शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

पुलवामा अटेक पर

भारत की जनता देशद्रोहियों को कभी क्षमा नहीं करती लेकिन उसका गुस्सा सिर्फ तात्कालिक होता है और कुछ समय बाद चिकना घड़ा सब सूख जाता है कितना भी कोई काटे दर्द बस दर्द रहने तक बाद में सब माफ़ .....!
किन्तु #अवन्ति पूरा-पुलवामा ऐसा घाव हे जिसे बदला मिलने तक पुनि-पुनः कुरेद-कुरेद कर उस दर्द का अहसास होने देना हे क्यों की हमने जो 44 बंधू इस कायरता से भरे हमले में खोये हे।उनको हर एक सेंटीमीटर माप कर,पालपोस कर राष्ट्र को समर्पित किया था और वह सर्वोपरि वलिदान देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हे।किन्तु इससे बड़ा कष्ट एक राष्ट्र के लिए और क्या होगा जिसने प्रत्येक जवान सेमी-सेमी माप कर लिया हो और घर लौटाने के लिए सेमी-सेमी चुनना पड़ा हो ...!

अवन्तिपुरा की सड़को से वह वीररक्त साफ़ कर दिया होगा किन्तु भारतमाता के आँचल पे लगे इस ममता के दाग को कैसे धोया जाए ...!
माँ का आँचल उसके बच्चों के रक्त के धोने के लिए माँ को दुश्मनो का रक्त जाहिये फिर चाहे वो राष्ट्रद्रोही मझहवी कश्मीरियों का हो या देश की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओ में पल रहे सफेद आतंकियों का हो !

हा उनको देखा हे हम सबने इस शहादत पर जश्न मनाते हुए।पार्टियो के लिए टिप्पणी नुमा निमन्त्रन  देते हुए!आज समय हे इस ग़हरे जख्म को जो हमने 14 फ़रवरी को खाया हे उसे दुष्ट दुश्मन के अस्थिमज्जा,माँस, रुधिर का स्नेहलेप लगाया जाए ।
भारत की राजनयिक सत्ता से अनुरोध हे की 35a और 370 जेसी घृणित धाराओ को समूल रूप से खत्म कर इन राष्ट्र द्रोहियो की नश्ल का समूल उन्मूलन कर दिया जाए ।
देश से यह राष्ट्रद्रोही बीज नाश कर पुनः किसी की हिम्मत न हो ऐसा दण्ड दिया जाए ।

कड़ी भृत्स्नाये और निंदाये बहुत हुई साहव अब सहन नहीं होता।क्यों न इन निंदाओ और भर्त्सनाओ को क्रोध में परिवर्तित कर इन हरामी आतंकियों को चोराहो पर लटका कर सुखा दिया जाए ।
राजनयिक दलो को वोट की राजनीति छोड़ सत्ता पक्ष्य का साथ देना चाहिए और कमीने सिद्धू जेसे पाक परस्त को तत्काल जेल में डाल सडा देना चाहिए ।

अमेरिका के पेंटागन और व्हाइट हाउस पर आतंकी हमला हुआ था और जश्न अफगान में मना ...!
परिणीति में अमेरिकी फौजो ने अफगान से एक एक आतंकी को चुन-चुन कर मारा हे।क्या हम उन मज़ हवी कश्मीरियों और विभिन्न विश्व विदयालयी मज हवियो को मार इस देश की दीमक को खत्म नहीं कर सकते ..!

हा मेरा खोलता रक्त उन राष्ट्र द्रोहियो के लहू से सड़के लाल करने को आतुर हे।आप बिपक्ष और अंतराष्ट्रीय नीतियों से बंधे होंगे किन्तु हम भारतवासी नहीं,कम से कम अपेक्षित आग्नेयास्त्र ही उपलब्ध करा दीजिये।अगर राष्ट्रहित में गुमनाम मृत्यु  आई तो अभिनन्दन के साथ स्वीकार्य हे ।

बहुत सहन किया अब तक किन्तु अब टुकड़ो हुए दिव्य पार्थिव शरीर देखे नहीं जाते!आखिर हम कब तक अपनों कन्धों पर सेनिक भाइयो की ताबूते ढोये क्या हमारे कन्धे अपने भाइयो के साथ कन्धे-कन्धा मिलाकर  रायफल और रॉकेट लांचर नहीं ढो सकते  सकते !

