शनिवार, 22 जून 2019

डायरी भाग 1

             ★यादो के कद★
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कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता हे की आपकी यादे आपसे कही आगे चलती हे।आप जिन्हें बारम्बार भूलने का प्रयास करते हे,वह आपके समक्ष आपसे अपना कद बड़ा करते हुए दिख जाती हे। और आप गहरे विसाद की स्तिथि से दो-चार करते हुए स्वम को पाते हे,किन्तु आपकी अविजित पराजय का मूल होती हे वह गलतिया जिन्हें आप बार-बार दोहराते जाते हे ।

मेने भी कुछ गलतिया की,उनको डायरी में अंकित भी किया किन्तु अंकन उपरांत भी चुके होती रही! डेस्टिनी हे की आपका पीछा नहीं छोडती, वह आपके साथ साये की तरह साथ चलती हे ।
एक गलती हुई थी साइंस कॉलेज के दिनों में जिसका भरपाई सम्भवतः कभी नहीं होगी,वहा करियर की ऊँची उड़ान 'धर्म निर्वहन' के चलते स्वाहा हो गयी ।

उसका मेरा सम्बन्ध ही क्या था,वह तो बणिक थी न...! सम्भवतः मेरी  सम्बोधन में अपनत्व बनाने की भावनाये और उसके प्रति निर्वहन की हटता ही थी की एक क्लासमेट  के साथ हुए अभद्र व्यवहार पर वर्षो से सुप्त हुआ 'ठाकुर' जाग गया और ...और  डिग्री से अंतिम कुछ पलो पूर्व सिर में ६टाँके थे........जगह-जगह से कपड़े फ़टे थे किन्तु किये पर तनिक भी मलाल न था ...!सहयोगी मित्रो पर गर्व था....।
हम अपने नजदीकी जनपदों से कुल 18 थे  6 लडकिया .और 12 लड़के, एक परिवार सा ही परिवार वहां भी था।..परस्पर कभी वह भाव न था जो उम्र के उस पड़ाव में प्रायः होता हे।हम एक विद्यालय परिवार के 18 भाई-बहिनो की तरह जो टिपिंन, केन्टीन,ग्रुप स्टडी से लेकर लेव के उस सुर्ख प्रकाश में भी साथ ही रहते थे ।
एक अजीव सा रिस्ता था परस्पर लड़ने से लेकर पढ़ने तक का ,और उन्हें अपना उत्तरदायित्व समझ छात्रावास तक छोड़ने का !
बहुत ही भोली सी थी वह "बड़की दी" जो आयु में मात्र 3 माह बड़ी थी किन्तु 17 लोगो की दीदी नहीं दादी की तरह व्यवहार करती थी।सबको प्रिप्रेसन से लेकर प्रजेंटेसन और खाने से लेकर जागने तक के लिए फटकार दिया करती थी ...!उस के द्वारा  सिर में हल्की चपत लगाने का स्नेह उस समय कितना स्नेहिल हुआ करता था। वह किसी के हल्के बीमार होने पर एक प्रशिक्षित नर्स बन जाती थी फिर चाहे सुभह का कॉलेज मिस हो जाए अथवा कालांस ...उन्हें चिंता थी तो अपने अनुज-अनुजाओ की...!
करुणा नाम था उन दीदी का और यथा नाम तथो गुणः की सूक्ति जैसा स्वभाव ...!

उस दिन वह हम सभी से कुछ सो मिटर की दुरी पर रह गयी....कॉलेज गेट के बाहर स्टेशनरी की दूकान से कुछ नोट्स के लिए रजिस्टर्स जो लेने थे ....किन्तु उस उनके कन्धों से पहली बार मर्यादा का पट नहीं था! वह वस किसी निर्जीव शरीर की भाँती थके-हारे,निष्प्राण कदमो से आती दिखी....हम सब हत प्रभ थे कि सदा समय से आगे चलने बाली करुणा जीजी आज इतनी मन्थर कैसे हो गयी ?

