सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

एक सैनिक और कश्मीरी लड़की का प्रेम

वो समय जब, बुरहान वाणी की मौत के बाद से कश्मीर में लगातार 4 महीने से ज्यादा प्रोटेस्ट चले। लेकिन कुछ साल पहले भी एक ऐसा प्रोटेस्ट हुआ था। भारतीय सेना के एक जवान पर एक लड़की के रे’प और एक नागरिक की ह’त्या का आरोप लगा था। रणजीत सिंह एक सिख नौजवान थे, पंजाब के एक छोटे से गांव के। मात्र 17 साल की उम्र में सन 2000 में वो भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे। वो एक बेहतरीन खिलाडी थे और बास्केट बाल में स्पेशलिस्ट थे। दो साल की सेवा के बाद वो गनर के तौर पर टैंक पर चलने के लिए अपॉइंट कर दिए गए। कुछ ही दिनों में उनकी नियुक्ति राष्ट्रीय राइफल्स में हो गयी। राष्ट्रीय राइफल्स सेना का एक खास अंग है जो 1990 के बाद कश्मीर में इंसर्जेंसी से निपटने के लिए गठित हुआ था। इसमें 50% इन्फेंट्री से और बाकी 50% सेना के बाकी अंग से लिए जाते हैं। चूँकि रणजीत सिंह इन्फेंट्री से नहीं थे तो कश्मीर भेजे जाने से पहले उन्हें ट्रेनिंग के लिए कोर्प्स बैटल स्कूल भेजा गया। इस स्कूल में एक समय में 3 से 4 हजार तक सिपाही ट्रेनिंग लेते हैं और ये ट्रेनिंग चार हफ़्तों की होती है।
रणजीत सिंह इस ट्रेनिंग में बेस्ट स्टूडेंट जज किये गए थे। एक बेहद रिगरस और टफ ट्रेनिंग के बाद रणजीत सिंह ने कश्मीर में अपनी यूनिट के कंपनी ऑपरेटिंग बेस को ज्वाइन किया। उन्हें उम्मीद थी की अब उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन यहाँ शेड्यूल उस ट्रेनिंग से भी ज्यादा सख्त था। इस यूनिट में 60 – 70 जवान अमूनन होते हैं, जिसमें एक तिहाई एडमिनिस्ट्रेशन और सिक्योरिटी में, एक तिहाई पेट्रोलिंग और ऑपरेशन में और बाकी के एक तिहाई रेस्ट और ट्रेनिंग में होते हैं। किसी बड़े ऑपरेशन या इमरजेंसी के दौरान सभी सिपाही फील्ड में होते हैं और उस समय बिना किसी रेस्ट के 24 से 72 घंटे तक की ड्यूटी होती है। औसतन एक सिपाही को सिर्फ 5 से 6 घंटे सोने के मिलते हैं वो भी कभी कभी किस्तो में।
ऐसे माहौल में करीब 6 महीने तक रणजीत सिंह ने काम किया और छोटे बड़े ऑपरेशंस में हिस्सा लिया जिसमें 7 टेररिस्ट मारे गए। ऐसी यूनिट का एक खास काम लोकल लोगों से मिलकर इंटेलिजेंस इकठ्ठा करना भी होता है। रणजीत सिंह को भी ये जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वो लोगों से संपर्क बनाकर सूचनाएं इकट्ठी करें। सामान्यतः सैनिक मेडिकल टीम के साथ गांव जाते हैं, अपने संपर्क सूत्रों से मिलते हैं और सूचनाएं इकट्ठी करते हैं। रणजीत सिंह ने भी मेडिकल टीम और सद्भावना प्रोजेक्ट की टीमों के साथ गांव-गांव जाना शुरू किया और लोगों से संपर्क बनाने शुरू किये। रणजीत जी ने अपने कई सोर्स डेवलप किये जिनकी सूचना के आधार पर सेना ने कई सक्सेसफुल ऑपरेशंस को अंजाम दिया।