में देखता हूँ प्रातः-प्रातः अपने गाँवों का जज्बा जहाँ भाइयो की वीरगतिया देख लड़को का क्रोध और बदले की भावना से सड़को को रौंदते युवा जो सैनिक बनने के लिए इतनी सर्दी में पसीने से लथपथ होकर देश के लिए समर्पित होना चाहते हे।एक भाई की शहादत का बदले के लेने के लिए कम से कम 100 पाक और पाकपरस्तो का नरमुण्ड उन सूखे आंचलों और सिंदुरो,कलाइयों के लिए कॉंपति उंगलियो के लिए  लाना चाहते हे ।

किन्तु....!!
क्रोध परवान चढ़ता हे जब भारत में रहकर भारत का खाकर,आधुनिक पढे-लिखे देशद्रोही विश्वविद्यालयी आतंकी शोशल मिडिया पर हमारे भाइयो की शहादत का जश्न मनाते हे ।
आज वक्त हे देश की दीवारो में लगे इस विश्वविद्यालयी घुन-दीमक पर पेट्रोल छिड़क आग के हवाले कर दिया जाए।क्योंकि हम कृषक पुत्र वर्षो से अपने खेतो में लगी दीमक,टिड्डी,कीटो को होनेबाली हानि को नजरअंदाज कर मात्र अगली फसलो के भविष्य के लिए यह हानि भी स्वीकार कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते आ रहे हे ।
आखिर भारत क्षतिपूर्ति विस्मसरण करने बाला देश हे कुछ समय बाद सब भूला देगा.....!!

#पुलवामा अटेक पर द्रवित और क्रोधित लेखनी के साथ ....वीर सपूतो को कोटि कोटिस नमन
----जय हिन्द
..................
जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

स्नेह आलिंगन

#प्रेम_आलिंगन
नेमत उस ईश्वर की जो सिंखा दिया कब जरूरत किसको किसकी गले लगा दिया!

काश अहसासो के समन्दर होते भर लेता, नफरत की हमने इश्क जानवरों ने दिखा दिया!

इंसानियत जहाँ पल पल मरती दम तोड़ती दिखे,
शावक ने शावक को शाबाशी से अंक लगा लिया!

दोपायो का आलिगन कितना बोना सा दीखता हे,
मुहब्बत की असल नजीर तो बस चौपाया लिखता हे!

निस्वार्थ नेह समर्पण इस चोपाई छवि में दिखता हे,
इंसान दोपाया होकर भी चौपाये से निम्न लगता हे!

वलिहारि राम आपने जो प्रेम मूरत की सूरते दिखाई,
ओरो को न सही कम से कम 'असफल' प्रेमरीती सिखाई!!!!
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"स्नेह आलिंगन"
~असफल'५२से'

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन


             
'सामंत चंड महासेन और प्रथम बागी'
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'बीहड़' का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।हल्की भुरभुरी से बने ऊँचे और विशालतम पर्वतनुमा टीले और टीलो के अनुरूप उगी हुई शुष्ककालीन कँटीली वनस्पति हालाँकि औषधीय दृस्टि में बहुमूल्य जडियो का खजाना भी कह सकते हे किन्तु यह बीहड़ कैसे बना, इसकी अहम कहानी क्या है!यह आज भी शोध और अध्यन का विषय हे ।
चम्बल की कहानी प्रारम्भ होती हे  महु से और धौलपुर, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, आगरा की तराई से पचनद इटावा की मरुभूमि में इसके पानी को 'तामसी खाद' का एक अद्भुत संगम मिलता हे। राजस्थान के कोटा को आँचल में समेटे यह एक मात्र स्वच्छ नदी 900 किमी क्षेत्र में अपना अंक समेटे है।बीहड़ के बीचो बीच एक सुन्दर और देश की स्वच्छ चंबल नदी बहती है ।

