शुक्रवार, 13 जून 2025

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम। 
जो शहीद हुये है उनकी......
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर्णायक युद्ध में अवध की सेना का नेतृत्व करते हुये 600 से अधिक रणबांकुरो के साथ, मात्र 18 बर्ष की आयु मे रक्त की अंतिम बूंद तक संघर्ष करते हुये वलिदान चहलारी नरेश राजा बलभद्र सिंह के बलिदान दिवस पर (10 जून 1840  - 13 जून 1858  ) उनके मां भारती के अखंड अनुराग और महत्वपूर्ण योगदान का पुण्यस्मरण कर शत-शत वीरोचित नमन।
सर कटने के बाद भी अंग्रेजों से लड़ता वाले,अल्पज्ञात मां भारती के अमर सपूत के बारअतुल अवस्थी जी द्वारा वर्णित जानकारी के आधार पर चर्चा करते है।
भारत मां को दासता की बेंड़ियों से मुक्त कराने के लिए हुए महासमर के सैकड़ों ऐसे कई योद्धा हैं, जिन्होंने अपने शौर्य, पराक्रम, देशभक्ति और बलिदान से स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष को ऊर्जा दी और भावी पीढ़ियों के लिए आदर्श बन गये। लेकिन अवध में अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ संघर्ष में विद्रोहियों का नेतृत्व कर रहे चहलारी रियासत के राजा बलभद्र सिंह ऐसे वीर आजादी के दीवाने थे, जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए। कहा जाता है वह सर कटने के बाद भी अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

स्वतंत्रता आंदोलन में राजा बलभद्र सिंह और उनकी चहलारी रियासत का प्रमुख स्थान है। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ युद्ध में बलभद्र सिंह के अदम्य साहस की अंग्रेज सेनानापति ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की और ब्रिटेन की महारानी ने अपने महल में उनका चित्र लगवाया। इसी से वे अवध ही नहीं पूरे देश में अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ लड़ाई के नायक बन गये थे। उनके त्याग और बलिदान की गौरव गाथा आज भी अवध के मन मस्तिष्क में गौरव को संरक्षित किए हुए है।

स्वतंत्रता संग्राम के तराई के हीरो राजा बलभद्र सिंह का जन्म 10 जून सन 1840 को बहराइच के चहलारी राज्य (अब बहराइच ज़िले के महसी तहसील क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा श्रीपाल सिंह और मां का नाम महारानी पंचरतन देवी था। चहलारी रियासत पर कश्मीर से आए रैकवार राजपूतों का शासन होता था। राजा श्रीपाल साधु प्रवृत्ति के थे और अल्पायु में ही कुंवर बलभद्र का राज्याभिषेक कर राज्य कार्य से विरत हो जाना चाहते थे। लेकिन बलभद्र उन्हें समझा-बुझाकर उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते थे। अंततः बलभद्र सिंह किशोरावस्था में ही चहलारी के राजा बने। बाल्यकाल से ही निडर और पराक्रमी बलभद्र सिंह युद्ध कौशल में भी महारथी थे। उदारता और संवेदनशीलता के कारण ही राज्य की जनता पूरी तरह से शोषण मुक्त होकर सुख शांति से जीवन यापन कर रही थी। सेना में प्रत्येक जाति धर्म के बहादुर युवकों को भर्ती किया गया, जिसका नेतृत्व अमीर खां कर रहे थे। भिखारी रैदास जैसे बहादुर योद्धा भी सेना में ओहदेदार थे।

इतिहास के पन्ने पलटे तो पता चलता है कि सन 1450 में बालदेव रामनगर रियासत के राजा हुए तो उन्होंने अपने भाई शालदेव को घाघरा नदी के उस पार बौंडी (बहराइच) रियासत का राजा बना दिया। शालदेव के बाद उनके पुत्र लखन देव और पौत्र धर्मदेव व प्रपौत्र हरिहर देव ने बौंडी पर राज किया। प्रतापी राजा हरिहर देव और कश्मीर में रैकवारों किए गए वीरतापूर्ण कार्य से प्रसन्न होकर तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर ने हरिहर देव बहराइच जिले के बहुत बड़े भूभाग को सौगात के रुप में दे दिया। यही नहीं परम प्रतापी हरिहर देव को बांसी जैसे अजेय राज्य पर विजय प्राप्त करने के लिए बादशाह जहांगीर ने पुरस्कार नौ परगनों का राज्य प्रदान किया। हरिहर देव के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र जितदेव राजा हुए तो कनिष्ठ पुत्र संग्राम सिंह के लिए हरिहर पुर के नाम से अलग रियासत की स्थापना की गई। जितदेव के ज्येष्ठ पुत्र परशुराम सिंह को बौंडी और दूसरे पुत्र गजपति सिंह को नई रियासत रेहुआ का शासन मिला। इन्हीं गजपति सिंह के पुत्र मानसिंह के छोटे पुत्र धर्मधीर सिंह ने 1630 ई. में चहलारी रियासत की स्थापना की। धर्मधीर के पुत्र हिम्मत सिंह के बड़े पुत्र मदन सिंह को बौंडी की रानी द्वारा गोद लेने के कारण छोटे पुत्र देवी सिंह राजा बने। उनके बाद पुत्र उदित सिंह, पौत्र पृथ्वी सिंह, प्रपौत्र रणजीत सिंह तथा बरियार सिंह ने राज्य का प्रबंध संभाला। बरियार के पुत्र पृथ्वीपाल सिंह के बाद श्रीपाल चहलारी के राजा हुए। राजा श्रीपाल के ज्येष्ठ पुत्र बलभद्र सिंह राजा हुए और 13 जून को अंग्रेज सेना से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए और चहलारी राज्य ईस्ट इण्डिया कम्पनी में मिला लिया गया।

रैकवार क्षत्रियों के शासनाधीन चहलारी रियासत घाघरा नदी के दोनों ओर दूर तक फैला था। इसके पास वर्तमान सीतापुर और बहराइच जिले का विस्तृत भूभाग था। चहलारी राज्य में तब सीतापुर के 87 और बहराइच के 33 गांव शामिल थे। क्षेत्र में घाघरा नदी के तटवर्ती इलाके में स्थित गोलोक कोंडर गोचरण क्षेत्र में पांच हजार साल पहले राजा विराट की गायों का निवास रहा। यहां की भव्य गढ़ी भवन के पास ही मनमोहक सुगंध बिखेरने वाला केंवड़े का वन था। इसी वन में राजा रणजीत सिंह द्वारा बनाए गए ठाकुरद्वारा में भगवान राम, माता जानकी और हनुमान समेत कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित कराई गईं थीं। आज भी विजय दशमी व अन्य त्यौहारों पर यहां उत्सव मनाया जाता है।

बौंडी में अंग्रेजों के खिलाफ की थी मंत्रणा

10 मई 1857 को मेरठ में स्वतंत्रता आंदोलन की ज्वाला प्रकट होने पर जहां अंग्रेजों ने भारी दमन चक्र प्रारंभ किया वहीं सम्पूर्ण उत्तर भारत में स्वातन्त्र्य चेतना जाग्रत हुई। इस मुक्ति संग्राम को प्रारम्भिक दौर में आंशिक सफलता मिली। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अवध में बहराइच को मुख्यालय बनाकर विंग फील्ड कमिश्नर और कैप्टन बनबरी को डिप्टी कमिश्नर नियुक्त किया था। इन दोनों ने सत्ता संभालते ही दमन चक्र चलाना शुरू कर दिया। तब अंग्रेजी शासन के खिलाफ बहराइच में बिगुल फूंका गया। इस महाक्रान्ति की अंतिम लड़ाइयां अवध की बेगम हजरत महल के नेतृत्व में लड़ी र्गइं। गजेटियर के अनुसार लखनऊ पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उनकी बेगम हजरत महल ने अपने शहजादे बिरजिस कद्र और मम्मू खां जैसे कुछ विश्वास पात्र सैनिकों के साथ लखनऊ से भागकर बहराइच में बौड़ी नरेश हरदत्त सिंह के किले में शरण ली। वहां उन्होंने 40 दिन बिताए और उसी को संघर्ष की रणनीति का केन्द्र बनाया। अवध की राजधानी लखनऊ को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने वहां अपने विश्वासपात्र राजाओं, जमींदारों तथा स्वाधीनता सेनानियांे की बैठक बुलाकर सबको इस महासंग्राम में कूदने का आह्नान किया। बौंड़ी के किले में हुई बैठक में राजा हरिदत्त सिंह के साथ गोंडा नरेश राजा देवी बख्श सिंह, भिठौली (सीतापुर) के गुरु बख्श सिंह, रायबरेली के राणा बेनी माधव सिंह, रुइया (हरदोई) के राजा नरपति सिंह, फैजाबाद के विद्रोही मौलवी अहमद उल्ला, इकौना के राजा उदित प्रकाश सिंह, चरदा के राजा जगजोत सिंह, रेहुआ के राजा रघुनाथ सिंह, शाहगंज के राज मान सिंह, ईसानगर के राजा जांगड़ा, कमियार गोंडा के तालुकेदार शेर बहादुर सिंह और फीरोजशाह बेरुआ के गुलाब सिंह मौजूद रहे। भयारा (बाराबंकी) के जागीरदार यासीन अली किदवई के अलावा भिनगा, राम नगर, और पयागपुर के राजाओं ने भी बैठक में लिए गए निर्णय का स्वागत किया। सभी की उपस्थिति में मात्र 18 साल के आयु में पराक्रमी योद्धा चहलारी नरेश बलभद्र सिंह ने सेना के नेतृत्व का जिम्मा उठाया तो बेगम हजरत महल समेत सभी क़ी आंखें नम हो गईं। बेगम ने अंगूठा चीरकर अपने रक्त से तिलक लगाया और 100 गांवों की जागीर देने की घोषणा करते हुए रानी कल्याणी देवी को उपहार स्वरुप अपना दिव्य हार प्रदान किया। मात्र कुछ दिन पहले ही बलभद्र और कल्याणी का विवाह की जानकारी मिली तो बेगम के आंखों में वात्सल्य के आंसू छलक आए।

बाराबंकी ओबरी में हुआ अंतिम महासमर

जब बलभद्र सिंह सेना के साथ प्रस्थान करने लगे तो उनकी पत्नी रानी कल्याणी ने उनके माथे पर रोली-अक्षत का टीका लगाया और अपने हाथ से कमर में तलवार और कलाई में रक्षासूत्र बांध कर विदा किया। राजमाता ने भी बेटे को आशीर्वाद देकर अन्तिम सांस तक अपने वंश और देश की मर्यादा की रक्षा करने को कहा। तयशुदा कार्यक्रम के तहत अंग्रेजी सेना से युद्ध के लिए निकली बेगम हजरत महल और दर्जनों देशभक्त राजाओं समेत 20 हजार सैनिकों की भारी भरकम सेना का पहला पड़ाव बहराइच घाघरा के उस पार भयारा (बाराबंकी) में यासीन अली किदवई के गांव में हुआ। अगले दिन सेना नावाबगंज के जमुरिया नाले को पारकर रेठ नदी के पूरब ओबरी गांव के मैदान में युद्ध के लिए पहुंची। सेनापति जनरल होप ग्राण्ट के नेतृत्व में सुसज्जित अंग्रेजी सेना में मेजर हडसन, कर्नल डैली, विलियम रसेल, कालिन कैम्पवेल, हार्षफील्ड जैसे दक्ष सेना नायकों और सिख सेना के साथ नेपाल के जंग बहादुर राणा समेत उनके बड़ी संख्या में गोरखा सैनिक भी थे। अंग्रेज सेना में 10 हजार घुड़सवार, 15 हजार पैदल सेना के साथ भारी संख्या में इनफील्ड गनें और तोपखाना भी था। जबकि क्रान्तिकारी सेना के पास पुरानी तोपें और घिसे पिटे हथियार थे। मातृभूमि के इस महासमर में सर्वस्व न्यौछावर का जज्बा ही उनका मुख्य संबल था। 12 जून 1858 को युद्ध प्रारम्भ हुआ और 16 हजार सैनिकों के साथ बलभद्र सिंह ने फिरंगी सेना पर हमला कर दिया। अवध के जांबाज फुर्तीले सैनिकों और बलभद्र सिंह ने देखते ही देखते युद्ध के मैदान में लाशों का अंबार लगा दिया तो अंग्रेज सैनिकों में भगदड़ मच गई और सेनापति होप भाग गया।

सिर धड़ से अलग हुआ फिर भी शीश काटती रही तलवारें
पराजय से आहत होप ने बड़ी संख्या में तोपें और रायफलें मंगाई और 13 जून को पुनः युद्ध के लिए आ डटा। अंग्रेजी सेना के जबरदस्त तैयारियों को देखकर बेगम चिंतित हुईं और उन्होंने बलभद्र की कम उम्र को देखते हुए हुए उन्हें एक दिन विश्राम करने की सलाह देते हुए स्वयं नेतृत्व की इच्छा जताई। उन्होंने स्वयं को उनकी मां बताते हुए नववधू रानी के भविष्य का वास्ता दिया तो वीर बलभद्र ने 'युद्ध में सेनापति का आदेश चलता है मां का नहीं' कहकर उन्हें निरुत्तर कर दिया। तब विवश होकर बेगम ने सुरक्षा कवच पहनाकर आर्शीवाद देकर विदा किया। सेना को तीन भागों में बंाटकर 'खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का और हुक्म सेनापति बलभद्र सिंह का' नारे के साथ सेना फिरंगियों पर टूट पड़ी। बलभद्र सिंह चीते की भांति फिरंगी सैनिकों को काट रहे थे। युद्ध क्षेत्र में लाशों का अंबार लग गया। लेकिन बलभद्र के काका वीर योद्धा हीरा सिंह मारे गए। राजा देवी बख्श सिंह की मार से कैम्पवेल, बलभद्र की तलवार से घायल हडसन और राना बेनी माधव के वार से रसेल का घोड़ा मरा तो रसेल भाग खड़ा हुआ। अंततः बलभद्र और सेनापति होपग्राण्ट आमने सामने आ गए। बलभद्र के वार से होपग्राण्ट का युनियन जैक कटकर गिर गया और वह बेहोश हो गया, किन्तु तभी तोप के गोले ने उनके हाथी को धराशायी कर दिया। महावत सुभान खां ने बच निकलने की सलाह दी तो बलभद्र ने फटकार लगाई और घोड़े पर बैठकर नरसंहार शुरु कर दिया। लेकिन भाग्य ने फिर धोखा दिया और गोला लगने से उनका घोड़ा भी चल बसा। तब बलभद्र पैदल ही दोनों हाथों में तलवार लेकर अंग्रेज सैनिकों का संहार करने लगे। इसी बीच होपग्राण्ट ने घोखे से पीछे से वार किया और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। कहा जाता है कि सिर कट जाने के बाद भी उनका शरीर आठ घंटे तक लड़ता रहा, दोनों हाथों की तलवारें लगातार वार कर रहीं थीं। इस दृश्य को देखकर होपग्राण्ट के भी होश उड़ गए। चहलारी नरेश का यह रूप देख 800 क्रान्तिकारी सैनिक अंतिम सांस तक लड़े और मातृभूमिकी बलिबेदी पर न्यौछावर हो गए। इस युद्ध में चहलारी के प्रत्येक परिवार का लाल वीरगति को प्राप्त हुआ।
अंग्रेज सेनापति ने की प्रशंसा, बकिंघम पैलेस में लगा चित्र
ओबरी युद्ध के अप्रतिम योद्धा बलभद्र के साहस और शौर्य की प्रशांसा करते हुए अंग्रेज सेनापति जनरल होपग्राण्ट ने 'दि सिपाय वार इन इंडिया' शीर्षक से अपनी डायरी में लिखा कि 'मैंने तमाम युद्ध और वीर योद्धाओं को देखा लेकिन बलभद्र सिंह जैसा शानदार सैनिक, जांबाज योद्धा और अनूठा सेनापति नहीं देखा। इस लम्बे चौड़े और निर्भीक योद्धा को मृत्यु का भय भी नहीं झुका सका।' ओबरी के युद्ध में नायक रहे राजा बलभद्र सिंह के करिश्माई वीरता का समाचार लंदन टाइम्स और न्यूयार्क टाइम्स में छपा तो वे दुनिया भर में चर्चित हुए। विद्वान लेखक परमेश्वर सिंह ने अपनी पुस्तक राजपूत में लिखा है कि इसी वीरता से प्रभावित होकर महारानी विक्टोरिया ने चहलारी नरेश बलभद्र सिंह का भव्य और दिव्य चित्र अपने राज महल बकिंघम पैलेस में सम्मान के साथ लगवाया। भारत के इतिहास में बलभद्र सिंह की कालजयी गौरवा गाथा स्वर्णाक्षरों में सदैव अंकित रहेगी। एक कवि ने ठीक ही कहा है-'कालचक्र के मस्तक पर जो पौरुष की गाथा लिखते, उनकी मृत्यु कभी न होती वे केवल मरते दिखते।'

ऐसे हुआ चहलारी रियासत का अंत

ओबरी के महासमर में राजा बलभद्र के वीरगति प्राप्त होते ही का्रन्तिकारी भागने पर विवश हुए और अंग्रेजों की विजय हुई। बेगम हजरत महल उनके पुत्र बिरजिस, राजा सवाई हरिदत्त सिंह, गोंडा नरेश राजा देवी बख्श सिंह, रायबरेली के राणा बेनी माधव सिंह समेत तमाम क्रातिन्कारी नेपाल के दुर्गम पहाड़ियों में स्थित दांग-देवखर चले गए। पूरे अवध पर कब्जा करके अंग्रेजों ने बौंड़ी का किला ध्वस्त करा दिया और चहलारी राज्य को चार भागों में विभाजित कर 52 गांव का जंग बहादुर राणा, 08 गांव थानगांव के भया, तीसरा भाग में 2200 बीघा मुनुवा शिवदान सिंह और शेष चौथा भाग पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के वंशजों को दे दिया। राज बलभद्र सिंह की महारानी कल्याणी देवी ने अंग्रेजों का अनुग्रह अथवा सहायता स्वीकार नहीं था इसलिए वे अपने मायके चली गईं। उनके भाई छत्रपाल भी घाघरा पार करके सुरक्षित स्थान मुरौवा डीह चले गए। चहलारी राज्य के निकट सम्बन्धी मुनुवा शिवदान सिंह ने उनका पालन पोषण किया। वैसे चहलारी के कई बार बसाने का प्रयास किया गया लेकिन हर बार घाघरा ने आबाद हिस्से को नदी में समाहित कर लिया।

अवध की ऐतिहासिक धरोहरों में चहलारी रियासत का नाम सबसे पहले आता है। हालांकि बाराबंकी जिला मुख्यालय पर कांग्रेस कार्यालय परिसर में चहलारी नरेश बलभद्र सिंह की प्रतिमा स्थापित है किन्तु युद्ध के मैदान में जहां उन्हें वीरगति मिली थी वहां घने जंगलों के बीच उनकी मिट्टी की समाधि 162 साल से अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। समाधि तक पहुंचने के लिए कोई मार्ग तक नहीं है। ऐसे में आजादी के नायकों को समर्पित यह कविता 'शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा' भी बेमानी साबित हो रही है। इसी प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह होने के बावजूद महसी में घाघरा नदी के तट पर स्थित बौंडी किला पूरी तरह उपेक्षित है। किले के समीप से ही घाघरा नदी बह रही है। किले के अवशेष भी नदी में समा कर विलुप्त हो रहे हैं। लेकिन सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया। चहलारी नरेश के खानदान के आदित्यभान का कहना है कि उन्होंने किले की सुरक्षा व संरक्षा के लिए कई बार शासन व प्रशासन को पत्र लिखा। राजा बलभद्र सिंह की तलवार अभी भी सुरक्षित है। उसे लखनऊ स्थित म्यूजियम को सौंपने का प्रयास किया गया। लेकिन पुरातत्व विभाग की उपेक्षा से यह भी संभव नहीं हो सका। 
सादर

शुक्रवार, 17 मई 2024

अखातीज

अखातीज (अक्षय तृतीया)

अखातीज निकले अभी सप्ताह भी नही हुआ है,यह लोक  -उस लोक के उस पावन पर्व को लगभग बिसरा ही चुका है। अब मिट्टी के चार ढलो के ऊपर,मिट्टी का कलश स्थापित करके बरखा होने के पूर्व अनुमान की शकुन अथवा युक्ति ज्ञात ही किस स्त्री को है?

