बुधवार, 3 जुलाई 2019

सहालग (2 हास्य्)

सहालग की विदाई
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देवोत्थानी एकादशी से प्रारम्भ हुआ कानपकड़  उठाबैठक लगाने बाला विवाहकप कुम्भ देवशयनी एकादशी का फायनल को आया और सपनो की दुनिया का विचित्र संयोग अपने अस्ताचल को हो आया। किन्तु कुछ कुँवारे-कुंवारियों के लिए यह 'सीजन' भी सुखा निकल गया।देवशयनी एकादशी क्या आई जिन्दगी 'जैठालाल' हो गयी और आश करते करते पता न चला की कब बालो में खिझाव लगने लगा....कब विवाह की एक्सपायरी डेट निकल जाए !

पूरी सोमवारी ब्रत की परिधि  2πr होते-होते πrवर्ग होगयी,आशाओ का घनत्व नवरात्रों के क्षेत्रफल में #टेसू बना गया और मीडियम वेव की फ्रीक्वेंसी फिर से सॉर्ट वेव पर FM होकर बेसुरी हो गयी ।

भोझियो की जी हजुरी करते करते देवर का घेवर हो गया पर क्या मजाल की भौजी ने छुटकी केलिए छुटकू की बात चलाई हो....!
इस सहालग में अनगिनत लोगो के भोंपे बज गए किन्तु अनगिनत लोगो की पीपनी भी न बज पायी,बजे भी कैसे बैमानो ने सहालग देवता महादेव और सहालग देवी नवदुर्गा के व्रतो में चाट-भल्ले जो खाये थे ।

कितनी मुहब्बतों के जज्बातों को लोंडो ने अपनी खुन्दक मिटाने के लिए 'अपनी बाली परायी' के विवाह में आँखों के साथ हाथो से खूब पानी परोसा। 'मुहब्बत' भी "अब तुम मुझे भूलने की कोशिस करना" बोलकर किसी और की साँझ तक बाट जोहने के लिए चौपाया गाडी में बेठ कर गाँवबाले 'जिगरी' को 'मामा' बनाने निकल गयी ...!!

वहीँ कुछ लोंडे कॉलेज की मिस को मिस करके नया क्रस आइटम ले आये। मिस अपने छोना बाबू के "थाना थाया" वाक्य को बहुत मिस कर रही हे और 'टिकटोक' पर दिल्फ़टे गानो,फेसबुक पर गालिव चच्ची की तरह अपडेट्स हो रही हे ।
टेंट बालो के डोंगे सुष्क होने के साथ-साथ डीजे बालो के डायस भी सुने हो गए....और तो और 24 घण्टे शोशल मिडिया पर भटकती लोंडो की रूहे अब 42 घण्टे ससुराल से मिली चायना आइटम की रिपेयरिंग में व्यस्त हो गए हे ।
कोई कोई मिस अपने फिस्स हुई मुहब्बत को हलीमुन की फोटो व्हाट्सऐप करके मुहब्बतहत्या को प्रेरित कर रही हे तो कुछ लोंडे अभी से फैलाउलि के चक्कर में परदेस को निकल गए। उन्हें डर हे की दहेज़ में मिली हुई वाशिंग मशीन का पहला शुभारम्भ उन्ही के करकमलो न करा दिया जाए...!
जिन जोड़ो के विवाह से पूर्व मधुरमण्डप के लिए सीने छप्पन हुआ करते थे वह खुद को मोदी के द्वारा हिंन्दुत्व के नाम ठगे हुए महसूस कर रहे हे।मायके बालो के लिए जो बेटिया गाय होती थी वही ससुराल के चार रोज में गोपी बहु से नजर की डायन में अपडेट हो गयी।
जिन लड़कियो को भोंपा से पहले कुल्दुड़ में एक केयरिंग,हेंडसम,डेशिंग और एक बेहतर पार्टनर दीखता था ...उन्हें भी डोसा में मख्खी निकलने का अहसास हो रहा हे....असल में अपनी-हैंडग्रेनेड के सेफ्टी पिन निकालने का अहसास जब जब होता हे तब तब रिंग सेरेमनी को गरियाने की,कोसने की बड़ी जोर से इच्छा होती हे ।

सहालगपर्व की अपार तपस्या में तल्लीन हुए जोड़े जब एक दूसरे को भोर में देखते हे तो सोचते हे की काश !कुछ और प्रतीक्षा कर ली होती तो शायद यह जो काले जामुन को सफेद पेंट करके रसगुल्ला बताकर उनके पल्ले बाँध दिया हे वह शायद रसमलाई के वर्जन में मिल सकता था !

