बुधवार, 25 मार्च 2020

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                  भाग-97
        ◆रमेश राजावत◆

अंम्वाह टी आई रोज की तरह अपने ऑफिस पहुचे ही थे की महुआ सब स्टेसन SI पांडे का खरखराता स्वर वायरलेस रिसीवर की पिंग पिंग करती हल्की ध्वनि पर संगीत छेड़ रहा था....".सर आई हेव एम्बुस्ड द ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
     भाग-97
◆रमेश राजावत◆

अंम्वाह टी आई रोज की तरह अपने ऑफिस पहुचे ही थे की महुआ सब स्टेसन SI पांडे का खरखराता स्वर वायरलेस रिसीवर की पिंग पिंग करती हल्की ध्वनि पर संगीत छेड़ रहा था....".सर आई हेव एम्बुस्ड द टेरेबल ऑफ़ चम्बल रमेश...आई हेव वांट टू बेक आप फोर्सेस इमिडेडली इन विलेज गोहदुपुरा फार्महाउस ऑफ़ मुखिया ...ऑवर!!"

रोजमर्रा की फाइल्स में सर झुकाये इंस्पेक्टर ने आनन-फानन में  ऑफ़ चम्बल रमेश...आई हेव वांट टू बेक आप फोर्सेस इमिडेडली इन विलेज गोहदुपुरा फार्महाउस ऑफ़ मुखिया ...ऑवर!!"
आनन-फानन में 25 लोगो की टीम गठित की गयी और बात तत्कालीन आईपीएस चम्बल रेंज विजयकुमार  सूचित की गयी ...दलबल और दलबल की कांनवाय जेसी उड़ चली पिनाहट रोड की धूल के गुब्बार यथा स्थिति बखूबी वयाँ कर रहे थे की मामला कितना महत्वपूर्ण हे ।

उसैदपूरा 'तंवरघार उ.मा. विद्यालय' के तिराहे पर अगर बागी/डाकुओ की लाशो की कोई गणना करने बाला होता तो सम्भवतः अपने आप में इस क्षेत्र की कुख्याती का कीर्तमान बन जाता किन्तु क्रोध-दहसत,प्रतिशोध और धूर्तता से बाहर आकर किसी ने नही देखा ट्रेक्टर से ज़िंदा घसीट कर ले जाते हुए फुला डाकू की उधडी हुई चमड़ी को और उसे घसीट कर ले जा रहे उसी के परम् मित्र रघुनन्दन शर्मा थानेदार को .....यंहा लाशो सुरक्षित रखने के लिए 'फॉर्मलीन' नही मिलती थी और मरे हुए शरीर को नीम के झोंरो(पत्तो) में रखा जाता था फिर चाहे शरीर कर्तव्य की वलिवेदि पर गोली खाये किसी खाकसार हुए खाकी का हो या बदले की भावना में बीहड़ कूड़े बागी अथवा डकेत का हो ....!
चम्बल के हजारो किस्से हे कुछ मेरे हिस्से हे तो कुछ आपके हिस्से और रमेश राजावत का किस्सा भी चम्बल की एक चूक का हिस्सा भर हे। जो चम्बल का अभिन्न हिस्सा हे और लुप्त होती स्मर्तियो का एक हिस्सा है ।

जिला भिंड की रौंन तहसील का कछार बाला भाग,जँहा उप्र-मप्र के तीन जनपद जेसे वहति हुई जलराशि के समक्ष परस्पर कलेऊ करने बेठे किसान ....वहति हुई पञ्च संगम हुई नदियो में भले ही कोई  जल का भेद न समझ आये किन्तु बहादुरपुरा निबासी रमेश को अपने घर का टिमटिमाता दिया समझा जाता था...! पढ़ने में कुसाग्र बुद्धि और ग्रामीण चर्या में कसा हुआ मेहनती शरीर जब बहादुर पुरा के ऊँचे नीचे टीलो पर सैना के लिए पसीना बहाता था तो कोई भी कह उठता "अरे जाय रमेशा ऐ देखो, फौज में जायबे को कैसो पगला हे गओ हे !"
रमेश का यही जूनून उसे 12 जून 1988 को ला खड़ा करता हे ग्वालियर स्थिति बाज स्टेडियम बीआरओ भर्ती ग्राउंड में और तीन चक्कर टॉप में पूरा करते-करते रमेश के पाँव में चउथा चक्कर ...ग्राउंड में पड़ी बजरी से घायल होकर इस सरजमी पर पहली बार लहू के निसान अंकित करता हे ...पर कहते हे की जिन्हें जूनून होता हे वह दर्द की परवाह नहीं करते और रमेश जिंदगी की पहली रेस में 48 नम्बर की स्टाम्प कन्धे पर अंकित करता हे ।
पर शायद नियति पर सभी की तरह रमेश का भी वस नही था...मेडिकल एक्जाम्स में अनफिट ठहरा दिया जाता हे। हतास-निरास घर लोट आया और घर पर पड़े CRPF कॉल लेटर की तिथि की प्रतीक्षा करने लगता ...समय ने अपनी गति भी नही बदली और रमेश की किश्मत का द्वतीय अध्याय बदल गया ।
भोपाल स्थिति बंगरसिया भर्ती केंद्र से रमेश को 'एजुकेशन हलबिल्दार' पद पर रिकरियूट कर लिया गया। घर की कच्ची दीवाले पक्की खुशियो के गीत गुंजार करने लगी और घर में वैवाहिक रिश्ते भी आने लगे पर रमेश अभी कहा तैयार था प्रणय की वेदी में बैठने ...उसे प्रतीक्षा थी तमाम रैंक और घर की मुकम्ल ईटो से सजी बैंक का फिर उसे परवाह नही थी कितने ही बंकर बदले जाए और कितने दुश्मन मारे जाए ...!
समय पंख लगाकर उड़ता रहा और स्नातक रमेश एजुकेसन हवलदार से Asi पद की पदोन्नति अपने कोशल और तीक्ष्ण बुद्धि पा गया ...घर की मिटटी की दीवालों पर सीमेंट और ईंट की मजबूती तो जम ही रही थी किन्तु नियति रमेश के लिए अलग ही बुनियाद लिख रही थी ।

वह 11 अप्रैल 1991 की भोर थी जेसे रमेश के जीवन में यह सुभह नही भाद्रपद की अमावश्या की स्याहता थी जब खलिहान में आग लगी या लगाई का पर्दाफास हुए बगैर रमेश के पिताजी को खलिहान में झुझा दिया गया...शरीर से वृद्ध श्री राजावत जी गाँव की प्राथमिक शाला के ब्लॅकबोर्ड पर चॉक चलाया करते थे और सम्माननीय व्यक्ति थे किन्तु जब उनपे लोगो के लट्ठ चले तो वह अंतरयात्रा को चल निकले ...और खुशहाल गाँव में भ्याभ्यता की नीव ऐसी पड़ी जो दशको तक रक्त की शीतलता से भी न बुझ पायी। रमेश की जिंदगी का तीसरा पड़ाव था जब श्मशान के धुएं में बिलीन होती एक शिक्षक की अंतिम कहानी पर उसके बेटे ने अग्नि को साक्षी मान सैनिक जीवन ली सपथ को भुला कर, प्रतिशोध की सपथ लेली ...!!

