सोमवार, 27 नवंबर 2017

★चम्बल एक सिंह अबलोकन★

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                  भाग -१०
             डाकू पुतली बाई
चम्बल के शापित गारो में जहां  मर्यादाओ की एक लकीर खींच कर बागियो के नाम रोविन हुड की तरह याद किये गए तो कभी अपनो के रक्त तिलक किये मस्तक बहु दृष्टि गत हुए ।किन्तु जिस दुसाहसिक जीवन मे सिर्फ पुरुष प्रधानता की नींव रखने मान सिंह जैसे न्यायकारी बागी हुए वही कुछ दुर्दांत डाकू भी हुए ।
जहां मोछ पर ताव आवाज में गर्विता ओर बहिन बेटी के सम्मान को सर्वोपरि रखते हुए महिला निषेधिता की सीमाएं बंधी तो कभी टूटी भी ।

चम्बल की शांत वादियो में जहां हरियाली है ...देशभक्तिहे..मर मिटने का जज्बा लिए गवरु छै फूटे जवान अत्याचारो के विरुद्ध न्याय करने के लिए कारतूसों के बिलडोरिया बांध गारो में कूदे तो कभी घुघरू के पटटके बांध सबका अपना नृत्य से मन मोहती खूबसूरत बलाए भी  चम्बल की वादियों में सनसनी बनी रही ।
ऐसी एक कहानी है चम्बल की प्रथम दस्यु सुनदरि #पुतलीबाई उर्फ गौहरबानो की जो कोमलांगी कभी घुंघुरू बांध रँगमंचो की सितारा हुआ करती थी फिर क्यों कारतूसों के पटे बांध बीहड़ो में जा पहुची ,आखिर क्या बजह थी पुतली के घुंघरू से बन्दूक तक के सफरनामे की ...?घुंघरू झनक से बन्दूक की धमक तक के सफरनामे की दासता सुनाता है तहसील अम्बाह जिला मुरैना का बरबाई गांव ..
  ये चंबल के बीहड़ों में बीच बसा हुआ एक और गांव है। गांव में घुसते ही आपको एक पार्क दिखाई देगा। और गांव में घुसते ही आप को कुछ ऐसा दिखाई देगा जो आपने सोचा भी नहीं होगा। पुतलीबाई की तलाश करने गांव पहुचे लोगों को पहले दिखता है  राम प्रसाद बिस्मिल पार्क ओर उनकी स्मिर्ति बना हुआ मन्दिर ... बरबाई और बिस्मिल एक करीब का रिश्ता है। ये बिस्मिल का गांव है। रामप्रसाद बिस्मिल का गांव। सरफरोशी की तमन्ना जैसा देशभक्ति का तराना लिखने और इसी गाते गाते फांसी पर चढ़ जाने वाली बिस्मिल का यही पुश्तैनी गांव है।
(बिस्मिल जी पहले लेख लिख चुका हूं )।
आज चंबल की रानी यानि पुतलीबाई की कहानी। इस घर की टूटी हुई दीवारे आपको ये बता रही होगी की लगभग सत्तर साल से ये घर इसी तरह किसी काइंतजार कर रहा है। घर के अलग-अलग हिस्से हो चुके है। किसीको किसी ने खरीद लिया तो किसी को किसी ने। लेकिन जो रह गया उसमें एक इंतजार दिखता है। जैसे उसको घुंघरूओं की आवाज का इंतजार हो कि कब वो महफिल फिर से सजेगी, और तबले की थाप कब बजेगी और कब इस घर के आंगन में असगरीबाई की आवाज और पुतलीबाई का नाच एक बार फिर से जवां हो जाएंगा। पुतलीबाई के घर के कई हिस्से हो चुके है। और कई हिस्से बिक चुके है। पुतली के भाई के परिवार वाले इस घर को हिस्सों में बेच कर गांव से जा चुके है। बस  एक हिस्सा ह ैजिसकी ताख पर आज भी कुछ टूटे हुए दिए रखे है।
वो दिए जिनकी रोशनी में पुतली का नाच दिखता था और वो दिए जो पुतली के मरने पर एक बार बुझे तो फिर कभी नहीं जले।