सहालग बाद असली मुर्दायि तो रुठने में पीएचडी सर्टिफिकेट प्राप्त फूफा और जीजो के चेहरे पे देखा जाता हे। जिन्हें शादी बाद कम से कम अपने असितित्व के होने का  बोध विवाहो में ही मिलता हे।दूल्हे के सहवाला कम 35 ₹ मासिक टेरिफ पैक साथी और दुल्हन की ब्लॅककेट कमांडो सहेलियों  की अजब दुनिया हे। सहवाले वरात् में 35 के टेरिफ से 350 के अनलिमिटेड रिचार्ज की भ्रान्ति में जीते हे और दूल्हे का साथ देने की ओट में काली,पिली,हरी,नीली सुट बालियों में कौन सही सूट करती हे की जुगाड़ में दूल्हे के फेंटा-पनरस को बार ठीक करते हे ।
दुल्हन की शेडो कम कमांडो सहेलियों का अलग नखरा हे,बो चाये एक नजर में किसी सहबाले पर फ़िदा हो गयी लेकिन क्या मजाल की फेरो के बख्त एक फूल बहिन के देवर को फेंककर 'फूल' बनाये....वहा तो इशारो ही इशारो मोबाईल नम्बर फॉरवर्ड कर दिए जाते हे ।

समधियों में परस्पर सामने बाले को लोभी और धनलोलुप शिद्ध करने की जो होड़ होती हे उसका अगर कोई कप होता तो समधनो के गले में टांग दिया जाता।और खुद के प्रोडक्ट को ISO9002 सर्टिफाइड तो समधी के प्रोडक्ट को चायना आइटम की मुहरबन्दी से नवाज देते ।

विवाह पढ़ते पण्डित पुरोहितो को भी जाता हुआ साहलग अखर रहा है ....अब उनको कोण बार-बार दक्षिणा के नाम पर सुलभ धन देगा ...!!कुछ पण्डित जी तो हजारो विवाह पढ़कर भी खुद के विवाह में दूल्हा न बन पाने के मलाल में सुखकर काँटा हुए जा रहे हे। खुद भोंपा न रच पाने के लिए कमाऊ पंडिताई को ही गरिया रहे हे। काश एक पण्डिताइन मिल जाती तो अपनी भी जिन्दगी लीलावती कलावती के नाज नखरों में निकल जाती ..!

समाचार पत्र बाले इकलौते ऐसे दिव्य मनुष्य हे जो सहालग की सप्लीमेंट्री में फ़ैल हुए कुवारों के सीने पर सव्र की सिला यह लिखकर रखते हे की "विवाह के 2 माह बाद विवाहिता प्रेमी संग फुर्र हो गयी!"
कभी-कभी तो पत्नी पूजन करते पतियो की फोटो भी सहालग में सूखे हुए बबूलों को काँटो में आगरा के पेठे लगने का सुखद आनन्द देती हे ।

कल परसो देवशयनी एकादशी आ जायेगी,एक और ग्यारह होते-होते युवक-युवतियों को रिवर्स स्विंग करके आती डिलिवरी कोट &बोल्ड कर जाएगी! और कुछ कुँवारे-कुंवारियों के अरमान भी हरे होते होते सुख जाएंगे। वह फिर शिद्दत से जुट जाएंगे श्रवण माष के सोमवारों में वर और कुवार के नवरात्रो में बधु प्राप्ति के अखण्ड तप में .....किन्तु स्मरण रहे चाट-भल्ले, दशहरा का दिव्य पेय आपकी तपस्या में नोटबन्दी बाद GST न लगा जाये ......और आगामी सहालग कुम्भ फिर से बगैर पर्व लिए न निकल जाए ....!!