24 अप्रैल 1991 की वह तेहरवी शायद ही कोई भूल पायेगा जब मृत्युभोज उपरान्त रमेश की राइफल से निकले शीशे ने दो अप्रत्याशित तेहरवियो की मुनादी कर दी और जो ट्रिगर आतंकियों नक्सलियों पर बज्र प्रहार करता था वह चम्बल की वादियो में कहर बनके बरपा !
Crpf का एक असिस्टेंट सव इंपेक्टर की वर्दी पर पैसे से खरीदे हुए दो सितारों में इजाफा ही नही हुआ था वरन रमेश राजावत से 'रमेशा बागी' सफर भी प्रारम्ब हुआ ।
कन्धे और कमर में बंधे बिलडोरिये के कारतूस 315 से एसएलआर में क्या बदले दनादन रमेश के अपराधिक मामले जिले दर जिले बदलते गए ...फिरोतियों की ऐसी बाढ़ आई की एक समय में सेकड़ो बनिए धन स्वतः रमेश को देंने पहुच जाते थे। बड़ी हुई कुख्याति ने रमेश का गैंग भी खड़ा कर दिया जिसमे बड़ी कॉन्थर थाना पोरसा के चैना तोमर जेसे तैराक भी थे ।
में चम्बल में नगरा के लाखन के बाद किसी को किस्मत का धनी समझता हु वह रमेश हे क्योंकि इतनी वारदातो के बाद भी वह बुद्धि और सक्रिय मुखविर तन्त्र के कारण हर बार पुलिस प्रशाशन को चकमा दे जाता और तुरन्त ही कोई बड़ी पकड़ करता। उसने अपनी सैनिक जीवन के अनुभव का बखूबी प्रयोग किया और तावातोड़ अपहरण करके नई ईवारत लिखी ...नए सम्पर्क हुए और अपहरण ऐसा भी हुआ जब औरैया पुलिस अधिकारी की लड़की को ही उठा लिया ...नाम था बबली पांडे !
बबली और रमेश का किस्सा भी बड़ा फ़िल्मी और दिलचस्प रहा हे। अपहृत होकर आई पढ़ी-लिखी बबली बीहड़ो में दौड़ लगाते रमेश के प्रेम में बीहड़ो की ही हो गयी और जब रमेश ने फिरोती उपरान्त उसे घर पहुचाना चाहा तो बबली ने के दो टूक शब्द " महीनो बीहड़ में तेरे साथ रहकर भले ही में अछूती वे पवित्र हूँ लेकिन कौन समाज मुझे स्वीकार करेगा !" सुनकर रमेश पहलीबार हतप्रभ था ।
बागी/ डकैतो की शक्तिपीठ माँ रतनगढ़ बाली पर रमेश-बबली की विधि विधान के साथ वैवाहिक रीती सम्पन्न हुई और कभी कॉलेज की जीनियस रमेश के साथ कारबाइन पर इतिहास लिखने लगी ..!! सम्भवतः चम्बल के किस्सों में यह पहला किस्सा था जब दो स्नातक वैवाहिक बन्धन में बंधकर अपराधो में स्नातकोत्तर कर रहे थे ।

एक बार रमेश और बबली अपनी बिली जीप के साथ आगरा के आर्म कॉन्टेक्ट से एसएलआर और अन्य रायफलों के बुलेट्स लेने क्या पहुचे ..डीलर ने खटीक और मुस्लिम दंगो की बजह चलती पुलिस चेकिंग के कारण डिलेबरी देने की असमर्थता जताई! रुकने का पर्याप्त बंदोबस्त न होने के कारण उसकी जीप वाईपास अछनेरा मार्गपर रुकी और रमेश का सातिर दिमाक ने युक्ति निकाली ...क्यों न पुलिस के हथियार ही ले लिए जाए और दुःसाहस की नई इबारत लिखी गयी ।
दोनों ने अपने अनुभव और पढ़े-लिखे होने का लाभ उठाया और जीप जाकर रुकी अछनेरा चोकी पर ..बातो में ऑफिसर्स का अनुभव और बबली का साथ पुलिस बालो को धता देने में काम आया .....वह जिस पुलिस ऑफिसर रेस्ट हॉउस में रुका वही के कोथ व तैनात सिपाहियो की 8 एसएलआर और कई बॉक्स राउंड लूट लाया ।

रमेस के साहस दुःसाहस का दुसरा किस्सा अम्बाह कस्बे का हे...वह दिन और दिनों तरह होटल 'सुखसागर' कर्मचारियों के लिए सामान्य दिन था जब सुरक्षाबलो जेसी नम्बर प्लेट बाली विली जीप होटल सुखसागर की पार्किंग में खड़ी थी और सैना अफसर की तरह सूटेड-बूटेड रमेश होटल के कमरा नम्बर बीस में द्वतीय तल पर ठहरा था लेकिन लाखो चतुराई भरे प्रयास बाबजूद भी आपकी प्रशिद्धि/कुख्याति आपका चेहरा और नाम आम जनमानस में किसी प्रतिबिम्ब की तरह स्थापित या चस्पा कर देता हे और रमेश की भी पहिचान हो गयी ...होटल में हड़कम्प था और नीचे saf और मप्र पुलिस के चौकस जवान किन्तु कहते हे जब तक आई नही होती बाल-बांका नही होता और रमेश अपनी जान पर खेल गया बालकनी के सहारे निकली अंडर कंट्रक्शन हाइटेसन वायरिंग से दूसरी बिल्डिंग और सामान्य नागरिको की भीड़ बन पुलिस बल को चकमा देकर निकल गया ।

कहते हे की समान जोड़े चिरञ्जीवी नही होते ,यही कुछ रमेश के साथ हुआ भांजे के विवाह बाद रमेश कुछ काम से गाँव गया और पुलिस का नेटवर्क एक्टिव हो गया ...एम्बुस्ड हुआ,फायरिंग हुई ...यंहा पुलिस को जोड़े के रूप में रमेश गैंग की पहली सफलता हाथ लगी ...फायरिंग में बबली और चैना के साथ 3 अन्य पुलिस की गोलियों के शिकार हो गए पर किसी तरह रमेश और अन्य साथी बच निकले जिसमे रमेश बाल्मीकि नामक एक रमेश का विशवस्थ भी था । वह अपने कुछ साथियो के साथ अपने विश्वस्थ शरणप्रदाता गोहदुपुरा मुखिया के यंहा समय निकालने लगा ...उन्ही के दहगांव के पास बने ट्यूबेल की तिवरिया से सारे नेटवर्क को अंडर ग्राउंड करके स्वम अंडर ग्राउंड हो गया किन्तु नियति में जब अंत आता हे और समय बिपरीत होता हे तो सभी चतुराई और बुद्धिमत्ता बिपरीत हो जाती हे और अतिविश्वास के चलते रमेश को व्यूह में घेर लिया गया ।

अम्बाह,नगरा,महुआ की संयुक्त पुलिस पार्टी की धूल जब गोहदुपुरा के खेतो दिखाई तो सभी ने योजनाबद्ध कारीवायी की फलतः तिवरिया पर सेकड़ो राउंड फायर हुए यंहा तक की हेंण्ड ग्रेनेडो उस ट्यूबेल की तिवरिया के साथ रमेश की दुस्साहसिक कहानी भी सदा की तरह चम्बल के भरखो में धुंधली हो गयी ।
प्रत्यक्षी और जानकार ग्रामीणों के अलावा अगर तथ्यों पर गौर किया जाए तो उनके अनुसार मुखिया ने धोके से पहले जहर देकर रमेश को मार उसके द्वारा एकत्रित सम्पत्ति के लालच में मुखबिरी की थी और उसकी गवाह मुखिया जी पोरसा स्थिति वह कोठी हे जिस पर कभी कोयले तो कभी चॉक से शरारती लोग बड़े-बड़े हर्फो में लिख देते हे ...
"बागी रमेश राजावत की कोठी..!"

किस्से की सत्यता कुछ भी हो अंततः उपसंघारत यही निकलता हे की अपराध और अपराधी कैसा भी बुद्धि और समझ का धनी हो बुरे का अंत बुरा होता हे और कुछ समय बाद बीहड़िया लोग किस्सा बताकर भूलने लगते हे ...!!

#विशेष-
(प्रस्तुत घटनाक्रम,किस्सागोई,और तिथियों में अंतर सम्भावित हे। जो पुलिस सूत्रो,ग्रामीण लोगो की बातचीत पर आधारित हे , जो चम्बल पर अध्यन एवं शोधन कर रहे  लेखक के निजी विचारो और चम्बल आधारित संकलित पुस्तक "चम्बल एक सिंह अवलोकन" के किसी विवाद का उत्तरदायित्व नही लेता हे ।)
('चम्बल एक सिंह अवलोकन' पुस्तक,ब्लॉग व शोशल मीडिया पोस्ट  लेखक की निजी बौद्धिक सम्पत्ति हे जिसे कॉपीराइट कर लिया गया हे। इसके किसी अंश अथबा भाग की प्रतिलिपि/डीजिटल प्रिंटिंग,कटपेस्ट, एडिटिंग,पत्र-पत्रिकाओ में लेखक अनुमति बगैर प्रकाशन करना कॉपीराइट एक्ट1957 अंनुच्छेद 18 (3) के अंतर्गत दण्डनीय हे ।)

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र .

