शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

===चम्बल एक सिंह अवलोकन ==भाग 16 अंतिम खण्ड गब्बर सिंह

        ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                   भाग-१६(तृतीय खण्ड)
                        ---गब्बर सिंग----
गब्बर का शौंक जूनुन में बदल गया। अब वो इलाके के इलाके की नाक काटने पर तुल गया। 
यहां तक पुलिस के कई सिपाहियों की नाक भी गब्बर ने काट दी। एक सिपाही तो किसी गांव में वारंट की तामील कराने गया तो वो भी गब्बर सिंह के हत्थे चढ़ गया और गब्बर सिंह ने उसकी भी नाक काट ली। गब्बर सिंह ने एक गांव में एक साथ 11 लोगो की नाक काट ली। और अपनी पूजा अथवा वहशियत पूरी करने में जुट गया। 
गब्बर सिंह को मुखबिरों से सख्त चिढ़ थी। पुलिस से साथ हुई एक मुठभेड़ में उसे चंबल के एक गांव के लोगों पर शक हो गया कि उन्होंने उसके गैंग की मूवमेंट की खबर पुलिस को दी है बस इतना बहुत था गब्बर के लिए बेगुनाह लोगो पर कहर बरपाने के लिए। और एक दिन गब्बर दिन में ही उस गांव में जा पहुंचा। एक के बाद एक 21 लोगों को एक लाईन में खडा कर दिया गया। और डर में कांपते हुए लोग इससे पहले कि कुछ समझे 21 लोगों को गोलियों से भून दिया।गब्बर का आतंक बढ़ रहा था और प्रदेश की राजनीति भी गर्मा गई। 1957 में विपक्षी दलों ने गब्बर सिंह के शिकार दर्जनों लोगों को लेकर भोपाल विधानसभा के बाहर बड़ा प्रर्दशन किया। सरकार की नाक का सवाल बन गया गांव के बेगुनाह लोगो की नाक बचाना। मध्य प्रदेश सरकार ने पुलिस इंस्पेक्टर जनरल को भिंड में कैंप करने का आदेश दिया ताकि गब्बर के गैंग को खत्म किया जा सके। पुलिस अधिकारियों ने जिले के तमाम पुलिस अधिकारियों की मीटिंग्स बुलाकर इस काम के लिए किसी अधिकारी से स्वेच्छा से आगे आने को कहा। और फिर ये जिम्मेदारी दी गई युवा डिप्टी एसपी राजेन्द्र प्रसाद मोदी को ,आर पी मोदी कुछ दिन पहले ही चंबल की दस्यु सुंदरी पुतलीबाई का एनकाउंटर कर चर्चाओं में चुके थे। आर पी मोदी के लिए गब्बर का खात्मा करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। क्योंकि गब्बर सिंह का खौंफ इतना हो चुका था कि कोई आदमी गब्बर सिंह के बारे में खबर देना तो दूर की बात है नाम भी जुबां पर नहीं लाना चाहता था। पुलिस के सारे प्रयास लगातार पानी में मिलते जा रहे थे। दो साल का वक्त गुजर चुका था लेकिन पुलिस गब्बर तो दूर की बात है गब्बर के बारे में कोई खबर भी हासिल नहीं कर पा रही थी। गब्बर सिंह पर उस वक्त तीन राज्य इनाम घोषित कर चुके थे। लेकिन चंबल घाटी में किसी को ईनाम का लालच नहीं बल्कि अपनी जान के लाले पड़े हुए थे। और तभी गोहद थाने में बैठे हुए मोदी ने एक ऐसा काम किया कि उनके लिए गब्बर तक पहुंचने का रास्ता मिल गया।गोहद सड़क के सामने घुमपुरा गांव में एक झोपड़ी से आग की लपटे दिखी। मोदी मौका ए वारदात पर पहुंचे। पुलिस ने आग पर काबू पा लिया तभी पता चला कि एक पांच साल का बच्चा दिख नहीं रहा है शायद वो झोंपड़ी में ही फंस गया। इससे पहले कि कोई सोचे मोदी खुद झोंपड़ी में घुसे और उस पांच साल के बच्चें को बाहर निकाल लाएं। बच्चा आग में झुलसा हुआ था। मोदी ने अपनी जीप और कुछ पैसे बच्चें के बाप को देकर फौरन अस्पताल भेज दिया। बच्चे के बाप का नाम था रामचरण।गोहद थाने और डांग गांव के बीच में दूरी बहुत नहीं  है। लेकिन डांग का गब्बर और गोहद में मध्यप्रदेश पुलिस दोनो के बीच इतनी दूरी हो चुकी थी कि गब्बर तक पुलिस की गोली पहुंच ही नहीं पा रही थी। ऐसे में झोंपड़ी के जलने के 25 दिन बाद रामचरण आ र पी मोदी के पास गोहद थाने पहुंचा और उसने मोदी को कहा कि वो मोदी की वर्दी पर मैडल सजा कर अहसान उतारना चाहता है। मोदी  हैरान थे कि रामचरण क्या करना चाहता है इस पर रामचरण ने कहा कि वो गब्बर का पता देंगा। 
रामचरण ने मोदी से कहा कि पहले वो रात में उसके साथ डांग गांव चले। रात में मोदी और रामचरण डांग पहुंचे फिर रामचरण मोदी को लेकर हाईवे और वहां से घूम का पुरा जिसे तालाब भी कहा जाता था पहुंचे। रामचरण ने वो भिंड हाईवे के इस तरफ डांग और दूसरी तरफ घूमकापुरा के बीच की वो जगह दिखा दी जहां गब्बर सिंह अक्सर रहा करता था। मोदी अपने दिमाग में नक्शा बना चुके थे , और जाल तैयार हो चुका था। बस अब शिकार का इतंजार था। 
गोहद थाने में 13 नवंबर 1959 का दिन। अभी सूरज सही से निकला भी नहीं था कि आर पी मोदी को एक मेहमान ने चौंका दिया। रामचरण पहुंच चुका था और उसने पुलिस वालों के बीच में चुपचाप मोदी को इशारा कर दिया कि पूरा गैंग ठिकाने पर पहुंच चुका है।  मोदी उसको अलग ले गए और डिटेल्स पूछी। रामचरण ने कहा कि पूरा गैंग पहुंच चुका है, पूरे गैंग को खत्म कर दो। क्योंकि चंबल में अगर गैंग का एक आदमी भी बचता है तो फिर वो मुखबिर के पूरे परिवार को खत्म करता है।सुबह 10 बजे तक गोहद थाने में तीन सौ हथियारबंद पुलिस वाले पहुंच चुके थे। प्लान बना तीन तरफ से घेराबंदी कर चौथी तरफ से सर्च पार्टी को आगे भेजा जाएं। मोदी ने किसी पुलिस वाले को ये पता नहीं दिया कि आखिर जाना कहां है और निशाना कौन है
मोदी और तीस आदमी सर्च पार्टी के तौर पर हाईवे की और से मौके की तरफ गए। दूसरी और से डिप्टी एसपी माधौं सिंह ने अपनी पार्टी लगा दी थी। पार्टी आगे बढ़ी तो देखा कि गैंग के लोग जमीन पर रैंगकर दूसरी तरफ से निकलने की कोशिश में है लेकिन वहां भी पुलिस मौजूद थी। लिहाजा गैंग ने फायरिंग शुरू कर दी।  
11 लोगों का गैंग पूरी ताकत से फायरिंग कर रहा था। मुठभेड़ सुबह दस बजे से शुरू हो चुकी थी। गैंग के साथ कुछ अपह्त लोग भी। दोनो तरफ से फायरिंग हो रही थी। दिन का समय था आसपास के गांवों के लोग मौके पर पहुंच चुके थे। डकैत फायरिंग कर जिस तरफ से भी बच निकलने की कोशिश करते उसी तरफ से पुलिस की हैवी फायरिंग शुरू हो जाती। अब डाकुओं ने एक गड्डे मे पोजीशन ले ली और पुलिस के साथ आखिरी फायरिंग शुरू कर दी। सुबह से चल रही मुठभेड़ शाम तक जारी थी। धीरे-धीरे अंधेरा छा रहा था और अंधेरे का लाभ उठा सकते है। लेकिन मोदी गब्बर को खत्म करने का ये आखिरी मौका खोना नहीं चाहते थे लिहाजा उन्होंने एक बड़ा फैसला ले लिया। 
मोदी ने अपने पुलिस वालों से कहा कि वो सीधा हमाल करने जा रहे है अगर कोई उनके साथ इच्छा से जाना चाहे तो चले। इस पर 11 गोरखा सिपाही जो पुतलीबाई के एनकाउंटर में भी साथ थे आगे निकल आए। मोदी गड्डे की तरफ बढ़े लेकिन डाकुओं की ओर से हैवी फायरिंग शुरू हुआ। मोदी ने हैंड ग्रेनेड से गड्डे में हमला किया। कुछ डाकुओं के मरने से फायरिंग कम हो गई लेकिन तब भी जैसे ही पुलिस ने आगे बढ़ना शुरू किया फिर एक डाकू की मार्कथ्री गरज उठी। इस पर मोदी ने फिर से दो हैंड ग्रेनेड गड़्डे में फेंके और फिर घायल डाकुओं पर लाईटमशीनगन से हमला बोल दिया। 
कुछ देर में जब पुलिस पार्टी गड़्े पर पहुंची तो देखा कि ग्रेनेड्र से मारे गए डाकुओं के बीच में गब्बर सिंह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। उसका निचला जबड़ा ग्रेनेड से उड़ चुका था। कुछ ही देर में जब तलाशी पूरी हुई तो 11 डाकुओं का पूरा गैंग खत्म हो चुका था लेकिन इस ऑपरेशन में चार पकड़ में से दो पकड़ भी गोलियों की जद में आकर दम तोड़ चुकी थी। उधर गब्बर की मौत की खबर पक्की होने के साथ ही हाईवे पर खड़ी हजारों की भीड़ ने गब्बर सिंह की मौत की खुशी मनानी शुरू कर दी थी। ये चंबल के सबसे खूंखार डाकू का अंत था लेकिन आखिरी डाकू का नहीं। 
यही खुशखबरी प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू को उनके जन्म दिवस के दो दिन पूर्व मप्र.सरकार ने बतोर जन्म दिवस उपहार स्वरूप भेंट की थी ।