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

शनिवार, 22 जून 2019

गजल


लगता नही है दिल मेरा उजड़े दयार मे,
किसकी बनी है आलमे नापायदार मे।

उम्रे दराज मांग कर लाए थे चार दिन,
दो आरजू मे कट गए दो इंतजार मे।

बुलबुल को पासबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत मे कैद लिक्खी थी फसले बहार मे।

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहां है दिले दागदार मे।

एक शाखे गुल पै बैठ के बुलबुल है शादमा,
कांटे बिछा दिए हैं दिले लालाजार मे।

दिन जिंदगी के खत्म हुए शाम हो गई,
फैला के पांव सोएंगे कंजे मजार मे।

कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए,
दो गज जमीन भी न मिली कू ए यार मे।

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बहादुर शाह जफर

डायरी भाग 1

             ★यादो के कद★
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कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता हे की आपकी यादे आपसे कही आगे चलती हे।आप जिन्हें बारम्बार भूलने का प्रयास करते हे,वह आपके समक्ष आपसे अपना कद बड़ा करते हुए दिख जाती हे। और आप गहरे विसाद की स्तिथि से दो-चार करते हुए स्वम को पाते हे,किन्तु आपकी अविजित पराजय का मूल होती हे वह गलतिया जिन्हें आप बार-बार दोहराते जाते हे ।

मेने भी कुछ गलतिया की,उनको डायरी में अंकित भी किया किन्तु अंकन उपरांत भी चुके होती रही! डेस्टिनी हे की आपका पीछा नहीं छोडती, वह आपके साथ साये की तरह साथ चलती हे ।
एक गलती हुई थी साइंस कॉलेज के दिनों में जिसका भरपाई सम्भवतः कभी नहीं होगी,वहा करियर की ऊँची उड़ान 'धर्म निर्वहन' के चलते स्वाहा हो गयी ।

उसका मेरा सम्बन्ध ही क्या था,वह तो बणिक थी न...! सम्भवतः मेरी  सम्बोधन में अपनत्व बनाने की भावनाये और उसके प्रति निर्वहन की हटता ही थी की एक क्लासमेट  के साथ हुए अभद्र व्यवहार पर वर्षो से सुप्त हुआ 'ठाकुर' जाग गया और ...और  डिग्री से अंतिम कुछ पलो पूर्व सिर में ६टाँके थे........जगह-जगह से कपड़े फ़टे थे किन्तु किये पर तनिक भी मलाल न था ...!सहयोगी मित्रो पर गर्व था....।
हम अपने नजदीकी जनपदों से कुल 18 थे  6 लडकिया .और 12 लड़के, एक परिवार सा ही परिवार वहां भी था।..परस्पर कभी वह भाव न था जो उम्र के उस पड़ाव में प्रायः होता हे।हम एक विद्यालय परिवार के 18 भाई-बहिनो की तरह जो टिपिंन, केन्टीन,ग्रुप स्टडी से लेकर लेव के उस सुर्ख प्रकाश में भी साथ ही रहते थे ।
एक अजीव सा रिस्ता था परस्पर लड़ने से लेकर पढ़ने तक का ,और उन्हें अपना उत्तरदायित्व समझ छात्रावास तक छोड़ने का !
बहुत ही भोली सी थी वह "बड़की दी" जो आयु में मात्र 3 माह बड़ी थी किन्तु 17 लोगो की दीदी नहीं दादी की तरह व्यवहार करती थी।सबको प्रिप्रेसन से लेकर प्रजेंटेसन और खाने से लेकर जागने तक के लिए फटकार दिया करती थी ...!उस के द्वारा  सिर में हल्की चपत लगाने का स्नेह उस समय कितना स्नेहिल हुआ करता था। वह किसी के हल्के बीमार होने पर एक प्रशिक्षित नर्स बन जाती थी फिर चाहे सुभह का कॉलेज मिस हो जाए अथवा कालांस ...उन्हें चिंता थी तो अपने अनुज-अनुजाओ की...!
करुणा नाम था उन दीदी का और यथा नाम तथो गुणः की सूक्ति जैसा स्वभाव ...!

उस दिन वह हम सभी से कुछ सो मिटर की दुरी पर रह गयी....कॉलेज गेट के बाहर स्टेशनरी की दूकान से कुछ नोट्स के लिए रजिस्टर्स जो लेने थे ....किन्तु उस उनके कन्धों से पहली बार मर्यादा का पट नहीं था! वह वस किसी निर्जीव शरीर की भाँती थके-हारे,निष्प्राण कदमो से आती दिखी....हम सब हत प्रभ थे कि सदा समय से आगे चलने बाली करुणा जीजी आज इतनी मन्थर कैसे हो गयी ?