और ऐसे में एक दिन रणजीत की मुलाकात एक सोर्स की छोटी बहन से हुई। लव एट फर्स्ट साइट। दोनों तरफ से। पहली मुलाकात जैसे शर्माते सकुचाते हुई थी। लेकिन जल्द ही दोनों मिलने के बहाने खोजने लगे। एक आकर्षक सिख नौजवान, एक सुन्दर कश्मीरी लड़की। जैसे आसमान से उतरी जोड़ी हो। परियों की कहानियों के जैसे। एक तरफ सेना का डिसिप्लिन था , दूसरी तरफ अलग अलग धर्म, संस्कृति थी। समाज के पहरे थे। और पार्श्व में चलता यु’द्ध था।
लेकिन दिल की पुकार कौन ठुकरा सका है। दोनों एक दूसरे के गहरे प्यार में थे। मुलाकाते पब्लिक व्यू में ही संभव होती थीं और बहुत कम ही हो पाती थीं। लड़की कॉलेज जाती थी। इसलिए दोनों का आपसी प्यार मोबाईल के सहारे परवान चढ़ रहा था। घंटों फोन पर दोनों बातें करते। और इन बातों के लिए रणजीत को अक्सर अपनी 5 घंटे की नींद भी खोनी पड़ती थी। लेकिन इश्क में पगलाए रणजीत को इसकी परवाह नहीं थी।
इस बार रणजीत जब छुट्टियों से वापस आया तो अपनी महबूबा के लिए अंगूठी भी लाया था। एक मेडिकल कैम्प में उसने वो अंगूठी अपनी प्रेयसी को दी। रणजीत सिंह का दो साल का टेन्योर पूरा हो रहा था। लेकिन रणजीत ने वालंटीरियलि अपना टेन्योर 6 महीने और बढ़वा लिया। लेकिन जल्द ही ये 6 महीने भी पूरे होने लगे। रणजीत सिंह की दूसरी पोस्टिंग आ गयी। उसे कश्मीर छोड़कर जाना था। उसने अपनी महबूबा को मिलने के लिए बुलाया।
एक दिन बाद ही उसे नयी पोस्टिंग पर जाना था, इसलिए यूनिट में आज उसे कोई ड्यूटी नहीं दी गयी थी। ताकि वो अपनी पैकिंग कर सके। वो कैम्प छोड़कर बाहर नहीं जा सकता था। रणजीत ने देखा की एक पैट्रोलिंग टीम पैदल निकल रही थी। वो बिना किसी अधिकारी को बताये उस टीम के सबसे पीछे लगकर कैम्प से निकल गया। जब गांव पास आया तो वो अपनी टीम से अलग हो गया और एक उजाड़ मकान के पास पहुंचा। रणजीत सेना की पोशाक में था अपने सभी हथियारों के साथ। इसी मकान में उसने अपनी प्रेयसी को बुलाया था। रणजीत जानता था वो कितना बड़ा रिस्क ले रहा है, लेकिन प्यार के आगे फिर कौन सोचता है।
मुलाकात मुख़्तसर सी थी। रणजीत ने अपनी प्रेयसी से वादा किया कि वो जल्द ही वापस आएगा और शादी करके उसे अपने गांव ले जायेगा। दोनों ने साथ रहने की कसमे खायी और फिर मिलने का वादा करके उस घर से निकले। लेकिन जैसे ही वो घर से बाहर आये। उन्होंने देखा एक भीड़ बाहर खड़ी थी। क्रोध में भरी भीड़। लोगों ने रणजीत को घेर लिया और उसे धक्का देने लगे, मा’रने पर उतारू हो गए। वो चिल्ला रहे थे कि रणजीत ने उस लड़की के साथ बला’त्कार किया है। रणजीत ने उस भीड़ को समझाने की कोशिश की। उस लड़की ने भी भीड़ से कहा , लेकिन वहां सुनने वाला कोई न था। भीड़ गुस्से से पागल हो रही थी और रणजीत की जान लेने पर उतारू थी। रणजीत ने अपनी गन हाथ में लेकर उन्हें चेतावनी दी।