शेलजा के झिझोड़ने पर जेसे करुणा जीजी का कृदन और भावुकता का ठाठे मारता सागर फुट पड़ा....वह जिसे देखती वस रोती और बहुत जोर से रोटी,जेसे कोई बड़ा रहष्य उनकी आत्मा से निकलना चाहता हो किन्तु उसे अंदर ही अंदर पी जाने का असफल प्रयास कर रही हो ...और एक साथ अठारह भाई-बहिनो का दामन अश्रुओं से तर हो गया....उस दिन की कॉलेज का किसी को ध्यान ही कब था,जब कॉलेज का समय बताने बाली दीदी ही कस्ट में थी....!शैलजा,कविता,रोहिणी,अमन, हरिओम सब बार-बार पूछ रहे थे किन्तु मेरी निगाये दीदी का दुपट्टा खोज रही थी। पूर्वाभाष हो रहा था की,वह दुपट्टा सम्भवत किसी के मलिन हाथो से  मैला होकर बंधू के धर्म निर्वहन को पुकार रहा था। उस दुपट्टे का ऋण था जो कितनी ही बार गर्म माथे की पट्टी बन जाया करता था..! उस दुपट्टे का ऋण था जो कितनी बार मेरे माथे का दर्द छीन लिया करता था। उस दुपट्टे का ऋण था जो बिन बहन हुए भी निस्वार्थ अनुज को दुलारता था ...!
आज किसी ने उसी दामन को मलिन करने का प्रयास किया था और उसी भ्रात धर्म निर्वहन में बो हो गया जिसके पूर्वाभाष से करुणा दीदी सिर्फ कृंदन के हलाहल को पि रही थी ।
अमन बो लड़का था जो नजदीकी जनपद का ना होकर बेहद नजदीकी था,उसके शब्द "पवन भिया में जनता हु उस कमीन को जिसने अपनी दीदी को रुलाया हे,भइओ आज आप 12 नहीं 13 भाई हे,चलो सालो के हाथ ही काट देते हे !"
शब्द नहीं बो तलाश थी जिसके लिए हम सब पिछले 2 घण्टो में 2 हजार बार मरे थे और जेसे दीदी की 'सप्तमसुधि' जागृत हुई ।
"छुटकू तू कुछ मत करना,भला तेरे साथ तेरे 18 भाई बहिनो का उत्तरदायित्व भी हे। उन्हें कोन सम्भाल पायेगा!मत जा मेरे वीर !"
जब युद्ध अथवा लड़ाई आवश्यकता बन जाए तब दीदी तब मुँह फेरना,अपनी कुल मर्यादा के बिपरीत हे।यंहा तो धर्म की बात हे,में सुप्त सैनिक नहीं हूँ दीदी.....जितने आपके आसु इस केम्पस में गिरे हे मुझे उतना ही उसका लहू गिराना हे ताकि फिर से किसी करुणा दी की तरफ कोई 'कमीन' नजर भर न देखे ।
फिर बो हुआ जो अपनी मिटटी में रोज होता हे,दोनों तरफ से लात,घूंसे,पत्थर,ब्रेंच के पाये और उसकी निम्न जात को दर्शाते मेरे बीहड़िया शब्दों को किसी ने नोकिया 6600 पर रिकार्ड किया ।
ये कोई फ़िल्मी सीन नहीं जो में बच जाता सर में 6 टाँके,पीठ पे अनगिनत नील निशाँ  मुझे मेरे धर्म निर्वहन में उत्तीर्नांक दे रहे थे जबकि मलिंमुखी धूर्त के पैर को तोड़ चुका था....उसकी फ़टी हुई हथेली और कन्धे से टपकता लहू मुझे असीम सुख दे रहा था। में नहीं समझता उस दिन रक्त को देख दर्द क्यों न महसूस हो रहा था,महसूस तो मात्र उसकी दर्द भरी चीखो में एक लक्ष्यवेदन को कर रहा था ।।

केम्पस से कुछ ही फलांग पर रहने बाले पुलिस जवानो ने बूथ पे बिठा क्रास केस पंजीबद्ध किया,जिसके कुछ समय बाद ही स्वम प्रिंसिपल महोदया ने ...मुझे पुत्रवत स्नेह करती थी ..आवश्यक जमानती पत्र दाखिल कराये ..!

किन्तु नियति को कुछ और मंजूर था .....उसे तो मेरी असफलता की दूसरी कहानी लिखनी थी ....एक कॉलेज टॉपर और उसके सहयोगियों की धर्मनिर्वहन संगत लड़ाई पर 'एस्ट्रोसिटी एक्ट' के मामला पंजीबद्ध हुआ। शायद जीवन में पहली बार भारतीय दण्ड प्रक्रिया में निहित लचक को इतनी नजदीकी से देखा था और सुदूर बीहड़ो में बसी चम्बल मिटटी की सेकड़ो दास्ताने चलचित्र हो चुकी थी ।