शेलजा के झिझोड़ने पर जेसे करुणा जीजी का कृदन और भावुकता का ठाठे मारता सागर फुट पड़ा....वह जिसे देखती वस रोती और बहुत जोर से रोटी,जेसे कोई बड़ा रहष्य उनकी आत्मा से निकलना चाहता हो किन्तु उसे अंदर ही अंदर पी जाने का असफल प्रयास कर रही हो ...और एक साथ अठारह भाई-बहिनो का दामन अश्रुओं से तर हो गया....उस दिन की कॉलेज का किसी को ध्यान ही कब था,जब कॉलेज का समय बताने बाली दीदी ही कस्ट में थी....!शैलजा,कविता,रोहिणी,अमन, हरिओम सब बार-बार पूछ रहे थे किन्तु मेरी निगाये दीदी का दुपट्टा खोज रही थी। पूर्वाभाष हो रहा था की,वह दुपट्टा सम्भवत किसी के मलिन हाथो से  मैला होकर बंधू के धर्म निर्वहन को पुकार रहा था। उस दुपट्टे का ऋण था जो कितनी ही बार गर्म माथे की पट्टी बन जाया करता था..! उस दुपट्टे का ऋण था जो कितनी बार मेरे माथे का दर्द छीन लिया करता था। उस दुपट्टे का ऋण था जो बिन बहन हुए भी निस्वार्थ अनुज को दुलारता था ...!
आज किसी ने उसी दामन को मलिन करने का प्रयास किया था और उसी भ्रात धर्म निर्वहन में बो हो गया जिसके पूर्वाभाष से करुणा दीदी सिर्फ कृंदन के हलाहल को पि रही थी ।
अमन बो लड़का था जो नजदीकी जनपद का ना होकर बेहद नजदीकी था,उसके शब्द "पवन भिया में जनता हु उस कमीन को जिसने अपनी दीदी को रुलाया हे,भइओ आज आप 12 नहीं 13 भाई हे,चलो सालो के हाथ ही काट देते हे !"
शब्द नहीं बो तलाश थी जिसके लिए हम सब पिछले 2 घण्टो में 2 हजार बार मरे थे और जेसे दीदी की 'सप्तमसुधि' जागृत हुई ।
"छुटकू तू कुछ मत करना,भला तेरे साथ तेरे 18 भाई बहिनो का उत्तरदायित्व भी हे। उन्हें कोन सम्भाल पायेगा!मत जा मेरे वीर !"
जब युद्ध अथवा लड़ाई आवश्यकता बन जाए तब दीदी तब मुँह फेरना,अपनी कुल मर्यादा के बिपरीत हे।यंहा तो धर्म की बात हे,में सुप्त सैनिक नहीं हूँ दीदी.....जितने आपके आसु इस केम्पस में गिरे हे मुझे उतना ही उसका लहू गिराना हे ताकि फिर से किसी करुणा दी की तरफ कोई 'कमीन' नजर भर न देखे ।
फिर बो हुआ जो अपनी मिटटी में रोज होता हे,दोनों तरफ से लात,घूंसे,पत्थर,ब्रेंच के पाये और उसकी निम्न जात को दर्शाते मेरे बीहड़िया शब्दों को किसी ने नोकिया 6600 पर रिकार्ड किया ।
ये कोई फ़िल्मी सीन नहीं जो में बच जाता सर में 6 टाँके,पीठ पे अनगिनत नील निशाँ  मुझे मेरे धर्म निर्वहन में उत्तीर्नांक दे रहे थे जबकि मलिंमुखी धूर्त के पैर को तोड़ चुका था....उसकी फ़टी हुई हथेली और कन्धे से टपकता लहू मुझे असीम सुख दे रहा था। में नहीं समझता उस दिन रक्त को देख दर्द क्यों न महसूस हो रहा था,महसूस तो मात्र उसकी दर्द भरी चीखो में एक लक्ष्यवेदन को कर रहा था ।।

केम्पस से कुछ ही फलांग पर रहने बाले पुलिस जवानो ने बूथ पे बिठा क्रास केस पंजीबद्ध किया,जिसके कुछ समय बाद ही स्वम प्रिंसिपल महोदया ने ...मुझे पुत्रवत स्नेह करती थी ..आवश्यक जमानती पत्र दाखिल कराये ..!