रविवार, 26 जनवरी 2020

गणतन्त्र

===गणों पर लदा 'गणतन्त्र'===
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रिहर्सल शुरू हो गई,गणतंत्र आ गया! सुबह-सुबह चौराहे पर मलिन बालक-बालिकाओं को तिरंगे की झंडियां बेचते देख, सहसा यकीन करने का मन करता है....'गणतंत्र आ गया....!!
' मैंने उनसे जानना चाहा। 'अभी बोहनी नहीं हुई है साब।' वे सर्द आवाज में बोले। एकाएक लगा, जैसे गणतंत्र 'बोहनी' के इंतजार में अटका हुआ है। 
तस्दीक करने के लिए मैंने फुटपाथ पर ठंड में गठरी बने पड़े आदमी से पूछा, 'तो तुमने देखा है गणतंत्र को?' 
वह मैली-कुचैली, फटी-पुरानी कंबल को कसकर पकड़ते हुए, अनजान भय से भयाक्रांत होते हुए, कांपती आवाज में बोला, 'बाल-बच्चों की कसम साब, मैं रात भर इधर ही था, नहीं देखा। इसने देखा होगा।'

यह कहते हुए उसने पास में लेटे व्यक्ति की ओर इशारा कर दिया। वह अधलेटा आदमी सर्दी से इतना नहीं कांपा, जितना इस भय से कांप उठा कि कहीं, गणतंत्र को देखकर, मुकरने के जुर्म में उसको रात को ही मिली एकमात्र कंबल न छीन ली जाए, उसने 'ना' में सिर हिला दिया! 
मुझे लगा, गणतंत्र अभी कंबल से ही नहीं निकला है। 
एक गरीब आदमी से पूछा, 'क्या तुमको गणतंत्र मिला है?'
'नहीं जी, इस बार भी बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं चढ़ा।' कहते हुए वह मायूस हो गया। बड़ा संकट है, बीपीएल लिस्ट में नाम नहीं, चढ़े तो 'गणतंत्र' मिले....!

मुझे अगले जवाब का अनुमान हो चला, सरकार तो घोषणा करती रहती है, लेकिन जैसे राशन का गेहूं, चावल, केरोसिन दाब कर बैठे हैं, वैसे ही किसी ने गणतंत्र भी दाब लिया होगा! गरीब तक कहां पहुंचता है, बीच रास्ते ही मार्केट में ब्लैक हो जाता है ।

 कुछ लोगों ने चौकन्ने होते हुए मुझे बताया, 'श्रीमान जी, गणतंत्र के बारे में ज्यादा पूछताछ ना करें यहां, वरना अभी झांकी निकल जाएगी आपकी....यहां नेताजी की मर्जी के बगैर गणतंत्र तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकता । 
पिछले साल कुछ लोगों ने हिम्मत कर दबी जुबान से गणतंत्र की मांग उठाई थी, नेता जी के लोग उन्हें गणतंत्र देने के बहाने उठा ले गए....तब से उनका 'गनतंत्र', 'भूगोल' सब बदला हुआ है, अब वे लोग गणतंत्र का नाम लेते ही 'गुलामी' के दिनों को अच्छा बताने लगते हैं ।
अब नेता जी के लोग आकर पूछते हैं-और किसी को चाहिए गणतंत्र, तो लोग सहम जाते हैं।'

सच तो यही है कि गणतंत्र की उम्मीद तो हम सबने की थी! बड़े जोर-शोर से दिवास्वप्न भी दिखाए गए थे कि 'तुम हमें अपना 'गण' दो, हम तुम्हें एक जबर्दस्त 'तंत्र' देंगे.... एक सशक्त गणतंत्र देंगे।' आजादी की अलसभोर थी, पब्लिक उत्साह से सराबोर थी, आंख मूंदकर अपना सारा 'गण' उन्हें सौंप दिया। जिन्हें सौंपा, वे बदले में तंत्र देने की बजाय 'गण' पर ही लद गए। तब से लोग 'तंत्र' को ढो रहे हैं।
 बड़ी उम्मीद से दीवार पर टंगे कैलेंडर को निहारते हैं। जिसे गणतंत्र समझते हैं, वह महज 26 जनवरी निकलती है।

कहते हैं, अब हर साल छब्बीस जनवरी को गणतंत्र राजपथ पर आता है। इस समय आधे से ज्यादा भारत सर्दी में ठिठुरता है। शीतलहर के मारे लोग घरों में दुबके रहते हैं। ऊपर से कोहरे, पाले की मार! ठिठुरते, कांपते, सिकुड़े, सिमटे शरीरों में इतनी हलचल भी नहीं होती कि वे उसे देखने की चेष्टा कर सकें। हर तरफ नैराश्य का कोहरा फैला दिखता है। गणतंत्र राजपथ पर टहलकर चला जाता है.....!!

बाकी लोगों की तरह मैं भी हर साल उम्मीद से होता हूं कि राजपथ पर उसकी झलक भर दिख जाए। नजरें गड़ाता हूं कि शायद झांकियों में वह सब दिखेगा, जो हमारे लिए अपेक्षित था.... लेकिन किसान की झांकी में किसान फसल काट रहा है कि फंदा बुन रहा है....के बीच अंतर नहीं समझ पाता हूँ ....नैराश्य में डूबा आसमान में बादल तक रहा है कि लटकने के लिए ऊंचाई नाप रहा है-दृश्यता शून्य से तय करना मुश्किल हो जाता है। आंखें फाड़कर देखने की कोशिश करता हूं, अहा, कश्मीर की झांकी में स्वर्गिक अनुभूति हो जाए..!!
लेकिन घाटी में ये रंग-बिरंगे फूल खिले हैं कि स्वर्ग की सारी कायनात आतंक से लहूलुहान है, यह समझ नहीं आता।

लोकतंत्र को परिपक्व रूप में दिखाने वाली सदन की झांकी भी दिखती है। भीतर नेताओं का बहिष्कार, हो-हुल्लड़, वॉक आउट, दोषारोपण की धमा-चौकड़ी है। गोया सारा देश पूरी सज-धज के साथ झांकी में दिख रहा है, लेकिन कोहरे का फायदा उठाकर नेता, अधिकारी, बाबू, अपराधी जिसको जहां से मौका मिलता है, उसे कुतरने में लगे हैं। यहां, वहां से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातीय संघर्ष, क्षेत्रीय वैमनस्यता की लपटें उठ रही हैं। लेकिन मंचासीन लोग केवल तालियां बजा रहे हैं....!

इन सबके बीच पब्लिक की हालत जाड़े की सर्द सुबह में घाट पर खड़े उस व्यक्ति की तरह है, जिसके लिए गणतंत्र वह तौलिया है, जिसे किनारे रख, यों ही पानी में डुबकी लगाई, तौलिया गायब! वह बरसों से उघड़े, गीले बदन खड़ा ठिठुर रहा है। यह स्थाई मुद्रा है। जो भी आता है, उसी से खोए तौलिए की उम्मीद लगा लेता है। लेकिन उस तौलिए से तो कुछ 'नग्न' किस्म के लोग अपनी नंगई ढांपे खड़े हैं!

खैर.....गणतन्त्र दिवस की बधाई..!
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गुरुवार, 23 जनवरी 2020

वार्ता में इतिहास

===गढ़ी के अवशेष===
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अगर आप भिंड-मुरैना आएंगे तो आपको समझना पड़ेगा यंहा के रियासत और ठिकानों के अनुसार रचे-बसे क्षत्रियो कुलो के अनुसार पड़े क्षेत्रो के नाम ...जेसे तंवरघार(तोमरघार),सिकरवारी, भदावर,कछवाह घार इत्यादि ।
इन्ही घारों(ठिकानों) में चम्बल से २३ किमी. दक्षिण-पक्षम में स्तिथि हे मेरा गाँव 'पालि ५२से'! जो चम्बल के मैदानी क्षेत्र की उपजाऊ भूमि और तहसील पोरसा की वृहद कृषक रकबो का गाँव हे। मुख्यतः क्षत्रिय ब्राह्मण की बसाबट और चम्बल की 'बागी-क्रांति' का जीवित प्रमाण भी हे। इस ठिकाने ने गजनबियो को गाजर-मूली की तरह चम्बल के खारो में काटा था कभी किन्तु आज चर्चा करते हे...इस ठिकाने में छिपे ८००से६०० वर्ष छिपे इतिहास पर ....!

कभी यह क्षेत्र प्रतिहारों(परिहारों) का आधिपत्य था और ठाकुर मंगलसिंह के विवाह उपरान्त यह क्षेत्र बतोर वैवाहिक भेंट तन्वरो को मिला किन्तु 'पोरसा' के क्रूर और दुष्ट मुगल क्षेत्रीय प्रशाशक के कारण यदा-कदा-सर्वदा मुगलो की बसाबट का कारण भी रहा .....एक साझा युद्ध अभियान में 'पेरुस' जमीदोज कर दिया और प्रारम्भ हुआ मलेक्ष्य सफाई अभियान....