विशेष- ये वारूदी श्रंखला ने अब थका दिया अब प्रयास रहेगा चम्बल के कण-कण में बसे उन लाखो वीर शहीदों को लिखने का जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध हे कारगिल तक मिटटी की गरिमा को हिमालय पर स्थापित किया ।
कुछ परिचित लोक कथानक कुछ प्रशिद्धतम ऊँचे नाम और कुछ शामे गुमनाम सबका उल्लेख और श्रंखला में विविद प्रसंग भी ।
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              आपका
      जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'               

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

ममता और कर्तव्य(फौज देवरे आई)

“बारात चल पड़ी है। गाँव समीप आ गया है इसलिए घुड़सवार घोड़ों को दौड़ाने लगे हैं। ऊँट दौड़ कर रथ से आगे निकल गए हैं । गाँव में ढोल और नक्कारे बज रहे हैं –
दुल्हा-दुल्हिन एक विमान पर बैठे हैं । दुल्हे के हाथ में दुल्हिन का हाथ है । हाथ का गुदगुदा स्पर्श अत्यन्त ही मधुर है। दासी पूछ रही है -“सुहागरात के लिए सेज किस महल में सजाऊँ? इतने में विमान ऊपर उड़ पड़ा।।’

विमान के ऊपर उड़ने से एक झटका-सा अनुभव हुआ और सुजाणसिंह की नीद खुल गई । मधुर स्वप्न भंग हुआ । उसने लेटे ही लेटे देखा, पास में रथ ज्यों का त्यों खड़ा था । ऊँट एक ओर बैठे जुगाली कर रहे थे । कुछ आदमी सो रहे थे|
और कुछ बैठे हुए हुक्का पी रहे थे । अभी धूप काफी थी । बड़ के पत्तों से छन-छन कर आ रही धूप से अपना मुँह बचाने के लिए उसने करवट बदली ।
‘‘आज रात को तो चार-पाँच कोस पर ही ठहर जायेंगे । कल प्रात:काल गाँव पहुँचेंगे । संध्या समय बरात का गाँव में जाना ठीक भी नहीं है ।’
लेटे ही लेटे सुजाणसिंह ने सोचा और फिर करवट बदली । इस समय रथ सामने था । दासी जल की झारी अन्दर दे रही थी । सुजाणसिंह ने अनुमान लगाया – ‘‘वह सो नहीं रही है, अवश्य ही मेरी ओर देख रही होगी ।’