पहले कॉलेज एक्जाम्स छूटे फिर छूटा सफल होने का स्वर्णिम सपना जिसमे माँ,पिता,भाई और सम्बन्धियो के सेकड़ो सपने निहित थे।कही न कहि मेरे एक के कारण 18 परिवारो का सपना एक ही दिन में कांच किरचों की तरह बिखर गया।मेरे कॉलेज छूटने के साथ उन सभी कॉलेज छोडा जो कही न कहि उनकी भावनाओ के वस हुआ ।
इस जीवन का वह सबसे बड़ा अपराधबोध था जिसके कारण सेकड़ो लोगो की आश पर मुझ दम्भी ने एक ही क्षण में तुषारापात कर दिया ।
करुणा दीदी अनुजा बहिने जब भी मिलती हे न जाने क्यों मुझे गर्वित नजरो से देखती हे।जबकि में स्वम को उन सबका अपराधी आज भी मानता हूँ ...!
18 बहिन-भाइयो का साझा परिवार कॉलेज पहुचा तो अलग-अलग था किन्तु घर साथ-साथ आया
में आज तक उन 18 परिवारो से नहीं मिला क्योंकि मुझे स्वम से घृणा होने जा रही हे जबकि उन 18 माँ ओ की नजर में 'पवनप्रताप' आज भी एक हीरो हे और उनका पूत हे ।

परछाइयों के कद बढ़ते गए और पवनप्रताप,जितेन्द्र हो गए ......
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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

गुरुवार, 6 जून 2019

हल्दी घाटी के महावलिदानी

    ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                   भाग-56
        ग्वालियर के राजा राम शाह तोमर
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चम्बल की माटी का रंग ही कुछ ऐसा हे की वलिदानो को अगर कलमबद्ध किया जाए तो सम्भवतः मसि और कागद की आपूर्ति की जा सके।जब जब पूर्व से पुरवाई व्यार इस क्षेत्र में वहति हे तो बढ़ता हे चम्बल का स्तर और साथ में बढ़ता क्षेत्रवासियों की रगो में रक्तसंचार....बढ़ते रक्तसंचार की परिणीति जन्म दायक बन जाती हे कर्तव्य और धर्म के प्रति कर्तव्यता की अनुभूति के साथ-साथ प्रवल हो जाता हे कुछ करगुजरने का माद्दा ....और रच जाते हे सुभटता के इतिहास जो समय समय मातृभूमि के प्रति आहूत होने के रूप में पुनः दोहराये जाते रहे हे ....!

आज यह गाथा हे उस तीन पीढ़ी के आत्मवलिदान की जो ग्रीष्म होते हुए जब भगवान भाष्कर के  प्रचण्ड पर होते 'रक्त तलाई' को 'मुगल रक्त' से लवालव करके मानो श्रवण से पूर्ण श्रवण में परिवर्तित कर चुके थे और आज भी 'मेवाड़धरा' में चिरनिद्रा में लीन हे .....।
1526 ई. पानीपत के युद्ध में राजा विक्रमादित्य के वीगतिक हो जाने के समय रामशाह तंवर मात्र 10 वर्ष की आयु के थे| पानीपत युद्ध के बाद पूरा परिवार खानाबदोश  हो गया और इधर उधर भटकता रहा| युवा रामशाह ने अपना पेतृक़  राज्य पाने की दशको कोशिशें की किन्तु नियति ने कुछ अलग ही नियत कर रखा था और स्वराज्य प्राप्य करने के सभी प्रयास असफल होते गए।अंततः कुछ परिवार चम्बल के सुदूर विहडो में  रच बस गए तो कुछ इधर उधर छोटे-छोटे गढ़ो में स्थिर हो गए ....!

वह समय था  1558 ई. का जब नियति ने नियत को बदलना अस्वीकार कर दिया और अपने राज्य की पुनर्प्राप्ति में किया गयाअंतिम  ग्वालियर पाने का आखिरी प्रयास असफल होने के बाद रामशाह चम्बल के बीहड़ छोड़ वीरों के स्वर्ग व शरणस्थली चितौड़ की ओर चल पड़े.....!
मेवाड़ की वीरप्रसूता भूमि जो उस वक्त वीरों की शरणस्थली ही नहीं तीर्थस्थली भी थी।इस भूमि  पर कदम रखते ही रामशाह तोमर का मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने अतिथि परम्परा के अनुरूप  स्वागत सत्कार किया। यही नहीं ....!सम्बन्धो और आत्मीयता देने के लिए महाराणा उदयसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह रामशाह तोमर के पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ कर आपसी सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता प्रदान की| इन्हीं सम्बन्धों के चलते रामशाह तंवर मेवाड़ में रहे और वहां मिले सम्मान के बदले मेवाड़ के लिए हरदम अपना सब कुछ बलिदान देने को तत्पर रहते थे ।