यह भारत की इकलौती नदी है जो प्रदूषण से मुक्त है, पर इसके जल को न तो इंसान, पी सकते हैं और न ही जानवर(ये बात हालांकि अतिशयोक्ति हे )। चंबल को शापित नदी के नाम से जाना जाता है। इस नदी के बारे में पुराण में भी लिखा गया है, चंबल की जिक्र महाभारत काल में है। मुरैना के पास इसी नदी के तट पर शकुनी ने जुएं में पांडवों को पराजित कर द्रौपदी का चीरहरण किया था। तभी क्रोधित होकर द्रौपदी ने नदी को शाप दिया था !
 जहाँ सभी नदियो के आँचल में महानगरो का वैभव आया वही चम्बल को मिले कांटे,जलीयग्रह,बगावती तेवर रक्त-रंजिस की दुश्मनिया,अंग्रेजो के विरुद्ध गोलियों से लेकर डकैतियों तक के महानायक और स्वतन्त्र हुए राष्ट्र को समर्पित हजारो सैनिक....!

इसके अभिशप्त होने को उससे भी पहले राजा रंतिदेव के समय से जोड़ा जाता रहा है। शुरू से ही बगावत को शरण देने वाले माने जाते रहे इसके बीहड़ों में  दिल्ली से रॉज्योच्युत होकर आए तोमर राजवंश ने भी शरण पाई थी और इसके पश्चिमी क्षेत्र की तराई को एक इतिहास संगत संज्ञा "तँवर घार" की स्थापना हुई ।
मुगलों और अंग्रेजों के काल से डाकू समस्या के लिए इसे जाना जाने लगा था। लेकिन क्या आप जानते है कि इस घाटी में पहला डकैत कौन था?
 
धौलपुर के व्याघ्रप्रद गोत्रीय सामंत चंड महासेन की गाथा, जो अपने अधिकार छीन लिए जाने पर बगावत कर बाग़ी और लूट के कारण डाकू बन गया था।  
बात उस दौर की है जब दिल्ली पर तोमर शासन समाप्त हो गया  था। उनके धौलपुर सामंत को हटा कर मालवा के शासक राजा भोज ने अपना सामंत नियुक्त कर दिया था। लेकिन धौलपुर के तत्कालीन वत्स वंश के युवराज महासेन को ये कतई स्वीकार नहीं था। चंबल क्षेत्र पर अपने वंशानुगत अधिकार को हासिल करने के लिए आखिरकार वह बागी बन गया। उसने चंबल के बीहड़ों में अपनी सेना के साथ शरण ले ली, और चंबल के रास्ते मालवा की और जाने वाले व्यापारियों से कर वसूलना शुरू कर दिया। कर देने से मना करने वालों को महासेन दंड भी देने लगा। व्यापारियों ने सख्ती से पेश आने की वजह से उसके नाम के आगे चंड भी जोड़ दिया। मालवा के शासक राजा भोज से उसकी शिकायत डाकू चंड महासेन के तौर पर की गई। 
धौलपुर से मुरैना होते हुए भिंड तक फैले चंबल के जलीय रास्तों से गुजरने वाले व्यापारियों को चंड महासेन ने लूटना शुरू कर दिया था।  चंबल के रास्ते से गुजरने वाले व्यापारियों के दल को चंड अचानक बीहड़ों से निकल कर घेर लेता था और व्यापार कर मांगता था। जब जवाब राजा भोज को कर चुकाने के हवाले से न में मिलता था, तो चंड और उसके सैनिक कर से कई गुना धन जबरिया व्यापारियों से वसूल कर लेते थे। चंबल घाटी के दूसरे डकैतों की तरह चंड महासेन भी देवी का भक्त था। वह बीहड़ों में तोमर राजवंश द्वारा स्थापित देवी मंदिर में नियमित पूजा करता था। उसने बीहड़ों में एक किले नुमा छोटा सा ठिकाना भी बना लिया था। अपने अधिकार को छीनने के जुनून ने चंड महासेन को निर्दयी हत्यारा बना दिया था ।
  