दुल्हिन का अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उसने बनावटी ढंग से खाँसा । उसने देखा – रथ की बाहरी झालर के नीचे फटे हुए कपड़े में से दो भाव-पूर्ण नैन उस ओर टकटकी लगाए देख रहे थे । उनमें संदेश, निमंत्रण, जिज्ञासा, कौतूहल और सरलता सब कुछ को उसने एक साथ ही अनुभव कर लिया । उसका उन नेत्रों में नेत्र गड़ाने का साहस न हुआ । दूसरी ओर करवट बदल कर वह फिर सोने का उपक्रम करने लगा । लम्बी यात्रा की थकावट और पिछली रातों की अपूर्ण निद्रा के कारण उसकी फिर आँख लगी अवश्य, पर दिन को एक बार निद्रा भंग हो जाने पर दूसरी बार वह गहरी नहीं आती । इसलिए सुजाणसिंह की कभी आँख लग जाती और कभी खुल जाती । अर्द्ध निद्रा, अर्द्ध स्वप्न और अर्द्ध जागृति की अवस्था थी वह । निद्रा उसके साथ ऑख-मिचौनी सी खेल रही थी । इस बार वह जगा ही था कि उसे सुनाई दिया

“कुल मे है तो जाण सुजाण, फौज देवरे आई।’
“राजपूत का किसने आह्वान किया है ? किसकी फौज और किस देवरे पर आई है ?”
सहसा सुजाणसिंह के मन में यह प्रश्न उठ खड़े हुए । वह उठना ही चाहता था कि उसे फिर सुनाई पड़ा –
‘‘झिरमिर झिरमिर मेवा बरसै, मोरां छतरी छाई।’’
कुल में है तो जाण सुजाण, फौज देवरे आई।”

‘‘यहाँ हल्ला मत करो ? भाग जाओ यहाँ से ?‘‘ एक सरदार को हाथ में घोड़े की चाबुक लेकर ग्वालों के पीछे दौड़ते हुए उन्हें फटकारते हुए सुजाणसिंह ने देखा ।
“ठहरों जी ठहरो । ये ग्वाले क्या कह रहे हैं ? इन्हें वापिस मेरे पास बुलाओ ।’ सुजाणसिंह ने कहा –
“कुछ नहीं महाराज ! लड़के हैं,यों ही बकते हैं । … ने हल्ला मचा कर नीद खराब कर दी |” …… एक लच्छेदार गाली ग्वालों को सरदार ने दे डाली ।
“नहीं ! मैं उनकी बात सुनना चाहता हूँ ।’
“महाराज ! बच्चे हैं वे तो । उनकी क्या बात सुनोगे ?’
“उन्होंने जो गीत गाया, उसका अर्थ पूछना चाहता हूँ ।’
“गंवार छोकरे हैं । यों ही कुछ बक दिया है। आप तो घड़ी भर विश्राम कर लीजिए फिर रवाना होंगे ।’’
“पहले मैं उस गीत का अर्थ समझुंगा और फिर यहाँ से चलना होगा ।’
‘‘उस गीत का अर्थ. ।’’ कहते हुए सरदार ने गहरा निःश्वास छोड़ा और फिर वह रुक गया |

“हाँ हाँ कहों, रुकते क्यों हो बाबाजी?”
“पहले बरात को घर पहुँचने दो फिर
इसका अर्थ बताऊँगा ।।’
“मैं अभी जानना चाहता हूँ ।’
‘‘आप अभी बच्चे हैं । विवाह के मांगलिक कार्य में कहीं विघ्न पड़ जायगा ।’’
“मैं किसी भी विघ्न से नहीं डरता ।
आप तो मुझे उसका अर्थ…… I’
‘‘मन्दिर को तोड़ने के लिए पातशाह की फौज आई है । यही अर्थ है उस का।’’
“कौनसा मन्दिर ?’
“खण्डेले का मोहनजी का मन्दिर।’
‘‘मन्दिर की रक्षा के लिए कौन तैयार हो रहे हैं ?’
‘‘कोई नहीं।’’ ‘‘क्यों ?’
‘‘किसमें इतना साहस है जो पातशाह की फौज से टक्कर ले सके । हरिद्वार, काशी, वृन्दावन, मथुरा आदि के हजारों मन्दिर तुड़वा दिए हैं, किसी ने चूँ तक नहीं की ‘‘ “पर यहाँ तो राजपूत बसते हैं।’’
“मौत के मुँह में हाथ देने का किसी में साहस नहीं है ।

“मुझ में साहस है । मैं मौत के मुँह में हाथ दूँगा । सुजाणसिंह के जीते जी तुर्क की मन्दिर पर छाया भी नहीं पड़ सकती । भूमि निर्बीज नहीं हुई, भारत माता की पवित्र गोद से क्षत्रियत्व कभी भी निःशेष नहीं हो सकता । यदि गौ, ब्राह्मण और मन्दिरों की रक्षा के लिए यह शरीर काम आ जाय तो इससे बढ़कर सौभाग्य होगा ही क्या ? शीघ्र घोड़ों पर जीन किए जाएँ ?’ कहते हुए सुजाणसिंह उठ खड़ा हुआ ।


परन्तु आपके तो अभी काँकण डोरे (विवाह-कंगन) भी नहीं खुले हैं ।
“कंकण-डोरडे अब मोहनजी कचरणों में ही खुलेंगे ।।’
बात की बात में पचास घोड़े सजकर तैयार हो गए । एक बरात का कार्य पूरा हुआ, अब दूसरी बरात की तैयारी होने लगी । सुजाणसिंह ने घोड़े पर सवार होते हुए रथ की ओर देखा – कोई मेहन्दी लगा हुआ सुकुमार हाथ रथ से बाहर निकाल कर अपना चूड़ा बतला रहा था । सुजाणसिंह मन ही मन उस मूक भाषा को समझ गया।

“अन्य लोग जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाओ ।’ कहते हुए सुजाणसिंह ने घोड़े का मुँह खण्डेला की ओर किया और एड़ लगा दी । वन के मोरों ने पीऊ-पीऊ पुकार कर विदाई दी ।
मार्ग के गाँवों ने देखा कोई बरात जा रही थी । गुलाबी रंग का पायजामा, केसरिया बाना, केसरिया पगड़ी और तुर्रा-कलंगी लगाए हुए दूल्हा सबसे आगे था और पीछे केसरिया-कसूमल पार्गे बाँधे पचास सवार थे । सबके हाथों में तलवारें और भाले थे । बड़ी ही विचित्र बरात थी वह । घोड़ों को तेजी से दौड़ाये जा रहे थे, न किसी के पास कुछ सामान था और न अवकास ।