अब इस लोक की संस्कृति सनै-सनै संस्कारी मातृशक्ति के अभाव में संक्षारित जो हो रही है।अब कनिक की खीखडी मूँझ की सींक में पिरोकर रखना पसंद ही कौन करता है ?
अब न वृषभों की जोड़ियां रही हैं और ना ही हरायतो के लिये पाग बांधते किसान!हल-जुअट,बखर-पटेला जैसे किबदन्ति सी प्रतीत होते हैं।बस बचा है वृद्धा होती माताओं के द्वारा एक अमिट संस्कृति को कुछ और साँसे देकर,मंगलगान करके अपनी दिवंगत माँ-सासुमाँ के सिखाये हुये गीतों में पल्लवित भारत की यशोगाथा को स्मरण करना !

पुनः तीज आई थी...भुरारे से माँओ के पल्लू सिरपर क्या आधे माथे तक थे।घी में कनक भुनाती माँ पुनः भगवान बलराम व माँ कात्यायनी को गुनगुनाकर प्रसन्नचित थी। पुत्रबधुओं को अपनी सास के किस्से से मनोरंजित करती...ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे..महीनों से शुष्क पड़ी पीली माटी में बरखा की चंद बूंदों ने सम्पूर्ण आभामण्डल को पल्लवित कर दिया हो ।
एक कोने में संजोकर रखे हल को अर्घ देकर,गुलगुले उसकी फाल में पिरोकर पुनः धन्य-धान्य भण्डार अक्षत रहने की कामना की गई।
माँ बताती हैं कि प्रातःकाल किसी भी स्त्री का खुला सिर व पुरुष का सूर्योदय उपरांत जागते देखना भारी अपशकुन होता है!अब तो हर स्त्री के सिर पर पल्लू क्या बेटी के कांधे से दुपट्टा तक उड़ गया है !!
सत्यता में भोली माँ को पता ही नही कि उनका सतयुगी समय निकलकर कलियुगी समय कुण्डली बनाके सबके सिर पर बिराजमान हो चुका है ।

टिटहरी ने अबकी उच्च स्थान पर अपने अन्डजो को जना है,अबकी बरखा भरपूर होने का यह पूर्वानुमान जो है। ऐसी मान्यता है कि टिटहरी को वरदान मिला था।जहां वह अण्डे जनेगी वह स्थान बरखाजल भराव से दूर रहेगी। टिटहरी के चार अण्डे देख हर कृषक प्रसन्नता से आषाडी 'हरायतो' की प्रतीक्षा कर रहा है। यह किसानी भी आश्चर्य चकिताओं से परिपूर्ण कर्म है। उसी टिटहरी के चार अण्डज देख प्रसन्न हो रहा है,जिसके गांव में बोलने पर बिन थूके-अपशकुन मिटाये नही रहता !
इन सबसे दूर टिटहरी अपनी कल्पनाओं में लम्बी-लम्बी टांगे ऊपर करके चित्त लेटकर गगन (आसमान)को गिरने से रोकने को किसी ऊसड धरा पर सोयी होगी।(जैसी कि लोक क़िबदन्ती है)

और!!

इधर भीषण ग्रीष्म की तप्तता में पुनः कोई स्वाभाविक आद्र हो उठा होगा !!!
पुनः बरखा आएगी,पुरवाई चलेगी और जितने भी घाव लगे हैं.. पुनः रिसकर कसक उठेंगे ...!!!!!

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जितेन्द्र सिंह तौमर '५२से'
  चम्बल मुरैना मप्र.

रविवार, 24 मार्च 2024

पूर्वाभास

#नेह..

जब नेह पर अशेष भावनाओं का सम्मान व समान एकीकार स्वरूप 'स' का अर्द्धभाग संयुक्त होता है।वहाँ ठाठे मारते सागर की तरह,विकार रहित 'स्नेह' प्राप्त होता है।असीम सम्भावनाओ और अद्वैत भावनाओं का ऐसा मंथन जिसमे कुछ प्राप्त करने के भाव से अधिक कुछ खोने की परिकल्पना अधिक प्रभावी होती है। जहां कुछ प्राप्त करने भाव जागृत हुआ वह लक्ष्य अधिक प्रतीत होता है,प्रेम का अर्द्धनकार युक्त-संयुक्त भाव ही कुछ खोने का स्वरूप है ।

स्नेह जब भाषाई सभ्यता में परिवर्तित होकर उर्दू से होकर  गुजरती है ,तब यह मीठी जुवां की गजल बनकर बह उठती है।गजल उम्दा लफ्जों व खूबसूरत अहसांसो वह दरिया है जो यकायक अहसांसो में नफासत के साथ साँसों का हमसफ़र बनकर लरज उठती है ।

जैसे किसी ने श्वसन के वेग को फेंफड़ों में खीचकर रोक लिया हो और श्वसनतंत्र दृश्यनुभूत भाग एकाएक अधिक आकर्षक हो उठा हो!
जैसे किसी ने, सप्तस्वर ऊँचाई से गिरते जलप्रपात के जल को अधर में दिव्यता से अस्थिर को स्थिरता में परिणीत कर दिया हो!
जैसे किसी ने,उन्मुक्त गगन में विहार करते पखेरूओं कि गति को सम्मोहित करके कलरव के साथ कुंडली की तरह गौलाकर कर दिया हो!

प्रेम में प्रायः एक विचित्र और विलक्षण अनुभति-अनुभूत करने का अनुभव हुआ है।
'शून्य में एकटक अशेष प्राप्तता के साथ अप्रत्यक्ष का प्रत्यक्ष हो उठना।'
सम्मोहन का इतना विलक्षण प्रभाव होता है कि सामने कब-कौन-क्या हो गया अनुभूत ही नही होता। खुले नयनों जागृत अवस्था मे स्वप्न की सुंदरता तलाशना ही प्यार है ।

इश्क में सीमायें,बन्धन,स्तर इत्यादि अपना परिमाप खो बैठते हैं।इसकी अनुभूति जितनी सुखद व लालायित करने बाली है,वहीं इसकी अभिव्यक्ति उतनी ही दुस्कर है ।इश्क करिये..जीवन का अद्भुत अनुभव है किंतु इसको प्राप्तता या लक्ष्य बना लेना इसकी क्षीणता है ।

प्रस्तुत पंक्तियों में 'सायरा जंहा' के सैरों में लफ्जों के साथ चेहरे पर आते अहसासों को लफ्जो के दरमियाँ महसूस करिये ,इश्क की खूबसूरती में 'चार चांद लगना' शायद इसी को कहते होंगे!!
         ❤️
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सोचा था ए साहिबान मुहब्बत के दौर से निकल जाएंगे,
फिर से दोहरा के मुहब्बत को फिर न कभी आजमाएंगे!

अहसासों का दरिया दहक उठा यादों के शोले पाकर,
 इश्क हमशक्ली के चेहरों से नकाब सभी उतर पाएंगे !!

इश्क असफल रस्सी में पड़े बल जैसे तबस्सुम शाम,
शायद जलकर भी  बलरस्सी बनकर बिखर जाएंगे!!

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JVS.

मंगलवार, 12 मार्च 2024

कुछ नही बस यूं ही


    
लड़का बीती को बिसार जीवन के नये लक्ष्य को लेकर आगे के धागे बुनने में मस्त हो गया,पर उसके अंग-अंग में बस चुकी जीवन शैली को बिसारने में उतना ही असफल भी हो गया था।अब वह बीती बात में लिए कठिन परिश्रम के साध्य प्रशिक्षण को इतनी शीघ्रता में भूल भी कैसे सकता था भला??
वह सर्वोत्तम प्रशिक्षु था, कम बोलना अधिक सुनना और अच्छे काले घने बाल होते हुए भी छोटे-छोटे बाल रखना जेसे उसे सबसे प्रिय था ।

वह अपने घर का छोटा किन्तु सबसे बड़ा शैतान हुआ करता था...उससे कोई नही बचता था कि जिसे वह तंग न करता हो!किन्तु जिस तरह मरखा से मरखा बैल पशु हाट में जाकर सारी हेकड़ी भूल जाता है। उसी तरह उसे भी प्रशिक्षण केंद्र जाकर अपनी शैतानियों से मुह मोड़ना पड़ा था। उसे पसंद था 90 और उससे पहले के गीत सुनना और किताबों से  बेइंतहा मोहब्बत करना,गर्मी की छुट्टियों में वह अपने बड़े भाइयों के सिलेबर्स की किताबें पहले ही चट कर लिया करता था..।और वह मुहब्बत के माह में किताबो की मुहब्बत शिद्दत से निभा रहा था। 
फरबरी में सौगात से प्राप्त हुई हरक्युलिस साइकिल चलाने को मिली...।.कॅरियर में बंधे बैग और उसकी साइकिल का वेग...उसकी हवा से पैराशूट बनती सर्ट मापा करती थी ।

वह फ़रवरी और फाल्गुन के प्रिय सरगम की शाम थी,पेड़ो से छरते पात और और कॉलेज केम्पस में बौराये दशहरी से लड़के को कोई आकर्षण न था।वह तो सायकल और  किताबो में जो डूबा रहता था....!
सायकल की चैन कुछ लूज थी जो प्रायः ब्रेकर पे उतर जाया करती थी।लेकिन  फ्रिव्हील से उतरी हुई चैन को बापस पीछे पैडल मार बापस चढ़ा लेना जैसे उसके लिए आम बात थी....और एक दिन बारिस में केम्पस के पास बने स्टॉपेज पर चेन उतरी! घनघोर बारिस......झमाझम बारिस...पर लड़के के कई पेड़ल  उलट मारने पर भी चैन न चढ़ी। चैन स्टेण्ड  और कल्पम्स के बीच  जो फंस चुकी थी।वह  देख न जाने क्या सोच मुस्कुरा उठा,जैसे सोचा हो कि कुछ जगह और करतब नही किस्मत का भी खेल होता है ।
वह स्टॉपेज के रेस्टसेल्टर में जा बैठा....!जहां पहले से एक जोड़ी अक्स छिपाये वह स्वप्निल आंखे  बैठी थी...।
पिंक सूट में  सिमटी हुईऔर हल्के मेहरून स्कार्फ से ढके चेहरे में दो आँखे दिखी ..।.उसने पहली बार महसूस किया कि ,क्यों आँखों में आकर्षण की बात शायर- कवि  लिखते आये है...आखिर होता क्या है,यह आँखों का सम्मोहन  ??

बारिश जेसे प्रकृति का वह संयोग था जो निरन्तर होते हुए भी अपनी मध्यस्थता में उन दोनों केव परिचायक बनने पर आमदा थी।केम्पस लॉन की जलती स्ट्रीट लाइट के साथ उन दोनो को अहसास हुआ की आज बरखा न रुकेगी ....!लड़का प्रतीक्षा का सब्र खो बेठा और सर से रुमाल बाँध उलझी हुई सायकल चेन को अलग करने  में व्यस्त हो गया ...।
."सर मुझे हॉस्टल तक ड्राप कर देंगे..प्लीज...प्लीज !!,अब ऑटो भी न मिलेगा !" 
कहते हुए लड़की ने स्कार्फ खोला तो लड़का स्तब्द्ध था और सोचने लगा की कही देखा है!! फिर स्वयं की स्मरण शक्ति के सुप्त हुये सूक्ष्म तन्तुओं में वह छवि खोजने लगा,बार-बार जोर देने पर जब कुछ यकीनी न मिला तो ,काल्पनिक और पूर्व स्थापित भ्रांति में मष्तिष्क ने उत्तर दिया ....इसी कॉलेज की तो है, दिख ही गयी होगी,तू ही किसी पर कहा ध्यान देता है !
मस्तिष्क को सोचने से स्वतंत्र कर वह पुनः चैन निकालने में तल्लीन हो गया।तभी उसने वह देखा जो आजतक न देखा,इतने दिन में शायद उसने कुछ न देखा था जो आज दिखा और चिहुंका ....!!
  जून से लेकर फरबरी भी निकल ही तो चुकी थी फिर उसने आजतक देखा क्यों नहीं ?
अंतर्द्वन्द में चलता प्रश्न-प्रश्न ही रह गया! जब लड़की ने उसे पुनः प्रासंगिक किया.....वह भी नाम लेकर !
इससे पहले की वह कुछ सोचता,उसने चेन को फ्री-व्हील पर चढ़ा पैडल घुमाके तसल्ली की...अब ठीक है न ??
और उसकी ओर बिना देखे ही सायकल के पहिये का मुआयना करते हुये उससे मुखातिब हुआ ।

जी आपको किधर चलना में एरोड्रम रोड बाले हॉस्टल तक ही जाऊंगा...।आप अकेली है तो पहले आपको ड्राप कर दूंगा फिर निकलूंगा ...!
लड़की बगैर प्रतिउत्तर दिए बोली आप चलिए और उसके कन्धे लटका बेग लेते हुए बोली ..."कुछ भीगने बाला तो बता दीजिये में लाइब्रेरी से एक बढ़ी चिल्ली(पॉलीथिन) साथ लाई हूँ " 
लड़के ने खामोस रहते हुए पॉकेट रेडियो उसकी और बड़ा दिया ।

लड़का चाहते हुए भी लड़की से बात नहीं कर पा रहा था...।साइंस की पढ़ाई में पढ़ी शिरायें और धमनियों के मध्य संचारित रक्त बहाव की अधिकतम गति क्या होती है..वह आज अनुभूत कर रहा था ।
उसने मीठे और धीमे स्वर में जब कहा "अब चलो भी,कब तक भिगोगे...और भिगाओगे ?
उसका पहला अनुभव था किसी के प्रति आकर्षण में और वह बार-बार सोचता की सपना है या सच !!

कॅरियर पर पहली बार कोई था, जिससे लड़का शैतान होते हुए भी  कोई भी शैतानी करना जैसे भूल गया था। कभी वह जब भी गले में पड़े स्कार्फ को व्यवस्थित करती थी  तो जो महक वह महसूस करता। वह उसे बार-बार एक अनजान अहसास की अनुभति कराता देता और लड़का सायकल के पैडल चलाते हुए सीटी बजाना भूल चुका था...।उसे अहसास ही न हुआ की कब एरोड्रम रोड निकल थॉमसन क्रासिंग आ चुकी थी...!

"रुको-रुको,हम आगे आ गए,बापस चलिए आपका एरोड्रम तो पीछे रह गया !" 
वह अपनी तल्लीन तन्द्रा से निकला और लौट चला पर उसने लड़की के ओठों के मध्य मुस्कान देख ली थी ।
उन दोनों के हॉस्टल के बीच किलोमीटर भर का ही फर्क था।
एक ही रोड पर ....
लड़की ऊँगली से बता रही थी आगे बाली स्ट्रीट लाइट ...।गन्तव्य आ चुका था.....।।
लड़का बैग बाली थैली लेते हुए पहली बार उसको निहारा ओर लज्ज़ा से दोहरा हो गया ....उसने वह देखा जो आजतक उसने नहीं देखा और अपनी सर्ट उतार पकडाते हुए बोला ,यह लीजिये आप भीगी हुई अव्यवस्थित दिख रही हैं। इसे पहन लीजिये मुझेें सुबह या कॉलेज में लौटा दीजिये ...।
उसे लड़के द्वारा सर्ट देने का जब मन्तव्य आभास हुआ तो वह लज्जा और  दोहरी होती हुई वहीं बेठ गयी पर उसके हाथ में थी लड़के की हल्की काली सर्ट....!

