकर, मुकरने के जुर्म में उसको रात को ही मिली एकमात्र कंबल न छीन ली जाए, उसने 'ना' में सिर हिला दिया! 
मुझे लगा, गणतंत्र अभी कंबल से ही नहीं निकला है। 
एक गरीब आदमी से पूछा, 'क्या तुमको गणतंत्र मिला है?'
'नहीं जी, इस बार भी बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं चढ़ा।' कहते हुए वह मायूस हो गया। बड़ा संकट है, बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं, चढ़े तो 'गणतंत्र' मिले....!

मुझे अगले जवाब का अनुमान हो चला, सरकार तो घोषणा करती रहती है, लेकिन जैसे राशन का गेहूं, चावल, केरोसिन दाब कर बैठे हैं, वैसे ही किसी ने गणतंत्र भी दाब लिया होगा! गरीब तक कहां पहुंचता है, बीच रास्ते ही मार्केट में ब्लैक हो जाता है ।

 कुछ लोगों ने चौकन्ने होते हुए मुझे बताया, 'श्रीमान जी, गणतंत्र के बारे में ज्यादा पूछताछ ना करें यहां, वरना अभी झांकी निकल जाएगी आपकी....यहां नेताजी की मर्जी के बगैर गणतंत्र तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकता । 
पिछले साल कुछ लोगों ने हिम्मत कर दबी जुबान से गणतंत्र की मांग उठाई थी, नेता जी के लोग उन्हें गणतंत्र देने के बहाने उठा ले गए....तब से उनका 'गनतंत्र', 'भूगोल' सब बदला हुआ है, अब वे लोग गणतंत्र का नाम लेते ही 'गुलामी' के दिनों को अच्छा बताने लगते हैं ।
अब नेता जी के लोग आकर पूछते हैं-और किसी को चाहिए गणतंत्र, तो लोग सहम जाते हैं।'

सच तो यही है कि गणतंत्र की उम्मीद तो हम सबने की थी! बड़े जोर-शोर से दिवास्वप्न भी दिखाए गए थे कि 'तुम हमें अपना 'गण' दो, हम तुम्हें एक जबर्दस्त 'तंत्र' देंगे.... एक सशक्त गणतंत्र देंगे।' आजादी की अलसभोर थी, पब्लिक उत्साह से सराबोर थी, आंख मूंदकर अपना सारा 'गण' उन्हें सौंप दिया। जिन्हें सौंपा, वे बदले में तंत्र देने की बजाय 'गण' पर ही लद गए। तब से लोग 'तंत्र' को ढो रहे हैं।
 बड़ी उम्मीद से दीवार पर टंगे कैलेंडर को निहारते हैं। जिसे गणतंत्र समझते हैं, वह महज 26 जनवरी निकलती है।

कहते हैं, अब हर साल छब्बीस जनवरी को गणतंत्र राजपथ पर आता है। इस समय आधे से ज्यादा भारत सर्दी में ठिठुरता है। शीतलहर के मारे लोग घरों में दुबके रहते हैं। ऊपर से कोहरे, पाले की मार! ठिठुरते, कांपते, सिकुड़े, सिमटे शरीरों में इतनी हलचल भी नहीं होती कि वे उसे देखने की चेष्टा कर सकें। हर तरफ नैराश्य का कोहरा फैला दिखता है। गणतंत्र राजपथ पर टहलकर चला जाता है.....!!

बाकी लोगों की तरह मैं भी हर साल उम्मीद से होता हूं कि राजपथ पर उसकी झलक भर दिख जाए। नजरें गड़ाता हूं कि शायद झांकियों में वह सब दिखेगा, जो हमारे लिए अपेक्षित था.... लेकिन किसान की झांकी में किसान फसल काट रहा है कि फंदा बुन रहा है....के बीच अंतर नहीं समझ पाता हूँ ....नैराश्य में डूबा आसमान में बादल तक रहा है कि लटकने के लिए ऊंचाई नाप रहा है-दृश्यता शून्य से तय करना मुश्किल हो जाता है। आंखें फाड़कर देखने की कोशिश करता हूं, अहा, कश्मीर की झांकी में स्वर्गिक अनुभूति हो जाए..!!
लेकिन घाटी में ये रंग-बिरंगे फूल खिले हैं कि स्वर्ग की सारी कायनात आतंक से लहूलुहान है, यह समझ नहीं आता।