दूसरे गाँव वालों ने दूर से ही देखा – कोई बरात आ रही थी । मारू नगाड़ा बज रहा था; खन्मायच राग गाई जा रही थी, केसरिया-कसूमल बाने चमक रहे थे, घोड़े पसीने से तर और सवार उन्मत्त थे । मतवाले होकर झूम रहे थे ।

खण्डेले के समीप पथरीली भूमि पर बड़गड़ बड़गड़ घोड़ों की टापें सुनाई दीं । नगर निवासी भयभीत होकर इधर-उधर दौड़ने लगे । औरते घरों में जा छिपी । पुरूषों ने अन्दर से किंवाड़ बन्द कर लिए । बाजार की दुकानें बन्द हो गई । जिधर देखो उधर भगदड़ ही भगदड़ थी ।

“तुर्क आ गये, तुर्क आ गये “ की आवाज नगर के एक कोने से उठी और बात की बात में दूसरे कोने तक पहुँच गई । पानी लाती हुई पनिहारी, दुकान बन्द करता हुआ महाजन और दौड़ते हुए बच्चों के मुँह से केवल यही आवाज निकल रही थी- “तुर्क आ गये हैं, तुर्क आ गये हैं “ मोहनजी के पुजारी ने मन्दिर के पट बन्द कर लिए । हाथ में माला लेकर वह नारायण कवच का जाप करने लगा, तुर्क को भगाने के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगा ।

इतने में नगर में एक ओर से पचास घुड़सवार घुसे । घोड़े पसीने से तर और सवार मतवाले थे । लोगों ने सोचा – ‘‘यह तो किसी की बरात है, अभी चली जाएगी ।’ घोड़े नगर का चक्कर काट कर मोहनजी के मन्दिर के सामने आकर रुक गए । दूल्हा ने घोड़े से उतर कर भगवान की मोहिनी मूर्ति को साष्टांग प्रणाम किया और पुजारी से पूछा – “तुर्क कब आ रहे हैं ?’
“कल प्रातः आकर मन्दिर तोड़ने की सूचना है ।’

“अब मन्दिर नहीं टूटने पाएगा । नगर में सूचना कर दो कि छापोली का सुजाणसिंह शेखावत आ गया है; उसके जीते जी मन्दिर की ओर कोई ऑख उठा कर भी नहीं देख सकता । डरने-घबराने की कोई बात नहीं है ।’

पुजारी ने कृतज्ञतापूर्ण वाणी से आशीर्वाद दिया । बात की बात में नगर में यह बात फैल गई कि छापोली ठाकुर सुजाणसिंह जी मन्दिर की रक्षा करने आ गए हैं । लोगों की वहाँ भीड़ लग गई । सबने आकर देखा, एक बीस-बाईस वर्षीय दूल्हा और छोटी सी बरात वहाँ खड़ी थी । उनके चेहरों पर झलक रही तेजस्विता,दृढ़ता और वीरता को देख कर किसी को यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि वे मुट्टी भर लोग मन्दिर की रक्षा किस प्रकार कर सकेंगे । लोग भयमुक्त हुए । भक्त लोग इसे भगवान मोहनजी का चमत्कार बता कर लोगों को समझाने लगे –
“इनके रूप में स्वयं भगवान मोहनजी ही तुकों से लड़ने के लिए आए है । छापोली ठाकुर तो यहाँ हैं भी नहीं- वे तो बहुत दूर ब्याहने के लिए गए है,- जन्माष्टमी का तो विवाह ही था, इतने जल्दी थोड़े ही आ सकते हैं ।
यह बात भी नगर में हवा के साथ ही फैल गई । किसी ने यदि शंका की तो उत्तर मिल गया –

‘‘मोती बाबा कह रहे थे ।’’
मोती बाबा का नाम सुन कर सब लोग चुप हो जाते ।

मोती बाबा वास्तव में पहुँचे हुए महात्मा हैं । वे रोज ही भगवान का दर्शन करते हैं, उनके साथ खेलते, खाते-पीते लोहागिरी के जंगलों में रास किया करते हैं । मोती बाबा ने पहचान की है तो बिल्कुल सच है । फिर क्या था, भीड़ साक्षात् मोहनजी के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी । भजन मण्डलियाँ आ गई । भजन-गायन प्रारम्भ हो गया । स्त्रियाँ भगवान का दर्शन कर अपने को कृतकृत्य समझने लगी । सुजाणसिंह और उनके साथियों ने इस भीड़ के आने के वास्तविक रहस्य को नहीं समझा । वे यही सोचते रहे कि सब लोग भगवान की मूर्ति के दर्शन करने ही आए हैं । रात भर जागरण होता रहा, भजन गाये जाते रहे और सुजाणसिंह भी घोड़ों पर जीन कसे ही रख कर उसी वेश में रात भर श्रवण-कीर्तन में योग देते रहे ।

प्रात:काल होते-होते तुर्क की फौज ने आकर मोहनजी के मन्दिर को घेर लिया । सुजाणसिंह पहले से ही अपने साथियों सहित आकर मन्दिर के मुख्य द्वार के आगे घोड़े पर चढ़ कर खड़ा हो गया । सिपहसालार ने एक नवयुवक को दूल्हा वेश में देख कर अधिकारपूर्ण ढंग से पूछा –
“तुम कौन हो और क्यों यहाँ खड़े हो?’
“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो ?’
“जानते नहीं, मैं बादशाही फौज का सिपहसालार हूँ।’
“तुम भी जानते नहीं, मैं सिपहसालारों का भी सिपहसालार हूँ ।’
‘‘ज्यादा गाल मत बजाओ और रास्ते से हट जाओ नहीं तो अभी. ”
“तुम भी थूक मत उछालो और चुपचाप यहाँ से लौट जाओ नहीं तो अभी ….।”
“तुम्हें भी मालूम है, तुम किसके सामने खड़े हो?’
“शंहशाह आलमगीर ने मुझे बुतपरस्तों को सजा देने और इस मन्दिर की बुत को तोड़ने के लिए भेजा है। शहंशाह आलमगीर की हुक्म-उदूली का नतीजा क्या होगा, यह तुम्हें अभी मालूम नहीं है। तुम्हारी छोटी उम्र देख करे मुझे रहम आता है, लिहाजा मैं तुम्हें एक बार फिर हुक्म देता हूँ कि यहाँ से हट जाओ ।।’