१८जून 1576 को मेवाड़ और दिल्ली के मुगल आक्रांता अकबर के मध्य घमासान युद्ध चल रहा था ....क्योंकि महाराणा ही ऐसे एक शाशक थे जिन्होंने अकेले दम पर मुगलो की युद्ध चुनोती को स्वीकार कर लिया मातृभूमि की माटी का जीते जी तिल मात्र भाग न देने की सपथ उठा राखी थी।इन्ही के सैना का प्रमुख मारक भाग थे चम्बल सपूत महाराज रामसाह तोमर और उनके पुत्र  जिन्होंने 'हरावल दस्ते' (अग्रिम पंक्ति योद्धा) सदा से उत्तरदायित्व सम्भाला हुआ था .....छापामार और गोरिल्ला युद्ध कलाये इनको विरासत में मिली थी लगभग ३५० रणबांकुरों की लपलपाति तलवारे  निरन्तर मुगलो के रक्त को पान कर रही थी .....हल्दीघाटी उस समय दुसरा 'कुरुक्षेत्र' प्रतीत हो रही थी।और रक्ततलाई रक्त से उफ़न रही थी .....लोथो के ऊपर लोथ जम रहे थे कटे हुये नरमुंड रक्त के ऊपर तैर रहे थे .....!
इस युद्ध में एक वृद्ध वीर अपने तीन पुत्रों व अपने निकट वंशी बन्धु बान्धवो के साथ हरावल (अग्रिम पंक्ति) में दुश्मन के छक्के छुड़ाता नजर आ रहा थे । युद्ध में जिस तल्लीन भाव से यह योद्धा तलवार चलाते हुए दुश्मन के सिपाहियों के सिर कलम करता आगे बढ़ रहा था, उस समय उस बड़ी उम्र में भी उसकी वीरता, शौर्य और चेहरे पर उभरे भाव देखकर लग रहा था कि यह वृद्ध योद्धा शायद आज मेवाड़ का कोई कर्ज चुकाने को इस आराम करने वाली उम्र में भी भयंकर युद्ध कर रहा है ।
इस योद्धा को अपूर्व रण कौशल का परिचय देते हुए मुगल सेना के छक्के छुड़ाते देख अकबर के दरबारी लेखक व योद्धा बदायूंनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली| बदायूंनी ने देखा वह योद्धा दाहिनी तरफ हाथियों की लड़ाई को बायें छोड़ते हुए मुग़ल सेना के मुख्य भाग में पहुँच गया और वहां मारकाट मचा दी| अल बदायूंनी लिखता है- “ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मान के पोते रामशाह ने हमेशा राणा की हरावल (अग्रिम पंक्ति) में रहते ठेको, ऐसी वीरता दिखलाई जिसका वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है| उसके तेज हमले के कारण हरावल में वाम पार्श्व में मानसिंह के राजपूतों को भागकर दाहिने पार्श्व के सैयदों की शरण लेनी पड़ी जिससे आसफखां को भी भागना पड़ा| यदि इस समय सैयद लोग टिके नहीं रहते तो हरावल के आगे आये हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार हो जाती |" 

रक्त तलाई,मेवाड़ और राजपूताने की माटी में अन्तिम स्वास तक लड़ते हुए योद्धा और युद्ध के सर्वोच्य पद को प्राप्त करने बाली तीन पीढ़ियों के आत्मोत्सर्ग को चम्बल की कोटि कोटि नमन करती हे और उनकी समृति में आगामी दिनाक १८/०६/२०१९ को कुलदेवी योगेश्वरी माँ के भवन में आप सभी को एक सूत्र में बन्धने की लिए पुनः आह्वान करती हे ।
आइये पूर्वजो के वलिदान को स्मरण करे व उन्हें स्मरण करे ...🙏
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जय माँ योगेस्वरी भवानी
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‌जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

सोमवार, 27 मई 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन भाग 5 लाखन संशोधित

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
       भाग-५ ब (संसोधित व विस्तृत)
            ★बागी लाखन सिंह★
एक छोटी सी घटना से रघुबीर सिंह और लाखन सिंह का परिवार एक दूसरे के आमने सामने आ गया। चम्बल में अहसास ही नहीं हो पाता की कब चीर का सांप बन जाए और कब भाई से मानस मरी हो जाए...!
एक छोटा सा मानसिक सन्तुलन और समझने में हुई चूक से कितने घरो में चिराग बुझे और कितने चिराग बीहड़ में दौड़े।अगर समय पर आपसी मनभेद भुलाकर चर्चा की जाती तो सम्भवतः रघुवीर सिंह और लाखन सिंह की मित्रता कभी शशत्रुता के गहन अन्धकार में कालकबलित नहीं होती किन्तु नियति और विधि पर किसी का प्रभाव् नहीं पड़ता ।