इस चेतावनी को सुनते ही एक आदमी ने हाथ में कु’ल्हाड़ी लिए उस पर हमला किया। और कोई चारा न देखकर रणजीत ने फा’यर किया। गो’ली सीधी उस आदमी को लगी और वो वहीँ गिरकर ढेर हो गया। भीड़ तत्काल छंटी और रणजीत वहां से निकल गया। लेकिन मुश्किल से वो 50 गज दूर ही जा पाया था कि विपरीत दिशा से आती एक बड़ी भीड़ ने फिर उसे घेर लिया। रणजीत सड़क के बीच में सैकड़ो लोगों की भीड़ के बीच अकेला खड़ा था। भीड़ उस पर प’त्थर फ़ेंक रही थी। भीड़ रणजीत की जान लेने पर आमादा हो चुकी थी रणजीत के लिए संकट की घडी थी। उसके पास गन थी, ग्रेनेड थे। वो उस भीड़ पर ग्रेनेड फ़ेंक कर निकल सकता था। फा’यर कर सकता था। लेकिन तय था की कई लोग मा’रे जाते।
शायद उस पर एक जान पहले ही ले लेने का अपराध बोध हावी हो रहा था। रणजीत ने भीड़ से परे अपनी निगाह फिराई। उसे अपनी प्रेमिका दिखी। लोगों की जकड में तड़फड़ाती हुई। दोनों की नजरें मिली। लड़की की आँखें आंसुओ से भरी थीं। रणजीत ने अपनी गन उठाई और उसकी नाल अपने मस्तक से सटा दी। एक गो’ली चली। आग की तरह ये खबर कश्मीर में फ़ैल रही थी कि एक सेना के जवान ने एक लड़की के साथ रे’प किया और एक नागरिक को मा’र दिया। सेना के लिए ये बड़े अपमान की बात थी। तुरंत एक्शन लेते हुए पुलिस ने कार्यवाही शुरू की।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत के मोबाईल से उस लड़की की काल डिटेल मिली। पुलिस ने उस लड़की से पूछताछ शुरू की। लड़की ने सारी कहानी कह सुनाई। सेना और पुलिस ने उस गांव जो श्रीनगर सोनमर्ग रास्ते पर था, और कंगन नाम से जाना जाता था, वहां बड़े बूढ़ो की बैठक बुलाई। जहाँ उस लड़की ने पूरी सच्चाई बयान की। और उसके बाद प्रोटेस्ट थमे। सरकार ने मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा दिया। उस लड़की को सेना ने अपने सरंक्षण में ले लिया और उसकी पढाई की आगे पूरी जिम्मेदारी ले ली।
रणजीत। जिसने आत्म ह’त्या कर ली थी। कहते हैं आत्म’हत्या कायरता का सबूत होती है। आत्मह’त्या कायर करते हैं। लेकिन सैन्य अधिकारी जानते थे कि रणजीत ने अपनी शहादत क्यों दी थी। सेना ने रणजीत को ‘किल्ड इन एक्शन’ माना, जिसने कई लोगों की जान लेने की जगह अपनी जान देकर सेना के शौर्य को बनाये रखा। सेना ने रणजीत सिंह को उचित सम्मान दिया। मैंने जब ये कहानी पढ़ी, बार-बार पढ़ी, हर बार मेरी आँखें भर आयी। मैं सलाम करता हूँ इस बहादुरी को। रणजीत सिंह को। भारतीय सेना को। ऐसा अद्भुत पराक्रम एक भारतीय सैनिक ही कर सकता है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो दफ़न हो कर रह गयी।
मैं आभार प्रकट करता हूँ लेफ्टिनेंट जनरल H.S. Panag जी का जिन्होंने ये कहानी लिखी। और पनाग साहब वही थे, जिन्होंने कोर्प्स बैटल स्कूल में रणजीत सिंह को बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड दिया था। और आभार कर्नल अभिषेक वाजपेयी जी का जिनकी वॉल पर मैंने इस कहानी को पढ़ा। रणजीत सिंह का नाम हमेशा अमर रहेगा। नाज है हमें रणजीत पर और गर्व है भारतीय सेना पर।
जय हिन्द.....जय हिन्द की सैना !!
-----------
जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