“मुझे शहंशाह के शहंशाह मोहनजी ने तुकों को सजा देने के लिए यहाँ भेजा है पर तुम्हारी बिखरी हुई बकरानुमा दाढ़ी और अजीब सूरत को देख कर मुझे दया आती है, इसलिए मैं एक बार तुम्हें फिर चेतावनी देता हूँ कि यहाँ से लौट जाओ।’
इस बार सिपहसालार ने कुछ नम्रता से पूछा – “तुम्हारा नाम क्या है ?’
“मेरा नाम सुजाणसिंह शेखावत है ।’
“मैं तुम्हारी बहादूरी से खुश हूँ।
मैं सिर्फ मन्दिर के चबूतरे का एक कोना तोड़ कर ही यहाँ से हट जाऊँगा । मन्दिर और बुत के हाथ भी न लगाऊँगा । तुम रास्ते से हट जाओ ।’’

“मन्दिर का कोना टूटने से पहले मेरा सिर टूटेगा और मेरा सिर टूटने से पहले कई तुकों के सिर टूटेंगे ।
सिपहसालार ने घोड़े को आगे बढ़ाते हुए नारा लगाया –
‘‘अल्ला हो। अकबर |”
“जय जय भवानी ।’ कह कर सुजाणसिंह अपने साथियों सहित तुकों पर टूट पड़ा |
लोगों ने देखा उसकी काली दाढ़ी का प्रत्येक बाल कुशांकुर की भाँति खड़ा हो गया। तुर्रा -कलंगी के सामने से शीघ्रतापूर्वक घूम रही रक्तरंजित तलवार की छटा अत्यन्त ही मनोहारी दिखाई से रही थी| बात की बात में उस अकेले ने बत्तीस कब्रे खोद दी थी ।

रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जब ऊँटों पर सामान लाद कर और रथ में बैलों को जोत कर बराती छापोली की ओर रवाना होने लगे कि दासी ने आकर कहा –
“बाईसा ने कहलाया है कि बिना दुल्हा के दुल्हिन को घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए ।।’
“तो क्या करें ?’ एक वृद्ध सरदार ने उत्तर दिया ।
“वे कहती हैं, मैं भी अभी खण्डेला जाऊँगी ।
“खण्डेला जाकर क्या करेंगी ? वहाँ तो मारकाट मच रही होगी ।’
“ वे कहती हैं कि आपको मारकाट से डर लगता है क्या ?’
“मुझे तो डर नहीं लगता पर औरत को मैं आग के बीच कैसे ले जाऊँ ।’
“वे कहती हैं कि औरतें तो आग में खेलने से ही राजी होती हैं ।
मन ही मन – ‘‘दोनों ही कितने हठी हैं ।
प्रकट में – “मुझे ठाकुर साहब का हुक्म छापोली ले जाने का है ।
“बाईसा कहती हैं कि मैं आपसे खण्डेला ले जाने के लिए प्रार्थना करती हूँ ।’
‘‘अच्छा तो बाईं जैसी इनकी इच्छा ।।’ और रथ का मुँह खण्डेला की ओर कर दिया । बराती सब रथ के पीछे हो गए । रथ के आगे का पद हटा दिया गया ।

खण्डेला जब एक कोस रह गया तब वृक्षों की झुरमुट में से एक घोड़ी आती हुई दिखाई दी ।
“यह तो उनकी घोड़ी है ।“ दुल्हिन ने मन में कहा । इतने में पिण्डलियों के ऊपर हवा से फहराता हुआ केसरिया बाना भी दिखाई पड़ा ।
“ओह! वे तो स्वयं आ रहे हैं । क्या लड़ाई में जीत हो गई? पर दूसरे साथी कहाँ हैं ? कहीं भाग कर तो नहीं आ रहे हैं ?’
इतने में घोड़ी के दोनों ओर और पीछे दौड़ते हुए बालक और खेतों के किसान भी दिखाई दिए ।

‘‘यह हल्ला किसका है ? ये गंवार लोग इनके पीछे क्यों दौड़ते हैं ? भाग कर आने के कारण इनको कहीं चिढ़ा तो नहीं रहे हैं ?’
दुल्हिन ने फिर रथ में बैठे ही नीचे झुक कर देखा, वृक्षों के झुरमुट में से दाहिने हाथ में रक्त-रंजित तलवार दिखाई दी ।
“जरूर जीत कर आ रहे हैं, इसीलिए खुशी में तलवार म्यान करना भी भूल गए । घोड़ी की धीमी चाल भी यही बतला रही है ।’’
इतने में रथ से लगभग एक सौ हाथ दूर एक छोटे से टीले पर घोड़ी चढ़ी । वृक्षावली यहाँ आते-आते समाप्त हो गई थी । दुल्हिन ने उन्हें ध्यान से देखा । क्षण भर में उसके मुख-मण्डल पर अद्भुत भावभंगी छा गई और वह सबके सामने रथ से कूद कर मार्ग के बीच में जा खड़ी हुई । अब न उसके मुख पर घूंघट था और न लज्जा और विस्मय का कोई भाव ।

“नाथ ! आप कितने भोले हो, कोई अपना सिर भी इस प्रकार रणभूमि में भूल कर आता है।” कहते हुए उसने आगे बढ़ कर अपने मेंहदी लगे हाथ से कमध ले जाती हुई घोड़ी की लगाम पकड़ ली।

और उसी स्थान पर खण्डेला से उत्तर में भग्नावस्था में छत्री खड़ी हुई है, जिसकी देवली पर सती और झुंझार की दो मूर्तियाँ अंकित हैं । वह उधर से आते-जाते पथिकों को आज भी अपनी मूक वाणी में यह कहानी सुनाती है और न मालूम भविष्य में भी कब तक सुनाती रहेगी ।

