गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

अभिनंदन जी का अभिनन्दन

अभिनन्दन का अभिनन्दन  हम पलक पावड़े बिछाये बेठे हे,
जाकर तह तक तह लेलो कुछ गद्दार नकाव लगाये बेठे हे!

बो मात भारती का लाल दुष्ट दमन करते गगन से कूदा था,
डूब मरो लेता जी जंग लगी खड़गो को ले जंगजू जंग कूदा था!

चार दशको में तुम एम्बेसडर से लेंजरोवर पे आ जाते हो,
रण जाते रणवीर को 'नेहरू-रेजांगला' कसक उकसाते हो !

अरे नहीं चाहिए हमको महंगे वादे तकनीकी पर सुधार करो,
जननायक बन उभरे हो कुछ देशद्रोहियो का भी संघार करो!

पापी पाक की औकात नहीं जो भारत भाल को निहार सके,
निवेदन हे कृषक सुत बन हलधर दमन करो दुस्ट न विहार सके!

आस्तीन के सांपो के अब बांह उलट फन कुचलने होंगे,
मुफ़्त की महबुबाओ से महबूब छीन छलनी करने होंगे !

जब भी वक्त आएगा घर घर से माँके लाल महादेव बन जाएंगे,
सजे रोली माथे पर कफ़न बाँध हम रायफल कन्धे पे आएंगे !

पर इतना याद रखना सरहद पर मुफ़्तखोर सांसद विधायक नहीं
खून पसीने से फसल सिंचित करने बाले श्रम जीवि वोटर ही जाएंगे ...!!

🇮🇳जय हिन्द

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

छुटकी गर्लफ्रेंड 'महक'

#मेरी_छुटकी_गर्लफ्रेंड
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उन दिनों बीते समय की असफलताओ से निकले के लिए एकाकी जीवन को में रँगने की कोशिश कर ही रहा था।क्यों की बीती को बिसारने में मुझे जेसे एक ऊर्जा का आभाष हुआ करता था ।

उस दिन नित्य की तरह अपने कानो में 'हेण्डस्फ्री' लगाये में पार्क में टहलते,कूदते,बतियाते लोगो से दूर नितांत में बैठा हुआ,आँखे बन्द किये 'जगजीत सिंह जी' की स्वरलहरी में खोया हुआ था।की एकाएक किसी के दो नन्हे अपरिचित ठंडे हाथो से मेरे कल्पना सागर में गोते लगाते हुए अंतर्मन को आँखों के माध्यम से स्पर्श किया और कानो में शब्द पड़े "अंकल-अंकल......अंकल..........अंकल्लल्लल्ल...!!" ने तन्द्रा को भंग कर दिया ।
जब पलको को खोल प्रतक्ष्या को देखा तो जो क्रोध तन्द्रा भंग होने पर प्रकट हुआ था वह अग्नि के समक्ष रखे कपूर की भाँती काफूर हो गया।क्योंकि जिसे मेने देखा वो करीव 5 वर्षीय एक बालिका थी और चावल की भाति धवलदन्तवली से बाग़ में खिले #पुष्प की भाँती अपनी आभा से अनुपम क्षटा विखेर रही थी।हलके गुलाबी फ्रॉक में खड़ी बो मोहन की मोहक छवि ने जब मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ाकर बोला की "अंकल आप मेरे बोयफ़्रेंड बनोगे?" मेरे मुह पर न चाहते हुए भी हँसी आ गयी और उसकी बातो को दिलचस्पी से सुनने लगा ..!