शनिवार, 26 जनवरी 2019

सवारी अथवा सवारा

         ===सवारी अथवा सवारा===
               ●हास्य कल्पना●

वास्तविकता में मौषम और समय किसी के लिए समान रहते हे तो वह वर्ग हे परिवहन वालो का....।
वह दिवस विशेष के मोको पर भी अपनी सदावहार 'टोन' से हमलोगो की तरह बाहर नहीं निकलते।जेसे उसी में रचे-बसे भर हो .....!
"शीशे की तरह दिल तोड़ दिया पथरा का जमाना से लेकर" गर्मी में "खटिया सरकने और ठण्ड लगने" तक में वातानुकूलन का अनुभव देते हे।तो कभी "कब याद करु उसको,कब तक अश्क बहाउ" सूना-सूना के कितनो को 'खाँसी-हंसी' मध्य पड़ने बाले ठसके का पुनःअनुभव करा ही दे ...।

इनमे कुछ ट्रेवल्स बसे मेल तो कुछ फीमेल भी होती हे।जिनके मुह,बोनट,डेशबोर्ड,विंडस्क्रीन पर लाली-नथुनिया से सजी दुल्हनिया की मुखाकृति से लेकर दिल्फ्टी शायरिया और प्रीतम के प्रति 'दारु पीकर मत चलाना,जिंदगी भर साथ दूंगी' जेसी पंक्तियों से लेकर उच्चक्के कोटि की तस्वीरें भी चस्पा मिलेंगी किन्तु रंग के मामले में यंहा भी शेडो की भरमार मिलेंगी।76  लोंडो की रँगविरंगि तस्वीरें विभिन्न मुद्राओ में देख कर अनुमान लगाया जा सकता हे।कि, यह मण्डली पसन्द के मामलो कितनी बहिर्मुखी हे ।
तुरा जब फिट बैठता हे जब आप चालक और परिचालक की जुल्फों के भेद नहीं कर पाते की 'जुल्फे नागन' की हे या ना-गण की ...!
बात अगर इनकी 'होर्न्स'(ध्वनि) की जाए तो इतने कर्कस से लेकर मधुर तक मिलेंगे की आपको अकेले यात्रा में सहयात्री की याद आ ही नहीं सकती।चाल तो कहने क्या साहव.....इतने लटके-झटके दिखाकर चलाई जाती हे की सीलिंग और विंडस्क्रीन पर दर्शाये क्षितिज(जहा जमी-आसमा मिलते प्रतीत होते हे) से लेकर व्हिलो के पास बंधे हजारो नुपुर एक साथ झंकार उठे हो.....!और आपको आपकी उनकी....नेपथ्य बाली पदचाप ....स्मरण हो आई हो और आप किसी से  चेटीआते,शेखी बखारते,पुरुषप्रधान विनोद अध्यन में-दर्शन में,अथवा मित्रो के समक्ष 'पति-पर-मूसक' होने का दाबा करते-करते,तदस्तिथि में थूक से सेलफोन की स्क्रीन साफ़ करने की सुखद अनभूति का स्मरण कर सकते हे ।
अंततः इनके पश्चभाग में  'घर कब आओगे'... 'ड्रायवर की बनी दुल्हनिया-क्लीनर से प्यार हुआ' .....'मालिक की लाड़ली'.....'डिपर मत मार जगह मिलने पर दूंगी...साइड'  'फला जगह की शेरनी' इत्यादि जेसे मनोवैग्यानिक, बहुभावअर्थीय, रिझाते,ट्रैफिक-शाश्त्रीय,त्रकारीभाव पाये जाते है ।

इनमे कुछ वाहन 'मेल्स' भी होते हे,जिसकी अनुभूति 'एंटर गेट' के सामने लिखा 'महिला सीट' और "फलाना टूर&ट्रेवल्स आपका हार्दिक स्वागत करता हे "....ऐसी अनुभूति कराता हे जेसे  'दौर-ऐ-जाम' के वक्त साकी बने मित्र ने एक जाम के बाद ही.....पूरी खेप लाने बाली नजरो से आशा लगाई हो ..!
इनकी विंडस्क्रीन पर नर स्वभावी विभिन्न नर्तकियों से लेकर हूरो तक की आकृतिया दिख जाती हे।इन बाहनो के प्रायः 'रेडिएटर कवर' नदारत होकर ऐसा दृश्य मष्तिष्क में बनाते हे जेसे बीड़ी-हुक्के की तलब में बिचारे दूकान खोज रहे हो......और बगल गुजरते वाहन से पैसे न होने की एवज कोई फुक्कु ब्रांड चलने की सहमति दे रहे हो ...तलव बड़ी चीज हे प्यारे,गुटके-तम्बाकू की लत में सर्वदा ट्रक और बसो का मुह भी  दन्तरहित ही दीखता हे ...!!
हेडलाइट्स के मध्य चस्पा बड़ी-बड़ी क्रुरसिंघि मुछो से तो वाहन पूरा मर्द ही नजर आता हे.....!मुखाकृति को और चलने पर बजती खिड़कियों का करतल का संयोजन करके देखिये की 'नरवाहन' और उसका माथे अंगोछा लपेटे चालक जेसे 'नाती-बाबा,साडू-साडू' बाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हो ..!
इनमे बजते विद्धुतचुम्बकीय वाद्य यन्त्र पर गीतों परिचालक की आयुनुसार भजन,गीत,रसिया बजाए जाते हे।हालांकि अल्ताफ राजा की गायी गजले "तुम तो ठहरे परदेशी ...की बेटकलुफि से लेकर रफ़ी साहव का 'आजा तुझको पुकारे मेरा प्यार' आह्वाहन सहसा नरो की नाजुक दुनिया की सैर करा ही देता हे।हालांकि परिचालक मुड़ तफ़रीह मारने का हुआ और रक्त में करामाती रसायन का मिशन हुआ तो 'मुन्नी बदनाम से लेकर,जवानी मांगे पानी-पानी' का ठोस-रस अनुभव करके गोरी जेल भी करा सकती हे ।
इन वाहनों की पीछे लिखी ...'तू चल में आया'.....'अम्मा-बप्पा की दुआएं'....फला का शेर....ढिका का गेहदु....गोरी का साजन......ड्रायवर की जिंदगी स्टेरिंग और ब्रेक पर'....!!!!इत्यादि वाक्य जीवन घर्षण को व्यक्त करते हे ।
यदपि कुछ-कुछ वाहन तांत्रिको का स्वभाव् भी दर्शाते हे जो अनपरिचित 'जय बाबा अकड़-पकोड़े'......'अलख निरंजन'.....'मैड बाबा की कृपा'...'जय केतली बाबा 56' के न समझ आने बाले लम्बे लम्बे बाउंसरों की तरह बहुत दूर तक समझ नहीं आते हे !