लेखक : कुँवर आयुवान सिंह जी हुडील, ‘ममता और कर्तव्य’ पुस्तक से साभार

★चम्बल एक सिंह अबलोकन★भाग १५

          ===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                            भाग-१५
                     ◆डाकू गब्बर सिंह★
सुनहरे पर्दे का 'शोले'बाला गब्बर सिंह ...........! जी हा ..
वही गब्बर सिंह जो ६०के दशक में फ़िल्मी दुनिया के रुपहले पर्दे पर नमूदार हुआ।कारतूसों से भरा हुआ बिलडोरिया चट्टानी टुकड़ो पर घसीटता हुआ।तम्बाकू से पीले दांत, झाड़-झकाड दाढ़ी चेहरे पर क्रूरता और सांभा से पूछता हे "अरे ओ सांभा कितने आदमी थे?
"सरदार दो" डरकर जबाब देता हुआ सांभा तलबे से मुंडी तक काँप रहा हे।
ये फ़िल्मी दुनिया का गब्बर असल में वास्तविक दुनिया के गब्बर के सामने १०प्रतिशत भी नहीं था।असल गब्बर को ओ सनक थी लोगो को नकटे-बूचे करके मारने की।
आज की पूरी श्रंखला में आपने पढ़ा होगा की चम्बल के बागियों ने अत्याचारो,जबदस्ती छीनती जमीनों या बदला लेने के लिए बन्दूक से मुहब्बत की थी और मर्यादा मे रहकर बागी कहलाये।किन्तु आज आपको एक ऐसे दुर्दांत,आदमखोर,सनकी डाकू से मिलवाते हे जिसने मात्र दौलत ओर कुख्याति के लिए सेकड़ो नाक काटी तो तीन सेकडे से ज्यादा हत्याए भी की और पौराणिक कथाओ के डाकू अंगुलिमाल को चुनोती देता किरदार निभाया तो आइये शब्दों की समय अभियांत्रिकी के माध्यम से चलते हे।72 वर्ष पूर्व के दुर्दांत पलो में।

जीं हां शोले का गब्बर नकली गब्बर है। क्योंकि सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाला किरदार एक असली डाकू गब्बर सिंह की कॉपी भर है। ऐसा डाकू जिसकी कहानी ने हिंदी फिल्म जगत में शोले भर दिये। 
फिल्म के खत्म होते ही खौंफ की निशानियां भी खत्म हो जाती है। लेकिन असली गब्बर के आतंक के निशान आज भी चंबल के बीहड़ों में बसे हुए गांवों में मिल जाते है। छिनसरेठा गांव। चंबल के बीहड़ों में बसे हुए सैकड़ों गांवों में से एक है।  गब्बरसिंह की कहानी तो लगभग छह दशक पहले ही खत्म हो चुकी है लेकिन उस कहानी का खौंफ आज तक इस गांव के बूढ़ें ढो रहे हे।
71 साल एक ऐसी जिंदगी जीना सिर्फ वही जान सकता है जिसके साथ गुजरी हो।लेकिन  ये अकेला फिरे लाल नहीं है। चंबल के दर्जनों गांव चबंल के गब्बर के आतंक की कहानी को आज भी सीने में छिपाएं हुए फिरते है। अजनबी ने गब्बर का नाम लिया नहीं कि पुराने घाव रिसने लगते है।
लेकिन ये बाते भी शायद आपको कहानी लगे तो फिर आप ये जान लीजिए कि हिंदुस्तान के सबसे सफल पुलिस अधिकारियों में से एक के एफ रूस्तमजी ने गब्बर के मरने की खबर को हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उनके सत्तरवें जन्मदिन पर  मध्यप्रदेश पुलिस की ओर से  सबसे बड़े तोहफे के तौर पर पेश किया था। 
गब्बर का शौंक सिर्फ मौत बांटना और बेगुनाह लोगो की नाक काटना था। इलाके में गब्बर से पहले भी बहुत डाकू हुए और गब्बर के  बाद भी चंबल में डाकुओं का पैदा होना जारी रहा लेकिन चंबल का सबसे बड़ा खौंफ और आतंक सिर्फ गब्बर के नाम रहा। ऐसा नाम कि हिंदी फिल्मों में भी उसका नाम देखने वालों की रीढ़ में पानी ला देता था। चंबल में जब गब्बर की कहानी खत्म हुई तब तक गब्बर खून और लाशों की ऐसी इबारत लिख गया कि उसके मरने के दशकों बाद भी लोग उसके नाम से कांप जाते है। इस बार असली गब्बर की कहानी। 

चंबल। दूर तक फैले बीहड़ों में भिंड शहर। चंबल में डाकुओं के ज्यादातर किस्सों में भिंड बार बार घूम कर आता है। इसी के गोहद थाने से कुछ किलोमीटर दूर चलने के बाद ही आपको एक सड़क डांग ले जाती है। ऊबड़-खाबड़ सड़क जैसे गांव का मिजाज का पता बता देती हो। इसी गांव में एक घर तक आपको लिए चलते है। ये घर आपको चंबल के सबसे बड़े आतंक का पता देगा। आप घर पर तो है लेकिन घर की जगह अब कोई पत्थर भी नहीं बचा है। 
‌ये घर गब्बर सिंह का घर है। गुजरो के इस गांव में गब्बर का जन्म १९२६ में हुआ था। गब्बर के पिता के पास बेहद कम जमीन थी। गांव में कम जमीन आपके रूतबे को भी कम कर देती है। गब्बर का परिवार पेट पालने के लिए मजदूरी किया करता था। इलाके में आज भी पत्थर निकाला जा रहा है वैद्य या अवैद्य दोनो तरीके से। गब्बर का परिवार भी गांव में पत्थर ढोने का काम करता था। गब्बर शरीर से काफी मजबूत था। गांव में मजदूरी के साथ ही शाम को अखाड़े में जोर -आजमाईश करता था। और  शरीर की मजबूती के घमंड में गब्बर गांव वालों से एक से एक शर्त लगाया करता था और ऐसे ही शर्त के दौरान गब्बर की जिंदगी ने अपनी राह बदल ली। बचपन में गब्बर आवारा था। गांव में खेती-किसानी से उसे कोई मतलब नहीं था। लेकिन गब्बर के बाप के एक अपराध के बाद पंचायत ने खेती की जमीन ही छीन ली। इसके बाद आवारा गब्बर के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया। आप जानते ही हैं.. ऐसे लोगों का बांहें खोलकर स्वागत करने के लिए तैयार रहता था चंबल.. बस यहीं से शुरू हो गया गब्बर के चंबल का सफर। 
‌गब्बर ने गांव में रहने वाले रखीश्वरों से दुश्मनी में कत्ल कर दिए लेकिन गब्बर के डकैत बनने की कहानी पहले ही शुरू हो चुकी थी। दरअसल चंबल के 40 और पचास के दशक में डाकुओं का बड़ा आतंक था और इलाके में लोग डर से डाकुओं की इज्जत करते थे। इसी दौरान एक बार गब्बर अपने डाकू रिश्तेदारों से मिला। उनका रौब-दाब देखकर ही गब्बर को डाकू बनने की धुन सवार हो गई और जब वो गांव में लौटा तो बदला हुआ गब्बर था जो हर बात पर मौत बांटने की धमकी देने लगा। 
इसी बीच गब्बर के पिता रघुबीर को आपसी झगड़े में सजा हो गई और गांव में भी उसका हुक्का पानी बंद हो गया। तो गब्बर ने फैसला कर लिया कि वो अब इस ईलाके में ईज्ज्त हासिल करके ही दम लेगा। लेकिन ईज्जत हासिल करने का जो तरीका उसने चुना वो बेहद खतरनाक था और उसका रास्ता चंबल के बीहड़ों से जा मिला था। गब्बर ने एक दिन छोटी सी बात पर गांव में रखीश्वरों के परिवार वालों को गोलियों से भून दिया। डांग में अपने दुश्मनों का कत्ल कर गब्बर चंबल में कूद गया। पहली बार में दो लोग को मौत के घाट उतारने की खबर चंबल में पहुंच चुकी थी और उसको कल्याण सिंह गुर्जर के गैंग में एंट्री मिल गई। चंबल में कहावत थी कि कत्ल करने के बाद कोई मुखबिर नहीं रह जाता यानि पुलिस का आदमी होने का डर खत्म हो जाता है इसीलिए किसी गैंग में शामिल होने के लिए या होने के बाद कत्ल और लूट दोनो करने होते थे। सो गब्बर सिंह ने अपनी पहली बाधा आसानी से पार कर ली थी।