 चंड के उत्पात से व्यापारियों में आतंक व्याप्त हो गया। राजा भोज ने उसे पकड़ने कई सैनिक अभियान चलाए, लेकिन बीहड़ों की कठिनता की वजह से चंड का कुछ  नहीं बिगड़ा। आखिरकार राजा भोज ने दिल्ली से आकर चंबल क्षेत्र में बसे तोमर शाशक से चंड के आतंक से छुटकारा दिलाने का आग्रह किया। उसके बदले में तोमरों के शासक 'वज्रट तोमर' को चंबल क्षेत्र में कर वसूली का अधिकार देने की पेशकश की। और मात्र 'सामन्त' पद के लिए तोमरो की तलवारे तोमरो के रक्त से रंग दी गयी ।
युद्ध स्तिथि बड़ी विकट थी,दोनो तरफ एक ही रक्त अपने पक्ष का प्रतिनिधित्व कुशलता से कर रहा था किन्तु चन्दमहासेंन रूपी छलावा हर बार धता बता कर आसानी से निकल जाया करता आखिर बो भी इस मिटटी का लाल था और परम्परागत छापामार,गुरिल्ला युद्धों का पारंगत था ।
कितने प्रत्क्षय दिवसीय युद्ध हुए दोनों तरफ से बहने बाला रक्त एक था किन्तु ग्लानि किसी को नाममात्र ना थी।हा चिंता और चिंतन मात्र अपनी-अपनी रक्षा और आक्रमण का था ।
इसी बीच भदावर नरेश को निमन्त्रण दिया गया की वह अपने क्षेत्र को महसैन से मुक्त कराने के लिए बागी उन्मूलन कारवाही में सहयोग करे और भदावर नरेश सहर्ष तैयार हुए ।
वह दिन शायद चंड महासेन के लिए बुरा था और एक व्यापारियो का बड़ा जत्था धौलपुर-मुरैना की राहो से गुजरा जिसमे दिल्ली से पहुच रचे एक बड़े खजाने की अफवाह साथ थी और महासेन की टोली  ने चिरपरिचित अंदाज में आक्रमण किया किन्तु खारो में छिपी एक बड़ी टुकड़ी से खनखन तलवारे बजने लगी चहुओर से घिरी महासेन की टुकड़ी धराशाही होती रही और एक भल्ल महासेन के उदर को आरपार भेद गया और  बीहड़ो के आदी हो चुके तोमर सैनिकों ने चंड को मार गिराया, व्यापारियों को चंबल के रास्ते से निर्भय होकर गुजरने देने को खुद मुस्तैद रह कर सुनिश्चित किया ।
शायद बागियों के इतिहास यह पहली घटना होगी जब एक सगोत्रीय द्वारा सगोत्रीय रक्त से पहली सगोत्रीय पिपासा की नीव रखी थी जो आज भी निरन्तर रक्त पिपासाये जागृत कर ही देती हे .....!
इति.....!!

कथासूत्र:-विभिन्न पत्रपत्रिकाओं का अध्यन,बुजुर्गो के किस्से,'चम्बल का रक्त रंजित इतिहास' पुस्तक व स्वम के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित ।
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      जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

