मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

में बदल गया हु माँ...!

===बदल गया हु,शहर आने से==

मां
तुमने रोक क्यों नहीं लिया,
मुझे इस शहर आने से...!
कितना आसान था
तेरे पास
सच को सच
झूठ को झूठ कहना....!!

तुम्हारे आशीष सदा सच बोलने के
चुभ रहे है
अब.....?
किसका सच बोलूं
दफ्तर का......घर का.....रास्तों का...!

किससे सच बोलूं.....!
बॉस से.....दोस्त से ...दुकानदार से
या
इन सबसे अलग
अपने आप को ......!!

शीशे में देखकर सच बोलूं.....?
दिन भर जो शरीर गतिमान रहता है,
रात को घावों से टपकता दर्द बन जाता है....।

कितना आसान था
मां....!
विश्वास कर लेना
सहजता से ......
दुख
सुख
प्यार
दुत्कार...!!!!

पर
न जाने क्यों.....?

अब विश्वास नहीं होता
भीख मांगते भिखारी की दयनीयता पर...!
झुंझला सा जाता हूं,
मदद के अनुग्रह पर...!!

मां
कितना मुश्किल था,
तेरे पास ये मान लेना......
कि चोर दिन में भी निकलते होंगे.....!!!

जीत शेर की नहीं
सियार की होंगी
खरगोश जिंदा नहीं रहेगे
बिना दांतों के ...!!!!

यहां
अब
कितना सहज हो गया हूं....?
रोज मरते हुये
लोगों के बीच से गुजरते हुये ......!!

मां
याद ही नहीं आती
तेरी सुनायी हुई कहानी.....!
कि
आखिर में जीत हुयी सही इंसान की,
कितना सरल था
दोस्त.दुश्मन पहचानना.......!!!!

मां
मुझे रोक लेती ....!!
तो
अब बहुत कठिन नहीं रहता
मुझे सच और झूठ के बीच निकलना......

मां
वहां
आज भी डरता मैं ....
पेड़ों पर उल्टे लटके चमगादडों से,
गांव के कोनों पर बनीं बांबियों से
दिन में कहानी सुनने से......!!!!

अब
ये सब बकवास लगते है
मां तुमने रोक क्यों नहीं लिया
मुझे शहर आने से......!!!!
....................

        जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

भाड़े का राजा

===कथा कूप===
किसी जंगल में एक बड़ा सा तालाब था उसमें सैकड़ों मेंढ़क रहते थे। तालाब में कोई राजा नहीं था। दिन पर दिन अनुशासनहीनता बढ़ती जाती थी और स्थिति को नियंत्रण में करने वाला कोई नहीं था।
उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र दिखाई नहीं देता था। नई पीढ़ी उत्तरदायित्व हीन थी। जो थोड़े बहुत होशियार मेंढ़क निकलते थे वे पढ़-लिखकर अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे।
हार कर कुछ बूढ़े मेंढ़कों ने घोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिये कोई राजा भेज दें। जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके।

शिव जी ने प्रसन्न होकर नंदी( शिव का वाहन) को उनकी देखभाल के लिए भेज दिया।नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता, पहरेदारी करता लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था न उनकी भावनामई को  आवश्यकताएं। नंदी के खुर से कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढ़क मर जाता। समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई थी। पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिवजी को प्रसन्न किया और राजा को बदल देने की प्रार्थना की। शिव जी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए नंदी को वापस बुला लिया औरअपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज दिया।

फिर क्या था वह पहरेदारी करते समय एक दो मेंढ़क चट कर जाता, मेंढ़क उसके भोजन जो थे। मेंढ़क बुरी तरह से परेशानी में घिर गएे।
फिर से मेंढ़कों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोलेशंकर को पुनः प्रसन्न किया। शिव भी थे तो भोलेबाबा ही, सो जल्दी से प्रकट हो गए। मेंढ़कों ने कहा, "आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसेदूर होंगे!कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता। आप ही बताएं हम क्या करें?