मानक सिंह उस दुश्मनी की कहानी का चश्मदीद थे। 90 साल की उम्र में भी मानक सिंह को वो पूरी कहानी फिल्म की रील की तरह से याद है क्योंकि मानक सिंह खुद लाखन सिंह का भतीजा है और गैंग में सालों तक दुश्मनों पर पुलिस पर गोलियां चला चुका है। सात हत्याओं के आरोपी मानक सिंह ने लाखन के कहने पर ही पुलिस के सामने समर्पण किया था।
नगरा गांव में दो ठाकुर परिवारों की दुश्मनी की कहानी शुरू हो चुकी थी। लाखन सिंह इलाके के एक गांव में डकैती डालकर चंबल का रास्ता तय कर लिया। इस वारदात में उसके भाई और दूसरे लोग तो गिरफ्तार हुए लेकिन लाखन फरार हो गया।
चंबल में सबसे पहले हर गोविंद और महाराज सिंह के गैंग में कुछ दिन रहे। उसके बाद उसने चरणा डकैत के गैंग में शामिल हुआ। लेकिन उसने वहां से भी जल्दी ही किनारा कर लिया। क्योंकि लाखन सिंह को किसी से आदेश लेना पसंद नहीं था। लाखन सिंह ने अपना गैंग बना लिया और उसमें परिवार के कई लोग शामिल हो गए।
लाखन ने बदला लेना शुरू कर दिया। और डकैती में उसकी मुखबिरी करने के शक में पांच लोगों को एक साथ लाईन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया। वारदात से चंबल में लाखन सिंह का नाम सुर्खियों में आ गया। इस मामले में लाखन सिंह का भाई फिरंगी सिंह पकड़ा गया। फिरंगी सिंह हाईकोर्ट में अपील पर बाहर आ गया। लेकिन इस दौरान गांव में रघुबीर सिंह का रूतबा काफी ऊंचा हो गया था और फिरंगी के बाहर आने पर रघुबीर सिंह ने एक बार फिर उसको पुलिस की मदद से अंदर करा दिया और आरोप लगाया धमकी देने और सताने का।  इस बात ने लाखन सिंह के जख्मों को फिर से हरा कर दिया। लाखन सिंह ने अपना बदला लेने का फैसला किया।
दो महीने बाद नगरा गांव के बाहर खेत में हवेली के दो लोगो तिलक सिंह और मथुरी सिंह की लाश  गोलियों से छलनी पड़ी पाई गई। इस घटना ने लाखन सिंह को पुलिस रिकॉर्ड में लाखन द टैरिबल का नाम  दिया। पुलिस अब लाखन सिंह का सफाया करना चाहती थी। हवेली ने भी लाखन के सफाएं में पुलिस की पूरे तौर पर मदद करना शुरू कर दिया। लेकिन लाखन ने इस कत्ल के बाद तो लूट, डकैती और कत्ल की एक पूरी नदी ही बहा दी। हर रोज कही न कही लाखन सिंह गैंग की वारदात की खबर पुलिस फाईलों में दर्ज होने लगी।  और पुलिस के साथ मुठभेड़ से लाखन सिंह नहीं डरता था। उसका हौंसला कितना बढ़ा हुआ था इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि 1952-53 के बीच लाखन और पुलिस के बीच 9 एनकाउंटर हुए। इन एनकाउंटर में लाखन के सिर्फ दो लोग ही पुलिस की गोलियों का शिकार बने वही इस दौरान लाखन ने 47 लोगो को अपना निशाना बनाया।
लाखन सिंह का कहर अब हवेली पर बढ़ता जा रहा था। हवेली के हर कोने पर गोलियों के निशान उसके खौंफ की कहानी बता रहे है। रघुवीर सिंह की पुस्तैनी हवेली में समय दर समय लाखन की रायफल से होते सुराख और नगरा में पुलिस का बढ़टी नफरी इस बात का प्रमाण दे रही थी की लाखन अपना बदला लेने के लिए हमेशा ताक में लगा रहता था। इसके अलावा लाखन इलाके में भी वारदात करने में जुटा रहता था। मार्च 1952 में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में ऊंटों के नाम पर अपनी किस्मत के सहारे बच निकले लाखन का शक एक बार फिर मुखबिरी के लिए रघुबीर सिंह पर ही गया।
गांव में दशहरे मनाया जा रहा था। लेकिन इसी बीच नगरा गांव के खेतों में हवेली वालों में से एक जबर सिंह को लाखन सिंह ने पकड़ लिया। लाखन सिंह ने जबर सिंह को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद गांव के बाहर से निकलते हुए ऐलान कर दिया कि वो हर दशहरे पर इस हवेली पर मौत बरसाएंगा।
मध्यप्रदेश पुलिस लाखन की दुश्मनी और कहर दोनों को जान चुकी थी। लिहाजा पुलिस ने लाखन को मारने के लिए एक प्लान बना दिया। प्लान था कि दशहरे पर लाखन फिर हवेली आएंगा और हवेली में रघुबीर का परिवार की सुरक्षा में पुलिस की पूरी बटालियन तैनात मिलेगी। 1954 में दशहरे के दिन लाखन ने फिर हवेली पर हमला किया लेकिन इस बार हवेली से निकली पुलिस की गोलियों ने उसके पैर उखाड़ दिए। लाखन को भागना पड़ा। ये लाखन के लिए एक हार थी। और हार का बदला लेना लाखन को अच्छी तरह से आता था।
दशहरे के दो दिन बाद पुलिस को सूचना मिली कि बीती रात आगरा के पास मानसिंह गैंग से पुलिस के बड़ी मुठभेड़ हुई है। और उस मुठभेड़ में मानसिंह गैंग के साथ लाखन सिंह का गैंग भी था। लिहाजा पुलिस को उम्मीद हुई कि मुठभेड़ से बच निकला गैंग अपने पुराने रास्ते से लौटेंगा। नगरा में थाना बना चुकी पुलिस को आदेश मिला कि वो आगरा वाले रास्ते पर कूच करे। पुलिस ने तेजी के साथ मूवमेंट की। नगरा थाना यानि हवेली से निकली पुलिस को गांव से निकले कुछ ही वक्त हुआ होगा। कि अचानक खेतों से लाखन का गैंग निकल आया।  और हवेली में कत्लेआम मचा दिया। 6 लोगो को मौत के घाट उतार कर लाखन सिंह वहां से निकल लिया।
पुलिस को इससे बड़ी हार शायद ही किसी डाकू के हाथ मिली हो। नगरा से सत्रह किलोमीटर दूर कस्बा पोरसा में मध्यप्रदेश पुलिस के डीआईजी ठहरे हुए थे। खबर पोरसा तक पहुंची तो सदमे में आई पुलिस फौरन नगरा पहुंची। लेकिन तब हवेली के अंदर सिर्फ रोने चीखने की चीत्कारें और हवेली के बाहर गोलियों के निशान बचे थे। लाखन अपना बदला लेकर निकल चुका था। लेकिन दुश्मनी कम नहीं थी। कहते है कि हवेली के लोगो की चिताओं के जलने से पहले ही रघुबीर सिंह के लोगो ने भी दूसरी तरफ लाशें बिछा दी।
अब इस दुश्मनी की कहानी चंबल के बीहड़ की हर डांग या भरकों में गूंज रही थी। पुलिस के मत्थे एक नाकामी का दाग बढ़ता जा रहा था। पुलिस चाहती थी कि किसी भी तरह इस दाग को साफ करने की कोशिश की जाएं..........
कृमशः
सलंग्न चित्र लाखन सिंह के भाई फिरंगी सिंह जी (जीवित अवस्था में )

