सोमवार, 18 दिसंबर 2017

==चम्बल एक सिंह अवलोकन==भाग ७

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                      भाग-७
     ●छिद्दा,माखन की युगल जोड़ी●
चम्बल पार खेड़ा राठौर निवासी राजा की उपाधि प्राप्त ददुआ मान सिंह राठौर ......
भदावर के डॉक्टर,मास्टर,और फिर जादूगर कहलाये मशहूर बागी माधो सिंह भदोरिया......
दोस्ती का दूसरा रूप  दुश्मनी में बदलति लाखन सिंह की मरणासन्न स्तिथि बदला लेने की अद्भुत क्षमता .........
बही अपने स्वर्ण युक्त पेरो से देश के लिए करीव ८तमगे दिलाने वाले सूबेदार पानसिंह तोमर की जीवन में सिर्फ दौड़ना लिखा था .......
दद्दा मलखान सिंह का अन्याय के विरुद्ध रायफल उठाने का दृश्यावलोकन करती इस श्रंखला की अपनी लेखनी आज आ पहुची सिकरवारि के खारो में ......

#साहिव_सलाम" के चिरपरिचित वाक्य के कारण प्रशिद्ध
यहा कें दो बागी मित्रो की अतुलनीय मित्रता का किस्सा आज आपके समक्ष
वही चिरपरिचित ऊँचे बड़े टीले  दूर क्षितीज में हल्की धुंध के वीच चम्बल किनारे स्वर्णिम अतीत को याद कराती और नारी शक्ति के त्याग की गाथा का प्रमाण  "सती मैया " मन्दिर यही स्तिथि सिकवारी का एक छोटा ठिकाना #नन्दगांगोलि ......

प्रातः काल की बैला आनन्द के आषाढ़ का माह कोयल कुक तो पपीहे की पीहू पीहू .....मोर का नृत्य के बीच कन्धे पर हल रखे करीव 20 वर्षीय नोजवान अपनी बैल जोड़ी के बिच कोई लोकगीत गुनगुनाता हुआ मस्त चाल चला जा रहा हे दूर के खेत पर ........हल चलाने ..     .सृजन करने....कृषि कर्म करने किन्तु नियति को कुछ और मंजूर था ।

"काये रे मखना तू मानो नाय फिर आय गओ खेत पे हमने नाही करि हती की नहीं ....?" के शब्द एकाएक नवयुवा के कर्णो में पिघले हुए शीशे की मानिंद उतरते चले गए ।

"अरे भज्जा जी खेतु तो दादे पुखरण रीति ते  हमहि जोते आय रहे हे तिहाओ कब हे गयो" ....माखन के क्रोध भरे शब्द
एकाएक सामने बाले दवंग की त्योरियों में बल बढाते गए और क्रोधतिरेक में या धन का घमण्ड और अपनी ऊँची पहुच पुलिस पटवारी का मेल का दम्भ बन्दूक टाँगे दवंग को बल देता गया  ....

बात ही बात में एक अकेले युवा को लट्ठ,डंडो के जख्म बढ़ते रहे ......बैल की जोड़ी मालिक की करून कृदन देख सुन  रंभाती रही किन्तु सुनसान खेतो पर कोन था जो सहयोग करे ....अथवा बचाव करे ...?
हमलावरों द्वारा लगातार जख्म पड़ते रहे दूर चम्बल ,कुँवारी नदी के वादियो एक बगावत का बीजारोपण होता रहा ।

लगभग मरनासन्न स्तिथि में बेले के नारे खोल जुअट के सहारे माखन को लटका कर बाँध गाव की तरफ बेल हांक दिए जाते हे ........जेसे ही बेल घर के सन्मुख पहुचते हे की हाहाकार मच जाता हे चारो तरफ ग्राम वासियो का जमावड़ा रुदन क्रोध बदले की भावना आँखों से टपकती हुयी ऊँगली के पोरो में आकर सूखती रही ।