पता ही न चला कब ये असम्भावित -अप्रत्याशित मुलाक़ात हृदय की उन शुष्क होती भावनाओ को स्पर्श करने लगी थी जिनसे बचने के लिए में नितांत को चुनने लगा था।और फिर ये मुलाकाते जेसे उस समय का अभिन्न अंग बन गयी ।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा में दिनप्रतिदिन उस के स्नेहपाश में बंधता रहा।इन दो तीन माहो में बो कितनी बार मुझसे अपने बाल बंधबा चुकी थी और में कितनी ही बार अपने जेबखर्च की कटौति करके उसको लस्सी से लेकर पोहा-जलेबी खिला चुका था किन्तु आश्चर्य ही था जो लड़का स्वम को नहीं जान सका बो छोटी बच्ची उससे बेहतर उसे जान चुकी थी।उन दिनों मेरी भावनाये  उस पिता के सदृश थी जो अपनी बिटिया के लिए सब कुछ छोड़ बस उसकी मुस्कान देखने को आतुर रहता हो !
किन्तु मुझे एक बात अवश्य चुभती थी की इतनी छोटी गुड़िया प्रायः अकेली ही क्यों आती?बड़े ही गैरजिम्मेदार माता-पिता हे जो इस फूल सी बच्ची को सुभह-सुभह अकेले पार्क आने देते हे!और अंतर्मन में तीव्रता से दौड़ते इस प्रश्न का शीघ्र ही मिल गया जब एकाएक उसको चक्कर आया और वह मुर्छित हो गयी .....में अवाक था.....!मुह पर एक अंनजाना भय जेसे किसी अपने को खोने की आभास हुआ हो और उसे अप्रत्याशित रूप से ले भागा नजदीकी क्लीनिक पर।व्यग्रताये चरम पर थी और न क्यों सुख चुकी आँखे बार-बार सजल हो रही थी।
डॉक्टर परिचित थे उस भोली बच्ची से और चेकअप दौरान उनका मोन मुझे अधीर किये जा रहा था।करीब 20 मिनट बाद उन्होंने आँखों से चश्मा और कानो से स्टेथस्कोप निकालते हुए मेरी और  प्रश्नवाचक दृस्टि से देखा और कहा .....!"हा तो मिस्टर ....!"
जी सर मुझे जितेन्द्र सिंह तोमर कहते हे और में इसी कॉलोनी के नजदीकी होस्टल में रहता हु और यहाँ रहकर विज्ञानं तकनीकी विषय से अध्ययन कर रहा हु।यह बच्ची मुझे पिछले 3 माह से फला पार्क में घुल-मिल गयी हे किन्तु आज न जाने क्यों बेठी-बेठी अचेत हो गयी कोई बड़ी दिक्कत तो न हुई हे !

मेरे शब्दों को सुनकर डॉक्टर गम्भीरता पूर्ण बोले "देखिये तोमर जी यह बच्ची हे ही ऐसी की जो एक बार मिला बो इसका हो गया और 'महक' को एक लाइलाज बीमारी हे जो इसे इसकी माँ से आनुवंशिक तोर पर मिली हे।ब्लड केन्सर के चलते प्रति 4 माह बाद इसका ब्लड हमे बदलवाना पड़ता हे और यह मेरी ही बच्ची हे !"

मन में आया की इस डॉक्टर का मुह तोड़ दू किन्तु उसकी चिकित्सीय इक्यूपमेंट बाली टेबल रखी उसी बच्ची की खिलखिलाती फोटो देख में बस जड़वत था।
शायद फिल्मो के बाद रियल लाइफ में इस 'केन्सर' की दरिंदगी से परिचित हुआ था और मन ही मन ईश्वर की श्रद्धा और वास्तविकता को कोस रहा था।'महक'की रगो जाती ड्रिप की हर बून्द के साथ  जेसे में अपनी शिराओं को शुष्क महसूस कर रहा था ।
"तोमर जी कॉफी ..."
मेरी तन्द्रा को तोडा उसके डॉक्टर पिता की आबाज ने जो मेरे समक्ष भाप उड़ाते मग को बड़ा रहे थे और में कही दूर अपनी सोचो में पतवार रहित नैया खेय रहा था ।
कॉफी और उसकी वाष्प मुझे कुछ स्मरण दिला रही 'महक' से पूर्व 'पुष्प' का स्नेह कही धमनियों में पुनः जागृत हो रहा था और वाष्प उड़ाते कप में नयनो का सुखा हुआ नीर कम होती विलेय क्षमता को पूर्ण कर रहा था ।
न उस डॉक्टर के पास प्रश्न थे न मेरे पास प्रश्न तो वार्तालाप कैसे सम्भव होता और में अचेत बिटिया के माथे पर अपनी बात्सल्य अभिव्यक्ति अंकित कर वहां से चला आया ।
सुबह नीयत समय पर में पार्क नहीं महक के घर था किन्तु घर में लगा ताला और क्लीनिक के सामने लगी खाली थडी से चिंतित था।पूछने पर ज्ञात हुआ की डॉक्टर साव यहाँ मात्र अपनी पत्नी की यादो के बजह से रहते थे और अपार धन होते हुए भी अपनों से निर्धन थे।उनका क्लीनिक भी धर्मार्थ था जो मात्र 10 रूपये सेवा शुल्क के नाम पर लोगो का शुल्करहित उपचार किया करते थे।आज बो बेबस थे और न चाहते हुए भी 'बोनमेरो ट्रांसप्लांट' के लिए महक सहित कनाडा वाया मुम्बई को उसी रात निकल गए थे क्योंकि महक को अब मात्र यही एक उपचार या युक्ति साँसे दे सकता था ।