लोकतंत्र को परिपक्व रूप में दिखाने वाली सदन की झांकी भी दिखती है। भीतर नेताओं का बहिष्कार, हो-हुल्लड़, वॉक आउट, दोषारोपण की धमा-चौकड़ी है। गोया सारा देश पूरी सज-धज के साथ झांकी में दिख रहा है, लेकिन कोहरे का फायदा उठाकर नेता, अधिकारी, बाबू, अपराधी जिसको जहां से मौका मिलता है, उसे कुतरने में लगे हैं। यहां, वहां से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातीय संघर्ष, क्षेत्रीय वैमनस्यता की लपटें उठ रही हैं। लेकिन मंचासीन लोग केवल तालियां बजा रहे हैं....!

इन सबके बीच पब्लिक की हालत जाड़े की सर्द सुबह में घाट पर खड़े उस व्यक्ति की तरह है, जिसके लिए गणतंत्र वह तौलिया है, जिसे किनारे रख, यों ही पानी में डुबकी लगाई, तौलिया गायब! वह बरसों से उघड़े, गीले बदन खड़ा ठिठुर रहा है। यह स्थाई मुद्रा है। जो भी आता है, उसी से खोए तौलिए की उम्मीद लगा लेता है। लेकिन उस तौलिए से तो कुछ 'नग्न' किस्म के लोग अपनी नंगई ढांपे खड़े हैं!

खैर.....गणतन्त्र दिवस की बधाई..!
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गुरुवार, 23 जनवरी 2020

वार्ता में इतिहास

===गढ़ी के अवशेष===
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अगर आप भिंड-मुरैना आएंगे तो आपको समझना पड़ेगा यंहा के रियासत और ठिकानों के अनुसार रचे-बसे क्षत्रियो कुलो के अनुसार पड़े क्षेत्रो के नाम ...जेसे तंवरघार(तोमरघार),सिकरवारी, भदावर,कछवाह घार इत्यादि ।
इन्ही घारों(ठिकानों) में चम्बल से २३ किमी. दक्षिण-पक्षम में स्तिथि हे मेरा गाँव 'पालि ५२से'! जो चम्बल के मैदानी क्षेत्र की उपजाऊ भूमि और तहसील पोरसा की वृहद कृषक रकबो का गाँव हे। मुख्यतः क्षत्रिय ब्राह्मण की बसाबट और चम्बल की 'बागी-क्रांति' का जीवित प्रमाण भी हे। इस ठिकाने ने गजनबियो को गाजर-मूली की तरह चम्बल के खारो में काटा था कभी किन्तु आज चर्चा करते हे...इस ठिकाने में छिपे ८००से६०० वर्ष छिपे इतिहास पर ....!

कभी यह क्षेत्र प्रतिहारों(परिहारों) का आधिपत्य था और ठाकुर मंगलसिंह के विवाह उपरान्त यह क्षेत्र बतोर वैवाहिक भेंट तन्वरो को मिला किन्तु 'पोरसा' के क्रूर और दुष्ट मुगल क्षेत्रीय प्रशाशक के कारण यदा-कदा-सर्वदा मुगलो की बसाबट का कारण भी रहा .....एक साझा युद्ध अभियान में 'पेरुस' जमीदोज कर दिया और प्रारम्भ हुआ मलेक्ष्य सफाई अभियान....

अपने ठिकाने का इतिहास करीब सहस्त्र वर्षो पूर्व का हे....जिसने कितने ही काल देखे और कितने ही रक्तपात भी देखे....उन्ही कालो की प्रमाण हे मेरे गाँव की 'गढ़ी' जो किसी गढ़ अथवा दुर्ग (किले) के कारण गढ़ी नहीं कहलाती,जैसा की इधर गाँवों में प्रायः देखने को मिलता हे ।
जब-जब वारिश के मिटटी कटाव होता हे तो इसमें से निकलते हे साढ़े साथ से लेकर आठ फिट तक नरकंकाल और अल्युमिनियम के कटोरे,मिटटी के सुराहीदार बर्तन,ऊंट के चर्म से निर्मित घी के कुप्पे और सेकडो जिज्ञासाओं को जन्म देते प्रश्न ....!!