'इस बार शिव जी जरा गंभीर हो गए। थोड़ा रुक कर बोले, "यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो। मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिए और तुम्हारे लिए क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो।किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी विदेशी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता। इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो,संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो। अपनी आवश्यकताएं समझो, गलतियों से सीखो। मांगने से सब कुछ प्राप्त नहीं होता, अपने परिश्रम का मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो।"

#शब्दसार
लघुकथा का आशय यह है कि हमें अपने विवेक और बुद्धि का उपयोग करते हुए काम करना चाहिए। किसी पर आश्रित रहकर यदि काम करते हैं तो हानि ही उठानी पड़ती है।
             (बाकि जो हैए सो हैए ही)

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

आहा जिंदगी (गजल)

ज़रा सी है ये ज़िन्दगी, तक़रार क्याकरना ,
जब रहना है साथ साथ, तो रार क्या करना !

दुखित है वैसे भी मन, तमाशे देख दुनिया के,
फिर भरे बाज़ार में, तमाशा यार क्या करना !

काट लो खुशियों से, बची है जो ज़िंदगी यारो,
इसके लिए भी यूँही, नख़रे हज़ार क्या करना !

झेली हैं हमने मुश्किलें, वह अपना करम था ,
अपने लिए किसी और को, लाचार क्या करना !

न जीत पाया कोई भी, इन नफरतों के खेल में,
ज़िंदगी के सफर में, किसी पे वार क्या करना !

,(एक वर्ष पहले फेसबुक )

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

क्या क्या थे तुम

टूटे ख्वाबो के बिखरने से सजे हुए अरमान थे तुम,
बिखरी आशाओ के आश लगाये मेहरबान थे तुम।

सर पे  सजाना चाहा था तुमको बो सम्मान थे तुम,
कुछ सधे सम्भलते कदम रख रहे हो बन्दा परवर।

कही न कही कभी कभी न कभी मुझे देखते हो ,
अब बेतकल्ल्उफि से खुद को खुदाई रखते हो।

नुपुर सी ध्वनि नीरजवृत्त दृगदृस्टि सदृश हो तुम,
सम समान आत्मा आत्मनिधान कृष्ट् बहुदृश् हो तुम।

स्पर्श अभिप्राय नहीं  कदापि समभाज्य विधान हो तुम,
बिबर से शिखर तक पुनः पाये अप्राप्य श्रद्धान हो तुम।

सोचता हु 'इति श्री शिद्धयम' मान प्रस्थान कर दू ,
पुनः विस्मरण न कर सकु ऐसा ध्यान दृष्टान हो तुम........

                 🚩🌷🚩

हम

भूल जाओ यारो, अपने हाथों की लकीरों को
खुद ही बनाना पड़ता है, अपनी तक़दीरों को!

उसका तो फल मिलेगा जो किया है तुमने
मगर दोष देते हो क्यों, अपनी तकदीरों को!

ग़मों का क्या वो न छोड़ते हैं किसी को भी,
चाहे जकड़ें गरीबों को, चाहे पकड़ें अमीरों को!

वो तो बैठा है हर किसी के #दिल में,
मगर सर नवाते है हम, बेज़ुबान तस्वीरों को...!!

वक्त

✍🕘
मेहरवानी अय वक़्त, तूने रहना सिखा दिया ,
दुनिया के सारे ग़म, तूने सहना सिखा दिया !

आसान कर दी, अपने परायों की परख तूने,
जो था लबों पर मेरे, तूने कहना सिखा दिया !

कूप मंडूक थे, न पता था बाहर का मिज़ाज़,
मिल के साथ राहों में, तूने चलना सिखा दिया !

लगाते थे तक तक कर, निशाने मुझ पे लोग,
इक बता के नया हुनर, तूने बचना सिखा दिया !

इबारत भोले चेहरों की, न समझ पाए हम,
शुक्रिया अय वक़्त कि, तूने पढ़ना सिखा दिया !

#सिखा_दिया

डिलिवरी वॉय 'एक दृश्य'

#डिलिवरी_बॉय           (एक दृश्य)

कितनी तेजी से निकला वो बाईक वाला
रेडलाईट पर रूकना था,जरा सी देर में क्या बिगड़ जाएंगा....!

लड़के ने सुना नहीं

उसको आदत है इस बात की ठीक रेड़ लाईट के बीच दूसरे गियर में गाड़ी डाल कर निकलने की....!

रेड लाईट पर रूके लोग अक्सर देखते है पीठ पर बैग लटकाएं लड़के को
लड़के को जल्दी है वक्त पर पहुंचने की
तो
फ्लैट में घड़ी ताक रहे लोगो को इंतजार है उस के लेट होने का...!