मुझे याद नहीं की मेने महक के उस छोटे से वैनिटीकेस से कितनी बार दो चोटी बाली चोटिया बनाना सीख लिया था!कितनी बार निसन्तान रहकर उस छोटी मूरत से एक विद्यार्थी आयु में ही पिता का अनुभव कर लिया था ।
जब उसके लिए पुरे 60 रूपये खर्च करके तितली की पंख हिलती क्लेचर उसकी बालो में लगाई थी तो अहसास हुआ था की ईश्वर अगर कही हे तो बो इन बाल-गोपालों में!जिनसे मिलकर न धर्म गौण रहता हे न जाति का महत्ब,महत्ब रखता हे निश्छल स्नेह जो मुझे-मेरी उस नन्ही सी 'गर्लफ्रेंड' ने उन तीन माह में बखूबी सिखाया था ।

आज वर्षो बाद भी में उस पार्क के इर्दगिर्द उन झाड़ियो में स्वम को और उस परी को खोजता हूँ।किन्तु न डिसूजा जी का अब क्लीनिक हे न उनकी कोठी बस उसी जगह खड़ी झुल्हे बाली तिपाहि जिस पर मेने अपने अंक में लेकर कितनी बार उसे झुलाया था।और उसने मुझे कितनी बार 'स्मोकिंग इज इंज्यूरिअस टू हेल्थ" कहकर कितनी ही बार कहकर दादी जी की तरह डाटा भी था ......!!

आज सात वर्ष हो गए उसकी मेरी पहली मुलाक़ात को और समय की दुरूह मार ने उसको मेरे अंक से छीन नीले गगन के 'सितारों' में स्थापित कर लिया ...!!
एक अभिभूत पिता से उसकी पुत्री,एक नितांतवादि दार्शनिक प्रेमी से उसकी गर्लफ्रेंड और श्रद्धांवित 'पुष्प ' की 'महक' उससे दूर इन फिजाओ में आज के दिवस घुल गयी ......!

मेरी नन्ही परी में खुदगर्ज हूँ ,में तुम्हारी 'क्रेब' पर 'पुष्प' अर्पण नहीं कर पाउँगा !
इतनी सी इल्तिजा हे इस जीवन में तुम्हारे दो चोटी बालो में पुनः 'पुष्प' सजाऊंगा !!

तुम सदैव याद आओगी मेरी बेटी......!मेरी एक और असफलताओ के रूप में .......
हृदय की अंतरिम गहराइयो से श्रधांजलि 🙏🚩🙏

तुम्हारा बॉयफ्रेंड अंकल
~जितेन्द्र सिंह तोमर '५२से'

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

राजनीति का असली रूप

रूबिया सईद अपहरण कांड ।

कश्मीर के मुफ्ती मुहम्मद सईद अपने लिए जमीन तलाश रहे थे । वे कभी कांग्रेस कभी नेशनल कांफ्रेंस में आ जा रहे थे । बाद में उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बना ली - पी डी पी । उस दौर में विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीति अपने शबाब पर थी । उस समय राजीव गांधी की पार्टी वांछित बहुमत हासिल नहीं कर पायी थी । इसलिए सबसे बड़ी बहुमत हासिल करने वाली पार्टी के नेता होते हुए भी उन्होंने सरकार बनाने से मना कर दिया । विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी जनता दल ने सरकार बनाया । उस सरकार में पी डी पी नेता मुफ्ती मुहम्मद सईद को गृह मंत्री बनाया गया । गृह मंत्री बनते ही मुफ्ती मुहम्मद सईद को वह जमीन मिल गयी , जिसकी उन्हें दरकार थी । सबसे पहले उन्होंने कश्मीर में अपना मनपसंद गवर्नर जगमोहन को बनाया । फारूख अब्दुल्ला को इस्तीफा देना पड़ा । बाद में राॅ के रिटायर्ड निदेशक गैरी सक्सेना को राज्यपाल बनाया गया।