                  जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

रविवार, 14 अप्रैल 2019

पूंजी स्नेह की

#पूंजी_स्नेह_की
हमारे गाँवों रिश्ते बड़े आत्मीय होते हे।यहाँ सिर्फ  माँ के लिये बेटा ही नहीं,भावियो के लिए भी देवरो की उम्र कभी नहीं बढ़ती हे ।

अभी कल ही तो में रोज की तरह पेड़ की छाँव में बैठा-बैठा सेलफोन में कुछ मनमाफिक पढ़ने का प्रयास कर रहा था और वही दशको से चिरपरिचित मधुर स्वरों ने आवाज दी ।
"ऐ लाला जरा इस सर्वत कलश को मातारानी के भवन तक लै चलो,आज तुम्हरे हाथ से नारियल भेंट कराएंगे!"

आदेश हुआ हो और में अवहेलना ये असम्भव हे!बस आगे-आगे चल दिया शर्बत लेकर...!
प्राय ऐसा होता हे की जब कोई वर्षो पुरानी स्मृति सहसा पुनः नयनो के समक्ष चलचित्रित होती हे तो मष्तिष्क आपकि वर्षो पुरानी स्मरणता को पुनः सजीव करता हे ।

"शर्वत काँधे पे और स्वाद जिव्हा पर" जेसे कहावत नहीं उस समय समयबिम्ब प्रतीत हो रही थी।कितनी ही बार इसी तरह बचपन में दादी माँ, माँ,बड़ी माँ,चाची जी,भावियो के पाँच रूपये शुल्क की सर्त पर शर्वत पीया करते थे।आज तो उम्र में 'अंगूर' हो गए जो कल तक हर एक नवरात्र में मात्र 'लँगूर' हुआ  करते ।

सम्भवतः इस जीवन के वह सबसे सुखद पल थे जब पांच रूपये की 'पोषकशुल्क' के लिए माँओ के माध्यम से माँ का वह स्नेह तरल भी हमे प्रशन्न और उत्सुक देखने के लिए बड़े दुलार से मिलता था ।
आज तो 'मीलो' भागते हे जिंदगी ताकि जिंदगी का 'मील' अनवरत चलता रहे और 500 देकर टेबलों पे आया  'कडुतरल' की मदहोसी में डूबकर मृदुता प्राप्त करने की उसी तरह अपेक्षा करते हे।जिस तरह कभी बचपन में 'अनारणी फल' को खरबूज की तरह मीठा होना की मृगमरीचका  हो !