अपने ठिकाने का इतिहास करीब सहस्त्र वर्षो पूर्व का हे....जिसने कितने ही काल देखे और कितने ही रक्तपात भी देखे....उन्ही कालो की प्रमाण हे मेरे गाँव की 'गढ़ी' जो किसी गढ़ अथवा दुर्ग (किले) के कारण गढ़ी नहीं कहलाती,जैसा की इधर गाँवों में प्रायः देखने को मिलता हे ।
जब-जब वारिश के मिटटी कटाव होता हे तो इसमें से निकलते हे साढ़े साथ से लेकर आठ फिट तक नरकंकाल और अल्युमिनियम के कटोरे,मिटटी के सुराहीदार बर्तन,ऊंट के चर्म से निर्मित घी के कुप्पे और सेकडो जिज्ञासाओं को जन्म देते प्रश्न ....!!

मेरे जैसा जिज्ञासु इन सबको जान्ने के प्रयास में रहता हे और सांध्यकालीन चर्चाओ में बुजुर्गो से प्राय कुछ न कुछ जुटाता रहता हे....यह किस्सागोई अलिखित हे जो मेरे बुजुर्गो को उनके बुजुर्गो से और उनके बुजुर्गो को वृहद बुजुर्गो से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होकर आज तक यथावत हे ....! अलाव लगते हो या खेतो पर अपने समय को स्मरण करते करीब ८७ वर्षीय ठाकुर बलवीर सिंह जी 'अटा दाऊ'  की शब्दों में सबकुछ सहज ही जीवन्त हो उठता हे ।
'दाऊ' कहते हे की अपना गाँव कभी 'तुर्को' की आवादी हुआ करता था...उनके मुख्य केंद्र को खत्म करने के बाद प्रारम्भ हुआ इस माटी को तुर्क मुक्त और तंवरघार में विस्तारण का कार्य ....जिसके तहत विभिन्न ठिकाने असितित्व में आये और  'चापिक-ढोढरी' से पूर्वजो ने हजारो की 'अखज' को ठिकाने दर ठिकाने....ठिकाने लगाते चले आये ....!!

में कदाचित जानते हुए भी "अखज'(खरपतवार) को गहराई से स्पष्ट जानने की चेष्टा में दाऊ को स्पष्ट बताने का निवेदन करता हूँ तो वह हुक्के के दो गहरे कस लेकर धुआ छोड़ते हुए बताते हे की -
"खेतो में उगी अनावश्यक वनस्पति जेसे 'गाजरगास'   और समाज में उगी अनावश्यक "तुरकि" ही अखज हे जो हानि के अलावा आज भी कुछ नहीं हे !"

"ठीक उसी तरह अपने गामो में भी अखज को समूल जड़ से नष्ट कर दिया गया और यह गढ़ी उन्ही की लाशो को दबाने का स्थान हे !" 
"यंहा सेकडो तुर्को को गाढ़ा गया और कालांतर में यह जगह 'गाढ़-गाढ़' से गढ़ी में बदल गयी....बदला तो बहुत कुछ हे लले !"
यूँ ही नही अपने गाँव इन क्रूर मुगलो से रहित हे..."इतिहास की गर्त में सेकडो छोटे-छोटे 'अखज साफ़' अभियान निहित हे जो पढ़ने को नही मिलेंगे बस एकआध को स्मरण रहेंगे ..!"

दाऊ कहते हे की उन्होंने वह समय देखा हे जब जमीन पटपर(बंजर) पढ़ी रहती थी और वारिषो के 'झर' लगने के कारण मिटटी से बने घर ढ़य जाते थे ....घर का हर युवा लांटेंन,फावड़ा,रस्सी लेकर चोपार में सोया करते थे......चोपारे तो तुमने भी देखि हे न ...! उनमे लगाई लकडियो की 'लोढ़े' ही ५०० वर्ष से पुरानी होती थी और पक्के घरो के लिए कंकडों को पीस ककैया ईंटो के माध्यम से घर बनाने में दसको को गुजर जाते थे !"

इससे पहले की ताऊ जी अपने अतीत में जाकर दार्शनिक मोड़ में चले जाए में उन्हें पुनः कुछ स्मरण दिलाने के प्रयास में पूछता हूँ की,दाऊ माता मन्दिर के पास 'कसाई चबूतरे' को कसाई चबूतरा क्यों कहते हे ?
दाऊ मुस्कुराते हे और कहते हे की "तुम आज ही सब पूछोगे का ?"

में थोड़े ज्यादा आग्रह और निवेदन पूर्ण होकर पूछता हूँ। दाऊ आप न बताओगे तो हमे को बतायेगो !

'कसाई चबूतरा ' जैसा नाम बैसा काम की बजह बोला जाता हे,इसकी दांत के नीचे दफन हे वह तुर्क... जिसने 'महुआ' के चार बालको को इस बजह 'रेत' दिया था की उन्होंने होली पर उसको कीचड़ से बिगाड़ दिया और यही वह कारण जिसके कारण गढ़ी गाजियों के कंकाल उगलती हे। रक्त से सनी हुई 'पाल' महीनो तक गढ़ी पर सूखने के कारण अपना गाँव #पालि ...और तंवरघार श्रंखला में ५२ गाँवों की रियासत के कारण '५२से' कहा जाता हे ...!!"

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 22 जनवरी 2020

क्रांति नायक

#क्रांति_ऐ_रोशन

'.. जिंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन
.. वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं..।'

जी हां यह पंक्तिया हे माटी के पूत क्रांति रोशन दीप ठाकुर रोशन सिंह जी क़ी.... सनातनी आर्य विचारो की खान वर्ण से क्षत्रिय  यह वीर था उत्तरप्रदेश के शाहजँहापुर के नवादा गाँव, माँ कौशल्या देवी पिता ठाकुर जंगी सिंह जी के घर २२जनवरी १८९२ को हुआ था ...।

ठाकुर रोशन सिंह ने छह दिसंबर 1927 को इलाहाबाद नैनी जेल की काल कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था..। 
"एक सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूं। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्टभरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी जीने के लिए जा रहा हूं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की...।"
पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अंत में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा...जो पोस्ट के प्रारम्भ उल्लेखित हे !

फांसी से पहली की रात ठाकुर रोशन सिंह कुछ घंटे सोए। फिर देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रात:काल शौच आदि से निवृत्त हो यथानियम स्नान-ध्यान किया। कुछ देर गीता पाठ में लगाया फिर पहरेदार से कहा.. 'चलो.., वह हैरत से देखने लगा यह कोई आदमी है या देवता।

उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फांसी घर की ओर चल दिए। फांसी के फंदे को चूमा फिर जोर से तीन बार वंदे मातरम का उद्घोष किया और वेद मंत्र का जाप करते हुए फंदे से झूल गए।

इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध एकत्र थे उनके अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाए वहां उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया '..रोशन सिंह अमर रहें..'। भारी जुलूस की शक्ल में शवयात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी, जहां वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

फांसी के बाद ठाकुर रोशन सिंह के चेहरे पर एक अद्‍भुत शांति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूंछें वैसी की वैसी ही थीं बल्कि गर्व से ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थी। उन्हें मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फांसी दे दी गई, कोई बात नहीं। उन्होंने तो जिंदगी का सारा सुख उठा लिया परंतु बिस्मिल, अशफाक और लाहिडी़ जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा, उन्हें इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फांसी पर क्यों लटकाया?

नैनी जेल के फांसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आदमकद प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगाई गई है। वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक मेडिकल कॉलेज स्थापित है। मूर्ति के नीचे ठाकुर साहब की कहीं गई यह पंक्तियां भी अंकित हैं... ।
 'जिंदगी जिंदादिली को जान ए रोशन, 
वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं !!