8 दिसम्बर 1989 को मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का अपहरण हो गया । रूबिया सईद ललदद हाॅस्पिटल में डाक्टर थीं । वे अपनी ड्यूटी पूरी होने के उपरांत घर जाने के लिए सिविल बस में सवार होती हैं । ( एक गृह मंत्री की बेटी सिविल बस में सफर करे, यह आश्चर्य की बात है !) । उसी बस में कुछ आतंकवादी भी चढ़ते हैं । फिर रूबिया का अपहरण हो जाता है । इस प्रकरण के दो घंटे बाद जे के एल एफ ने इस अपहरण की जिम्मेदारी लेता है । वह बदले में अपने सात साथियों को छुड़ाने की बात करता है । फिर नेगोशिएस्न्स का दौर चलता है । बात पांच आतंकवादियों को छोड़ने पर जम जाती है । अपहरण के पाँच दिन बाद यानी कि 13 दिसम्बर 1989 को रूबिया सईद को छोड़ दिया जाता है । पांचों आतंकवादी भी रिहा कर दिए जाते हैं । स्पेशल फ्लाइट से रूबिया को दिल्ली लाया जाता है ।मुफ्ती मुहम्मद सईद बयान देते हैं - " एक पिता के रुप में मैं बहुत खुश हूँ , पर एक राजनेता के रुप में मैं कहता हूँ कि ऐसा नहीं होना चाहिए था "।

आतंकवादियों को रिहा करते समय जे के एल एफ ने वादा किया था कि कोई जुलूस , आतिशबाजी या प्रदर्शन नहीं किया जाएगा , लेकिन यह वादा टूटा और बुरी तरह से टूटा । पूरी घाटी में रात भर जश्न मनाया गया । खुशियाँ मनायी गयी । भारत सरकार के इस असफलता को खूब जोर शोर से उछाला गया । मुफ्ती मुहम्मद सईद को घाटी में जिस जमीन की तलाश थी , वह मिल गयी थी ।रूबिया सईद के अपहरण के बाद से घाटी में अपहरणों और हमलों का दौर शुरू हो गया -

1) कश्मीर विश्व विद्यालय के उप कुलपति प्रोफेसर मुशरील हक और सेक्रेट्री अब्दुल गनी का अपहरण हुआ ।
2) एच एम टी के जेनरल मैनेजर एच एल खेड़ा का अपहरण  हुआ ।
3) इंडियन आॅयल कार्पोरेशन के एक्सक्यूटिव डायरेक्टर दुरई स्वामी का अपहरण हुआ ।    

इसके अतिरिक्त आई सी 814 का हाई जैक , संसद पर हमला जैसी बड़ी घटनाओं को भी अंजाम दिया गया ।

इस घटना के बाद संसद में राजीव गांधी ने रहस्योद्घाटन किया था कि रूबिया सईद का अपहरण पूर्व नियोजित था , जो गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की संज्ञान में था । रूबिया को बारामुल्ला की एक मस्जिद में रखा गया था । रूबिया के घर से उसका नाश्ता व खाना आता था । इस आरोप का कोई माकूल जवाब मुफ्ती मुहम्मद सईद नहीं दे पाए थे । अलगाववादी नेता हिलाल वार ने भी अपनी किताब " ग्रेट डिस्क्लोजर - सीक्रेट अनमास्क्ड " में लिखा है कि पूरी योजना तत्कालीन डीजीपी के घर में बनायी गयी थी । वहां एक बैठक हुई थी , जिसमें जे के एल एफ के नेता यासीन मलिक भी शामिल थे । आज भी हिलाल वार डंके की चोट पर कहते हैं कि यदि मैं गलत हूँ तो यासीन मलिक मुझ पर मुकदमा करें । मैं कोर्ट में इस बात को साबित कर दूंगा ।

यासीन मलिक से पूछने पर वे कहते हैं - इस बात को गुजरे जमाना हो गया है । आज ये प्रश्न क्यों ? अब इसे कुरेदने से कोई फायदा नहीं है ।

क्या मिला!

अलग अपना घर बसा कर क्या मिला  हमको,
रिश्तों को अकारण तोड़ करक्या मिला हमको !

कभी कितना विशाल था अपने घर का आंगन,
पर टुकड़ों में उसको बांटकर क्या मिला हमको !

मुस्कराते थे कभी कितने फूल मन उपवन मेंपर ,
खुद ही उसे बरबाद कर क्या मिला हमको !