पुतलीबाई की कहानी की शुरूआत यही से शुरू होती है। पुतलीबाई की मां का नाम असगरीबाई था। जाति से बेड़नी और काम नाच-गाना। असगरीबाई ने बचपन से ही पुतलीबाई को नाचगाना सिखाया था। असगरीबाई के बारे में कहा जाता कि वो  बेहद खूबसूरत थी और वही खूबसूरती विरासत में पुतलीबाई को मिली थी। पुतलीबाई और उसकी बहन तारा ने अपना नाचगाना यही से शुरू किया और कुछ ही दिन में असगरी समझ गई कि पुतली के लिये ये गांव छोटा पड़ रहा है। लिहाजा पुतली को लेकर असगरीबाई आगरा पंहुच गई। कद्रदानों का शहर आगरा। इसी शहर के बसई इलाके में एक कोठे पर पुतलीबाई का नाचगाना शुरू हो गया।पुतली की सुरीली आवाज और सुंदर नृत्य ने लोगो  पर जादू करदिया। किस्सा यही है कि आगरा में असगरीबाई का कोठा इलाकेका सबसे ऊंचा कोठा बन गया। महफिलों की रौनक बढ़ती गई। और पुतलीबाई की शोहरत के साथ दौलत भी असगरी के हिस्से में आने लगी। पुतलीबाई की आवाज के चर्चे आगरा के साथ साथ लखनऊ, कानपुर और दूसरे बड़े शहरों तक जा पहुंची।  पुतलीबाई के नाच पर पैसों की बौछार हो जाती थी। इसीबीच पुतली ने अपनी नाचने-गाने की कला के बीच एक और चीज सीख ली। और वो था आल्हा और होली के गीत गाना। आल्हा इस इलाके के लिए जिंदगी का हिस्सा थी। महोबा के आल्हा ऊदल की वीर गाथा के गीतों को पुतलीबाई इतना डूबकर गाती थी कि इलाके के बड़े-बडे अल्हैत पानी भरने लगे।
समय ने करबट ली पुतली के नाच के किस्से जगजाहिर होते गए और अब पुलिसबालो की आमद होने लगी जिसकी बजह से ओर कद्रदानों की सहज कमी होने लगी एक दिन असगरी का मोहभंग हुआ और पुतली को लेकर मुरैना में नया ठिकाना बना लिया ।अब पुतली गांव खेडा के विवाह उत्सव इत्यादि में अपने नाच गाने से पैसे का अम्बार लगाने लगी किन्तु मानसिंग गिरोह के सुल्ताना डाकू की आमद से पैसा तो खूब आया साथ लाया पुलिस की आबक भी बढ़ गयी ..
गाहे बगाहे सुल्ताना ओर पुतली का नयनसंगम कब इश्क में बदल गया किसी को खबर न हुई ।बरबाई से आगरा का सफर वाया मुरेना होता हुआ फिर बरबाई में आकर रुक चुका था । चम्बल के गांवों में सनसनी खेज खबर चली की डाकू सुल्ताना ओर पुतली का इश्क परवान चढ़के बीहड़ो का रास्ता माप चुका था । स्त्री प्रवेश वर्जित बागी गैंग मानसिंह के संमक्ष सुल्ताना घुटनो के बल और पुतली नजर झुकाये खड़ी थी इससे पहले की गोली सुल्ताना का हृदय वेदन करती पुतली आगे आ गयी और बोली "ददुआ में स्वम आयी हु सुल्ताना के साथ ओर रहना भी चाहती हु इसमे इसका कोई दोष नही" तनी हुई नाल ऊपर हो गयी और सुल्ताना को जीवन बख्शने के साथ ही मर्यादा भंग करने के दोष में गिरोह निष्कासन का आदेश दिया गया ।
मान सिंह गैंग से निष्कासित सुल्ताना ने अपने दम पर एक ओर गिरोह बनाया पुतली साथ ही बनी रही उसको ये सब छोड़ने की सलाह देती रही बही सुल्ताना बार बार एक जबाब देता की बागी जिंदगी सिर मोत तक आगे बडते रहना लिखा होता है चम्बल आने के दस हजार रास्ते है लेकिन बापस जाने का कोई रास्ता नही ।एक दिन पुतली की जिद के आगे सुल्ताना टूट गया और उसको बापस बरबाइ छोड़ आया किन्तु महीनों तक डाकुओ के रहने पुतली से आये दिन पुलिस की पूछतांछ ओर ज्यादती यहां तक टॉर्चर से तंग आकर पुतली को सुल्ताना का साथ याद आने लगा । रछेड गांव के एक विवाहमें पुतली के  नाच गाने का कार्यक्रम था और सुल्ताना को मिली खबर अनुसार पुतली फिर से बीहड़ी गारो में शरण को तैयार हो चुकी थी ।विवाह उत्सव से पहले ही सुल्ताना पुतली को या यूं कहे पुतली सुल्ताना के साथ निकल भागी ।अब पहले की सुरीला आवाज अब दहसत का पर्याय बन  चुकी घुघरु की जगह कारतूस ले चुके थे कल की नृत्यांगना आज गोलियों की दम पर तिगनी नाच नचाने बीहड़ी सौन्दर्य के साथ सुर ताल मिला चुकी थी .....