५०के दशक में अभी भी भारतीय पुलिस भारतीय न हो पाई थी उनमे अभी भी ईस्ट इंण्डिन संक्रमनता के विषाणु व्याप्त थे ।
तहकीकात और न्याय की बजाय देवगढ़ थाने पर ही एक क्षेत्रीय चिकित्सक द्वारा मलहम पट्टी उपरान्त खेत दवंग को देकर मुक्ति पा लेने जैसा तुगलकी आदेश ....सूना दिया गया ....!!
न चाहते हुए भी विवस होकर मातृभूमि जबरदस्ती छीन लिए जाने का दर्द और बदला लेने की पृवती सबल होती गयी
और कुछ समय बाद गाँववासियों पर होते अत्याचार के कारण रह रह कर माखन सिंह सिकरवार की आँखों में अंगार वर्षाने लगा कहते हे की जव अति की पराकाष्ठा हो जाती हे तब तब रौद्रता प्राकट्य होता हे ।

आखिर घर की औरतो से दशहरे पे भेंट में मिली चुडिंया माखन सिंह को ललकार उठी और प्रारम्भ हुआ जुल्म पर जुल्म होने का ,आग को आग में जलने जैसा विचित्र खेल जिसमे शामिल हुए माखन के अभिन्न मित्र छिद्दा सिंह की सहभागिता ने विकट रूप ले लिया था ।

कभी कुल्हाड़ी से दुश्मन को टुकड़े टुकड़े कर बीहड़  निकले माखन सिंह के पास आज सेमिआटोमेटिक रायफल का भरोसा था तो छिद्दा जेसे यार का मजबूत कन्धा एक एक करके बदले लिए जाते रहे फिर चाहे पटवारी को उलटा टांग बीहड़ में मिर्चीयो का धुँआ दिया गया हो या तत्कालीन  प्रभारी को दौड़ा दौड़ा कर शिकार करने की बेदर्दी से लिए गए बदले .......
वीहड़ी जीवन में पकड़े होना आम बात हे सबलगढ़ के सेठ की चर्चित डेढ़ लाख फिरोती ने प्रशाशन की नजर माखन ,छिद्दा की जोड़ी को एनिमी नम्बर ५ पांच बना दिया ।

उप्र०मप्र०राज० की पुलिस तिकड़ी बीहड़ो की ख़ाक छानती रही किन्तु माखन का धैर्य और छिद्दा की चपलता४५ बागियों का गिरोह कभी राजस्थान,कभी मप्र०तो कभी उप्र में काण्ड करता रहा ।

इसी बीच एक दिन भीषण मुठभेड़ हुई सुभह से शाम किन्तु दोनों और से गरजती बन्दुके गरजती रही डाकुओ का अम्युनेसन खत्म होने की कगार पर निकलने का कोई रास्ता नहीं चहु और भदावर क्षेत्र में घिरा गिरोह ईश्वर को याद करने लगा .........
एक एक के छिद्दा सिंह ने सभी से अपने सर की शपथ ली की आज माखन कोई कुछ न बताएगा और सब निकल जाएंगे  अपने भाई की बात मांनेगे ।
इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता छिद्दा की रायफल गरजने लगी अकेले ही मोर्चे पर भाग भाग तावड तोड़ फायरिंग करता हुआ पुलिस को ललकारता रहा और पुलिस पूरा गिरोह एक  जगह समझ केवल छिद्दा की चाल में फंस गयी गिरोह जमीन के सहारे रेंगता हुआ एक खार से होते हुए गायव हो चूका था ।

माखन को जब पता चला की छिद्दा "साहव सलामत" ..........प्रतिउत्तर दीर्घ मोन .......!!
और उन्हें समझते देर न लगी की आज छिद्दा ने सबकी सलामति के लिए मित्रता का सर्वोपरि वलिदान कर  दिया हे .......तत्क्षण शपथ ली की छिद्दा तेरे वलिदान का बदला लिए बगैर न जाऊँगा इस दुनिया से ।

छिद्दा जेसे मित्र और रघुवीर जेसे भाई को वीहडो में खोकर माखन ने अपना बदला लेने के लिए मास्टर  माधो सिंह भदोरिया का साथ चुना और एक दिन  छिद्दा ,रघुवीर सिंह के एनकाउंटर उपरान्त उत्साह में आई पुलिस पार्टी के सभी १५ को अधिकारियो समेत कुवारी के बीहड़ो में माधो सिंह के सहयोग से आमने सामने की गोली बारी में मार कर बदला पूरा किया ।