सबसे अलग दिखने की चाहत का क्या कहिये,
पर खुद को यूं मशहूर कर क्या मिला हमको !

सोचता होगा भगवान भी सर पकड़ कर,
कि इस इंसान को बना कर क्या मिला हमको ?

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

बदल गया इंसान

अमृत बता कर लोगों को, वो ज़हर बेच सकता है,
अपनी जागीर बता कर, वो समंदर बेच सकता है !

उसकी नसों में खून बहता है मक्कारियां बन कर,
वो अपना ही बता कर, औरों का घर बेच सकता है !

न जाने क्या हुआ है इंसान के ईमान को दोस्तो,
कि अपने नाम से किसी का, वो हुनर बेच सकता है !

ज़माने में कोई तो गिर चुका है इतना दोस्तो कि
ज़रा से ऐश की खातिर, वो हमसफ़र बेच सकता है !

रोग ए हवस ने अब घेर रखा है आदमी को दोस्त ,
ज़रा से नफ़े के लिए, अपनों का सर बेच सकता है !

एक वर्ष पूर्व

रश्म ओ गारित हर एक मंजर दिखाई देता हे ,
मुझको जलता हुआ मेरा घर दिखाई देता हे !

जीवन निकलाखुशियो का कैदखाना बुनते-बुनते
देखा टूटा हुआ फुस का आशियाना दिखाई देता हे !

हर शै यहा चेहरे पर नया चेहरा लगाये खड़ी हे
रूहानियत फिर मासूमियत का खरीदार दिखाई देता हे!

शामे ख्वाव के तृणआशियाने उजड़े जा रहे हे दोस्त ,
क्या करना और क्या कर बेठे में खोया दिखाई देता हे !

उड़ते हुए धुएं सी थी जेहन में मंजिले कभी अशेष ,
आज बेरंग बादल सा गगन में भटकता दिखाई देता हे !

सोचा था उन्मुक्त गगन सी गरिमा बन यशोभित होंगे
आज खड़ा चौराहे की तरह एक राह दिखाई देता हे !

   

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

पुलवामा अटेक पर

भारत की जनता देशद्रोहियों को कभी क्षमा नहीं करती लेकिन उसका गुस्सा सिर्फ तात्कालिक होता है और कुछ समय बाद चिकना घड़ा सब सूख जाता है कितना भी कोई काटे दर्द बस दर्द रहने तक बाद में सब माफ़ .....!
किन्तु #अवन्ति पूरा-पुलवामा ऐसा घाव हे जिसे बदला मिलने तक पुनि-पुनः कुरेद-कुरेद कर उस दर्द का अहसास होने देना हे क्यों की हमने जो 44 बंधू इस कायरता से भरे हमले में खोये हे।उनको हर एक सेंटीमीटर माप कर,पालपोस कर राष्ट्र को समर्पित किया था और वह सर्वोपरि वलिदान देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हे।किन्तु इससे बड़ा कष्ट एक राष्ट्र के लिए और क्या होगा जिसने प्रत्येक जवान सेमी-सेमी माप कर लिया हो और घर लौटाने के लिए सेमी-सेमी चुनना पड़ा हो ...!

अवन्तिपुरा की सड़को से वह वीररक्त साफ़ कर दिया होगा किन्तु भारतमाता के आँचल पे लगे इस ममता के दाग को कैसे धोया जाए ...!
माँ का आँचल उसके बच्चों के रक्त के धोने के लिए माँ को दुश्मनो का रक्त जाहिये फिर चाहे वो राष्ट्रद्रोही मझहवी कश्मीरियों का हो या देश की विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओ में पल रहे सफेद आतंकियों का हो !

हा उनको देखा हे हम सबने इस शहादत पर जश्न मनाते हुए।पार्टियो के लिए टिप्पणी नुमा निमन्त्रन  देते हुए!आज समय हे इस ग़हरे जख्म को जो हमने 14 फ़रवरी को खाया हे उसे दुष्ट दुश्मन के अस्थिमज्जा,माँस, रुधिर का स्नेहलेप लगाया जाए ।
भारत की राजनयिक सत्ता से अनुरोध हे की 35a और 370 जेसी घृणित धाराओ को समूल रूप से खत्म कर इन राष्ट्र द्रोहियो की नश्ल का समूल उन्मूलन कर दिया जाए ।
देश से यह राष्ट्रद्रोही बीज नाश कर पुनः किसी की हिम्मत न हो ऐसा दण्ड दिया जाए ।