 गब्बर सिंह अपना खौंफ पैदा करने के लिए इलाके में लूट, डकैती, अपहरण और कत्ल की झड़ी लगा दी। चंबल में कूदने के कुछ दिनों बाद ही गब्बर के नाम का खौंफ का गुबार चंबल में चढ़ने लगा। मध्यप्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड में गब्बर का नाम लगभग हर रोज गूंजने लगा। एक  के बाद एक वारदात की कहानी चंबल में थाने दर थाने चलने लगी। गब्बर सिंह डकैत चंबल के उन चंद डकैतों में से एक था जिसे हालात ने नहीं बल्कि उसकी इच्छा ने डकैत बनाया था। लिहाजा गांव में नाम मात्र की दुश्मनी के बाद पहले अपने दुश्मनों के साथ मौत का खेल खेला और फिर गांव के दूसरे लोगो पर भी उसकी बंदूकें गरजने लगी। गब्बर को बेगुनाहों की मौत से खेलना अच्छा लगता था। और वो इस खेल में महारथ हासिल करना चाहता थाष लिहाजा कत्ल की एक झडी लगा दी। 

बात-बेबात पर कत्ल करने की गब्बर की आदत से गैंग में भी दुश्मनी हो गई। कुछ ही महीने में गब्बर ने अपने पांच -छह साथियों को लेकर अपने गैंग से नाता तोड़ लिया और एक नया गैंग बना लिया। लूट से हासिल पैसे के सहारे हथियार भी हासिल हो चुके थे लिहाजा गब्बर सिंह ने चंबल में अपने आपको चंबल का महाराज कहलाना शुरू कर दिया। हर वारदात के बाद उसका गैंग पीड़ितों से नारे लगवाता था चंबल महाराज की जय। भिंड, मुरैना, ग्वालियर, धौलपुर, इटावा और आसपास के इलाकों में गब्बर ने वारदात करना शुरू कर दिया। गैंग भी बढ़ने लगा। और इसके साथ ही बढ़ने लगा गब्बर का आतंक भी। 
चंबल में पचास का दशक बड़े गैंग के दशक का गैंग था। दर्जनों गैंग चंबल के इलाके में आम जनता की जिंदगी को नर्क बनाए हुए थे। ऐसे में गबरा उर्फ गब्बर एक नया बवाल बन कर पुलिस के सामने आ खड़ा हुआ। गब्बर ने अपने गैंग को एक मशीन में तब्दील कर दिया। मौत और लूट की मशीन। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक अक्तूबर 1956 से दिसंबर 1956 के तीन महीनों के बीच एक के बाद एक कत्ल और डकैती की झड़ी लगा दी। दर्जनों डकैतियां और कत्ल के मामले थानों में दर्ज हो गए। 
गब्बर गैंग ने दर्जनों कत्ल, डकैतियां, अपहरण और लूट की वारदात को अंजाम दिया।  तीनों राज्यों की पुलिस उसके पीछे लग चुकी थी। पुलिस के ऊपर इस नये लेकिन खतरनाक गैंग को खत्म करने का दबाव बढ़ रहा था। लेकिन गब्बर पुलिस से बेखौफ था। पुलिस रिक़ॉर्ड के मुताबिक गब्बर के गैंग के साथ उस वक्त कई मुठभेड़े हुई। लेकिन हर मुठभेड़ में पुलिस के जवान या तो घायल हुए या फिर उन्हें अपनी जिंदगी खोनी पड़ी। एक के बाद एक एनकाउंटर से बच निकलने ने चंबल में गब्बर का रूतबा और बढ़ा दिया। गब्बर का हौसला भी इससे बढ़ता जा रहा था। 
चंबल के दूसरे डकैतों की तरह से गब्बर भी देवी की पूजा करता था और इस मामले में काफी हद तक अंधविश्वासी था। चंबल के घने जंगलों में बने रतनगढ़ देवी के मंदिर में वो हफ्तों तक रहता और पूजा किया करता था। घने जंगलों में बेहद ऊंचाई पर बने हुए इस मंदिर तक पहुंचने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी और जब तक वो वहां पहुचंती थी गैंग फरार हो चुके होते थे। चंबल में गब्बर का नाम चलने लगा था। गांव के गांव उससे कांपने लगे थे। और डाकुओं की परंपरा के मुताबिक गब्बर ने ऐलान कर दिया कि वो मां शीतला देवी के मंदिर पर नगाड़ें चढ़ाने जाएंगा। 
मां शीतला देवी का ये मंदिर डाकुओं के लिए काफी श्रद्रा का केन्द्र रहा है। गब्बर सिंह ने जब इस मंदिर पर घंटा और नगाड़़ा चढ़ाने का ऐलान किया तो इलाके में सनसनी फैल चुकी थी। क्योंकि गब्बर हर बार इस तरह के ऐलान के बाद कुछ नई वारदात करता था। और फिर एक दिन पूरे गैंग के साथ गब्बर सिंह दिन दहाड़ें शीतला मां के मंदिर पहुंच गया।
शीतला देवी के मंदिर पर घंटा चढ़ाने की घोषणा पुलिस तक भी पहुंची थी लेकिन पुलिस जब तक गब्बर सिंह को घेरती गब्बर वहां से फुर्र हो चुका था। शीतला देवी के इस मंदिर में रखे नगाड़े आज भी ये बताते है कि गब्बर का हौंसला और खौंफ दोनो कितनी ऊंचाई पर पहुंचे हुए थे। शीतला देवी के इस मंदिर में और भी डाकुओं के सिर झुकाने की कई दूसरी चीजें भी है। मंदिर में चमकती हुई पीीतल के दियों की ये झालर चंबल की पहली महिला डकैत पुतलीबाई ने चढ़ाई थी।