कोटिस नमन करता हूँ आपको क्रांतिवीर 🙏
वन्देमातरम 🚩

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र 
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सोमवार, 13 जनवरी 2020

पितामह भीष्म

====पितामह भीष्म====
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दुर्योधन के द्वारा बार-बार उकसाने पर पितामह भीष्म वचन देते हे कि कल युद्ध निर्णायक होगा और  कल गंगापुत्र भीष्म के सरो का कोई तोड़ न रहेगा !
पाण्डव खेमे में चिंता चरम पर हे कि अगर पितामह चाहे तो कल ही युद्ध समाप्त हो जाएगा,उनके समक्ष कोई न टिकेगा! किन्तु योगेश्वर नेत्रबन्द किये मोहक मुस्कान बिखेर रहे हे। कल की कोई चिंता न हो..! द्रोपदी पुकारती हे "केशव आपका मोन कब खुलेगा?"
"हम चिंतित हे की अगर पितामह मनोयोग से युद्ध करते हे फिर पांडवो की विजय नही पराजय होगी,और आपका सूत्रधार बनना व्यर्थ जायेगा भैया ..!"
केशव ने नयन खोले और द्रोपदी को सम्बोधित करते हुए दिग्दर्शक बोल उठे..जेसे किसी ने एकाएक जलतरंग को छेड़ दिया हो ..!
"हे कल्याणी! चिंतित न होइये क्यों न आज पितामह के शिविर में जाकर आप उन्हें आभास हुए बगैर शन्ध्या वन्दन उपरांत प्रणाम कर आइये और पितामह की काट पितामह से पूछ ली जाए ..!"

कुरुक्षेत्र का वह शिविर जंहा प्रतिदिन तेज और त्याग श्वेतकणिकाएं एक अद्भुत आभामण्डल प्रकट करती थी। पितामह पद्मासन में ध्यानमग्न हे और शिविर के बाहर कन्हैया द्रोपदी की पादुकाएं पीताम्बर में लपेटे चोरो की तरह खड़े हे। योगेश्वर पहले से समझा चुके थे की चरणवन्दन करते हुए कंगन की खनक अवश्य हो ...!
जेसे ही पितामह का संध्या वन्दन ध्यान पूर्ण होने को हुआ और योगेश्वर ने संकेत किया कि भृतकुल बधु भरतकुल श्रेष्ठ पितामह के पदपंकजो में किंकिंकर ध्वनि साथ शीश रख चुकी थी। पितामह सब जानते थे और बन्द नेत्रो से ही आशीष में दोनों कर उठाते हुए बोल पड़े "अखण्ड सौभाग्यवती भवः पुत्री..!"
किन्तु जब चक्षु खोले तो द्रोपदी .....!!
कल्याणी बोल पड़ी पितामह क्षमा करिये आपके इस 'अखण्डसोभाग्य' वर पर कदाचित प्रशन कर सकती हूँ?
पितामह मुस्काये जेसे रहष्य और रहस्योद्घाटन के मध्य की खाई दायें-वाये मन्थर गति से फैलते होठो के मध्य जड़वत हो गयी हो...!
"पुत्री ..! भोजन और भजन के उपरान्त प्राप्त हुए आशीष कभी निष्फल नहीं जाते हे !" 
"मुझे उस माखनचोर की उपस्तिथि का आभाष हो रहा हे! कहा हो माखन चोर ?"
यह सूना और मुरलीधर पीताम्बर से अनुजा पादुका लपेटे भक्त के समक्ष आ खड़े हुए !
भक्त की आँखों में स्नेह के आंसू थे और भगवन के नेत्रो में दुनिया भर के स्नेह की नमी !!
पितामह सहसा बोल उठे " कुलबधु मेरा बध तभी सम्भव हे जब में धनुष नीचे ढाल दू और शशत्र तभी ढालूँगा जब कुरुक्षेत्र में मेरे समक्ष कोई स्त्री आ जाए !"
"पूर्वजन्म की अम्बा अथवा तात्कालिक शिखण्डी वही हे जो मुझे अश्त्र-शश्त्र न धारण किये रहने की स्तिथि पर ले आएगा,जाओ और धर्मयुद्ध विजय के मध्य खड़े इस भीष्म को मुक्त करो !"

प्रातः नियत समय पर पितामह और प्रपोत्र परस्पर प्रत्यक्ष थे....दीर्घ शंखनाद से दशो दिशाएं गूंज उठी,श्रीकृष्ण सारथि अर्जुन रथी ऐसे प्रतीत होते हे जेसे दो भास्कर एकसाथ युद्ध को निकले हो और पितामह स्वरूप दिग्बृह्मांड़ सामने भीषण युद्ध हुआ और साधारण से लेकर दिव्यास्त्र तक प्रयोग किन्तु पितामह ने  प्रपाश्त्र कदापि आह्वाहनित न किया क्योंकि वह जानते हे की उनका वलिदान ही धर्म की विजयनीव रखेगा...!!
शिखण्डी ध्वजा के समीप खड़ा हे और पितामह शशत्र त्याग चुके हे। अब बस गाण्डीव से निकले वाण और पार्थ के नेत्रो से झरते आंसू दिख रहे हे। प्रत्येक वक्ष विभेदन करता वान पितामह के श्रीमुख से 'यशश्वी भवः वत्स,विजयी भवः पार्थ!" का स्नेह आशीष देता हे और कभी अनभर प्रपोत्र को स्नेह देने बाले पितामह आज अपने सबसे लाडले के द्वारा वाणों की सर सैंया पर लेट चुके हे !
दोनों दल हाथ जोड़े खड़े हे। कोई मलमल का सिरहाना लेने गया कोई कुछ पर पितामह कह उठे अरे मुझे सरो की सैंया देने बाले पार्थ के हाथो से सिरहाना चाहिए और  गाण्डीव से निकले दो वाण सिरहाना वन गए,एक वाण माँ गंगा को प्रकट कर वृद्ध पितामह को जलपान कराने लगा ..!

इक्छामृत्यु वर प्राप्त पितामह,अपने गुरु पराजित करने बाले देववृत आज बाणो की पीडाश्रयी सैंया लेटे हे और १८ दिवसीय,१८अक्षोहणि,१८ महारथी इस प्रथम विश्वयुद्ध को देख रहे हे। प्रतिदिन इस पितामह रूपी महात्मा स्वर्ग लेने के लिए देवताओ के दल आते हे किन्तु उन्हें सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा हे और मकरसंक्रांति पर्व के दिवस भरतकुल नन्दन देववृत 'भीष्म' युगों-युगों दोहराई जाने बाली कुरुकुल की महागाथा बनकर #महाप्रयाण कर गए ...!!
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आइये इस मकर संक्रांति पर कुरुकुल गौरवसिरोमणि पितामह भीष्म को मैया योगेश्वरी के समक्ष स्मरण करे और इस भरतवंश (पाण्डु वंश) गुप्तगंगा दर्शन के साक्षी बन 'तँवरगढ़ ऐसाह' पर पितामह देववृत भीष्म को स्मरण कर श्रद्धांजलि अर्पित करे !

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कुँ. जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
      तंवरघार एकता मंच 
     स्टेट चम्बल मुरैना मप्र

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

विश्व हिंदी दिवस

जब हमारी कलमे अपने शरीर के रस से सराबोर होकर चलती हे,और उस मसि से उद्धृत हुए शब्दो में लिखे भाव माता के साथ मातृभाव समेटे हुए वहते हे।तो यह टँकन और लेखन,बोधन,श्रवण,बक्तव्य, का माध्यम एक समान धार में बिंधकर 'हिन्दी' बन जाता हे ।

14 सिप्टेम्बर सिर्फ भारत के लिए हिंन्दी दिवस हे जबकि आज 10 जनबरी को 'विश्व हिन्दी दिवस' के रूप स्मरण किया जाता हे। जिसका प्रारम्भ और आधिकारिक घोषणा का श्रेय जाता हे। अपने उद्धबोधनो में कभी भी सही से हिन्दी उच्चारण  न कर पाने बाले पूर्व प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंह को....!!
जी हा आप सही पढ़ रहे हे आज ही के दिन 2006 को मनमोहन सिंह द्वारा इसकी आधिकारिक घोषणा की गयी थी और समस्त विश्व के देशो ने इसी सहर्ष स्वीकार किया था ।