मेरे जैसा जिज्ञासु इन सबको जान्ने के प्रयास में रहता हे और सांध्यकालीन चर्चाओ में बुजुर्गो से प्राय कुछ न कुछ जुटाता रहता हे....यह किस्सागोई अलिखित हे जो मेरे बुजुर्गो को उनके बुजुर्गो से और उनके बुजुर्गो को वृहद बुजुर्गो से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होकर आज तक यथावत हे ....! अलाव लगते हो या खेतो पर अपने समय को स्मरण करते करीब ८७ वर्षीय ठाकुर बलवीर सिंह जी 'अटा दाऊ'  की शब्दों में सबकुछ सहज ही जीवन्त हो उठता हे ।
'दाऊ' कहते हे की अपना गाँव कभी 'तुर्को' की आवादी हुआ करता था...उनके मुख्य केंद्र को खत्म करने के बाद प्रारम्भ हुआ इस माटी को तुर्क मुक्त और तंवरघार में विस्तारण का कार्य ....जिसके तहत विभिन्न ठिकाने असितित्व में आये और  'चापिक-ढोढरी' से पूर्वजो ने हजारो की 'अखज' को ठिकाने दर ठिकाने....ठिकाने लगाते चले आये ....!!

में कदाचित जानते हुए भी "अखज'(खरपतवार) को गहराई से स्पष्ट जानने की चेष्टा में दाऊ को स्पष्ट बताने का निवेदन करता हूँ तो वह हुक्के के दो गहरे कस लेकर धुआ छोड़ते हुए बताते हे की -
"खेतो में उगी अनावश्यक वनस्पति जेसे 'गाजरगास'   और समाज में उगी अनावश्यक "तुरकि" ही अखज हे जो हानि के अलावा आज भी कुछ नहीं हे !"

"ठीक उसी तरह अपने गामो में भी अखज को समूल जड़ से नष्ट कर दिया गया और यह गढ़ी उन्ही की लाशो को दबाने का स्थान हे !" 
"यंहा सेकडो तुर्को को गाढ़ा गया और कालांतर में यह जगह 'गाढ़-गाढ़' से गढ़ी में बदल गयी....बदला तो बहुत कुछ हे लले !"
यूँ ही नही अपने गाँव इन क्रूर मुगलो से रहित हे..."इतिहास की गर्त में सेकडो छोटे-छोटे 'अखज साफ़' अभियान निहित हे जो पढ़ने को नही मिलेंगे बस एकआध को स्मरण रहेंगे ..!"

दाऊ कहते हे की उन्होंने वह समय देखा हे जब जमीन पटपर(बंजर) पढ़ी रहती थी और वारिषो के 'झर' लगने के कारण मिटटी से बने घर ढ़य जाते थे ....घर का हर युवा लांटेंन,फावड़ा,रस्सी लेकर चोपार में सोया करते थे......चोपारे तो तुमने भी देखि हे न ...! उनमे लगाई लकडियो की 'लोढ़े' ही ५०० वर्ष से पुरानी होती थी और पक्के घरो के लिए कंकडों को पीस ककैया ईंटो के माध्यम से घर बनाने में दसको को गुजर जाते थे !"

इससे पहले की ताऊ जी अपने अतीत में जाकर दार्शनिक मोड़ में चले जाए में उन्हें पुनः कुछ स्मरण दिलाने के प्रयास में पूछता हूँ की,दाऊ माता मन्दिर के पास 'कसाई चबूतरे' को कसाई चबूतरा क्यों कहते हे ?
दाऊ मुस्कुराते हे और कहते हे की "तुम आज ही सब पूछोगे का ?"