कृमशः ......

बुधवार, 15 नवंबर 2017

★तलाश★

==तलाश"==
#तलाश
चलो हंसने की कोई, हम वजह ढूंढते हैं,
जिधर न हो कोई ग़म, वो जगह ढूंढते हैं !

बहुत उड़ लिए ऊंचे आसमानों में यारो,
चलो जमीं पे ही कहीं, हम सतह ढूंढते हैं !

छूटा संग कितनों का ज़िंदगी की जंग में,
चलो उनके दिलों की, हमगिरह ढूंढते हैं !

बहुत वक़्त गुज़रा भटकते हुए अंधेरों में,
चलो अँधेरी रात की, हमसुबह ढूंढते हैं !!!

कथा सरिता

===कथा कूप===
किसी जंगल में एक बड़ा सा तालाब था उसमें सैकड़ों मेंढ़क रहते थे। तालाब में कोई राजा नहीं था। दिन पर दिन अनुशासनहीनता बढ़ती जाती थी और स्थिति को नियंत्रण में करने वाला कोई नहीं था।
उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र दिखाई नहीं देता था। नई पीढ़ी उत्तरदायित्व हीन थी। जो थोड़े बहुत होशियार मेंढ़क निकलते थे वे पढ़-लिखकर अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे।
हार कर कुछ बूढ़े मेंढ़कों ने घोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिये कोई राजा भेज दें। जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके।

शिव जी ने प्रसन्न होकर नंदी( शिव का वाहन) को उनकी देखभाल के लिए भेज दिया।नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता, पहरेदारी करता लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था न उनकी भावनामई को  आवश्यकताएं। नंदी के खुर से कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढ़क मर जाता। समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई थी। पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिवजी को प्रसन्न किया और राजा को बदल देने की प्रार्थना की। शिव जी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए नंदी को वापस बुला लिया औरअपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज दिया।

फिर क्या था वह पहरेदारी करते समय एक दो मेंढ़क चट कर जाता, मेंढ़क उसके भोजन जो थे। मेंढ़क बुरी तरह से परेशानी में घिर गएे।
फिर से मेंढ़कों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोलेशंकर को पुनः प्रसन्न किया। शिव भी थे तो भोलेबाबा ही, सो जल्दी से प्रकट हो गए। मेंढ़कों ने कहा, "आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसेदूर होंगे!कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता। आप ही बताएं हम क्या करें?

'इस बार शिव जी जरा गंभीर हो गए। थोड़ा रुक कर बोले, "यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो। मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिए और तुम्हारे लिए क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो।किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी विदेशी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता। इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो,संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो। अपनी आवश्यकताएं समझो, गलतियों से सीखो। मांगने से सब कुछ प्राप्त नहीं होता, अपने परिश्रम का मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो।"

#शब्दसार
लघुकथा का आशय यह है कि हमें अपने विवेक और बुद्धि का उपयोग करते हुए काम करना चाहिए। किसी पर आश्रित रहकर यदि काम करते हैं तो हानि ही उठानी पड़ती है।
             (बाकि जो हैए सो हैए ही)