१६ अप्रैल १९७२ जोरा गांधी आश्रम में माधो सिंह और लगभग ५४७बागियों  के साथ माखन सिंह सिकरवार ने भी आत्मसमपर्ण कर दिया था ।
१९८२ तक जेल में रहने के बाद समाज की मुख्य धारा से जुड़कर ,समाज सैवा और दस्यु उन्मूलन में माधो सिंह के साथ सहभागी रहे  माखन सिंह २१, मई १९९८ शिकारपुर रेलवे स्टेशन के पास संदिग्ध परिस्तिथियों में मृत पाये गए ।

"साहिव सलाम " के ताकिया कलाम से  प्रशिद्ध बागी ,डाकू,मित्र ,दस्यु उन्मूलन के सहभागी माखन सिंह अंतोतगत्वा गति को प्राप्त हुए ।

विशेष -: लेख की रोचकता के लिए चलचित्र "मुझे जीने दो " का सांकेतिक चित्र ,मात्र रोचकता के लिए संज्ञान में ले जिसका इस किस्से से कोई सम्बन्ध नहीं हे ।
(दिनांक 17 जुलाई 2017 --13:47 फेसबुक बाल पर प्रथम)

★कथा सरिता★

कालिदास एक बार भ्रमण करते-करते एक गांव पहुंचे गए। बहुत प्यास लगी थी, तो एक घर के द्वार जाकर पानी मांगा।
वहां मौजूद स्त्री और अपने ज्ञान के चलते ख्याति अर्जित कर चुके कालिदास के बीच रोचक संवाद हुआ। एक नजर इसी संवाद पर -

कालिदास बोले: माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा।

स्त्री बोली:  बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं।अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास:  मैं मेहमान हूं, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री:तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसारमें दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्यबताओ कौन हो तुम ?
(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)

कालिदास बोले:मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा:  नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है,
दूसरे पेड़ जिनकोपत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?
(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गएऔर तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)

कालिदास बोले:मैं हठी हूं.

स्त्री ने कहा: फिर झूठ। हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं।
सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?(कालिदास पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)

कालिदास ने फिर कहा:   फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।

स्त्री फिर बोली:  नहीं, तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो?
मूर्ख दो ही हैं।
#पहला_राजा_जो_बिना_योग्यता_के_भी_सब_पर_शासन_करता_है,

#और_दूसरा_दरबारी_पंडित_जो_राजा_को_प्रसन्न_करने_के_लिए_गलत_बात_पर_भी_तर्क_करके_उसको_सही_सिद्ध_करने_की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।)

स्त्री ने कहा: उठो वत्स! (आवाज सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात् माता सरस्वती वहां खड़ी थीं,

कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए।)माता ने कहा:शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे, इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

सीख:-विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।
               शुभ दिवस ,
              जय श्री कृष्ण

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

भारत यश

हरा भऱा वीरौ से हर दम प्यारा हिन्दुस्तान रहा
सव देशो मे देश हमारा भारत ये वलवान रहा  ।

अवधपुरी के रामचन्द्र ने लन्कापति को मारा था
मथुरा मे श्रीकृष्णचन्द्र ने राजा कँस पछाडा था  ।

अभिमन्यु ने चक्राव्युह मे शष्त्रुो को संहारा था  
जगतपाल भगवान कृष्ण ने भीषम का प्रण पाला था ।

धरती से सुरपुर तक देखो अर्जुन सेतु बनाया था
इंद्रलोक से ऐरावत हाथी जिसने मंगवाया था ।

स्वाभिमान की मूरत महाराणा ,मुगलो को  मार भगाया था
विजय हेतु हाडी रानी ने अपना शीश थाल में सजाया था ।

वीरमति ने करी वीरता भारतवासी जान रहा  
सव देशो मे देश सिरौमणि भारत ही वलवान रहा ।

अँगरेजौ कौ मार भगाया झॉसीवाली रानी ने
दुर्गा पदमा जौहर कीन्हे दल मे हिन्दुस्तानी ने  ।