कड़ी भृत्स्नाये और निंदाये बहुत हुई साहव अब सहन नहीं होता।क्यों न इन निंदाओ और भर्त्सनाओ को क्रोध में परिवर्तित कर इन हरामी आतंकियों को चोराहो पर लटका कर सुखा दिया जाए ।
राजनयिक दलो को वोट की राजनीति छोड़ सत्ता पक्ष्य का साथ देना चाहिए और कमीने सिद्धू जेसे पाक परस्त को तत्काल जेल में डाल सडा देना चाहिए ।

अमेरिका के पेंटागन और व्हाइट हाउस पर आतंकी हमला हुआ था और जश्न अफगान में मना ...!
परिणीति में अमेरिकी फौजो ने अफगान से एक एक आतंकी को चुन-चुन कर मारा हे।क्या हम उन मज़ हवी कश्मीरियों और विभिन्न विश्व विदयालयी मज हवियो को मार इस देश की दीमक को खत्म नहीं कर सकते ..!

हा मेरा खोलता रक्त उन राष्ट्र द्रोहियो के लहू से सड़के लाल करने को आतुर हे।आप बिपक्ष और अंतराष्ट्रीय नीतियों से बंधे होंगे किन्तु हम भारतवासी नहीं,कम से कम अपेक्षित आग्नेयास्त्र ही उपलब्ध करा दीजिये।अगर राष्ट्रहित में गुमनाम मृत्यु  आई तो अभिनन्दन के साथ स्वीकार्य हे ।

बहुत सहन किया अब तक किन्तु अब टुकड़ो हुए दिव्य पार्थिव शरीर देखे नहीं जाते!आखिर हम कब तक अपनों कन्धों पर सेनिक भाइयो की ताबूते ढोये क्या हमारे कन्धे अपने भाइयो के साथ कन्धे-कन्धा मिलाकर  रायफल और रॉकेट लांचर नहीं ढो सकते  सकते !

में देखता हूँ प्रातः-प्रातः अपने गाँवों का जज्बा जहाँ भाइयो की वीरगतिया देख लड़को का क्रोध और बदले की भावना से सड़को को रौंदते युवा जो सैनिक बनने के लिए इतनी सर्दी में पसीने से लथपथ होकर देश के लिए समर्पित होना चाहते हे।एक भाई की शहादत का बदले के लेने के लिए कम से कम 100 पाक और पाकपरस्तो का नरमुण्ड उन सूखे आंचलों और सिंदुरो,कलाइयों के लिए कॉंपति उंगलियो के लिए  लाना चाहते हे ।

किन्तु....!!
क्रोध परवान चढ़ता हे जब भारत में रहकर भारत का खाकर,आधुनिक पढे-लिखे देशद्रोही विश्वविद्यालयी आतंकी शोशल मिडिया पर हमारे भाइयो की शहादत का जश्न मनाते हे ।
आज वक्त हे देश की दीवारो में लगे इस विश्वविद्यालयी घुन-दीमक पर पेट्रोल छिड़क आग के हवाले कर दिया जाए।क्योंकि हम कृषक पुत्र वर्षो से अपने खेतो में लगी दीमक,टिड्डी,कीटो को होनेबाली हानि को नजरअंदाज कर मात्र अगली फसलो के भविष्य के लिए यह हानि भी स्वीकार कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते आ रहे हे ।
आखिर भारत क्षतिपूर्ति विस्मसरण करने बाला देश हे कुछ समय बाद सब भूला देगा.....!!

#पुलवामा अटेक पर द्रवित और क्रोधित लेखनी के साथ ....वीर सपूतो को कोटि कोटिस नमन
----जय हिन्द
..................
जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

स्नेह आलिंगन

#प्रेम_आलिंगन
नेमत उस ईश्वर की जो सिंखा दिया कब जरूरत किसको किसकी गले लगा दिया!

काश अहसासो के समन्दर होते भर लेता, नफरत की हमने इश्क जानवरों ने दिखा दिया!

इंसानियत जहाँ पल पल मरती दम तोड़ती दिखे,
शावक ने शावक को शाबाशी से अंक लगा लिया!

दोपायो का आलिगन कितना बोना सा दीखता हे,
मुहब्बत की असल नजीर तो बस चौपाया लिखता हे!