★कथा कूप★

===कथा कूप==
स्वाति नक्षत्र की वेला थी, आसमान में घने बादल घुमड़ तो रहे थे, लेकिन बरसने का नाम नहीं ले रहे थे। नीचे खेतों की प्यासी जमीन बूंदों की टिप-टिप को तरस रही थी।

बादलों में बसने वाली जलराशि में समाहित बूंदें खेतों की प्यास देखकर विह्वल हो उठीं।उन्होंने बादल से विनती की - 'तात, अब हमें अपने आंचल से मुक्त करो और धरती पर बरस जाने दो। नीचे प्यासी धरती और प्राणियों को हमारी बहुत जरूरत है।"

यह सुनकर बादल बोला -'अरी बूंदो, तुम क्यों उतावली हो रही हो, क्या तुम्हें आसमान में हमारे साथ यूं स्वच्छंद विचरना अच्छा नहीं लग रहा?
देखो कितनी सुंदर हवा चल रही है। कुछ समय और इसका आनंद लो। आसमान में उड़ने का अपना ही मजा है। मैं तुम्हें बड़ी मुश्किल से जमीन से उठाकर आसमान में लाया हूं।"
यह सुनकर बूंदों ने कहा - 'हमें आसमान नहीं, जमीन चाहिए। ऐसे उडने में क्या आनंद, जो हम किसी का भला न कर सकें। इससे तो अच्छा है कि हम नीचे वालों के साथ आत्मसात् बनकर क्यों न जिएं।"

लेकिन बादल फिलहाल उन्हें मुक्त करने के लिए राजी नहीं था। वह उन्हें अपने आंचल में ही समेटे रखना चाहता था। उसे बरसने की जल्दी नहीं थी।
लेकिन उन बूंदों में से एक बूंद तुरंत नीचे गिरने के लिए मचल उठी। उसकी सहेलियों ने उसे समझाया कि वह अकेले कुछ नहीं कर पाएगी और फिलहाल न गिरने में ही समझदारी है, लेकिन वह नहीं मानी। वह आगे-पीछे सोचे बिना धरती की ओर टपक ही पड़ी।हवा भी उसका साथ नहीं दे रही थी। लेकिन वह नन्ही बूंद अपनी पूरी शक्ति लगाकर प्यासे खेत की ओर बढ़ी जा रही थी।
उसका सोचना था कि मन मसोसकर क्यों रहा जाए और अपनी सामर्थ्य से जितना बन पड़े, दूसरों की भलाई की दिशा में प्रयत्न क्यों न किया जाए।
बूंद बहुत दूर नहीं चल सकी और जहां भी बन पड़ा, वहीं बरस पड़ी। सरोवर तट पर बैठी हुई सीप ने उसकी ममता को परखा और मुंह खोल दिया - 'आओ बहन, मैं तुम्हें अपने कलेजे से लगाकर रखूंगी। तुमसे बढ़कर कौन है इस दुनिया में, जिसे मैं अपना बनाऊं।
" सीप और स्वाति बिंदु का संयोग मोती बन गया।"
★ अनुदानी और भाव पारखी
दोनों धन्य हो गए।★

        जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'
              (किस्सा जो पढ़ा था कही)

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

★कथा कूप★

बहुत पुराने समय की बात है।भारत वर्ष में  एक नृप का चक्रवर्ती शाशनथा, उनके कुलगुरु और कुलपुरोहित नीति और ज्ञान की बातें समझाते रहते थे।
निरन्तर युद्ध में जीतने के बाद राजा का ध्वज अखण्ड भारत पर गर्व से लहराता जा रहा था ।
निरन्तर प्राप्त होती विजय श्री और बढ़ते शाशन क्षेत्र के प्रभुत्व ने राजन के मस्तिष्क में गर्व की भावना कब अभिमान में परिवर्तित हुई उनको स्वम अहसास न हुआ ।
एक बार राजा ने घमंड से चूर होकर कुलगुरु से कहा, 'गुरुदेव, आज  मैं अब चक्रवर्ती सम्राट हो गया हूं....
अब मैं हजारों-लाखों लोगों का रक्षक हूं....
मेरे कंधों पर उन सब की जिम्मेदारी है।'
कुलगुरु समझ गए कि मेरे यजमान को सर्वसत्ताधीस  होने की अवभिव्यक्ति का घमंड हो गया है। यह घमंड उसकी संप्रभुताको हानि पहुंचा सकता है। इस घमंड को तोड़नेके लिए कुलगुरु ने एक उपाय सोचा...
जब एक दिन शाम को राजा और कुलगुरु भ्रमण कर रहे थे तभी राजा को एक बड़ा सा पत्थर दिखा। कुलगुरु ने उस पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा 'राजन! जरा इस पत्थर को तोड़ कर तो देखो।
'राजा ने अत्यंत नम्र भाव से अपने बल से वह पत्थर तोड़ डाला।
किन्तु यह क्या!
पत्थर के बीच में बैठे एक जीवित मेंढक को एक पतंगा मुंह में दबाए देख कर राजा दंग रह गया।