किन्तु नियति को कुछ और मंजूर था .....उसे तो मेरी असफलता की दूसरी कहानी लिखनी थी ....एक कॉलेज टॉपर और उसके सहयोगियों की धर्मनिर्वहन संगत लड़ाई पर 'एस्ट्रोसिटी एक्ट' के मामला पंजीबद्ध हुआ। शायद जीवन में पहली बार भारतीय दण्ड प्रक्रिया में निहित लचक को इतनी नजदीकी से देखा था और सुदूर बीहड़ो में बसी चम्बल मिटटी की सेकड़ो दास्ताने चलचित्र हो चुकी थी ।

पहले कॉलेज एक्जाम्स छूटे फिर छूटा सफल होने का स्वर्णिम सपना जिसमे माँ,पिता,भाई और सम्बन्धियो के सेकड़ो सपने निहित थे।कही न कहि मेरे एक के कारण 18 परिवारो का सपना एक ही दिन में कांच किरचों की तरह बिखर गया।मेरे कॉलेज छूटने के साथ उन सभी कॉलेज छोडा जो कही न कहि उनकी भावनाओ के वस हुआ ।
इस जीवन का वह सबसे बड़ा अपराधबोध था जिसके कारण सेकड़ो लोगो की आश पर मुझ दम्भी ने एक ही क्षण में तुषारापात कर दिया ।
करुणा दीदी अनुजा बहिने जब भी मिलती हे न जाने क्यों मुझे गर्वित नजरो से देखती हे।जबकि में स्वम को उन सबका अपराधी आज भी मानता हूँ ...!
18 बहिन-भाइयो का साझा परिवार कॉलेज पहुचा तो अलग-अलग था किन्तु घर साथ-साथ आया
में आज तक उन 18 परिवारो से नहीं मिला क्योंकि मुझे स्वम से घृणा होने जा रही हे जबकि उन 18 माँ ओ की नजर में 'पवनप्रताप' आज भी एक हीरो हे और उनका पूत हे ।

परछाइयों के कद बढ़ते गए और पवनप्रताप,जितेन्द्र हो गए ......
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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

गुरुवार, 6 जून 2019

हल्दी घाटी के महावलिदानी

    ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                   भाग-56
        ग्वालियर के राजा राम शाह तोमर
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चम्बल की माटी का रंग ही कुछ ऐसा हे की वलिदानो को अगर कलमबद्ध किया जाए तो सम्भवतः मसि और कागद की आपूर्ति की जा सके।जब जब पूर्व से पुरवाई व्यार इस क्षेत्र में वहति हे तो बढ़ता हे चम्बल का स्तर और साथ में बढ़ता क्षेत्रवासियों की रगो में रक्तसंचार....बढ़ते रक्तसंचार की परिणीति जन्म दायक बन जाती हे कर्तव्य और धर्म के प्रति कर्तव्यता की अनुभूति के साथ-साथ प्रवल हो जाता हे कुछ करगुजरने का माद्दा ....और रच जाते हे सुभटता के इतिहास जो समय समय मातृभूमि के प्रति आहूत होने के रूप में पुनः दोहराये जाते रहे हे ....!

आज यह गाथा हे उस तीन पीढ़ी के आत्मवलिदान की जो ग्रीष्म होते हुए जब भगवान भाष्कर के  प्रचण्ड पर होते 'रक्त तलाई' को 'मुगल रक्त' से लवालव करके मानो श्रवण से पूर्ण श्रवण में परिवर्तित कर चुके थे और आज भी 'मेवाड़धरा' में चिरनिद्रा में लीन हे .....।
1526 ई. पानीपत के युद्ध में राजा विक्रमादित्य के वीगतिक हो जाने के समय रामशाह तंवर मात्र 10 वर्ष की आयु के थे| पानीपत युद्ध के बाद पूरा परिवार खानाबदोश  हो गया और इधर उधर भटकता रहा| युवा रामशाह ने अपना पेतृक़  राज्य पाने की दशको कोशिशें की किन्तु नियति ने कुछ अलग ही नियत कर रखा था और स्वराज्य प्राप्य करने के सभी प्रयास असफल होते गए।अंततः कुछ परिवार चम्बल के सुदूर विहडो में  रच बस गए तो कुछ इधर उधर छोटे-छोटे गढ़ो में स्थिर हो गए ....!