विचारो और स्मृतियों के मध्य दोलनगति करता हुआ में कब माँ के दरवार पहुंचा,अहसास ही न होता अगर एक दूसरी भावी अपनी सदाबहार टोन.........
"ओ छिन..रु.. रसिया!मन्दिर तो आ गओ अब लुगाई की धुन में मस्त हो जो कछु न दिख रहो,कलस उतारो और पूजा करबाये में हाथ बटाओ!"

मेरी तन्द्रा खुली तो झेंपना स्वभाविक था क्योंकि इस तरह इन छोटी भावी को मुझे छेड़कर, तानामारने में बड़ा आनन्द आता हे ।

पूजा मध्य उन्ही छोटी भावी के द्वारा  हल्दी और मोली से कलाई का मण्डन किया और मुंह मुंह व्यंगात्मक मुस्कान के साथ "एक ही पटक में नारियल न फूटने पर आगरा  से फुस्स हो आये लाला का व्यंग्वांण भी छोड़ा गया ।
पूजा उपरान्त जब कन्या और लँगूरो को शर्बत पिलाया जा था तब एक बड़ा गिलास मेरी तरफ उन बढ़ते हुए बड़े हांथो में देखा जिन्होंने कितनी बार मुझे अपने हाथो खिलाया था ।
उन बड़ी भावी के आंखो मेंने अपने लिए एक अबोध जैसा स्नेह देखा और कानो से सूना की.....

"लाला माँ के बेटा और भावी के लिए देवर कभी बड़े नहीं होते है वो सदा भोले-भाले,अबोध 'लँगूर' ही होते हे!तुम आज भी मुझे वही 15 वर्ष छोटे बच्चे ही लगते हो जो पांच रूपये की सर्त पर माता मन्दिर पर मेरे हाथो से सरबत पीया करते थे ......!

इस भागदोड और आभासी होते शहरी रिश्तों में जहां देवर-भावी का रिश्ता मात्र सब्जीमण्डी से सब्जी का थैला पकड़ने और अपने पति की कमाई पर ऐशखोर के रूप परिभाषित हो रहे हों वही गाँव की भावियो के लिए उनके देवर गवरु जवान होकर भी बातसलयि बच्चे होना किसी स्वर्गिक सुख से कम नहीं ..!!

माँ के ईन नवरात्रो में माँ की एक अलग ही मूर्ति से साक्षात होने के लिये हे महादेव हम आपके आभारी हे ।
निश्चित ही प्रेम के रिश्ते भी जीवन की अशेष पूंजी हे,संजोते रहिये .....!
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जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन,भाग-४४

  ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                      भाग-४४
               ●अपने- अपने भाव ●
कहते हे की मिटटी,जल और उस क्षेत्र में उपजे अन्न का समान प्राणियो पर समान प्रभाव पड़ता हे किन्तु जब मष्तिष्क में चम्बल की उर्वरक खाद की जगह जातीयता की मवाद भरी हो तो दर्द,पीड़ा,खुन्नस,जलन,पूर्वाग्रह का नासूर फूटता हे उर्वरक खाद बालो के ऊपर ....!
कुछ ऐसा ही हुआ था जब मूर्खता में उच्च न्यायालय के आदेस को ठीक तरह समझे बिना आरक्षण कारियों ने 'भारत बन्द' का नाम लेकर भारत भर को 'सीरिया' के समतुल्य बना दिया था !

वह २अप्रैल उसी तरह खूबसूरत थी।व्यापारियो की दुकानों से उठते धुप की महक और मन्दिरो से आती घण्टी-घड़ियालों की मधुर ध्वनियां पृकृति को गुंजायमान कर रही थी।'वेरियल चोराहे' के उन ठेले बालो को किसी 'बन्द' से क्या लेना जिनके साँझ के चूल्हे दिन की 'उदर गुजारूं' से ही होते हे ।
'गन्ना सवील' के उस बुजुर्ग दम्पति को तो उसी सवील से अपने इकलौते पोत्र की शिक्षा शुल्क भी भरणी हे...!उस दिव्यांग जगताप को किसी की राजनीति और विरोध से क्या लेना जिसका जीवन का ताला ही तालो की कुचिया मिलाकर चल रहा हे।उस 'हम्माल' को किसी के आरक्षण से किसी की धारा से क्या मिलना जिसका जीवन तो ओरो के लिए अपनी कमर 'क्विंटलों' के बोझे से तोड़ने के लिए ही बनी थी ।
विद्यालयो में जाते नन्हे नोनिहाल गले में पेयजल और पीठ पर भविष्य का बोझ उठाये कोलाहल करते हुए निकले जा रहे की एकाएक .........!!
कुछ नीलवर्णो के उन्मादी शराव भभको के साथ झुंडों में 'जे बीम' उच्चारण करते हुए मुरैना को 'गदर का लाहोर' बना देते हे ।
गले में २५० ग्राम स्वर्ण लटकाये एक 'नील युवती' वृद्ध बुजुर्ग को भद्दी गालिया देती हुई सवील बाले बुजुर्ग का हॉकी से सर फाड़ देती हे और लकड़ी की गुल्लक सड़क पर 'टूटे अरमानो' कीतरह उदरस्थ आशा को चोराहे पर 'भारत' की तरह बिखेर देती ।