उस रात वह सो नहीं पाया,आँखों के समक्ष केम्पस से लेकर एरोड्रम तक का चलचित्र चलता रहा...और वह बार-बार सोचता की कहाँ देखा है ...?फिर बुद्धि कहती की कॉलेज में रोज ही देखा होगा पर आशवस्त नही हो पा रहा था और सुबह जब आँख लगी तो 11 बजे खुली...!घड़ी की दो सुइयां एक नियत आकर -मिलकर गुजर गईं।अलार्म पिंग-पिंग करता रहा वह सोता रहा ....!

उसने महसूस किया की वह बुखार में है और पोर-पोर दुःख रहा है...।कुछ पिल्स पड़ी थी..नास्ते बाद निगल ली और झटपट तैयार हो ऑटो ली क्योंकि सायकल चलाने को बॉडी तैयार न थी ।
लंच ब्रेक में पहुँचा और केन्टीन में जाकर पंडित जी से कुछ स्लाइस और उसके बाली कड़क चाय बोल दिया ...।उसने वहां देखा की वही लड़की किसी को उत्सुक नजरो से खोज रही है, और वह उसके सामने आ बेठी ...।मुस्कुराते हुये उसको देखा।
उसका मुस्कान बिखेरना जेसे लड़के की त्योरी पुनः भंग कर गया...वह उसे अपलक निहार रहा था !

"सुनो दीदी के लाडले.....तुमसे आज में परिचय कर ही लेती हूँ क्योंकि तुम हो निरे बुद्धू,पढ़ाकू !"
"इन किताबों से फुर्सत पाओ तो कुछ जानो,सम्बन्धियों को   भी यूँ न पहिचानना कोई तुमसे सीखे!"
इससे पहले की वह कुछ समझता ..वह खिलखिला उठी ...।
लड़का जेसे जलतरंग की स्वरलहरी में डूब गया..! 
उसने उसके चेहरे पर चुटकी बजाई और वह हड़बड़ाहट में बोल गया ....में-में...में...में समझा नही ?

लड़की बेतिहासा हंसती रही और लड़का अवाक सा खोया रहा...इसी मध्य उसने लड़के की तह की हुई सर्ट देते हुए बोला की "कल के लिए आभार व्यक्त करके में यह भूलना नहीं चाहुगी! पर यह आपका कर्तव्य था...हम परस्पर सम्बन्धी हैं किन्तु आपको पिछले 8 माह से यह बताते हुए झिझकती थी,सोचा करती थी कि पता नही आप क्या अनुमान लगायें। "
"कल जब बर्षात के अँधेरे में बिजली कड़कती थी,में डर से काँप रही थी...मुझे न बिजली कौंध से बड़ा डर लगता है।"
"आप आये तो हॉस्टल तक पहुंची,न तो मर ही जाती ..थोड़ी और देर में ..!"
अब लड़के का चित्त जाग्रत हुआ,याद  आया की उसकी पड़ोस बाली भाभी जी की छोटी बहिन भी तो यही किसी कॉलेज में दाखिला ली,पर उसके कालेज में होगी ,यह अनुमानित कल्पना से भी परेह की बात है !!

भाभी जी दिवाली पर बता रहीं थी की उनकी बहिन भी उसी शहर में कहीं हैं, जरा मिल आना उससे।आखिर सुदूर    भीड़ से भरे 'नितांत शहरों' में कोई अपने हैं तो उनसे मिलना और परस्पर खोज-खैर ओ खबर रखना हमारी संस्कृति के दायित्व हैं।
एक ही शहर में हो,एक-दूसरे को जानते हो तो  फिर तो टाइमपास भी होता रहेगा ! हम भी फिक्रमंद नही रहेंगे कि शहर में लड़की अकेली है ।
पर उसे क्या पता था की उसका परिहास उसको बदल देगा और जो परिलक्षित होगा वह उसे शैतान से परिपक्वता में बांध लेगा ।

समय के साथ पता ही न चला की वारिस में परिचय हुए दो प्राणी कब परस्पर परछाई बन गए...।कितनी ही बार साथ खाना खाये और कितनी ही बार एक-दूजे को सिखाते भी रहे ....।दोनों के दोस्त कहते थे की यह दोनों कितनी समानता लिए हैं, अगर बेलेंस किया जाए तो अंश भर भी फर्क न निकलेगा ...??
एक्जाम्स में लड़का 2 अंक से आगे आया ...वह बोल उठी की "लड़के थोड़े श्रेष्ठ ही अच्छे होते है,न तो इकवल्टी से लडाईया अधिक होती हैं !"

वह अंतिम वर्ष का अर्द्ध था.....।
दिवाली अवकाश से पूर्व दोनों ने साथ-साथ घूमा और एक पाम वृक्ष की छाँव में, लड़की ने स्नेहभूत होकर  लड़के के बालों में उंगलियों के पोरों से स्नेह अथवा बात्सल्य की अनुभूति  क्या दी। लड़का उसके अंक में सोता रहा ...।
घण्टो निकल गये, धूप आई तो उसने अपने स्कार्फ की छाँव कर दी ताकि नींद न टूटे .....।
यह करीव 31 माह में यह उनका पहला और निश्छल स्पर्स था ...वह सोता रहा और वह उसके सिर को ममता के साथ सहलाती रही ....दींन दुनिया से बेखबर...बेपरवाह होकर !!

वह जागकर  पूछता है,कि मुझे जगाया क्यों नही इतना समय  हो गया ?
वह किसी दूसरी दुनिया में बिचरण करती हुई कहती है की "आज जब तुम्हे पहली छुआ तो मेरा ममत्त्व जागृत हो गया ...और तुम्हारी ये निश्छल भोली सूरत निहारते-निहारते मेरी आँखे तृप्त नहीं हो रही  थी।"
"ऐसा प्रतीत हो रहा था,मेरे मातृत्व की सारी सुप्त प्रकृति  सिमट कर तुम्हारे में आ स्थिर हो गयी है,तुम्हे पता भी है???
"तुम सोते समय कितना खूबसूरती से मुस्कुराते हो,जब मुस्कुराते हो तो ऐसा लगता है, जेसे पलक झपकाते ही अद्भुत बालदृश्य- वह दृश्य कही चला न जाए !!"
"हम स्त्रियों में यह अलग ही अनुभूति होती है,प्रेम में समर्पण और समर्पित स्नेही में बात्सल्यबोध हम सहज ही अनुभूत कर लेती हैं।"
पता नही क्या था वह....??
वह यह सब बताते-बताते पता नही क्यों फफक पड़ी और उसके मोटे तीखे नयनो से कुछ भावविहलता की ओस सहज ही लड़के के ललाट को आलिंगनबद्ध कर गयी।
यंत्रवत सा लड़का भी भावबिभोरता में कुछ अश्रुदान करते हुये उसके समक्ष अपने सीने को भुजाओ से समांतर करते हुऐ गले लग गया ।

अगले दिन उनका पूरा ग्रुप्स साथ-साथ अपने-अपने गन्तव्य की गाड़ी पकड़ता है।राह में होती अंताक्षरी और गले मिलकर कुछ समय के लिए विदा होते सभी खुश थे, पर कहीं कुछ दो जोड़ी आँखे समन्दर हो रही थी ।

समय आता है और लड़के का रिम प्रीपेड रोज रिचार्ज होता है...।बातो में पुनर्वृत्ति दोहराई जाती है,कुछ दिन के शेष अवकाश जेसे युग बने प्रतीत होते है। 
एक दिन लड़के को खबर मिलती है की एक दुर्घटना में वह अधूरा रह गया ,जाते-जाते उसके सांस तोड़ते-.कॉंपते ओठों  पर उस लड़के का अधूरा नाम रह गया .....!!

लड़का कुछ समय विक्षिप्त सा रहा...पोरो पर दिन गिनता रहा पर उसका एक टुकड़ा दूर क्षितिज से उसे जेसे आज भी पुकार रहा है...उसको बार-बार निहार रहा है। सफलता की छांव से टूटा स्नेह जब-जब उसपर बरसता है,वह सफलता को स्पर्श करके भी असफल कहानी ही लिखता है ।
वह लड़का आज भी उस साइकल के करियर को निहारता है,केरियर-केरियर रिक्त  जेसे खोया हुआ समय पुनः आएगा और पुकारेगा .....
"मुझे होस्टल तक ड्राप कर दीजिये सर !"

---------
जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
    आगरा,उप्र.
      282007
   29/02/2016

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

गज़ल

रश्म ओ गारित हर एक मंजर दिखाई देता है,
मुझको जलता हुआ मेरा घर दिखाई देता है !

जीवन निकला खुशियो का कैदखाना बुनते-बुनते,
देखा टूटा हुआ फूंस का आशियाना दिखाई देता है !

हर शै यहाँ चेहरे पर नया चेहरा लगाये खड़ी है,
फिर से कोई मासूमियत का खरीदार दिखाई देता है!

शामे ख्वाव के तृणआशियाने उजड़े जा रहे हैं दोस्त ,
क्या करना और क्या कर बेठे में खोया दिखाई देता है !

उड़ते हुए धुएं सी थी जेहन में मंजिले कभी अशेष ,
आज बेरंग बादल सा गगन में भटकता दिखाई देता है !

सोचा था उन्मुक्त गगन सी गरिमा बन यशोभित होंगे 
आज खड़ा चौराहे की तरह एक राह दिखाई देता है !

फ़क्त सजाने को जिन्दगी,एक मन्ज़र सजाया था,
कत्ल ओ गारत यहाँ हर एक मन्ज़र दिखाई देता है !!

   
      ~JVS•

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

सिकरवार

#श्रीरामकुल

वैसे तो श्रीराम के विषय में कौन नहीं जानता लेकिन उनके कुछ विशिष्ट पूर्वजों व कुटुंब और वंशजों के विषय में लोग कम ही जानते हैं। 

#पूर्वज

-श्रीराम का कुल वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु कुल से प्रारंभ हुआ जिनकी वंशावली पुराणों व रामायण में अलग-अलग है। 
-
#  ऐसा प्रतीत होता है कि इक्ष्वाकु वंश की कई शाखाएं स्थापित हुई जो एक गणसंघ के रूप में संगठित थीं, जिसकी राजधानी थी #अयोध्या। इन शाखाओं में प्रमुख थीं-

-उत्तर-पश्चिम में मांधाता
-सौराष्ट्र में बसे शार्यात और मधु जिनका हैहय गणसंघ में विलीनीकरण हो गया। 
-दक्षिण में दक्षिण कोशल 
-उत्तर में उत्तर कोशल 

मांधाता, हरिश्चन्द्र, सगर, भगीरथ, मुचकुंद आदि इक्ष्वाकुओं की विभिन्न शाखाओं से संबंधित प्रतीत होते हैं जिन्हें पुराणों में एक ही वंशरेखा में जोड़ दिया गया। 

# उत्तर कोशल की मुख्य शाखा में दिलीप के  प्रतापी पुत्र रघु ने अयोध्या में स्थाई राजतंत्र की नींव डाली इसलिये उनके वंशज 'रघुवंशी' या 'राघव' भी कहलाने लगे।
 श्रीराम के प्रपितामह यही चक्रवर्ती रघु थे। 

# पितामह:- महाराज अज
# पितामही:- विदर्भ राजकुमारी इंदुमती

# पिता:-  महाराज दशरथ जिनके पराक्रम के कारण देवराज इंद्र स्वयं उनसे मित्रता रखते थे। 
# माताएं:- श्रीराम की जननी कोशल्या व विमाताएँ कैकई, सुमित्रा थीं जिनमें कोशल्या पटरानी और  कोशल्या व कैकई मुख्य रानियां थीं। 
कोशल्या व कैकई के वास्तविक नामों का पता नहीं चलता हालांकि कोशल्या दक्षिण कोशल की राजकुमारी और कैकई कैकय की राजकुमारी थीं। सुमित्रा के बारे में अलग अलग विवरण हैं। कुछ के अनुसार वह मगध की राजकुमारी थीं और कुछ के अनुसार काशी की।
इसके अलावा महाराज दशरथ की अन्य सामान्य पत्नियां भी थीं। 

# पितृव्य:- श्रीराम के किसी पितृव्य का उल्लेख नहीं मिलता परंतु महाराज दशरथ के घनिष्ठ मित्र काशी नरेश प्रतर्दन और अंग नरेश रोमपाद को श्रीराम जीवन भर पितृव्य का ही सम्मान देते रहे। 

# नाना व मामा:- श्रीराम के नाना जी का नाम महाराज भानुमान था जो दक्षिण कोशल के राजा थे जिसे आजकल का छत्तीसगढ़ कहा जाता है। 
मामा का उल्लेख नहीं मिलता लेकिन भरत के मामा आनव नरेश युधाजित का उल्लेख मिलता है जो झेलम व चेनाब क्षेत्र में राज्य करते थे। लक्ष्मण व शत्रुघ्न के नाना मामा का पता नहीं लगता। 

# कुलगुरु:- वसिष्ठ पीठ के तत्कालीन कुलपति वसिष्ठ जिनके पुत्र सुयज्ञ श्रीराम के समवयस्क और मित्र थे। 

# अन्य गुरु:- महर्षि विश्वामित्र जिन्होंने श्रीरा म को दुर्लभ दिव्यास्त्र और क्रांतिदीक्षा दी। महर्षि अगस्त्य उनके तीसरे गुरु थे जिन्होंने श्रीराम को वैष्णवी धनुष, अक्षय बाण भंडार और स्वयं का बनाया नवीनतम दिव्यास्त्र एन्द्रास्त्र प्रदान किया। उन्होंने श्रीराम को महारुद्र द्वारा विकसित कलारी की वदक्कन शैली की शिक्षा भी प्रदान की जिसके द्वारा उन्होंने कबन्ध का वध किया। 

# भाई:- भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न। इनमें भरत कैकई के और शत्रुघ्न तथा लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र थे। 

# बहन:- श्रीराम की एक बड़ी बहन शांता का भी उल्लेख मिलता है जो  एक अल्पज्ञात विमाता से उत्पन्न हुईं थीं। इस कन्या को दशरथ ने अपने मित्र अंग नरेश रोमपाद को दे दिया था। इस कन्या का विवाह श्रृंगी ऋषि से हुआ जिन्होंने महाराज दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। अर्थात श्रृंगी ऋषि दशरथ जी के जामाता लगते थे। 

# पत्नी:- राजर्षि जनक की पालित पुत्री सीता। 

# अनुजपत्नियाँ:- भरत की मांडवी, शत्रुघ्न की श्रुतकीर्ति पत्नियां मिथिला नरेश सीरध्वज के भाई कुशध्वज की पुत्रियां थीं। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला स्वयं महाराज सीरध्वज जनक व महारानी सुनयना की सगी पुत्री थीं।

(अगले अंक में श्रीराम के प्रसिद्ध वंशजों के विषय में।)

#श्रीराम_के_वंशज 2

 श्रीराम के अपने वंश में कुश के वंशज मूल अयोध्या पर राज्य करते रहे। राक्षसों द्वारा कुश की हत्या के पश्चात उनके पुत्र अर्थात श्रीराम के पोते अतिथि ने न केवल पूरा पूरा प्रतिशोध लेकर राक्षसों का रहा सहा नामोनिशान मिटा दिया बल्कि अपने दादा श्रीराम के साम्राज्य को फिर जीवित किया। 

कालांतर में सुदर्शन के बाद उनके विलासी पुत्र अग्निवर्ण के पश्चात अयोध्या सम्राज्य का पतन होता गया और उसी अनुपात में हस्तिनापुर प्रगति करता गया। 

अंततः श्रीराम का वंशज बृहद्वल अन्यायी कौरवों के पक्ष में लड़ता हुआ अभिमन्यु के हाथों यश विहीन वीरगति को प्राप्त हुआ। 

प्रसेनजित और फिर उसका पुत्र विदूदभ अंतिम उल्लेखनीय रघुवंशी थे और प्रसेनजित ने श्रावस्ती को राजधानी बनाकर अयोध्या को और उपेक्षित कर दिया।

इसके बाद का राम के वंशजों का इतिहास पंडों, भाटों व चारणों की बहियों व प्रशस्तियों में मिलता है। 

ऐसा प्रतीत होता है कि इक्ष्वाकुकुल के क्षत्रिय पूरे भारत में बिखर गए और फिर स्कन्दगुप्त के काल में भट्टार्क के उल्लेखनीय रूप में प्रकट होते हैं। 

तत्पश्चात प्रतिहार राजपूतों के रूप में व उनके नेतृत्व में एक बार फिर राम के वंशज एकत्रित होना प्रारंभ हुए। 

कच्छप टोटम के नागों का विनाश करने वाले कुश वंशीय कच्छपघात पहले ग्वालियर क्षेत्र में और फिर आमेर क्षेत्र में 'कछवाहों' के रूप में प्रकट हुए। 

लक्ष्मण के पुत्र मल्ल व उनके वंशज 'मालवी'  के पुत्र  'मालव' आबू के यज्ञ के बाद 'परमारों के रूप में प्रतिष्ठित हुये। 

मेवाड़ में ही श्रीराम के वंशजों की एक शाखा गुह के वंशजों के रूप में 'गुहिलोत' व 'सिसोदियो' के रूप में पद प्रतिष्ठित हुई। 

अयोध्या से रावी किनारे श्रीराम द्वारा लव के नाम पर बनाई गई सैन्य छावनी 'लवपुर' जिसे आज 'लाहौर' कहा जाता है, जाकर बसे श्रीराम के वंशजों में एक उल्लेखनीय वंशज हुये 'कनकसेन'। 

उन्हीं कनकसेन के वंशजों की एक शाखा आठवीं शताब्दी के आसपास शेखावटी क्षेत्र में आ बसी और फिर अपने ही बांधव 'कछवाहों' से परास्त होकर रेत अर्थात 'सिकता' के क्षेत्र में आ बसी जिसे कहा गया 'विजयपुर सीकरी' और अकबर ने नाम बदलकर कहा 'फतेहपुर सीकरी'। 

1527 में राणा सांगा के साथ ये 'सीकरी वाले' राजपूत भी आये थे राव धम्मदेव सिंह के नेतृत्व में खानवा के मैदान में मातृभूमि की वेदी पर अपना रक्त अर्पण करने लेकिन तोपों के विरुद्ध वज्र वक्ष भी चूर चूर हो गए। 