में थोड़े ज्यादा आग्रह और निवेदन पूर्ण होकर पूछता हूँ। दाऊ आप न बताओगे तो हमे को बतायेगो !

'कसाई चबूतरा ' जैसा नाम बैसा काम की बजह बोला जाता हे,इसकी दांत के नीचे दफन हे वह तुर्क... जिसने 'महुआ' के चार बालको को इस बजह 'रेत' दिया था की उन्होंने होली पर उसको कीचड़ से बिगाड़ दिया और यही वह कारण जिसके कारण गढ़ी गाजियों के कंकाल उगलती हे। रक्त से सनी हुई 'पाल' महीनो तक गढ़ी पर सूखने के कारण अपना गाँव #पालि ...और तंवरघार श्रंखला में ५२ गाँवों की रियासत के कारण '५२से' कहा जाता हे ...!!"

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 22 जनवरी 2020

क्रांति नायक

#क्रांति_ऐ_रोशन

'.. जिंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन
.. वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं..।'

जी हां यह पंक्तिया हे माटी के पूत क्रांति रोशन दीप ठाकुर रोशन सिंह जी क़ी.... सनातनी आर्य विचारो की खान वर्ण से क्षत्रिय  यह वीर था उत्तरप्रदेश के शाहजँहापुर के नवादा गाँव, माँ कौशल्या देवी पिता ठाकुर जंगी सिंह जी के घर २२जनवरी १८९२ को हुआ था ...।

ठाकुर रोशन सिंह ने छह दिसंबर 1927 को इलाहाबाद नैनी जेल की काल कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था..। 
"एक सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूं। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्टभरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी जीने के लिए जा रहा हूं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की...।"
पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अंत में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा...जो पोस्ट के प्रारम्भ उल्लेखित हे !

फांसी से पहली की रात ठाकुर रोशन सिंह कुछ घंटे सोए। फिर देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रात:काल शौच आदि से निवृत्त हो यथानियम स्नान-ध्यान किया। कुछ देर गीता पाठ में लगाया फिर पहरेदार से कहा.. 'चलो.., वह हैरत से देखने लगा यह कोई आदमी है या देवता।

उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फांसी घर की ओर चल दिए। फांसी के फंदे को चूमा फिर जोर से तीन बार वंदे मातरम का उद्घोष किया और वेद मंत्र का जाप करते हुए फंदे से झूल गए।

इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध एकत्र थे उनके अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाए वहां उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया '..रोशन सिंह अमर रहें..'। भारी जुलूस की शक्ल में शवयात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी, जहां वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

फांसी के बाद ठाकुर रोशन सिंह के चेहरे पर एक अद्‍भुत शांति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूंछें वैसी की वैसी ही थीं बल्कि गर्व से ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थी। उन्हें मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फांसी दे दी गई, कोई बात नहीं। उन्होंने तो जिंदगी का सारा सुख उठा लिया परंतु बिस्मिल, अशफाक और लाहिडी़ जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा, उन्हें इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फांसी पर क्यों लटकाया?

नैनी जेल के फांसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आदमकद प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगाई गई है। वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक मेडिकल कॉलेज स्थापित है। मूर्ति के नीचे ठाकुर साहब की कहीं गई यह पंक्तियां भी अंकित हैं... ।
 'जिंदगी जिंदादिली को जान ए रोशन, 
वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं !!

कोटिस नमन करता हूँ आपको क्रांतिवीर 🙏
वन्देमातरम 🚩

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र 
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सोमवार, 13 जनवरी 2020