लेट होने से  ठंडा हो सकता है पिज्जा
ठंडा है तो बदमजा हो सकता है पिज्जा
बदमजा हो तो फ्री हो सकता है पिज्जा,
पिज्जा फ्री मिलेंगा......कही से तो कटेगा
ये जानता है रेड लाईट पर दौड़ने वाला लड़का.....!

लड़के की सैलरी पर नजर है मैनेजर की
मैनेजर का सौ फीसदी रिकार्ड है
कंपनी को जीताने का.......और हारती है तो
लड़के की सैलरी।कंपनी का एकाउंट नहीं...!!

लड़के को मालूम है
एक असाईंनमेंट लेट करने की कीमत
घर का किराया....बाप के थके कदमों को उठाकर दरवाजों तक ले जाने की ताकत दवाई से आती है।रोज आसमान तक पहुंचती दवाई और सैलरी में पुराना झगड़ा है ।

रूक जाती है सैलरी
चढ़ जाती है दवाई..!

मां को चाहिए घर का सामान
पिज्जे की खुशबू से ज्यादा
मादक होती है घर की रोटी
और मां के हाथ की सब्जी की महक
लेकिन जाने क्या है की सब्जी कम होती  जाती है थाली से...?
क्योंकि इंटरनेशनल मार्किट में दाम बढ़ रहे है तेल के.....और तेल कम नहीं करता खाड़ी से शेखों से लेकर दिल्ली के शेखों की थाली की कीमत मुद्रा का  अवमूल्यन।
गिरा देता है लड़के और क्रेडिट कार्ड की कीमत...!

बहन को जरूरत है
नई ड्रैस की,पर
कभी कहती नहीं...!
लेकिन आंखें लड़के की खुली है
बहन को गुजरना होता है ऐसी ही कई रेडलाईटों से भूखी सी सैकड़ों हजारों निगाहों से कटते हुए....!

पब्लिक ऑटों का किराया भी बढ़ता है
और बढ़ता है लड़के का डर भी रोज रोज
इसके अलावा फोन में बंद है ....चार्ज कूपन
कीमत कितनी भी हो।दुनिया से बाते करनी है.....!

दुनिया जाने क्यों दो आंखों में सिमट जाती है
कुछ तो गिफ्ट होगा....?
मिलना है शाम को कही भी....!
जिस पिज्जा को पहुंचाना है,वही खरीद कर खिलाना है ।
अरे इसका दाम भी तो रोज बढ़ता है सैलरी से ज्यादा...!
दोस्तों के साथ शेयर करना है पानी हो या बीयर...
दोनो में से कोई चीज नहीं मिलती है फ्री
खुद भी तो चाहिए एक सही सा जूता
सेल में मिले या रिसेल में...जेब के खांचें में बैठता हो फिट....
और सही से लग जाएं किक,घिसे हुए सोल से फिसलती है किक
और सूजन डाल देती है पंजें की हड्डी में
और ये सूजन निकाल देती है हवा पर्स की.....!!

किराया घर का हर तारीख पर देना है।
बिल बिजली का सही समय पर देना है..!
खाना भी रोज ही चाहिए
कुछ तो खर्च होना ही है,बहाना चाहे जितना बनाईंये....!
मंडली दोस्तों की हो
या साथ,दुनिया की सबसे अलग आंखों का
दोस्तों की जान रहना है न....!

बहन का अभिमान रहना है
मां का स्वाभिमान रहना है
इसलिए ऐसी रेडलाईटों को तो रोज ही सहना है.....!!!!

जल्दी में कई बार अखबार के आखिरी पन्नें की खबरें छूट जाती है ।

पेज पर छपे गरीबों के मसीहाओं के बच्चों की शादी के खूबसूरत फोटों के ठीक नीचे
रेड लाईट पार करता हुआ एक डिलिवरी ब्वॉय एक्सीडेंट में कुचला गया......!

घंटों बाद पहुंची पुलिस ने जाम खुलवा दिया है।
शव की पहचान के लिए पिज्जा हटों से सपर्क में है  पुलिस.....

#पता_नहीं_कभी_कभी_क्या_लिखदेता_हूँ.....!