वह समय था  1558 ई. का जब नियति ने नियत को बदलना अस्वीकार कर दिया और अपने राज्य की पुनर्प्राप्ति में किया गयाअंतिम  ग्वालियर पाने का आखिरी प्रयास असफल होने के बाद रामशाह चम्बल के बीहड़ छोड़ वीरों के स्वर्ग व शरणस्थली चितौड़ की ओर चल पड़े.....!
मेवाड़ की वीरप्रसूता भूमि जो उस वक्त वीरों की शरणस्थली ही नहीं तीर्थस्थली भी थी।इस भूमि  पर कदम रखते ही रामशाह तोमर का मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने अतिथि परम्परा के अनुरूप  स्वागत सत्कार किया। यही नहीं ....!सम्बन्धो और आत्मीयता देने के लिए महाराणा उदयसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह रामशाह तोमर के पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ कर आपसी सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता प्रदान की| इन्हीं सम्बन्धों के चलते रामशाह तंवर मेवाड़ में रहे और वहां मिले सम्मान के बदले मेवाड़ के लिए हरदम अपना सब कुछ बलिदान देने को तत्पर रहते थे ।

१८जून 1576 को मेवाड़ और दिल्ली के मुगल आक्रांता अकबर के मध्य घमासान युद्ध चल रहा था ....क्योंकि महाराणा ही ऐसे एक शाशक थे जिन्होंने अकेले दम पर मुगलो की युद्ध चुनोती को स्वीकार कर लिया मातृभूमि की माटी का जीते जी तिल मात्र भाग न देने की सपथ उठा राखी थी।इन्ही के सैना का प्रमुख मारक भाग थे चम्बल सपूत महाराज रामसाह तोमर और उनके पुत्र  जिन्होंने 'हरावल दस्ते' (अग्रिम पंक्ति योद्धा) सदा से उत्तरदायित्व सम्भाला हुआ था .....छापामार और गोरिल्ला युद्ध कलाये इनको विरासत में मिली थी लगभग ३५० रणबांकुरों की लपलपाति तलवारे  निरन्तर मुगलो के रक्त को पान कर रही थी .....हल्दीघाटी उस समय दुसरा 'कुरुक्षेत्र' प्रतीत हो रही थी।और रक्ततलाई रक्त से उफ़न रही थी .....लोथो के ऊपर लोथ जम रहे थे कटे हुये नरमुंड रक्त के ऊपर तैर रहे थे .....!
इस युद्ध में एक वृद्ध वीर अपने तीन पुत्रों व अपने निकट वंशी बन्धु बान्धवो के साथ हरावल (अग्रिम पंक्ति) में दुश्मन के छक्के छुड़ाता नजर आ रहा थे । युद्ध में जिस तल्लीन भाव से यह योद्धा तलवार चलाते हुए दुश्मन के सिपाहियों के सिर कलम करता आगे बढ़ रहा था, उस समय उस बड़ी उम्र में भी उसकी वीरता, शौर्य और चेहरे पर उभरे भाव देखकर लग रहा था कि यह वृद्ध योद्धा शायद आज मेवाड़ का कोई कर्ज चुकाने को इस आराम करने वाली उम्र में भी भयंकर युद्ध कर रहा है ।
इस योद्धा को अपूर्व रण कौशल का परिचय देते हुए मुगल सेना के छक्के छुड़ाते देख अकबर के दरबारी लेखक व योद्धा बदायूंनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली| बदायूंनी ने देखा वह योद्धा दाहिनी तरफ हाथियों की लड़ाई को बायें छोड़ते हुए मुग़ल सेना के मुख्य भाग में पहुँच गया और वहां मारकाट मचा दी| अल बदायूंनी लिखता है- “ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान के पोते रामशाह ने हमेशा राणा की हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहते ठेको, ऐसी वीरता दिखलाई जिसका वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है| उसके तेज हमले के कारण हरावल में वाम पार्श्व में मानसिंह के राजपूतों को भागकर दाहिने पार्श्व के सैयदों की शरण लेनी पड़ी जिससे आसफखां को भी भागना पड़ा| यदि इस समय सैयद लोग टिके नहीं रहते तो हरावल के आगे आये हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार हो जाती |" 

रक्त तलाई,मेवाड़ और राजपूताने की माटी में अन्तिम स्वास तक लड़ते हुए योद्धा और युद्ध के सर्वोच्य पद को प्राप्त करने बाली तीन पीढ़ियों के आत्मोत्सर्ग को चम्बल की कोटि कोटि नमन करती हे और उनकी समृति में आगामी दिनाक १८/०६/२०१९ को कुलदेवी योगेश्वरी माँ के भवन में आप सभी को एक सूत्र में बन्धने की लिए पुनः आह्वान करती हे ।
आइये पूर्वजो के वलिदान को स्मरण करे व उन्हें स्मरण करे ...🙏
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जय माँ योगेस्वरी भवानी
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‌जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