कुलगुरु ने राजा से पूछा, 'पत्थर के बीच बैठे इस मेंढक को कौन हवा-पानी और खुराक दे रहा है? इसका पालक कौन है? कहीं इसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी तुम्हारे ही कंधों पर तो नहीं आ पड़ी है?'
राजा को अपने कुलगुरु के प्रश्न का आशय समझमें आ गया। वह इस घटना से पानी-पानी हो कर कुलगुरु के आगे नतमस्तक हो गया।
तब कुलगुरुने कहा, 'चाहे वह तुम्हारे राज्य की प्रजा हो या दूसरे प्राणी, पालक तो सबका एक ही है- परमपिता परमेश्वर।हम-तुम भी उसी की प्रजा हैं, उसी की कृपा से हमें अन्न और जल प्राप्त होता है। एक शाशक के रूप में तुम उसी के कार्यों को अंजाम देते हो। इसीलिए हमारे भीतर पालनकर्ता होने का घमंड कभी नहीं आना चाहिए।'

#सारांश -: किसी भी कार्य के लिए हम सब मात्र निमित्त हे जिसका कर्ता स्वम को समझ सर्वश्रेठता का प्रदर्शन करना सबसे बड़ी भूल हे ।
क्योंकि धन्वन्तरि वैद्य को भी मृत्यु के समय औषधि प्राप्त न हुई थी ।