खेर इतना सब लिखते आने बाली/बाला रेल-गाडी-रेलगाडा की प्रतिक्षा कर रहा हूँ.....की अपनी तकदीर में सवारी वाहन मेल आएगा अथवा फीमेल ....😊

-------------------
जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
प्लेटफाम नम्बर 4 ग्वालियर

गीत केशरिया

आ सजनी तोहे रंग दू केसरिया
फिर मल दू भाल पे गुलाल में
तू बन जा जो मेरा सावरिया  ।।

देर सवेर जाग उठेगा जो सोया
बेसुध,बेखबर भोला सावरिया
रुत ने जम्हाहि तू न सो जाबरिया ।।

आज न जागा ,सोता जग सारा
तेरी एक आवाज से तड़कै सारा
किलक काल को सुलावन हारा ।।

आ सजनी तोहे रंग दू केसरिया
आ सजनी तोहे रंग दू केसरिया

फटी पपीडि भोर भयो उजियारो
उठ जाग असि ले तोहे रन ललकारो
सामूहि खड़ो सुभट तोहे ललकारो ।।

बांधो फेटा सर से कांपे जग सारो
क्षत्रिय या रक्त को कर्ज उतारो
कह गए कानू रणसर रन को रख्वारो ।।

रणभेरी न बाजहिं फिर से नहो बे खबरिया
आ बालम तोहे रंग दू में केसरिया ,,,,केसरिया  केसरिया .......केसरिया .......केसरिया ।।

26/01/2017

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

अलविदा आगरा

===अलविदा आगरा===
           ★🖐★
बेसे स्वरों में पहले 'आ' आता हे किन्तु मेरी पहली विदाई एक क्रम आगे के स्वर 'ई' अर्थात इन्दोर से हुई थी।आँखे तव भी सजल थी और अब भी द्रवित हे।हालांकि इन्दोर छोड़ने समय कितनी अमित यादे साथ थी।कितने ही इस जीवन के सुनहरे पल हृदय स्पंदों के मध्य आज भी सजीव हे।फिर चाहे 'मेरी असफलताओ का झखीरा  क्यों न हो किन्तु यादे तो जीवन की पूंजी हे जो खर्चति नहीं बल्कि बढ़ती ही जाती हे ।

इन्दोर स्मरण रहेगा इस जीवन को दार्शनिक शैली के लिए तो आगरा स्मरण रहेगा।उस अनदेखी शैली को सभी के समक्ष व्यक्त करवाने के लिए,तमाम रोचक,जीवन उपयोगी,करुणकाय दृश्य,और लेखकीय अनुभव के लिए।आगरा से मेरा जुड़ाव तो उस वक्त से हे जब प्रथम बार धरनि पे गिरा था।शैशव से युवा तक आगरा ने एक अच्छे मित्र,पालक,गुरु,सहचर की तरह स्नेह प्रदान किया किन्तु तृष्णाओ का दमन नहीं कर पाया और इन्दोर की द्रवित स्मिर्तियो पर यहां आकर भूलने की कोशिश मे स्वम को भूल बैठा....!
यहां पर काफी सारे अनुभव हुए,ओडि से लेकर कवाड चुनने बाले तक नन्हे-मुन्हों के चेहरे पर हसि देखि।लालबत्ती और धर्माचार्यो के लगे पोस्टरों के नीचे माँ बनती विक्षिप्तताओ की कराह देखि।जिंदगी की उधेड़बुन में विद्यार्थियो को सपने बुनते देखा किन्तु नहीं देखा कभी भी 'ताजमहल' या अन्य कोई शेलानि इमारत क्योंकि मेरी तो एकाकी भावनाये सदैव पहुचती थी कभी यमुना तीर तो कभी जंगलो में बसे आश्रमो में ....!