एक सैनिक प्रेम और आत्मवलिदान

वो समय जब, बुरहान वाणी की मौत के बाद से कश्मीर में लगातार 4 महीने से ज्यादा प्रोटेस्ट चले। लेकिन कुछ साल पहले भी एक ऐसा प्रोटेस्ट हुआ था। भारतीय सेना के एक जवान पर एक लड़की के रे’प और एक नागरिक की ह’त्या का आरोप लगा था। रणजीत सिंह एक सिख नौजवान थे, पंजाब के एक छोटे से गांव के। मात्र 17 साल की उम्र में सन 2000 में वो भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे। वो एक बेहतरीन खिलाडी थे और बास्केट बाल में स्पेशलिस्ट थे। दो साल की सेवा के बाद वो गनर के तौर पर टैंक पर चलने के लिए अपॉइंट कर दिए गए। कुछ ही दिनों में उनकी नियुक्ति राष्ट्रीय राइफल्स में हो गयी। राष्ट्रीय राइफल्स सेना का एक खास अंग है जो 1990 के बाद कश्मीर में इंसर्जेंसी से निपटने के लिए गठित हुआ था। इसमें 50% इन्फेंट्री से और बाकी 50% सेना के बाकी अंग से लिए जाते हैं। चूँकि रणजीत सिंह इन्फेंट्री से नहीं थे तो कश्मीर भेजे जाने से पहले उन्हें ट्रेनिंग के लिए कोर्प्स बैटल स्कूल भेजा गया। इस स्कूल में एक समय में 3 से 4 हजार तक सिपाही ट्रेनिंग लेते हैं और ये ट्रेनिंग चार हफ़्तों की होती है।
रणजीत सिंह इस ट्रेनिंग में बेस्ट स्टूडेंट जज किये गए थे। एक बेहद रिगरस और टफ ट्रेनिंग के बाद रणजीत सिंह ने कश्मीर में अपनी यूनिट के कंपनी ऑपरेटिंग बेस को ज्वाइन किया। उन्हें उम्मीद थी की अब उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यहाँ शेड्यूल उस ट्रेनिंग से भी ज्यादा सख्त था। इस यूनिट में 60 – 70 जवान अमूनन होते हैं, जिसमें एक तिहाई एडमिनिस्ट्रेशन और सिक्योरिटी में, एक तिहाई पेट्रोलिंग और ऑपरेशन में और बाकी के एक तिहाई रेस्ट और ट्रेनिंग में होते हैं। किसी बड़े ऑपरेशन या इमरजेंसी के दौरान सभी सिपाही फील्ड में होते हैं और उस समय बिना किसी रेस्ट के 24 से 72 घंटे तक की ड्यूटी होती है। औसतन एक सिपाही को सिर्फ 5 से 6 घंटे सोने के मिलते हैं वो भी कभी कभी किस्तो में।
ऐसे माहौल में करीब 6 महीने तक रणजीत सिंह ने काम किया और छोटे बड़े ऑपरेशंस में हिस्सा लिया जिसमें 7 टेररिस्ट मारे गए। ऐसी यूनिट का एक खास काम लोकल लोगों से मिलकर इंटेलिजेंस इकठ्ठा करना भी होता है। रणजीत सिंह को भी ये जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वो लोगों से संपर्क बनाकर सूचनाएं इकट्ठी करें। सामान्यतः सैनिक मेडिकल टीम के साथ गांव जाते हैं, अपने संपर्क सूत्रों से मिलते हैं और सूचनाएं इकट्ठी करते हैं। रणजीत सिंह ने भी मेडिकल टीम और सद्भावना प्रोजेक्ट की टीमों के साथ गांव-गांव जाना शुरू किया और लोगों से संपर्क बनाने शुरू किये। रणजीत जी ने अपने कई सोर्स डेवलप किये जिनकी सूचना के आधार पर सेना ने कई सक्सेसफुल ऑपरेशंस को अंजाम दिया।
और ऐसे में एक दिन रणजीत की मुलाकात एक सोर्स की छोटी बहन से हुई। लव एट फर्स्ट साइट। दोनों तरफ से। पहली मुलाकात जैसे शर्माते सकुचाते हुई थी। लेकिन जल्द ही दोनों मिलने के बहाने खोजने लगे। एक आकर्षक सिख नौजवान, एक सुन्दर कश्मीरी लड़की। जैसे आसमान से उतरी जोड़ी हो। परियों की कहानियों के जैसे। एक तरफ सेना का डिसिप्लिन था , दूसरी तरफ अलग अलग धर्म, संस्कृति थी। समाज के पहरे थे। और पार्श्व में चलता यु’द्ध था।
लेकिन दिल की पुकार कौन ठुकरा सका है। दोनों एक दूसरे के गहरे प्यार में थे। मुलाकाते पब्लिक व्यू में ही संभव होती थीं और बहुत कम ही हो पाती थीं। लड़की कॉलेज जाती थी। इसलिए दोनों का आपसी प्यार मोबाईल के सहारे परवान चढ़ रहा था। घंटों फोन पर दोनों बातें करते। और इन बातों के लिए रणजीत को अक्सर अपनी 5 घंटे की नींद भी खोनी पड़ती थी। लेकिन इश्क में पगलाए रणजीत को इसकी परवाह नहीं थी।
इस बार रणजीत जब छुट्टियों से वापस आया तो अपनी महबूबा के लिए अंगूठी भी लाया था। एक मेडिकल कैम्प में उसने वो अंगूठी अपनी प्रेयसी को दी। रणजीत सिंह का दो साल का टेन्योर पूरा हो रहा था। लेकिन रणजीत ने वालंटीरियलि अपना टेन्योर 6 महीने और बढ़वा लिया। लेकिन जल्द ही ये 6 महीने भी पूरे होने लगे। रणजीत सिंह की दूसरी पोस्टिंग आ गयी। उसे कश्मीर छोड़कर जाना था। उसने अपनी महबूबा को मिलने के लिए बुलाया।