राणा सांगा के साथ पूरे के पूरे 'सीकरीवाले' राजपूत निकल पड़े मुगलों से शाश्वत संघर्ष का संकल्प लिए। 

वे बंटे तीन हिस्सों में-

एक हिस्सा गया झारखंड के गहनतम वनों की ओर और  गांव बसाकर आसपास के इलाके को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। यह गांव आज एशिया का सबसे बड़ा गांव 'गहमर' कहलाता है। 

दूसरा हिस्सा आगरा के जंगलों में छिप गया ताकि छापामार युद्ध चला सके। यह क्षेत्र 'बड़ी सिकरवाली' कहलाता है। 

तीसरा हिस्सा चंबल के बीहड़ों में जा बसा जिसकी दुर्भेद्य घाटियां मुगलों के लिए सदैव अभेद्य रहीं। 

चंबल का यह क्षेत्र भी कहलाया 'सीकरवाली' और उसके ये निवासी कहलाये 'सिकरवार'। 

इसी चंबल क्षेत्र में एक सूर्यवंशी योद्धा 'सहजराम' ने बसाया एक गांव 'सहजपुरा' और प्रण लिया 'वैष्णव सम्प्रदाय, शाकाहार' व प्राणी कल्याण का लेकिन एक वंशज के दलितों पर अत्यचारों के कारण शाप मिला कि हर तीसरी पीढ़ी पर तुम्हारा गाँव उजड़ेगा। 

उस शाप को ढोते हुये नवीं पीढ़ी में भी यह गांव तीसरी बार उजाड़ हुआ और दसवीं पीढ़ी के एक बालक ने आजीवन उसकी त्रासदी झेली। 

भगवान श्रीराम की तीन सौ दसवीं(+) पीढ़ी के इस बालक की अब यही कामना है कि हर हिन्दू एक दूसरे को भाई माने और उसका सम्मान कर्म से करे न कि जातिगत जन्म से ताकि फिर किसी तीसरी पीढ़ी को ऐसा विनाश न झेलना पड़े। 

इति!
#श्रीराम_के_वंशज 2

 श्रीराम के अपने वंश में कुश के वंशज मूल अयोध्या पर राज्य करते रहे। राक्षसों द्वारा कुश की हत्या के पश्चात उनके पुत्र अर्थात श्रीराम के पोते अतिथि ने न केवल पूरा पूरा प्रतिशोध लेकर राक्षसों का रहा सहा नामोनिशान मिटा दिया बल्कि अपने दादा श्रीराम के साम्राज्य को फिर जीवित किया। 

कालांतर में सुदर्शन के बाद उनके विलासी पुत्र अग्निवर्ण के पश्चात अयोध्या सम्राज्य का पतन होता गया और उसी अनुपात में हस्तिनापुर प्रगति करता गया। 

अंततः श्रीराम का वंशज बृहद्वल अन्यायी कौरवों के पक्ष में लड़ता हुआ अभिमन्यु के हाथों यश विहीन वीरगति को प्राप्त हुआ। 

प्रसेनजित और फिर उसका पुत्र विदूदभ अंतिम उल्लेखनीय रघुवंशी थे और प्रसेनजित ने श्रावस्ती को राजधानी बनाकर अयोध्या को और उपेक्षित कर दिया।

इसके बाद का राम के वंशजों का इतिहास पंडों, भाटों व चारणों की बहियों व प्रशस्तियों में मिलता है। 

ऐसा प्रतीत होता है कि इक्ष्वाकुकुल के क्षत्रिय पूरे भारत में बिखर गए और फिर स्कन्दगुप्त के काल में भट्टार्क के उल्लेखनीय रूप में प्रकट होते हैं। 

तत्पश्चात प्रतिहार राजपूतों के रूप में व उनके नेतृत्व में एक बार फिर राम के वंशज एकत्रित होना प्रारंभ हुए। 

कच्छप टोटम के नागों का विनाश करने वाले कुश वंशीय कच्छपघात पहले ग्वालियर क्षेत्र में और फिर आमेर क्षेत्र में 'कछवाहों' के रूप में प्रकट हुए। 

लक्ष्मण के पुत्र मल्ल व उनके वंशज 'मालवी'  के पुत्र  'मालव' आबू के यज्ञ के बाद 'परमारों के रूप में प्रतिष्ठित हुये। 

मेवाड़ में ही श्रीराम के वंशजों की एक शाखा गुह के वंशजों के रूप में 'गुहिलोत' व 'सिसोदियो' के रूप में पद प्रतिष्ठित हुई। 

अयोध्या से रावी किनारे श्रीराम द्वारा लव के नाम पर बनाई गई सैन्य छावनी 'लवपुर' जिसे आज 'लाहौर' कहा जाता है, जाकर बसे श्रीराम के वंशजों में एक उल्लेखनीय वंशज हुये 'कनकसेन'। 

उन्हीं कनकसेन के वंशजों की एक शाखा आठवीं शताब्दी के आसपास शेखावटी क्षेत्र में आ बसी और फिर अपने ही बांधव 'कछवाहों' से परास्त होकर रेत अर्थात 'सिकता' के क्षेत्र में आ बसी जिसे कहा गया 'विजयपुर सीकरी' और अकबर ने नाम बदलकर कहा 'फतेहपुर सीकरी'। 

1527 में राणा सांगा के साथ ये 'सीकरी वाले' राजपूत भी आये थे राव धम्मदेव सिंह के नेतृत्व में खानवा के मैदान में मातृभूमि की वेदी पर अपना रक्त अर्पण करने लेकिन तोपों के विरुद्ध वज्र वक्ष भी चूर चूर हो गए। 

राणा सांगा के साथ पूरे के पूरे 'सीकरीवाले' राजपूत निकल पड़े मुगलों से शाश्वत संघर्ष का संकल्प लिए। 

वे बंटे तीन हिस्सों में-

एक हिस्सा गया झारखंड के गहनतम वनों की ओर और  गांव बसाकर आसपास के इलाके को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। यह गांव आज एशिया का सबसे बड़ा गांव 'गहमर' कहलाता है। 

दूसरा हिस्सा आगरा के जंगलों में छिप गया ताकि छापामार युद्ध चला सके। यह क्षेत्र 'बड़ी सिकरवाली' कहलाता है। 

तीसरा हिस्सा चंबल के बीहड़ों में जा बसा जिसकी दुर्भेद्य घाटियां मुगलों के लिए सदैव अभेद्य रहीं। 

चंबल का यह क्षेत्र भी कहलाया 'सीकरवाली' और उसके ये निवासी कहलाये 'सिकरवार'। 

इसी चंबल क्षेत्र में एक सूर्यवंशी योद्धा 'सहजराम' ने बसाया एक गांव 'सहजपुरा' और प्रण लिया 'वैष्णव सम्प्रदाय, शाकाहार' व प्राणी कल्याण का लेकिन एक वंशज के दलितों पर अत्यचारों के कारण शाप मिला कि हर तीसरी पीढ़ी पर तुम्हारा गाँव उजड़ेगा। 

उस शाप को ढोते हुये नवीं पीढ़ी में भी यह गांव तीसरी बार उजाड़ हुआ और दसवीं पीढ़ी के एक बालक ने आजीवन उसकी त्रासदी झेली। 

भगवान श्रीराम की तीन सौ दसवीं(+) पीढ़ी के इस बालक की अब यही कामना है कि हर हिन्दू एक दूसरे को भाई माने और उसका सम्मान कर्म से करे न कि जातिगत जन्म से ताकि फिर किसी तीसरी पीढ़ी को ऐसा विनाश न झेलना पड़े। 

इति!

बुधवार, 27 दिसंबर 2023

कच्ची डोर (कहानी)

पावस ऋतु के प्रचंड वेग के समय एक सैनिक घनघोर जंगलों में अपनी चिर-परिचित राह से क्या भटका,जैसे दुरूह और स्याह रात की मुसलाधार वर्षा भी उससे कोई पुराने परिबाद का बदला लेने पर उतारू हो चुकी थी।

सर्द मेघ की बूंदों ने सैनिक की तमाम अस्थियों के मेरूरज्जु तक शीत पहुँचा दी थी। किन्तु राह भटका पथिक चलता रहा-चलता रहा और शीत व क्षुदा से त्रस्त होकर कोई आश्रय तलाशने लगा।


चंहुओर तलाश करने पर भी उसको कंही भी कोई आशा किरण नजर नही आई तो एक विशाल वटवृक्ष पर चढ़कर जीवन बचने की आशा में ,दूर तक देखकर कोई आशा की किरण खोजने लगा।कंही दूर से उसको एक आलोक होता दिखा तो मरा हुआ साहस पुनः जागृत हो उठा।


तड़ित  प्रकाश में वह एक मनोरम कुटिया में बिखरी डिभरी की आभा में गृहस्वामिनी तरुणी को देख ठिठक गया।फूलती सांस,सतत होती शारीरिक ऊर्जा क्षय और कांपते जिगर से आश्रय पाकर भी निराश्रित सा लोटने को उध्दृत हो उठा। किन्तु तरुणी की तीक्ष्ण दृष्टि व बादलों में कड़कती तड़ित के आलोक से वह न बच सका।

तरुणी ने कहा कि देखो इस घनघोर बहित्काल में मेरे आश्रय तो ले सकते हो किन्तु मेरे पिता-माता ननिहाल गए तो मुझे तुम्हारे कारण मेरे शील मर्यादा का भय न  हो !

वह बलबीर द्रवित हो उठा...!

'भद्रे!,में एक क्षत्रिय हूँ और शील-मर्यादा,धर्म की रक्षा मेरे लिए इस जीवन से अधिक प्रिय है। में बाहर औलाती के सहारे प्रहरी बनकर बैठा रहूंगा।''किन्तु!तुम्हे कोई क्षति नही आने दूंगा!!'

तरुणी आश्वस्त हुई और कुटी के पट से परेह हटकर आगन्तुक को अंदर आने की क्रियात्मक स्वीकृति दी ।

प्रायः ऐसा ही होता है,की आश्रय मिल जाये तो क्षुदा आग्रह भी मेजबान के समक्ष प्रस्तुत करना ही पड़ता है।और आगन्तुक भी आमंत्रित से बरबस ही बोल पड़ा।

'कृपया कुछ क्षुदा निवारण हेतु उपलब्ध हो तो मेरी प्राण रक्षा कीजिये,चार घड़ी से इस निर्जन में भटक रहा हूँ।'

तरुणी द्वारा सैनिक को कुछ सत्तू व कन्द इत्यादि खिलाकर तृप्त किया और अपने लिए जमीन पर बिछावन करने लगी। 

इस बरसात में चलती तेज वायु और सतत धरा की शीतलता में शयन  की सोच सैनिक बरबस ही बोल उठा।"

देवि!आप इस चारपाई पर शयन करिये में सैनिक हूं और इस भूमि पर शयन करने का अभ्यस्त भी हुँ।,कृपया आप चारपाई ग्रहण करिये। में बड़े आराम से सो लूंगा!"

तरुणी ने भृकुटि तानी और थोड़े से बनाबटी गुस्से के साथ बोली..."अतिथि को भूमि पर और स्वयं सुलाकर,में आतिथ्य सत्कार में हुई चूक की हकदार क्यों बनूगी ?"

दोनो और से "आप-आप" होते-होते एक शायिका पर दोनों के मध्य एक कच्ची सूत की डोर की मर्यादा बांध दी गयी और दोनों अपनी-अपनी करबट सोने का प्रयास करने लगे।

भोर में लड़की पहले जागी और बोलने लगी.....

"तुमने कितने समुहे रिक्त करके युद्ध किये हैं..?"

सैनिक -भद्रे इस जीवन काल मे सैकड़ों युद्ध किये और कभी पराजित नही हुआ हूँ,एक-एक दुश्मन के ओहदों पर अपनी ढाल और सिरोही की धमक से धावे पर धावा बोला है।"


प्रतिउत्तर में तरुणी रक्तिम आंखे और खा लेने बाली नजरों में से देखते हुये बोली...

"चल नामर्द,झूठे...इससे पहले की तुझपर शीलभंग का आरोप लगाकर तुझे मरबा दूँ।निकल जा इधर से ..!!"

"रात में एक यौवना तरुणी की धधक शांत करने के लिए तुझसे एक कच्चे सूत की डोर तो लांघी नही जा सकी।बड़ा आया युद्ध जीतने-पराक्रम दिखाने की बाते बनाने बाला।"

"जा. !ओझल हो जा,जो एक स्त्री के मन की बात और बाह्य दिखावे को नही समझ सकता।उससे सौर्य की बातें शोभा नही देती!!"

मेने,तुझे...

आश्रय किसी पथिक को आतिथ्य सत्कार के लिए ही नही,वरन स्वयं की आवश्यकता के लिए दिया था।एक डोर तो टूटी नही,किसी की सैया क्या तोड़ पायेगा..पौरुष हीन।


सैनिक ..किंकर्तव्य विमूढ़ होकर सिर धुनने लगा कि,आखिर उससे चूक अपना धर्म निर्वहन करके हुई अथवा अधर्म न करके...!!

वह पहली बार जीवन मे धर्म निर्वहन करके सात्विक रहकर,शौष्ठव शरीर होकर भी स्वयं को पौरुषहीन अनुभूत करता हुआ।धराशायी पगों से अपनी पगडंडी को चलता बना ।

आखिर चूक कहाँ हुई.. ??

सोमवार, 27 नवंबर 2023

चार वर्ष ♥️🥰

सुना है..!
तुम बहुत दूर जाने बाले हो,अपनो से कहीं विस्तृत होकर,नया सम्बोधन लेकर,विरक्त से होकर अपनी शास्वत दुनियाँ में पदार्पण करने...जैसा कि हर कोई एक स्वप्न में सजा के रखा करता है।
अब वह तुम्हारा मेरे से तमाम प्रश्न रखना और अनायास ही चिंतित होकर लताड़ना कदाचित ही हो पायेगा।शायद ही वह दिव्य ध्वनियों से अभिगुंजित होती स्वर सरिता पुनः अपने कर्णों के माध्यम पुनः अपने मन मस्तिष्क में लहरा सकूंगा !

में नही जानता कि हम किसको-कितना स्मरण रख पायेंगे,किन्तु जब-जब यारी-दुनियादारी,ईमानदारी व परस्पर स्वभावों की तुलना करने की बारी आएगी...मुझे-तुम्हारी और शायद तुम्हे भी मेरी सूरत।उजली न सही,धुंधली तो अवश्य याद आएगी न?
क्या तुम्हें याद रहेगा,मेरा तुम्हारे ओजस्वी चौड़े भाल पर संस्कृति की बिंदी के लिए बाध्य कर देना?और तुम्हारा मुझे "प्राचीन खड़ूस बुढ़ऊ दोस्त " कहकर 'बिंदी' स्वीकार कर लेना  ।
 
सच कहुँ यार...!!
मेरे 'शब्द' तुम्हारे स्वर के बिना बहुत नीरस हो चुके हैं,प्रायः अब वह लिखने की अकुलाहट व मेरी सदैव की टंकण त्रुटि पर तुम्हारी झल्लाहट का न होना बहुत खलेगा।बहुत याद आएगा तुम्हारा शब्दों में प्राण सजीव करने का अद्भुत सामर्थ्य।पर मेरे सामर्थ्य से तुम बहुत दूर अपने स्वर्णिम सपनो में सदैव गतिमान रहना। प्रायः इस संसार की गति में आकर सबको अपनी गति पकड़नी होती है ।

हम प्रत्यक्षय कभी भेंट नही कर सके,कभी तुम्हारे आग्रह पर में उपलब्ध नही हो सका तो कभी मेरे आग्रह पर तुम।शायद कुछ आत्मीय बंधन बनते ही इस लिये हैं कि,उनकी रिक्तियां सदैव भावाव्यक्तियों से कहीं सर्वोच्य होकर सदैव चिर स्मृतियों में स्थायित्व प्रदान करके स्मरण की जा सकें ।

सम्भवतः यह मेरा तुम्हारे लिए लिखा पहला और अन्तिम भावासक्त विदाई भाव हो।क्यों कि तुम्हारे को संस्कारस्वरूप प्राप्त हुए।नूतन जीवनशैली,नूतन उत्तरदायित्व एवं नवनूतन भावप्रवणता मुझे भावरहित होने पर बाध्य कर देती है।

लोग कहते हैं कि,एक समय अंतराल उपरांत हर कोई अपनी स्मृतियों को विस्मृत कर देता है।किन्तु में बिलुप्त होती उस मानव सभ्यता का प्राणी ठहरा जो अपनी जीवनी को बड़े समीप से चलचित्रित होते प्रायः देखा करता हुँ।अपनी इसी विप्लब क्षमता के कारण कितनी ही बार स्वयं के द्वारा ठगा जाता हूँ ।
मुझे विदित नही कि लोग क्या समझेंगे?
सम्भवतः स्नेह से अनुरिक्त करके जोड़े।जैसा की आम अवधारणा पूर्व से निहित है। किन्तु यह स्नेह की भावना उस आम जनमानस की भावना से कहीं सो कोटि सर्वदा प्रथक है ।
यार!!
तुम न,मेरी जिन्दगी के वह अभिसिंचित अमूल्य धरोहर थे,जो कभी न कभी उसके धारक को दिव्य रश्मो के साथ देने ही थे।
माँ भगवती तुम्हारे पावन आँचल में सदैव उन्नति-प्रगति व बात्सल्य की दिव्य 'रश्मियां' सदैव पल्लवित रखे ।
तुम जिधर जाओ उधर मधुर श्रवनमाष की दिव्य सुसंस्कृतिया सदैव 'अभिगुंजित' होकर गुंजार करती रहे ।

सदैव प्रशन्न व आनन्दित रहकर नवजीवन की असीम शुभकामनायें प्रिय ...!!
सुखद विदाई,अँकवार स्नेह ...अलविदा !!