इन्दोर की गुलावी याद जब जब भूलने का प्रयास किया तब-तब कोई न कोई पुष्प-भँवर पुनः दिख गया और दिख गया व्यतीत कल जिसमे असंख्य भावनाये थी।असीम स्नेह था किन्तु असफ़लताओ की दरियादिली में समय की परीक्षाओ में सब कुछ ढ़य गया और एकाकी जीवन शैली नितांत होती गयी ......!
अनुभवो में के रूप में आगरा,इन्दोर से श्रेष्ठ रहा क्योंकि तब अपरिपक्व था अव परिपक्व युवा स्वम को बोल रकता हु।यहां कितने रिश्ते बने किन्तु विक्षेदन एक भी न हुआ।इन वर्षो में होस्टल से भीगती सड़के देखने का एक अपना अनुभव था।रेस्टोरेंटस् पर प्रेमयुगलो का लड़ना,बिछड़ना,और फिर आरोप-प्रत्यारोप तक देखा....शराव में डूवी शाम भी देखि तो इहलीला समाप्त करते विद्यार्थी भी देखे ।

कभी-कभी बो अदृश्यक भी समक्ष देखा जो सम्भवतः स्वम को चिकोटी काट के भी यकीन न हो .....!
यहां सेकड़ो 'पंक्षी पेठे' की नकली दुकाने भी देखि तो 10 रूपये घर-घर फेरी करके चेन लगाते उस युवा को देखा जो उदरपूर्ति के लिए मीलो पैदल भागता था और शाम देशी के भवके से थकान उतारता था।यहां बो बन्दर भी देखा जो हक से रोटी खाकर ही जाता था और बो स्वान भी देखा जो क्षुदा हेतु कितनी ही बार मेरी पतलून पर अपने पंजो से निशान छोड़ता था ।
पूरी एक टोली के साथ टिपिन साझा करने का अनुभव तो जेसे मन-मयूर को नृत्य करने पर ला खड़ा करता था ।

न जाने कितनी मधुर यादो का संगम रहा आगरा में और आज सब शनै-शनै पीछे छूट रहा।साथ छूट रहा था नया साथ जुड़ने की कल्पनायें कैसा अद्भुत संगम रच रही थी जेसे मष्टक पर एक बून्द उष्ण तो एक बून्द शीत धीमे से ढलक जाती हो .......

खैर,
आगरा मेरी जन्मस्थली तुमसे मेरा रिश्ता तो अटूट हे किन्तु क्या करू सिर्फ इश्क के सहारे गृहस्थी नहीं चलती न ....तो अलविदा आगरा......अलविदा आगरा..!!

------------
जितेंद्र सिंह तोमर'५२से'
24/01/2019

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

यह चम्बल का असर हे

       ©®
     ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
 
"चंबल" मध्य भारत के बीच बहती एक खूबसूरत नदी।तीन राज्यों के बीच बहती हुई ये नदी 900 किलोमीटर का रास्ता तय करती हुई यमुना में मिल जाती है। लेकिन नदी की लंबाई से ज्यादा लंबी है इसकी कहानी.....नदी के सफर से लंबा है इसके किस्सों का सफर। नदी के पानी से ज्यादा चर्चित नदी के पानी की तासीर चंबल  घाटी की कहानी देश के हर हिस्से में पढ़ी और सुनी जाती है !

 चंबल की कहानी नदी के साथ दौड़ते इन टीलो और जंगली झाडियों, घने पेड़ों और गहरे खारो  की कहानी है। ये चंबल है और ये चंबल की घाटी है !
 
 चंबल की कहानी चंबल जितनी ही पुरानी किन्तु उतनी ही पुरानी हे यहाँ की मर्यादित-दुस्मनिया जो पुरुष में होती हे,माँ-बेटी,बहु चाहे दुश्मन की ही क्यों न हो दुश्मन के लिए भी "माँ आदिशक्ति" का स्वरूप होती हे ।
यहाँ के कण-कण में रक्त उबाल मारता हे।चम्बलरज का एक कण गौर तो एक श्याम वर्ण होता हे।बुजुर्ग कहते हे की यह रज बृजभान दुलारी और कृष्ण के पावन स्नेह से सिंचित हे किन्तु "माँ द्रोपदी अभिशाप" से कुछ स्वाभाविक उज्जर हे ।

यहाँ के युवा सिपाही का रक्त जब सीमाओ पर गिरता हे....'सर्वत्र विजय' का जयघोस बनता हे! सत्ता से दुश्मनी का सफर नदी के सफर जितना ही पुराना है।पिंडारियों, ठगों, बागियों और डाकूओं तक का ये सफर जिनता खौंफनाक है उतना ही दर्दनाक भी है। चंबल के इन टीलों में सदियों से इंसानों की चींखें दफन है तो इनमें दफन है खूंखार, और दुर्दांत इंसानों की दास्ताने। कभी ठग, कभी पिंडारी, कभी बागी तो कभी डाकू बस नाम और गांव बदलते रहे कहानियां नहीं.......!