पितामह भीष्म

====पितामह भीष्म====
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दुर्योधन के द्वारा बार-बार उकसाने पर पितामह भीष्म वचन देते हे कि कल युद्ध निर्णायक होगा और  कल गंगापुत्र भीष्म के सरो का कोई तोड़ न रहेगा !
पाण्डव खेमे में चिंता चरम पर हे कि अगर पितामह चाहे तो कल ही युद्ध समाप्त हो जाएगा,उनके समक्ष कोई न टिकेगा! किन्तु योगेश्वर नेत्रबन्द किये मोहक मुस्कान बिखेर रहे हे। कल की कोई चिंता न हो..! द्रोपदी पुकारती हे "केशव आपका मोन कब खुलेगा?"
"हम चिंतित हे की अगर पितामह मनोयोग से युद्ध करते हे फिर पांडवो की विजय नही पराजय होगी,और आपका सूत्रधार बनना व्यर्थ जायेगा भैया ..!"
केशव ने नयन खोले और द्रोपदी को सम्बोधित करते हुए दिग्दर्शक बोल उठे..जेसे किसी ने एकाएक जलतरंग को छेड़ दिया हो ..!
"हे कल्याणी! चिंतित न होइये क्यों न आज पितामह के शिविर में जाकर आप उन्हें आभास हुए बगैर शन्ध्या वन्दन उपरांत प्रणाम कर आइये और पितामह की काट पितामह से पूछ ली जाए ..!"

कुरुक्षेत्र का वह शिविर जंहा प्रतिदिन तेज और त्याग श्वेतकणिकाएं एक अद्भुत आभामण्डल प्रकट करती थी। पितामह पद्मासन में ध्यानमग्न हे और शिविर के बाहर कन्हैया द्रोपदी की पादुकाएं पीताम्बर में लपेटे चोरो की तरह खड़े हे। योगेश्वर पहले से समझा चुके थे की चरणवन्दन करते हुए कंगन की खनक अवश्य हो ...!
जेसे ही पितामह का संध्या वन्दन ध्यान पूर्ण होने को हुआ और योगेश्वर ने संकेत किया कि भृतकुल बधु भरतकुल श्रेष्ठ पितामह के पदपंकजो में किंकिंकर ध्वनि साथ शीश रख चुकी थी। पितामह सब जानते थे और बन्द नेत्रो से ही आशीष में दोनों कर उठाते हुए बोल पड़े "अखण्ड सौभाग्यवती भवः पुत्री..!"
किन्तु जब चक्षु खोले तो द्रोपदी .....!!
कल्याणी बोल पड़ी पितामह क्षमा करिये आपके इस 'अखण्डसोभाग्य' वर पर कदाचित प्रशन कर सकती हूँ?
पितामह मुस्काये जेसे रहष्य और रहस्योद्घाटन के मध्य की खाई दायें-वाये मन्थर गति से फैलते होठो के मध्य जड़वत हो गयी हो...!
"पुत्री ..! भोजन और भजन के उपरान्त प्राप्त हुए आशीष कभी निष्फल नहीं जाते हे !" 
"मुझे उस माखनचोर की उपस्तिथि का आभाष हो रहा हे! कहा हो माखन चोर ?"
यह सूना और मुरलीधर पीताम्बर से अनुजा पादुका लपेटे भक्त के समक्ष आ खड़े हुए !
भक्त की आँखों में स्नेह के आंसू थे और भगवन के नेत्रो में दुनिया भर के स्नेह की नमी !!
पितामह सहसा बोल उठे " कुलबधु मेरा बध तभी सम्भव हे जब में धनुष नीचे ढाल दू और शशत्र तभी ढालूँगा जब कुरुक्षेत्र में मेरे समक्ष कोई स्त्री आ जाए !"
"पूर्वजन्म की अम्बा अथवा तात्कालिक शिखण्डी वही हे जो मुझे अश्त्र-शश्त्र न धारण किये रहने की स्तिथि पर ले आएगा,जाओ और धर्मयुद्ध विजय के मध्य खड़े इस भीष्म को मुक्त करो !"