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

डाक दिवस

#डाक_तार

पता नही कि खुद के पते पर आई अन्तिम डाक की अन्तिम तिथि क्या थी..??
अब तो अपनी खाकी गणवेश में सायकल से डाक लाने बाले छुट्टे चाचा का चेहरा भी ढंग से याद नही है।याद तो बस रह गया है,कि मेरी उन तमाम जी गयी जिंदगियों की अक्स सिहाईयों के माध्यम से भरी डायरियों में सबके डाक व्यवहार की एक छोटी-छोटी स्मर्णीका!प्रथम भेंट,प्रथम सन्देश की एक छोटी सी पुर्जी को मैने अपनी जीवन की उन अमूल्य थातियों के रूप में संजों रखा है ।

आज  उन सबके पत्राचार का सूत्र मैंने अपने पास संजो रखा है,जिनका मुझसे तनिक सा भी सम्पर्क कभी रहा हो..!पता नही क्यों आज भी उन पत्र व्यवहारी पतों को क्यों सतत फेहरिस्त में जोड़े जाता हूँ?
जबकि मुझे पता है कि कभी किसी को पत्र व्यवहार के माध्यम से वह अमूल्य भाव भेंट नही कर पाऊंगा।जिस भाव से डायरी के पेजों को नीलवर्णों से सजा लेता हूँ।

अब न शब्दों की सारंगी दुनिया में , "थोड़ा लिखो अधिक समझों...आप अधिक समझदार हो!"
समझने बाले लोग बचे हैं,और ना ही खतों-खतूत की दुनिया के वह प्रतिक्षिक लोग ...!!

बचा है बस...चंद अल्फाजों में सिकुड़ती दुनिया का खत्म हुआ बजूद!जो कभी खतों को भी सिकोड़कर-सहेजकर रख लिया करती थी..!

पता नही...! किस पते पर...?
किस नायक-नायिका,पिता-पुत्र,बहिन-भाई,पूत-माई,सखा-सम्बन्धी,देवर-भौजाई का आखिरी खत तन्मयता के साथ नयनो में नमी लेकर बाँचा अथवा पढ़कर सुनाया गया होगा ...!!

जगजीत सिंह जी के 'चिट्ठी न कोई सन्देश'  से लेकर  सोनू निगम-रूपकुमार राठौर के " संदेशे आते हैं .." और पंकज उदास की "चिट्ठी आई है,आई है..!" 
एक नम आंखों की दास्तान है,जो एकात्म हुए भावों के भंवर में बरवस पाशवित कर ही लेती है ।

आज कुछ खतों पर समय की मार के कारण तह की हुई यादों का रंग हल्का पीला सा पड़कर भी कितना सजीव सा है..!
इस दुनिया को भले ही हम असीमित भावों को लेकर अपनो आप को  'पोस्टकार्ड' की तरह पेश करें.....किन्तु चहुँ ओर से बन्द 'अन्तर्देशीय' से चित्त हो ही जाते हैं ।

खैर चलो...!
खतों-खतूत की दुनिया की तरह ही इस दुनिया का भी पराभव होना सुनिश्चित है।पोस्टकार्ड हो या अन्तर्देशीय एक दिन सबके लिखे हर्फ सनै-सनै समझ आ जाते हैं ।

हाँ याद आया ... !!!!!
डाक आती तो है.. ..! बहिना की राखी लेकर किन्तु उसमे भी वह शब्दों का संजोये जाना बाला 'इंद्रजाल' नही पढ़ने को मिलता .....!!!
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विश्व डाक दिवस है आज....♥️

"क़ासिद तेरी हड़ताल पे, कुर्बान जाइये;
वो आ गये हैं खुद, मेंरे खत के जबाब में।"

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से' 
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

यादों का इडियट बॉक्स 2

गाँव में महीनो बाद आने पर दिखाई देती है मेरी मातृभूमि! धानी चुनरिया ओढे दुलार देती हुयी सी!!अपने शावक को अंक में लेकर दुलारने को आतुर नयन देख बरबस ही यह नयन भी सजल हो उठते हैं..।

बाजरे की बालियों का रंग जैसे चाँदी की जरिकारी किये हुए लहराता हुआ किसी का आँचल,कहीं कनखियों से निहारकर आलम्बन कि प्रतीक्षा में न जाने कितने समय की दूरियों का शिकवा-गिला जताकर अभी फफक पड़ेगा..!

 अभी-अभी दुग्ध कटोरा देते हुए बो लाल चूड़ियों से भरा हाथ,अपने चेहरे पर आई ,आधी धवल हो चुकी लटों को..लाल देख हटाना भूल चुका है। अभी दुलार से माथे पर सहलाते हुए कहेगा कि,
 "कितना दुबला हो गया है रे तू ...?

"कुछ खाता भी है वहाँ ,जा मात्र जोड़ने-जोड़ने  की ही  सोचता है ??"

" ले ये तेरा पसंदीदा मीठा दूध ,जब तक रुका है, छक के पी ।आज देर से क्यों आया..तनिक जल्दी आ जाता तो तेरे पसन्द की खीर न बना लेती...!"

खाना खिलाते माँ प्रायः सदा की भांति अपनी पढ़ाई भूल जाती है,चार की संख्या उन्हें दो नजर आती है ।
ना-नुकुर करने पर डपट देती है
 "अभी खाया ही क्या जो इतरा रहा है ?,क्या तुझे माँ से बेहतर कोई खाना खिलाने बाला भा रहा है !"

"चल झट बात करा ...देखु-सुनु-समझु तेरे व्यक्तित्व के अर्द्धभाग को!,अगर जरा चूक हुई तो क्या कोसूँगी बाद अपने भाग को ..!"

 लाडले की लजाती नजर को अनदेखा करके खीर का कटोरा भर देती है,दोनों हथेलियो के मध्य बत्सलता का सूर्य सन्मुख कर लाडले की थाली कचौड़ियों से भर देती है...!
समझ नही पाता हूँ...!!!
खाते-खाते जड़वत होकर सोच उठता हुँ....!!!!
पहले इस स्नेह-बात्सल्यता के प्रतीक स्नेहसागर के दर्श के नयन अघाउँ या उन नयनो के आदेश पर इस उदर को अघाउँ...!!!!!

पुरवाई भी क्या खूब मन महक से भरती है।जब शिवालय में मधुर शंखझालर बजती है न,मन मयुर एकाकी जीवन में बिताये एकाकी क्षद्म स्वांतन्त्र के नीरस पलो को धिक्कारता है।
आ अब लौट चले सुवर्ण माटी की महक में  मुझे मेरा गाँव पुकारता है ।

फिर अवकाश खत्म होने का भय पुरजोर स्मरण आ रहा है।कुछ घण्टों अथवा प्रहरों का ही तो समय शेष बचा है...!इन शेष प्रहरों में उन पेड़ों की शाखाओं पर गोदकर उकेरे हुये,खोटियों के साथ झड़ते हुये,अपने नामों को देखकर आह भर लूं....!या उन पुराने घरों का एक चक्कर लगा लूं...जहां न जाने कितनी शैतानियों की गवाह दीवारों में आज इश्क की महक नमी पाकर तेजी से पुकारती प्रतीत होती है।

क्या निकल लूँ...?
उन विश्वविद्यालयी दिवसों के सतरंगी सपनो के सागर किनारे,जहां एक रेडियोसेट की सरसराती फ्रीक्वेंसी उसके पसन्द के गीत को बरबस ही उसकी याद में ले जाया करती थी।
या उन काल्पनिक परछाइयों के बढ़ते-कम होते कदों के साथ,उसका अक्स उकेरने की तमन्ना पूरी कर लूं..!!

कभी-कभी प्रतीत होता है कि,में बड़े होने की मरीचिका में कितना कुछ अपना ...उन दरख्तों पे गोद डाले गए नामों और समय के साथ उखड़ति खोटियों के माध्यम से मिटता सा अपना सब कुछ इस उन्नति की चाह में स्वतः ही मिटाकर ....कितना आगे निकल आया हूँ....!!!!!!

काश!वह व्यतीत सब कुछ एक बार पुनः त्रुटि रहित प्रारम्भ कर सकता!!
जिसका पटाक्षेप कल्पनातीत था .......।।

(7 वर्ष पूर्व की मेमोरी का अपडेट वर्जन)
-  -------- 
~जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'
   चम्बल मुरैना मप्र.

शनिवार, 19 अगस्त 2023

फिर से गजलें और एक बिखरा स्वप्न 😥

लोगों के अंदर कुछ और, बाहर कुछ और होता है!
दिखता है कुछ और, पर असल कुछ और होता है!

 इनके मासूम चेहरों पर न जाइये साहिबान,
इनके चेहरे पे कुछ और, दिल में कुछ और होता है!

ग़मगीन होकर सुनेंगे तुम्हारे दर्द की दास्तान ये,
मगर सामने कुछ और,पर पीछे कुछ और होता है!

सच तो ये है कि हम सब निभाते हैं यही किरदार, 
अपने लिए कुछ और, गैरों के लिए कुछ और होता है!

उपाहने पांव चलके देखा करता हुँ, नित शमशीर की धारें,
घाव पड़ते हैं -लहू बहता कंही और दर्द कहीं और होता है!

सोया हुआ मेरे हरफों का चश्मो चिराग और कहीं आज,
आह की आभा बिखेरता यहां,उजाला कहीं और होता है..!!!!!

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#अर्से_बाद_गजल_से_मुहब्बत_हुई_है

~JV•सिंह

शनिवार, 12 अगस्त 2023

शब्द श्रद्धांजलि ♥️🙏♥️

अन्तर्जाली स्मरणिका और तुम
===================
बो कल का दिन था!जब तुम्हे पिछले 13 वर्ष उपरांत पुनः एक बिसराई हुई कसक की तरह सहज कुरेदा था मेने। 
महसूस किया था..तुम्हारे पंचम स्वर में निहित वेदना को,रुग्णता के पलो में जो दिव्य औषधि रूपी साथ था! आज छिन्न-भिन्न सा है ।
जेसे किसी ने वर्षो से संजोये हुए मुक्तकों की मणिका को एक पल में खण्डित कर दिया हो,और में और तुम छिटक के शिखर के किसी बिबर  में पढ़कर अनन्त रसातल की यात्रा पर निकल चुके हों....!!

हम एक ऐसी यात्रा के सहभागी बनकर रह गए।जो जीवन के प्रतिभागी बनने में दो राहे से होकर निकलनी थी।तुम्हारे शब्द मूक होकर मष्तिष्क में भूचाल ला देते थे। कितना कुछ समानता का समिश्रण था, स्वर से मुखर तक पुष्प-श्रद्धा के साथ आभा का समीकरण तक।यहां तक की अंतरात्मयी ऐश्वर से धमनियों के रक्त तक का एक ही होना संयोग मात्र नहीं हो सकता था.!!!

हाँ में!!
 तुम्हारे अदृश्य एक कृतिक का आज भी उपासक हूँ, किन्तु स्मरणी चिन्हो से वंचित हूँ।क्योंकि जब हृदय में साक्षात-चिरस्थायी एक प्रतिबिम्ब हो तो स्मरणीका चिन्ह स्वयं का स्वरूप छोड़कर अनन्त में यात्राबलंबित हो जाते हैं न.....??

किन्तु अन्तर्जाली स्मृति एक वर्ष-दस वर्ष, प्रतिवर्ष अथवा उम्र रहने तक,साँस चलने तक।सहज ही कुछ न कुछ स्मरण करने को प्रतिबद्ध करते रहती है। 
कि आज १० वर्ष की स्मरण,साढ़े तीन वर्ष की स्मृति कणिका अपना अनन्त ०(शून्य) त्याज्य करके पुनः ११ (एकादस) आलंबन के लिए स्वागतातुर है ।और तुम्हारा यथेस्ट १(एक), अभीस्ट १(एक) युग्म न होकर सदैव एकाकारी ही रह गया !
शीर्ष पर लघु शून्य,मध्य में वक्रार्द्ध और तल में निम्नतम तक नींव के साथ अपना असितित्व लिए बस प्रतीक्षित सा खड़ा है । 

फिर स्वविवेक अनुसार तुम १ से लेकर ९की दहाई तक,अपने भाल को  किसी से भी अंकित करो ये एकल था।एकल की सन्तुति और एकल ही प्रतीकित होगा।।

किसी का योग बनना सम्भवतः मेरी नीयति में नहीं और दहाई रिक्त होकर भी कोई रिक्तता नहीं ..!!!!
समय हंस से उसके पखेरू कुतरकर उसकी उड़ान समाप्त कर सकता है।किंतु उसके विवेकी नीर-क्षीर पृथक करने की क्षमता को कभी समाप्त नही कर सकता  है।
संकल्पों के कभी विकल्प नही होते,विकल्पों के सदैव अनन्त संकल्प जो होते है।एकमेवता संकल्पता की शिद्धि  है,जिसके समक्ष विवेक और श्रेष्ठता की परिशिष्ठता समाप्त हो जाती है ।
कुछ अनुभूतियां आजन्म समाप्त नही होती हैं,जैसे किसी का होना-न होना।अदृश्यता में दृश्यता व भास-आभाष से मुक्त अनुभूति भी एक सजीव आभा है ।
श्रेष्ठता परिमापन की असल आजतक कोई इकाई नही बनी है,वह तो हम लोंगो की नजर है जो...लाभ-हानि से जोड़कर श्रेष्ठता व निष्ठता का स्वभाव अनुसार परिमापन किया करती है ।

 ।। श्रद्धा_पुष्प_आभा_के_स्वमेवी_एकाकी भाव के साथ,स्वयं को साक्षात भावव्यक्ति पूर्ण होने पर ..प्रथम से आज १३ वर्षीय पूर्ण होने पर बधाई के साथ श्रद्धांजलि ।।
                       🙌🌷🎭
                   ~  जितेंद्र सिंह तोमर '५२से'
                        चम्बल मुरैना मप्र .

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

फूलन का आत्मसमर्पण

5 दिसंबर, 1982 की रात मोटर साइकिल पर सवार दो लोग भिंड के पास बीहड़ों की तरफ़ बढ़ रहे थे. हवा इतनी तेज़ थी कि भिंड के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र चतुर्वेदी की कंपकपी छूट रही थी.
उन्होंने जींस के ऊपर एक जैकेट पहनी हुई थी, लेकिन वो सोच रहे थे कि उन्हें उसके ऊपर शॉल लपेट कर आना चाहिए था.
मोटर साइकिल पर उनके पीछे बैठे शख़्स का भी ठंड से बुरा हाल था. अचानक उसने उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा, 'बाएं मुड़िए.' थोड़ी देर चलने पर उन्हें हाथ में लालटेन हिलाता एक शख़्स दिखाई दिया.

वो उन्हें लालटेन से गाइड करता हुआ एक झोपड़ी के पास ले गया. जब वो अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर झोपड़ी में घुसे तो अंदर बात कर रहे लोग चुप हो गए.

साफ़ था कि उन लोगों ने चतुर्वेदी को पहले कभी देखा नहीं था. लेकिन उन्होंने उन्हें दाल, चपाती और भुने हुए भुट्टे खाने को दिए. उनके साथी ने कहा कि उन्हें यहां एक घंटे तक इंतज़ार करना होगा.
थोड़ी देर बाद आगे का सफ़र शुरू हुआ. मोटर साइकिल पर उनके पीछे बैठे शख़्स ने कहा, 'कंबल ले लियो महाराज.' कंबल ओढ़कर जब ये दोनों चंबल नदी की ओर जाने के लिए कच्चे रास्ते पर बढ़े तो चतुर्वेदी के लिए मोटर साइकिल पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो रहा था रास्ते में इतने गड्ढे थे कि मोटर साइकिल की गति 15 किलोमीटर प्रति घंटे से आगे नहीं बढ़ पा रही थी.
वो लोग छह किलोमीटर चले होंगे कि अचानक पीछे बैठे शख़्स ने कहा, 'रोकिए महाराज.'
वहां उन्होंने अपनी मोटर साइकिल छोड़ दी. गाइड ने टॉर्च निकाली और वो उसकी रोशनी में घने पेड़ों के पीछे बढ़ने लगे. अंतत: कई घंटों तक चलने के बाद ये दोनों लोग एक टीले के पास पहुंचे.
चतुर्वेदी ये देख कर दंग रह गए कि वहां पहले से ही आग जलाने के लिए लकड़ियाँ रखी हुई थीं. उनके साथी ने उसमें आग लगाई और वो दोनों अपने हाथ सेंकने लगे.
राजेंद्र चतुर्वेदी ने अपनी घड़ी की ओर देखा. उस समय रात के ढाई बज रहे थे. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर चलना शुरू किया.
अचानक उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी, 'रुको.' एक व्यक्ति ने उनके मुंह पर टॉर्च मारी. तभी उनके साथ वहाँ तक आने वाला गाइड गायब हो गया और दूसरा शख्स उन्हें आगे का रास्ता दिखाने लगा.
वो बहुत तेज़ चल रहा था और चतुर्वेदी को उसके साथ चलने में दिक़्क़त हो रही थी. वो लगभग छह किलोमीटर चले होंगे. पौ फटने लगी थी और उन्हें बीहड़ दिखाई देने लगे थे.

राजेंद्र चतुर्वेदी याद करते हैं, ''उस जगह का नाम है खेड़न. वो टीले पर चंबल नदी के बिल्कुल किनारे है. पौ फट रही थी. हमारे साथ का आदमी आगे बढ़कर करीब 400 मीटर तक गया. उसने मुझसे कहा कि मैं ऊपर पहुंच कर आपको लाल रुमाल दिखाउंगा. जब आप यहाँ से चलना शुरू करना.''
चतुर्वेदी ने कहा, ''कुछ देर बाद उसका हिलता हुआ लाल रुमाल दिखाई दिया. मैंने धीरे-धीरे चलना शुरू किया. जब मैं टीले के ऊपर पहुंचा तो बबूल के झाड़ के पीछे से एक लंबा शख़्स बाहर निकला. उसकी शक्ल बिल्कुल जीसस क्राइस्ट से मिलती जुलती थी. उसने मान सिंह कह कर अपना परिचय कराया. उसने आगे आकर मेरे पैर छुए और मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया.''