एक दिन बाद ही उसे नयी पोस्टिंग पर जाना था, इसलिए यूनिट में आज उसे कोई ड्यूटी नहीं दी गयी थी। ताकि वो अपनी पैकिंग कर सके। वो कैम्प छोड़कर बाहर नहीं जा सकता था। रणजीत ने देखा की एक पैट्रोलिंग टीम पैदल निकल रही थी। वो बिना किसी अधिकारी को बताये उस टीम के सबसे पीछे लगकर कैम्प से निकल गया। जब गांव पास आया तो वो अपनी टीम से अलग हो गया और एक उजाड़ मकान के पास पहुंचा। रणजीत सेना की पोशाक में था अपने सभी हथियारों के साथ। इसी मकान में उसने अपनी प्रेयसी को बुलाया था। रणजीत जानता था वो कितना बड़ा रिस्क ले रहा है, लेकिन प्यार के आगे फिर कौन सोचता है।
मुलाकात मुख़्तसर सी थी। रणजीत ने अपनी प्रेयसी से वादा किया कि वो जल्द ही वापस आएगा और शादी करके उसे अपने गांव ले जायेगा। दोनों ने साथ रहने की कसमे खायी और फिर मिलने का वादा करके उस घर से निकले। लेकिन जैसे ही वो घर से बाहर आये। उन्होंने देखा एक भीड़ बाहर खड़ी थी। क्रोध में भरी भीड़। लोगों ने रणजीत को घेर लिया और उसे धक्का देने लगे, मा’रने पर उतारू हो गए। वो चिल्ला रहे थे कि रणजीत ने उस लड़की के साथ बला’त्कार किया है। रणजीत ने उस भीड़ को समझाने की कोशिश की। उस लड़की ने भी भीड़ से कहा , लेकिन वहां सुनने वाला कोई न था। भीड़ गुस्से से पागल हो रही थी और रणजीत की जान लेने पर उतारू थी। रणजीत ने अपनी गन हाथ में लेकर उन्हें चेतावनी दी।
इस चेतावनी को सुनते ही एक आदमी ने हाथ में कु’ल्हाड़ी लिए उस पर हमला किया। और कोई चारा न देखकर रणजीत ने फा’यर किया। गो’ली सीधी उस आदमी को लगी और वो वहीँ गिरकर ढेर हो गया। भीड़ तत्काल छंटी और रणजीत वहां से निकल गया। लेकिन मुश्किल से वो 50 गज दूर ही जा पाया था कि विपरीत दिशा से आती एक बड़ी भीड़ ने फिर उसे घेर लिया। रणजीत सड़क के बीच में सैकड़ो लोगों की भीड़ के बीच अकेला खड़ा था। भीड़ उस पर प’त्थर फ़ेंक रही थी। भीड़ रणजीत की जान लेने पर आमादा हो चुकी थी रणजीत के लिए संकट की घडी थी। उसके पास गन थी, ग्रेनेड थे। वो उस भीड़ पर ग्रेनेड फ़ेंक कर निकल सकता था। फा’यर कर सकता था। लेकिन तय था की कई लोग मा’रे जाते।
शायद उस पर एक जान पहले ही ले लेने का अपराध बोध हावी हो रहा था। रणजीत ने भीड़ से परे अपनी निगाह फिराई। उसे अपनी प्रेमिका दिखी। लोगों की जकड में तड़फड़ाती हुई। दोनों की नजरें मिली। लड़की की आँखें आंसुओ से भरी थीं। रणजीत ने अपनी गन उठाई और उसकी नाल अपने मस्तक से सटा दी। एक गो’ली चली। आग की तरह ये खबर कश्मीर में फ़ैल रही थी कि एक सेना के जवान ने एक लड़की के साथ रे’प किया और एक नागरिक को मा’र दिया। सेना के लिए ये बड़े अपमान की बात थी। तुरंत एक्शन लेते हुए पुलिस ने कार्यवाही शुरू की।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत। जिसने आत्म ह’त्या कर ली थी। कहते हैं आत्म’हत्या कायरता का सबूत होती है। आत्मह’त्या कायर करते हैं। लेकिन सैन्य अधिकारी जानते थे कि रणजीत ने अपनी शहादत क्यों दी थी। सेना ने रणजीत को ‘किल्ड इन एक्शन’ माना, जिसने कई लोगों की जान लेने की जगह अपनी जान देकर सेना के शौर्य को बनाये रखा। सेना ने रणजीत सिंह को उचित सम्मान दिया। मैंने जब ये कहानी पढ़ी, बार-बार पढ़ी, हर बार मेरी आँखें भर आयी। मैं सलाम करता हूँ इस बहादुरी को। रणजीत सिंह को। भारतीय सेना को। ऐसा अद्भुत पराक्रम एक भारतीय सैनिक ही कर सकता है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो दफ़न हो कर रह गयी।
मैं आभार प्रकट करता हूँ लेफ्टिनेंट जनरल H.S. Panag जी का जिन्होंने ये कहानी लिखी। और पनाग साहब वही थे, जिन्होंने कोर्प्स बैटल स्कूल में रणजीत सिंह को बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड दिया था। और आभार कर्नल अभिषेक वाजपेयी जी का जिनकी वॉल पर मैंने इस कहानी को पढ़ा। रणजीत सिंह का नाम हमेशा अमर रहेगा। नाज है हमें रणजीत पर और गर्व है भारतीय सेना पर।
जय हिन्द.....जय हिन्द की सैना !!
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जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