निस्वार्थ नेह समर्पण इस चोपाई छवि में दिखता हे,
इंसान दोपाया होकर भी चौपाये से निम्न लगता हे!

वलिहारि राम आपने जो प्रेम मूरत की सूरते दिखाई,
ओरो को न सही कम से कम 'असफल' प्रेमरीती सिखाई!!!!
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"स्नेह आलिंगन"
~असफल'५२से'

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

चम्बल एक सिंह अवलोकन


             
'सामंत चंड महासेन और प्रथम बागी'
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'बीहड़' का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।हल्की भुरभुरी से बने ऊँचे और विशालतम पर्वतनुमा टीले और टीलो के अनुरूप उगी हुई शुष्ककालीन कँटीली वनस्पति हालाँकि औषधीय दृस्टि में बहुमूल्य जडियो का खजाना भी कह सकते हे किन्तु यह बीहड़ कैसे बना, इसकी अहम कहानी क्या है!यह आज भी शोध और अध्यन का विषय हे ।
चम्बल की कहानी प्रारम्भ होती हे  महु से और धौलपुर, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, आगरा की तराई से पचनद इटावा की मरुभूमि में इसके पानी को 'तामसी खाद' का एक अद्भुत संगम मिलता हे। राजस्थान के कोटा को आँचल में समेटे यह एक मात्र स्वच्छ नदी 900 किमी क्षेत्र में अपना अंक समेटे है।बीहड़ के बीचो बीच एक सुन्दर और देश की स्वच्छ चंबल नदी बहती है ।

यह भारत की इकलौती नदी है जो प्रदूषण से मुक्त है, पर इसके जल को न तो इंसान, पी सकते हैं और न ही जानवर(ये बात हालांकि अतिशयोक्ति हे )। चंबल को शापित नदी के नाम से जाना जाता है। इस नदी के बारे में पुराण में भी लिखा गया है, चंबल की जिक्र महाभारत काल में है। मुरैना के पास इसी नदी के तट पर शकुनी ने जुएं में पांडवों को पराजित कर द्रौपदी का चीरहरण किया था। तभी क्रोधित होकर द्रौपदी ने नदी को शाप दिया था !
 जहाँ सभी नदियो के आँचल में महानगरो का वैभव आया वही चम्बल को मिले कांटे,जलीयग्रह,बगावती तेवर रक्त-रंजिस की दुश्मनिया,अंग्रेजो के विरुद्ध गोलियों से लेकर डकैतियों तक के महानायक और स्वतन्त्र हुए राष्ट्र को समर्पित हजारो सैनिक....!

इसके अभिशप्त होने को उससे भी पहले राजा रंतिदेव के समय से जोड़ा जाता रहा है। शुरू से ही बगावत को शरण देने वाले माने जाते रहे इसके बीहड़ों में  दिल्ली से रॉज्योच्युत होकर आए तोमर राजवंश ने भी शरण पाई थी और इसके पश्चिमी क्षेत्र की तराई को एक इतिहास संगत संज्ञा "तँवर घार" की स्थापना हुई ।
मुगलों और अंग्रेजों के काल से डाकू समस्या के लिए इसे जाना जाने लगा था। लेकिन क्या आप जानते है कि इस घाटी में पहला डकैत कौन था?
 
धौलपुर के व्याघ्रप्रद गोत्रीय सामंत चंड महासेन की गाथा, जो अपने अधिकार छीन लिए जाने पर बगावत कर बाग़ी और लूट के कारण डाकू बन गया था।  
बात उस दौर की है जब दिल्ली पर तोमर शासन समाप्त हो गया  था। उनके धौलपुर सामंत को हटा कर मालवा के शासक राजा भोज ने अपना सामंत नियुक्त कर दिया था। लेकिन धौलपुर के तत्कालीन वत्स वंश के युवराज महासेन को ये कतई स्वीकार नहीं था। चंबल क्षेत्र पर अपने वंशानुगत अधिकार को हासिल करने के लिए आखिरकार वह बागी बन गया। उसने चंबल के बीहड़ों में अपनी सेना के साथ शरण ले ली, और चंबल के रास्ते मालवा की और जाने वाले व्यापारियों से कर वसूलना शुरू कर दिया। कर देने से मना करने वालों को महासेन दंड भी देने लगा। व्यापारियों ने सख्ती से पेश आने की वजह से उसके नाम के आगे चंड भी जोड़ दिया। मालवा के शासक राजा भोज से उसकी शिकायत डाकू चंड महासेन के तौर पर की गई। 
धौलपुर से मुरैना होते हुए भिंड तक फैले चंबल के जलीय रास्तों से गुजरने वाले व्यापारियों को चंड महासेन ने लूटना शुरू कर दिया था।  चंबल के रास्ते से गुजरने वाले व्यापारियों के दल को चंड अचानक बीहड़ों से निकल कर घेर लेता था और व्यापार कर मांगता था। जब जवाब राजा भोज को कर चुकाने के हवाले से न में मिलता था, तो चंड और उसके सैनिक कर से कई गुना धन जबरिया व्यापारियों से वसूल कर लेते थे। चंबल घाटी के दूसरे डकैतों की तरह चंड महासेन भी देवी का भक्त था। वह बीहड़ों में तोमर राजवंश द्वारा स्थापित देवी मंदिर में नियमित पूजा करता था। उसने बीहड़ों में एक किले नुमा छोटा सा ठिकाना भी बना लिया था। अपने अधिकार को छीनने के जुनून ने चंड महासेन को निर्दयी हत्यारा बना दिया था ।
  