आषाढ़  से पूर्व चैत्र में होती व्यापारियो पर पत्थर और गालियो की उष्ण वर्षा,चेहरों से गिरता रक्त चम्बल की मिटटी को अचेत किया जा रहा हे।किन्तु उन्मादी,दवे-कुचले,सो कॉल्ड दलितों को कमाई लूटने में मजा जो आ रहा हे।पैदल भागती पुलिस स्वम का असितित्व बचाने को प्रयासरत दिख रही थी तो कमजोर बीमवादि युवक के हाथ किसी ऑटो सवार युवती की लज्जा राक्षसी अट्टहासो के साथ खिच रही थी ।
नोनिहालो से सवार रिकसो पर लाठी-डंडे,ईंट-पत्थर वारिस के बोसो की तरह अनवरत गिर रहे थे।शायद इन्ही अबोधो ने ही तो न इनकी धाराओ को मूत कर कमजोर किया था ..!

दवे-कुचले और कतिथ पिछड़े जीवो की इस सुनियोजित उपद्रवी 'बन्द' को क्या हम जातीय हमला नहीं कह सकते हे!इन्ही 'असहाय नीले मूर्खो' ने उस दिन ईंट,पत्थर,लाठी-डंडे छोड़िये आग्नेय अशत्रो से भी तीन युवको भून दिया था कारण बस इतना था की वह सवर्ण थे और उपद्रवियों अपने घर से दूर रहने की बोल रहे थे ।

उस दिन मेने प्रत्क्षय देखा नोनिहालो की 'वाटर बॉटल' और दूध की बॉटलस् सड़को पर पड़ी माँ के आँचल के लिए रो रही थी।सेकड़ो मंगलसूत्र और जंजीरो को तोड़ा गया।यहां तक की नीली युवती ने एक बुजुर्ग महिला को उसकी पहिचान से पुकारा था जो उसका 'आभूषण' भी थी।किन्तु शराब के भभके में धुत्त सेकड़ो युवतियां जेसे 'नारी' का नारीत्व बखान करके जेसे खुद को बुलन्द कर रही थी ।

जब तक जिला प्रशाशन और पुलिस अमला नियंत्रण करता हजारो हड्डिया चटक चुकी थी।दुधमुहे मुखो से दूध छीन चुका था ....!'गतिमान एक्सप्रेस' में भारी लूट हो चुकी थी.....रेलवे स्टेशन क्षत-विक्षत हो चुका था......महिला,बच्चे,पुरुष,बुजुर्ग 6 घण्टो तक बिन अन्न-जल ट्रेन में कैद हो चुके थे और कैद करने बाले वही नीले युवक युवतियां थे,जिन्हें जातीय बन्द को हिंसा और लूटकर प्रासंगिक किया था ।

जब उत्पात और लूट की अति हो गयी तो आखिर में   कुछ नवयुवको के समूहों ने इन 'नीलचारियो' खदेड़ा और 'मुरैना रेलवे स्टेशन पर मातृत्व से भरी माँओ ने नोनिहालो के लिए अपने आँचल का दूध और  पूरी ट्रेन के लिए सुस्वादु खाना बनाया ।
उस दिन गतिमान एक्सप्रेस का हर यात्री आँखों खारा जल लिए एक बात बोल रहा था की अपने-अपने भाव हे ।
"मुरैना में जीवन की आस छोड़ चुके थे जब इन उत्पातियों ने हमे लूटा था ।किन्तु इस निस्वार्थ और निःशुल्क सेवा को हम लूटकर जा रहे जीवन पर्यन्त न भूलेंगे ...."

एक यात्री नवयुवती कह रही थी .....
"भैया हमें जो लूटकर गए उनका भाव क्या था और जो हमे लूटा रहे हे उनका भाव क्या हे .....!"
"अपने-अपने भाव हे कोई लूटकर लूटता हे तो लूटाकर 'लूटता' हे!"

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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...