कुछ लोगो को लगता है कि चंबल का पानी ही ऐसा है।लेकिन बात ऐसी भी नहीं है। चंबल शुरू होती है मध्यप्रदेश के महु जिले से लेकिन एक लंबे रास्ते में उसके आपपास के लोगो को इसके पानी से बगावत बाली उर्वरक प्रणाली की खाद नहीं मिलती है..... जाने क्या हो जाता है इस पानी में जैसे ही ये राजस्थान के धौलपुर से घुसकर इस इलाके में बहने लगती है।पानी जैसे बगावत के तेजाब में बदल जाता है।और पानी की इस बदली तासीर की गवाही कोई एक दो दस नहीं बल्कि सदियों की कहानियां देती है ।
नदी के एक और राजस्थान तो दूसरी और मध्यप्रदेश.....एक और मध्यप्रदेश तो दूसरी और उत्तरप्रदेश....!!! और इस हजारो किलोमीटर के इलाके में हर तरफ बागी और डाकूओं के किस्से ।
 
चंबल के इन्हीं किस्सों, कहानियों के बीच छिपे सच को सामने लाये अलाव पर बेठे बुजुर्ग और उनकी अनुभवी वार्ता को शब्द दिए 'हम सब'। किस्सों के बीच दर्द और दुस्साहस के किस्सों के बीच के ताने-बाने को आपके सामने लाने का अदना प्रयास आपका अपना  "जितेन्द्र सिंह तोमर -५२से" करता रहता है।
मानसिंह, डोंगर, बटरी , रूपा महाराज, लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का, लाखन, अमृतलाल , मोहर सिंह, मलखान सिंह और ......और ... और । ये एक अतंहीन फेहरिस्त है। जो कहां से शुरू होती है और कहां खत्म होगी ठीक से कोई नहीं बता सकता है। चंबल की रूखी पहा़डियों में बंदूकों और बारूद की गंध के बीच में सिर्फ आदमियों की क्रूरता के किस्से ही नहीं है बल्कि इसकी घाटियों ने महिला डकैतों की एक परंपरा देखी है। बागियों के दलो में भले ही किसी महिला को शामिल न किया जाता हो लेकिन चंबल में एक ऐसी प्रेम कहानी भी पनपी जिससे जनमी चंबल के किस्सों की सबसे पहली महिला डाकू पुतलीबाई और एक हाथ से निशाना लगाने में मशहूर पुतलीबाई से चंबल में गूंजी महिला डकैतों की बंदूकों को फूलन, कुसुमा नाईन, और सीमा परिहार जैसी महिला डकैतों ने संभाले रखा ।

चंबल की कहानी पुराणों में महाभारत काल तक पहुंचती है। तो इतिहास में पृथ्वीराज चौहान के शासन में पनपे इस इलाके के बागियों तक जाती है।। सदियों तक इस इलाके से गुजरने वाले यात्रियों को पिंडारियों और ठगो ने मौत बांटी है।ठगो ने अपने आतंक से इस इलाके को इतना दहला दिया था कि अंग्रेजों ने बाकायदा आदेश जारी कर दिया था कि गिरफ्तार किए गए ठग को उसी के गांव में सरेआम फांसी दे दी जाए और उसके परिवार को गुलाम बना लिया जाए ...!
ठगों की कहानी तो ब्रिटिश राज में ही खत्म हो गई लेकिन ठगो की जगह चंबल के बीहड़ो में एक नया शब्द गूंजने लगा और ये शब्द था "बागी"......!
19वीं सदी से चंबल में बागियों की बंदूकें गरजने लगी।  और बागियों से शुरू हुआ सफर चंबल के मौजूदा डाकूओं तक जा पहुंचा। लेकिन सफर के साथ किस्सों में दिलचस्पी बढती जाती है।चंबल का ये सफर इतना किस्सागोई से भरा है कि कई बार किस्सों और हकीकत में अंतर करना मुश्किल हो जाता है....!!
'चम्बल नीर' का असर देखिये चम्बल किस्सों को बुनने बाला पुनः मिटटी की महक महसूस करता हूँ और एकाएक सुचना पर पुनः चंबल में सरप्रथम 'चम्बल' ही लिखता हूँ.....!