कुकुर मूत्र विसर्जन

#विचित्र_तथ्य_कुकुर_विसर्जन_लेताजी
हम सभी ने कुत्तों को कभी न कभी बिजली के खंभे या गाडियो के टायर को गीला करते तो देखा ही होगा, लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि आखिर कुत्ते पेशाब करने के लिए इन दो जगहों को ही ज्यादा क्यों पसंद करते हैं?
हम सभी जानते हैं कि कुत्ता इंसानों के प्रति सबसे ज्यादा वफादार प्राणी है, इसके अलावा अन्य जानवरों की तुलना में कुत्ता थोड़ा ज्यादा सामाजिक भी होता है।
कार ,बाइक के टायर और बिजली के खंभों पर पेशाब करने के पीछे भी दरअसल एक सामाजिक कारण ही जिम्मेदार होता है। ऐसी जगहों पर पेशाब करके कुत्ते दूसरे कुत्तों के लिए अपनी गंधछोड़ जाते हैं।
आमतौर पर कुत्ते पेशाब करने के लिए ऐसी जगहको तरजीह देते हैं, जो सीधा खड़ा हो। इससे उनका निशाना सटीक बैठता है और खुल कर हलके हो लेते हैं। इतना ही नहीं, अपने इस अनोखी क्रिया से वो दूसरे कुत्तों के लिए नाक की ऊंचाई पर ही अपने पेशाब की गंध छोड़ जाते हैं।पेशाब की गंध क्षितिज सतह से ज़्यादा देर तकवर्टिकल सतह पर मौजूद रहती है।
उनकी इस आदतसे वो दूसरे कुत्तों को अपने क्षेत्र से परिचित कराते हैं। इसका मतलब ये भी होता हैकि वो दूसरे कुत्तों को संभवत: अपने इलाके की जानकारी देते हो।

ठीक इसी तरह लेताजी भी अपना अपना विशेष एजेंडा रखते हे ,चुनावी मौषम के लिए की फला हिंदुत्व की राजनीती करेगा ।
फला मूलनिवासियो के हिट करने का दायित्व संभालेगा ।
कुछ दल तो सत्ता सुख पाने के लिए एक विशेष वर्ग के नाज नखरे वाले प्राणियो को अल्प वस्तरीय  फूहड़ नृत्य और मादकता के सहारे जनता रूपी वोटबैंक को पाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हे ।

जो नेता सिर्फ सत्ता के लिए देश रूपी मर्यादा के की धुरी पर खुले आम मूत्र विसर्जन कर जाते  बो ही देशभक्ति ,विकास का बड़ा ढोल पीटते नजर आते हे ।

समझदारी इसी में हे की ये देख कर चुने कही लेताजी धुरी पर टांग उठाते कुकुर न निकल जाए ।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...