रविवार, 16 सितंबर 2018

भक्ति सत्यकथा 'बंशी बारे बाबा

        ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                          भाग-२८
                  ★भक्ति गाथा★
यु तो अपनी चम्बल में अशेष किस्से सजीव हे।कुछ दनदनाती गोलियों के तरह आते हे और हम हालिया स्मरण करके जल्द भूल जाते हे।किन्तु कुछ अविस्मरणीय किस्से भी हे जो गोलियों ,कडबाहटो,जख्मो,दुसमनियो से दूर अनन्त ईश्वर के साक्षात् होने का स्वप्रमान हे ।
ऐसा ही एक वाक्या हे रजोधा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने बाले गाव #अटागाँव का।पनिहल मिटटी से बने हुए घरो को चारो तरफ से आछ्यादित करते अनमोल बनस्पति के वृक्षयः और आपसी सोहार्द का प्रतीक ये गाँव भी सामन्ती सोच से निकल ही रहा था की अपवाद स्वरूप एक भूमि हड़प का सड़यन्त्र सबके सामने था ।
इस वाकये को जान्ने के लिए हमे आज से करीब 45  वर्ष पुर्व का सफर तय करना होगा।

अटागाँव के एक परिवार में तीन भाई रहा करते हे  सोवरन सिंह ,अहिवरन सिंह और रामबरन सिंह (पीछे के दो नाम परिवर्तित हे ) सोवरन सिंह बाल्यकाल से गाएँ और खेतो में मस्त श्रीकृष्ण भजनों में लींन रहा रहा करते थे बही छोटे दोनों भाई अपनी कार्यकुशलता,फुर्ती,बुद्धिमत्ता और धूर्तता के लिए जाने जाते ते।समस्त गाँव में ऐसा कोई न था जो अहिवरन और रामवरण की बुद्धि और कुटिनीति का लोहा न मानता हो।कुशल बुद्धि सदैव विद्यार्जन में निपुण होती हे और इसी बजह अतिशीघ्र ही उन्होंने अपने बड़े भाई की उपस्तिथि को नगण्य कर दिया।परिवारी-रिश्तेदारी सब जगह दोनों भाइयो की पूछ परख जबकि सोवरन जी अपनी गाय चराने और कुवारी के बेहदो में अनन्य सखा कृष्ण को खोजते रहते।मनोस्तिथि ऐसी जेसे बाबले हो ,सिर पे मुडाचा,हाथ दण्डी और वही कृष्ण भक्ति की पगडंडी ही उनका जीवन था।

जैसा की समय अनुकूल होता हे सोवरन जी का भी पाणिग्रहण हुआ।घरबाले समझते थे की सम्भवत विवाहोप्रांत परिवर्तन आये।जैसी की हर जगह भ्रान्ति हे की शादी के बाद लड़के सुधर जाएंगे किन्तु ये उपाय भी निष्फल रहा और सोवरन जी जीवन चर्या में तिल मात्र परिवर्तन न हुआ।घर परिवार बालो ने मुर्ख बाबला समझ उन्हें उपेक्षित कर दिया ।
समय के पंखो के साथ परिवार में वृद्धि हुई और जिम्मेदारियो में वृद्धि तनिक न हुई।सोवरन जी अपनी जिम्मेदारियो को समझते थे किन्तु 'मेरो मन अनन्त कहा सुख पावे' की अनन्त भक्तिपाश से सहज निकल पाना क्या सम्भव होता हे ..!!
जब बो कहते हे की भाई को भाई प्रति उकसाने बाली भार्यायै हर समय एक ही बुद्धि की परम्परागत वाहिकाएं होती हे।और ऐसा ही सोवरन सिंह साथ हुआ।उन्हें परिवार से अलग कर दिया...!पेत्रिक जमीन के त्रि असमान भाग हुए ...!!सबसे निम्न स्तर की जमीन सोवरन सिंह को दी गयी किंतु आश्चर्य इस बात का की अतिसामान्य से निम्न स्तर का कार्य करने बाले सोवरन जी के यहां धन-धान्य जेसे 'बंशी बारे' की कृपा से वरसात करता।किन्तु गाय और कृष्ण भजनों के प्रेमी सोवरन सिंह मुख के पर रहष्य भरी मुस्कान साथ एक शब्द रहता हे "मेरो तो बंशीबारो हे, ओरु कोउ कहा करे.!"

समय पंख लगा कर उड़ता जाता हे ,भाइयो ने नूतन युक्ति खोजी की सोवरन दादा के क्यों न ७बीघे खेत को अपने नाम कर लिया जाए जिसमे उन अकेले की सबसे ज्यादा फसल होती हे।पुलिस-पटवारी का जुगाड़ बिठाया गया।सोवरन सिंह को बाबला और निःशनतांन ,अवेवाहिक ठहरा कर ७बीघे जोत लिए गए ....!