प्रातः नियत समय पर पितामह और प्रपोत्र परस्पर प्रत्यक्ष थे....दीर्घ शंखनाद से दशो दिशाएं गूंज उठी,श्रीकृष्ण सारथि अर्जुन रथी ऐसे प्रतीत होते हे जेसे दो भास्कर एकसाथ युद्ध को निकले हो और पितामह स्वरूप दिग्बृह्मांड़ सामने भीषण युद्ध हुआ और साधारण से लेकर दिव्यास्त्र तक प्रयोग किन्तु पितामह ने  प्रपाश्त्र कदापि आह्वाहनित न किया क्योंकि वह जानते हे की उनका वलिदान ही धर्म की विजयनीव रखेगा...!!
शिखण्डी ध्वजा के समीप खड़ा हे और पितामह शशत्र त्याग चुके हे। अब बस गाण्डीव से निकले वाण और पार्थ के नेत्रो से झरते आंसू दिख रहे हे। प्रत्येक वक्ष विभेदन करता वान पितामह के श्रीमुख से 'यशश्वी भवः वत्स,विजयी भवः पार्थ!" का स्नेह आशीष देता हे और कभी अनभर प्रपोत्र को स्नेह देने बाले पितामह आज अपने सबसे लाडले के द्वारा वाणों की सर सैंया पर लेट चुके हे !
दोनों दल हाथ जोड़े खड़े हे। कोई मलमल का सिरहाना लेने गया कोई कुछ पर पितामह कह उठे अरे मुझे सरो की सैंया देने बाले पार्थ के हाथो से सिरहाना चाहिए और  गाण्डीव से निकले दो वाण सिरहाना वन गए,एक वाण माँ गंगा को प्रकट कर वृद्ध पितामह को जलपान कराने लगा ..!

इक्छामृत्यु वर प्राप्त पितामह,अपने गुरु पराजित करने बाले देववृत आज बाणो की पीडाश्रयी सैंया लेटे हे और १८ दिवसीय,१८अक्षोहणि,१८ महारथी इस प्रथम विश्वयुद्ध को देख रहे हे। प्रतिदिन इस पितामह रूपी महात्मा स्वर्ग लेने के लिए देवताओ के दल आते हे किन्तु उन्हें सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा हे और मकरसंक्रांति पर्व के दिवस भरतकुल नन्दन देववृत 'भीष्म' युगों-युगों दोहराई जाने बाली कुरुकुल की महागाथा बनकर #महाप्रयाण कर गए ...!!
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आइये इस मकर संक्रांति पर कुरुकुल गौरवसिरोमणि पितामह भीष्म को मैया योगेश्वरी के समक्ष स्मरण करे और इस भरतवंश (पाण्डु वंश) गुप्तगंगा दर्शन के साक्षी बन 'तँवरगढ़ ऐसाह' पर पितामह देववृत भीष्म को स्मरण कर श्रद्धांजलि अर्पित करे !

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कुँ. जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
      तंवरघार एकता मंच 
     स्टेट चम्बल मुरैना मप्र

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

विश्व हिंदी दिवस

जब हमारी कलमे अपने शरीर के रस से सराबोर होकर चलती हे,और उस मसि से उद्धृत हुए शब्दो में लिखे भाव माता के साथ मातृभाव समेटे हुए वहते हे।तो यह टँकन और लेखन,बोधन,श्रवण,बक्तव्य, का माध्यम एक समान धार में बिंधकर 'हिन्दी' बन जाता हे ।

14 सिप्टेम्बर सिर्फ भारत के लिए हिंन्दी दिवस हे जबकि आज 10 जनबरी को 'विश्व हिन्दी दिवस' के रूप स्मरण किया जाता हे। जिसका प्रारम्भ और आधिकारिक घोषणा का श्रेय जाता हे। अपने उद्धबोधनो में कभी भी सही से हिन्दी उच्चारण  न कर पाने बाले पूर्व प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंह को....!!
जी हा आप सही पढ़ रहे हे आज ही के दिन 2006 को मनमोहन सिंह द्वारा इसकी आधिकारिक घोषणा की गयी थी और समस्त विश्व के देशो ने इसी सहर्ष स्वीकार किया था ।