''तभी झाड़ से नीले रंग का बेलबॉटम और नीले ही रंग का कुर्ता पहने हुए एक महिला सामने आईं. उनके कंधे तक के बाल थे जिसे उन्होंने लाल रुमाल से बाँध रखा था. उनके कंधे से राइफ़ल लटक रही थी. उनकी शक्ल नेपाली की तरह लग रही थी. पूरी दुनिया में दस्यु संदरी के नाम से मशहूर फूलन देवी ने मेरे पैर पर पांच सौ एक रुपए रख दिए.''
चतुर्वेदी ने बात शुरू की, ''मैं आप के घर होकर आ रहा हूँ.' कब? फूलन ने झटके में पूछा. पिछले महीने, राजेंद्र चतुर्वेदी ने जवाब दिया. मुन्नी मिली? फूलन का सवाल था. राजेंद्र चतुर्वेदी ने जवाब दिया- न सिर्फ़ आपकी बहन मुन्नी बल्कि मैं आपकी मां और पिता से भी मिलकर आ रहा हूँ.
उन्होंने फूलन को पोलोरॉएड कैमरे से ली गई अपनी और उसके परिवार की तस्वीरें दिखाईं. उन्होंने ये भी कहा कि वो उनकी आवाज़ें भी टेप करके लाए हैं. जैसे ही फूलन ने टेप रिकॉर्डर पर अपनी बहन की आवाज़ सुनी, उनका सारा तनाव हवा हो गया.
अचानक फूलन ने पूछा, 'आप मुझसे क्या चाहते हैं?' चतुर्वेदी ने कहा, ''आप को मालूम है मैं यहाँ क्यों आया हूँ. हम चाहते हैं कि आप आत्मसमर्पण कर दें. इतना सुनना था कि फूलन आग बबूला हो गई. चिल्ला कर बोली, ''तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हारे कहने भर से हथियार डाल दूँगी. मैं फूलन देवी हूँ. मैं इसी वक़्त तुम्हें गोली से उड़ा सकती हूँ.''
पुलिस अधीक्षक राजेंद्र चतुर्वेदी को लगा कि नियंत्रण उनके हाथ से जा रहा है. फूलन के रौद्र रूप को देखते हुए मान सिंह ने तनाव कम करने की कोशिश की. उसने चतुर्वेदी से कहा, आइए मैं आपको गैंग के दूसरे सदस्यों से मिलवाता हूँ. एक-एक कर मोहन सिंह, गोविंद, मेंहदी हसन, जीवन और मुन्ना को चतुर्वेदी से मिलवाया गया.
अचानक फूलन का मूड फिर ठीक हो गया. जब दोपहर हुई तो फूलन ने उनके लिए खाना बनाया. रोटी सेंकते हुए ही उन्होंने पूछा, ''अगर मैं हथियार डालती हूँ तो क्या आप मुझे फाँसी पर चढ़ा दोगे?' चतुर्वेदी ने कहा, ''हम लोग हथियार डालने वालों को फाँसी नहीं देते. अगर आप भागती हैं और पकड़ी जाती हैं तो बात दूसरी है."
फूलन ने उन्हें बाजरे की मोटी-मोटी रोटियाँ, आलू की सब्ज़ी और दाल खाने के लिए दी. चतुर्वेदी ने सोचा कि अगर वो पोलेरॉयड कैमरे से फूलन की तस्वीर खींचे तो शायद उसे अच्छा लगे. उन्होंने तस्वीर खींच कर जब उसे फूलन को दिखाया तो वो चहक कर बोलीं, ''आप तो जादू करियो.''
फूलन ने गैंग के सभी सदस्यों को चिल्ला कर बुला लिया और पोलेरॉयड कैमरे से खींची गई अपनी तस्वीर दिखाने लगीं. चतुर्वेदी वहाँ 12 घंटे रहे. उन्होंने फूलन और उनके साथियों की तस्वीर खींची.

फूलन ने उन्हे अपनी माँ के लिए एक अंगूठी दी थी जिसमें एक पत्थर हकीक लगा हुआ था. चलते-चलते फूलन के दिमाग़ ने फिर पलटी खाई. वो बोलीं, ''इस बात का क्या सबूत है कि आपको मुख्यमंत्री ने ही भेजा है.''
चतुर्वेदी याद करते हैं, ''मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ अपना एक आदमी कर दीजिए. मैं उसे ख़ुद मुख्यमंत्री के पास ले जाकर उनसे मिलवाऊंगा. फूलन ने एक व्यक्ति को मेरे साथ लगा दिया.''
''शाम को हमने वहाँ से चलना शुरू किया और दो बजे रात को हम भिंड पहुंचे. मैंने तुरंत मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को फ़ोन मिलाया. वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार कर रहे थे. मैंने सिर्फ़ इतना कहा, 'सर टू डाउन डन.''
टू डाउन हमारा कोड वर्ड था. मैंने उनसे कहा, सर मैं सुबह छह बजे ग्वालियर से दिल्ली की फ़्लाइट पकड़ रहा हूँ. मैंने फूलन के उस साथी के लिए भी टिकट ख़रीदा. इंडियन एयरलाइंस के अधिकारियों से अनुरोध किया कि हमें बिज़नेस क्लास में अपग्रेड कर दें. दिल्ली हवाई अड्डे से हम टैक्सी में बैठकर मध्य प्रदेश भवन पहुंचे.

चतुर्वेदी ने बताया, ''वहां मैंने अपने और फूलन के साथी के लिए कमरा बुक करा दिया था. अर्जुन सिंह ने अपनी दाढ़ी तक नहीं बनाई थी. वो अपने कमरे में बैठे चाँदी के गिलास में संतरे का जूस पी रहे थे. मैंने उन्हें पोलोरॉएड कैमरे से खीचीं गई फूलन की तस्वीरें दिखाईं. मैंने कहा उनके एक आदमी मेरे साथ आए हैं और मेरे कमरे में बैठे हुए हैं.''
उन्होंने फ़ौरन उन्हें बुलवा लिया. उन्होंने देखते ही अर्जुन सिंह के पैर छुए. मैंने उन्हीं के सामने उनसे कहा कि अब तो आपको विश्वास हो गया कि मुझे मुख्यमंत्री ने ही भेजा था.'
उसके बाद फूलन के उस आदमी को वापस एक गार्ड के साथ वापस फूलन के पास भिजवाया गया. एक बार अर्जुन सिंह चतुर्वेदी को ले र दिल्ली पहुंचे. उन्होंने राजीव गांधी को संदेश भिजवाया कि उनके पास उनके लिए एक अच्छी ख़बर है.
राजेंद्र चतुर्वेदी को अभी तक याद है, ''हम लोग उनसे मिलने एक, सफ़दरजंग रोड गए थे. राजीव गाँधी ने ये समाचार सुनते ही मेरे कंधे थपथपाए और हमें अंदर के कमरे में ले गए. वहां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गुलाबी रिम का पढ़ने का चश्मा पहने बैठी हुई थीं.''
चतुर्वेदी ने कहा, ''मैंने उन्हें देखते ही सेल्यूट किया. अर्जुन सिंह ने उनसे मेरा परिचय कराया और बोले ये आपके लिए कुछ लाए हैं. जैसे ही उन्होंने फूलन के साथ मेरी तस्वीरें देखी, वो बोलीं, 'शी इज़ नॉट वेरी गुड लुकिंग.' फिर वो बोलीं आप आगे बढ़िए. हम आपके साथ हैं.''

इस बीच राजेंद्र चतुर्वेदी की फूलन देवी से कई मुलाक़ातें हुईं. एक बार वो अपनी पत्नी और बच्चों को फूलन देवी से मिलाने ले गए. फूलन देवी अपनी आत्मकथा में लिखती हैं, ''चतुर्वेदी की पत्नी बहुत सुंदर और दयालु थीं. वो मेरे लिए शॉल, कपड़े और कुछ तोहफ़े लेकर आई थीं. वो अपने साथ घर का बना खाना भी लाई थीं. '
मैंने राजेंद्र चतुर्वेदी से पूछा कि अपनी पत्नी को फूलन के सामने ले जाने की वजह क्या थी ? उनका जवाब था, ''फूलन को दिखाना चाहता था कि मैं उन पर किस हद तक विश्वास करता हूँ. बदले में क्या वो भी मुझ पर इतना विश्वास करेंगीं? बहरहाल वो उनसे मिल कर बहुत ख़ुश हुई थीं.''
चतुर्वेदी ने फूलन से पूछा, कब समर्पण करने जा रही हैं आप? फूलन का जवाब था, ''छह दिनों के भीतर.'' चतुर्वेदी की नज़र कैलेंडर पर गई. छह दिनों बाद तारीख थी, 12 फ़रवरी 1983.
समर्पण वाले दिन फूलन ने घबराहट में कुछ नहीं खाया और न ही एक गिलास पानी तक पिया. पूरी रात वो एक सेकंड के लिए भी नहीं सो पाईं. अगली सुबह एक डॉक्टर उन्हें देखने आया. फूलन के साथी मान सिंह ने उनसे पूछा, ''फूलन को क्या तकलीफ़ है?' डाक्टर का जवाब था तनाव. इसको वो बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं.
कार में बैठते ही फूलन ने चतुर्वेदी से अपनी राइफ़ल वापस माँगी. चतुर्वेदी ने कहा, नहीं फूलन अपने आप को ठंडा करो. फूलन इतनी परेशान थीं कि उन्होंने चतुर्वेदी के बॉडीगार्ड से उसकी स्टेन गन छीनने की कोशिश की. उसने फूलन को समझाया कि ऐसी हिमाकत दोबारा न करें, नहीं तो चतुर्वेदी और उनकी दोनों की बहुत बदनामी होगी.
डाक बंगलों के बाथरूम में फूलन ने अपने बालों में कंघी की. अपने माथे पर लाल कपड़ा बांधा और अपने मुंह पर ठंडे पानी के छींटे मारे. पुलिस की ख़ाकी वर्दी पहन कर उसके ऊपर लाल शॉल ओढ़ी.जब वो बाहर आईं तो पुलिस वालों ने उन्हें उनकी राइफ़ल वापस कर दी. उसमें कोई गोली नहीं थी. लेकिन उनकी गोलियों की बेल्ट में सभी गोलियां सलामत थीं. वो चाहतीं तो एक सेकेंड में अपनी राइफ़ल लोड कर सकती थीं.
तभी राजेंद्र चतुर्वेदी ने अर्जुन सिंह के आगमन की घोषणा की. फूलन मंच पर चढ़ीं उन्होंने अपनी राइफ़ल कंधे से उतार कर अर्जुन सिंह के हवाले कर दी. फिर उन्होंने कारतूसों की बेल्ट उतार कर अर्जुन सिंह के हाथ में पहना दी.
बगल में खड़े एक पुलिस अफ़सर ने फूलन को इशारा किया. उसने अपने दोनों हाथ जोड़ कर माथे के ऊपर उठाया. पहले उसने अर्जुन सिंह को नमस्कार किया और फिर सामने खड़ी भीड़ को. अफ़सर ने फूलन को फूलों का एक हार दिया. फूलन ने वो हार अर्जुन सिंह के गले में पहना दिया.
जब वो ऐसा कर रही थीं तो उस अफ़सर ने उन्हें रोक कर कहा कि हार उन्हें गले में न पहना कर उनके हाथ में दिया जाए. फूलन ने सवाल किया, क्यों? अर्जुन सिंह मुस्कराए और बोले, ''उन्हें गले में हार पहनाने दीजिए.' फिर फूलन ने एक और हार उठाया और मेज़ पर रखे दुर्गा के चित्र के सामने रख दिया.....



गुरुवार, 16 मार्च 2023

रुअर की पटिया

===चम्बल एक सिंह अवलोकन===
                  भाग-१०९
          ★रुअर की पटिया★    
          
बीहड़..!!!
हां वही बीहड़,जिनकी तुलना हम बीहडियो-गंवारों के लिए किसी चमत्कृत धाम से कम नही है।हम मैदानी बीहडियो के पूर्वजो की यंहा कर्मठ आभा बिखरी पड़ी है।उसी आभा से मस्तक पर अभिषेक कर हम मलेक्षों को कई बार रौंद चुके हैं।इसी बीहड़ की माटी में सिर्फ लड़ाके ही नही अपितु धर्मध्वजा के साथ-साथ सनातन आस्था के भी अकूत किस्से सुनने को मिल जाते है ।

 आज कुछ ऐसा ही किस्सा एक पाषाणकालीन शिला का जो कभी न्याय का प्रतीक हुआ करती थी,और आज भी यंहा के लोग अपनी बात की सत्यता प्रमाणित करने को इस शिला पर चलकर शपथ उठाने की बोलने से नही चूकते हैं। जो आज एक कहावत के रूप में प्रायः जुबान पर आ ही जाती है ।
"चलो रुअर की पटीआ पे कसम खाई लें!"
 
किस्सा लगभग 700-800 वर्ष पूर्व का है,अम्बाह-पिनाहट मुख्य राजमार्ग से 5 किलोमीटर उत्तर-पक्षमी बीहड़,चम्बल तलहटी की तरफ एक ग्राम स्थिति है। 'रुअर' सघन क्षत्रिय बाहुल्य आवादी का यह गांव आज सेकड़ो छोटे-छोटे मझरों(पुरों,भागों)में विभक्त हो चुका है।कालांतर में इस का बहुत नाम रहा है,फिर चाहे क्रांति में अथवा 'भडीआई'(चोरी का क्षेत्रीय नाम)में ख्यात कुख्यात रहा है। सिंधिया  रियासत काल में अगर कोई लश्कर से ऊंट-घोड़े साज-सामान चुराने का जिगर रखता था ,तो वह 'रुअर के भडीआ' ही थे।जो तात्कालीन रियासत को चुनोती देकर 'पनिहाई' (लुटे गए माल को बापस लौटाने की एवज में मिला/दिया धन)ले लिया करते थे।
इस गांव की कुछ पृकृति ही ऐसी है कि यंहा गुप्त को लुप्त होते देर नही लगती थी।इसी बीहड़िया गांव के हटी ग्रामीणों ने सिंधियाओ के 'नाक में कोड़ी' पहना रखी थी ।

ज्येष्ठ माह के दशहरे का समय था।जैसा कि प्रचलन है,हर कोई नदीस्नान अथवा पर्व को जाता है। ठिकाने से कुछ बच्चे पर्व लेने चम्बल किनारे गए,बालसुलभ जलक्रीड़ा करते-करते उनको एक शिला जल में तैरती हुई मिली...जिसे वह टनों भारी बजन की परवाह किये बिना कन्धों पर गांव तक ले आये।जब ग्रामीणों ने यह देखा कि छोटे-छोटे बालक इतना भारी पत्थर किस तरह रख लाये?सावधानी बस उन्होंने बच्चों से शिला लेनी चाही तो नही ले पाए और इसे चमत्कार ही कहिये या संयोंग दो खड़े पत्थरों पर वह शिला रख दी ,जिसे आजतक कोई टस-मस नही कर पाया है।वह अठिग शिला आज भी वंही आधी सदी से अधिक समय बाद भी अडिग है।
जैसा कि प्रचलन है,कोई भी असाधारण बात प्रायः चमत्कार से जोड़कर देखने की हम सनातनियों पृकृति रही है।अतः यह शिला आस्था का केंद्र बन गयी और इस के स्थान पर धीरे-धीरे सच-झूठ की कसमें उठाये जाने लगी। बुजुर्ग कहते हैं कि इस 'पटिया' पर जिसने भी झूठी सपथ ली उसका तत्तक्षण दुष्प्रभाव भुगतना पड़ा था। धीरे-धीरे, चलते-चलते यह स्थान इसी तरह बातो से प्रशिद्ध हुआ और कुछ जनहानि भी हुई तो ब्रिटिश कालीन 'जिला तंवरघार'  सेशन जज द्वारा इस स्थान पर कसम उठाने पर पाबन्दी लगा दी। जिससे धीरे-धीरे कसम उठाने की बात बन्द हो गयी।

आम जनश्रुति है कि शपथ लेने से पूर्व इस स्फटिक को गाय के दुग्ध से स्नान कराया जाता था।ततपश्चात अगर किसी ने मिथ्यासपथ ली तो यह स्फटिक रक्तवर्णीय होकर संकेत देती थी,अगर सपथ सच है तो शिला प्रतिक्रिया विहीन रहती थी।
यह चमत्कारी शिला आज भी उन्ही पत्थरों के आधार पर टिकी है और आस्था व जनश्रुतियों का केंद्र है।जिसपर ग्रामीणों द्वारा एक छोटा मन्दिर भी निर्मित है ।
शिला पर टँगे हुए सैकड़ों बागी/दस्युओं के बड़े-बड़े घण्टे घड़ियाल आज भी हैं,प्रतिवर्ष मेले लगतें हैं। अब लोग शपथ की सत्यता तो नही परखते किन्तु मन की मनोकामनाएं आज भी अनवरत जारी हैं।

आज भी इस शिला के पूर्वकालिक यश व सम्मति की झलक प्रचलित कहावत "में तो अपनी बात सांची साबित करबे को रुअर की पटिया पे कसम उठाए लेगों" में स्पष्ट दिखती हैं।

यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यंहा चम्बल में जलीय जीवों पर सेकड़ो मीडिया के कैमरे प्रायः घूमते रहते हैं।किंतु सनातन आस्था व न्याय की प्रतीक यह शिला आज भी किसी आखर अथवा चलचित्रीय धनलोलुप मीडिया के कैमरे या आर्टिकल से बाहर है।

यहाँ जब-जब कोई जवान वीरगति को प्राप्त होता है,बड़े-बड़े अधिकारी, लेते,बड़े-बड़े पेट लेकर इधर से बिना डकारे गुजर जाते रहें हैं।किन्तु न्यायिक आस्था के केंद्र से आजतक सभी का व्यवहार उपेक्षित ही रहा है ।

जय गोपाल जी की 🙏
(शिला का चित्र साभार भैया दीपक सिंह जी तोमर 'उसेद'! प्रस्तुत विवरण बुजुर्गों से सुनी बातों व प्रचलित जनश्रुतियों पर आधारित)
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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

मेरी गजलें

ये महीना भी गया,वह साल भी गुजर जाएगा,,
रंगमंच के पर्दे से हर किरदार नजर आएगा!