वीरमति ने करी वीरता चारो युग हनुमान रहा
सब देशो में देश हमारा भारत ये बलवान रहा ।

अँग्ररेजौ ने मार न पाई चुन्गल चिडिया भारी थी
गोरे पड़े रहे खेतो में फौज पड़ी सरकारी थी ।

राजा गोविन्दसिहँ "दतिया' के चुन्गल चिडिया मारी थी ।

सत्तावन की क्रांति भारी 'बिस्मिल' सा स्वाभिमान रहा
आजाद-भगत रणबिगुल फूंके अंग्रेजो का श्मशान रहा ।

सब देशो देश शिरोमणि चारो युग हनुमान रहा
सब देशो से देश हमारा भारत ये वलवान रहा

हरा भरा वीरो से हरदम भारत ये वलवान रहा ।

(विगत चार वर्षो से लगातार आज ही के दिन )
                    आपका ही
              जितेन्द्र सिंह तोमर

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

===चम्बल एक सिंह अबलोकन===भाग 14

    
           ★बाग़ी मोहर सिंह गुजर★
५०-६० का दशक........हालिया मिली स्वतन्त्रता को समेटता हुआ भारत अपने पुनर्सृजन में मगन शने शने ताजे घावो पर बासी मरहम लगाता हुआ निरन्तर उन्नति कैसे हो? जेसे प्रश्नो में विचारशील था।किन्तु भारत का एक अहम भूभाग अभी भी १८५७ की जीवन शैली में जीवनयापन को जिए जा रहा था। हालाँकि बन्दुके पहले कभी विरोध ,अंग्रेजी हुकूमत,अबैध भू अधिकार,स्वाभिमान के लिए निकलती थी पर अब मरने बाले भी अपने थे और मारने बाले भी। बैलगाड़ियों में जूते बेलो की कंठमालाये जीवन राग की तरह बजती तो कभी चम्बल की वादियो में वारुदि सुगंध के अहसास के साथ गरजती।
चम्बल की अब लिखी गयी किस्सागोई में मानसिंह,रुपा,लाखन,माखन-छिद्दा,माधो सिंह,मलखान सिंह ,सुल्ताना,पुतली ,सुवेदार पान सिंह तोमर इत्यादि की कहानियो से जुदा नहीं हे मोहर सिंह की कहानी बही कायथो की पटवारी और बैमान लठैतों की चपलताओ से ही एक सीधे साधे युवक को बन्दूक थमा दी जिसने फिर मानवी लाशो पर चलना ही नियति माना ।
जब जब जुवा पर बागी डकैतो की बात चले और मोहरसिंह का किरदार अपनी अलग छाप छोड़ता हे। तो आइये आज के लेख में मिलते हे एक मुच्छड़ बागी किरदार से ......'मोहर सिंह गुजर'

बिसुलि नदी के कछार में एक छोटा गाँव .जट पूरा-जिला भिंड...
गाँव के पश्चिम में भगवान शंकर का पीले रंग से पुता हुआ मन्दिर-मन्दिर से ही सटा था कभी मोहर सिंह का कच्चा मकान। मकान में लगी सोटो(लकड़ी के पट्ट) से छड़ता हुआ घुन चूर्ण उसकी 20 वर्ष पुरानी कारीगरी को प्रमाणित कर रहा था। एक टीले पर बनी मड़ैया और कुछ पालतू जानबरो के साथ पेत्रिक जमीन का सीना चिर जीवन यापन करना यही तो था उस गाँव की किन्तु समय की धुरी बदल गयी अब गाँव की पहिचान बन चूका था एक नाम 'मोहर'!