अब सोवरन जी का चित्त कुछ जागृत हुआ की अरे मेरी और बंशीवारे की गाये अब कहा करेगि ,में किस बिधि उससे मिल पाउँगा,कैसे उसकी मधुर बंशी की धुन में खो पाउँगा........!! हाय मेरे 'बंशी बारे' का साथ छूट जाएगा ....! बीहड़ का एकाकी यही हिस्सा तो हे जिसकी घास कितनी गाये रोज खाती हे किन्तु एक -एक तृण की पूर्ति एक रात्रि में करने बाला ये खेत दुस्ट भाइयो ने कब्जा लिया ......!!!!
हाय  बंशीबारे  अब तू ही कोई राह दिखा ..!मुझे खेतो की नहीं तेरी मुरली की पड़ी हे, की अब ये न मिलेगीे सुनने को ...!
सहसा पार्श्व से मुरली की मीठी स्वर लहरी सुनाई देती हे और सोवरन जी उसकी तरफ आकृष्ट हो जाते हे।
"आहा बंशीबारे तुम आ गए ,ये देखो मेरे भाइयो ने अपनी गोचर की जमीन हड़प ली अब कैसे अपनी गाये चरेंगी और कैसे हम साथ-साथ एक पोटली से 'कलेऊ' करेंगे ,शायद अब तुम बापस जल्दी  चले  जाओगे। एक वर्ष में सिर्फ४माह के लिए ही तो आते हो वृन्दावन से अपनी गाये लेकर ...!"
प्रतिउत्तर मे जेसे किसी ने एकाएक शांत पड़े 'जलतरंग' को छेड दिया हो,सेकड़ो बसन्तो से भँवरो को बाबला कर दिया हो,पुरवाई में चन्दन घोल दिया हो और पपीहे ने "पीहू-राग" गादिया हो के सदृश्य शब्द निकले " शंभु दादा तुम न्यायालय जाइए,किसी को मध्यस्त किये बिना मेरे साथ चलिए।मुरैना में अपने 'दाऊभैया' का घर भी हे उनसे मिलकर न्यायालय के माध्यम से अपनी खेती पुनः ले लेंगे ।"

सोवरन......! सोवरन.....!!सोवरन.......!!!
की आवाज और किसी के पुकारने पर उनकी तन्द्रा भंग हुयी।
आंय.....!!!
में अपने घर पे स्वप्न देख रहा था की जागृत था ....!!
अतिविष्मयकारी नजरो से घर मुहाने खेल रहे बच्चों की करतल ध्वनि और बालसुलभ अठखेलियों के समक्ष वो उठ खड़े हुए और निकल पड़े मुरेना की ओर......!

मुरैना न्यायालय में तहरीर लिखाई जाती हे।अब मुंशी द्वारा 'गवाह' का पूछा जाता हे तो सदैव की तरह एक शब्द निकलता हे 'बंशीबारो' और निकल आते हे घर की तरफ ।
अगले दिवस जब फरियादी का नाम दरवान उद्घोषित करता हे..!कचहरी से सोवरन जी नदारद थे ।
"बो तो पदयात्री हे और नियत समय पर पहुचने में बिलम्ब तो होगा ही ,आप न्याधीश महोदय के समक्ष मुझे ले चलिए ,'सम्भु दादा' जिन्हें आप सोवरन सिंह तोमर के नाम पुकार रहे थे उनका गवाह में ही 'बंशीबारो-बासुदेव-श्रीकृष्ण हु।"
गवाही दी जाती हे न्यायाधीश और मुंशी मात्र किसी अदृश्य शक्ति के कारण मन्त्रमुग्ध से मात्र श्रोता हे और फैसला ७बीघे जमीन सोवरन सिंह के नाम लिख देते हे ।
कुछ अंतराल बाद सोवरन सिंह अनमने भाव से दरवान से पूछते हे की भैया मेरा नाम निकल तो नहीं गया !मुझे बिलम्ब हो गया आने में ..।
दरवान कहता हे सोवरन सिंह तोमर तुम्हारा ही नाम हे न तो ये लीजिये आदेश आपकी गवाही हो चुकी हे और आपके गवाह अभी-अभी वृन्दावन परिक्रमा को जाने की कहकर ये पत्र मुझे आपको देने की बोल गए हे ।
सोवरन जी पत्र देखा और आँखों से अश्रुधार बह निकली "वाह बंशीबारे तू मेरे साथ भी था और गवाही भी दे गया..!",में सामान्य गवारिया समझता रहा तुझे तू तो वास्तविक 'बंशीबारो' निकला.......!!
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आज भी सोवरणसिंह जी नगेपांव सिर्फ पदयात्रा करते हे।और बंशीबारे बाबा के नाम से पहिचाने जाते उनके वास्तबिक नाम से सम्भवतः ५%लोग ही परिचित हे।उनकी जीवन शैली भी अद्भुत हे बिलकुल विरक्तो की तरह न तन का होश न मन का उन्हें खोज हे तो सिर्फ 'बंशीबारे की' .........🙏🚩🙏
बोलिये भक्त बतसल भगवान बंशीबारे श्रीकृष्ण जी की जय !!