आज भारत की राष्ट्रीय भाषा  विश्व के लगभग 15 देशो में बोली,पढ़ाई व सिखाई जाती हे।फिर भारत की दण्ड संहिता में 'इंडियन पीनल कोड',ताजीराजे-ए-हिन्द" जेसे शब्द आज भी हमे सेकडो वर्षो दासता की कहानी स्मरण करने के लिए क्यों दोहराये जाते हे?
आंग्लभाषा के बाद विश्व की सबसे अधिक समझी जाने बाली इस वैद(मूल संस्कृत) को हम भारतीयो ने उपहासित कर रखा हे। अन्यथा इसमें 5 उपभाषाएँ व 17 बोलियो का संगम हे। जिसमे अनन्त शब्दों का महासागर हे। विश्व के साहित्य जनक भगवान वैद्व्यास जी महाराज व लेखक आदिगणेश जी से लेकर आज  तक के  शब्दऋषियो  तक अद्भुत ज्ञान सराबोर हे ।
देवनागरी लिपि ही नहीं अपितु वह समाधि हे जिसमे  रमने के बाद शाधक मुक्तिबोधन तक की यात्रा में सर्वश्रेष्ठ सुख अनुभूत करता हे ।
रोज भाषा में अनगिनत शब्दों को स्वम्भू  राजनेतिक प्रचार-प्रसारित करने बाली पक्ष और बिपक्ष की धूर्त मीडिया को शायद स्मरण न हो किन्तु गूगल ने हिंदी साहित्य विसारद श्री प्रेमचन्द जी और  भाषा प्रथम तीन वर्णों का 'डूडल' बना बखूबी स्मरण किया हे ।

हिन्दी से मेरा पहला प्रेम तो "माँ" और उनके द्वारा गायी जाती 'लोरियों' से हो गया था। जो कुछ कमी थी वह सावन की मल्हारों,होली फागों के साथ स्नेहबन्धो ने पूर्ण कर दिया हे ।
हमारे बृज की तो हर माँ-बहिन हिन्दी की कवित्री हे। वह आँगन बुहारने से चाकी चलाते हुए भी अनगढ़ पदों को रच लेती हे,फिर चाहे बांकेबिहारी की बाललीला हो या प्रीतम बिछोह हिन्दी की सरसता हिलोरे मारती हे ।

वैद्ग्रंथो में चन्द्र बिंदी (ऊँ),माता ललाट पर शुशोभित कंकु बिंदी और  देवभाषा हिन्दी के हम सदैव ऋणी हे और ऋणी रहेंगे .....!!!

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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

राजेश

तुझे मेने बचपन से देखा था...वही पुरविया बोली में लपेटा हुआ हंसमुख चेहरा..किसी भी नकल उतारने में जेसे तुझे महारथ हासिल थी। साले तू तो मुझसे वर्षो छोटा था...तुझे मेने नंगा घूमता देखा था पर कभी समझ नही पाया तुझे..! तू जितना जमीन के ऊपर था उससे कहि ज्यादा जमीन के नीचे भी था ..!!
तुझे सही से जाना जब तू दिल्ली और में दादरा-नगर हवेली की योजनो दुरी होकर भी घण्टो गप्पे मारा करते थे और मुझे तब पता हुआ की तुझे अपने भौतिक परिवर्तनों के कारण बढ़ते आकर्षण विषयो पर बात करने में बड़ा मजा आता था। में स्वप्न में भी अनुमान नही कर सकता था की मुझसे इतना छोटा होते हुए भी तू इतना मुखर था ...!
लगभग एक वर्ष तक तू मेंरे साथ भी रहा...एक सिगरेट से लेकर तुझे मेरा हर सीक्रेट तक पता था और उन्ही बातो को केंद्र में रखकर तू परिहास ही परिहास में मुझे कितना सुकून देता था....!!
जब बीमार हुआ तू मेरे साथ मेरा तीमारदार था निस्वार्थ प्रेम के वशीभूत तूने अपना वह दिन और रात दोनों मेरी सेवा में गुजार दिए थे ....माथे की पट्टी से लेकर ड्रिप बड़ल्वाने पर तूने जो हॉस्पिटल में हंगामा बरपा दिया था ...कैसे भूलूंगा.......कैसे भूलूंगा की तू डेढ़ पाव हड्डी,एक भोले से लड़के की आँखों में मेने ड्रिप की नली मेंआये खून से कहि सौगुना ज्यादा लहू था ।

कमीने वो तेरा मुझसे हक से पैसे छिनना कैसे भूलूंगा और कैसे भूलूंगा 

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

कुलदेवी योगेश्वरी माता

तोमर/तँवर राजवंस कुलदेवी ऐसाहगढ़ी
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जिला मुरैना(पूर्व का जिला तंवरघार) कभी तंवरघार की सीमाओ निर्धारण चम्बल की धार नहीं बल्कि उसके घनत्व से हुआ करता था। पूर्वी राजस्थान जिला धौलपुर से सटी चम्बल की हरियल धार और मध्यप्रदेश की किनारी पर बसे ऐसाह गाँव से कुछ ही दुरी पर स्तिथि हे 12 वी सदी कालीन महाराज अनंगपाल सिंह द्वितीय द्वारा स्थापित तोमरराज वंस की कुलदेवी माँ योगेश्वरी चिल्लाय माता का मन्दिर जो पुरातन कालीन मन्दिर के भग्नावेशो से थोड़ा पहले हे। 12 वी सदी का मन्दिर और किला चम्बल की अशेष जलराशि में कहि बिलुप्त हो चुका हे किन्तु किनारे कुछ अवशेष आज भी विद्यमान हे जो इसकी भव्यता की दास्ताँ खुद व्यान करते हे ।

इस स्थान को इसकी विशेष आकृति के कारण "भवेश्वरी" भी कहते हे। यंहा चम्बल की बीच धार प्राकतिक रूप से एक हरा-भरा टापू निर्मित करती हे। जिसकी आकृति स्टेलाइट व्यू अथवा वायुयान से देखने पर  स्त्री योनि की आकृति सुस्पष्ट करता हे। जो माँ कामख्या देवी की ही द्वितीय कृति हे ।

लोकश्रुतियो और इतिहास का अध्यन करने पर ज्ञात होता हे की 'ऐसाहगढ़' स्तिथि बट वृक्ष के नीचे ही तोमरवंस के गुम हुए मदनायक (कोहिनूर) हीरे की पुनर्प्राप्ति महाराज अनंगपाल को यही हुई थी। यह वही हीरा हे जो महाभारत काल में उर्वसी अप्सरा द्वारा अर्जुन को भेंट किया गया था और तन्त्र से अभिमन्त्रित महरोली स्तिथि किल्ली को हिलाते ही गायब हो गया था।
 बुजुर्ग कहते हे तोमरो के दिल्लीच्युत होने के बाद। ऐसाह को दूसरे गढ़ के रूप में स्थापित कर शाशन व्यवस्था पुनर्स्थापित की गयी और राव घाटम देव के 84 गाँव राव वीरमदेव के द्वारा 52 और 120 गाँवों की नीव रखकर 'तंवरघार' की नीव रखी गयी। वस्तुतः यह परिहार/प्रतिहार राजाओ का भूभाग था जो प्रतिहार कुमारी धारावती से राव वीरमदेव के विवाह उपलक्ष्य में सप्रेम भेंट स्वरूप प्राप्त हुआ था ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण जी बहिन योगमाया के कारण कुलदेवी का नाम योगेश्वरी,भगेश्वर टापू के कारण यह तीर्थ भवेश्वरी और चील पक्षी की सवारी के कारण इन्हें चिल्लाय माता,कंस के समक्ष स्वम को योगमाया उच्चारित करने कारण मंशादेवी व सरुण्ड माता के नाम भी जानते हे ।
मन्दिर से चम्बल तक जाने के लिए पक्की सिंढीया और नीचे माँ गंगा का प्राकृतिक उद्गम कलकल निनादित हे। यंहा महिलाओ के स्नान के प्राकृतिक झरने का एक कक्ष रूप स्नानागार  हे तथा पुरुषो के लिए गोमुख झरना अपनी अलग ही छटा विखेरता हे। यही से आप भवेश्वरी पर्वत को निहार व नोका विहार कर सकते हे। 
जलराशि में तैरते सेकडो घड़ियाल और मगर आपका मन मोह लेंगे तो हजारो प्रवासी पक्षीयो का कलरव यंहा की छटा को और दर्शनीय बना देता हे ।
यु तो यंहा प्रतिदिन उप्र, राज,मप्र से आते सेकडो श्रद्धालुओं द्वारा प्रसादी-भण्डारण होते रहते हे किंतु प्रतिवर्ष 18 जून को हल्दीघाटी के शहीद तोमरकुल की तीन पीढ़ियों की स्मिर्ती में विशेष आयोजन 'तंवरघार एकता मंच' के तत्वाधान में होता हे ।

यंहा की विशेषता हे की चंद्रवंस,तँवर कुल देवी ध्वजा के ऊपर आकाशगंगा में कोई भी तिथि हो कोई भी प्रहर हो 'चन्द्र देव' सदा सर्वदा दर्शन किये जा सकते हे और यंहा स्नानुपरांत भोजन ग्रहण कर व माँ की आराधना करके इच्छित फल की प्राप्ति होती हे ...!