मोहर सिंह इसी गांव का रहने वाला एक छोटा सा किसान था। गांव में छोटी सी जमीन थी। जिंदगी मजे से चल रही थी। लेकिन चंबल के इलाके का इतिहास बताता है कि किसानों की जमीनों में फसल के साथ साथ दुश्मनियां भी उगती है। जमीन के कब्जें को मोहर के कुनबे में एक झगड़ा शुरू हुआ। और इसी झगड़े में मोहर सिंह की जमीन का कुछ हिस्सा दूसरे परिवार ने दबा लिया। गांव में झगड़ा हुआ। पुलिस के पास मामला गया। और पुलिस ने उस समय की चंबल में चल रही रवायत के मुताबिक पैसे वाले का साथ दिया। केस चलता रहा। इस मामले में मोहर सिंह गवाह था। 
गांव में मुकदमें में गवाही देना दुश्मनी पालना होता है। जटपुरा में एक दिन मोहर सिंह को उसके मुखालिफों ने पकड़ कर गवाही न देने का दवाब डाला। कसरत और पहलवानी करने के शौंकीन मोहर सिंह ने ये बात ठुकरा दी तो फिर उसके दुश्मनों ने उसकी बुरी तरह पिटाई कर दी। घायल मोहर सिंह ने पुलिस की गुहार लगाई लेकिन थाने में उसकी आवाज सुनने की बजाय उस पर ही केस थोप दिया गया। 
बुरी तरह से अपमानित मोहर सिंह को कोई और रास्ता नहीं सूझा और उसने चंबल की राह पकड़ ली। 1958 में गांव में अपने इसी मंदिर पर मोहर सिंह ने अपने दुश्मनों को धूल में मिला देने की कसम खाई और चंबल में कूद पड़ा।  
मोहर सिंह ने पहला शिकार अपने गांव के दुश्मन को किया। उसके बाद बंदूक के साथ मोहर सिंह जंगलों में घूम रहा था। शुरू में उसने बाकि बागियों के गैंग में शामिल होने की कोशिश की। दो साल तक जंगलों में भटकते हुए मोहर सिंह की किसी गैंग में पटरी नहीं बैठी तो मोहर सिंह ने फैसला कर लिया कि वो खुद का गैंग बनाएंगा और गैंग भी ऐसा जिससे चंबल थर्रा उठे। 
गांव में ताकतवर लोगो से बदला लेने में ना कानून साथ देता है, ना भगवान और न ही अदालत की चौखट। चंबल में हर कमजोर के लिए ताकत हासिल करने का एक ही शॉर्ट कट है और वो है चंबल की डांग में बैठकर राईफलों के सहारे अपने दुश्मनों पर निशाना साधना।  मोहर सिंह की बदूंकें आग उगर रही थी और निशाना बन रहे थे दुश्मन। 
चंबल के मोहर सिंह ने अपना गैंग बनाया तो उस वक्त कई गैंग चंबल में अपना खौंफ बनाएं हुए थे। मानसिंह गैंग की कमान लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का पंडित के हाथों में थी। लाखन, माधों सिंह, हरविलास, छोटे-बटुरीसिंह जैसे गैंग पूरे चंबल में घूम रहे थे। और मोहर सिंह को इन्ही के बीच अपना रास्ता बनाना था। मोहर सिंह ने अपने साथियों के साथ पहले छोटी छोटी वारदात करना शुरू किया। और पुलिस के रिकॉर्ड में उसकी एंट्री शुरू हुई। 
मेहगांव थाने में धारा140/60 के तहत पहला अपराध था जो मोहर सिंह गैंग के खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। 1960 में ही गौहद थाने में दूसरा अपराध दर्ज हुआ(307/60) हत्या के प्रयास का। 