★चतुर्भुज क्षत्रिय योद्धा★

      ===चम्बल एक सिंह अबलोकन =
                   ● सौर्य गाथा●
     ★चार भुजाधारी ऐतिहासिक युद्ध ★
चित्तोड़ की धरती पर स्वाभिमान,मर्यादा और धर्म रक्षा हेतु यु सेकड़ो युद्ध हुए दशको जय पराजय के    साथ सत्ता परिवर्तन लाखो योद्धाओ को वीरगति प्राप्त हुई .....हल्दीघाटी की पिलिमिट्टी गेरुए रंग में रंग गयी किन्तु एक अविस्मरणीय युद्ध ऐसा भी हुआ जिसमे अखिल विश्व पालन कर्ता भगवान श्री हरी का चार भुजा धारी रूप सदृश हुआ हो और उस दुस्ट दमनकारी रूप धरने बाले थे दो विकट योद्धा एक जयमल मेड़तिया तो दूजे कल्ला राठौर जी । तो आइये जाने की इस #चारभुजाधारी युद्ध के नाम सनातन गौरव गाथा को ।
राव जयमल का जन्म आश्विन शुक्ला ११ वि.स.१५६४,ईस्वी सन्१७ सितम्बर १५०७ शुक्रवार के दिन हुआ था ।बाल्य् काल से ही मेड़ता रियासत पर पड़ोसी रियासत द्वारा होते आक्रमणों में समय समय पर युद्ध करते युवावस्था तक करीव२२युद्ध लड़ चुके मेड़तिया सिरदार जयमल एक असाधारण योद्धा बन चुके थे ।
कुछ समय बाद उन्हें चित्तोड़ की रक्षा का अहम जिम्मा सौंप चित्तोड़ नरेश अपनी रक्षा व्यवस्था को और सुदृण कर देते कि उसी समय कई बार का परास्त दुस्ट मुगल आक्रांता अकबर द्वारा चित्तोड़ पर चढाई कर देता हे ।
आक्रमण का समाचार सुन जयमल चित्तोड़ पहुँच जाते हे | २६ अक्टूबर १५६७ को अकबर चित्तोड़ के पास नगरी नामक गांव पहुँच गया | जिसकी सूचना महाराणा उदय सिंह को मिल चुकी थी और युद्ध परिषद् की राय के बाद चित्तोड़ के महाराणा उदय सिंह ने वीर जयमल को ८००० सैनिकों के साथ चित्तोड़ दुर्ग की रक्षा का जिम्मा दे स्वयम दक्षिणी पहाडों में चले गए |
विकट परिस्तिथियों बाले युद्ध के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थो व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी |
उधर अकबर ने चित्तोड़ की सामरिक महत्व की जानकारिया इक्कठा कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तोड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेर लिया और दुर्ग के पहाड़ में निचे सुरंगे खोदी जाने लगी ताकि उनमे बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सकें,दोनों और से भयंकर गोलाबारी शुरू हुई तोपों की मार और सुरंगे फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को जयमल रात्रि के समय फ़िर मरम्मत करा ठीक करा देते |
अनेक महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नही निकला | चित्तोड़ के रक्षकों ने मुग़ल सेना के इतने सैनिकों और सुरंगे खोदने वालो मजदूरों को मारा कि लाशों के अम्बार लग गए | बादशाह ने किले के निचे सुरंगे खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक-एक मिट्टी की टोकरी के बदले एक-एक स्वर्ण मुद्राए दी ताकि कार्य चालू रहे | अबुलफजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के सामान हो गई थी |
अकबर और उसकी मुगल सैना जयमल के पराकर्म से भयभीत व आशंकित भी थे सो उसने राजा टोडरमल के जरिय जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तोड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो,चित्तोड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो मै तुम्हे तुम्हारा पैत्रिक राज्य मेड़ता और बहुत सारा प्रदेश भेंट कर दूंगा | किन्तु  जयमल ने अकबर का प्रस्ताव साफ ठुकरा दिया कि मै राणा और चित्तोड़ के साथ विश्वासघात नही कर सकता और मेरे जीवित रहते आप किले में प्रवेश नही कर सकते |
जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो कवित रूप में इस तरह प्रचलित है

है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण |
कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण ||
जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह |
आण फिरै गढ़ उपरा पडियो धड पातशाह|| 
 
एक रात्रि को अकबर ने देखा कि किले कि दीवार पर हाथ में मशाल लिए जिरह वस्त्र पहने एक सामंत दीवार मरम्मत का कार्य देख रहा है और अकबर ने अपनी संग्राम नामक बन्दूक से गोली दाग दी जो उस सामंत के पैर में लगी वो सामंत कोई और नही ख़ुद जयमल मेडतिया ही थे |
थोडी ही देर में किले से अग्नि कि ज्वालाये दिखने लगी ये ज्वालाये जौहर की थी | जयमल की जांघ में गोली लगने से उसका चलना दूभर हो गया था उसके घायल होने से किले में हा हा कार मच गया अतः साथी सरदारों के सुझाव पर जौहर और शाका का निर्णय लिया गया ,जौहर संपन्न होने के बाद सभी वीरो ने  जोहर कुण्ड की भस्म को भाल पर लगा भयंकर सिंहनाद करते हुए युद्ध के लिए निकल पड़े .....किन्तु इसी सैना में एक योद्धा दूसरे योद्धा के कन्धे पे सवार चतुर्भुज रूप धारण किये हुए सैना नायक के रूप में प्रकट हुआ ।
ये विकट रूप चार हाथ अश्त्र शस्त्रो से सुसज्जित कोई और  घायल जयमल मेडिया व कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर चल पड़ा रणचंडी का आव्हान करने |
दोनों सेनाओ में घमासान होने लगा चारभुजा धारी योद्धाओ के शौर्य से मुगल सैना ऐसे कटती जा रहे जेसे किसान फसलो को काट रहा हो ।चाचा भतीजे का अद्भुत रोद्रकारी रूप मुगल मुंडो के लिए रणचण्डी बना हुआ ओहदे दर ओहदे खाली कर रहा था । और ऐसा प्रतीत होता था की दुश्मनो के काल बने विष्णु देव स्वम अवतरित हो उठे हो ।
जयमल ,कल्ला के दोनों हाथो की तलवारों बिजली के सामान चमकते हुए शत्रुओं का संहार कर रही थी ,रक्त की नदिया वह निकली नर मुंड के ढेर लग गए अकबर और उसकी सैना भाग खड़ी हुई ।
इस अति विषमय कारी युद्ध और  उसके शौर्य को देख कर अकबर भी आश्चर्यचकित था |
इस प्रकार यह वीर चित्तोड़ की रक्षा करते हुए दुर्ग की हनुमान पोल व भैरव पोल के बीच लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुवा और सदा सदा केवलिये भारतीय इतिहास में "जय चारभुजाधारी "के जय घोष के नाम से आज भी अमर हुआ जहाँ उनकी याद में स्मारक बना हुआ है | 