तो आइये आगामी मकर संक्रांति पर्व पर महाप्रयाण हुए पितामह देववृत 'भीष्म' को नमन कर श्रधांजलि अर्पित करने माँ कुल देवी योगेश्वरी चिल्लाय भवानी के सानिध्य में धर्म लाभ अर्जित करे !
जय माँ योगेश्वरी भवानी !!


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~कुं.जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र (स्टेट तंवरघार)

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

गेंदालाल जी दीक्षित

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                     भाग-७२
    ★बागी गुरु गेंदालाल जी दीक्षित★

बटेश्वर वाह के 'मई' गाँव को सभी जानते हे,जाने भी क्यों न!चूँकि इसी कालिंदी से घिरे छोटे गाँव में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटलबिहारी बाजपेयी का जन्म स्थान हे। किन्तु इस पावन मारुभूमि की एक नीव की ईंट और हे जो कालांतर में स्मिर्ति से धुँधली होती जा रही हे और हम भूल जाते हे एक ऐसे महान क्रांतिकारी सूत्रधार गोलोक वासी पण्डित जी गेंदालाल दीक्षित जी को ।
इसी भूमि पर चम्बल के बागियों को 'क्रांति का गुरुमन्त्र' देने बाले इस चाणक्य सदृस् आचार्य के शिष्य थे प.रामप्रसाद तोमर 'बिस्मिल',अस्फाख् उल्ला खान,महावीर सिंह राठौर,ठाकुर रोशन सिंह लाहिड़ी,बरकत उल्ला खान,सेठ गयादीन प्रसाद के साथ ख्यात बागी मान सिंह राठौर,ठाकुर पंचम सिंह चौहान,बृह्मांनन्द 'बृह्मचारि जेसे बागी भी थे ।

एक समय था जब चम्बल में स्वम के मरते परिवार डूबते आत्मसम्मान के लिए लोगो बीहड़ का रास्ता अपनाया किन्तु उस रस्ते में बदले की भावना ज्यादा थी और इसी भावना को दीक्षित जी नया पथ दिया क्रांति का और इसी क्रोधक्रान्ति ने सेकडो डाके डाले। ब्रिटिस और सिंधिया फौजे मारी गयी तो ले चलते आपको इसी अद्भुत स्वप्न में जो क्रांति से प्रकट हुआ और क्रांति के लीन हो गया ...! जिस समय देश के लोगों को अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध खड़ा करने की जद्दोज़हद चल रही थी, उस समय इन्होंने डकैतों को इकट्ठा कर अंग्रेज़ी सरकार के खिलाफ़ ‘शिवाजी समिति’ का गठन किया। उनके इस संगठन ने अंग्रेज़ी सरकार की नींद हराम कर दी थी।
पंडित गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवम्बर 1888 को उत्तर-प्रदेश के आगरा जिले के मई गाँव में हुआ। मात्र 3 वर्ष की आयु में ही अपनी माँ को खो देने वाले गेंदालाल का बचपन बिना किसी वात्सल्य और सुख-सुविधा के बीता। शायद इसी वजह से वे शरीर और मन दोनों से ही मज़बूत बन गए थे।

घर की आर्थिक परिस्थिति ठीक न होते हुए भी गेंदालाल ने किसी तरह दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की। आगे पढ़ने की इच्छा तो थी, परन्तु घर के खर्चों में हाथ बंटाने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश में औरैया जिले की डीएवी स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार कर ली। इसी दौरान 1905 में हुए बंग-भंग के बाद चले स्वदेशी आन्दोलन का उन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। क्रांति के इस दौर में गेंदालाल को एक ऐसी योजना सूझी, जो शायद ही किसीको सूझती! उस वक़्त डैकेतों का बड़ा प्रहार था। ये डकैत बहादुर तो बहुत थे, पर केवल अपने स्वार्थ के लिए लोगों को लूटते थे। ऐसे में गेंदालाल ने ऐसा उपाय सोचा, जिससे इन डकैतों की बहादुरी और अनुभव का फ़ायदा स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए उठाया जा सकता था।
उन्होंने गुप्त रूप से सभी डकैतों को इकट्ठा कर अपनी ‘शिवाजी समिति’ बनाई और शिवाजी की ही भांति उत्तर-प्रदेश में ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ़ गतिविधियाँ शुरू कर दी। पंडित गेंदालाल भले ही अपनी गतिविधियाँ चोरी-छिपे करते थे पर क्रांतिकारी नेताओं में वे धीरे-धीरे मशहूर होने लगे। उनकी बहादुरी के किस्से जब महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल तक पहुंचे, तो उन्होंने गेंदालाल से अपने अभियान के लिए मदद मांगी।

गेंदालाल ने भी इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकृति दे दी। और जल्द ही गेंदालाल की शिवाजी समिति के साथ बिस्मिल ने ‘मातृवेदी’ की स्थापना की। इस संस्था के काम करने का मुख्य केंद्र मैनपुरी था। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था कि इस केंद्र की किसीको कानो-कान ख़बर न हो पर दल के ही एक सदस्य दलपतसिंह अंग्रेज़ों का मुखबीर बन गया। इस गद्दार ने अंग्रेज़ों को यहाँ का पता दे दिया। ख़बर लगते ही अंग्रेज़ अधिकारियों ने इस अड्डे पर छापा मारकर, गेंदालाल और उनके कुछ साथियों को गिरफ़्तार कर लिया।

गेंदालाल को अपने बाकी साथियों से अलग कर, आगरा के किले ले जाकर कड़ी निगरानी में रखा गया। अंग्रेज़ उनसे अन्य लोगों का पता उगलवाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।
उधर बिस्मिल ने अपने इस क्रांतिकारी साथी को मुक्त कराने की योजना बनानी शुरू कर दी थी। एक दिन गुप्त रूप से किले में आकर बिस्मिल ने गेंदालाल से मुलाकात की।

इन दोनों ने संस्कृत में बात की ताकि सिपाहियों को कोई शक न हो और गेंदालाल की जेल से फ़रार होने की योजना बनाई। योजना के अनुसार गेंदालाल ने पुलिस को सब कुछ बताने के लिए हामी भर दी। बयान देने के लिए उन्हें आगरा से मैनपुरी भेज दिया गया, जहाँ उनके बाकी साथियों को रखा गया था।
यहाँ पहुँचते ही गेंदालाल ने एकदम से पैंतरा बदला और पुलिस से नाटक करते हुए कहा कि ‘इन लड़कों को क्या पता, मैं इस कांड का सारा भेद जानता हूँ।’ पुलिस उनके झाँसे में आ गयी और उन्हें क्रांतिकारियों के साथ उसी बैरक में बंद कर दिया गया।बाकायदा चार्जशीट तैयार की गयी और मैनपुरी के स्पेशल मैजिस्ट्रेट बी॰एस॰क्रिस की अदालत में गेंदालाल दीक्षित सहित सभी नवयुवकों पर अंग्रेज़ो के विरुद्ध साजिश रचने का मुकदमा दायर किया गया। इस मुकदमे को भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में मैनपुरी षड्यन्त्र के नाम से जाना जाता है।
मुकदमा अभी चल ही रह था कि गेंदालाल ने एक और चाल चली। उन्होंने जेलर को यकीन दिला दिया कि क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ गवाही देने वाला सरकारी गवाह उनका अच्छा दोस्त है और अगर उन्हें इस सरकारी गवाह के साथ एक ही बैरक में रख दिया जाये, तो कुछ और षड्यन्त्रकारी गिरफ़्त में आ सकते हैं।
जेलर ने गेंदालाल की बात का विश्वास करके उन्हें सी॰आई॰डी॰ की देखरेख में सरकारी गवाह के साथ हवालात में भेज दिया। थानेदार ने एहतियात के तौर पर गेंदालाल का एक हाथ और सरकारी गवाह का एक हाथ आपस में एक ही हथकड़ी में कस दिया ताकि रात में वे हवालात से भाग न सकें। लेकिन गेंदालाल को कहाँ कोई जेल और हथकड़ी रोकने वाली थी। वे खुद तो जेल से फ़रार हुए ही साथ में उनके सरकारी गवाह को भी भगा ले गये। पूरी ब्रिटिश सरकार हका-बक्का रह गयी कि कैसे एक मामूली-सा स्कूल का मास्टर उनकी पूरी पुलिस फ़ोर्स को चकमा दे गया। एक निजी शोध अनुसार सबलगढ़ से ग्वालियर आते ब्रिटिस-सिंधिया खजाना लूट के 'प्रद्युमपुर जमीदार'  प्रद्युम्न सिंह और उनके द्वारा की गयी लूट और जेल तोड़ने से भी शोधकर्ता इन्हें जोड़ते हे किन्तु 1857 और 1911 में काफी अंतराल हे तो सबलगढ़ खजाना लूट में दीक्षित जी की सहभागिता शिद्ध नहीं होती हे ।