                 जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
                   वृजभूमि तंवरघार चम्बल

शनिवार, 8 सितंबर 2018

अनुभव

#अनुभव                  (कहानी)
‘‘पिया- पिया,’’ पापा की आवाज सुनकर पिया की निन्द्रा टूटी।‘‘जी पापा’’ कहती हुई वह सीढ़ियाँ उतरने लगी, किन्तु विचारों की माला अभी भी उसके मन में बनती-उधड़ती जा रही थी।
सुबह ही तो उसके ससुर से उसकी तीखी बहस हुई थी, ‘‘अरे ये बुज़ुर्ग हमारे युवा दृष्टिकोण को समझते ही नहीं, सिर्फ सुनते हैं और नकार देते हैं।
‘‘ पिया की मित्र फोन पर उसे कहती है कि तू तो अपनी बात पर अटल रह, ये तो बुज़ुर्ग हो चले हैं व इनका समय गुज़र गया है अब तो हर व्यवस्था नयी है।

पिया एक संयुक्त परिवार से शादी होकर एक ऐसे घर में आई जिसमें केवल वो, उसके पति, देवर व उसके ससुर थे। सास को गुज़रे बरसों हो चले थे। बरसों बाद जब बहू की चूड़ी घर में छनकी तो सुख की हँसी हर ओर बिखरने लगी।
ससुर का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था, वे अति उच्च पद से सेवानिवृत हुए थे तथा सम्पूर्ण परिवार के एकछत्र स्वामी थे।
परिवार में आई बहू से अब उनका परिवार एक बार फिर पूर्ण हुआ है इस बात से वह अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु जब से पिया ने अपने पति के साथ आपसी मुद्दों पर स्वयं निर्णय लेना शुरू किया तब से उसके ससुर दुःखी रहने लगे।