शीतला के मंदिर पर सरेआम नगाड़े चढ़ाने वाला गब्बर अब कोई छोटा मोटा पुलिस फाईल का भगौड़ा नहीं बल्कि चंबल  में गब्बर सिंह नामी डकैत बन चुका था गब्बर की हवस सिर्फ नाम होने भर से खत्म नहीं होने वाली थी। गब्बर चाहता था कि सब डाकूओं से अलग उसका नाम किसी भी गांव में पहुंचते ही खौंफ की लहर बन जाएं। और तभी उसने एक नया फैंसला ले लिया एक ऐसा फैसला जिसने उसके खौंफ को चंबल की घाटी से बाहर तक फैला दिया। अब उसने फैसला किया कि वो शरीर के अंग काट कर मुखबिरों को सजा देंगा।
चंबल में गब्बर सिंह का नाम गूंज रहा था लेकिन गब्बर को तो और ही धुन थी। पुलिस के साथ एक के बाद एक एनकाउंटर में भले ही गब्बर अपने गैंग को साफ बचा कर ले जा रहा हो लेकिन उसका शक था कि गांव के लोग उसकी मुखबिरी करते है। और ये बात गब्बर को इतनी चुभी कि उसने सजा तय कर ली।
छिनरैठा गांव में एक दिन दहाड़ें गब्बर जा धमका। गांव के एक चौकीदार पर उसको शक था कि उसने पुलिस को मुखबिरी की है। गांव में पहुंच कर पहले चौकीदार को पकड़ा फिर उसके साथ एक और आदमी को और जब वो उनको गांव के बीच के कुएं पर ला रहा था तो रास्ते में बैठे दो दलितों को भी उसने पकड़ लिया। भरे गांव के बीच जो अब घरों में बंद खौंफजदा लोगो का श्मशान दिख रहा था उसने पहले तो लाठियों से पीट-पीट कर उन चारों का मरने हाल कर दिया। उसके बाद उसने कहा कि ला तेरी नाक देखता हूं कितनी बड़ी है और चार लोगों की नाक काट दी। नाक कटने की पीड़ा से बेहोश लोगो में से चौकीदार को गोलियों से भून कर गब्बर आराम से टहलता हुआ चल दिया। गांव के लोगो के घर तो खुल गए लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो उन लोगो को अस्पताल तक पहुंचा दे। कोई गब्बर के कहर को न्यौतना नहीं चाहता था। किसी तरह सुबह तक पुलिस तक खबर गई और पूरी पुलिस पार्टी वहां पहुंची और दर्द से तड़प रहे लोगो को किसी तरह से हॉस्पीटल लेकर पहुंची। आज भी फिरेलाल जिंदा है तो उसके लगी हुई ेये नाक सरकार ने लगाई है लेकिन किसी को भी ये आसानी से पता चल जाता है कि नाक को किस तरह से काटा गया था।
एक ही गांव में चार लोगो की नाक काटने की घटना ने जैसे पूरे इलाके को दहला कर रख दिया। इससे पहले ऐसी घटना यदा-कदा ही चंबल के बीहड़ों में सुनी जाती थी लेकिन एक साथ चार लोगो की नाक काटने ने तो पुलिस के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी। लेकिन गब्बर सिंह की वहशत तो इससे जाग गई।  और अब उसने छोटी सी घटना पर गांव वालों को सबक सिखाने का एक बेहतर तरीका भी मान लिया। किसी बात पर भी वो नाराज होता तो फिर गांव के गांव को सबक सिखाने लगता। गब्बर के शिकार लोगो की कहानियां आप उनके मुंह से सुन सकते है। और एक गांव में चौपाल पर बैठे हुए ये लोग जब अपनी आपबीती सुनाते है तो आपको शोले का वो सीन याद आ जाता है जब गब्बर का आदमी कालिया रामगढ के लोगो से कहता है कि गब्बर आप से क्या चाहता है सिर्फ थोड़ा सा अनाज और क्या। इस गांव के लोग उस कहानी से ज्यादा खौंफ आप को दिखा सकते है क्योंकि हकीकत में ये वो है जिन्होंने उस सीन को असली जिंदगी में जीेने वाले ये लोग किस तरह से अपनी कहानी कहते है।
अब आप इस गांव के बचे हुए लोगो की बात सुनलीजिए जिन्होंने असली गब्बर सिंह के कहर को सालों तक भुगता है।
गल्ला न देने पर नाक काट लिए और पूरे गांव पर जुर्माना किया। देशी घी, दूध,चावल और आटा। गांव में उस वक्त किसी किसी के घर इतना सामान होता था कि वो तीस आदमियों के गिरोह को इस तरह से खाना खिला दे। और एक दो बार देने के बाद जब गांव वालो ने एक बार कहा कि उनके पास कुछ नहीं है तो गब्बर सिंह ने अपना खौंफ दिखा दिया। पहले दो लोगो की गांव के बीचो-बीच नाक काट ली और उसके बाद बाकि गांव को लाठियों और बंदूकों की बटों से बेहोश होने तक पीटा। गांव वालों को माफी मिली तब जब उन्होंने सजा के बदले जुर्माना देने की हामी भरी।
जीं हां उस वक्त जब एक आदमी के एक दिन के काम की मजदूरी सिर्फ एक आना या दो आना होती थी उस वक्त इस गांव के लोगो ने गब्बर सिंह को 1100 रूपए चुकाने के लिए एक साल तक गांव ही छोड़ दिया और शहरों में मजदूरी कर पैसा जमा कर वीरान पड़े गांव में कदम रखे।
इस बीच गब्बर सिंह की एक तांत्रिक से मुलाकात हुई और उस तांत्रिक ने गब्बर सिंह को बताया कि अगर वो 116 लोगो की नाक काट कर  दुर्गा मां को भेंट करता है तो फिर पुलिस की कोई गोली उसको छू नहीं पाएंगी।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...