सोमवार, 27 मई 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन भाग 5 लाखन संशोधित

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
       भाग-५ ब (संसोधित व विस्तृत)
            ★बागी लाखन सिंह★
एक छोटी सी घटना से रघुबीर सिंह और लाखन सिंह का परिवार एक दूसरे के आमने सामने आ गया। चम्बल में अहसास ही नहीं हो पाता की कब चीर का सांप बन जाए और कब भाई से मानस मरी हो जाए...!
एक छोटा सा मानसिक सन्तुलन और समझने में हुई चूक से कितने घरो में चिराग बुझे और कितने चिराग बीहड़ में दौड़े।अगर समय पर आपसी मनभेद भुलाकर चर्चा की जाती तो सम्भवतः रघुवीर सिंह और लाखन सिंह की मित्रता कभी शशत्रुता के गहन अन्धकार में कालकबलित नहीं होती किन्तु नियति और विधि पर किसी का प्रभाव् नहीं पड़ता ।

मानक सिंह उस दुश्मनी की कहानी का चश्मदीद थे। 90 साल की उम्र में भी मानक सिंह को वो पूरी कहानी फिल्म की रील की तरह से याद है क्योंकि मानक सिंह खुद लाखन सिंह का भतीजा है और गैंग में सालों तक दुश्मनों पर पुलिस पर गोलियां चला चुका है। सात हत्याओं के आरोपी मानक सिंह ने लाखन के कहने पर ही पुलिस के सामने समर्पण किया था।
नगरा गांव में दो ठाकुर परिवारों की दुश्मनी की कहानी शुरू हो चुकी थी। लाखन सिंह इलाके के एक गांव में डकैती डालकर चंबल का रास्ता तय कर लिया। इस वारदात में उसके भाई और दूसरे लोग तो गिरफ्तार हुए लेकिन लाखन फरार हो गया।
चंबल में सबसे पहले हर गोविंद और महाराज सिंह के गैंग में कुछ दिन रहे। उसके बाद उसने चरणा डकैत के गैंग में शामिल हुआ। लेकिन उसने वहां से भी जल्दी ही किनारा कर लिया। क्योंकि लाखन सिंह को किसी से आदेश लेना पसंद नहीं था। लाखन सिंह ने अपना गैंग बना लिया और उसमें परिवार के कई लोग शामिल हो गए।
लाखन ने बदला लेना शुरू कर दिया। और डकैती में उसकी मुखबिरी करने के शक में पांच लोगों को एक साथ लाईन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया। वारदात से चंबल में लाखन सिंह का नाम सुर्खियों में आ गया। इस मामले में लाखन सिंह का भाई फिरंगी सिंह पकड़ा गया। फिरंगी सिंह हाईकोर्ट में अपील पर बाहर आ गया। लेकिन इस दौरान गांव में रघुबीर सिंह का रूतबा काफी ऊंचा हो गया था और फिरंगी के बाहर आने पर रघुबीर सिंह ने एक बार फिर उसको पुलिस की मदद से अंदर करा दिया और आरोप लगाया धमकी देने और सताने का।  इस बात ने लाखन सिंह के जख्मों को फिर से हरा कर दिया। लाखन सिंह ने अपना बदला लेने का फैसला किया।
दो महीने बाद नगरा गांव के बाहर खेत में हवेली के दो लोगो तिलक सिंह और मथुरी सिंह की लाश  गोलियों से छलनी पड़ी पाई गई। इस घटना ने लाखन सिंह को पुलिस रिकॉर्ड में लाखन द टैरिबल का नाम  दिया। पुलिस अब लाखन सिंह का सफाया करना चाहती थी। हवेली ने भी लाखन के सफाएं में पुलिस की पूरे तौर पर मदद करना शुरू कर दिया। लेकिन लाखन ने इस कत्ल के बाद तो लूट, डकैती और कत्ल की एक पूरी नदी ही बहा दी। हर रोज कही न कही लाखन सिंह गैंग की वारदात की खबर पुलिस फाईलों में दर्ज होने लगी।  और पुलिस के साथ मुठभेड़ से लाखन सिंह नहीं डरता था। उसका हौंसला कितना बढ़ा हुआ था इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि 1952-53 के बीच लाखन और पुलिस के बीच 9 एनकाउंटर हुए। इन एनकाउंटर में लाखन के सिर्फ दो लोग ही पुलिस की गोलियों का शिकार बने वही इस दौरान लाखन ने 47 लोगो को अपना निशाना बनाया।