1961 में गौहद में पहला कत्ल का केस दर्ज हुआ। 
और इसके बाद की कहानी कत्लों का एक सिलसिला है।
मोहर सिंह ने पहले तो भिंड और आसपास के इलाके में अपराध किए लेकिन जैसे जैसे गैंग बढ़ने लगा मोहर सिंह ने भी अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। मोहर सिंह अपने गैंग के अनुशासन को लेकर बेहद सतर्क था। मोहर सिंह का गैंग बढ़ रहा था उधर दूसरी और पुलिस एक एक कर चंबल के दूसरे गैंग का सफाया कर रही थी। मोहर सिंह ने इसका तोड़ निकाल लिया था। मोहर सिंह ने चंबल में ऐलान कर दिया था कि जो कोई भी उनके गैंग की मुखबिरी करेंगा उसका पूरे परिवार को साफ कर दिया जाएंगा। और इस पर उसने कड़ाई से अमल शुरू कर दिया। मुखबिरों को निबटाने में मोहर सिंह बेहद खूंखार हो जाता था। 
मुखबिरों को और उनके परिवार पर मोहर सिंह शिकारी की तरह से टूट पड़ता था। मोहर सिंह के गैंग के ऊपर ज्यादातर मुखबिरों के कत्ल के मामले बन रहे थे। लेकिन चंबल में मोहर सिंह का खौंफ पुलिस और उसके मुखबिरों पर लगातार बढ़ता जा रहा था। और इसका फायदा मिल रहा था मोहर सिंह को। मोहर सिंह का नाम मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में फैल गया था। जहां दूसरे गिरोहों को किसी भी गांव में रूकते वक्त मुखबिरी का डर रहता था वही मोहर सिंह का गैंग बेखटके अपनी बिरादरी के गांवों में ठहरता और पुलिस को खबर होने से पहले ही निकल जाता था।
मोहर सिंह ने अपने गैंग को सबसे बड़ा गैंग बनाने के साथ-साथ कुछ कठोर नियम भी बना दिये थे। मोहर सिंह गैंग में किसी भी महिला डाकू को शामिल करने के खिलाफ था। और इसके साथ ही उसके गैंग को सख्त हिदायत थी कि वो किसी भी लडकी और औरत की और आंख उठाकर न देखे नहीं तो मोहर सिंह उसको खुद सजा देगा। ये बात पुलिस अधिकारियों को आज भी याद है
और इस बात को  साल बाद भी मोहर सिंह याद रखता है कि.........कृमशः😂🙏
(अगली कड़ी शीघ्र ही पोस्ट की जायेगी )
                       जितेंद्र सिंह तोमर'५२से'
                        13/12/2017