हिंदू,मुस्लमान,अंग्रेज,फ्रांसिस,जर्मन,पुर्तगाली आदि अनेक इतिहासकारों ने जयमल के अनुपम शौर्य का वर्णन किया है।
                     "जय चारभुजा की"
                    

★चतुर्भुज क्षत्रिय योद्धा★

      ===चम्बल एक सिंह अबलोकन =
                   ● सौर्य गाथा●
     ★चार भुजाधारी ऐतिहासिक युद्ध ★
चित्तोड़ की धरती पर स्वाभिमान,मर्यादा और धर्म रक्षा हेतु यु सेकड़ो युद्ध हुए दशको जय पराजय के    साथ सत्ता परिवर्तन लाखो योद्धाओ को वीरगति प्राप्त हुई .....हल्दीघाटी की पिलिमिट्टी गेरुए रंग में रंग गयी किन्तु एक अविस्मरणीय युद्ध ऐसा भी हुआ जिसमे अखिल विश्व पालन कर्ता भगवान श्री हरी का चार भुजा धारी रूप सदृश हुआ हो और उस दुस्ट दमनकारी रूप धरने बाले थे दो विकट योद्धा एक जयमल मेड़तिया तो दूजे कल्ला राठौर जी । तो आइये जाने की इस #चारभुजाधारी युद्ध के नाम सनातन गौरव गाथा को ।
राव जयमल का जन्म आश्विन शुक्ला ११ वि.स.१५६४,ईस्वी सन्१७ सितम्बर १५०७ शुक्रवार के दिन हुआ था ।बाल्य् काल से ही मेड़ता रियासत पर पड़ोसी रियासत द्वारा होते आक्रमणों में समय समय पर युद्ध करते युवावस्था तक करीव२२युद्ध लड़ चुके मेड़तिया सिरदार जयमल एक असाधारण योद्धा बन चुके थे ।
कुछ समय बाद उन्हें चित्तोड़ की रक्षा का अहम जिम्मा सौंप चित्तोड़ नरेश अपनी रक्षा व्यवस्था को और सुदृण कर देते कि उसी समय कई बार का परास्त दुस्ट मुगल आक्रांता अकबर द्वारा चित्तोड़ पर चढाई कर देता हे ।
आक्रमण का समाचार सुन जयमल चित्तोड़ पहुँच जाते हे | २६ अक्टूबर १५६७ को अकबर चित्तोड़ के पास नगरी नामक गांव पहुँच गया | जिसकी सूचना महाराणा उदय सिंह को मिल चुकी थी और युद्ध परिषद् की राय के बाद चित्तोड़ के महाराणा उदय सिंह ने वीर जयमल को ८००० सैनिकों के साथ चित्तोड़ दुर्ग की रक्षा का जिम्मा दे स्वयम दक्षिणी पहाडों में चले गए |
विकट परिस्तिथियों बाले युद्ध के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थो व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी |
उधर अकबर ने चित्तोड़ की सामरिक महत्व की जानकारिया इक्कठा कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तोड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेर लिया और दुर्ग के पहाड़ में निचे सुरंगे खोदी जाने लगी ताकि उनमे बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सकें,दोनों और से भयंकर गोलाबारी शुरू हुई तोपों की मार और सुरंगे फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को जयमल रात्रि के समय फ़िर मरम्मत करा ठीक करा देते |
अनेक महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नही निकला | चित्तोड़ के रक्षकों ने मुग़ल सेना के इतने सैनिकों और सुरंगे खोदने वालो मजदूरों को मारा कि लाशों के अम्बार लग गए | बादशाह ने किले के निचे सुरंगे खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक-एक मिट्टी की टोकरी के बदले एक-एक स्वर्ण मुद्राए दी ताकि कार्य चालू रहे | अबुलफजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के सामान हो गई थी |
अकबर और उसकी मुगल सैना जयमल के पराकर्म से भयभीत व आशंकित भी थे सो उसने राजा टोडरमल के जरिय जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तोड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो,चित्तोड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो मै तुम्हे तुम्हारा पैत्रिक राज्य मेड़ता और बहुत सारा प्रदेश भेंट कर दूंगा | किन्तु  जयमल ने अकबर का प्रस्ताव साफ ठुकरा दिया कि मै राणा और चित्तोड़ के साथ विश्वासघात नही कर सकता और मेरे जीवित रहते आप किले में प्रवेश नही कर सकते |
जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो कवित रूप में इस तरह प्रचलित है