घटती रहेंगी सांस-दर-सांस उम्र की नजाकते ,
सांस,सांस-साँसों का काफिला गुजर जाएगा!

राह चलते आईने में अक्स निहार गुजरी दुनिया,
एकदिन अक्स से रूह का भरम भी हट जाएगा!

वक्त ने सौगात की खुशियां हँसे-हंसकर के दिल,
वक्त बदला,ले खुशी से,ये वक्त भी निकल जाएगा!

हो सके संजों लो जिंदगी के सुनहरे पल कशिश से,
जज्बा-जज्बात और जन्नत,एक पल में पा जाएगा!

बड़ा अनुख है जिंदगी का पल ,नायाक-नालायक,
कभी सर्द कभी उष्ण बन फिर तपायेगा-सताएगा!!
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'अ'सफल

बुधवार, 18 जनवरी 2023

चम्बल एक सिंह अवलोकन भाग 108

अम्बाह कस्बे के पूठ गांव से करीब 100 मीटर पहले ही एक लगभग 500 वर्ष या उससे पुरानी जग्गा (शैवमत की उपमठ) है। यह जग्गा अपने-आप में ऐतिहासिक-प्रागेतिहासिक महत्वों के साथ-साथ श्रद्धा व सनातन साधकों जीवंत प्रमाण भी है ।
प्रथम दृष्टि में देखने पर वास्तुशिल्प व निर्मित ढांचे के अनुसार यह स्थान,लोक प्रचलित स्थापना से कंही हटकर ८०० अथवा इससे कहीं अधिक वर्ष पूर्व का प्रतीत होता है। क्योंकि इसमें और प्रतिहार कालीन ग्वालियरगढ़ वास्तुकला,वास्तुशिल्प व वास्तु शिल्प सामग्री सेंकडो समानताएं मिल जाएंगी  ।
अस्तु!
करीब 25 एकड़ जगह पर अडिग खड़े हुए इस तपोमढ़ मे सैकड़ों कक्ष व दक्षिण-पश्चिमी भाग के मध्य में श्रीराम-जानकी-लक्ष्मण जी की संयुक्त मूर्तियां है।जिनपर पुरातन समयातीत  कई ऐतिहासिक महत्व के उल्लेखित ताम्रपत्र महंत श्री नारायण दास जी के पास सुरक्षित हैं।
कभी शैव साधकों से लेकर क्रान्तिकारियों व सिंधियाओं की अगाध श्रद्धा केंद्र रहा मठ आज उपेक्षित सा खड़ा है। लोग आते हैं और 500 वर्षों से सतत धुनित अखण्ड धूनी आभा की परिक्रमा कर मनोती करते हैं और अतिशीघ्र लाभ प्राप्तकर विस्मरण कर देते हैं ।
एक प्रचलित जनश्रुति व बुजुर्गों के अनुसार सिंधिया सामन्त से रियासतदारी तक दत्तक सन्तान  मुक्ति का प्रमाणिक किस्सा बड़ा रोचक है।इसको जानने-समझने हेतु थोड़ा संक्षिप्त सा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करना मुझे आवश्यक लगता है ।

ग्वालियर का सिंधिया 'राजवंश' राणोजी सिंधिया द्वारा स्थापित किया गया था।यह महाराष्ट्र स्थिति सतारा जनपद में कान्हेरखेड़ गांव के जानकोजीराव  के पुत्र थे । सिंधिया 'शिंदे' का ही   ब्रिटिशों की वाक शैली द्वारा उतपन्न अपभ्रंसित 'सरनेम' है। सन 1818 के तीसरे मराठा युद्ध मे ब्रिटिश भारतीय शाशन के गवर्नर-जनरल लाडहेगेन्स्टिन द्वारा मराठाशक्ति पूरी तरह तहस-नहस कर दीया था,और सिंधियाओं कि बागडोर दौलतराव सिंधिया के हाथ आ गयी।दौलतराव  बिट्रिशो के समक्ष घुटने टेके व भारत के भीतर अंग्रेजी रियासत के रूप रहने को तैयार हो गए।मराठा सरदारों में दौलतराव सिंधिया ने अंग्रेजों के साथ मिलकर,उज्जैन से लश्कर होते हुए ग्वालियर पर आधिपत्य करते हुए,राजधानी बना लिया गया ।
दौलतराव सिंधिया की मृत्यु उपरांत उनकी बिधवा रानी बैजाबाई ने साम्राज्य चलाया और बिट्रिश सत्ता  हस्तांतरण से बची रही। 
एक बड़ी रौचक बात हैं की वाडियार वंश की तरह ही सिंधिया वंश भी सन्तानोतपत्ति से वंचित था।बैजाबाई के दत्तकपुत्र जानकोजीराव ने सत्ता संभाली,1843 जानकोजीराव की मृत्युपरांत पुनः एक दत्तक पुत्र लिया गया।जयाजीराव द्वारा कुल 4 विवाह कृमशः1848 चिमनाराजे,1852 लक्ष्मीबाई राजे,1873 बायूबीबाई राजे, व मृत्यु से कुछ दिन पूर्व ही रानी साक्याराजे के साथ...जिन्ही से एक सन्तान बाबा श्री मंगलाचार्य जी की आशीषभरी गालियों से प्राप्त हुआ।

किस्सा यह की श्रीटीलाद्वारपीठनामक,श्रीरामन्दमहापीठाचार्य श्री श्री ११०८ मंगलचार्य जी ख्याति उस समय इतनी हुआ करती थी,की लोग दूर-दूर से -उनके द्वारा प्रकट की अग्नि से उतपन्न धूनी की धोक लगाने आया करते थे। चंहुओर से हताश सिंधिया जब अपनी चौथी पत्नी से विवाह कर चुके तो उनको भी किसी ने महाराज जी द्वारा धुनि व उसकी परिकृमा का वक्तव्य कह सुनाया। राजा-रानी हाथी आदि फ़ौज के साथ आये तो बाबा जी ने 'कायर' व दुष्ट-पापी जैसे कटुशब्दो से नबाजकर भगा दिया।
ग्रामीणों के अनुसार पुनः सिंधिया दम्पत्ति दण्डबत करते हुए करीब 500 मीटर की दूरी तह करके आये तब मन्दिर में प्रवेश करने दिया था। पग-पखारन व आजन्म ईश्वरभक्ति में तल्लीन रहने के उपरांत महाराज ने उपहार स्वरूप एक गाली दी 'जा निपूत जाई,अब कभी अपना भोंडा(मुंह) मत दिखाना!'
कहते हैं कि इस वाकये के कुछ समय उपरांत रानी गर्भिणी तो हुई किन्तु राजा चल बसे। साकयाराजे से सिंधिया परिवार पहली उतपन्न सन्तान मिली और लगातार दत्तक पुत्रो का सिलसिला टूटा,आगे चलकर इसी सन्तान का नाम 'जीवाजी राव' रखा गया।

इस समस्त क्षेत्र में महाराज मङ्गलाचार्य जी से हजारों किस्से-किबदन्ति व जनश्रुतियां है।किंतु उनकी आयु ठीक से किसी को ज्ञात नही है।
महाराज जी द्वारा प्रकट की गई अखण्ड धूनी आज भी करीब 500 वर्षों से रमी हुई है,वंही पास में उनका चीमटा,त्रिशूल भी स्थापित है। जिससे हजारों लोगों की मंशाएं पूर्ण हो चुकी है ।
सनद रहे यह वही उपमठ है ,जिसमे विनोद खन्ना-कबीर बेदी अभिनीत 'कच्चे धागे' फ़िल्म व डाकू पुतली बाई से लेकर कई दस्यु आधारित फिल्म फिल्माई जा चुकी है। इसी मठ पर विनोदखन्ना कभी घण्टो भजन करके नृत्य भी कर चुके थे।

इस मठ के कुछ भागो का अधूरा निर्माण से पुनर्निर्माण व जीर्णोद्धार भी किया गया था,मन्दिर न्यास से करीब 51 बीघे पुख्ता जमीन जुड़ी हुई है। यह मंदिर न्यास्ट्रस्ट अंतर्गत आता है,जो कि जिलाधाकारी द्वारा संरक्षित है।
सन 1999 में इस मठ को पुरातत्व संरक्षित स्थान भी घोसित किया जा चुका है,...किन्तु यह हताश करने बाली बात है कि जगह-जगह उखड़ती हुई मन्दिर विशाल प्रवेश द्वार की ककैया ईंटें व पुरातन समय का मसाला अपनी बुनियादों से लगातार चूना छडा रँहा है। 

लोग आते हैं,चले जांते है..अखण्डधूनी से मनोकामना भी रखते हैं और पूर्ण होने पर आभार व्यक्त करने भी आते हैं,किन्तु नही आता कोई इस तपोस्थल,ऐतिहासिक स्थान व 'मङ्गलाचार्य जी महाराज ' तपोस्थल की सुधि लेने ...!!

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जितेंद्र सिंह तौमर '५२से'
चम्बल मुरैना मप्र

सोमवार, 15 अगस्त 2022

कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया जी

लाल सेना के संस्थापक - महान क्रान्तिकारी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया

ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लाल सेना तैयार कर एक युवक अर्जुन सिंह भदौरिया ने न केवल इटावा जनपद बल्कि सीमावर्ती जिलों को भी आजादी के संघर्ष की चेतना से ऐसा जोड़ा कि घर-घर में स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा

10 मई 1910 को बसरेहर के लोहिया गांव में जन्मे अर्जुन सिंह भदौरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था . 1942 में उन्होंने सशस्त्र लालसेना का गठन किया. बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए. 

1940 के दशक में, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने तीन साल (1941-44) तक चंबल की घाटियों के किनारे यमुना के किनारे रहने और पनपने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाते हुए एक सशस्त्र समूह लाल सेना का गठन किया था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना की तर्ज पर भारत छोड़ो आंदोलन के समय लाल सेना बनाने के बाद 'कमांडर' की उपाधि अर्जित की।  

आजादी के योद्धा कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने चंबल घाटी में हजारों क्रांतिकारियों को ट्रेनिंग देकर फिरंगी सरकार की चूलें हिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति का सबसे उम्दा प्रयोग किया था. करो या मरो आंदोलन के दौरान कमांडर को 44 वर्ष की सजा हुई और अपने पूरे जीवनकाल में वह करीब 52 बार जेल गए.

उन्होंने दो स्तरों पर काम किया - एक ओर वे एक गांधीवादी थे, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने लाल सेना की स्थापना की, जिसने लोगों को राजस्व, खाद्यान्न और हथियार जैसी ब्रिटिश संपत्ति लूटने के लिए प्रशिक्षित किया।  जबकि पैसे और हथियारों का कुछ हिस्सा समूह चलाने और खाद्यान्न खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया था, शेष पैसे का इस्तेमाल गरीबों को खिलाने के लिए किया गया था, ”।

अर्जुन सिंह के साहस से ब्रिटिश शासन तंग आ चुका था, लिहाजा जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो उन्हें बेडिय़ों से बांधकर रखा गया था। कोर्ट में मुकदमा चला और उन्हें 44 साल की कड़ी सजा सुनाई गई। आचार्य नरेंद्र देव चंबल के इस क्रांतिकारी संगठन से प्रभावित हुए और उन्होंने ही पहली बार अर्जुन सिंह भदौरिया को 'कमांडर' कहकर संबोधित किया। करो या मरो के आंदोलन में उन्हें 44 साल की कैद हुई. अंग्रेज इनसे इतने भयभीत थे कि उन्हें जेल में हाथ-पैरों में बेड़ियां डालकर रखा जाता था.

यही कारण रहा की आजाद भारत में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया 1957, 1967 और 1977 में इटावा से लोकसभा सांसद चुने गए. इटावा मे शैक्षिक पिछड़ेपन की समस्या, आवागमन के लिए पुलों का आभाव जैसी तमाम सरोकारी समस्याओं को वे सदन में प्रमुखता से उठाते रहे. कमांडर ने इसी जज्बे से आजाद भारत में आपातकाल का जमकर विरोध किया. तमाम यातनाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, जिससे प्रभावित क्षेत्र की जनता ने सांसद चुन कर उन्हे सर आंखों पर बैठाया. वे आपातकाल में पुनः जेल भेज दिए गए। उन्होंने किसान पंचायत के संगठन में विशेष रुचि ली और स्वामी भगवान, गेंदा सिंह, मुलखी राज, सूरजदेव, रामधारी शास्त्री और बलवान सिंह के साथ मिलकर सशक्त किसान आंदोलन खड़ा किया। 🇮🇳

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

टेडी डे

रोजमर्रा ज़िंदगी की जूतम-लात से दो-चार, हम ख़ुद को अब कितना भी बड़ा-बुजु़र्ग क्यों ना महसूस करते हों....पर अयोध्या से लखनऊ की तरफ आते-जाते हुए हाइवे के किनारे-किनारे ऊंचे-नीचे, छोटे-बड़े तमाम कद-काठी के रंग-बिरंगे टेडीवेयर्स की वो बस्तियां...भले ही कुछ पल को सही, पर हम सबकी नोटिस में तो ज़रूर आईं होंगी।

तो बात यही 5-6 साल पुरानी है। जब लखनऊ से वापस आते हुए, एक ऐसी ही बस्ती के साइड से गुज़रते हुए, मैं बेसब्र हो पड़ी। भाई ने मुझे मचलते देख खासी दिलेरी दिखाई और गाड़ी को साइड लगाते हुए पूछा, "लेना है?" 
मैंने पलभर की देर किए बिना, भरसक मुस्कुराहट के साथ आंखें चमकाते हुए पूरा सिर 'हां' में हिलाया। उन्होंने पूछा, "कौन-सा लोगी?" मैंने झट से फुटपाथ पर काफी दूर तक नज़र डाली। 

'एक सबसे बड़े वाले टेडी पे नज़र गई, कितना बड़ा-सा...उसकी तो गोद में भी बैठा जा सकता है। फिर वो वाला बंदर दिखा, जो एक हाथ से रस्सियों से लटकते हुए चिढ़ा रहा था। फिसलती हुई नज़र उस झबरे बाल वाले डॉगी पे टिक गई, जिसके कान तो बिल्कुल खरगोश के जैसे लग रहे थे। वो पिंक आंखों वाले छोटे-छोटे टेडीवेयर्स की तो पूरी फैमिली ही रूम में सजाने के लिए है। वो सीने के पास दिल संभालता हुआ रेड वाला अगर ले भी लूं, तो उसके बगल में क्रीम कलर वाला रखने पे ही वो इतना जंचेगा।' एकाएक मुझे लगा कि मैं अब काफी असहाय हाल में पड़ चुकी हूं।😟

"अरे कोई लेना भी है।" और अब भाई बेसब्र होने लगे थे।  
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ता से जगते हुए एकदम से बोल गई, "हां, सब"!!
"अच्छा-अच्छा...मतलब कोई नहीं" कहते हुए भाई ने गाड़ी स्टार्ट कर ली और अगले घंटे भर में मैं खाली हाथ घर पे थी।🥺

वो दिन और आज का दिन...आज घर में हमारे समानांतर ही कई हेल्थ-हाइट के टैडियों की भी एक पूरी फैमिली का दबदबा है। और हां मजाल है, इनमें से कोई किसी नोना बाबू से साभार प्राप्त हो!!😎

सोचा था एकदिन जब सिलेबिट्टी बनूंगी, तो अपनी ये  कलेजाफाड़क सक्सेज-स्टोरी सुनाकर, नेहा कक्करजी जैसे किसी मासूम को रुलाऊंगी। ईश्वर की कृपा से आज वो मासूम लोग आप हो, और वो सिलेबिट्टी मैं।।😌🙏(सिलेबिट्टी ग्रुप से सर्टिफाइड)

#टेडी_डे

~RJ. रश्मि सिंह जी

शनिवार, 29 जनवरी 2022

इतिहास सोमनाथ युद्ध हमीर सिंह गोहिल

#वीर_हमीरसिंह_गोहिल
#सोमनाथ_का_शूरवीर

सोमनाथ मंदिर के ठीक सामने एक भाला धारी घुड़सवार की प्रतिमा तिराहे पर विद्यमान है, जिस पर लिखा है कि यह हमीर जी गोहिल की मूर्ति है जो सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए शहीद हुए थे। वैसे तो सोमनाथ पर सत्रह से अधिक बार आक्रमण के कारण कई लोग शहीद हुए होंगे, जिन्होंने सोरठ की उर्वर धरा में सोमनाथ की रक्षार्थ आत्माहुति दी होगी, किंतु यह वीर कोई खास होगा यह मेरे मन में पैठ गया। चूंकि गजनवी, खिलजी, तुगलक ये तो मेरे दिमाग में घूम गए किंतु यह वीर किससे और कब लड़ा होगा यह ज्ञात करना जरूरी हो गया था। जानकारी लेने पर तो लगता है उस रण बांकुरे पर आज भी लोग बिछ जाने को तैयार है। सोरठ में एक दोहा है -
"जननी जणे तो भक्त जण जे, के दाता, के सूर।
नहीं तर रहेजे वांझणी, मत गुमावजे नूर।।"

हमीर जी गोहिल भीमजी गोहिल के पुत्र थे और तीन भाइयों में सबसे छोटे, उन्हे गढाली गांव की जागीर मिली थी, एक बार अपने मझले भाई अरजण जी के साथ मुर्गों की लड़ाई के चक्कर में उनके निकल जा कह देने पर सौराष्ट्र छोड़ मारवाड़ चले गए।

दिल्ली की गद्दी पर उस समय मोहम्मद तुगलक (द्वितीय) बैठा हुआ था, जूनागढ़ के सूबेदार शम्शुद्दीन की पराजय के बाद उसने जफरखान को नियुक्त किया था। जफरखान की सीधी नजर सोमनाथ की संपदा पर थी और साथ ही वह अपने मजहब की कुंठा के कारण बुत शिकन बनना चाहता था।

जफरखान ने इसके लिए आदेश जारी किया कि अधिक संख्या में सोमनाथ में दर्शनार्थी इकट्ठा न हो। शिवरात्रि पर्व के अवसर पर जनमेदिनी तो एकत्रित होनी ही थी। जफरखान के कारकून रसूल खान के दर्शनार्थियों को रोकने पर विवाद हुआ और विवाद इतना बढ़ा कि जनता ने सैनिकों सहित रसूल खान को समाप्त कर दिया। जफरखान का आग बबूला होना स्वाभाविक था। उसने इस बहाने तमाम दलबल के साथ सोमनाथ पर चढ़ाई करने की सोची।

सोमनाथ पर आक्रमण की आशंका के चलते गढाली से मझले भाई अरजण ने हमीर को ढूंढने के लिए माणसुर गांव के गढ़वी को भेजा। हमीर जी को भाई के दुखी होने की सूचना मिली जिसपर उनका मन तुरंत चलने को हुआ, अपने दो सौ राजपूत साथियों के साथ वे दरबार पहुंच गए। धामेल के जागीरदार उनके काका वरसंग देव और बड़े भाई दूदाजी आदि के साथ उनका समय बीतने लगा, वे दूदाजी की जागीर अरठिला आ गए। यहां उनका नित्य जीवन और खेलकूद जारी था, हमीर अभी कुंवारे थे। कड़ाके की भूख लगी थी और साथियों के साथ वे दरबारगढ़ आए और (दूदाजी की पत्नी) बड़ी भाभी से खाना मांगा, तब भाभी ने कहा कि - "क्यों देवर जी इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो, क्या खाना खाकर सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जाना है?" हमीर जी ने पूछा कि भाभी क्या सोमनाथ पर संकट है? तब भाभी ने बताया कि दिल्ली का कटक निकल चुका है और सूबेदार जफरखान का दल रास्ते में है। यह बात सुनकर हमीर औचक खड़े हो गए और पूछा -"भाभी क्या बात कर रहीं हो? क्या कोई राजपूत सोमनाथ के लिए मरने निकल पड़े ऐसा नहीं? विधर्मियों की फौज चढ़ाई करेगी और रजपूती मर गई है क्या? ऐसे कई प्रश्न उन्होंने किये जिस पर भाभी ने कहा कि राजपूत तो बहुत है मगर सोमनाथ के लिए साका करे ऐसा कोई नहीं, तुम खुद राजपूत नहीं हो क्या?