ब्रिटिश पुलिस ने हर एक हथकंडा आजमाया लेकिन कभी भी गेंदालाल को पकड़ न पाई। इस घटना के बाद, गेंदालाल दिल्ली पहुंचे और वहां अज्ञात नाम से आजीवन क्रांतिकारियों की मदद करते रहे।देश की सेवा में बिना रुके और बिना थके काम करने वाले इस क्रांतिकारी को आख़िर क्षय रोग ने हरा दिया और 21 दिसंबर 1920 को उन्होंने आख़िरी सांस ली।

भारत की आज़ादी की नींव रखने वाले ऐसे न जाने कितने ही क्रांतिकारी हैं, जिनका नाम कभी इतिहास हम तक न पहुंचा पाया। परन्तु देश सदा इन अनसुने, अनदेखे, गुमनाम क्रांतिकारियों का ऋणी रहेगा । नबम्बर में प्रकट हुए दिसम्बर में महाप्रयाण हुए इस महान क्रांति गुरु,एकात्म चिंतक,श्रीमद्भगवद्गीता के मर्मज्ञ और महान नीतिज्ञ को मेरा कोटिस नमन ...🙏
शब्द श्रधांजलि 💐
वन्दे मातरम् 🇮🇳
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से' 
चम्बल मुरैना मप्र .


मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

भारत में कश्मीर की नींव

भारत की कश्मीर नींव
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सन 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हो रहा था तब मीरपुर भी तत्कालीन कश्मीर रियासत का एक हिस्सा था। इस दौरान पाकिस्तान वाले पंजाब से हजारों की संख्या में हिंदु मीरपुर पहुंचे रहे थे। वहीं मीरपुर के मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे। प्रतिवर्ष 25 नवंबर का दिन बंटवारे के दर्द को हरा कर देता है।जम्मू-कश्मीर सरकार के रिटायर्ड डिप्टी सेक्रेटरी सीपी गुप्ता बताते हैं कि वर्ष 1947 को हुई घटना में मीरपुर निवासियों का केवल इतना ही दोष था कि उन्होंने एक दृढ़ संकल्प कर रखा था कि जब तक उनके पास बंदूक की आखिरी गोली है, तब तक वे पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को मीरपुर शहर के अंदर प्रवेश नहीं करने देंगे, इसी प्रतीज्ञा के वशीभूत मीरपुर निवासियों ने अंतिम सांस तक आक्रमणकारियों का डट कर मुकाबला किया।दुर्भाग्यवश युद्ध खत्म होते ही आक्रमणकारियों ने 25 नवंबर 1947 के हत्याकांड में 18 हजार से भी ज्यादा बूढ़े, युवक-युवतियां तथा अल्प आयु वाले बच्चों को भी क्रूरता से मृत्यु के घाट उतार कर हमेशा की नींद सुला दिया।24 नवंबर 1947 के दिन मीरपुर के 25 हजार लोगों ने उनके पास मौजूद बारुद को खत्म होते देख खुद को असहाय महसूस किया। यह स्थिति इसलिए हुई क्योंकि उस समय की भारत सरकार और रियासत जम्मू व कश्मीर सरकार के बीच मतभेद के कारण फौजों को मीरपुर से दूर रखा।

मीरपुर शहर के अंदर शुरू में रियास्ती सरकार के केवल 800 सिपाही थे, जिन में लगभग आधे अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के साथ जा मिले। बाकी लगभग 400 सिपाहियों ने अपने अल्प संख्या में अस्त्रों के साथ चारों ओर से घिरे हुए मीरपुर नगर की चौकसी की।ऐसे मौके पर मीरपुर के लगभग एक हजार युवकों ने रक्षा चौकियों पर सिपाहियों के कंधे से कंधा मिलाकर पूरा सहयोग दिया। 6,10 तथा 11 नवंबर 1947 को शत्रुओं द्वारा किए गए हमलों का डटकर मुकाबला किया और शत्रुओं को बहुत हानि पहुंचाई, किंतु अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बढ़ती हुई पाकिस्तानी सेना के सामने स्थानीय मदद के अभाव में उनका स्वप्न अधूरा रह गया।17 नवंबर 1947 के दिन मीरपुर के पुलिस कैंप में रखे हुए वायरलेस सेट में अचानक खराबी हो जाने के कारण जम्मू-कश्मीर रियासत तथा भारत सरकार के साथ रेडियो संपर्क पूरी तरह से टूट गया। मौके का फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी सेना ने शहर की पूर्वी दिशा की ओर से आक्रमण किया।सात पठान आधी रात को शहर के भीतर प्रवेश करने में सफल हो गए। मीरपुर के आत्मघाती टोलों ने मिलकर पांच पठानों को मार गिराया और दो पठान भागने में सफल हो गए और बाकी शत्रु सेना को खदेड़ने में नगरवासी सफल हो गए।
इस भयानक स्थिति में जिला मीरपुर के वजीर बजारत राव रतन सिंह ने मीरपुर से जम्मू की ओर भागने का फैसला किया। मीरपुर के शासनिक हुक्मरान मीरपुर निवासियों को मौत के मुंह में छोड़कर स्वयं सुबह चार बजे कुछ पुलिस अफसरों के साथ घोड़ों पर बैठकर जम्मू की ओर भाग निकले। चौकियों पर तैनात बचे-खुचे सिपाहियों ने भी पुलिस अधिकारियों के भागने की सूचना पाकर चौकियों को छोड़ दिया।पुलिस के भागने का समाचार मिलते ही शत्रु ने एक भूखे भेड़िए की तरह सुबह आठ बजे शहर के अंदर प्रवेश कर के धावा बोल दिया और घरों को आग लगा दी। उन्होंने नागरिकों को शहर के एक कोने में धकेल दिया।  लोग भगने लगे तो शत्रु ने पैदल चलते हुए लोगों पर अंधा- धुंध गोलियां बरसाई, जिसके कारण लगभग 18 हजार से भी ज्यादा लोग मर गए। कुछ युवतियों ने तो शहर के गहरे कुओं में छलांगे लगाई और कुछ ने अपने पुरुष वर्गों को विवश किया कि वे अपने ही हाथों से उन को मार दें ताकि वे आक्रमणकारियों के हाथों में न पड़ें।

कुछ लोगों को तो जिंदा ही आग में जला दिया गया। लगभग 3500 नागरिक जो कि गंभीर रुप से घायल हो गए थे, उन को बंदी बना लिया गया। शेष लगभग 3500 लोग जीर्ण-हीन अवस्था में ठोकरें खाते हुए सात दिन भूखे और प्यासे पैदल चलते जम्मू पहुंचे, जिन की दर्दनाक कहानी को शब्दों में आज भी वर्णन करना असंभव है। मीरपुर शहर जो 650 सालों तक एखता और शांति का प्रतीक रहा, 25 नवंबर 1947 को कुछ ही घंटों में लाशों का मरघट बन कर रह गया।
उन्हीं सन 1947 के मीरपुर के शहीदों की स्मृति में गवर्नमेंट मेडिकल कालेज के सामने महेशपुरा चौक जम्मू में एक शहीदी स्मारक बनाया गया है। इस स्मारक का उद्घाटन कुमारी सुषमा चौधरी आईएएस एडिशनल चीफ सेक्रेटरी ने 25 नवंबर 1998 को किया था। मीरपुर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उस सड़क का नाम मीरपुर रोड रखा। जंहा प्रतिवर्ष उनके स्मरण स्वरूप प्रशिद्ध मेले का आयोजन किया जाता हे ।
प्रतिवर्ष सभी मीरपुरी, बक्शीनगर, गुड़ा रिहाड़ी, सरवाल, जम्मू शहर, गांधीनगर, शास्त्री नगर, त्रिकुटा नगर और जम्मू के आसपास की अन्य कालोनियों से एकत्रित होकर मीरपुर के उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखा....!!
...वन्देमातरम🇮🇳
सन्दर्भ:- 'कश्मीर के तीर१९४७' पुस्तक
दैनिक जागरण समाचारपत्र,बिकिपीड़िया के तुलनात्मक अध्यन से
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...