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

चम्बल एक सिंह अबलोकन

           ===चम्बल एक सिंह अबलोकन===
                ★रूपा पण्डित ★{तृतीय भाग}
सर्दिया अपना पूर्ण रूप लेने लगी थी और इधर रुपा पर  बिचित्र सनक सबार होती जा रही थी।31 दिसंबर 1958 की रात मध्यप्रदेश और राजस्थान के के बीच एक छोटे से गांव से चार लोगो को रूपा ने पकड़ा और उनका कत्ल कर दिया। थोड़ी देर बाद ही मुरैना जिले के एक गांव से चार और बेगुनाह लोगो को पकड़ उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। रूपा ने मध्यप्रदेश पुलिस के ऐलान का जवाब इस तरह से बेगुनाहों का खून बहा कर दिया था। 
मध्यप्रदेश पुलिस की डायरियों में रूपा और लाखन जी1और जी 2 के गैंग के तौर पर दर्ज हो चुके थे। पुलिस किसी भी कीमत पर इन दोनो का सफाया करना चाहती थी। इसी बीच अपने दुश्मनों की हवेली जला कर लाखन ने पुलिस के लिए बड़ी चुनौती डाल दी थी। इस पर सरकार ने सबसे पहले लाखन का सफाया करने के लिए एसएएफ की एक पूरी बटालियन पुलिस अधिकारी टी क्विन (कोड नेम जो असल कुछ और थी)के नेतृत्व में लाखन के गांव नगरा में उतार दी।
 टी क्विन किसी भी तरह से लाखन का सफाया चाहता था।  पहले तो सीधी मुठभेड़ हुई लेकिन लाखन सिंह आसानी से पुलिस के जाल को काटकर निकल भागा। इस पर टी क्विन ने पहली बार चंबल में ऐसी चाल चली जो चंबल में न कभी सुनी गई थी और न देखी गई थी।
टी क्विन नगरा के आस पास के गांवों की रात दिन खाक छान रहा था। हर गांव में उसने अपना मजबूत मुखबिर तंत्र खड़ा कर लिया था। लेकिन उसको न लाखन का सुराग मिल रहा था और न ही रूपा का।  टी क्विन ने  रूपा के गैंग छोड़ कर पुलिस के सामने समर्पण करने वाले एक डकैत को अपने विश्वास में ले लिया।    उससे हासिल सूचनाओं के आधार पर टी क्विन ने एक के बाद एक रूपा के लोगो को पकड़ना और मार गिराना शुरू कर दिया। रूपा ने बदला लेने का प्लान बनाया।
भिंड में पुलिस के घेरे में रह रहे मुखबिर के रिश्तेदारों को टार्चर किया और उन्हें मजबूर कर दिया कि वो मुखबिर को किसी बहाने से अपने यहां बुलाएं। और एक दिन जब वो मुखबिर जाल में फंस कर अपने रिश्तेदारों के यहां पहुंचा तो वहां उसका इंतजार कर रहा था .......रूपा। मुखबिर को बुरी तरह से यातना देकर मौत के घाट उतार दिया। 
 इसके बाद रूपा ने अपना दिमाग लगाया टी क्विन के सफाए पर। टी क्विन ने कई बार रूपा को दौड़ाया था और उधर रूपा ने एंबुश करना शुरू कर दिया। एक दिन मुरैना के जंगलों में घूम रहे टी क्विन पर उसका निशाना लग भी गया ........ अब तक पुलिस व्यूह रचती थी लेकिन इस बार सिकरवारि की डांग में शिकारी खुद शिकार हो गयी होती लेकिन टी क्विन के ड्राईवर ने अपनी जान पर खेलकर भी टी क्विन को निकाल लिया। वारदात में टी क्विन के साथ बात करने वाले 9लोगो को रूपा ने गोलियों से भून दिया। 
टी क्विन ने हार नहीं मानी। एक के बाद एक मुखबिरों के सहारे दोनो गैंग को ठिकाने लगाने की कोशिशों में जुटा रहा। लेकिन दोनो गैंग अलग अलग दिशाओं में काम करते थे ऐसे में एक दिन टी क्विन को  एक मुखबिर ने सलाह दी कि क्यों न 'कंटनैव कंटकै'की निति से काम  निकाल दिया जाएं।
कांटे से कांटा यानि लाखन का कांटा रूपा के कांटे से निकाल दिया जाएं। और फिर रूपा का देखा जाएंगा।  टी क्विन को ये राय जम गई। और फिर टी क्विन ने रूपा पर जाल बिछाना शुरू कर दिया।  रूपा के एक रिश्तेदार की मदद से टी क्विन उस तक पहुंच गया। 
टी क्विन ने रूपा को लालच दिया कि अगर वो लाखन सिंह का सफाया करा देता है तो फिर उसको हाजिर कराने में टी क्विन उसकी मदद करेगा। ये तो आज भी साफ नहीं कि क्या वाकई रूपा इस बात परयकीन कर रहा था? लेकिन ये साफ था कि वो लाखन सिंह का सफाया चाहता था लिहाजा उसने टी क्विन से हाथ मिला लिया। इसके बाद टी क्विन को सूचना मिलना शुरू हो गया।  

पुलिस को पोरसा इलाके में लाखन सिंह की सटीक मुखबिरी पुलिस को कर दी। सैकड़ों  पुलिस वाले तेजी से पोरसा के जंगलों में चुपचाप जा धमके। लेकिन किस्मत ने लाखन का साथ दिया। उसकी लोकेशन से पहले ही पुतली का गैंग निश्चित होकर खाना बना रहा था। ऐसे में पुलिस का उसके साथ आमना सामना हो गया। घटना में पुतली और उसका पूरा गैंग पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया। लेकिन लाखन मौके का फायदा उठाकर निकल चुका था। 
पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी। इससे भी ज्यादा परेशानी टी क्विन और रूपा पंडित के बीच के रिश्तों को लेकर होने लगी। टी क्विन चंबल के सबसे खूंखार डकैत के साथ दोस्ती की कहानियां सरकार को मिलने लगी। मीडिया ने दबाव बढ़ा दिया। टी क्विन को जेड ओ यानि जोनल ऑफिसर वन कहा जाता था लेकिन इन दोनो के रिश्तों के चलते पूरे इलाके में रूपा को जेड़ ओ 1 और टी क्विन को जेड और 2 कहा जाने लगा। 