आज भारत की राष्ट्रीय भाषा  विश्व के लगभग 15 देशो में बोली,पढ़ाई व सिखाई जाती हे।फिर भारत की दण्ड संहिता में 'इंडियन पीनल कोड',ताजीराजे-ए-हिन्द" जेसे शब्द आज भी हमे सेकडो वर्षो दासता की कहानी स्मरण करने के लिए क्यों दोहराये जाते हे?
आंग्लभाषा के बाद विश्व की सबसे अधिक समझी जाने बाली इस वैद(मूल संस्कृत) को हम भारतीयो ने उपहासित कर रखा हे। अन्यथा इसमें 5 उपभाषाएँ व 17 बोलियो का संगम हे। जिसमे अनन्त शब्दों का महासागर हे। विश्व के साहित्य जनक भगवान वैद्व्यास जी महाराज व लेखक आदिगणेश जी से लेकर आज  तक के  शब्दऋषियो  तक अद्भुत ज्ञान सराबोर हे ।
देवनागरी लिपि ही नहीं अपितु वह समाधि हे जिसमे  रमने के बाद शाधक मुक्तिबोधन तक की यात्रा में सर्वश्रेष्ठ सुख अनुभूत करता हे ।
रोज भाषा में अनगिनत शब्दों को स्वम्भू  राजनेतिक प्रचार-प्रसारित करने बाली पक्ष और बिपक्ष की धूर्त मीडिया को शायद स्मरण न हो किन्तु गूगल ने हिंदी साहित्य विसारद श्री प्रेमचन्द जी और  भाषा प्रथम तीन वर्णों का 'डूडल' बना बखूबी स्मरण किया हे ।

हिन्दी से मेरा पहला प्रेम तो "माँ" और उनके द्वारा गायी जाती 'लोरियों' से हो गया था। जो कुछ कमी थी वह सावन की मल्हारों,होली फागों के साथ स्नेहबन्धो ने पूर्ण कर दिया हे ।
हमारे बृज की तो हर माँ-बहिन हिन्दी की कवित्री हे। वह आँगन बुहारने से चाकी चलाते हुए भी अनगढ़ पदों को रच लेती हे,फिर चाहे बांकेबिहारी की बाललीला हो या प्रीतम बिछोह हिन्दी की सरसता हिलोरे मारती हे ।

वैद्ग्रंथो में चन्द्र बिंदी (ऊँ),माता ललाट पर शुशोभित कंकु बिंदी और  देवभाषा हिन्दी के हम सदैव ऋणी हे और ऋणी रहेंगे .....!!!

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

राजेश

तुझे मेने बचपन से देखा था...वही पुरविया बोली में लपेटा हुआ हंसमुख चेहरा..किसी भी नकल उतारने में जेसे तुझे महारथ हासिल थी। साले तू तो मुझसे वर्षो छोटा था...तुझे मेने नंगा घूमता देखा था पर कभी समझ नही पाया तुझे..! तू जितना जमीन के ऊपर था उससे कहि ज्यादा जमीन के नीचे भी था ..!!
तुझे सही से जाना जब तू दिल्ली और में दादरा-नगर हवेली की योजनो दुरी होकर भी घण्टो गप्पे मारा करते थे और मुझे तब पता हुआ की तुझे अपने भौतिक परिवर्तनों के कारण बढ़ते आकर्षण विषयो पर बात करने में बड़ा मजा आता था। में स्वप्न में भी अनुमान नही कर सकता था की मुझसे इतना छोटा होते हुए भी तू इतना मुखर था ...!
लगभग एक वर्ष तक तू मेंरे साथ भी रहा...एक सिगरेट से लेकर तुझे मेरा हर सीक्रेट तक पता था और उन्ही बातो को केंद्र में रखकर तू परिहास ही परिहास में मुझे कितना सुकून देता था....!!
जब बीमार हुआ तू मेरे साथ मेरा तीमारदार था निस्वार्थ प्रेम के वशीभूत तूने अपना वह दिन और रात दोनों मेरी सेवा में गुजार दिए थे ....माथे की पट्टी से लेकर ड्रिप बड़ल्वाने पर तूने जो हॉस्पिटल में हंगामा बरपा दिया था ...कैसे भूलूंगा.......कैसे भूलूंगा की तू डेढ़ पाव हड्डी,एक भोले से लड़के की आँखों में मेने ड्रिप की नली मेंआये खून से कहि सौगुना ज्यादा लहू था ।

कमीने वो तेरा मुझसे हक से पैसे छिनना कैसे भूलूंगा और कैसे भूलूंगा 

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...