भाभी की बात पर हमीर झळहला उठे। व्यंग्य भीतर तक चुभ गया। उसी समय भाभी को कहा - "मेरे दोनों बड़े भाइयों को मेरा जुहार कहना, मैं सोमनाथ मंदिर के लिए साका करने निकल रहा हूँ।" भाभी ने पछताते हुए खूब समझाया, मगर वे न माने और अपने पीछे किसी को समझाने भेजने की दुहाई देकर अपने दो सौ साथियों के साथ निकल गए। जब क्षेत्र के क्षत्रप बड़े आक्रमण से दिग्मूढ़ बने हुए थे, रजवाड़े अंतर्कलह में डूबे हुए थे तब हमीर मृत्यु का मंडप पोखने के लिए निकल पड़े।

कुंवर हमीर जी कुंवारे थे और अपने दो सौ साथियों के साथ चल पड़े, नीरव अंधेरी आधी रात को एक जगह से गुजरते हुए, जहां वायु भी रूक चुकी थी ऐसी नीरवता को चीरती एक महिला के शोकगीत गाने की आवाज सुनाई दी। झोंपड़ी में एक वृद्धा चारण गा रही थी। हमीर ने वहां जाकर पूछा कि किसके लिए यह शोकगीत गा रही हो? वृद्धा ने कहा मैं एक विधवा हूं और पन्द्रह दिन पहले दिवंगत अपने पुत्र का शोकगीत गा रही हूँ। हमीर ने कहा - "मां पुत्र के मरने के बाद भी लाड़ लड़ा कर उसका मर्शिया गा रही हो क्या तुम मेरे लिए शोकगीत गाओगी?" "मुझे मेरा शोकगीत सुनना है!" उस लाखबाई चारण ने कहा कि - "बाप यह क्या बोल रहे हो, क्या तुम्हारा जीते जी शोकगीत गाकर मुझे पाप में पड़ना है?" हमीर ने कहा - "मां हम मरण के रास्ते पर निकल चुके हैं और सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जा रहे हैं। इस रास्ते से लौटना संभव नहीं है।" चारण लाखबाई उस राजपूत युवा के शौर्य की बात सुनकर अभिभूत हो गई। उसने पूछा कि - "बेटा हमीर तुम विवाहित हो?" हमीर ने ना कहा। तब वृद्धा ने कहा -" रास्ते में जो मिले उससे विवाह कर लेना। क्योंकि कुंवारों को युद्ध में अप्सरा वरण नहीं करती।" हमीर ने कहा कि -" मां हम मृत्यु के लिए जाने वालों को कौन अपनी कन्या ब्याहेगा?"
वृद्धा ने कहा कि "बाप तुम्हारी सूर वीरता देख कोई तुम्हे अपनी पुत्री ब्याहने के लिए कहे तो मना मत करना। मेरा यह कहा जरूर निभा लेना।" यह कहकर वृद्धा सोमनाथ में राह जोऊंगी बताते हुए चल पड़ी।

हमीर को रास्ते में द्रोणगढड़ा गांव में वेगड़ा भील मिल गए जो गीर के जंगल का सरदार था उसके पास भील योद्धाओं की हजार बारह सौ की टुकड़ी थी। गीर से लेकर शिहोर और सरोड के पहाड़ तक वेगड़ा के तीरों की धाक जमी हुई थी। भील जनजाति सोमनाथ में गहरी आस्था रखते थे और जूनागढ़ के राजा की सत्ता स्वीकार करते थे। वेगड़ा के पास एक युवा कन्या थी। जिसका नाम था राजबाई। एक बार जेठवा राजपूत गीर के पूर्वी हिस्से में स्थित तुलसीश्याम के मंदिर की यात्रा पर जा रहे थे, वेगड़ा के साथ उनका सामना हो गया, युद्ध में जेठवा के मरने से पहले उसने वेगड़ा को अपनी नन्ही बालिका सौंपते हुए जिम्मेदारी दी कि इसका पालन करना और योग्य होने पर किसी राजपूत के साथ विवाह कर देना। वेगड़ा ने मरते हुए जेठवा को वचन दिया और राजबाई को पुत्री की तरह पाला।

संयोग से चारण वृद्धा लाख बाई का वेगड़ा की राह से गुजरना हुआ, वेगड़ा ने उसे रोका और किसी राजपूत की जानकारी चाही लाख बाई ने हमीर जी गोहिल के सोमनाथ के लिए साका करने निकले होने की बात बताते हुए कहा कि उसी को अपनी कन्या परणा दे।

लाखबाई के कहे अनुसार वेगड़ा ने अपने तीन सौ धनुर्धर योद्धाओं के साथ गिर के काळवानेस के निकट पड़ाव डाला। उधर से चले आ रहे हमीर जी काळवानेस के पास शिंगोड़ा नदी के किनारे पहुंचे।
बहती नदी देख हमीर जी के साथी नहाने के लिए उतर गए। नहाने के दौरान किल्लोल करते कुछ को देर हुई कुछ आगे के लिए निकल गये। नहाने वाले साथियों के बाहर आने पर देखते हैं कि घोड़े गायब थे। हमीर जी ने आदेश दिया कि समीप पहाड़ी पर चढ़कर देखो कि घोड़े ले जाने वाले कौन है? खबर मिली कि घोड़े पास के पड़ाव में हिनहिना रहे हैं। वहां जाकर पूछने पर वेगड़ा सामने आया और पूछा कि हमीर जी गोहिल आप हो क्या? हम तो आपकी बांट जोह रहे हैं। प्रत्युत्तर में हमीर ने पूछा कि वे लोग कौन है तब वेगड़ा ने अपना परिचय दिया। वेगड़ा का परिचय सुनकर हमीर गदगद हुए कहा की सोमनाथ का साका करने चले और आपका मिलाप हुआ। ॥

वेगड़ा ने हमीर को दो दिनों के लिए रोक लिया। इस बीच राजबाई को हमीर से विवाह का पूछा, जेठवा कुल की कन्या राजबाई ने स्वीकृति और संकोच के साथ लज्जा का आवरण धारण किया। हमीर जी ने भी स्वीकृति दी मगर एक समस्या आ खड़ी हुई कि जितने साका करने वाले साथी थे उनका भी विवाह नहीं हुआ था उन्होंने हमीर जी के विवाह की शपथ ली थी, उन सबके लिए भील कन्याएँ ढूँढ कर सभी के सामूहिक लग्न हुए। गिर की वादियां ढोल और बांसुरी से गूंज उठी। इस तरह मौत का वरण करने वाले योद्धाओं ने पहले उन भील कन्याओं का वरण कर सिर पर केसरिया बांध लिया। द्रोणगढड़ा का गिरी प्रांतर उस विवाह का साक्षी बना। कई बातें इतिहास के पन्नों से भले ही छूट रही हो लेकिन लोक मानस ने अपने हृदय में स्थान दिया है।

इस तरह गीर के जंगल में लग्न के दूसरे दिन सब के साथ वेगड़ा ने भी अपने साथियों के साथ प्रयाण किया। अरठीला गांव के साथी माणसुर गढ़वी भी रास्ते के छोटी बस्तियों के टिंबे आदि में अपनी बबकार लगा, योद्धा तैयार कर साथ ले चला। राजपूत, भील, काठी, अहीर, मेर, भरवाड़ और रबारी जाति के जवान सोमनाथ के लिए साका करने निकल पड़े।

वेगड़ा ने अपने खबरचियों के द्वारा जफरखान की फौज की जानकारी हासिल की। उधर दिल्ली की फौज सौराष्ट्र की सीमाएं रौंदती, राजाओं और ठाकोरों को दंडित करती आ रही थी, उसकी सेना को रोकने की सामर्थ्य न होने के कारण कोई उन्हें रोक नहीं रहा था। इधर हमीर और वेगड़ा सोमनाथ के प्रांगण में उन सेनाओं का रास्ता देखने लगे। पुजारी और प्रभास के नगरजन स्तब्ध होकर खड़े थे। जफरखान को तो जैसे सोमनाथ को रौंद डालना था। उसे समाचार मिला कि कोई सिरफिरे उसका रास्ता रोकने के लिए सोमनाथ में तैयार हैं। वेगड़ा का पड़ाव सोमनाथ और प्रभास के बाहर था। हमीर ने अंदर का मोर्चा सम्हाला था।

जफरखान उन्मत्त होकर वहां आ पहुंचा, बाहर के मोर्चे पर वेगड़ा भील के योद्धाओं के तीरों के हमले ने मुस्लिम आक्रांताओं की सेना को त्राहिमाम् करवा दिया। एक तरफ देवालय को तोड़ने का जुनून था तो दूसरी तरफ मंदिर रक्षा की विजीगिषा थी। हाथी पर बैठे जफर ने सेना का संहार देख तोपों को आगे करने का हुक्म दिया।

उस समय भील योद्धाओं ने जफरखान का इरादा भांप लिया। उन्होंने घनी झाड़ियों और वृक्षों की ओट से बाणों का संधान जारी रखा। सूबेदार के तोपची चित्कार कर गिरने लगे। जफर ने गुस्से में दूसरी पंक्ति को आगे कर दी, भील योद्धा भी खेत होते कम होने लगे। जफर ने कुशल हाथी के साथ एक सरदार को वेगड़ा के पीछे किया, हाथी ने सूंड में पकड़ कर उसे पटक दिया जिससे वेगड़ा वहीं सोमनाथ रक्षा यज्ञ में समिधा बनकर काम आए। दूसरी तरफ भीतरी सुरक्षा में रत हमीर जी सचेत थे जफर का हमला सोमनाथ गढ़ की ओर हुआ। सुलगते तीरों की वर्षा हमीर जी ने शुरू की। पत्थरों से भी आक्रमण हुआ। जो सैनिक गढ़ के पास थे उन पर उबलता तेल डाला गया। इस प्रकार पहला आक्रमण असफल हुआ। सांझ हुई मंदिर में आरती हुई। सभी साथियों को एकत्रित कर अगला व्यूह समझाया।

जफरखान ने सोमनाथ को तीन तरफ से घेर लिया चौथी तरफ समुद्र था। दूसरे दिन सुबह हमीर जी ने घुड़सवार होकर आक्रमण कर दिया और हाथियों को भालों से गोदकर त्राहि त्राहि करवा दी। जफर ने गढ़ में प्रवेश के लिए सुरंग खोद डाली जिसमें हमीर जी ने पानी भरवा कर प्रवेश को अवरूद्ध कर दिया। रोज नई योजना के साथ जफर का नौ दिन तक हमीर जी ने सामना किया।

सोमनाथ गढ़ के सामने नौ दिनों से जफरखान के सैनिकों से लड़ते हमीर जी के पास योद्धा खेत रहे, नौवें दिन की रात्रि शेष बचे योद्धाओं को इकट्ठा कर व्यूह समझाया, कि जैसे ही सूर्यनारायण पूर्व दिशा से निकले गढ़ के द्वार खुले छोड़कर 'केसरिया' कर लेना यानी आत्माहुति दे देना। "सभी सावधान हो जाओ" इतना कहते ही हर हर महादेव के घोष गुंजायमान हुआ। पूरी रात कोई योद्धा सोया नहीं, सोमनाथ के मंदिर में मृत्यु के आलिंगन की उत्तेजना की कल्पना ही की जा सकती है, उन वीरों ने रात भर अबीर गुलाल की होली खेली, भगवान शंकर को भी जैसे सोने न दिया।

भिनसारे नहा धोकर हमीर जी ने चंद्र स्थापित भगवान सोमनाथ की पूजा की, हथियारों से सुसज्ज होकर लाख बाई को चरण स्पर्श किया और आशीष मांगा साथ ही कहा कि 'आई अब मेरे कानों को मृत्यु के मीठे गीत सुनने की वेला आ पहुंची है। सोमनाथ के पटांगण में थोड़ी देर के लिए नीरवता फैल गई। पथारी पर बैठी 'आई' ने सुमीरनी फेरते हुए कहा - धन्य है वीर तुझको, तूने सोरठ की मरने पड़ी मर्दानगी का पानी रक्खा।' आई ने गाया -

वे'लो आव्यो वीर, सखाते सोमैया तणी।
हीलोळवा हमीर, भाला नी अणिए भीमाउत।
(વે'લો આવ્યો વીર, સખાતે સોમૈયા તણી;
હીલોળવા હમીર, ભાલાની અણીએ ભીમાઉત.)

माथे मुंगीपर खरू, मोसाळ वसा वीस।
सोमैया ने शीश, आप्यु अरठीला धणी।।
(માથે મુંગીપર ખરૂ, મોસાળ વસા વીસ;
સોમૈયાને શીષ, આપ્યુ અરઠીલા ધણી.)

गढ़ के दरवाजे खोल दिये और जफरखान की फौज पर योद्धा टूट पड़े। इस अचानक आक्रमण की कल्पना न होने से जफर अचकचा गया। उसने फौज को सावधान कर युद्ध आरंभ किया। इस ओर हमीर जी काला कहर बरसाते हुए लड़ रहे थे। सांझ होते होते दुश्मन फौज को बहुत पीछे धकेल दिया। हमीर जी ने देखा कि अब शेष बचे डेढ़ दो सौ योद्धाओं में किसी के हाथ, किसी के पैर, किसी की आँतें कट चुकी थी। हमीर जी ने निर्णय लिया कि अब युद्ध इसी परिसर में लड़ना है। सुबह होते ही जफरखान ने सामने से हमला किया, कारण कि वह ज्यादा समय कमजोर शत्रु को देने के लिए तैयार नहीं था। हमीर जी ने भगवान आशुतोष को जल अर्पण किया और सभी साथियों ने आपस में अंतिम जुहार करने के साथ रणांगण में उतर पड़े।

ग्यारहवें दिन की सांझ युद्ध में हमीर जी का शरीर क्षत विक्षत हो गया, तलवार का भयानक वार होने के बाद भी दुश्मन को बराबर प्रत्युत्तर दे रहे थे लेकिन ग्यारहवें दिन की सांझ शिव सेवा में उन्होंने स्वयं को अर्पित कर दिया। इस युद्ध को लाख बाई गढ़ की ड्योढ़ी से निहार रही थी और उस शूरवीर योद्धा की विरूदावली गा रही थी और गाया पहला शोकगीत -

रड़वड़िये रड़िया, पाटण पारवती तणा;
कांकण कमल पछे, भोंय ताहळा भीमाउत ।
(રડવડિયે રડિયા, પાટણ પારવતી તણા;
કાંકણ કમળ પછે, ભોંય તાહળા ભીમાઉત.)

वेळ तुंहारी वीर, आवीने उं वाटी नहीं ;
हाकम तणी हमीर, भेखड़ हुती भीमाउत।
(વેળ તુંહારી વીર, આવીને ઉં વાટી નહીં;
હાકમ તણી હમીર, ભેખડ હુતી ભીમાઉત.)

इधर चारण मां अपने शूरवीर पुत्रों के शोकागीत गा रही थी और जफरखान के सैनिकों के हाथों सोमनाथ का देवल लुट रहा था। हमीर जी इस तरह अपने अनुपम पराक्रम से इतिहास के पृष्ठ लाँघते हुए लोक जीवन के कंठ से होकर हृदय में विराजित हो चुके थे। जब सौराष्ट्र का शौर्य बिखरा हुआ था तब अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ स्वयं का बलिदान हमीर जी को लोकमन का नायक बना गया।

सोमनाथ मंदिर के बाहर वेगड़ा जी की और मंदिर के परिसर में हमीर जी की डेरी आज भी पूजी जाती है। सोमनाथ मंदिर की लूट में भले ही आक्रांताओं ने बहुत बार प्रयास किया हो मगर तत्कालीन वीरों ने अपने बलिदानों से इस धरा को अभिषिक्त किया है।

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

यथोचित प्रणाम।  जो शहीद हुये है उनकी...... 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में,  अंग्रेजों के खिलाफ बहराइच जिले में रेठ नदी के तट पर एक निर...