लाखन सिंह का कहर अब हवेली पर बढ़ता जा रहा था। हवेली के हर कोने पर गोलियों के निशान उसके खौंफ की कहानी बता रहे है। रघुवीर सिंह की पुस्तैनी हवेली में समय दर समय लाखन की रायफल से होते सुराख और नगरा में पुलिस का बढ़टी नफरी इस बात का प्रमाण दे रही थी की लाखन अपना बदला लेने के लिए हमेशा ताक में लगा रहता था। इसके अलावा लाखन इलाके में भी वारदात करने में जुटा रहता था। मार्च 1952 में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में ऊंटों के नाम पर अपनी किस्मत के सहारे बच निकले लाखन का शक एक बार फिर मुखबिरी के लिए रघुबीर सिंह पर ही गया।
गांव में दशहरे मनाया जा रहा था। लेकिन इसी बीच नगरा गांव के खेतों में हवेली वालों में से एक जबर सिंह को लाखन सिंह ने पकड़ लिया। लाखन सिंह ने जबर सिंह को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद गांव के बाहर से निकलते हुए ऐलान कर दिया कि वो हर दशहरे पर इस हवेली पर मौत बरसाएंगा।
मध्यप्रदेश पुलिस लाखन की दुश्मनी और कहर दोनों को जान चुकी थी। लिहाजा पुलिस ने लाखन को मारने के लिए एक प्लान बना दिया। प्लान था कि दशहरे पर लाखन फिर हवेली आएंगा और हवेली में रघुबीर का परिवार की सुरक्षा में पुलिस की पूरी बटालियन तैनात मिलेगी। 1954 में दशहरे के दिन लाखन ने फिर हवेली पर हमला किया लेकिन इस बार हवेली से निकली पुलिस की गोलियों ने उसके पैर उखाड़ दिए। लाखन को भागना पड़ा। ये लाखन के लिए एक हार थी। और हार का बदला लेना लाखन को अच्छी तरह से आता था।
दशहरे के दो दिन बाद पुलिस को सूचना मिली कि बीती रात आगरा के पास मानसिंह गैंग से पुलिस के बड़ी मुठभेड़ हुई है। और उस मुठभेड़ में मानसिंह गैंग के साथ लाखन सिंह का गैंग भी था। लिहाजा पुलिस को उम्मीद हुई कि मुठभेड़ से बच निकला गैंग अपने पुराने रास्ते से लौटेंगा। नगरा में थाना बना चुकी पुलिस को आदेश मिला कि वो आगरा वाले रास्ते पर कूच करे। पुलिस ने तेजी के साथ मूवमेंट की। नगरा थाना यानि हवेली से निकली पुलिस को गांव से निकले कुछ ही वक्त हुआ होगा। कि अचानक खेतों से लाखन का गैंग निकल आया।  और हवेली में कत्लेआम मचा दिया। 6 लोगो को मौत के घाट उतार कर लाखन सिंह वहां से निकल लिया।
पुलिस को इससे बड़ी हार शायद ही किसी डाकू के हाथ मिली हो। नगरा से सत्रह किलोमीटर दूर कस्बा पोरसा में मध्यप्रदेश पुलिस के डीआईजी ठहरे हुए थे। खबर पोरसा तक पहुंची तो सदमे में आई पुलिस फौरन नगरा पहुंची। लेकिन तब हवेली के अंदर सिर्फ रोने चीखने की चीत्कारें और हवेली के बाहर गोलियों के निशान बचे थे। लाखन अपना बदला लेकर निकल चुका था। लेकिन दुश्मनी कम नहीं थी। कहते है कि हवेली के लोगो की चिताओं के जलने से पहले ही रघुबीर सिंह के लोगो ने भी दूसरी तरफ लाशें बिछा दी।
अब इस दुश्मनी की कहानी चंबल के बीहड़ की हर डांग या भरकों में गूंज रही थी। पुलिस के मत्थे एक नाकामी का दाग बढ़ता जा रहा था। पुलिस चाहती थी कि किसी भी तरह इस दाग को साफ करने की कोशिश की जाएं..........
कृमशः
सलंग्न चित्र लाखन सिंह के भाई फिरंगी सिंह जी (जीवित अवस्था में )

                  जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

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