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 26 अक्तूबर 1959 का दिन था। टी क्विन ग्वालियर से वापसी के रास्ते में महुवा गांव में रूके। इस बीच महुवा थाने के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ कि जी 1 गैंग की आमद इलाके में होने वाली है। रूपा का गैंग वारदात के लिए लाखन के गांव नगरा की ओर जाने वाला है। गैंग की दूरी कुछ मील दूर है।  टी क्विन ने कुछ ही देर में 9 बटालियन का इंतजाम कर लिया। इलाके को पूरे तरह से घेर लिया गया।  
दो प्लानटून नगरा की तरफ
दो प्लाटून महुआ, 
दो प्लाटून काली आरोली
और एक एक प्लाटून उद्योतगढ़ और पोरसा भेज दी गई। 
क्विंस ने छह बटालियन के साथ मार्च किया।  और बीहड से चंबल के बीच की जगह में घेरा बंदी कर ली। पुलिस जैसे ही कुछ आगे बढ़ी तो गैंग के पहरेदार जिसे आउटपोस्ट कहा जाता है ने शोर मचाना शुरु कर दिया कि "पतरी दाल खाने बालो की आमद हुई भजो रे भजो" गोलियां चलने लगी। पुलिस ने आवाज को निशाना बना कर 28 ग्रुप बना कर एक के बाद एक कई घेरे बना  दिये। 
गैंग तीन तरफ से भाग कर तीन मील को पार कर राजस्थान में निकलना चाहता था लेकिन हर तरफ पुलिस की भारी फायरिंग हो रही थी। और रूपा के गैंग के बचने का कोई रास्ता नहीं था। चंबल की ओर भागते हुए गैंग को चंबल से आधा किलोमीटर पहले ही एक दूसरी पुलिस पार्टी से सामना हुआ। पुलिस जमादार बालम सिंह ने अपनी रेंज में दिख रहे  तीन लोगो पर अचानक अपनी टॉमीगन से गोलियों की बौछार कर दी। गोलियों के साथ चीखने की आवाज भी हवा में गूंजी और फिर शांत हो गई। रात का वक्त था ऑपरेशन रोक दिया गया। अल सुबह तलाश शुरू हुई तो कुछ दूर जंगल में एक लाश मिली लेकिन जैसे उसका चेहरा पहचाना गया तो टी क्विन निराश हो गया क्योंकि ये रूपा नहीं था बल्कि उसका गैंग का राजाराम था। पुलिस पार्टी लौट ही रही थी कि एक और खून के निशान दिखाई दिए।ष निशान के पीछे जाने पर कुछ दूर पर ही गोलियों से छलनी एक लाश थी। और लाश की पहचान के साथ ही टी क्विन खुशी के साथ नाचने लगा। क्योंकि ये लाश किसी और की नहीं मानसिंह के बाद चंबल के सबसे बड़े डाकू रूपा की लाश थी। 
हालांकि चंबल के किस्सों में ये कहानी कुछ दूसरे तरीके से कही जाती है।
आम लोगो के  मुताबिक टी क्विन ने लाखन को मार पाने में नाकाम रहने पर रूपा का ही काम तमाम करने की ठानी। उधर रूपा को टी क्विन पर पूरा विश्वास था लिहाजा टी क्विन के बुलावे पर वो  गैंग को पीछे छोड़ कर सिर्फ राजाराम के साथ ही महुआ आ पहुंचा और वहां टी क्विन ने उसका एनकाउँटर कर दिया और एक खूबसूरत जाल में फसकर रुपा ने स्वम अपनी मोत का सामान इक्ट्ठा किया था ।
लेकिन कहानी कुछ भी हो चंबल का एक और आतंक पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया था। इस मुठभेड की सूचना मिलने पर के एफ रूस्तम जी ने अपनी टेबल में लगे हुए चार्ट से जी 1 गैंग के नाम पर भी काटा लगा दिया। और चंबल का एक और खौंफनाक डाकू जमीन से उठ कर किस्सों की नदी में उतर गया। 

-: किस्सा पुलिस रिकार्ड और बुजुर्गो की बातो पर आधारित।
कृमशः....
मिलते रहेंगे किसी नयी पुरानी कहानी के साथ। सलग्न चित्र प्रतीकात्मक।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

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