पिया और उसके पति को उनके ख़राब मूड में उनकी उदासी साफ़ दिख रही थी, किन्तु बात कैसे छेड़ी जाये यह समझ नहीं आ रहा था। एक दिन पिया ने निर्णय लिया कि वे अपने ससुर से उनके ख़राब मूड का कारण पूछेगी, क्योंकि एक पिया ही थी जिससे उसके ससुर हर बात बाँटते थे।
‘‘पापा, आपको क्या कोई बात परेशान कर रही है?’’पिया ने जब सोफे पर बैठते हुए पूछा तो ससुर नेअपना झुका सर ना में हिला दिया। मगर दो मिनट के मौनके बाद अचानक बोले - ‘‘बेटा, हम लोग अब बूढ़े हो गये हैं, ज़िन्दगी में बहुत दुःख देखा, बहुत सुख भी भोगा।
तुम्हारी सास के साथ ये परिवार बनाया और जब वे हमें बीच मझधार में छोड़कर ईश्वर के पास चली गई, तब हर सुख छोड़ अपने बच्चों को पाला और इस क़ाबिल किया आज वे समाज में प्रतिष्ठित हैं।
हमने तुम्हें अपने निर्णय स्वयं लेने के क़ाबिल बना दिया है किन्तु क्या हम इतनी अपेक्षा भी नहीं कर सकते कि किसी भी निर्णय को लेते समय हम बुज़ुर्गों से भी पूछ लिया करो?
’’पिया एक पल को तो चुप रह गई फिर अचानक बोली –"लेकिन पापा हमने आपको दो-तीन दिन पहले बताया तो थाना कि हम घर में पार्टी देने की सोच रहे हैं।"ससुर थोड़ा नाराज़ हो कर बोले – "हाँ जाते-जातेकह दिया था, हो सकता है पार्टी रखें। अरे भई, ऐसे हीपार्टी थोड़े ही ना हो जाती है। हमने हज़ारों पार्टियाँ दी हैं, हम जानते हैं इनविटेशन, तैयारी और कई ऐसे बिन्दु जो यदि छूट जायें तो एक मिनट में पार्टी ख़त्म हो जाती है।
"पिया तुनक कर बोली – "अब आपके ज़माने गये पापा,अब तो हर चीज़ के लिए ‘‘प्लैनर’’ होते हैं जो सब काम कर देते हैं।"यह सुनकर ससुर अचानक गुस्सा हो गये – "क्या मतलब है हमारे ज़माने गये का, हम बूढ़े हो गये तो क्या ख़त्म हो गये?"पिया भी गुस्से से बोली – "पापा, आप तो समझ हीनहीं रहे हैं, हम अब बच्चे नहीं रहे जो आपकी अंगुलीपकड़ कर हर निर्णय लें।"यह कहकर पिया पैर पटकती अपने कमरे में बजते अपनी फ्रेंड का फोन उठाने चल पड़ी और उसे सारी राम कहानी सुनाई।
तभी छत से उसके पति नीचे आये और पूछा क्या बातहो रही थी दोनों ससुर-बहू के बीच। पिया ने सारी बातपति को बताई। पति मुस्कुराते हुए बात सुनने लगे। कहते-कहते पिया को अहसास होने लगा कि वो अपने ससुर से वैसे ही बात करके आई है जैसे एक विद्रोही नव युवा अपनी स्वतंत्रता पर लगाम लगाने पर करता है औरयदि उसके अपने बच्चे बीस साल बाद उससे ऐसे बात करें तो उसे कैसा लगेगा?यह प्रश्न मन में कौंधते ही उसे ऐसा लगा मानो वह अपने ससुर के स्थान पर बैठी हो और उसका पुत्र उससे कह रहा हो – "माँ, अब आपका ज़माना तो गया, अब हमबच्चे नहीं रहे जो हर निर्णय आपकी अंगुली पकड़ कर करेगें।"पिया की आँखों में ग्लानी के आँसू आये और रुक गये। वह फौरन उठी और सर झुकाये अपने ससुर से बच्चों की तरह बोली - ‘‘क्या पापा, आप भी छोटे बच्चे की तरह रूठ जाते हो। आई एम सॉरी, पापा।"यह कह कर उसने अपने ससुर के कांपते हाथ पर अपना हाथ रखा।
ससुर की आँखों से आँसू बहने लगे, किन्तु रूठे बच्चे की तरह हँसते हुए बोले, ‘‘तू यूँ मुझे ना मना। मुझे पता है, अब हमारा ज़माना बीत गया है, मगर बेटा, हमारे पास सीखों का वो खज़ाना है जो हज़ारों दुःख, ठोकरें और धोखे खा कर हमने जमा किया है। हम नहीं चाहते तुम उनसे गुज़रो, तुम सब बहुत निपुण हो, गुणी हो, हमें तुम पर पूरा विश्वास है किन्तु जब हालात ऐसे बने कि रास्ते समझ ना आये तो हमारे इस खज़ाने से एक सीख का दीपक जला लेना और याद रहे तो हमारे लिए दुआ देना।
"पिया की आँखो से आँसू झरने लगे।सच ही तो है कल उसे भी तो उम्र के इसी पायदान पर आ खड़ा होना है और यदि आज उसने अपने बुज़ुर्गों कासम्मान नहीं किया, उनके सम्पूर्ण उम्र में इकठ्ठे किये अनुभवों के खज़ाने को नहीं आत्मसात् किया तो एक दिन समयचक्र फिर से घूमेगा और ऐसा ना हो कि उसकेबच्चे उसे यहीं खड़े होकर कहें कि - आपका ज़माना बीत गया है।
नहीं, पिया ख़ुश थी कि उसने समयचक्र को एक सकारात्मक दिशा दी है क्योंकि उसके बच्चे पापा से पूछ रहे थे कि - दादा मम्मी को बहुत प्यार करते हैंना?

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...