है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण |
कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण ||
जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह |
आण फिरै गढ़ उपरा पडियो धड पातशाह|| 
 
एक रात्रि को अकबर ने देखा कि किले कि दीवार पर हाथ में मशाल लिए जिरह वस्त्र पहने एक सामंत दीवार मरम्मत का कार्य देख रहा है और अकबर ने अपनी संग्राम नामक बन्दूक से गोली दाग दी जो उस सामंत के पैर में लगी वो सामंत कोई और नही ख़ुद जयमल मेडतिया ही थे |
थोडी ही देर में किले से अग्नि कि ज्वालाये दिखने लगी ये ज्वालाये जौहर की थी | जयमल की जांघ में गोली लगने से उसका चलना दूभर हो गया था उसके घायल होने से किले में हा हा कार मच गया अतः साथी सरदारों के सुझाव पर जौहर और शाका का निर्णय लिया गया ,जौहर संपन्न होने के बाद सभी वीरो ने  जोहर कुण्ड की भस्म को भाल पर लगा भयंकर सिंहनाद करते हुए युद्ध के लिए निकल पड़े .....किन्तु इसी सैना में एक योद्धा दूसरे योद्धा के कन्धे पे सवार चतुर्भुज रूप धारण किये हुए सैना नायक के रूप में प्रकट हुआ ।
ये विकट रूप चार हाथ अश्त्र शस्त्रो से सुसज्जित कोई और  घायल जयमल मेडिया व कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर चल पड़ा रणचंडी का आव्हान करने |
दोनों सेनाओ में घमासान होने लगा चारभुजा धारी योद्धाओ के शौर्य से मुगल सैना ऐसे कटती जा रहे जेसे किसान फसलो को काट रहा हो ।चाचा भतीजे का अद्भुत रोद्रकारी रूप मुगल मुंडो के लिए रणचण्डी बना हुआ ओहदे दर ओहदे खाली कर रहा था । और ऐसा प्रतीत होता था की दुश्मनो के काल बने विष्णु देव स्वम अवतरित हो उठे हो ।
जयमल ,कल्ला के दोनों हाथो की तलवारों बिजली के सामान चमकते हुए शत्रुओं का संहार कर रही थी ,रक्त की नदिया वह निकली नर मुंड के ढेर लग गए अकबर और उसकी सैना भाग खड़ी हुई ।
इस अति विषमय कारी युद्ध और  उसके शौर्य को देख कर अकबर भी आश्चर्यचकित था |
इस प्रकार यह वीर चित्तोड़ की रक्षा करते हुए दुर्ग की हनुमान पोल व भैरव पोल के बीच लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुवा और सदा सदा केवलिये भारतीय इतिहास में "जय चारभुजाधारी "के जय घोष के नाम से आज भी अमर हुआ जहाँ उनकी याद में स्मारक बना हुआ है | 

हिंदू,मुस्लमान,अंग्रेज,फ्रांसिस,जर्मन,पुर्तगाली आदि अनेक इतिहासकारों ने जयमल के अनुपम शौर्य का वर्णन किया है।
                     "जय चारभुजा की"
                    

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

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