 चंड के उत्पात से व्यापारियों में आतंक व्याप्त हो गया। राजा भोज ने उसे पकड़ने कई सैनिक अभियान चलाए, लेकिन बीहड़ों की कठिनता की वजह से चंड का कुछ  नहीं बिगड़ा। आखिरकार राजा भोज ने दिल्ली से आकर चंबल क्षेत्र में बसे तोमर शाशक से चंड के आतंक से छुटकारा दिलाने का आग्रह किया। उसके बदले में तोमरों के शासक 'वज्रट तोमर' को चंबल क्षेत्र में कर वसूली का अधिकार देने की पेशकश की। और मात्र 'सामन्त' पद के लिए तोमरो की तलवारे तोमरो के रक्त से रंग दी गयी ।
युद्ध स्तिथि बड़ी विकट थी,दोनो तरफ एक ही रक्त अपने पक्ष का प्रतिनिधित्व कुशलता से कर रहा था किन्तु चन्दमहासेंन रूपी छलावा हर बार धता बता कर आसानी से निकल जाया करता आखिर बो भी इस मिटटी का लाल था और परम्परागत छापामार,गुरिल्ला युद्धों का पारंगत था ।
कितने प्रत्क्षय दिवसीय युद्ध हुए दोनों तरफ से बहने बाला रक्त एक था किन्तु ग्लानि किसी को नाममात्र ना थी।हा चिंता और चिंतन मात्र अपनी-अपनी रक्षा और आक्रमण का था ।
इसी बीच भदावर नरेश को निमन्त्रण दिया गया की वह अपने क्षेत्र को महसैन से मुक्त कराने के लिए बागी उन्मूलन कारवाही में सहयोग करे और भदावर नरेश सहर्ष तैयार हुए ।
वह दिन शायद चंड महासेन के लिए बुरा था और एक व्यापारियो का बड़ा जत्था धौलपुर-मुरैना की राहो से गुजरा जिसमे दिल्ली से पहुच रचे एक बड़े खजाने की अफवाह साथ थी और महासेन की टोली  ने चिरपरिचित अंदाज में आक्रमण किया किन्तु खारो में छिपी एक बड़ी टुकड़ी से खनखन तलवारे बजने लगी चहुओर से घिरी महासेन की टुकड़ी धराशाही होती रही और एक भल्ल महासेन के उदर को आरपार भेद गया और  बीहड़ो के आदी हो चुके तोमर सैनिकों ने चंड को मार गिराया, व्यापारियों को चंबल के रास्ते से निर्भय होकर गुजरने देने को खुद मुस्तैद रह कर सुनिश्चित किया ।
शायद बागियों के इतिहास यह पहली घटना होगी जब एक सगोत्रीय द्वारा सगोत्रीय रक्त से पहली सगोत्रीय पिपासा की नीव रखी थी जो आज भी निरन्तर रक्त पिपासाये जागृत कर ही देती हे .....!
इति.....!!

कथासूत्र:-विभिन्न पत्रपत्रिकाओं का अध्यन,बुजुर्गो के किस्से,'चम्बल का रक्त रंजित इतिहास' पुस्तक व स्वम के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित ।
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      जितेन्द्र सिंह तोमर'५२से'

राजा भलभद्र सिंह 'चहलारी'

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