तो स्टेट्युण्ड बिथ "चम्बल एक सिंह अवलोकन"....
"गोली-बोली,केशरिया होली,हमजोली-बन्दूक पे रोली" बाकी हे मेरे दोस्त .....

🙏जय माँ भवानी🙏

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

लफ्ज़-ए-बिस्मिल

#म्हारी_धरोहर।।।

खून में बसती जिसके ज्वाला धर्म पे जान गवांते है।
वो सूरवीर रणबांकुर क्षत्रिय ओ राजपूत कहलाते है।।

नमस्कार है उन कोखों को जिनमे राणा से थे वीर पले।
नमस्कार है उस धरती को जिसपे पृथ्वी जैसे धीर चले।।

थर थर कंपती थी धरती और व्योम बड़ा थर्राता था।
राणा सांगा चढ़ घोड़े पर जब अपना शौर्य दिखाता था।।

महासती माँ पद्मा सी जो अनल सुधा को पीतीं थी।
अपने इतिहासों से परिचित वे स्वाभिमान से जीतीं थी।।

स्वामिभक्ति ओर राष्ट्रभक्ति का क्षत्रिय एक पर्याय बना।
गोरा बादल की गाथाओ से रजपुताना इतिहास भरा।।

गौरी भी हारा था खिलजी भी हारा था गजनी ने मुँह की खाई थी।
जब भी शाका करने निकले वीरों की शमशीरें लहराई थी।।

भूल नही जाना तुम बंधु जयमल फत्ते की कुर्बानी।
राम सिंह और अमर सिंह की आधी रही जवानी ।।

भूल नही जाना तुम बंधु #बिस्मिल_तोमर की कुर्बानी।
रोशन सिंह और कुंवर सिंह फिर झांसी वाली रानी।।

भूल नही तुम जाना बंधु चम्बल के वीर जवानों को।
रण में जिनने धूल चटाई नरभक्षी काले श्वानों को।।

भूल नही तुम जाना बंधु #कोन्थर के वीर किसानों को।
अंग्रेज सिंधिया की तोपों से खाली हुए किनारों को ।।

भूल नही तुम जाना मित्रों #तरसमा के वीर शहीदों को।
पदचापों से ही मार गिराया लाश नोंचते गिद्धों को ।।

भूल नही तुम जाना मित्रों #छोटी_कोन्थर के चौदह शेरों को।
द्वितीय विश्व युद्ध मे जो लगा गए दुश्मन की लाशों के ढेरों को।।

भूल नही तुम जाना बंधु इस #अनुज सिंह की रचना को।
चम्बल माटी  विश्वमणि हो हर चम्बलवासी का सपना हो।।।

कुँ.अनुज सुमन सिंह तरसमा (बिस्मिल)
9713086007।।।।

लफ्ज़-ए-बिस्मिल

बूंद बूंद बही रक्त की रक्तिम बरसा सावन था।
सदा कटाया सर जब भी गरजा नैतिकता का रावण था।

क्यों महाराणा की गाथा आज किताबों से हट जाती है।
क्यो रजपूती तलवारें शक्कर के भावों में बिक जाती है।

आज जयचंद हमारे गद्दारो के समदार बने।
महाराज भारमल अकबर के जाने कैसे नातेदार बने।

अनंगपाल को ना जाने कब, कौन सामने लाएगा।
#बिस्मिल था क्षत्रिय का बेटा, आगामी पीढ़ी को कौन बताएगा।।

कौन बताएगा वो गड़ी हुई वो कोन्थर की करुण कहानी।
जिसमे घर घर थी विधवाएं ओर रक्तिम हुई जवानी।

अरे कैसे सीखें ये शावक अपने शेरो के हमलों को।
ये तो सत्य समझ बैठे उन फिरदौसी जुमलो को।

अरे कोई तो नानी दादी की कहानी फिर से शुरू करो।
अरे कोई तो सोना बाबू से क्षत्राणी का उदय करो।

परितोष ताऊ में जीवन आप सभी का आभारी हूँ।
बिस्मिल नाम मिला है ओर में माँ चम्बल का ऋणधारी हूँ।

आप बताओ इतिहास हमारा हम जगजाहिर कर देंगे जी।
एक बार वह विजय पताका समस्त विश्व पर रख देंगे जी।।

कुंवर अनुज सुमन सिंह तोमर तरसमा (बिस्मिल)..
.9713086007

आदरणीय ताऊ जी को समर्पित।।।।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...